मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

ढाई आखर


* कुछ हो न हो
तुम सुंदर तो हो
यही बहुत |

* तरस गए
मेरे होंठ , बोलना
ढाई आखर |

* वह अंधी थी
मैंने आँखें चूमीं तो
खिले कमल |

* लोकतंत्र की
दूरी ज्यादा नहीं है
भीड़तंत्र से  |

* क्या घुस जाए
कब मेरे सिर में
नहीं जानता |

* सरकार हो
अव्यवस्था न हो तो
सूना लगता |

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