मंगलवार, 21 मई 2013

Nagrik Posts 21 May 2013


* रंग महलों के 
बिस्तरों की सलवटें 
यदि जान ले लें तो ?
- - - - - -
[ Ambiguous / Gibberish ]

क्या करें भाई साहेब , कोई आता ही नहीं | न लिखता है न पढ़ता है | आलोक जी ने इकलौता पोस्ट डाला था | फिर बहुत दिन बाद टोह लेने के लिए मैंने उन्हें छेड़ा - Is there any suspended thought ,Alok ji ? कोई स्पंदन नहीं | गुरजीत जी का LIKE आया , बस | वस्तुतः वह एक समय की आवश्यकता थी  जो न रही , न वे लोग रहे | जो हैं उनकी नई प्राथमिकतायें हैं | हरजिंदर काम में हैं, मैं अपने कुछ ग्रुप्स मुर्गी के अंडे की तरह " से " रहा हूँ, प्रमोद जी के अपने आग्रह हैं | सुना है शहीद स्मारक में वह " शनिवार गोष्ठी " चला रहे हैं | अम्बरीश कॉफ़ी हॉउस आदि सबसे  विलग जनादेश पोर्टल चला रहे हैं | आपके भी विचार आ ही जाते हैं | तो काम तो चल ही रहा है | यह तो आलोक जी का इसके प्रति पुराना मोह था जिसके तहत उन्होंने यह ग्रुप बनाया | फिर जब वह स्वयं इसे छोड़ गए तो कैसे चले यह | एक बात और आप के संज्ञान में लाना चाहता हूँ | हम लोगों के वे दिन कुछ सीखने, जानने सुनने के थे | अब हम सब अपने विचारों पर दृढ़ नहीं तो कुछ स्थिर ज़रूर हुए हैं | कब तक भटकते ? पुराने members हमें हमारे पुराने चेहरों में पहचानते, जो कि हम अब नहीं रहे | परिचय बदल गए तो अपरिचय की स्थिति में वार्तालाप थोडा दुष्कर था | 
आप रेगुलर लिखे तो ! इसे आप अपना ग्रुप बना लें तो चल सकता तो है यह - प्रौढ़ विचारों से युक्त , बिना तू तू मैं मैं के | क्योंकि हम लोग स्वाभाविक रूप से पहले से ही मित्रता भाव से बंधे हैं, एक दूसरे के प्रति सहज स्नेह या कहें आदर - अनुशासन के साथ | ऐसे ही सदस्यों को भरती करें जो कम से कम वार्तालाप के संयम को तो जानें , प्रतिवाद / आन्दोलन उनके कैसे भी हों | चलाइए इसे, अच्छी परंपरा का स्कूल है / होगा यह | और प्रतिष्ठित भी खूब होगा, मुझे विश्वास है | यदि संपादन भारआप उठा लें |
एक तरीका और हो सकता है जैसा अज्ञेय जी ने " मत - सम्मत " स्तम्भ के लिए सुझाया था कि कुछ दिन पत्र अपने सम्पादकीय टीम से लिखायें | उसी प्रकार आप भी इधर उधर से समुचित सामग्री उठा कर इस पर पोस्ट कीजिये | फिर तो वही लोग स्वयं आपसे इसकी सदस्यता माँगेंगे और लिखेंगे | और यह एक उत्कृष्ट समूह बनकर उभरेगा | यह काम आप कीजिये भाई साहेब, बड़ा ही उत्तम venture, साहसिक कार्य होगा यह | अपने अनुभव और संपादन कला को फिर से एक मंच दीजिये | पुराना " हिंदुस्तान " पराने " लखनऊ स्कूल " में तब्दील हो जायगा | बड़ा मज़ा आएगा | मेरा भी स्वार्थ - " नागरिक उवाच " जिंदा हो जायगा यदि उचित हुआ | पंकज चतुर्वेदी को शामिल कीजिये, और भी अनेक हैं , आप उन्हें पकड़ लेंगे | पुरानों [संस्थापकों ] को चाहे बाहर करना पड़े | वैसे भी वे निष्क्रिय हैं | आप ने छेड़ा तो थोडा उत्साह बना | शेष निर्णय आपका - -
[ To Pramod Joshi]       


* Global Secular Humanist Movement  - SAYS =
 Humanists need to participate more and more.   [ AND QUOTED =
THOSE WHO REFUSE TO PARTICIPATE IN POLITICS SHALL BE GOVERNED BY THEIR INFERIORS ."    [ - PLATO  ]   

* अल्लाह - गॉड के बारे में तो कुछ कहना मुश्किल है | इतनी हिम्मत नहीं है मेरी, और हिम्मत हो भी तो कहना नहीं चाहिए, क्योंकि मैं इनकी मान्यता वाले समुदाय में नहीं हूँ | लेकिन ईश्वर-भगवान् के बारे में तो मैं जानता हूँ कि वह " नेति नेति (नहीं नहीं )" है |

* स्वर्ग का बोर्ड लगा है लेकिन स्वर्ग जैसा यहाँ कुछ तो नहीं है !
[ means - स्वर्ग अभिकल्पना मात्र , न की यथार्थ | [ Style of saying ]

* जरूरत है अंडा मित्र की 
मुझे आवश्यकता है मेरे साथ अंडा शेयर करने वाले साथी की |   
डॉक्टर ने मुझे अंडा खाने से मना तो नहीं किया है लेकिन केवल सफेदी वाला हिस्सा ही मेरे लिए prescribed है | अब बाज़ार में ऐसा अंडा तो उपलब्ध नहीं है जिसमे केवल सफेदी ही सफेदी हो | इसलिए एक भी अंडा पूरा ज़र्दी समेत खरीदना पड़ता है | ऐसे में यदि कोई साथी हो जो ज़र्दी खा ले तो मैं भी सफ़ेद भाग खा सकूँ |   

* कोई पैदायशी ब्राह्मण नहीं होता तो कोई पैदायशी दलित भी नहीं होता ,
अथवा  यूँ कहें =
कोई पैदायशी दलित नहीं होता तो कोई पैदायशी ब्राह्मण भी नहीं होता |
लेकिन दलित और ब्राह्मण होते तो हैं भले वे किसी खानदान में पैदा हुए हों | निश्चय ही कुछ लोग उच्च कोटि के तो स्पष्ट है कुछ निम्न कोटि के होते हैं समाज में | ऐसा वे किसी भी प्रकार बने हों, परवरिश के कारण या जींस डीएनए के प्रभाव से [यह शोध मेरे क्षेत्र में नहीं ] | लेकिन तथ्य से इनकार करना तो हठधर्मिता ही कही जायगी | अब दिल्ली या कहीं के बलात्कारियों को कोई उच्च कोटि का तो नहीं कहेगा ? यह अंतर हमें स्वीकार करना , अच्छे बुरे का भेद करना हमें सीखना चाहिए नहीं तो सब घाल मेल हो जायगा | कोई अच्छा क्यों बनना चाहेगा यदि उसकी कोई पहचान ही न होगी ? क्योंकि बुराई में तो बड़ा आनंद है न ? और ऊपर से इन्हें समान सम्मान दिया जाय तो फिर कहना क्या ? कोई आन्दोलन इसे नज़र अंदाज़ कर रहे हैं , इसलिए उनसे पृथक यह पोस्ट लिख रहा हूँ कि समाज में ब्राह्मण और दलित , ऊँच और नीच तो हैं ही | निर्विवाद 

* तो कुछ झूठ बोलना ही सीख लो ब्राह्मणों से , उन्ही की तरह लन्तरानियाँ उड़ाना | वह योग्यता मुझमे नहीं लेकिन मसलन द्रोण का अंगूठा कुत्ते ने काट खाया था इसलिए एकलव्य ने उन पर दया करके अपना अंगूठा काट कर उनकी हथेली पर लगा दिया था | पुष्पक विमान तो था पर उसका चालक दलित दुसाध था | शबरी प्रकरण तो नाटक था | शबरी, बूढ़ी ब्राह्मणी, ताज होटल की रिटायर्ड शेफ थी पाक कला में कुशल सिद्धहस्त | और वह बेर नहीं स्वादिष्ट नूडल्स थे जिसे उसने राम लखन को खिलाये | राम कुछ आधुनिक थे सो खा गए, लखन दकियानूसी थे इसलिए फेंक दिया | जब शबरी ने उन्हें देसी संजीवनी बनाकर दिया तब उन्होंने खाया | राम लखन के तीर धनुष दक्षिण टोला के रहमनिया लोहार ने बनाये थे तब वे युद्ध जीत पाए | पर्ण कुटी वास्तव में एस्बेस्टस शीट का था , उसका पूरा Fabrication & फिटिंग - फिक्सिंग Maya Structural Co . Ltd का था | इत्यादि इत्यादि | यारो जब ऐसे ही झूठ-झाठ अफवाह फैला कर इन्होने हजारो साल इतने मनुष्यों को गुलाम बनाया | तो क्या हम तुम सब मिलकर ऐसे हजारों झूठ ईजाद नहीं कर सकते जिससे ब्राह्मणों का साम्राज्य धराशायी हो जाय, और इतने लोग जो फेसबुक पर और इतर जगहों पर आंदोलनों में दिन रात लगे हैं वे कुछ अमन चैन सुख शांति से जी सकें | दुःख के दिन तो रे भैया   
और यह तो बहुत ज़रूरी है कहना कि पहले ब्राह्मण लोग ब्रह्मा के मुँह से पैदा होते थे | पर उन्होंने इतना पूजा पाठ यज्ञ हवन किया, देवी देवताओं, श्री राम चन्द्र के पाँव पखारे कि वे ब्रह्मा के पैर से पैदा होने लगे और जो दलित पहले पैर से जन्मते थे उनके मुँह से निकलने लगे | इसलिए अब दलित पूज्य हैं , ये ही विप्र हैं | सही है पूजहि विप्र सकल गुन हीना | दोहा चौपाई वही , उनका प्रभाव बदल जाय |         


* इतना लिखता हूँ तो डरा डरा सा रहता हूँ | कहीं मैं किसी का " मुंशी " न कह दिया जाऊँ ?

* हरि अनंत     
हरि कथा अनंता
सुनो न संता |  
[ अर्थात, इस विवाद का कोई अंत नहीं है,
इसलिए हे संत इसे मत सुनो ]
[सुनो प्रचंडा ]

* दूर हो तुम 
तो बहुत अच्छा है 
सर का दर्द !

* सोचता हूँ क्या 
पहनकर जाऊँ 
उनके द्वार ?   

सोमवार, 20 मई 2013

Nagrik Posts 20 May, 2013


* मुझे होने वाला था 
उनसे 'प्यार' ,
होते होते हो गया 
मुझे उनसे 'प्रेम' |

* आप अच्छे लगे तो 
आपका घर, आपका द्वार 
खिड़की दरवाज़ा सब 
अच्छा लगने लगा  
आपके हाथ का व्यंजन, 
आपकी चाय, सब 
आपकी झिड़की |
#   

* इसलिए मैं निष्कर्ष निकालता हूँ  मनुष्य के कल्याण के लिए भी किन्ही मनुष्यों की हत्या उचित नहीं है | इससे अच्छा है ऐसे कल्याण किये ही न जायँ, ऐसे कल्याण की बात सोची ही न जाए | 

* मैं जो कुछ भी कहता हूँ यह जान कर कहता हूँ कि उन्हें कोई मानने नहीं जा रहा है | 

* फिर , हर आदमी हर काम करे ही क्यों | जिसकी जैसी प्रेरणा हो करे | यह समझना  तो भूल होगी कि चिंतन कार्य कुछ फ़िज़ूल का काम है, इसमें कोई ऊर्जा नहीं लगती थकान नहीं होती, बड़े आराम का काम है यह | ज़नाब चिन्दियाँ उड़ जाती हैं, यदि ईमानदार हैं आप | फिर भी आयेंगे क्यों नहीं , किसी सार्थक काम में | यदि भरोसा दिल दें की उसमे आपका कोई नितांत निजी स्वार्थ निहित नहीं है ,और वह सचमुच सार्वजनिक कार्य है | व्यवधान तो होगा पर समय निकाला जा सकता है      [Shrinivas]

नर्सरी क्लास में छोटे बच्चों से पूछा गया-भगवान कहां है?
एक बच्चे ने हाथ उठाया, बोला- मुझे पता है!
टीचर ने कहा- अच्छा बताओ।
बच्चे ने बताया- हमारे बाथरूम में।
एक पल के लिए टीचर चुप! फिर संभलते हुएबोली, तुम्हें कैसे पता?
बच्चा बोला- रोज सुबह जब पापा उठते हैं,बाथरूम का दरवाजा पीटते हुए कहते हैं। हेभगवान! तुम अब तक अन्दर ही हो!

* कोई MBA है कोई ENGINEER है कोई डॉक्टर, IAS है , लेकिन कोई भी अपनी शादी करने में समर्थ नहीं है | यह उनके बाप दादा करते हैं | और उसी दकियानूसी तरीके से कि लगता ही नहीं ये देश के अग्रगामी लोग हैं |

* सरकारों को कम से कम हिंसा और न्यूनतम कर पर गुज़ारा करना चाहिए |   

[ विज्ञान के खिलाफ }
एक बार एक नागरिक जी छत से गिर गए | कुछ दुरुस्त होते ही नामज़द रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुँच गए |
" मुझे पटकने में दोनों की सम्मिलित साज़िश थी | मैं छत पर चक्कर न्रत्य [सूफी] कर रहा था | इतने में Centrifugal Force [ केंद्र बाह्य बल ] ने मुझे बाहर फेंक दिया | फिर उसके साथी Law of Gravitation ने मुझे ज़मीन पर पटक दिया | "

* अनुमान [ही] है कि अब सभ्य लोग शादियों में सड़कों पर नाच गानों, बैंड बाजों, डी जे वगैरह से शीघ्र ही ऊब जायेंगे और इन्हें बंदकर देंगे | शायद हिन्दू विधि की रतजगा शादियों से भी इनका कुछ मन उचटे ?  

* जो भी काम है हमारा सब सरकार के विरोध में है | इसके अतिरिक्त तो कोई काम मुझे सूझ नहीं रहा है ! [ [ इस पंक्ति के कुछ गहरे व्यंग्यात्मक निहितार्थ हैं ]

*दाढ़ी बनाना आया नहीं, चले हैं दुनिया बदलने ! 
or ,
शेव करने का शऊर नहीं , चले हैं दुनिया बदलने !  


* तार्किक दृष्टि अलौकिक दृष्टि से अधिक ताक़तवर होती है और प्रामाणिक |
[ दरअसल , दृष्टि कोई अलौकिक नहीं होती | वह तो कहने और मूर्ख बनाने की बात है | [To Niranjan]

* हमसे और नीति की बात !
गधा - घास संप्रीति की बात ?        

* यह 'वाद ' वह वाद और तमाम वादियाँ ,
इन्ही के बीच से ही रास्ता निकले कोई |

* समाजवाद परिवारवाद के रास्ते गुज़रता है |

* घर में बिजली के करेंट मारने के कई सामान बाज़ार से आ गए हैं - हीटर , कूलर - - | मेरा तो सी पी यू भी मुझे करेंट मारता है | 

* संदीप वर्मा लखनऊ आये नहीं कि मेरी सिगरेट की डिब्बी डर से दुबक गयी | पिछली बार मुंबई से आकर उन्होंने उसे बहुत डाँटा था | आज सुबह से अभी 9 -40 पर मेरी पहली सिगरेट थी, जब कि अब तक तो चार पी चुका होता | सचमुच यह यदि मुझसे छूट जाय तो यह मेरे जीवन की नई शुरुआत होगी |   

* पार्टी कार्यकर्ता हैं | हाँ कविता - कहानी भी लिख लेते हैं |

* जैसे मुलायम सिंह समाजवादी , वैसे हम मार्क्सवादी |

* अमावट आ गया जब मार्केट में आम से पहले ,
तो क्यों मजदूर मजदूरी न माँगे काम से पहले ?
[ इसीलिये  लेखक = लेखन मजदूर लेखक संगठनों = ? ? का सदस्य होता है | विचारधारा को मारो गोली [ उसे कहीं नहीं देखा जाता, राजनीतिक पार्टियों में भी नहीं ] जहाँ से नाम संवर्धन - पिष्टपेषण प्राप्त हो तो उसका मंगल गान भला लेखक, वह भी भारतीय लेखक भला क्यूँ न करेगा ?]
संघवादी तो छोडिये, अब गाँधीवादी लेखक संघ में जाकर कोई क्या पायेगा ? चारो तरफ से लताड़ दुत्कार और दलितों की मार ?
लेकिन यह सब बड़े लोगों की बातें हैं | मैं कविकीय - लेखकीय दौड़ में नहीं हूँ | उनका एक कहना है कि जिस तरह का लेखन वे करते हैं उसमे बड़े खतरे हैं और संगठित न हों तो उन्हें लिखने ही न दिया जाय |पर इसे तो अभिवैयक्तिक मंच से भी लड़ा जा सकता है,लोकतंत्र के | असल बात " संघे शक्ति कलौयुगे " का है | अध्यक्ष - महामंत्री -सचिव आदि हैं तो ज़ाहिर है बड़े लेखक हैं फ़िराक , पन्त , महादेवी , या निर्मल वर्मा से | तो जब लिखने से पहले ही लेखक का रुतबा और राजनीतिक सत्ता के पथ प्रदर्शक होने का हनक मिलता हो तो क्यों न जाएँ संगठन में | संगठन की सदस्यता ही आपके लेखक होने का प्रमाणपत्र है | तो वही उर्दू का शेर :--
अमावट आ गया जब मार्केट में आम से पहले ,
तो क्यों मजदूर मजदूरी न माँगे काम से पहले ?
हाँ यह इसका ख़ास गुण है और उपलब्धि भी | यही क्रिया कर्म इसे जिंदा और गतिशील बनाये हुए है | लेकिन इनमे इतर स्वतंत्र लेखकों को अमान्य - दरकिनार क्यों किया जाता है ? यह पार्टी का कारकुन क्यों हो जाता है ? अंततः तानाशाही रवैये में क्यों ढल जाता है ? बटोही के सवाल का जवाब है - यहाँ निश्चय ही न सिर्फ कापियाँ जाँची जाती हैं बल्कि गतिविधियाँ भी आँकी जातीं , कैमरे के तले रहती हैं | उदय प्रकाश ने गोरखपुर में क्या किया ? मंगलेश डबराल ने राकेश सिन्हा आयोजन में भाषण क्यों दिया ? मित्र ! ऊपर से सब ठीक ठाक है, भीतर क्या है बहुत मुश्किल है जानना | [ Keshav Pandey]
मेरे निजी ख्याल से लेखक कभी बंधन में नही रह सकता | " प्रतिबद्ध " विशेषण से महिमामंडित करने से भी इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता | यूँ भी सच्चा लेखक किसी का दुश्मन नई होता, और दोस्त तो किसी का नहीं | होता है तो मनुष्यता का मित्र और मूर्खता का शत्रु | इसे यूँ समझें कि यह भी क्या बात हुई कि यदि मैं आलोचना कर दूँ तो मैं आप का दुश्मन हो गया, और प्रशंसा कर दूँ तो दोस्त ? करनी तो नहीं चाहिए निजी बात सार्वजानिक मंच पर मैं वाम - दक्षिण -दलित -सवर्ण - गांधीवाद -राष्ट्रवाद सबमे मीन मेख खोद खोद कर निकाला करता हूँ, लेकिन मैं हूँ इनके अंश भर इनके परम मित्र | यहाँ तक कि नास्तिकता, जिसका मैं अपने को अलमबरदार कहता हूँ उसमे भी पेंच निकाला, खिल्ली उड़ाया करता हूँ | हाँ , याद आया लेखक मूलतः व्यंग्यकार होता है | ऐसा मेरा ख्याल है | लेकिन मैं लेखक नहीं हूँ | लिखता ज़रूर हूँ - अपनों को चिट्ठियाँ | [sri niwas rai shankar]
भूपट जी ! इससे इन्कार नहीं है | समूह संगठन के महत्व को मानना तो पड़ेगा, अन्यथा इतने बुद्धिमान, पढ़े लिखे लोग क्या निरे मूर्ख हैं जो संगठनों / पार्टियों में है ? हमेशा से रहे हैं | कुछ कुछ यह मुझे जींस/ डी एन ए / का मामला लगता है | जैसे मुझे व्यक्तिगत स्वातंत्र्य ज्यादा प्रिय है | इसमें मैं ज्यादा मुखर, भरपूर क्रियाशील हो पाता हूँ | संगठनों में हूँ, लेकिन जड़ीभूत सम | शायद पृथक जी का भी यही हाल है कुछ - उन पर उनके अध्ययन का मनोबल अतिरिक्त है |    


* जबसे बैल गए, बैलगाड़ी गयी, तब से यही नहीं याद रहा कि बैल " त ता " कहने पर किस ओर मुड़ते थे और " वो वो " कहने पर किस ओर ? कब दाहिने, कब बाएँ ?   

* किसी को गुरु बनाना, फिर उसका अन्धतः अनुकरण करना एक समस्या तो है ही, लेकिन इसके पीछे भी मूल में एक समस्या है - महानुभावों में गुरु बनने/कहलाने की चाह, शिष्यगण समूह बनाने की ललक, पाँव पुजवाने- गुरु दक्षिणा पाने की लालच | मैं बहुत दुखी हुआ यह देखकर कि ओशो जैसा नवीन प्रवाचक भी गुरु [ सदगुरु कह देते हैं अपना सर बचने के लिए ] की महिमा गाने से अपने को नहीं बचा पाया |            
[ मेरी निजी पूरी कोशिश है इन दोनों अवगुणों से अपने को बचाने की |]

* प्लान बनाया 
दिमाग खर्च किया 
तब तो हुआ ?

* कोई बताये 
खेल है या व्यापार 
आई पी एल ?

* जो भी हो जाय 
प्रेम के नाम पर 
वह कम है, 
ईश्वर के नाम से 
तो कुछ भी संभव |

* कब बनोगे 
ब्राह्मण , मेरे भाई -
दलित जन ?

* कभी इनके 
झाँसे में मत आना 
प्रतिमाएँ हैं |

* कितना सोचूँ
मन तडपत है 
जितना सोचूँ | 

* हुआ तो है ही 
होने वाला भी तो है 
हो ही रहा है !

* क्या फ़िज़ूल की 
बातें करते हो जी 
ऐसा नहीं है |

* कवितायेँ हैं 
संवाद का माध्यम  
बातें करतीं |

* टालते जाओ 
मिलने का समय 
प्रतीक्षानन्द ?

* आया रे आया 
हाइकु  जपान से 
लघु कविता,
और चटपटाता    
चाऊमिन चीन से |

* एक ब्राह्मण 
सबका किरकिरा 
दूजा मैकाले | 

* अपनी वाली 
तो हम हाँकेंगे ही 
सुनो न सुनो !

* बदनामी का 
सम्बन्ध बन जाय 
तो आनंद आये |

* उनका कहीं 
मन नहीं लगता 
मेरा भी नहीं |

* बनाया ? 
ठीक है ईश्वर ने तुमको 
और दुनिया को बनाया 
इसलिए उसकी पूजा करते हो,
गुण गाते हो, बहुत अच्छी बात है | 
लेकिन दुनिया में जिन लोगों ने 
तमाम कुछ उपयोगी चीज़ें बनायीं,  
जिन्हें तुम रोज़ इस्तेमाल करते हो, 
जिनके बगैर जीवन दूभर है तुम्हारा ,
बिजली, बल्ब, पंखा, कूलर, ए सी,
टी वी, फ्रिज, सायकिल, मोटर सायकिल, कार 
बनाने वालों को कभी प्रणाम किया, धन्यवाद दिया ?
टेलीफोन, जहाज़, हवाई जहाज़ का आविष्कार 
करने वालों के नाम तो तुम्हे पता ही नहीं होंगे ,
और दुनिया को सजाने- सँवारने वाले विचारकों 
दार्शनिकों, धरा के कर्मकारों चर्मकारों 
अरे हाँ, याद आया - जूते चप्पल बनाने वालों की 
कितनी पूजा की तुमने ?
धिक्कार है तुमको, ईश्वरप्रेमियों !
# # #                 

[ पाँच पतियों से चार पत्नियों तक की सभ्यता की यात्रा ]
सोचता हूँ कैसे हुआ होगा यह सब ? द्रोपदी का प्रकरण बताता है कि पहले औरतों को 5 पति रखने की सुविधा थी | फिर सभ्यता के चलते 4 फिर 3 फिर 2 फिर एक पर आये होंगे | फिर सभ्यता आगे बढ़ी [ नीचे गिरी या ऊपर चढ़ी, इसका निर्णायक मैं नहीं ], तो अब पुरुषों की बन आई होगी | पहले कहाँ एक बटे पाँच पत्नी का हिस्सा पाते थे, अब पूरी एक पत्नी पाने लगे होंगे | फिर सभ्यता आगे बढ़ी तो [ नीचे गिरी या ऊपर चढ़ी, इसका ज़िम्मेदार फिर भी मैं नहीं ] डबल पत्नी रखने लगे होंगे | आगे, दशरथ की तीन रानियाँ थीं | फिर इस्लाम के आते आते उसने अपने लिए चार बीवियां जायज़ कर लीं | [ सभ्यता नीचे गिरी या ऊपर चढ़ी, इसे क मैं नहीं जानता ] |   

* आज के हमारे नेता चाहे जितना ही राक्षसी प्रवृत्तियों से ग्रस्त हों, लेकिन वे कभी रावण कुम्भकरण की तरह ठठाकर राक्षसी हुंकार भरते नहीं देखे गए, जैसा कि हम राक्षसों को रामलीला या ऐसे सीरियलों में देखते हैं | कितने तो सौम्य, शालीन और सभ्यतापूर्ण आचरण करते हैं हमारे नेता ? 

* किसी संस्था का नाम = 
SANSTHA - संस्था =
Secular Atheist Nationalist Scholar and Tarkik Humanist Association .  

शुक्रवार, 17 मई 2013

Nagrik Blog 16 May 2013


[ कविताएँ ]
* मैं जानता नहीं 
और जो जानता हूँ 
उसे जानो 
भूल गया |
# # 

* पहने तो हैं कपडे 
सर से पाँव तक 
सिर पर टोपी 
पैर में जूते !
और कितने 
कपडे पहनें ?
# # 

[ टांका ]
* धूल उड़ेगा 
झाड़ू जो लगाओगे
दुर्गन्ध देगी 
नालियों की सफाई 
तो क्या करोगे नहीं ?

* यह कोई ज़रूरी नहीं है | जो जहाँ काम कर कर रहा है, वह वहीँ काम करे | इसमें कोई बुराई नहीं है | यह क्या बात हुई कि हर मीडिया वाले हर मीडिया में आयें | उन्हें अपने क्षेत्र की उपयोगिता पर भरोसा रखना चाहिए | यह आत्मविश्वास हटते ही पत्रकार जन राजनीति में आने लगते हैं,किंवा [ मानो ] पत्रकारिता कुछ छोटी चीज़ है |

* 6 लाख रूपये वार्षिक आमदनी वाले अब क्रीमी लेयर में नहीं आते | ढाई लाख से अधिक आमदनी वाले पेन्सन भोगी बाकायदा आयकर देंगे | ध्यातव्य है कि इनकम टैक्स देने वालों कि समाज में एक हैसियत होती है, उन्हें क्रीमी मलाईदार माना जाता है | ज़ाहिर है सरकार भी उन्हें अतिरिक्त समृद्ध मानती है तभी तो उनसे आयकर वसूलती है ?

* आजकल घर में अकेला हूँ | सन्नाटे का फायदा यह है कि फोन की घंटी बजती है तो सुन पाता हूँ |

* लोग ग्रुप बनाते हैं फेसबुक पर और मुझे Admin बना देते हैं | I follow lane driving / Absolute Nonsense / नोक झोंक | कहना न होगा इनके निर्माता [ नहीं, निर्मात्री ] स्त्रियाँ ही हैं | राकेश किरन / नीलाक्षी / श्रीमती राकेश | सब मुझे मूर्ख समझती हैं | तो मैंने बुद्धिमत्ता का मार्ग निकाल लिया | तुलना करता हूँ इनकी प्रकृति से | ऐसे ही प्रकृति भी दुनिया बनाती है और हम निरीह, बेचारे मनुष्यों के कमज़ोर [ अथवा सशक्त जैसे भी ] हाथों में सौंप देती है |    

* Close friend वे होते हैं जिनसे बातचीत " बंद " हो ?
 

* व्यापार चोखा 
आयुर्वेद का नाम 
संत का मान |

* रुक भी जाओ 
जब कह रहे हैं 
तो मान जाओ |

* आपने कहा 
बड़ी मंहगाई है 
बेईमानी है ,
बड़ा भ्रष्टाचार है 
हो गयी पोलिटिक्स | 

* कितनी देर 
पाले रहोगे गुस्सा ?
थूको इसको |

* गला खुलेगा 
रोने धोने से ही 
खूब चिल्लाओ |

* फेसबुकिया
दोस्त भी तो दोस्त हैं 
दुश्मन नहीं |

* वह प्रसन्न 
सारा जग प्रसन्न 
मैं भी प्रसन्न |

* बड़े तो हुए  
किताबें पढ़कर 
छोटा भी हुआ |

* अच्छी लगतीं 
जब खिलखिलातीं 
बच्चे बच्चियाँ |

* इष्ट छोडिये 
अनिष्ट नहीं हुआ  
खुदा का शुक्र |

* कोई भी नीति 
काम नहीं करती  
हर जगह |

* तर्क यह कि 
तर्क मत कीजिये 
हर जगह |

* तर्क यह कि 
प्रत्येक मुद्दे पर 
तर्क न करें |

* थोडा लिहाज़ 
करना ही होता है 
महिलाओं का |

* हारता नहीं 
मेहनती मनुष्य 
जीवन जंग ,
पर हार रहा है 
कारण क्या है |

* ब्राह्मणवाद 
आवश्यकता वश 
ज़रुरी हो तो  
मार्क्स-दलितवाद ,
वक़्त की माँग ?

* " कल मिलेंगे "
अभी कल ही कहा ,
आज भी वही |

* फूल पत्तियाँ
नहीं होता है वृक्ष  
जड़ में जाओ |

* सब सवर्ण 
हो जाते तो अच्छा था 
कुछ तो होता !

* तर्क यह कि
काम नहीं करता 
तर्क हमेशा |

* पास आने की 
काबलियत नहीं 
अन्यथा आता |

* दूरी ज़रूरी 
संबंधों में मिठास 
बनी तो रही ! 

* इस पर तो 
हाइकु बना लेना 
बड़ा आसान  -
" रूप तेरा मस्ताना "
टांका बन गया न !

सब उद्भूत 
होता है, नहीं हूँ मैं 
इसका कर्ता |  

सब उद्भूत 
होता है, अद्भुत मैं 
नहीं लिखता |

नहीं लिखता 
मैं कुछ भी अद्भुत 
उद्भूत सारा,
मेरा कुछ नहीं है 
इसमें योगदान |

कुछ किया क्या 
लीक से हटकर 
जो मैं दाद दूँ ?

* दृष्टि नहीं है 
पढ़ाई लिखाई है 
तो उससे क्या ! 

* हम आपके  
यकीनन जानिए 
दुःख के संगी | 

* बुरे दिनों में 
जाने कैसे आ जाता 
इतना धैर्य !

* चलोगे तुम 
जितनी दूर तक 
मैं भी चलूँगा |

* दिया न दिया 
तूने बोल तो दिया 
जी खोलकर |

* मैं तो मैं ही हूँ 
कोई दूसरा नहीं,
न होगा ऐसा | 

* कहानियाँ हैं 
मनुष्यों के तमाम 
पाप पुण्य की |  

* हाथ बढ़ाया 
सबकी ओर पर 
साथ न पाया |  

* हस्तलाघव 
हाइकु बनाना है 
हमारे लेखे |

* ऐसा होना था 
इसलिए हो गया 
ऐसा होना था 
नहीं तो नहीं होता 
ऐसा न होना होता |

* फ्यूज़ वायर 
जैसे होते हैं बच्चे 
माँ - बाप मध्य |

* ईमानदार 
हो ही नहीं सकते 
हम खुद से |

* प्यार के लिए 
क्या क्या करते लोग 
बिलावजह |

* तुमने कहने का मन बनाया है ,
मेरा भी मन है उसे सुनने का |

* मैं समझ नहीं पाता, बेवकूफ लड़के लड़कियों के पीछे क्यों पड़े रहते हैं ? उन्हें तो उनके आगे पड़ना चाहिए |

* Next Shift = 
अनैतिक जन ( AGAR)
Anti God - Anti Religion

* Love marriage is no better than married Love .

* औरतों में कोई काबलियत नहीं होती | फिर भी मैं उनकी उच्च पदों पर नियुक्ति की अनुशंसा करता हूँ |

* तो आइये / बुलाइए | मैंने भी तो चिट्ठियों की पत्रिका [ प्रिय संपादक ] जिन्दगी भर निकली | उसके लिए जिया = मरा | पत्र -पत्रकारिता को प्रतिष्ठित करने में लगा रहा | मेरे सारे मित्र पत्र मित्र ही हैं | पर अब ' ज्यादा ' लिखना नहीं हो पाता | फिर fb blog पर तो सार्वजनिक लिखता ही हूँ | निजी बातें फोन कर लेने में हर्ज़ क्या है, जब यह कपूत आ ही गया है ?  [ Sandeep]

शुक्रवार, 10 मई 2013

Nagrik Posts 10 May , 2013


* पांच अक्षर 
कोई बोल देता 
सात अक्षर 
मैं हाइकु बनाता
सुन्दर जोड़कर |

* तरबतर 
स्वेद से जिंदगानी 
जब भी पूरी     
पसीने से नहायी  
धूप खिलखिलाई |  

* सोचना हो तो 
कुछ सोचो ही मत 
सोच आएगा |

* आप हँसे तो 
बहुत अच्छा लगा ! 
फिर हँसो तो |

* क्या बिना खड्ग 
दे दी हमें आज़ादी ,
क्या बिना ढाल ?

* ईंट प्रश्न का 
पाषाण पत्थर से 
उत्तर न दें !

* जो भाव आये 
वही तो मैंने लिखा 
और क्या लिखूं ?

* आदमी बनें 
आदमी ही बनाएँ
जातियाँ नहीं  |

* हमारे बीच 
छत्तीस का आँकड़ा
कायम अभी |
* बाबा कहते -
सोलह दूनी आठ 
हो गयी शिक्षा |
* नौ गुणे नौ हो 
तो चूल्हे में लकड़ी 
जले = इक्यासी |
* नौ गुणे चार 
मतलब निकालो -
मुँह चूमना | 

* धर्म पालन 
सामूहिक चेतना 
अवचेतना |

* कौन साथी है 
धैर्य के अतिरिक्त 
दुःख पीड़ा में ?

* भारतवर्ष 
असह्य आपत्तियाँ
झेलता देश | 

* अत्यंत आश्चर्य और  शोध का विषय है कि ऐसा क्या है इस्लाम में जो अपने सदस्यों को ऐसी घुट्टी पिला देता है कि अच्छे अच्छे पढ़े लिखे (?) लोग भी उसकी मान्यताओं पर संदेह नहीं कर पाते ? ऐसा तो नहीं हो सकता कि हर आदमी केवल भय से इस्लाम पर उँगली उठाने का साहस न कर पाए ? ज़रूर उसमे कोई मनोवैज्ञानिक रणनीति, दुआ की दवा, या पागलपन का नश्शा अन्तर्निहित है | उसी को शोध किये जाने कि बात है जिससे विज्ञानं भी मानव जाति को अपना गुलाम बना सके |   

* जो मुझे प्यार करेगा वह ईश्वर - अल्ला - भगवान् को प्यारा होगा |

* पैसा पानी की तरह बहाओ तो बहाओ | लेकिन पानी को पानी की तरह नहीं, पैसा की तरह बहाओ | 

* देश में बिजली की कमी Mobiles के charging के कारण हुई | बात तो बात , SMS Chat अलग से | ज़रा देर बैठे तो कानों में Plug और सुनना गाने | अब इनमें बिजली तो खर्च होती ही है !

* थोड़ी थोड़ी यात्रा
पिछले अप्रेल माह कोलकाता प्रवास के दौरान भाई मनबोध जी के साथ कुछ यात्रायें की | कुछ नोट्स ;-- * सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार | इसका जो अर्थ प्रचलित है वह सत्य नहीं है, ऐसा प्रकाशित पुस्तक से ज्ञात हुआ | इसका सही अर्थ यह है कि सारे तीर्थों की बार बार यात्रा करने में जितनी तरद्दुद - तकलीफें उठानी पड़ती हैं, उतनी तो परेशानियाँ गंगा सागर की एक बार की यात्रा में ही  उठानी पड़ जातीं हैं | किताब से ज्ञात हुआ कि पहले यह घने जंगलों से घिरा था, हिंसक पशु भी थे | रास्ता कठिन था और आज की भाँति आवागमन के साधन भी सुलभ नहीं थे | आज भी कोलकाता से सौ किमी दूर यह तीरथ एक दिन में जाकर लौट आना दुष्कर है | 
यहाँ कपिल मुनि का आश्रम है जिसका जीर्णोद्धार हो रहा है | कपिल मुनि सांख्य दर्शन के जनक थे, जो एक नास्तिक भारतीय दर्शन है | लेकिन उनके आश्रम में दुर्गा - हनुमान आदि समस्त देवी देवताओं -अवतारों की मूर्तियाँ एक लम्बी लाईन में लगा दिया गया है | इस पर अब कुछ क्या कहना !
* १८ अप्रेल को राजधानी से पुरी जाना हुआ | AC chair car थी , सो ठंडा तो होना था, लेकिन समझ में नहीं आता कि डिब्बे इतने ठन्डे क्यों कर दिए जाते हैं कि आदमी सिकुड़ जाय ? क्या सामान्य शीतलता यात्रियों को नहीं दी जा सकती ?               
* अब यहाँ एक टिप्पणी अप्रिय हो सकती है | मैंने यह अनुभव किया कि समाज में दलित कैसे बनते हैं, कल्पना किया कि दलित कैसे बने होंगे ? किसी किताब में लिखकर तो ऐसा नहीं किया जा सकता | हुआ यह कि वेज -नॉनवेज थालियाँ परोसने के बाद वेटर सौंफ- मिश्री लेकर आया | ज़ाहिर है होटलों की तरह बख्शीश लेने के लिए | यह मैं कई बार लिख चुका हूँ कियह प्रथा उन्हें नीचा दिखने के लिया पर्याप्त है | पहले पवनी परजा होली दीवाली की त्योहारी लेने आते थे | वही अब भी कायम है | वह व्यक्ति क्या यात्री के बराबर बैठ सकता हैं ? देने वाले का हाथ और स्थान ऊपर हो जाता है, और लेने वाले की स्थिति कथित दलित | वे अपनी मजदूरी और वेतन में सम्मान का अनुभव करें तो स्थिति बदलनी शुरू हो जाय |  

* खुन्नस , The Prejudice  
मेरा नाम = U.N.S.= उन्स
मेरी संस्था का नाम = खुन्नस

* हमारा सुंदर राष्ट्र गीत होना चाहिए =
" खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों "
अब इस पर भी खाप पंचायत वाले एतराज़ तो करेंगे !


* प्रश्न इनसे नहीं, उन प्रगतिशील तबकों से पूछो जो ऐसी सूरतेहाल में भी अपने को हिन्दू कहलाने कहे जाने में भी शर्म और निंदा समझते हैं ? मैं भी उन्ही में शामिल था | लेकिन मैं सोचता हूँ कि यदि मैं " ऐसा " मुसलमान नहीं हो सकता जो अपने मज़हब और किताब केप्रति इतना दृढ़ हो तो क्या मुझे ढीला ढाला हिन्दू होना स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए इनके बरक्स , इनके बरखिलाफ ? और मैं हो गया | हर गैर मुसलमान को अब हिन्दू हो जाना चाहिए पाकिस्तान बन जाने के बाद | आध्यात्मिक भले न सही , राजनीतिक रूप से तो ज़रूर ही |
 तिस पर लोग कहते हैं कि साम्प्रदायिकता तो कुछ कठमुल्लाओं की देन  है, साधारण मुसलमान तो बस - - -|  जब कि स्थिति यह है कि निश्चित मामलों में हर मुसलमान एक सा कट्टर होता है, उसे होना ही  होता है |  यह भी कहते हैं कि आतंकवाद कुछ सिरफिरों का काम है और आतंकी का कोई धर्म नहीं होता | जब कि सच यह है कि धर्म तो आतंकी का ही होता है | अहिंसक के धर्म कि कहाँ पूँछ होती है |
इसलिए इनसे बहस मत करो, इनकी बातों से इनका मन पकड़ो, नीयत पहचानो, सबक लो और तब अपने लिए कोई रास्ता कोई रणनीति बनाओ |   

बुधवार, 8 मई 2013

Nagrik Blog 8 May, 2013


[ कविता ]
कमर दर्द के कारण 
तुम्हारी याद कुछ 
कम तो हुई है,
फिर भी कभी 
आती तो है |
- - - - - - - - 
[ कविता ]
काँटा गुलाब में ही नहीं 
मछली में भी है,
गुलाब तो छोड़ भी दूँ |
- - - - - - - - - -  
[ कविता ]
* कभी तो मुझे 
आगे निकलने दो 
प्रणाम करने में, 
सलाम बोलने, या   
चरणस्पर्श में !
- - - - - - -  -
[ कविता ]
* यहाँ तो 
रास्ते पर  
चलने से पहले ही 
बिल्ली 
रास्ता काट जाती |
# #

* Famine [फेमीन] कहते हैं अकाल को | इस प्रकार Feminist का अर्थ निकलना चाहिए -  जिसके पास पौरुष का अकाल पड़ गया हो |

* गैरबराबरी के मंज़र तो यूँ ही समाज के बाज़ार में यत्र - तत्र - सर्वत्र है | e.g. दूल्हा दुल्हन बड़ी सी कर में चलेंगे और बाराती भले ट्रैक्टर ट्राली में | अब इसमें जाति, धर्म, नर-नारी का क्या भेद ? फिर पुराणी किताबों को ही हम क्यों कोसें ?

* नाक पर कपडा बाँधने से क्या दुर्गन्ध छन जाती है ?     

* असंभव शब्द डिक्शनरी में नहीं, रास्तों में होता है | चलने पर पता चलता है |

* यदि कुछ लोग इसकी सेवा बंद कर दें तो समाज का बड़ा कल्याण हो जाय |

* मान लीजिये वह है भी, तो भी यह तय है कि हम उसे जान नहीं सकते | फिर जानने का इतना ढिंढोरा क्यों ?

* - What do I do ?
= Poetry , personal poetry , practical poetry of life .

* सारी अच्छाई 
मेल मिलाप में है 
द्वेष में नहीं |

* दिल पसीजा 
उनका भी, जिनका 
पत्थर का था |
 
* क्रिकेट क्या है 
दौड़ने का बहाना 
फुटबाल भी |

* चाँदनी बस 
चार दिन ही ठीक 
फिर उबाऊ | 

* बस बात है 
प्यार नहीं करता 
मैं भी किसी को | 
 
* सारा संदेह 
सुबह होते होते 
दूर हो गया |

* खुल जाएगा 
सुबह होते होते 
सारा ही भ्रम |
 
* कह तो दिया 
न तुम हमें जानो 
बात झूठ थी | 

* मुल्ला से पूछो 
मस्जिद का महत्व 
मैं क्या बताऊँ ?

* तमाम पाया 
ज़िन्दगी का हिसाब 
कुछ दे दिया 
लेकर बराबर 
देकर बराबर |

* मुसलमान 
इस मामले में तो 
पक्के हैं हम |

* भारतीयों का 
है न एक इलाज 
अच्छा सा डंडा |

* जिया, जी लिया 
अच्छी ज़िन्दगी जिया 
संतोषप्रद |

* नागरिकता 
धर्म बना ले जो भी 
नागरिक है |   

* सवालाती  हैं   
सब, जवाब नहीं 
किसी के पास |

* छंदों में त्रुटि
अहसास दिलाती 
वृद्धावस्था की |  

* निपट गया 
आखिर तो यह भी  
दिन दुर्दिन |

* न ऊपर है
किधर गया पानी,  
न ही नीचे है |

* न रामायण 
महाभारत सही 
गोर्की की माँ ही !

* न रामायण 
महाभारत सही 
गोर्की की माँ ही ,  
कोई भी किताब हो    
भरती विश्वास ही |

* कोई विषय 
शायद ही बचा हो 
लिखा न हो 
जिस पर हमने 
हाइकु काव्य 
चुटकुला लेख या  
किसी विधा में कुछ |

* हाय रे दैय्या 
इतनी निष्पक्षता !
न्याय भी डरे ?

* मुझे पता है 
छूट जायँगे साथी 
अकेला हूँगा |  

* मेरी तो बातें 
कहने योग्य नहीं 
मैं कैसे बोलूं ?

* सब किताबी 
बातें हवा हवाई 
करते लोग |

* व्यवस्था होगी 
तो स्वतंत्रता कुछ 
सीमित होगी |

* झूठ नहीं था 
न अब, न तब भी  
मेरा कहना |

* सारी समस्या 
मनुष्य के मन में 
कैसे सुलझे 
बाहर बाहर से 
ऊपरी इलाज से ?

* उनसे हम 
प्रेम क्यों नहीं करें 
इसलिए कि
समाज ने बरजा
माँ बाप ने रोका है ?

* लर्न तो लिव [ Learn to live ]  
एंड वाइस वर्सा [ And vice-versa ]
लिव तो लर्न [ Live to learn ]  
 
* हाँ यह तो है 
बुरा लगा न लगा 
अच्छा न लगा  |

* जवाबदेह 
मैं हूँ तो ज़रूर 
पर उत्तर 
देने के मैं अयोग्य 
जवाब नहीं कोई |

* प्रायवेट है 
लेकिन पवित्र है 
काम संबंध |

* कुछ तो होगा 
जिसका परिणाम 
बलात्कार है !

* जो मिल गया 
जाने या अनजाने 
उसे छोड़ें क्यों 
चाहे या अनचाहे 
उसके साथ रहें |

  * जल्दी नहीं है 
बहुत समय है 
अभी सोच लो !

* जीवन स्वाहा 
हाँड़ तोड़ श्रम में 
सत्यनिष्ठा में |

* फोन तो नहीं 
फोन का इंतज़ार 
ज़रूर किया |

* तुम्हारी नहीं 
गलती हमारी थी 
जो दिल दिया |

* टूट जाती है 
जो परंपरा, फिर 
नहीं बनती |

* नहीं है कोई 
मेरे सरीखा दुष्ट 
इस जग में |

* यह गहना
- - -- - - - 
स्वर्ण गहना  
बेकार ही पहना 
फेंक बहना !  

[मूल भाव = 
किसी को हम 
ओवरटेक करते हैं 
कोई हमको |
[लेकिन यह तो गलत हाइकु हो गया | अब इसे दो तरह से लिखा जा  सकता है =] 
1 - किसी को हम 
ओवरटेक करें  
कोई हमको |
2 - किसी से हम 
आगे निकलते, तो 
कोई हमसे | 

* [ शायरी ]
मैंने तुमसे कह दिया था शाम को ही 
आज मेरे स्वप्न में तुम मत आना 
और तुम फिर आ गए ?

* यह शेर कुकुरनिदिया सोता है | सोता है, ज़रा सी आहट पर फिर भोंकने लगता है |   

* मई दिवस पूंजीवादी - साम्राज्यवादी अमेरिका के शिकागो शहर से आयातित है | कम्युनिस्ट भला इसे क्यों कर स्वीकार करेंगे ? 
वहाँ तो काम के घंटे कम करके आठ करने के लिए खून बहाए गए, हम कोशिश में हैं यह यहाँ लगभग 'शून्य' हो जाय |    

* मनुष्य की ज़िन्दगी को नर्क बना कर रख दिया है इस सभ्यता ने | बच्चों को पढ़ाओ तो कहाँ से इतना पैसा लाओ ? बिटिया की शादी में पैसा ही पैसा लगता है फिजूल | बीमारी हेरामी तो खेत बेचो | कहाँ से इतना इंतजाम कैसे करे कोई | भगवान् ने हमें नाहक  ही पैदा करके इस दुनिया में भेज दिया ! पता नहीं उसे क्या मिला | हमारे खाते में तो दुःख ही दुःख ही है |

* लेकिन यह मापदंड हिन्दू वांग्मय पर खरा नहीं उतरता | कई दलित विद्वान उसके अध्ययन का दावा करते हुए भी उसके प्रखर,बल्कि उग्र आलोचक हैं | [ Nilakshi ]

* इस्लाम डेढ़ हजार साल में ही " थक " गया | हिन्दू भले ही चोटिल हुआ, पर सनातन तो सनातन ! अभी तक चल रहा है | [ chachal bhu ]

* आपके इस पोस्ट पर 70 के दशक में लिखी एक कविता याद आई     ;--

[ धोबी का कुत्ता ]
* पहले एक धोबी होता था 
उसका एक घर होता था 
उसका एक घाट होता था ,
उसका एक कुत्ता भी होता था 
जो न घर का होता था 
न घाट का होता था | 
लेकिन अब, 
सिर्फ कुत्ते होते हैं    
उन्ही के घर भी होते हैं 
उन्ही के घाट भी होते हैं
और विडम्बना, 
उनका कोई कुत्ता नहीं होता |  
#  #  #

- और एक अत्यंत छोटी सी कविता जो मुझे बहुत पसंद है | इसे लिखकर मैं बहुत आनंदित हुआ था | लेकिन कुछ मित्र इसे अस्पष्ट [ambiguous ] बताते है | पूछते हैं - " इसका क्या अर्थ " ? पर यदि इसे यहाँ ससंदर्भ पढ़ा जाय तो सुधी मित्रो के लिए इसे समझना, इसमें डूबना लगाना मुश्किल नहीं है | यहाँ धोबी के स्थान पर भंगी है | 

" कमोड साफ़ करता हूँ 
चमक जाता है 
ख़ुशी होती है | " 
# # #

बुधवार, 1 मई 2013

Nagrik Blog 30 / 4/ 2013

* यदि आपने Top पहना हुआ है तो फिर Bottomless होने का अहसास जाता रहता है |

* अनुमानतः, कुछ लोग फेसबुक स्वयं स्वेच्छा से नहीं आये हैं | वे कहीं से भेजे या किन्ही द्वारा लाये गए हैं, उनके काम से | [ यथा सिमोन द बोउआ ]

* किसी भी पगड़ी धारी सिख को सरदार जी कहिये, नाम जानिए या नहीं | वह बोलेगा | अर्थात यहाँ व्यक्तिवाद तिरोहित होकर एक समूहवाद / किंवा समाजवाद में तब्दील हो जाता है | फिर पता नहीं क्यों लोग जातीय समूहों [ यादव अपवाद ] से चिढ़ते हैं ? उनके नाम तक उखाड़ फेंकना चाहते हैं, चाहे उखाड़ कुछ न पायें | यहाँ तक कि कम्यून [समूह ] वादी भी जब देखो तब जातिवाद के पीछे पड़े रहते हैं | यह गलत बात है कि नहीं ?     

* यही झकाझोरी में हेराय गए कँगना |
यह हम लोगों के यहाँ का देसी गीत है | किसी को यह अश्लील भी लग सकता है, क्योंकि मामला तो वही है | हमें भी लगता यदि इसका राग इतने प्यारा न होता | इसलिए मैं कभी मौज में अकेले खूब गता हूँ | आज इसकी याद दुसरे सन्दर्भ में आई | क्योंकि मेरा मिजाज कुछ पोयटिक भी है, इसलिए इसको जोड़ा मैंने फेसबुक पर चलने वाले बहसों विवादों से | कभी कभी यह झकाझोरी इतनी तेज हो जाती है की वार्ता का असली उद्देश्य, मंतव्य यानी जिसकी उपमा मैंने कँगना से दी वही हेराय, गायब हो जाता है |

* एक कोण से और देखना होगा | आज़म खान मुसलमान थे या नहीं, वह हमारे भारत देश के राज्य प्रतिनिधि थे | किसी भी कार्यवश वह गए हों मेज़बान मुल्क को उनकी हैसियत के मुताबिक उनसे ससम्मान ही पेश आना था | इस असम्मान का विरोध वाजिब था | इधर हम हैं कि आपसी इतर विवाद  में उलझ कर देश कि कमजोरी प्रकट करते हैं |

* प्रेमचंद सरीखे, और उनके समेत, लेखक दलित लेखन नहीं कर सकते | अतः इन्हें सवर्ण लेखक कहा जाना चाहिए | साधारण - सामान्य लेखक तो कोई होता नहीं |

* एक बात तो मुझे लगभग तय दिखाई देती है | मार्क्सवादी पैदायशी मूर्ख नहीं होते | वे बाद में बनाये जाते हैं |

* अभी तरुणाई में सुना एक पंडित जी का सुमधुर स्वर में गाया निर्गुण भजन याद आया तो उन्ही की लय में गाने लगा :--
*  यही अजरोरे बिछाई लेबा हो, अंधेरवा में ना बनिहैं राम | 
क्या यहाँ अजरोरे का अर्थ - प्रकाश [ enlightenment ] से है ?

*अरुण जी , आप तो सर न कहिये | किसी के लिए भी मैं यह रिवाज़ बंद करवाना चाहता हूँ | हम किन्ही professional school में नहीं हैं, न किसी के गुरु चेला | नाम के साथ ' जी ' या और कोई मित्रवत - भाई / साथी ठीक होगा | मेरे लिए उग्र जी चलता | वैसे मेरा उपनाम ' नागरिक ' है और मैं इसे '' कामरेड " की तरह सबके लिए इस्तेमाल कर सकता हूँ | " नागरिक धर्म " का प्रचारक रहा / हूँ मैं | [Rohela ]

* आप लोगों की घृणा का पात्र बनने का खतरा तो है लेकिन यह सच है कि मेरी वैचारिक पटरी लोगों से कम ही खाती है | मैं नालायक अपने आप में सरल किन्तु विरल हूँ | इसी को उस हाइकु कविता में व्यक्त किया है | लेकिन आप कविता पर न जाइए | संपर्क न तोडिये, स्नेह भाव बनाये रखियेगा | अंशुमान जी से पूछिए, इनसे मेरा प्रेम कितने झगड़ों के बाद हुआ, और आपसे कितने संकोच के साथ  | आभारी हूँ | इतना अवश्य है कि संस्कारवश मैं अधिक अशिष्टता बर्दाश्त नहीं कर पाता, जो कि अधिकतर विमर्शों में व्याप्त है | यद्यपि मैं स्वयं उग्र हूँ | अभी आप लोगों के कमेन्ट आ रहे थे तब मैं " जनमत निर्माण " की भूमिका लिख रहा था | क्षमा !   [ अंशुमन/वन्दिता  ]    

* सवर्ण राजनीति तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारत में इस्लामी राज्य लेन कि और अग्रसर है | ऐसे में यदि राज्य दलितों के हाथ में नहीं दिया गया तो नतीजा बुरा होने वाला है | इनके वश का नहीं भारत में हिन्दू राज्य बनाना | देख लीजिये इनके झगड़े | अवर्ण हिन्दू राज्य ही एकमात्र विकल्प है |  

* यदि ब्राह्मण ही बनना है तो अब दलित बनेंगे ब्राह्मण | ये ही उनका स्थान लेंगे, उन्हें रिप्लेस करेंगे | नव / भव ब्राह्मण नहीं, वही पुराने वाले ब्राह्मण - कुछ भी नयापन नहीं | वही पूजे जायँगे, उन्ही का वचन ब्रह्मवाक्य होगा | अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में वही सर्वोच्च होगे, शासक या शासक निर्माता | वाही चुनाव लड़ेंगे | और हम उन्ही को जितायेंगे | उनके ऊपर कोई कृपा करके नहीं | अपने स्वार्थवश, भारत में हिन्दू राज्य के लिए | इसे इस्लामी चंगुल से बचाने के लिए |     

*  आत्मरक्षा का भरोसेमंद कुदरती हथियार | बलात्कार से बचने के लिए अपने दाँत मजबूत कीजिये | अमुक वज्रदंती , फलाँ लौह्दंती मंजन इस्तेमाल कीजिये |

काहे चिल्लात हौ ? अबहीं चीन बहुत दूर है | हम तो लखनऊ में हन | बैंड बाजा बरात लेके आवत है, देखो कब तक पहुँचे | तब तनिक और पीछे खिसक लेब | काहे अब्बै से जान दिहे डारत हो ?


[त्रियक रेखाएँ ]
* एक रेखा हो 
तो उसे फोन करें 
इतनी सारी - - ?

* मैं राज्य की हिंसा का इसलिए समर्थक हूँ कि अन्यथा तो तमाम पहलवान लोग और संगठन हिंसा द्वारा समाज और मानव जीवन को अपने कब्ज़े में ले लेंगे | ध्यान से देखिये, भगत सिंह के समर्थक वे लोग हैं जो जीवन तो क्या, अपना एक कौड़ी भी त्यागने को तैयार नहीं | नारा ज़रूर ज़ोरदार लगायेंगे क्योंकि भगत,राजगुरु आदि ने इनके लिए अपनी जान दी | जिस प्रकार ईसा ने ईसाइयों के पापों के एवज में सूली पर चढ़ना स्वीकार किया | लेकिन स्वयं कोई ईसा, कोई भगत सिंह नहीं बनता | उधर अहिंसावादी गांधी के सींकिया चेले कम से कम अपना निजी जीवन तो थोडा बहुत जी जाते हैं !    

* लिखित दे रहा हूँ 
जुबानी नहीं है ,
समय पास करना 
जवानी नहीं है |

* जग में देखो, वह उतना ही लम्बरदार हुआ ;
जग में छोड़ी जिसने जितनी बदबूदार हवा |


एक बहुत अच्छा शेर हो गया है | सुनाकर फिर काम पर निकलूँगा | 
* नींद आ तो जा रही तेरे बगैर ,
अब तू आ या भाड़ या चूल्हे में जा | 

- - - - - - -- 
[ तो कैसा हो ? ]
* मैं सोचता हूँ 
शिक्षा का मतलब 
नैतिकता हो |

नैतिकता का [5]
नाम सार्वजनीन [7] 
नागरिकता [5]
मनुष्य केन्द्रीयता [7]
समता,सम्मान्यता [7]
{ हाइकू - ताँका, Poetry = 5 -7 -5 -7 -7 }

* तुम्हारी याद 
जैसे जलती हुई  
अगरबत्ती |

खुशबु भरी 
सुगन्धित करती 
धुआं उड़ाती  |

* कब आओगे 
मित्र, पड़ोसी चीन  
मेरे घर में ?   

* बच्चे हैं या हैं 
ये कोई पुष्पगुच्छ 
क्या अंतर है !

* बातें खूब हैं 
बातें हैं बातों का क्या 
खूब कीजिये |

* वही मेरा है 
जो मेरे काम आये 
शेष पराये |

* मार भगाओ 
विचार आ जाएँ तो 
ध्यान लगाओ |

* पाला पड़ता 
ऐसे ऐसे लोगों से 
जान बचाता 
कैसे कैसे लोगों से 
जैसे तैसे लोगों से |

* वह आयेंगे 
यदि विश्वास है तो 
वह आयेंगे |

* वह जानते 
जेब से निकालना 
हमारा पैसा  
बहुराष्ट्रीय हैं वे 
बड़े ताक़तवर |

* वह आये हैं 
विश्वास नहीं होता 
छूकर देखूँ !

* आप नेता हैं 
और मुझे चिढ़ है 
नेतागिरी से |

* क्या करता हूँ ?
बुद्धि का इस्तेमाल 
यथासंभव |

* समान होंगे 
आदमी से आदमी 
धर्म से धर्म 
नहीं, हिन्दू से तुर्क 
न सिख से ईसाई |

* व्यस्त रहता 
यही स्वास्थ्य का राज़ 
मस्त रहता |

* मेरी नियति 
सबसे दुश्मनी है 
वैचारिक तो !

* मेरी दृष्टि में 
हर किस्म की नारी 
आदर योग्य |

* बताईयेगा 
जब ऊब जाइए  
मेरे पोस्ट्स से |

* ऊटपटाँग    
लिखने में क्या श्रम 
मैं लिखता हूँ |

* सूरत नहीं 
सीरत से बनता 
आदमी प्यारा |

* लोग कहेंगे 
अच्छाई का ज़माना 
नहीं रहा, तो 
उन्हें चुप कराओ 
पूछो, तुम अच्छे हो ?

* रंग बिरंगे 
कुछ लोग, तो कुछ 
बदरंग क्यों ?

* माँ के मानी क्या 
परंपरा वाहिनी 
दकियानूसी ?

* ब्राह्मणवाद 
परोक्ष शासन का 
शाश्वत [शाब्दिक ] वाद 
सार्वकालिक सच 
सम्प्रति विद्यमान | 

* नास्तिकता तो 
देती बड़ा संबल 
" आत्मविश्वास " 

* लिख दीजिये 
आपका काम ख़त्म 
अब वे जानें 
उनका काम जाने 
क्या करते हैं वे ?

* आगे ही आगे 
और आगे सोचना 
रुक न जाना 
बहुत दूरस्थ है   
विचारों की मंजिल |

* जातिगत जो 
गैरबराबरी है 
न अभी बाक़ी 
शिक्षा में बराबरी 
उसे दूर करेगी |

* सस्ती हो गयी 
आसानी से मिल गयी 
जो कोई वस्तु ?

रविवार, 28 अप्रैल 2013

Nagrik Blog 29 / 4 / 2013


* क्यों भला लूँ मैं तुम्हारा नाम ?
कोई अपने पूज्य का 
नाम लेता है कहीं ?
# #

* धर्म के रक्षक बहुत हैं ,
प्राण के भक्षक बहुत हैं |

* भय बिनु होय न प्रीत "
जब मुझे प्रीत करानी हो तब न भय दिखलाऊँ ! नहीं कराना मुझे उनसे अपनी प्रीत | वह रहें निर्भय |

I FANCIED FOR YOU . AND YOU, FOR FANCY CLOTHES .
मैंने तुम्हे चाहा, और तुमने फैंसी कपड़े |

सू सू की सीटी बजाकर बच्चों के पेशाब उतारने की कला भला माँओं ने किस विधि से सीखा 

Is it not a shame on us that many of our fellow brethren and sisters are very poor , and we some are enjoying a lavish life ? Some of our children are unfed, un-clothed  and some have all the facilities of education , plays and entertainment ?
[ Secular Gods' Union ]

* लगता है हम लोग कुछ ज्यादा ही तिल का ताड़ बना लेते हैं | जैसे यही कि हिन्दू गाय को माता मानते हैं | अरे हिन्दू तो अपनी माता को ही माता नहीं मानते, गाय को क्या मानेंगे | लेकिन है एक मान्यता, कथन या कहावत | और माने तो अच्छा ही है | इस पर इतनी हुज्ज़त की क्या ज़रूरत ? 
देखा ? यही तो हमने कहा था | हम लोग कुछ बातों को अनावश्यक तूल देते हैं | वही हो रहा है आपके वाल पर | इसमें कोई दम, कोई सार तत्व नहीं है, सिवा बिलावजह की कटुता बढ़ाने के | फिजूल की बहस | फिर भी जिसके पास समय और शौक है, करते ही हैं |    [ Prachand Nag ]

* तोहरे घरे निकार के बैठेन | 
बूझो काव है ? [ जूता ] 
तोहरे घरे खडियाय के बैठेन |
बूझो काव है ? [लाठी ]
और भी कुछ हैं, याद नहीं आ रहा है |
Wish U a विस्थापन ?  
[ Samar Anary]

* संस्कृति के बारे में ज्यादा सोचा विचारी मत कीजिये | सिनेमा और टी वी जैसे जैसे बताते जायँ, करते जाइये | वही संस्कृति है |

* कोर्ट ने तो अभी कुछ कहा ही नहीं , आपने तो पहले ही उन्हें "निर्दोष" करार दिया !

* Rajneeti Hauva nahi hai .
 राजनीति की नहीं जाती | सही बात है कि उसके करने वाले और होते हैं पूर्णकालिक, 'राज्य' के मामले देखने वाले | साधारण मनुष्य / नागरिक को राजनीति करनी नहीं होती | उससे हो जाती है, होनी ही होती है | क्योंकि जीवन का कोई भी अंग उससे अछूता  नहीं | घर से निकले तो सड़क बाज़ार दफ्तर , सब राजनीति है |  घर परिवार में भी राजनीति है | राजनीति जीवन की एक कला एक व्यावहारिक कौशल भी है | आपने हमसे कैसे बात की ? कैसे अपने रूठे बच्चे को मनाया ? पत्नी को समझाया , माता पिता को प्रसन्न किया , पड़ोसी ,मित्रों -अफसर -मातहतों से निपटे ? सबमे राजनीतिक बुद्धि चाहिए | इसी को थोडा आगे बढ़ा कर सोचा , समाज और राज्य पर गौर किया तो वह राजनीति हो जायगी जिसके बारे में यह पोस्ट है | न भी करें तो अपने आस पास आपके खिलाफ जो खेल चल रहे हैं उसे तो समझें , अन्यथा धोखे खायेंगे, नुक्सान उठाएंगे |   

* नग्न होना शर्म की बात नहीं है बिल्कुल | जिस बात पर शर्म आनी थी उस पर तो किसी ने सोचा ही नहीं | वह यह कि ऐसी स्थिति - परिस्थिति क्यों बनी ? मुसलमानों को सोचना था कि किस तरह उन्होंने अपने लिए पूरी दुनिया में यह संदेहास्पद स्थिति बना ली कि उनके समुदाय का उच्च पदस्थ ख्यातिप्राप्त व्यक्ति भी बिना गहन जाँच के किसी देश के भीतर नहीं जा पाता ?     

* हिन्दू कहाँ कटाते थे पहले चुटिया ? अब कितने लोग रखते हैं चुरकी ? ऐसे ही बाकी भी कुछ बदलेगा , कुछ कटे पिटेगा ,मिटेगा | 


* मैं अभी अभी ही सोच रहा था कि आप का पोस्ट आ गया | कुछ और सीधी सच्ची बात कह दो तो वह भड़क जाएगा | प्रेम, प्यार, दोस्त वगैरह कह दो तो वह बड़े आराम से झाँसे में आ जायगा , जाल में फँस जायगा | फिर तो वही होना है जो होता है | [ Atul Singh]

वदामि सत्यं 
- - - - - - - - 
सच कहूँ तो 
नहीं लगता मेरा    
यद्किंचित भी    
मन पूजा पाठ में
किसी अनुष्ठान में |

* कूड़ा कबाड़ 
मेरा पढ़ते हैं आप 
आप धन्य हैं ,
आभारी हूँ आपका 
मुझे स्नेह देते हैं |

* बहुत अच्छी 
स्मृति नहीं जिसकी  
वह मज़े में |

* लोग सिद्धांत 
बघारते ज्यादा हैं 
पालते कम |

* उन्हें न देखो 
अपनी राह चलो 
वही सही है |

* मेरे तो लेखे 
वही राम नाम है 
जो मेरा काम |

* हमारी दृष्टि 
कुछ गलत तो है 
नारी के प्रति |

* छिपते रहो 
मैं तुम्हे ढूँढ लूँगा 
सात पर्दों में |

* उदास होता 
कुछ खो जाने पर 
पाने पर भी 
उदासी छा जाती है 
ऐसा क्यों होता भला ?

* सोच रहे थे  
कहाँ जाएँ धूप में
सूर्य ने कहा 
आओ मेरी छाँव में  
मैं चला गया |

* वोट देना भी 
एक राजनीति है  
करनी होगी |
* राजनीति है
एक वोट देना भी
करनी ही है | 

* बड़ाई करो 
मार्क्सवाद की,बड़े 
बन जाओगे |

* सच कहता हूँ 
मैं बहुत दुखी हूँ 
किससे बोलूं ?

* हैं न हमारे 
बगल में छुरियाँ
मन में राम !

* प्यार करूँ हूँ 
कितनी बार कहूँ ?
कहता रहूँ ?

* हरी बत्ती है 
देखकर चलो 
तिस पर भी |

* नहीं लिखता  
मैं हाइकु या तांका
ज़िन्दगी जीता,
मैं ज़िन्दगी लिखता 
ज़िन्दगी जीते हुए |

लघु मानव 
छोटी सी है ज़िन्दगी 
छोटे हाइकु |

* कोई खिचड़ी
मचानों पर टँगी
पक रही है |   

* यही क्या कम 
अब भी याद उन्हें  
है मेरा नाम 
जानते हैं अब भी   
मुझे पहचानते |

* मुक्ति का रास्ता 
बंधनों से पूछिए 
यही बतायें  
कहाँ से बँधी हैं ये
कहाँ से खुलेंगी ये ?

* बात रहेगी 
तो चीत भी होगी ही 
इसे बचाओ | 

* अभी आपने 
धर्म देखे कहाँ हैं 
लहूलुहान ?

* अब तो भाई 
मेरा काम हो गया 
मैं चलता हूँ |

* देख आईना
तू ही मेरी दुर्दशा 
उनके बिना |

* हाइकु मैंने 
अनगिनत डाले हैं 
इस ब्लॉग में 
कापीराइट मुक्त 
समस्त रचनाएँ |
 
* मैं उग्रनाथ नागरिक, महापुरुष 
एक आदमी 
ठिकाना ढूँढता हूँ  
अपनी पसंद का 
ठीहा बदलना चाहता हूँ 
नहीं रहना चाहता यहाँ 
अगरु के धुओं में दम घुटता है |
नया " घर करना " चाहता हूँ 
जहाँ ईश्वर न हो 
आदमी हो, औरत हो,
जानवर भी स्वीकार 
पर पंडा पुजारिन नहीं   
न देवी देवता 
मैं ढूँढता |
[ 09415160913]

बृहस्पतिवार, 25 अप्रैल 2013

Nagrik Blog 25/4/2013


* Work is worship 
Alright !
But ,
Worship is not ' work' .

* मानववादी या मानवतावादी  =
* हमारी संख्या बहुत है | हमारे मानववादी घुसपैठिये विश्व के हर कोने में, संसार के सभी धर्मों में व्याप्त हैं जो इंसानियत को सर्वोपरि मानते हैं और कर्मकांड, पाखण्ड में कम विश्वास करते हैं | अलबत्ता वे कहते अपने को ज़रूर हिन्दू - मुसलमान वगैरह हैं |

* ज्ञानी होने का अहंकार या ज्ञानी बनने / दिखने / कहलाये जाने की लालसा ही व्यक्ति को विवादप्रिय बनती है | वरना ज्ञानी जन तो अधिकाँश चुप रहते हैं |

* लडकियाँ इतना तो अपने पहनावे पर ध्यान देती हैं, वेशभूषा को लेकर सतर्क रहती हैं | फिर भी कुछ पुराने ख्याल के लोग कहते हैं कि वे कम कपडे पहनती हैं !   

* अक्ल बड़ी या भैंस ?
- बड़ी नहीं , बहुत बड़ी होती है भैंस |

* आइये हम लोग भी अपने लिए एक एक वाद चुन लें और उसके वादी बन जाँय | कुछ वादों की सूची इमाग से निकाल रहा हूँ , आप को जो अपने लिए पसंद आये ले लें | अपवाद , आशीर्वाद , अनेक्वाद . अनुवाद , गुणानुवाद , संवाद , परिवाद , अनापवाद, धन्यवाद ,  

* हम करें तो क्या करें ? मार्क्सवाद के अलावा और कोई बौद्धिक वाद भी तो नहीं दिखाई पड़ रहा है जिसकी कोई नीति हो ? और जो हैं भी वे राजनीति में नहीं हैं | 


*अन्यथा न लेंगे कामेश्वर जी ! आपके बहाने अपना भी याद करना सुखद लगा, कि 1966 से 2004 तक 38 वर्ष की सेवा अकलंक बिता ले गया, वह भी जूनियर एवं सहायक इंजीनियर जैसे खतरनाक पदों पर | फिर ज़रुरत न रहने पर समय से पहले त्यागपत्र दे दिया |   

* न्यायाधीश बनते बहुत हैं अपने आप को, लेकिन उनके यहाँ बहुत खोट है |
[ बनते की जगह " लगाते " भी अच्छा हो सकता था ]

 Till there are nations , nationalism can not be done away, however soft or broadminded it be . The quote shows humanism and intelligence, but beyond practice . Hence obsolete .
Rather, Internationalism - Marxism,Islamism,globalization etc are developing diseases. 

* पोर्नो इतनी दिखेंगी की वे बेमतलब हो जायेंगी | 

* कोई आदमी जब विशिष्ट बन जाता है, मेरी नज़रों से गिर जाता है | मैं उससे कटा - कटा रहने लगता हूँ | [ इसे मेरा दोष माना जाय ]   
Shriniwas Rai Shankar दोष और द्वेष दोनों माना जायेगा सर |
- इच्छा तो थी इन्कार करने की, लेकिन सोचता हूँ ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जिस पर सामान्यतः कोई विश्वास न करे | फिर यह भी तो हो सकता है कि आप की ही बात सूक्ष्मतः सत्य हो ! आभारी हूँ आपका |  
- मेरी कामना है सब सामान्य हों, सामान्य तरीके से रहें, उनके साथ सामान्य व्यवहार हो |
मैंने अपने Visiting Card पर दो वाक्य छपवायें हैं - 1 - Always in love , always at war , 2 - विशिष्टता के खिलाफ मेरी विशेष लडाई है | 

* अभी अनायास मार्गरेट थैचर जी की याद आ गयी | कुछ ही दिन पूर्व वह दिवंगत हुईं | उन्हें ब्रिटेन का आयरन लेडी कहा जाता है | पलट हमारे मनमोहन जी की दशा देख लीजिये, उन्हें क्या कहा जाता है ? अब मेरी बात यह है की ये दोनों ही डिमोक्रेसी की वेस्ट मिनिस्टर प्रणाली के मुखिया थे या रहे हैं | फिर दोनों में इतना अंतर क्यों ? कि जिसके चलते भारत में राष्ट्रपति प्रणाली का सुझाव दिया जा रहा है | जब कि यह इंग्लैण्ड में भली भाँति चल रहा है ?    

* अपनी अपनी चिंता -
मैं दो चिंताओं की आग में जलता रहता हूँ | एक तो महिलाओं के बारे में है, जिसे तो मैं बताने से रहा |  दूसरी यह कि संदीप, अंशुमान और कुछ अन्य उन जैसे टी टोटलर साथी कैसे चौबीस के चौबीस घंटे बिना एक भी सिगरेट पिए जीवित रह लेते हैं ?    


* मैं त्रुटिमुक्त नहीं हूँ | मैं गलतियाँ करता हूँ और गलती को गलती मान भी लेता हूँ | उसे हर हाल में सही साबित करने का जिद नहीं करता |

* Sorry भाई, आप तो दलित हो गए . I am not so privileged .

* [ संस्था ]  ? ?
तमाशा ( TAMASHA)
तार्किक मानववादी Secular - Humanist - Atheist

* उग्रनाथ नागरिक 
" मानवमात्र " 
L - V - L / Aliganj , Lucknow - 226024 { U . P .}  
or " पूर्ण निरपेक्ष "
L - V - L / Aliganj , Lucknow - 226024 { U . P .}

* उग्रनाथ 
नागरिक धर्म , अलीगंज , 
लखनऊ , 226024 [उ.प्र.]

* गलत जगह पर सही बात कहना भी गलत बात कहना है |

* जाने का मन न हो तो जाने की तैयारी में कुछ न कुछ छूट ही जाता है |

* मोलभाव नहीं कर पाता तो बाद में कचोटता है - हाय , इतना बोला होता तो भी शायद दे देता !

* घाव को यूँ खुला तो छोडो मत ,
मक्खियाँ भिनभिना रही हैं बहुत |

* जो मन में कुछ खटास भरे वह अधर्म है ,
जो मन को कुछ उदास करे वह अधर्म है |


[ कविता ]
* तथ्य तमाम हैं 
कुछ कथ्य हैं 
और कुछ -
न कहने लायक ,
न सुनने लायक |
# #

* हम दोनों 
दो समानांतर रेखाएं है 
मिल नहीं सकते तो क्या 
प्यार के देश की तो 
संरक्षित सीमायें है ?
थोडा मैं दूर हटा 
थोडा सा तुम भी परे 
फिर , बढ़ ही तो गया 
क्षेत्रफल , हमारे प्यार का ?
# # 

* सिंहासन खाली करो क्या ?
सिंहासन तो खाली है 
बस कोई सुपात्र हो 
तो बैठ जाये 
जनता तो चाहती है 
उसके मन के सिंहासन पर 
कोई विराजमान हो ,
वह तो खाली है 
कोई बैठने वाला तो हो ! 
# #

# Ramji Tiwari =
प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा कवि नवनीत की कविता

* एक दिन घृणा
प्रेम किये जाने की तरह
आसान हो जाय,
और बुराईयो को याद करना
किसी को याद करने
जैसा सुखद,

एक दिन
युद्ध से भागने की मजबूरी
कायरता नही,
साहसी होने की शुरूआत कही जाय
और तटस्थता सबसे बङा अपराध

एक दिन
धर्मनिरपेक्षता अपने चेहरे से
मुखौटे को हटाये
और दुनियाँ के सारे कट्टरपंथी शब्द
एक नये शब्द के स्वागत मे
खङे होकर तालियाँ बजाये

मुमकिन हो एक दिन |
_________________

[ कविता ]
* सच कहता हूँ 
गहरे मन की बात 
मैं प्रेम करना 
नहीं सीखना चाहता 
मैं घृणा प्रदर्शित 
करना चाहता हूँ ,
मैं मंदिर - मस्जिद 
जाने वालों से 
घृणा करना चाहता हूँ |
# # #   

* अपना होना 
सिद्ध करना होगा 
जीने वालों को |

* समस्याओं के 
मूल में तो है पैसा
समाधान भी |

* कोई भी सार
तत्त्व जग में नहीं
प्रेम (नेह) सरीखा |

* थोडा तो पास
रहूँगा मैं आपके
थोडा दूर भी |

* कूदो आग में
कूदो, कूदो आग में
पानी मिलेगा |

* अपने प्रति
क्यों नहीं होता कोई
ईमानदार ?

* कितना झूठ
कितना खूब झूठ
बोलोगे यार ?

* कविताई में
मैं कहाँ टिकता हूँ
सबसे पीछे |

* इन्सानी बातें 
अव्यावहारिक हैं 
इस काल में |

* कैसे तो आयें 
बेहतर विचार 
या वृहत्तर 
माँजना होगा मन,
दिल - दिमाग |  

* झूठा प्यार ही 
मुझे तो चाहिए था 
सो मुझे मिला |

* इस्लाम है न 
हिन्दू राजनीति की  
पवित्र गाय !

* दिल दे आया 
एक अजनबी को 
अब क्या होगा !

* प्रकृतिपूजा 
उसके सम्मुख मैं 
नतमस्तक |

* नया फार्मूला 
पैसा न खर्च करें 
दानी कहाएँ |

* मुझे पता है 
तुमने वह सब 
लिखा हास्य में |  

* दुस्साध्य कर्म 
मौन निश्चल मन 
हो भावशून्य |

* तज संदेह 
देह निस्संदेह है 
नेह का गेह | 

* बोल करके 
मन में पछताती 
कठोर जिह्वा |

* बड़ा कठिन 
मन को समझाना 
माने तब न !

* फ़ौरन जाओ 
उनकी शरण में 
जो हैं ही नहीं |

* यह तो मैंने 
किसी के कहने से 
लिखा नहीं है !

* रह ही जाता 
कितना भी चुनिए 
दाल में काला | 

* नवागंतुक 
नेह का स्वागत है 
मन के द्वारे | 

* कल करेंगे, 
आज मन नहीं है,
प्रेम की बातें |

* मूल संस्कृति 
पसंद करता हूँ 
पालन नहीं |

* डाला तुमने  
नींद में व्यवधान 
जुर्माना भरो | 

* सत्य और है 
प्रकट कुछ और 
नर नारी का |

* बुद्धि लगाओ 
चाहे जहाँ भी जाओ 
हिन्द या पाक |

* अजूबा हुआ ?
यह तो होता ही है 
ऐसा समझो |

* क्या कर लेते ?
लेकिन करते तो 
भरसक हैं |

* भेड़िया आया   
देखो इधर देखो
ईश्वर आया |

* भूल जाइये 
कभी भ्रष्टाचार था 
इस देश में 
भ्रष्टाचार नहीं है 
इस देश में |

* जो ही कोई इसे लूटे, बेइज्ज़त करे , यह देश उसी का है |

* उनका कहना है कि मेहतर या भंगी को यदि कचरा प्रबंधन समिति का अध्यक्ष कहा जाय तो स्थिति बदल जाती है |

* बाकी सब लोग तो शरीक हुए ,
जिनसे उम्मीद थी , नहीं आये |

लड़की होना, या न होना |
* लड़की होना कितना त्रासद ! प्रेमी से विवाह करे तो बाप मार डाले | न करे तो प्रेमी गला काट दे !
* पुत्री का होना माँ- बाप के लिए इस मायने में अच्छा है कि वह उन पर बोझ नहीं बनती | विवाह के बाद वे बोझ से मुक्त हो जाते हैं | जब कि पुत्र जीवन भर उनके सर का भार, उन्हें सताता रहता है | 

* जो पति - पत्नी शक्की नहीं होते, उनका यौनिक जीवन सुखमय बीतता है | 

एक नयी संविधान सभा व नये संविधान की मांग व‍ाजिब है

संविधान-विषयक कांग्रेसी विश्वासघात को उजागर करने के लिए एक तथ्य को याद दिलाना जरूरी है। मेरठ अधिवेशन में 'सब्जेक्ट्स कमेटी' की बैठक में बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने वायदा किया था कि आजादी मिल जाने के बाद सार्विक वयस्क मताधिकार पर आधारित एक नयी संविधान सभा बुलायी जायेगी (एस. गोपाल सम्पादित 'सेलेक्टेड वर्क्‍स ऑफ जवाहरलाल नेहरू', खण्ड1, पृ. 19)। लेकिन तमाम वायदों की तरह यह वायदा भी भुला दिया गया। इसके बाद कांग्रेस ने कभी भी सार्विक वयस्क मताधिकार आधारित संविधान सभा बुलाने की बात नहीं की।

आज बहुत कम लोगों को ही इस तथ्य की जानकारी है कि जो संविधान भारतीय लोकतन्त्र (जनवाद) का ''पवित्र'' आधार ग्रन्थ है, जो हर नागरिक के लिए अनुल्लंघ्य और बाध्‍यताकारी है, उसका निर्माण भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने नहीं किया था, न ही चुने हुए प्रतिनिधियों के किसी निकाय द्वारा उसे पारित ही किया गया था। संविधान बनाने वाली संविधान सभा को उन प्रान्तीय विधानमण्डल के सदस्यों ने चुना था, स्वयं जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल ने किया था। जाहिर है कि इनमें से चन्द एक कांस्टीच्युएंसी से चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़कर शेष सभी सम्पत्तिशाली कुलीनों के प्रतिनिधि थे। यानी संविधान सभा सार्विक नहीं बल्कि अतिसीमित वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गयी थी और प्रत्यक्ष नहीं बल्कि परोक्ष चुनाव के आधार पर चुनी गयी थी। इन चुने गये प्रतिनिधियों के अतिरिक्त उसमें राजाओं-नवाबों के मनोनीत प्रतिनिधि थे। कुछ उच्च मध्‍यवर्गीय विधिवेत्ता और प्रशासकों को भी उसमें मनोनीत किया गया था। यहाँ यह भी जोड़ दें कि इस संविधान सभा को चुनने वाले प्रान्तीय विधान मण्डलों का चुनाव (अतिसीमित मताधिकार पर आधारित होने के अतिरिक्त) धार्मिक एवं जातिगत आधार पर पृथक् निर्वाचक-मण्डलों द्वारा किया गया था। चुनाव के इन आधारों और प्रक्रिया का निर्धारण 'गवर्नमेण्ट ऑफ इण्डिया ऐक्ट, 1935' के द्वारा औपनिवेशिक शासकों ने किया था। संविधान सभा ने 1946 में जब काम करना शुरू किया तो देश अभी ग़ुलाम था। 1950 में संविधान जब बनकर तैयार हुआ तो देश आजाद हो चुका था। लेकिन सार्विक मताधिकार के आधार पर चुने गये किसी नये निकाय द्वारा पारित या पुष्ट किये जाने के बजाय उसी पुरानी संविधान सभा द्वारा इसे पारित करके पूरे देश की जनता पर इसे लाद दिया गया।


दुनिया को नर्क बना रखा है देवों के देव महादेव ने


  •   'रामायण' धारावाहिक के बाद इधर टी वी पर इस तरह के मिथकीय धारावाहिक कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं. अंधविश्वास और पूरी तरह सामंती तथा कबीलाई मानसिकता से भरे इन धारावाहिकों ने समाज की मानसिकता को अपने तरीके से प्रभावित तो किया ही है साथ में वह संकटों से घिरी इस व्यवस्था के लिए भी बड़े मुफीद हैं. अप्रासंगिक हो गयी जादू-टोने की किताबों से किये 'शोध' के ये परिणाम समाज के भविष्य और वर्तमान दोनों के लिए घातक हैं. जाने माने लेखक और पेशे से चिकित्सकराम प्रकाश अनंत का यह आलेख इन चमकदार धारावाहिकों के इन्हीं प्रभावों पर केन्द्रित है.


................................................................................................................

        २८ मार्च को राजस्थान के स्वामी माधोपुर जिले के गंगापुर सिटी के रहने वाले एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी,भाई,पुत्र व पुत्री के साथ मिलकर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली। उसने मरने से पहले एक विडियो बनाया और उसमें बताया कि वे लोग क्यों आत्महत्या कर रहे हैं. पुलिस छानबीन से पता चला कि वह परिवार अति धार्मिक प्रवृत्ति  का था .धार्मिक आयोजनों में काफी हिस्सा लेता थायहाँ तक कि टीवी पर भी धार्मिक सीरियल ही देखता था। वह महादेव सीरियल से बहुत प्रभावित था। बहुत से लोग ये तर्क दे सकते हैं कि महादेव सीरियल तो पूरा देश देखता है और किसी ने तो आत्महत्या नहीं कीअब वह परिवार मूर्ख था तो इसमें महादेव सीरियल का क्या दोष है।  
हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं और यह विज्ञान का युग है। विज्ञान ने आज चाँद सितारों तक की दूरियां तय कर ली हैं लेकिन विडम्बना है कि तमाम तरक्की के बाद भी आज समाज की सोच आदिम सामंती संस्कृति की सोच से ऊपर नहीं उठ पाई है। उसकी बड़ी वजह यह है कि शासक वर्ग ने समाज का ऐसा ताना वाना बुन रखा है कि वह अपने हित के लिए समाज की सोच को ऊपर नहीं उठने देना चाहता। यही वजह है कि तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बाद भी समाज का पढ़ा लिखा तबका भी अपनी पुरातनपंथी सोच से बाहर नहीं आ पाया है। उसकी वजह यही है कि  शासक वर्ग के पास जनता की चेतना को कुंद करने के तमाम हथियार हैं। वह चाहता है कि जनता की समझ वहीं तक विकसित हो जहां तक उसके हित में है। यह बिला वजह नहीं है कि निर्मल बाबा(और ऐसे तमाम बाबाओं)के दरबार में जनता की काफी भीड़ जुटती है,पढ़े लिखे लोग उसके बेहूदे उपायों पर विश्वास करते हैं, टीवी चैनलों पर निर्मल बाबा के कार्यक्रम छाए रहते हैं।

विजुअल मीडिया का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तमाम चैनल जिस तरह राशिफल, तंत्र-मन्त्र, बाबाओं और धार्मिक सीरियलों को परोसते हैं उसने जनता की सांस्कृतिक चेतना को मटियामेट कर दिया है और वह उसे फिर उसी आदिम युग में ले जाना चाहते हैं। ऐसे में किसी परिवार के पांच सदस्य ज़हर खाकर देवों के देव महादेव से मिलने चले जाते हैं या हज़ारों महिलाएं डाइन बता कर मार दी जाती हैं या तंत्रमन्त्र के चक्कर में लोग पड़ौसियोंजहां तक कि अपने ही बच्चों की बलि दे देते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।  अन्धविश्वास से लेकर परम शक्ति यानी ईश्वर से सम्बंधित जो सीरियल टीवी पर दिखाए जाते हैं वे हमारी सांस्कृतिक चेतना को एक ही जगह ले जाते हैं परन्तु इनमें एक बहुत बड़ा अंतर है। हो सकता है एक धार्मिक व्यक्ति तंत्र मन्त्र को सही मानता हो और दूसरा ग़लत या एक धार्मिक निर्मल बाबा को ढोंगी मानता हो और आशाराम बापू का भक्त हो जबकि दूसरा आशा राम को ढोंगी मानता हो और निर्मल बाबा का भक्त हो लेकिन जो इस तरह के धार्मिक सीरियल हैं उनमें सभी धार्मिक  अंधी श्रद्धा रखते हैं। इस बात को एक उदाहरण से समझते हैं।
         
कुछ दिन पहले टीवी पर ऐसे बहुत से विज्ञापन आ रहे थे जो विशेष छूट के साथ तीन-साढ़े तीन हज़ार में लक्ष्मी यंत्र कुबेर की चाबी आदि देते थे जिसकी स्थापना के बाद खरीदने वाले का घर दौलत से भर जाएगा। बहुत से धार्मिक व्यक्ति इस पर विश्वास नहीं करते होंगे। लेकिन यही बात महादेव सीरियल में कुबेर वाले एपीसोड में दिखाया गया है जिस पर हिन्दू माइथोलोजी में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति विश्वास करेगा। जहां तक कि उसके विश्वास करने या न करने का कोई सवाल ही नहीं उठता यह बात उसके अवचेतन में सीधे प्रवेश कर जाती है। कुबेर में अपने धन के प्रति लोभ पैदा हो जाता है। महादेव उसे फटकारते हैं कि लोगों में असंतोष बढ़ रहा है,दुनिया में जिनके पास धन है उनका दायित्व है कि वे अपना धन संसार आवश्यकताओं में लगाएं। दरअस्ल यहाँ महादेव पूंजीवाद के असमानता के अन्तर्विरोध को उसी उपदेशात्मक तरीके से हल कर देते हैं जैसे अब तक गली मोहल्ले के कथा वाचक हल करते आ रहे हैं। साथ ही वे निर्धनों को आश्वस्त करते हैं की वे अपने काम में लगे रहें उन्होंने कुबेर को डांट कर ठीक कर दिया है वह एक दिन आपके लिए भी अपना खजाना खोल देगा।
             
राजा- महाराजाओं के समय में लिखी गईँ ये  धार्मिक कथाएं शासक वर्ग के हितों के लिए वर्तमान समाज को पुराने सामंती मूल्यों की जकडबंदी में जकड़े रखना चाहती हैं। देवताओं का राजा इंद्र है।उसमें वे सारे गुण हैं जो उस समय राजा महाराजाओं में होते थे। धूर्तता,मक्कारी,अय्याशी और हमेशा अपने राज्य के लिए चिंतित। इससे यही पता चलता है कि जिस दौर में ये कथाएँ लिखी गईं उस दौर में इन्हें इसी तरह सोचा जा सकता था। लेकिन अफ़सोसजनक यह है कि इन कथाओं का धार्मिक जनमानस में काफ़ी प्रभाव है और शासक वर्ग जनता की मानसिकता को उन्हीं सामंती मूल्यों में जकड़े रखने के लिए इन कथाओं का इस्तेमाल कर रहा है। 
       
महादेव बार -बार यह बात दोहराते हैं कि कैलाशउनका परिवार सिर्फ उनका परिवार नहीं है,वह संसार के लिए एक आदर्श है। सही भी है। महादेव यानी इस सृष्टि के ईश्वर को शादी और बच्चे पैदा कर परिवार बसाने की भला क्या ज़रुरत है। उन्होंने यह सब संसार के लिए आदर्श स्थापित करने के लिए किया होगा। तब कुछ महिलाएं व पुरुष विवाह नाम की संस्था को स्त्री के विरुद्ध बताते हैं वे भी सही ही बताते हैं। क्योंकि महादेव ने परिवार का जो आदर्श स्थापित किया था वही अभी तक चला आ रहा है और उसे बदलने की ज़रुरत है। इस पारिवारिक व्यवस्था में महादेव विवाहित पुरुष का आदर्श हैं और पार्वती विवाहित स्त्री का। महादेव एक दूसरे ईश्वर नारायण के साथ मिलकर संसार की फर्जी चिंताओं (ध्यान रहे ईश्वर दुनिया की वास्तविक चिंताओं से निरपेक्ष है) में व्यस्त रहते हैं और पार्वती के तीन काम हैं- स्वामी के मूड को दुरुस्त रखना, बच्चों के भरण पोषण के लिए लड्डू बनाना और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखना। वे एक अच्छी गृहणी की तरह हमेशा चिंतित रहती हैं कि बच्चों की सुरक्षा के लिए एक भवन का निर्माण कर लिया जाए। वे बार -बार रट लगाए रहती हैं स्वामी बच्चों की सुरक्षा के लिए भवन का निर्माण कर लिया जाए। महादेव प्रकृति के निकट रहने का आदर्श स्थापित करते हैं कि इंसान को भवन की आवश्यकता ही नहीं है। आज जब करोड़ों लोगों के सर पर मकान नहीं है उनके लिए महादेव का यह आदर्श कितना सुन्दर है। कभी कभी महादेव यह कह कर कि पार्वती तुम आदि शक्ति हो यह सन्देश देते हैं कि दिव्य शक्तियों से संपन्न ईश्वर पुरुष रूप में ही नहीं स्त्री रूप में भी होता है। लेकिन पार्वती की शक्ति का संचालन महादेव के अधीन तो है ही वे अपनी शक्ति का उपयोग तभी करती हैं जब महादेव उसकी भूमिका बना देते हैं और उनके बच्चों पर कोई गहरा संकट आने को होता है। वे दुर्गा बन कर महिषासुर को मारती हैं क्योंकि वह उनके पुत्र कार्तिकेय पर हमला करता है।वे काली का रूप धरती हैं क्योंकि हुन्ड नाम का असुर उनके भावी दामाद नहुस को मारना चाहता है। वे एक अच्छी माँ की तरह बेहद चिंतित रहते हुए नहुस को  तत्काल विवाह योग्य बनाने की जिद पकड़ लेती हैं। महादेव के समझाने के बावजूद पार्वती का बार बार जिद पकड़ना समाज में प्रचलित कहावत तिरिया हठ और बाल हठ की ही पुष्टि करता है।  पार्वती की जिद पर महादेव अपने जादू से दस-बारह साल के दिखाई देने वाले नहुस को विवाह योग्य पूर्ण युवा बना देते हैं। स्त्री होते हुए भी पार्वती का नहुस को विवाह योग्य बनाने के लिए इतना चिंतित होना और महादेव का उसे विवाह योग्य बना देना सामंती युग में अधिक उम्र के पुरुषों द्वारा कम उम्र की नाबालिग लड़कियों से विवाह करने की प्रवृत्ति का ही प्रतीक है। कैसी विडम्बना है की देश में जब बहस छिड़ी हुई है कि लड़की की यौन स्वीकृति की उम्र सोलह साल हो या अठारह साल हो ऐसे समय में महादेव एक  कम उम्र के लडके को विवाह योग्य बना कर अपनी पुत्री जो विवाह योग्य नहीं है उससे शादी करने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक युग में भी लड़कियां अच्छे पति के लिए व्रत रखती हैं महादेव सीरियल इसकी सार्थकता की पुष्टि करता है। महादेव की पुत्री बाल्यावस्था में नहुस से विवाह करने के लिए तपस्या करने चली जाती है और लक्ष्मी की पांच बहनें अपने जीजा नारायण से विवाह करने के लिए घोर तपस्या करती हैं। जो कामकाजी महिलाएं यह शिकायत करती हैं कि उनके पति घर में सहयोग नहीं करते उन्हें समझना चाहिए की महादेव और पार्वती ने यही आदर्श प्रस्तुत किया है।
           
महादेव जैसे सीरियल समाज की चेतना का जिस तरह क्षरण करते हैं वह समाज की सोच को सदियों पीछे ले जाते हैं। धार्मिक संस्कार किस कदर व्यक्ति की चेतना में अन्दर तक घुस जाते हैं कि व्यक्ति चेतना के स्तर पर उनसे मुक्त भी हो जाए तब भी अवचेतन से ये संस्कार आदत के रूप में प्रदर्शित होते रहते हैं और व्यक्ति को उसका पता भी नहीं चलता। लोग डॉक्टर,इंजीनियर,वैज्ञानिक  बन जाते हैं फिर भी उनकी सोच इन्हीं संस्कारों की वजह से एक अनपढ़ अन्धविश्वासी व्यक्ति की सोच से ऊपर नहीं उठ पाती।उनकी इस सोच को बनाए रखने में रामायण,महाभारत,महादेव जैसे सीरियलों का बड़ा योगदान है।