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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

Individualism

Idea:-
Individualism / Individualist
*अकेला आदमी जो कर/ बन सकता है ।
*अकेले अकेले एकलव्य जन ।
*आदमी के अंदर का असल आदमी, जो हर दूसरे आदमी से अलग/भिन्न है ।

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

क्रांतिकारी भजन ?

क्रांतिकारी भजन ?
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परभू के गुन गाते चलो,
ईंट से ईंट बजाते चलो । ☺️👍

रविवार, 28 जुलाई 2019

Urban Naxal Party

अन - UN - Urban Naxal Party
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नाम साभार भारतीय जनता पार्टी
हमें कुछ नहीं करना है । बस उनके हुक्म की तामील कर देनी है, आदेश का पालन कर देना है ।
Urban Naxal Party अर्बन नक्सल पार्टी should be formed. Without delay.
और देर हो ही किस बात की ? सब उन्होंने बना बनाया, पका पकाया दे दिया है, या रेसिपी बता दिया है । सब प्रचारित कर दिया है UN कौन होते हैं, क्या करते हैं, उनकी नीति क्या है ?
फिर तो केवल पार्टी की घोषणा कर देनी है और चुनाव की राजनीति में उतर, कूद पड़ना है ।
Urban means शहरी (उर्दू- सभ्य) अर्थात "नागरिक" (हिंदी) -- Citizen ( अँग्रेज़ी)
और यह citizen होती है वस्तुतः समझदार, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी चरित्र की जनता !
तो सचमुच वही तो हैं हम । भाजपा को धन्यवाद कि उन्होंने हमारा चरित्र तो देश को बता दिया ! अब उनके स्वप्न को हमें पूरा करना। है ।
(उग्रनाथ नागरिक)

नागरिक दर्शन

Philosophy दर्शन
Scientific Civilism
वैज्ञानिक नागरिकतावाद
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धर्म और राजनीति, वैज्ञानिक समाजवाद तथा
व्यक्तिमत्ता वाद (Individualism) का मिश्रण ।
Conbination of Scientific Socialism and Individualism
- - - - - - - - - - -  - - - - by :-  Ugranath "Nagrik"
                                Lucknow, 30 July 2019
उग्रनाथ नागरिक
लखनऊ
30 जुलाई 2019

बुधवार, 31 जनवरी 2018

तिरंगा

क्या अब समय नहीं आ गया है कि इनके हाथ से तिरंगा छीन लिया जाय ? इनके हाथों नहीं संभल रहा है इसकी जिम्मेदारी, भावना और गरिमा का भार !
चर्चिल ने कहा था वह मैं नहीं कह रहा । मेरा कहना है जनता और युवा को इससे खेलने न दिया जाय । इन्हें अधिकार ही न हो इसे लेकर Flag March करने का । इसे केवल शासकीय, राजकीय उपयोग तक सीमित किया जाय जिससे इसका आदर, मान सम्मान सुरक्षित रह सके, बच सके । बंद हो प्लास्टिक का यह कारोबार । कोई जन, जनसमूह, एनजीओ इसका display न करे । सब अपना भगवा, हरा नीला पीला काला लाल झंडा लेकर चलें । तिरंगा लेकर न चलें ।
(निराला कोपदृष्टि)

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

नेता आयोग

यह प्रस्ताव मेरे अजेंडे में है । स्वतंत्र चुनाव आयोग (की तरह या उसी में) "जन प्रतिनिधि वेतन भत्ता एवं चरित्र पंजी समिति" होना चाहिए, जिसकी स्थापना और चुनाव जनता के हाथ में हो ।

दलितोवस्की

मैं सवर्ण होकर यदि कम्युनिस्ट हूँ, तो इस शर्त पर कि सत्ता का हक़ दलितों को सौंपा जाय । Marxism दलित को वर्ग नहीं मानता और वर्ग के नाम पर सवर्ण कम्युनिस्ट पार्टियों पर काबिज़ हैं, यह मुझे पसंद नहीं । या फिर यदि शुद्ध कम्युनिस्ट हूँ तो मैं हिन्दू मुसलमान वाला मौजूदा वामपंथी नहीं हूँ । या तो पूरा मार्क्सवादी बनूँ , नहीं तो दलितवादी कम्युनिस्ट होना ही उचित ।

सोमवार, 22 जनवरी 2018

निराला मंथन PPI

वसंत पंचमी । महाप्राण निराला का जन्म दिवस । आज उनके गाँव जिला उन्नाव हम लोग गए । साथी आशीष सिंह, बन्धु कुशवर्ती, धनञ्जय शुक्ला, विशाल वर्मा, रंजीत कुमार और शुभम पाण्डे । निराला जी का साधना कक्ष प्रणम्य । उनकी प्रतिमा के साये में कविता पठन समर्पित ।
"निराला मंथन" (Poetic Philosophers of India) PPI
दलित कम्युनिस्ट पार्टी with स्लोगन :
"दलित राजा सवर्ण प्रजा"
परिकल्पना । उग्रनाथ नागरिक । दस्तोवस्की
21 जनवरी 2018

DCP

दलित राजा सवर्ण प्रजा
CPM विवाद के मद्देनजर हमारी तरफ से यह उल्लेखनीय है कि इसके Central Committee में और साथ ही Polit Bureau में एक भी दलित नहीं है ।
और यही फ़र्क़ है उनकी और हमारी पार्टी में । यहाँ विचारधारा से लैस कोई भी व्यक्ति अवर्ण सवर्ण सदस्य कार्यकर्ता होगा, जातिभेद से परे जो कि वाम पंथ का गुण है । लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष में इसके जन्मना सवर्ण सदस्य पार्टी को पूरा सहयोग, योगदान देते हुए इसके केंद्रीय समिति या पोलित ब्यूरो में , या राज्य में किसी भी पद, सत्तापद पर नहीं होंगें । पार्टी और समाजवादी मूल्यों के प्रति यह उनका आध्यात्मिक त्याग होगा । यह त्याग उन्हें स्वयं, स्वेच्छा से स्वीकार होगा भारत के कलंकित सवर्णवादी ऐतिहासिक चेतना के फलस्वरूप ।
हमारा नारा, उदघोष होगा - "दलित राजा सवर्ण प्रजा " ।
दलित कम्युनिस्ट पार्टी
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निवेदक :- दलितोवस्की

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

Plan

"नागरिकता"
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Scientific Poetic Polity
उग्रनाथ नागरिक
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सोमवार, 25 दिसंबर 2017

बराबरी (संस्था)

"बराबरी"  (संस्था)
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समतावादी  :  Egalitarian
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उग्रनाथ श्रीवास्तव "नागरिक"
9415160913

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

प्रगति की कहानी


प्रगति की कोई भी कहानी जनसँख्या की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती | इसके नियमन के बिना कोई योजना सफल नहीं हो सकती | लेकिन विडम्बना है कि राजनीति, आधुनिक राज्य तंत्र ही इसमें बाधक है | अद्भुत बात है कि लोकतान्त्रिक प्रणाली इस दोष में अभिवृद्धि करती है | क्योंकि यह संख्या पर आधारित है, जनमत की बहुलता पर | " जिसकी जितनी संख्या भारी " इस समस्या को जटिल बनाती है | इसलिए जिस भी समूह को राज्य पर लोकतान्त्रिक ढंग से कब्ज़ा करना होता है, वह अपनी संख्या बढ़ाना अपना प्रथम कार्यक्रम बनाता है | आश्चर्य नहीं कि मुसलमानों पर ज्यादा बच्चे पैदा करने का आरोप इस कारण सही ही हो | और इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर संघी सुदर्शन प्रत्येक हिन्दू को नौ बच्चे धरती पर भार बढ़ाने के लिए उतारने का शुभ परामर्श देते थे | जनतंत्र के हिसाब से इसमें प्रथमदृष्टया तो कोई दोष नहीं दिखता लेकिन यह कार्यक्रम देश और संसार की जनसँख्या तो बढ़ाता ही है, और इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय समस्या आसमान चढ़ती है | गज़ब की शोकजनक बात यह कि तमाम सम्मानित और अपमानित किये जाने वाले विचारक इस का कोई ठोस उपाय बताये बिना ही सामाजिक विज्ञानी बने हुए हैं / बन जाते हैं |
लेकिन मैं , समाज का एक अदना सिपाही इसका एक समाधान बताता हूँ | वह यह कि समूहों में परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के लिए उनके सदस्यों के वोट की कीमत आनुपातिक ढंग से points में बढ़ा दी जाय | जैसे राष्ट्रपति चुनाव में सांसदों - विधायकों के वोटों के points होते हैं | उदाहरणार्थ मान लिया जाय कि भारत की कुल जनसँख्या एक अरब है | इसमें हिन्दू ६० करोड़ , मुस्लिम २० करोड़ ,सिख ईसाई आदि अन्य जातियाँ १९ करोड़ और सेक्युलर /नास्तिक/ ह्युमनिस्ट [ हुमी] बचे एक करोड़ | तो हिदुओं के ६ वोटों की कीमत एक वोट , मुस्लिमों के एक वोट को आधा वोट , अन्य जातियों के १.९ वोट एक point बनायेंगे | जबकि सेक्युलरों के एक वोट का मूल्य १० पॉइंट हो जायगा | [लागू करते समय इसकी गणित ठीक की जा सकती है ] | यानी प्रत्येक समुदाय के हाथ में १० - १० करोड़ के कीमती वोट होंगे , और अपने वोट की ताक़त से अपनी पसंद की सरकार बना सकेंगें | किसी को इस बात की ग्लानि तो न होगी कि हाय हम तो छोटी सी संख्या में हैं , क्या सरकार बनायें और हमारी क्या कीमत ? सरकार हमारी क्यों सुने जब हम कोई वोट बैंक ही नहीं हैं ? इससे गन्दी वोट बैंक की राजनीति पर रोक लगेगी | राजनीति साफ़ और स्वच्छ होगी | अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक का रोग समाप्त होगा | और सबसे बड़ी बात इससे अपने एक वोट के पॉइंट्स बढ़ जाने की व्यवस्था से लोग अपने परिवार कम से कम बढ़ाएंगे और देश की आर्थिक प्रगतिवादी योजनायें सफलता की ओर कदम बढ़ा सकेंगीं | सोचिये सभी जन आगे सोचिये | कोई मेरे अकेले के जिम्मे तो नहीं है यह देश ? और मैं एकला सोचूँ भी तो कितना सोचूँ ?    A

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

" प्रिय मनुष्य " ( Godless Humanity )

अनुमान से हमने कुछ लोगों को अपनी तरफ से इस ग्रुप " प्रिय मनुष्य " ( Godless Humanity ) में शामिल किया है | तथापि, जिन्हें इस दुनिया के ईश्वरविहीन होने में कोई संदेह हो, वे कृपया अपना नाम इस समूह से हटा लें | कृपा होगी | और जिन्हें इसमें कोई संदेह नहीं है और इस समूह से अभी बाहर हैं , वे कृपया अन्दर आ जाएँ |

सोमवार, 19 नवंबर 2012

दिल और दिमाग


[ दिल और दिमाग ]
मुख्यमंत्री का प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रथम संबोधन = [ सार ]
मेरे शासन काल में आप लोग आत्म विश्वास के साथ काम करें | हम किसी का ट्रांसफर नहीं करने जा रहे हैं | जो जहाँ है वह वहीँ अपना कर्त्तव्य निर्वाह जारी रखे | नियुक्तियों में परिवर्तन अन्य कारणों से तो हो सकता है किन्तु इस कारण नहीं  कि पिछले मुख्यमंत्री का कोई चहेता था या कोई अन - चहेता | हम दोनों वर्ग एक साथ सामंजस्य पूर्वक मिलकर प्रदेश के हित में संलग्न होंगे | हमारे बीच कोई द्वेष , कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं होगी | क्योंकि हम आपका सम्मान करते हैं | हम समझते हैं कि यदि हम देश के दिल हैं , क्योंकि हम ELECTED हैं , तो आप देश के दिमाग हैं , SELECTED हैं | दिल - दिमाग दोनों मिलकर प्रदेश को प्रगतिशील बनायेंगे | अब यह बात और है जैसा शायर ने कहा है कि - अच्छा है दिल के पास रहे पासबाने अक्ल , लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दें |

रविवार, 11 नवंबर 2012

हमारा पाखण्ड [ सच सच ]


हमारा पाखण्ड [ सच सच ] हमारा जीवन तमाम तरह के पाखण्डों से घिरा हैं, और हम उसे सच मान कर प्रसन्न हैं | ईश्वर , धर्म-अर्थ -काम -मोक्ष इन पाखंडों के बड़े सराय हैं | सेक्स - संस्कृति - भाषा , सामाजिक - पारिवारिक सम्बन्ध कुछ भी तो अछूता नहीं है इस झूठ से ! राजनीति तो मानो महासागर ही है इस प्रवृत्ति का ! ज़ाहिर है हमें इसे मिटाना चाहिए , इससे मुक्ति पाने के प्रयास करने चाहिए | लेकिन इससे किंचित भी बाहर निकलना तो तब संभव होगा जब हम जानें कि हमारे छ्द्माचरण हैं क्या ? कितने , कितनी मात्रा में हैं , कितने लाभदायक कितने हानिकारक हैं, कितने त्याज्य तो कितने अपरिहार्य हैं ? इसलिए ,चलिए नास्तिक मंडली सम्प्रति इसी की चर्चा करती है | इस समूह का नाम अभी तक ' नास्तिक मंडली ' था | क्या आप को नहीं लगता कि हमारी नास्तिकता भी एक प्रकार का पाखंड , एक फरेब ही है जैसे आस्तिकों की आस्था , जिसके हम विरोध में हैं ?

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

अंतरजातीय - अंतर्धार्मिक बच्चे

अभी ' मुक्त यौन ' कह दूँ तो युवा भी हमसे उखड़ जायेंगे | इसलिए मैं इसे अंतरजातीय - अंतर्धार्मिक बच्चे पैदा करने का शुभ कर्म कहकर प्रस्तावित करता हूँ | शादी सजातीय हो , किसी से हो , अनमेल हो , कैसी भी हो, किया जाय और उससे निभाया जाय | ऐसा मेरा मानना है | मैं तलाक़ का पक्षधर नहीं हूँ , भले विषम परिस्थितियों के लिए इसे कानून में रहना चाहिए | लकिन ऐसी शादी चलेगी कैसे जब पार्टनर्स को संतोष नहीं मिलेगा ? यह एक प्रश्न है जिसे मैं जनमत के नाते गौड़ करता हूँ | महत्वपूर्ण दूसरा पक्ष है | यदि इसी प्रकार सजातीय , माता पिता द्वारा अरेंज्ड मैरेज होते रहे तो समाज कैसे प्रगति करेगा और आधुनिक होगा ? इसका जवाब है | युवा इसके लिए भाव एवं व्यवहार के स्तर पर तैयार हो जायं कि शादी तो चलिए हमारे हाथ में नहीं है लेकिन संतानोत्पत्ति तो हमारा निजी मामला है ? वह भी परदे के भीतर का ? इसलिए हम यह करेंगे कि बच्चे सजातीय नहीं होने देंगे | ज़ाहिर है यह शादी किये गए पति या पत्नी के माध्यम से संभव नहीं है | अर्थात, विवाहेतर या नियोग सम्बन्ध अपनाएँगे |  हम अंतरजातीय बच्चे पैदा करेंगे | बाहरी दुनिया के परिचय के लिए भले वे बच्चे किसी ख़ास जाति के बताये जाएँ , लेकिन वैज्ञानिक , अनुवांशिक संरचना में तो वे मनुष्य मात्र ही होंगे ? और यदि DNA और JEANS की खुसूसियत ने अपना रंग दिखाया तो वे सच्चे समतावादी , भेदभाव मुक्त अनूठे इंसान निकलेंगे | अभी तो यह अन्दर की बात होगी , फिर धीरे धीरे जब मामले लीक होते जायेंगे तब समाज का पुराना मानस भी विषम [ अंतर जातीय / धार्मिक ] विवाहों को स्वीकार कर लेगा और इसका मार्ग प्रशस्त होगा | तब तो शायद इसकी प्रासंगिकता ही नहीं रह जायगी , और शायद कभी ' विवाह ' संस्था से मुक्ति भी !

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

नागरिक धर्म (secular)


नागरिक धर्म (secular)
Secular  Register   पर प्रत्याशित  प्रतिक्रिया - प्रोत्साहन नहीं मिला तो ज़रूर कोई वाजिब कारण होगा | कमी हमारे नाम्करारण में हो सकती है , पर यह भी ज़रूर है कि आदमी की धार्मिक पहचान के लिए कोई नया शीर्षक तो चाहिए | इस सम्बन्ध में मुझे व्यक्तिगत तौर पर एक व्यावहारिक अनुभव उठाना पड़ा | एक फार्म में धर्म का कालम भरना था | सेकुलर लिख तो दिया पर संतोष नहीं हुआ | कुछ अधूरा सा लगा |  फिर महसूस होने लगा कि मुझे Secular Citizen , सेकुलर नागरिक लिखना चाहिए  था | इससे परिचय पूरा होता है | इसलिए ग्रुप का नाम बदल रहा हूँ |  

ईश्वरीय तत्त्व ( God Particle )


ईश्वरीय तत्त्व ( God Particle )
ईश्वर तो नहीं है लेकिन मनुष्य तो है अपनी पूरी इयत्ता के साथ ? धार्मिक जगत में मनुष्य गौड़ हो जाता है इसलिए हम मानववादी नास्तिकता को गले लगाते हैं | लेकिन प्रतीतितः नास्तिक मंडली में नास्तिकता को ठीक से समझा नहीं जा रहा है | बस ईश्वर नहीं है या उसमे हमारी आस्था नहीं है , इतना भर तो पर्याप्त नहीं ! सोचना पड़ेगा कि फिर है क्या , और क्या होना चाहिए उसके विकल्प में जो ईश्वर बन कार पूरे विश्व पर छाया हुआ है ? कुछ को अमानव बनाता है तो कुछ को मानवीय श्रेष्ठता भी प्रदान करता है | यदि वह सब कुछ गलत होता तो अब तक वह रह न पता , वह भी इतनी शिद्दत के साथ | इसलिए हमें उसकी श्रेष्ठता को पकड़ कर उसे नास्तिकता के रूप में दृढ़ता के साथ मानवीय आस्था में तब्दील करना है | वरना यह सारा आयोजन एक फिसड्डी बन कर रह जायगा | हमें अपनी पूरी बौद्धिक और हार्दिक पराकाष्ठा के साथ इस क्षेत्र में उतरना है , न कि केवल छिछले ढंग से | जिसे मानव का कल्याण और वैज्ञानिक उत्थान संभव हो सके जो कि हमारा अभीष्ट है | वरना आस्तिकता और भजन कीर्तन में क्या दिक्कत थी ? यदि नास्तिकों ने मानवीय आचरण की कोई लम्बी लकीर खींच कर दुनिया को नहीं दिखाई कि देखो हम यह हैं उन पुजारियों से अलग , तो दुनिया हमारी ओर अर्थात वैज्ञानिकता - नास्तिकता की ओर कैसे खिंचेगी ? शब्द से चिढ़ने की ज़रुरत नहीं है , यदि हमने मनुष्य की आध्यात्मिक भूख नहीं शांत की , उसे उसका वांछित सुख , संतोष और शांति नहीं दिया तो शुद्ध मानववाद का हमारा सपना कैसे पूरा होगा ? इस महीन बात को समझने की ज़रुरत है |  पूरी मार्क्सवादी पीढ़ी नास्तिक है, पर वे इसके प्रचार प्रसार को कोई तवज्जो नहीं देते | उनके अनुसार कुछ वैसा होगा तब ऐसा होगा और तब ईश्वर समाप्त हो जायगा , धर्म मिट जायेंगें | जब कि आवश्यकता है कि इस दिशा में पूरी मिशनरी तरीके से काम किया जाय | अब वह उत्साह आये तो कहाँ से आये | नास्तिकता को नकारात्मक [ negative ] धारणा मानने से तो वह आने से रहा | यह ऐसा विचार वस्तुतः है भी नहीं | नास्तिकता तो एक प्रकार से अति , आत्यंतिक आस्तिकता है , जहाँ कथित आस्तिक जन नहीं पहुँच सकते | आस्तिकता का चरम है नास्तिकता, मनुष्यता पर , मानवीय सभ्यता पर परम विश्वास की स्थिति | यह अकर्मण्य और भाव शून्य नहीं बनाती मनुष्य को | मानव मूल्यों के प्रति यदि यह संवेदनशील और सकर्मक न हुयी तो यह टूट जायगी | सिर्फ स्थूल ईश्वर ही तो नहीं है | पर मनुष्य केवल स्थूल तत्त्व भी तो नहीं है ? इस सूक्ष्म तत्व को पहचानने में नास्तिक मंडली कुछ चूक रही है | फिर इधर उस सूक्ष्मता का वैज्ञानिक एक नाम सामने आया है | सो उसी नाम पर ग्रुप का नामकरण किया जा रहा है , जिसमे मानव सभ्यता और संस्कृति पर कुछ गहराई से चिंतन मनन और कर्म कार्यवाही , संभव है हो सके |   

मंगलवार, 19 जून 2012

लखनऊ के अन्य स्कूल


 लखनऊ के कुछ अन्य स्कूल =
------------------------------- लम्बे समय तक जब तक चन्द्र दत्त तिवारी जी D -10 /5 , पेपर मिल कॉलोनी  में थे , तब तक वह एक स्थायी विचार केंद्र के सामान रहा औपचारिक / अनौपचारिक रूप से | इसके अतिरिक्त उन दिनों जो केंद्र कार्य रहे थे मेरी स्मृति के अनुसार एक तो था माह के दो शनिवार चलने वाला नवचेतना केंद्र , अशोक मार्ग पर गोष्ठी जिसमे तमाम रिटायर्ड आई ए एस , आई पी एस , न्यायाधीश हैं , और जो अब भी नियमित चल रही है , जैसा कि अख़बार से पता चलता है , क्योंकि उसे हम लोगों ने पहले ही त्याग दिया था , जब डॉ एम एम एस सिद्धू से शिकायत  करने के बाद भी बात नहीं बनी | एक हर्ष नरायन जी का था नरही में उनके अपने घर पर , जिसका नाम लखनऊ अकादमी जैसा कुछ था | विश्वविद्यालय में कुछ थे / रहे होंगें क्योंकि वहाँ विचार केंद्र बनते बिगड़ते रहते है अकादमिक सेसन के साथ जैसे कभी ' सोच - विचार ' भी कोई था | अम्बरीश का थिंकर्स फोरम था और ज्यादा याद नहीं | हाँ जब तक राजा साहेब कोटवारा [फिल्म निर्माता मुज़फ्फर अली के पिता] जिंदा थे उनकी ह्युमनिस्ट  यूनियन में भी यदा - कदा गोष्ठी हुआ करती थी | और तो अन्य औपचारिक सभा- सेमिनार प्रेस क्लब , इप्टा ऑफिस , जय शंकर सभागार आदि स्थानों पर हुआ ही करते थे | पार्टियों और संस्थाओं की भी अपनी सभाएँ थीं | एक महान पाठक और पत्र लेखक स्व के.के .जोशी के घर भी हम लोग वक़्त ज़रुरत बैठक कर लिया करते थे | बाद में अनुराग बाल केंद्र , निराला नगर में चला | उधर लखनऊ मोंटेसरी में शिव  वर्मा जी भी सक्रिय थे | फिर जितना मैं जानता हूँ, या मुझे याद आता है , या जिनमे मैं शरीक होता था उन्ही को तो बता पाऊँगा | अन्य तमाम चलते रहे होंगे , जो उन्हें जानते हों वे जानें | #