रविवार, 2 नवंबर 2014

नागरिक पत्रिका = सितम्बर 2014

*अब यह परिभाषा मान ली जानी चाहिए, जो स्पष्ट हैं और धर्मों के अन्तर को साफ़ भी करता है |
हिन्दू वह जो मुर्तिवादी है और मुसलमान वह जो अमूर्तवादी है | यही परिभाषा हिन्दुत्व और इस्लाम पर लागू होती है / होनी चाहिए | यद्यपि एतराज़ हो सकता है कि मुसलमान भी क्या अमूर्त पूजक हैं जब उनके प्रतीक 786 या काबे का चित्र मूर्ति सामान ही समादृत है  | और कुरआन पुस्तक एवं मस्जिदें भी तो साक्षात भौतिक आकृतियाँ हैं ? लेकिन इससे कोई बात नहीं बनती | इससे वह मुर्तिवादी नहीं हो जाते, क्योंकि ईश्वर को वह अमूर्त ही मानते हैं | मूर्ति तो हिन्दू के भी तमाम पंथ नहीं पूजते , पर उससे क्या ? उन्हें मुर्तिवादी तो माना जा सकता है, क्योंकि वे मूर्ति के विरोध में नहीं हैं | कुछ मुस्लिम भी भले अमूर्त पूजक न हों और वे हिन्दू मूर्तियों का बराबर सम्मान करते हों , तब भी उन्हें अमुर्त्वादी मन जा सकता है , सिद्धांततः |
सचेत होकर हमने इस विभाजन को मूर्ति पूजक / अमूर्त पूजक न रखकर हमने दर्शन के आधार पर मुर्तिवादी / अमूर्त वादी रखा है |

 अब लीजिये , लव पर तो एतराज़ था ही | अब लव जेहाद पर भी आपत्ति है कि उस यैसा क्यों कहा जा रहा है | खगाले जा रहे हैं मूल अरबी के text | कहते हैं अनुवाद भ्रामक होता है | अब बताइए अभी तो बड़ी मुश्किल से संस्कृत से छुटकारा मिला है और टेढ़ - बाकुल अनुवाद से काम चला रहे हैं , अब और अरबी पढ़ें | आप पढ़िये , हम सहज बुद्धि , Common sense डाल कर देखते हैं | हम तो यह जानते हैं कि जो जो आप धत्कर्म इस धरती पर करते हैं वाही आपका धर्म है | हम का जानी तोहरे किताबिन में काव लिखा है ? और तुमहूँ कुल पढ़े हौ का ? पता है इस मुलुक का नाम है हिन्दुस्तान | बड़ा सनातनी ज्ञानी है इउ | कुल चीज़ के अर्थ निकाल लेत है , और अपने काम के लिए शब्दों को विशेष मतलब में ढाल लेता है | आप " आरोपित " को आरोपी लिखते हो , वह मान लेता है | बलात्कार एक ख़ास अपराध के लिए प्रयुक्त होता है , न कि हर प्रकार के जोर ज़बरदस्ती के लिए | आप संधि - समास जोड़ा घटाया करो , जन संवाद अपने हिसाब से चलेगा | जिस जाति के लक्षण आप के व्यवहार से प्रकट होगा वह आपको उसी जाति से सम्मानित करेगा , क्या करेगी सरकार , क्या करेगा संविधान ? वह अपना संविधान अपनी काँखों में दबा कर चलता है | आप कोई अच्छा काम करेंगे उसका कोई श्रेय आपको मिले न मिले , आपके किंचित भी दुष्कर्म पर वह आपकी जाति धर्म सिवान जिला प्रदेश खानदान , महतारी बाप सबकी खबर ले लेगा , यह इसका चरित्र है | और यह तो होता ही है कि एक मनई कि गलती से राष्ट्र का अपमान हो जाता है और होता है | 
तो लव जिहाद में मुसलमान को घसीट लिया गया तो किमाश्चर्यम ? जिहाद ( का जद्दोजहद ) उनके शब्दकोष में है और उसके लिए संघर्ष उनके कर्म क्षेत्र में ( इससे उन्हें भी एतराज़ नहीं ) | तो जब अभी तक प्रेमरहित जिहाद को जेहाद कहा जाता रहा रहा है , उसी काम को जब वह " प्रेम " से कर रहे हैं तो जनता ने लव जिहाद कह दिया | कौन सा अपराध कर दिया ? अलबत्ता यह बात तो है कि भारत में मुसलामानों को उनके इतने संरक्षकों के होते हुए कुछ " कहा " क्यों जाय ? यह बात मैं मानता हूँ , गलती स्वीकार करता हूँ | देखिये रांची में एक प्रेमी को कितना कष्ट उठाना पड़ रहा है ! इसीलिए मैंने तो खुलकर मार्क्सवाद जैसे महान अंतरराष्ट्रीय विचार को खारिज करते हुए घोषणा कर दी कि धर्म अफीम तो है , सिख बीडी सिगरेट नहीं पीते वह भी , जैन शुद्ध अहिंसक हैं वह भी अफीमची कहे जा सकते हैं | लेकिन हे दुनिया के लोगो इस्लाम को इस परिभाषा से पृथक रखो | अपवाद है इस्लाम इस मार्क्स कथन का | मार्क्सवाद तो दुनिया से विदा हो गया , तो एक इस्लाम को तो बचा रहने दो | यही उद्धारक है , और होगा, संसार का | इसे कुछ भ न कहो |

* भारतीय राजनीति के समक्ष महती समस्या यह है कि हर पार्टी की सरकार बनते ही वह व्यक्तिगत सरकार हो जाती है | कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाओं का वर्कशॉप , उनके सपनों का रंगमहल | चाहे वह इमरजेंसी हो, समाजवाद - सेक्युलरवाद, बैंक राष्ट्रीयकरण, ज़मींदारी उन्मूलन, प्रिवी पर्स की समाप्ति हो या जन धन योजना , टॉयलेट या बुलेट ट्रेन ! सब या ज्यादातर निजी उपलब्धि या लोकप्रियता बटोरने की खातिर, नैतिक - सैद्धांतिक कम ! क्या कहीं कोई सलाह मशविरा होता है , जो इन्हें जनता पर लाद दिया जाता है और जिसका सुफल कम, कुफल ज्यादा जनता को भुगतना होता है ! इससे अच्छा कम्युनिस्टों के पास कम से कम पोलित ( Polite न सही ) Bureau तो होता है ! इधर इनके पास होता है " गेरुआ संतों " की " मिली जुली " सलाहकार समिति | जब कि देश को चाहिए Sane ( सम्बुद्ध ) सहमति !

* अच्छा , एक बात बताइए | मौलिक प्रश्न है यह | अलबत्ता इसे मैं " वाहियात ग्रुप - Absolute Nonsense " में पोस्ट करूँगा | क्योंकि मेरी बातें वाहियात ही होती हैं |
हाँ तो आप जिस लड़की से प्यार करते हैं , चलिए वह किसी भी धर्म जाति की हो | आप ज़रूर चाहेंगे उसकी ख़ुशी | उसे हर तरह से सुखी ही रखना चाहेंगे | इसमें तो कोई शक नहीं है , भले आपको जान ही देनी पड़े , क्योंकि वह आपको आपकी जान से भी ज्यादा प्यारी है | अब वह तो जानती है कि वह आपसे शादी करेगी तो उसके माँ बाप देर सवेर अपने घर में प्रवेश दे ही देंगे , इसलिए वह आपके साथ भागने को तैयार हो जाती है | लेकिन प्रेमी महोदय, मजनू की औलाद, जब तुम्हे पता है कि तुमसे शादी के लिए तुम्हारी चहेती को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर क्या बल्कि उसे मुसलमान बनाया ही जायगा , चाहे उसके लिए उसकी रजामंदी हो, न हो | तो तुम बच्चू उसका सुख चैन छीनने , जीवन  तबाह करने के लिए उसे क्यों अपने घर ले आये ? क्या यही है तुम्हारा प्यार या प्यार का नाटक ? या सिर्फ उसके तन - मन से खेलने की तुम्हारी चाहत ? प्रेम करते थे तो त्याग करते अपनी वासना और तृष्णा का ? करते रहते प्रेम | प्रेम के लिए शादी ही क्या एकमात्र रास्ता है ? तुम्हारा क्या गया ? तुमने तो अपना धर्म छोड़ा नहीं ? प्यार का जज्बा था तो छोड़ते इस्लाम और अपनी प्रियतमा का धर्म अपनाते न अपनाते , उसकी बाहों में रहते !

* यह पोस्ट धर्मयोद्धाओं, युद्धप्रेमियों के लिए है | नास्तिक अधर्मी इसे न पढ़ें |--
युद्ध एक अनैतिक कर्म है | ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध मनुष्य की धृष्टता |    समझा जाना चाहिए , जो हो रहा है , नफा या नुक्सान , वह ईश्वर की इच्छा, सहमति , बल्कि उसी के करने से हो रहा है | फिर किस बात के लिए युद्ध ? किस उद्देश्य के लिए लड़ाई ?

* वह ईश्वर ही क्या जिसे अपने को मनवाने की परवाह करनी पड़े ? जिसके न मानने का भी विकल्प खुला हो वह सर्वशक्तिमान कैसे ?

* मानते हैं जी , बिल्कुल मानते हैं हम ईश्वर को | अब आपको हमारा मानना समझ में न आये तो हम क्या करें , जैसे हमें आपका ईश्वर को मानना पल्ले नहीं पड़ता | अब यह कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि जिसे माना जाय वह सच ही हो , या जब वह सच हो तभी माना जाय ? हम तो प्राइमरी / मिडिल स्कूल से ही व्याज / चक्रवृद्धि ब्याज के सवाल लगाते समय मानकर चलते रहे हैं कि " माना वह धन 100 है " | और फिर उल्टी दिशा से हल करते गए , उत्तर निकालते गये | और यह हमेशा हुआ है कि उत्तर 100 कभी नही निकला | 100 के बहाने हम गणित सुलझाते रहे और उत्तर 100 के अलावा कुछ और ही निकला , जो कि सही उत्तर थे | अब फर्क महसूस कीजिये | हमारे और आपके मानने में यही अंतर है | आप 100 मान कर चले और उसी को अंतिम उत्तर बता दिया जो कि गलत था , परीक्षक ने आपको शून्य अंक देना ही है | इधर हम 100 को मान कर चले , सही जवाब पर पहुँचे , उसे पकड़ा और माने गये 100 की संख्या को पीछे छोड़ दिया | हमारा उत्तर सही निकला | हम 100 / 100 नम्बर पाते हैं | तो चलिए हम आप फिर से मान कर चलते हैं कि " वह धन 100 है " ! :-)

* वैसे बात सही है | मैं सेक्युलर हूँ नहीं | मैं कभी कभी मुसलमानों की भी आलोचना कर देता हूँ |

* धर्म यदि राजनीति है, तो राजनीति भी धर्म हो सकता है | तो राजनीति हमारा धर्म हुआ !

* अब, बदले हुए समय में, धर्म की परिभाषा भी वही मान ली जानी चाहिए जो religion की है , मज़हब की है | सब एक दूसरे के पर्यायवाची | का करि तर्क बढ़ावे शाखा ?

* राम का एक अर्थ " अपना आप " भी है | अपने ' राम ' तो यही समझते हैं | अतः, धार्मिक जन अपने धर्म के स्थान पर 'राम ' भी लिख सकते हैं , हिन्दू मुसलमान के स्थान पर | सेक्युलरवाद की एक प्रमुख परिभाषा के अनुसार धर्म आपका निजी मामला है |

इतना सीधा नहीं हूँ मैं , कि कुत्ते मुँह चाटें | 
हाँ , कुतियों की बात दीगर है |

कोई भी सुख 
सुखान्त नहीं होता 
सर्वदा ,
कोई दुःख भी 
सदैव 
दुखान्त नहीं होगा !

सोमवार, 1 सितंबर 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = 24 जुलाई से - - 31 अगस्त 2014 = सारी बातें

[ नागरिक पत्रिका ] =  24 जुलाई  से - - 31 जुलाई 2014 = कुछ विचार
* ज़रूरत :- स्वास्थ्य के लिए निश्चय ही दवाएं , टॉनिक वगैरह आदमी की ज़रूरतें हैं | उसी प्रकार , असंभव नहीं कि पूजा - पाठ , पाखंड , उत्सव भी इंसान की ज़रूरत हो ! बस समझने की बात यह है कि दवा लेने वाला यह जाने तो कि वह बीमार है ! टॉनिक पीने वाला यह माने तो कि वह कमजोर है !

* अद्भुत विडम्बना है कि अत्यंत संवेदनशील , मनुष्य के प्रति करुणावान , मानवता के प्रेमी आध्यात्मिक अभिरुचि वाले लोग ही अंततः विश्व , प्रकृति , और ईश्वर कि सेवा में नास्तिक हो जाते हैं !


* ( कविता नुमा )

बिना विनम्र बने
कैसे सफल होगे ?
बिना घुटने कुछ मोड़े
दौड़ना तो दूर ,
चलोगे ही कैसे
तने हुए पाँव लिए ?

कैसे मंजिल प्राप्त करोगे ?
शिखर पर चढ़ोगे कैसे ?

कैसे बिना शीश झुकाए
देखोगे मुझको ?
देखो मैं कितना
छोटा तो हूँ तुमसे !
अहंकार में |
---------------
* विश्वास रखो
अगर विश्वास है
हें हें न करो !

केवल हाइकु = 24 जुलाई से - - 28 अक्तूबर 2014

* मन तो हुआ
इतना वैज्ञानिक
तन छूटा रे !

मना न करो
रंगदारी देने से
मारे जाओगे !

क्या कर लोगे
क्या कर सकते हो
तुम अकेले ?

खुश रहो तो
मैं भी खुश रहूँगा
तुम्हारे साथ |

प्यार के साथ
थोड़ा मनोरंजन
सेक्स ही हाथ |

औरत मर्द
साथ साथ जियेंगे
साथ रहेंगे |

सफाई नहीं
सफाई का ढोंग तो
मेरे खून में |

बाप गरीब
महतारी गरीब
बेटा तो धनी !

भूल जाते जो
दुःख भरे वे दिन
दुःख पाते हैं !

मुझसे लिया
मेरे बेटे बेटी ने
केवल धन |

हाँ यकीनन
नहीं चाहता हूँ मैं
दुःख ही दुःख !

जान लीजिये
मूर्तियाँ भी व्यक्ति हैं
मान लीजिये ,
पागल कर देतीं
अपने भी प्रेम में !

अब क्या कहूँ
मुझे हो क्या गया है
मुझे क्या पता !

यह आदमी
है ही इस लायक
कि मारा जाए !

सबका हाल
बस एक हवाल
मुसद्दी लाल |

सारे संकट ,
परेशानी की जड़
है यह बुद्धि !

प्रेम करता
बावजूद इसके
वह अंधी है !

हो सकता है
हो क्यों नहीं सकता
बिल्कुल होगा !

थोड़ी ही सही
इज्ज़त हो तो सही
उन सबकी !

सदा सर्वदा
कुछ बाकी रहेगा
अपरिचय !

मैंने बहुत
कम जगह ली है
धरती माँ की !

न कोई चाह
न कोई अभिलाषा
जीवन सुखी |

अपना काम
करते रहना है
कुछ हो न हो !

धर्म के लिए
ज़िंदगी न लो, न दो
जान जहान |

मेरा इशारा
ऊपर की ओर है ,
कौन है वहाँ  ?

मुक्त होकर
फिर मैं तुम्हारे ही
गले लगूंगा !

बोलती बंद /
लोगों का व्यवहार /
परखता मैं |

कुछ सच है /
पूरे प्रकरण में
कुछ झूठ है |

जब वह शै /
मेरे भाग्य में नहीं /
पीछे क्यों भागें ?

सटीक बातें /
सही समय पर /
जुबां न आतीं |

चाहते भी हैं /
नहीं भी चाहते /
बीच झूलते |

चल रहा है /
थोड़ा ऊँचा या नीचा /
सबका काम |

सच पूछो तो /
जो हो रहा है, सब /
अमानवीय |

पैसा चाहिए ! 
तो कितना चाहिए ? 
बताओ सही ।

एक गौरैया /
बैठी जो डाल पर /
झुकी है शाख़ |

कहाँ पहुँचे ?
पता नहीं कहाँ से ?
चल रहे हैं |

चित्त भूमि की /
खेती करता हूँ मैं /
यही संस्कृति |

मेरे जुड़ाव /
नहीं छोड़ते मुझे /
गाँव देश से |

कुछ सत्य है /
हर किसी के पास /
कुछ झूठ हैं |

आप बुलाएँ /
न आऊँ तो कहिये /
बुलाइए तो |

विद्या ददाति /
विनय - समन्वयं /
सर्व समानं |

बन गये हैं /
पत्थरों के ईश्वर /
अक्ल पत्थर |

विश्वास रखो 
अगर विश्वास है 
हें हें न करो !

लौट के बुद्धू 
कहाँ कहाँ होकर 
घर को आये |
*  *   *     *

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = 29 जून 2014 से 23 july



 * भाग्य एक सेक्युलर ( इहलौकिक, इसी दुनिया की ) स्थिति है :- 
ऐसा नहीं है कि यह किसी दूसरी दुनिया से लिख पढ़ कर आया और आदमी कि ज़िंदगी पर परमानेंट चस्पा हो गया , जैसा कि माना जाता है | माना क्या जाता है , स्थिति को बताने के लिए कह दिया जाता है | गुड लक - बैड लक / लकी - अनलकी आदि भाषा के शब्द हैं | 
भाग्य इससे बनता है कि आप किस परिवार, जाति , खानदान में पैदा हुए | यदि वह समृद्ध, संभ्रांत , सम्मानित है तो आप भाग्यवान हैं | अब चूँकि यह पैदा होने वाले व्यक्ति कि शक्ति में नहीं होता कि वह कहाँ पैदा हो इसलिए इसे ईश्वर प्रदत्त , पूर्वजन्मों का फल इत्यादि कहा जाता है जो कि गलत है | समृद्धि , सम्मान आदि इसी दुनिया कि स्थितियां हैं , जो परिवर्तन शील भी है | कोई ज़रूरी नहीं कि धनवान गरीब और गरीब धनवान न हो जाय | इसी प्रकार हमारा भाग्य इससे भी बनता है कि हम किस धर्म और देश में जन्मे | दकियानूसी समाज हमें दुःख देगा | यह हमारी भाग्यहीनता होगी | अब आगे आप इसे बदलें यह आपके कर्म से होगा |

धर्म संगठित हों , उनमें कितनी बुराई है यह अलग बात है । लेकिन धार्मिक लोगों की संगठित शक्ति और उनकी कार्यवाही का परिणाम तो हम निश्चित देख रहे हैं ।

कहा जाता है मुसलमान गरीब हैं | उनकी शिक्षा कि व्यवस्था नहीं है , नौकरियाँ नहीं है | लेकिन यहाँ तो मामला उल्टा दिख रहा है | सुना है अमरीका में ऊंची पढ़ाई करने वाले इन्जिनीर वगैरह अपनी अच्छी पढ़ाई व नौकरी छोड़कर कहीं जिहाद में शामिल होने जा रहे हैं | खबर पक्की है, तसलीमा कि इस पर आर्टिकल आ चुकी है | फिर इन्हें पढ़ाकर क्या करेंगे जब इनकी घरेलु शिक्षा उस पर पानी फेर दे रही है | 
कोई सुझाव तो दे रहा था कि हिंदुस्तान से भी जो जाना चाहे उन्हें जाने दिया जाना चाहिए | है तो यहाँ भी सुगबुगाहट , बेचैनी !

सच पूछें तो कृतघ्न , धोखेबाज़ , दगाबाज़ , गैरवफादार तो हम सब हैं , हिन्दू हों या मुसलमान ! जिस घर में रहते हैं उसे बनाने वाले कारीगरों , मजदूरों को धन्यवाद नहीं कहते | सवेरे जहाँ जहाँ जाते हैं उस कमोड निर्माता को , सीवर सफाई कर्मी को प्रणाम नहीं करते | रोटी खाते हैं तो अन्न पैदा करने वाले किसान के गुण नहीं गाते | तमाम घरेलु गैजेट , वैज्ञानिक उपकरणों के आविष्कर्ता , निर्माता , मरम्मत कर्ता को तनिक भी याद नहीं करते | घंटों बरबाद करते हैं उसके पीछे जो कहीं नहीं , हमारा कुछ भी काम नहीं करता | कितने तो बेईमान हैं हम लोग ! ऊपर से कहते हैं ईश्वर पर ईमान लाओ ?

नाम में क्या रखा है ? अरे , नाम में ही तो रखा है | यदि आप का हिन्दू नाम है , तो आप हिन्दू हैं चाहे आप मानें या न मानें | कोई नाम से मुस्लिम है तो मुस्लिम होगा ही , भले वह माने या न माने |

Animal Farm :-
कुछ देर पहले TV पर भौगोलिक चैनेल पर " शेरों का शिकार क्षेत्र " देखने का अवसर मिला , और मुझे एक अनुभव बनाने का लाभ मिला । वह यह कि हम मनुष्य भी उसी प्रकार जानवरों की ज़मीन , जंगल और मैदान में रह रहे हैं । वस्तुतः हम भी जानवर हैं , विभिन्न प्रकारों में । मनुष्य होते हुए भी हम जानवर अनेक जातियों प्रजातियों में अनेक प्रवृत्तियों ले साथ विचर रहे हैं । दो पाए हैं तो क्या ? TV में शेर नाम का चौपाया भी तो भैंस - हिरन नामक चौपायों को मारकर अपना भोजन बना रहा था ? मनुष्य की स्थिति इससे कुछ अलग नहीं है । इससे शांति और सहजीविता की आशा करना व्यर्थ है । अब तक तो हमने यही देखा । युद्धों का इतिहास है इसके पास । भले मूल रूप में इनकी बनावट एक सी है प्राकृतिक तौर पर । लेकिन इसने अपनी मान्यताओं और मानसिक प्रवृत्तियों को अप्राकृतिक तरीके से हिन्दू , मुसलमान , ईसाई , यहूदी इत्यादि बनाया हुआ है । और ये कत्तई एक नहीं हैं । ये एक दूसरे के विपरीत और परस्पर दुश्मन हैं । भले किन्ही दो में कुछ हद तक एकता हो पर दूसरों से वे अलग होंगे । ये एक दूसरे का शारीरिक न सही आस्तित्विक भक्षण करते रहेंगे । ताकतवर ( वह शक्ति कई प्रकार की हो सकती है ) शेर कमजोर हिरन को खाता ही रहेगा । भले इससे भी हिरणों की संख्या कम न हो, लेकिन वे भयग्रस्त होने को अभिशप्त रहेंगे । यही जंगल का खेल है । यदि अन्य सारे जानवर समाप्त भी हो जाएँ तो भी यह बुद्धिमान प्राणी संसार को जंगल बनाने के लिए पर्याप्त है । ताकतवर , जो बुद्धिहीनता से बढ़ेंगे , कमजोरों , जो बुद्धिमत्ता के फलस्वरूप होंगे , को सताते , परेशान करते रहेंगे। अब यह मानकर चलना होगा कि हमें इसी जंगल में इन्ही हिंस्र - अहिंस्र मनुष्यों के बीच रहना है ।

शनिवार, 28 जून 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = 12 अप्रेल 2014 से 28 जून 2014


आज मुझे यह इलहाम हो रहा है कि यदि यह गीतों की तरफ नहीं गया , तो हिंदी साहित्य से कविता गुम ही हो जायगी | इसे कोई पढ़ने, गुनगुनाने, याद रखने वाला नहीं मिलेगा |
दूसरे यह कि कलाओं को आकार देना scientific temper की देन है | और यह जिंदगी है ससुरी, कि पूरी की पूरी ही कला है |
- - - - - - - - -- -- - -
Withering away of religion with Islam :-
आज कुछ नया ख्याल आया, इस्लाम के परिप्रेक्ष्य में । यद्यपि इस आधार पर इस्लाम की आलोचना होती है । लेकिन मुझे उसमे कुछ शुभ लक्षण दिखे । संक्षेप में मोटे तौर पर उसने यही तो कहा कि मोहम्मद आखिरी पैगम्बर ? इसका अर्थ यह भी तो हुआ की अब धर्म के नाम पर तमाशे और नौटंकी बंद । अब आगे कुछ नहीं होगा , कुछ नहीं होना चाहिये । गौर किया जाय इसने तो धर्म का सिलसिला बंद कर दिया । रोक दिया फालतू धार्मिक विचारों को । क्या यह उसी प्रकार नहीं हुआ जैसे महात्मा मार्क्स का Withering away of state की परिकल्पना थी ? इस्लाम ने इसे भले इस प्रकार नहीं कहा लेकिन किया तो ऐसा ही ! या हम उसके प्रति अपनी समझ को यह आयाम , नया मोड़ तो दे ही सकते हैं ?
मैंने कुरआन पढ़ी ज़रूर है लेकिन मैं उसका अध्येता नहीं हूँ । इस्लाम के आलिम यदि इस कोण से इस्लाम की खोज करे तो असंभव नहीं वे ऐसे निष्कर्ष पर आधिकारिक तौर पर व्याख्या को पहुंचा पायें । फिर धर्मों के समाप्त होने का रास्ता, एक क्लू मिल जायगा ।

-------------------------------------------------
एक ख्याल आ गया और मन कुछ बुझा बुझा सा है । सोचता हूँ क्या अभी ही जमीनों की कीमत एकायक बढ़ गयी । क्या ४० - ५० पहले ज़मीनें इतनी कीमती न थीं ? तब तो गरीबी ज्यादा ही थी आज की तुलना में ! फिर उनमें ज़मीनों को लेकर इतनी लालच क्यों नहीं थी ? ५० से ७० की दशक तक गाँव में ही था । मिडिल स्कूल के पास इतनी ज़मीन थी कि आज के हिसाब से डिग्री कालेज बन जाता । तालाब के किनारे भीठे तमाम खाली रहते जहाँ गाय भैंसें बकरियाँ खुलकर चरतीं । बागों के विस्तृत क्षेत्र थे । गरीब घरों के भी सेहन बड़े होते,पशुओं के लिए चन्नी घारी होती ही थी , सब्जी की क्यारियां थीं ,खुले खलिहान थे , पानी के घोले थे , थोड़ी थोड़ी दूरी पर ताल तलैया थीं । कम से कम इतनी कंजूसी तो नहीं दिखती थी । अब क्या हुआ कि लोग श्मशान भी जोत लेते है ,खलिहान तो गायब हैं , तालाबो के तट भी सिकुड़ गये । कोई ज़मीन नहीं जो ज़रा सी भी फ़ालतू रहने पाए । हुआ क्या है ?
_____________________________________________________

पकिस्तान जिंदाबाद के नारों से क्या यह नतीजा निकाला जाय कि दोनों देशों में भाई चारा बढ़ रहा है ? हमारे नागरिकों के लिए हिन्दुस्तान - पाकिस्तान में कोई भेद नहीं है | हिन्दुस्तान जिंदाबाद की जगह यदि पाकिस्तान जिन्दाबाद भी कह दिया जाय तो चलेगा | लेकिन तर्क यह है कि इसी पैमाने पर यदि पाकिस्तान जिंदाबाद के बजाय हिन्दुस्तान जिन्दाबाद ही कह दिया जाय तो यह भी तो पाकिस्तान जिंदाबाद तक पहुँच जायगा ?
---------------------------------------------------------------------------------------------

किशोर शिक्षा या स्वास्थ्य चेतना :-
जहाँ पर वह खड़े हैं , हर्षवर्द्धन जी बिल्कुल गलत नहीं हैं । दरअसल भ्रम सेक्स शब्द में है जिसका हिंदी अनुवाद नहीं है , जैसे सेक्युलरिज्म का नहीं है । इसलिए विवाद है । सहज आदिम और पशु समाज के लिए भले यह शिक्षा गैरज़रूरी है । लेकिन मानव समाज के लिए तो यह आवश्यक है जैसे अन्य शिक्षाएँ , इतिहास भूगोल विज्ञान विषय । इससे बिदकने जैसी कोई बात नहीं है । परिवार इसकी सही शिक्षा नहीं दे सकते क्योंकि वह स्वयं अशिक्षित हैं । sex education सचमुच विज्ञान सरीखा विषय है । विज्ञान में प्रजनन तंत्र पढ़ाया जाता है कि नहीं ? काम शिक्षा भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी कुछ नया नहीं है । स्त्री के तमाम गुणों में काम कला प्रवीणता भी एक कला के रूप में स्थान प्राप्त है भारतीय वांग्मय में । लेकिन यहाँ तो उसकी बात भी नहीं है । किशोरों को अपने शरीर का गोपनीय ज्ञान तो होना ही चाहिए । इससे वह कई विकारों से बचेंगे । विशेषकर लडकियाँ सचेत हो सकती हैं कि किस प्रकार वह पुरुष के मानस को समझ उनकी गलत हरकतों को पहचान सकें और अपने को बचा सकें । और यदि स्वैक्षिक सेक्स रत हों तो आधुनिक जइवन के अनुकूल क्या सावधानियाँ बरतें ।
अलबत्ता इसे प्रौढ़ता की , दुनियादारी की , शिक्षा किशोरों के लिए कहा जाना चाहिए । या फिर स्वास्थ्य चेतना जैसे विषय - अंतर्गत । sex education कहने में ही भोडा लगता है । और यदि शिक्षकों की मानस - योग्यता को ध्यान में रखा जाय तो आशंका निर्मूल नहीं है कि शिक्षिकाएँ तो शायद कम , शिक्षक जन इस विषय को practical करके ' ठीक से 'समझाने लगेंगे ।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = 12 मार्च 2014 11 मार्च 2014

* समझौता ही करना पड़ता है राजनीति में | सब अपना चाहा मिल नहीं जाता | तो इस चुनाव में भी जनता को समझौता ही करना पड़ेगा | तो क्यों न मजबूरी में से कुछ ताकत निकाल ली जाय | इस चुनाव से ही शुरू कर दें ज्यादा से ज्यादा संख्या में स्त्रियों और दलितों को लोक सभा में भेजना | यदि अभी कोई इन्हें योग्य या अपरिपक्व ही मानें तो भी यह तो मानना पड़ेगा की चलो ये वहाँ पहुंच कर कुछ सीखेंगे ही |
--------------------------------------------------------------------------------------------------

अब इसी माहौल के मद्देनजर मेरे प्रस्ताव का मूल्यांकन किया जाय तो पता चल सकता है कि  वह कितना सटीक और उत्तम है | राजनीतिक रूप से प्रगतिशील और लगभग आधी सदी आगे की बात | शुरू अभी से करना है कि हिन्दुस्तान का शासन दलितों और केवल दलितों को दे दिया जाय | वरना यह इस्लामी शासन में तब्दील हो जायगा | हो न हो , खतरा तो है और बड़े झगड़े झंझट हैं | इसे समाप्त होना चाहिए | सवर्णों को भी शासन का अधिकार छोड़ देना चाहिए | यह त्याग उन्हें राष्ट्र हित में करना ही चाहिए जिसका उल्लेख , दावा वे निशदिन गाया करते हैं | समय आ गया है कि वह अपना राष्ट्रप्रेम धरती पर व्यवहार में उतार कर दिखाएँ | यह उनकी आध्यात्मिकता भी होगी और मानवता के लिए उनका धार्मिक अवदान भी | सत्ता का मोह नहीं छोड़ेंगे अंधे धृतराष्ट्र की भांति और इसी तरह सामंतवाद चलाते रहेंगे तो एक बार फिर राष्ट्र का पतन होगा | उनका छद्म राष्ट्रवाद धरा का धरा रह जायगा | असली सास्कृतिक राष्ट्रवाद तो दलितों के हाथ में ही सुरक्षित होगी, इसे जानना और मानना होगा | ऐसा मेरा सूक्ष्म अध्ययन और प्रतीति है |
और देखते जाईये यह बार बार हर घटना के बाद सत्य ही सिद्ध होता जा रहा है | कभी आजम खां कुछ कहेंगें, कभी पाक जिंदाबाद के नारे लगेंगे | भारत का दलित सबको दुरुस्त कर देगा | सवर्णों के त्याग से ही देश बनेगा, उसे ऐसा करना ही चाहिए | अतः वोट केवल दलित ( उम्मीदवार या पार्टी ) को दें |
____________________________________________________________________

पकिस्तान जिंदाबाद के नारों से क्या यह नतीजा निकाला जाय कि दोनों देशों में भाई चारा बढ़ रहा है ? हमारे नागरिकों के लिए हिन्दुस्तान - पाकिस्तान में कोई भेद नहीं है | हिन्दुस्तान जिंदाबाद की जगह यदि पाकिस्तान जिन्दाबाद भी कह दिया जाय तो चलेगा | लेकिन तर्क यह है कि इसी पैमाने पर यदि पाकिस्तान जिंदाबाद के बजाय हिन्दुस्तान जिन्दाबाद ही कह दिया जाय तो यह भी तो पाकिस्तान जिंदाबाद तक पहुँच जायगा !
______________________________________________________________________

दार्शनिकों को झूठ भी बोलना चाहिए, आवश्यकतानुसार | सत्य के ज्ञाता तो वह अवश्य हों , लेकिन उसे गुप्त रखते हैं | बताते थोडा झूठ में लपेटकर हैं | इतिहास गवाह है, इन्होने सदा  ऐसा किया और अपना कर्तव्य निभाया | स्वयं तो परम सत्य जाना लेकिन तत्कालीन जनता की भलाई के लिए झूठ मूठ ईश्वर का ईजाद किया, भगवान के दर्शन कराये, उनका डर फैलाया  | नैतिक व्यवस्था कायम करने के लिए धर्म बनाये, मोटे मोटे ग्रन्थ लिखे | और इनके लिए उन्होंने कितना झूठ गढ़ा कि यदि सचमुच कहीं स्वर्ग - नर्क होता तो ये रौरव नर्क में सड़ रहे होते | लेकिन नहीं , वे प्रतिष्ठित हैं , गुरु हैं , संत हैं, साधु हैं, पूज्य हैं | क्योंकि उन्होंने अपने कालक्रम में जनहित में झूठ बोला | वे समझदार दार्शनिक थे | उन्हें पता था कि शुद्ध सत्य बोलना वैज्ञानिकों का काम है | उनकी ज़िम्मेदारी आइन्स्टीन से ज्यादा है जिनके प्रयोग का दुष्परिणाम हिरोशिमा - नागासाकी को भुगतना पड़ा | वह ज्ञान दार्शनिक के हाथ लगा होता ( हो सकता है लगा ही हो लेकिन उदघाटित न किया हो ) तो वह दुर्घटना वह बचा ले जाता अपने ' सफ़ेद ', पवित्र झूठ के सहारे |
अब यही देखिये जानता तो मैं भी बहुत कुछ हूँ आपके बारे में | लेकिन मैं आपसे कहूँगा - आप बहुत ही अच्छे इंसान हैं, आपके शुद्ध विचारों और सुकर्मों से विश्व का भविष्य अवश्य उज्जवल होगा , और आप अपने सद्प्रयासों में पूर्ण सफल होंगे |    
लेकिन यह झूठ नहीं है |
-------------------------------------------------------------------------------------------------
रामदेव , रविशंकर जी की विवशता है कि वह भाजपा को ही वोट देने का प्रचार करेंगे | उनकी प्रवृत्ति और संस्कार ही ऐसे हैं कि वे सवर्ण पार्टी छोड़ मायावती को वोट देने को कह ही नहीं सकते | यह तो हम हैं जो कहते हैं बसपा को वोट दो , या फिर किसी दलित अथवा स्त्री उम्मीदवार को |
_________________________________________________________________

मंगलवार, 11 मार्च 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = एक मार्च 2014 से 11 मार्च २०१४


" नापाक "
नास्तिक पार्टी कार्यकर्ता
----------
नास्तिक कम्युनल पार्टी
" नाकपा "
------------
लेकिन मेरे ख्याल से पहला वाला ठीक है | क्योंकि नापाक का स्वतंत्र भी एक अर्थ है |
=======================================================

विरोधी दल [ V D ]
---------------------------------------
 कहना !
" ( माँ ) बाप न मिले तो पुत्र अदालत में दावेदारी ठोंकता है | जिनके हैं वे उन्हें बाहर निकाल देते हैं | "
-----------
कहाँ तो हिन्दुस्तान इस मामले में बदनाम था की माता पिता एक पुत्र के लिए तरसते थे | ( पुत्री के लिए न सही ) | प्राप्त न होने पर मंदिर - देवालय जाकर मनौतियाँ मांगता था | 
अब देश का नाम इस काम में ऊंचा हुआ है कि पुत्र पिता के लिए अदालत जाता है |
------------------------------
बस ऐसे ही बोलते बतियाते जिंदगी कट जाती है | इन्ही के बीच जिंदगी अपना कोई रास्ता निकाल लेती है | पुरानी राह मिल जाती है | नई बन जाती है | 
------------------------------------
यह तो कहिये कि तमाम पुरुष महिलाओं की बड़ी इज्ज़त करते हैं  | ( उतना औरतें पुरुषों का सम्मान नहीं करतीं ) | सीमा से आगे जाकर गलत ढंग से भी पुरुष स्त्रियों का पक्ष लेते हैं , वर्ना पता चल जाता इन्हें कि समानता क्या होती है | भुगत जातीं स्वतंत्रता | भुगत ही रही हैं !
-----------------------------------
पहले डाक्टर भगवान होते थे | अब भी माने तो जाते ही हैं | लेकिन अब डाक्टर के लिए ' मरीज़ ' भगवान होने चाहिए |
----------------------------------

कोई मानता ही नहीं | मैं कब से कह रहा हूँ भारत पाकिस्तान के बीच कोई मैच मत कराओ | बहुत हो चुका खेल | और वह भी मित्रता का भ्रम फैला कर ! जब कि हर बार हम देखते हैं यह द्वेष और तनाव ही पैदा करता है | नाराज़ न हों , चलिए मान लेता हूँ सब हिंदुस्तान की गलती है तो भी | क्या ज़रूरत है खेलने और भिड़ने की | ये दोनों मुल्क दुसरे देशों के बीच खेल देखें और मज़ा लें , तभी तक ठीक है | सत्यतः भी दोष भारतीयों का है | पाकिस्तान के जीतने और हारने पर जो खुश होते या मातम मानते हैं , वे भारतीय ही तो हैं ?
- - - - - -- - - - - -- -- -- - -- --- -- - - - - - - - - -
लिखता नहीं 
गोंजता रहता हूँ 
अलबत्ता मैं |

राजनीति का 
चमकता सितारा 
धूमकेतु है |

खलनायक 
इतने तो नहीं हैं 
राजनीति में !

करता तो है 
कमाल कामदेव 

क्या रामदेव !
- - - - - - - - - --  

औरतें क्यों नहीं कर सकतीं कोई भी काम ? लेकिन यह बात हर औरत पर लागू नहीं होती | हर पुरुष ही कौन सा हर काम कर लेता है ?
-- - - - -- - - --- -

 नादान हैं बच्चे | निश्चय ही उनका कृत्य निंदनीय /अक्षम्य है , फिर भी क्षमा उचित है | बुरा तो होगा कहना , जिंदाबाद के नारों से भी लोगों ने खूब लूटा - खाया है देश को , छलनी किया है माता के सीने को | हमारे सामने महत्वपूर्ण है देश , देशभक्ति के नारे और सहारा परिवार की प्रदर्शनी नहीं | नारे लगाकर वे देशद्रोही सामने प्रकट हो गये , तो उन्ही के साथी जिन्होंने ऐसे नारे नहीं लगाये क्या समझते हैं वे देशभक्त हो गये ? होंगे , हो सकते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं | जो दिखाई पडा सिर्फ वही न देखें , अनदेखे पर गौर करना ज्यादा जरूरी है |उन्हें क्षमा करने से देश बड़ा होगा , मुल्क मजबूत होगा , उन्हें फांसी दे दें तो भी कुछ हासिल न होगा |
- - - - - - - - - - - 

सत्य की संख्या बहुत अधिक है ,
झूठ की तादात भी कम नहीं है ; 
अब जिसको जो सत्य पसंद हो ,
जिसको जितना झूठ चाहिए  
वह ले सकता है 
तो ख़ुशी से ले ले | 
इस पर किसी को कोई 
आपत्ति नहीं होनी चाहिए ;
आपका अपना सच - झूठ 
उनका अपना और 
मेरा भी नितांत अपना | 
न मैं , न वह , न आप 
कोई अंतिम निर्णायक नहीं है 
सच और झूठ का
या क्या सच क्या झूठ !
#    #

विनोबा या दादा कहते थे कि " राजनीति बाँटती है " | इसमें वह जोड़ते थे - " और संस्कृति जोडती है "  ( लेकिन इस पर फिर कभी ) |लेकिन राजनीति बांटती है , इसका तो अनुभव हो रहा है | राजनीतिक हलचलों के बीच , या बिलकुल स्पष्ट कहें की " आप पार्टी " के उदय के साथ मेरे विपक्षी तेवर के नाते मेरे अच्छे भले मित्र जो आप के समर्थन में हैं , वे मुझसे कटे कटे दिखने लगे हैं | इसका श्रेय किस्क दिया जाय यदि राजनीती को नहीं ? जबकि यह भी सच है कि न हम न हमारे मित्र सीधे पार्टी बंदी की सक्रीय राजनीती में हों | तिस पर यह हाल है | अलबत्ता निजी प्रौढ़ता , शिष्टाचार और भद्रतावश कोई अप्रिय स्थिति नहीं आती , न कोई ख़ास खटास | लेकिन राजनीति बांटती तो है |
- - - - -
कभी कभी उच्चतर / उच्चतम चीज़ों को भी संरक्षण - आरक्षण की आवश्यकता होती है | जैसे शास्त्रीय संगीत , गायन - वादन - नृत्य को ; संस्कृत - पाली भाषाओँ को | कबड्डी - गुल्ली डंडा जैसे देसी खेलों को , लोक गीत , कहावतों , कलाओं को - -- -
अब इसका तो विरोध नहीं होना चाहिए | दलित , पिछड़े वर्गों की ओर से भी !
-----------------------------------------------------------------------------

साहित्य में मुझे प्रिय हैं दो विधाएँ । आत्मकथा और जीवन चरित्र । लेकिन अब इनके प्रति कुछ अरुचि पैदा करना चाहता हूँ । कारण यह है कि ये महान लोगों के होते हैं । इन्हें पढ़कर इनका अनुकरण करने का भाव मन में उठता है । वह संभव है या नहीं प्रश्न यह नहीं है । मैं कहना चाहता हूँ कि छुद्रता के इस समय में क्या ऐसा सोचना भी किसी दृष्टि से उचित है । इसलिए पसंद होते हुए भी इनसे विरत होना चाहता हूँ ।

 मेरे ख्याल से आदमी को एक साधारण जीवन जीकर चदरिया जस की तस रखकर मर जाना चाहिए | इसी में उसकी महानता है |
#    #

सोमवार, 3 मार्च 2014

[ नागरिक पत्रिका ] = एक जनवरी 2014 से - एक मार्च तक

* अरे कुहरे !
तू मत घबरा रे ,
अभी बस सूर्य
निकलने ही वाला है
और तुझे
छँट ही जाना होगा |
#  #

* जब कि कोहरा
पाँच फिट आगे
को भी दिखने न दे ,
दिख रहे तुम दूर
कोसों दूर से !
#   #

* शोक में हास्य
कठिन है निर्वाह
क्रोध में शान्ति !


* हालाँकि हम टोना टटका में विश्वास नहीं करते , बल्कि इनका विरोध ही करते हैं | लेकिन जो लोग इसे मानते हैं वे मान सकते हैं कि केजरीवाल की सफलता के पीछे एक टोटके का प्रभाव है / हो सकता है | आप भी गौर करें इनका नाम " लाल - बाल - पाल " से कितना मेल खाता है ? केजरीवाल ! अब भला इतने और ऐसे महान लोगों का सह - काफिया होने का कुछ लाभ यदि इन्हें मिले तो आश्चर्य क्या ?


मैं असंत हूँ " Non - Saints "
* ओशो की एक साधना पद्धति, ध्यान विधि है - ' मैं कौन हूँ ? ' | मैं यह तो नहीं जान पाया कि 'मैं कौन हूँ ? ' | लेकिन इस जानकारी पर अटका / पहुंचा तो हूँ कि मैं क्या / कौन नहीं हूँ | मैं संत नहीं हूँ | मैं डॉ कोवूर के ' Begone Godmen ' {दूर हटो , देवपुरुष !}का समर्थक हूँ | मैं देवपुरुष नहीं , देवतापन का विरोधी हूँ | मैं संत नहीं हूँ | मैं असंत हूँ और ऐसे ही " Non - Saints " ग्रुप में हूँ |

निःशुल्क निवास = मुफ्तावास
* आवश्यकता है एक वृद्ध Retd Engineer , साहित्यकार हेतु विश्वसनीय , सेवाभावी महिला की :)

* चलिए , विश्वास की ही बात हम भी करते हैं | तो विश्वास कीजिये ईश्वर जैसा कुछ नहीं हैं | अब तर्क तो मत कीजिये | अपनी बात पर कायम रहिये |

* तर्कातीत तो होना ही पड़ेगा | इसीलिए मैं तर्क की बात करता हूँ , उसका पक्ष लेता हूँ | तर्क करेंगे तभी तो तर्कातीत हो पायेंगे ! भाव विह्वलता इसका विकल्प नहीं है |

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

[ नागरिक पत्रिका ] 1 दिसम्बर से 31 दिसम्बर , 2013

 [ नागरिक पत्रिका ] 1 दिसम्बर से 31 दिसम्बर , 2013

* हमारे सिवा
सब बेईमान हैं
समझे आप ?

* आँखें खोलोगे
तो न सवेरा होगा ,
रौशनी होगी !

* उन्होंने कहा -
ये साले कम्युनिस्ट !
मैंने कहा - हाँ |

* पुण्य तन में
पाप मेरे मन में
पलता रहा |

* कुछ कीजिये
समस्या का हल हो
सुखी जन हों |

* जिस काम को
'गलत काम ' कहें
उसे क्यों करें ?

* वृद्धावस्था में
अखबार पढ़ना
चश्मा पोंछना |

* तुम न आओ
हम क्या कर लेंगे
थोडा रो लेंगे |

* आदमी तो है
मुसलमा हों न हों
हिन्दू हों न हों |

* सेमिनारों में
कहने की बातें हैं
सारी की सारी |

* आम बात है
बलात्कार , क़ानून
की भाषा में तो |

[ कविता ]
 सड़क तुम्हारे लिए
बुहारी जा रही है
गर्द मेरे ऊपर पद रही है ,
धुलाई तुम्हारे लिए हो रही है
छींटें मेरे ऊपर पद रही हैं ,
तुम साफ़ सुथरे
निकल जाओगे
मैं गन्दा हो रहा हूँ !
#    #

( कविता )
* बस इतनी सी बात बेटा ?
यही तो , कि तुम मेरा पैर नहीं छूना चाहते !
प्रणाम करने के प्रतीक ?
यह तुम्हारी पार्टी के रीति नीति और निर्देश के खिलाफ है ?
यह तो बहुत छोटी बात है , बेटा !
बिल्कुल चलो , समय के साथ चलो , प्रगति करो , प्रगतिशील बनो |
यह तो मैं भी चाहता हूँ |
बाप - दादा - चाचा - बाबा का पैर
छूना मना है तो मत छुओ
परंपरा और संस्कार को ,अपने मार्ग
की बाधा , व्यवधान न बनाओ
आगे बढ़ी , सतत तरक्की करो , सुखी रही
यह आशीर्वाद तो हमारा हमेशा रहेगा
तुम्हारे सर पर , मेरे सामने
तुम सर झुकाओ , न झुकाओ |
निश्चिन्त रहो !
#   #


* * जिस आँचल को अभी तुमने बना रखा है परचम सा ,
उसे तुम फिर से जो आँचल बना लेती तो अच्छा था |

* [उवाच ]
हर विषय हर व्यक्ति के लिए नहीं होता |

खाद्य सुरक्षा से पहले ज़रूरी थे यौन सुरक्षा अधिनियम लाना |

* मैं आशंकित हूँ कि क्या सारी बुद्धिमत्ता केवल मेरे पास है जो मैं कहता हूँ कश्मीर में अनुo 370 हटाने की बात करने वाले मूर्ख हैं ? अरे यही तो वह अनुबंध है जिसके ज़रिये कश्मीर भारत में शामिल हुआ था | या कहें शामिल है | इसके हटने पर कैसे कहोगे कि कशमीर भारत का है | एक तरफ यही लोग अधिकाधिक विकेंद्रीकरण की भी मांग करते हैं , दूसरी तरफ राज्य को प्राप्त कुछ विशेष स्वायत्तता समाप्त भी करना चाहते हैं | या तो फिर राज्यों / जिलों / गाँवों को संविधान संशोधन द्वारा मिली विकेंद्रीकृत व्यवस्था को भी ख़त्म करने और पूर्ण केन्द्रित भारत राज्य की मांग करें ! वर्ना तो 370 हटाने से कश्मीर को यह दावा करने का बहाना मिल सकता है कि अब तो हमें हिन्दुस्तान से अलग करो | ज्ञातव्य है कि कश्मीर को हैदराबाद की तरह पटेल ने सैनिक कार्यवाही द्वारा नहीं बल्कि इसी समझौते द्वारा देश में शामिल किया था | क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूँ | हमें सर्वसत्तावादी , सर्वाधिकारी नहीं बनना चाहिए | तभी यह विशाल , वैविध्यपूर्ण देश एक रहेगा | मैं तो कहता हूँ भारत के हिन्दू राज्य में तब्दील होने पर भी कश्मीर का यह विशेषाधिकार सुरक्षित रहना चाहिए | हमें विश्वसनीय बनना / काबिले एतबार होना चाहिए | यह श्रेष्ठ राजनय है |

* इधर मेरे कुछ पोस्ट्स को लेकर मित्रों में भ्रम फैला है | त्रुटि उनकी नहीं , मैं लिखता ही ऐसा हूँ | मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि तरुण तेजपाल और ए के गांगुली जैसे लोग जेल जाने की नौबत में में हुए है तो कृपया हम लोग अपने को सुरक्षित न समझें | हम कोई तीस मार खान नहीं है | हम भी उन्ही जैसे हांड मांस के बने हैं और उनसे बेहतर हों कोई ज़रूरी नहीं | हम भी ययाति के ही वंशज है | मेरा आशय यह नहीं कि कोई कन्या हम पर गलत आरोप लगा देगी [ लगा देगी तो भी स्वीकार करना पड़ेगा ] , बल्कि यह कि हमसे भी ऐसी गलती हो सकती है , हम भी पाप कर सकते हैं जो इस समय हाथ में पत्थर उठाये घूम रहे हैं | यह एक साधारण मनुष्य का आकलन है , जो मैं हूँ और तेज - गांगुली से तो बेहतर चरित्रवान नहीं हूँ | इसमें मैं अपने देवता मित्रों को शामिल न भी करूँ तो क्या ?

* हम यह सिद्ध करने के चक्कर में क्यों पड़ें कि ईश्वर नहीं है ? होगा तो होगा , हो तो हो ! बस हम उसे मानते नहीं |
जैसे होने को तो बकरे हैं , मुर्गे हैं , तमाम तरह की मछलियाँ हैं और सब में जान है | लेकिन लोग कहाँ मानते हैं ? मारकर खा जाते हैं |

कहने की बात यह भी है , इंसान हैं हम लोग ;
हम लोग बुद्धिमान हैं , कहने की बात है |
* हिन्दू होना 'कुछ नहीं ' होना है | और कुछ नहीं होना सर्वोत्तम होना है |

* कोई भी जो सामान देता है , उसकी कीमत वसूल करता है |

* लडकियाँ बहुत अच्छी दोस्त होती हैं |  जब तक बलात्कार का आरोप न लगा दें !

* मार गिराएँ खाप पंचायतें सौ पचास लड़कियों को | होने दीजिये दस बीस हजार पुरुषों को आजीवन कारावास या मृत्युदंड | औरतों का सौन्दर्य , उनका श्रृंगार , उनका सजना संवरना कहीं जाने वाला नहीं है | और उनके प्रति पुरुषों का आकर्षण समाप्त नहीं होगा , न उनका उनके लिए जान देने का सिलसिला ही ख़त्म होने वाला | सेक्स के लिए न सही , प्रेम के लिए ही सही |यह तो सदियों का किस्सा है , था और रहेगा | प्यार भला कब किसी कानून से बंधने वाला ?

* पीडिता पत्रकारिणी महोदय का उपनाम ज़ाहिर हो जाने से उनके सम्मान पर धब्बा लग गया | ज़ाहिर है उनकी ख्याति बड़ी थी तरुण तेजपाल से | इसलिए महिला आयोग ने कथित दोषियों से जवाब तलब कर लिया | लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज का भी सम्मान इतना कम था कि प्राथमिक स्तर पर ही उसे सार्वजनिक कर दिया गया ? क्योंकि वह पुरुष हैं ? कोई " गाँगुली " बताया गया है उनका नाम | मुझे इस पर , पुरुष होने के नाते ही सही , गंभीर एतराज़ है |

* अब तो खैर झड़ी लग गयी है ऐसे आरोपों की | बैंक की मैंनेजर स्तर की महिलायें भी इसमें शामिल हो रही हैं | अच्छा टूल हाथ लग गया है औरतों के हाथ , महिला सशक्तीकरण के लिए, जिसकी कोई काट नहीं है |

* आजकल इतनी सीता सती सावित्रियाँ पैदा हो गई हैं कि आश्चर्यजनक लगता है द्रोपदी युग के दुर्योधनों का इस सतयुग में उदय होना !

शनिवार, 30 नवंबर 2013

[ नागरिक पत्रिका ] 1 से 30 नवम्बर , 2013


* मूर्ख ही नहीं
बेवकूफ भी तो हैं
क्या समझाएँ !

* सारा बाज़ार
बनियों का जाल है
बच लीजिए |

* अफवाह हैं
चुनाव सर्वेक्षण
विश्वास न दें |

* काम की चीज़
लिखिए तो हाइकु
नहीं तो नहीं |

* दिखाते भी हैं
फिर शिकायत भी
देखते क्यों हो ?

* प्रेम करता ?
झूठ बोलता वह
बचना बाबा !

* धैर्य तो रखो
कोई लाभ नहीं है
घबराने से |

* तुम नहीं हो
मन नहीं लगता
किसी काम में |

* चलते रहो
कोई साथ न देगा
अकेले चलो |

* ताड़ सोचता
तिल भर लिखता
सूक्ष्म देखता |

* मन में पाप
जाति सम्प्रदाय का
न लाना चाहूँ |

* किसी ने कहा
हमने जैसे सुना
फौरन लिखा |

* मेरा महत्त्व
मुझमें निहित है
कोई क्या जाने !

* जो है ही नहीं 
दुनिया पागल है 
उसके पीछे |

* भागना ही है 
तो भागो , जल्दी भागो 

ज्ञान के पीछे |

धर्म तब भी अप्रासंगिक हैं हमारे लिए यदि वे अच्छी बातें सिखाते हैं | इन बुरे वक्तों में अच्छी , चिकनी चुपड़ी बातों का क्या महत्त्व ?

* चेहरा अलग
मनुष्य का चेहरा ही उन्हें अन्य मनुष्यों से अलग करता है |चेहरे न होते तो सब मनुष्य , स्त्री और पुरुष एक से दिखते , एक ही होते !

* " पशुता " को एक अवसर दो |

* अच्छी तरह जान लीजिये , जान नहीं देना है किसी के लिए | न नास्तिकता के लिये , न आस्तिकता के लिए | नास्तिक नहीं हो पा रहे हैं तो कोई बात नहीं | या जितना हो पा रहे हैं उतना बहुत है | शेष आस्तिक बने रहिये कोई दिक्कत नहीं है |
इसी प्रकार यदि यदि पूर्ण आस्तिक नहीं बन पा रहे है तो भी कोई समस्या नहीं है | जितना आस्तिक हैं उतना बहुत है | उतने से संतोष कीजिये क्योंकि आप जैसा और जितना आस्तिक भी बहुत कम हैं | और आस्तिकता के जितने पाखण्ड आप पचा नहीं पा रहे हैं , उसे छोड़ दीजिये | वाही पर्याप्त नास्तिकता है | जल्दबाजी न कीजिये | हीन भावना न पालिए | जान न दीजिये | जीवन महत्वपूर्ण है |

* हिन्दू तो ईसाई या मुसलमान हो सकता है ( तभी तो होता है ) | लेकिन क्या मुसलमान और ईसाई भी हिन्दू होते हैं ? कारण कोई हिन्दू में अनाकर्षण का होना तो नहीं हो सकता ( यह बहुत ही रोचक है ) , बल्कि उन धर्मों में बन्धनों की कठोरता है , जिससे वे नहीं निकल पाते , जितनी आसानी से हिन्दू निकल कर धर्म परिवर्तन कर लेता है | लेकिन यह भी है कि वहां भी बहुत सारे लोग निकलने की छटपटाहट में हैं , वज्ञानिक सोच के और सेक्युलर हैं | उनकी मुक्ति का मार्ग है हिन्दू होना | यद्यपि वे जैसे हैं वैसे भी रह सकते हैं , लेकिन कठिनाई यह है की उनकी कुल मिला कर संख्या इतनी कम होती  है कि उनके कोई असर समाज और देश की राजनीति पर दृष्टव्य नहीं हो पाता , जैसी ताक़त वे हिन्दू के समुदाय बनकर बटोर सकते हैं | अब प्रश्न उठता है कि हिन्दू होकर वे किस जाति में माने जायेंगे ? उत्तर आसान है - " है न " शुद्र " वर्ण " ? शुद्र होने में ब्राह्मण - दलितों को एतराज़ हो सकता है , लेकिन बुद्धिवादी का टी यह अहोभाग्य जो वह शुद्र होकर शूद्रों का साथी बन सके | फिर स्वाभाविक शुद्र तो हिन्दू का बगावती गुट है ? फिर तो समझिये शुद्र होना एक तरह से हिन्दू से भी मुक्त होना हो गया | इस तरह पूरी धार्मिक आज़ादी मिल गे |

* मेरा घर है मेरा राष्ट्र -
राष्ट्रवाद एक अत्यंत छुई मुई विषय हो गया है | कुछ संगठनों द्वारा इसके कट्टर इस्तेमाल के कारण यह अनावश्यक बदनाम हुआ और इसके चलते ईमानदार देशप्रेमी भी संदेह की दृष्टि में आ जाते हैं | लेकिन चूँकि मैं अपने कारणों से राष्ट्र से लगाव रखता हूँ इसलिए इसलिए इस पर अलोकप्रियता का खतरा उठा कर मुझे बोलना तो होगा | किसी पर असर हो , न हो | अव्वल बात तो यह तथ्य कि राष्ट्रवाद के तमाम विरोधी, कथित अंतर राष्ट्रवादी अभी तक तो विश्ववाद का कोई कोना हासिल करके नहीं दिखा पाए | बिना वीजा पासपोर्ट अमरीका ( ज्यादातर ये वहीँ जाते हैं ) नहीं जा पाए , न ब्रिटेन में ( यहाँ भी जाते हैं ) हिन्दुस्तानी गाँधी मार्का सौ - पांच सौ का नोट ही भुना पाए | दरअसल इस्लामी और साम्यवादी अंतर राष्ट्रवाद इस कुत्सित इरादे के तहत मात्र है की एक दिन ये पूरे संसार के शासक हो जायेंगे | छलावे में जी रहे हैं ये और इस अभियान में विश्व शांति का विनाश ही कर रहे हैं | दुसरे इसके चलते अपने हकीकतन मुल्क या देश को हेय दृष्टि से देखते हैं | उसकी सेवा , और उसके ज़रिये मानवता की सेवा जो ये कर सकते थे वह तो नहीं कर पाते , उलटे राष्ट्र विरोधी कुकृत्यों में लिप्त हो जाते हैं |
बहरहाल , उनकी वे जानें , मैं अपने राष्ट्र का मतलब खुद अपने तरीके से लगता हूँ | मेरा गाँव में कुछ ज़मीन और एक रिहाइश है | लखनऊ में 450 वर्गफीट में एक LIG आवास आवंटित है | अब मैं क्या चाहता हूँ ? यह कि मेरे घर सलामत रहें , जिसमे रहने वाला मेरा परिवार , मेरे बच्चे सुरक्षित रहें | न मैं किसी के निजी घर में घुसूं न कोई मेरे कमरे पर हमला कर मेरे बच्चों को मारे | तो मैं क्या गलत चाहता हूँ ? इसी को अब बढ़ा कर देखते हैं | मेरा घर तभी सुरक्षित रहेगा जब मेरा अलीगंज मोहल्ला बचेगा | अलीगंज लखनऊ शहर के बचना से बचेगा , लखनऊ , यू पी के बचने से और यू पी की सलामती भारत नामक एक ऊबड़ खाबड़ देश की सुरक्षा पर निर्भर है | इसलिए मैं इसके लिए हाथ पाऊँ मारता रहता हूँ | बहुत पढ़ा लिखा विद्वान् नहीं हूँ कि इसकी आलोचना में इतनी दुर्गति कर दूँ कि मेरा घर , मेरा पनाह मुझसे छिन जाए |
दूसरा तर्क मेरा बिलकुल देहाती किसनई का है | तीन एकड़ का एक चक है मेरा | उसे मेरी पूरी धरती मान लीजिये | फिर भी उसे मेंड बाँध कर कई टुकड़ों में बांटते है | इससे एक तो सिंचाई में आसानी होती है , दूसरे कई किस्म की फसलें अलग अलग खेतों में उगाई - पैदा की जा सकती हैं | इसे देश की सान्स्क्रित्क विविधता से जोड़ सकते हैं | एक और हँसी की बात ! खेत के एक एक टुकड़े को भी पूरा एक एक खेत ही कहते हैं | मानो एक एक देश अपने में एक पूर्ण विश्व हो | लेकिन कोई इसे ऐसा समझे तो ! सब अपने को अधूरा ही समझते हैं और अपने देश की सीमा फैलाना ही चाहते हैं | क्या इसे अपूर्ण - अतृप्त राष्ट्रवाद कहें ? हा हा हा |
तो इस प्रकार मेरा तो घर - ज़र - ज़मीन ही मेरा राष्ट्र है , और मैं इसी तरह का राष्ट्रवादी हूँ |

* तीसरी बार टला संस्कृत संस्थान का पुरस्कार वितरण समारोह " - समाचार ( N BT - ३/११/२०१३ )
# क्यों नहीं टलेगा ? उर्दू , अरबी , फ़ारसी का समारोह करो | दौड़े आएँगे मुख्यमंत्री , मुख्यमंत्री  क्या मुख्यमंत्री के पिताजी भी | चाचा जी भी , ताऊ जी भी |

* मैं अंग्रेजी पढ़ने की वकालत इसलिए करता हूँ कि जिससे आदमी कम से कम पोस्टमैन की नौकरी तो पाने लायक हो जाय !

* मैं ईश्वर के खिलाफ नहीं , उसके रूढ़ होने के खिलाफ हूँ |

* मान लीजिये मैं "आसा वादी "हूँ | तो क्या मुझे आस्तिक मान लिया जायगा ? 

* कोऊ नृप होय हमें का हानी ( या लाभा भी कह सकते हैं ) | यह स्थिति कहने वाले के मुंह से कैसे निकलती होगी , उसे कैसा अनुभव होता होगा ,वह मैं अभी से महसूस हो रहा है | जो और जैसा माहौल बनाया जा रहा है , उसके चलते यदि मोदी कहीं सचमुच पी एम बन गए तो मेरी वही दशा होगी  , और मैं भी यही दोहा दुहराऊँगा |

* बड़े लोगों से तुलना छोटे लोगों के लिए हमेशा नुकसानदेह होती है | तमाम हाथ पावं मारे मोदी जी ने पटेल के समकक्ष अपने को मनवाने के लिए | लेकिन एक ही बयान में धराशायी हो गए कि - " यदि पटेल होते तो मोदी को हरगिज़ अपना उत्तराधिकारी न बनाते " |

* हिसाब किताब का न मिलना भ्रष्टाचार ही हो , ज़रूरी नहीं |

* जो दोनों वक़्त खाना खाते हैं वे भारत जैसे गरीब मुल्क के कम्युनिस्ट नहीं हो सकते |

* खुल गया - खुल गया -खुल गया
" आस्था इंजीनियरिंग वर्कशाप " -
by - Er Ugra nath
[ Aastha Engineer ( A.E.)]

* खानदानी हों तो टेढ़े, ऐंचे, भेंगे, काने एक्टर भी फ़िल्मी हीरो बन जाते हैं |

* तुम न आओगे तो सड़ जाए मेरी लाश ,
इतने भी कम नहीं हैं मेरे चाहने वाले |

* देखिये भाई , हमें नीति पर कायम रहना ही होगा , रहना ही चाहिए | हम किसी भी देश , जाति , धर्म , लिंग के व्यक्ति हों | व्यक्तिगत रूप से ही सही |

क्या आपने गौर किया सारे नियम - कानून व्यक्ति के लिए होते हैं | इसीलिए तो गलती या अपराध के लिए व्यक्ति को ही सजा होती है | किसी पूरे समाज - सम्प्रदाय को नहीं | इसलिए मैं तो व्यक्ति को समाज से ऊपर महत्त्व देता हूँ | व्यक्ति भला तो समाज भला |

शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

[ नागरिक पत्रिका ] 27 से 31 अक्टूबर , 2013

* अपना पक्ष तो हर किसी का कुछ न कुछ होता ही है | लेकिन जो दूसरे का पक्ष जान -सुन - समझ कर  अपनी राय बनाने - बदलने को तैयार होता है , उसे 'निष्पक्ष ' कहा जाता है |

* कहते हैं धर्म तो एक है - मानव धर्म | तो धर्म की भाँति राजनीति भी तो एक हो - जन सेवा की नीति ! अतः पार्टी भी एक ही हो , नाम कांग्रेस ही हो सकता है ( मानो JP की दलविहीनता की तरह ) | उसके भीतर ही वैचारिक विविधता वाले गुट - समूह हो ( जैसे स्वयं भारत देश ) | लोकतांत्रिक चुनाव आयोग तो पार्तितों पर रोक लगा नहीं सकता | लेकिन कुकुरमुत्तों से नुक्सान भी बहुत हो रहा है | अतः वोटर यदि यह मन बना ले कि वह केवल एक ही पार्टी को रखेगा | और यदि उसमे उसके पसंद का उम्मीदवार खड़ा किया गया है { जैसे मेरे लिए हिन्दू - दलित } तब वह वोट देगा , अन्यथा रिजेक्ट करेगा | यह विषय नया है , गंभीर और लम्बा | वोटर तय करेंगे | अभी हमारी वोटिंग राईट की ताकत अनेक दलों में बाँट कर  बेअसर हो रही है |

* Walking while talking , is what mobile phone is meant for !

* विवाह या सहजीवन प्रस्ताव के लिए न सही , मैं यूँ ही बताता हूँ कि मैं मानसिक - वैचारिक स्तर पर एकल , अकेला हूँ | मैं Single हूँ | इस मायने में कि मैं दोगला नहीं हूँ | मैं विचारों में दोगलापन नहीं करता | तो single ही तो हुआ ?

* तेरा द्वार खटखटाए क्यों ?
कोई तेरे पास जाए क्यों ?
तमाम बंदिशें हैं तेरे दर /
तुझे देवता बनाए क्यों ?

* कवियों की दशा देखी ,
कविता का नशा छूटा |
#    #

[कविता ? ]
* आगे देखना ,
दायें बाएं का
ख्याल रखना
उनका काम |
मेरा काम , केवल
उन्हें देखना |
#   #

* आस्तिक होने के लिए कोई ज़रूरी तो नहीं कि अपनी सारी बुद्धि को गिरवी रख दिया जाय ? जैसे मैं राष्ट्र में विश्वास रखता हूँ तो भी यह क्यों समझूं और कहूँ कि 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ' ?

* मरहूम राजेन्द्र यादव ने यह दिखा दिया कि वह दलितों के अतिरिक्त नवयौवना लेखिकाओं से भी कुछ आत्मकथाएँ बुनवाकर उन्हें कहानीकार बना सकते हैं | अब उन्हें प्रोत्साहन कौन देगा ? निश्चय ही श्री यादव एक सकर्मक साहित्यकार, या नहीं तो, सम्पादक थे |

* स्वतंत्रता पूर्व मुसलमानों को लगा होगा कि अलग पाकिस्तान बनने से उनका फायदा होगा | इसलिए  देश बंटा | अपनी सुविधा के लिए वहां से उन्होंने हिन्दुओं से छुटकारा पाने की भी जुर्रत की | और अब , ज़ाहिर है पाक देश को भारत से दुश्मनी करने में लाभ नज़र आ रहा होगा , इसलिए वह हर संभव सामरिक तरीके हिन्दुस्तान के विरुद्ध अपना रहा है |
अब इतना यदि अब इस तरीके से समझ लें तो यह रास्ता भारत के लिए ईजाद करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि पाकिस्तान का सही, सटीक, प्रतिरक्षात्मक उत्तर यह होना चाहिए कि पाकिस्तान से शेष बचे भारत के मुसलामानों को यह निश्चित आभास दिया जाय कि " पाकिस्तान का बनना उनके लिए फायदेमंद नहीं हुआ " | उन्हें इसका खामियाजा स्वयं भुगतना चाहिए, भुगतने का आफर करना चाहिए | उन्हें नैतिक साहस करके यह कहना चाहिए कि चूँकि पकिस्तान भारत से तकसीम होकर बना | मुसलमानों का इस्लामी देश बना, बांगला देश भी कोई सेक्युलर शासन नहीं बना | और वह उस भारत से दुश्मनी निभा रहा है जिसमे हम रह रहे हैं | तो ऐसे में एक नैतिक , ईमानदार मुसलमान की हैसियत से हिन्दुस्तान पर राज करने, राज करने वालों की श्रेणी से अपना अधिकार हम विद्ड्रा करते हैं , वापस लेते हैं | निश्चय ही यह भारत के सेक्युलरवाद और लोकतंत्र की कृपा है कि हम सत्ता में इस प्रकार भागिदार हैं कि हम वोट दे सकते हैं | लेकिन हम शासक नहीं होंगे | हम किसी चुनाव में खड़े नहीं होंगे | तभी वे पाकिस्तान के खिलाफ भारत की लडाई को मजबूती दे सकेंगे |
यह कुछ अति दिख सकता है , लेकिन यदि हम देवता बनने की महत्वाकांक्षा न पालें , तो यह मानना होगा कि इतिहास का फल वर्तमान को भुगतना पड़ता है | ब्राह्मणों को दलितों के लिए आरक्षण स्वीकार करना पड़ता है | बाप का किया या क़र्ज़ सन्तान को भरना होता है | तो यह ठीक है कि सर्कार बनाने की प्रक्रिया में वे भाग लें , वोट दें | लेकिन सरकार न बनें, MLA , MP, मंत्री वगैरह | देश के संसाधनों पर 'पहला हक ' भी लें , अच्छी से अच्छी , बड़ी से बड़ी नौकरियाँ करें , लेकिन देश के विधाता बनने का सत्यशः उनका हक तो नहीं बनता | कहे कोई कुछ भी | अन्यथा वे यह तो बताएं कि कश्मीर मुद्दे और भारत पर होते रहते आतंवादी तो छोड़ दीजिये , सरकारी हमलों के मुद्दे पर भारतीय मुसलमान कहाँ खड़ा है ? कितना सक्रीय और उत्तेजित है पाकिस्तान के खिलाफ ? तो क्या साड़ी सदाशयता केवल हिन्दुस्तान के ही जिम्मे है या होना चाहिए ? यह तो सरासर और सीधे सीधे अत्याचार है भारत पर , मानसिक रूप से | इसलिए पाक से भारत की राजनय कुछ अलग ढंग की होनी चाहिए | ध्यान देना होगा कि इनकी उत्पत्ति और विकास की कथा अलग है | पाकिस्तान में भी कुछ हिन्दुस्तान शेष है तो हिन्दुस्तान में कुछ ज्यादा ही पाकिस्तान भी है | ये दोनों अभी कुछ ही समय पहले तक एक ही थे , और यह विभाजन वृहद् भारत अभी भुला नहीं पाया है |      
सही है मुसलमान भारत के द्रोही नहीं , लेकिन न्याय होना ही तो काफी नहीं है | न्याय होते कुछ साफ़ , स्पष्ट और कड़क दिखना भी तो चाहिए |
आखिर उनके अपने तमाम किस्म के राजनीतिक आन्दोलन हो रहे हैं , तो अत्यंत राष्ट्रीय महत्व के इस मुद्दे पर क्यों नहीं , जिस पर कि भारत में मुसलामानों का भविष्य निर्भर है ? या वे यहाँ अपनी स्थिति के प्रति बिलकुल मुतमईन हैं , कि हिन्दू भारत उनका कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा | ऐसे में यह शक होता है कहीं वे इस आशंका में तो नहीं हैं कि वे तो भारत को इस्लामी राज्य देर - सवेर बना ही लेंगे ? देखा नहीं आपने AMU के अल्पसंख्यक चरित्र के उन्होंने ज़मीन आसमान एक किया , उर्दू के लिए , मदरसों के लिए , इत्यादि | यहाँ यह बात भी उठती है कि अल्पसंख्यक के मायने क्या हैं ? अल्पसंख्यक हो तो उसी तरह रहो | बहुसंख्यक पर शासन क्यों करना चाहते हो, उन्हें परेशान क्यों करते हो दबंगई द्वारा ? अन्य और भी तो समुदाय अल्पसंख्यक हैं , वे तो इतना उत्पात नहीं मचाते |

* " बच्चे ईश्वर की देन नहीं हैं | "
[ चाहे एक हों या एक दर्जन | आज अमर उजाला में एक खबर है - ' पोषक तत्व न मिलने से अपंग हो रहे हैं गर्भस्थ शिशु ' | अब चाहे संघ की सलाह मानिए या अपने स्वयं के विवेक की ]

* " दिल्ली दूर नहीं है "| यह मुहावरा उनके लिए तो ठीक जो दिल्ली से दूर हैं, और दिल्ली फ़तेह करना चाहते हैं | लेकिन यदि " आप " का  कार्यक्षेत्र ही दिल्ली है, तो आपको क्या खा जाय ? यही तो कि " दिल्ली भारतवर्ष नहीं है " |

* मैं इस कथन के लिए पूरी तरह से मुआफी मांगता हूँ , लेकिन जो मैं महसूस करता हूँ उसे कहने से बचना नहीं चाहिए | कि इस्लाम ने वैश्विक अध्यात्म का बड़ा नुकसान किया | आदमी के दिमाग को ऐसा बाँध दिया की उसकी आत्मा खुल कर बाहर आ ही नहीं पाती | कहीं बंधे , बने बनाये तरीके से पूजा करने नमाज़ पढ़ने से रूहानी तरक्की होती है ? निश्चय ही इससे निकलने का प्रयास हुआ , शायरों ने किया | लेकिन वह बस शेरो शायरी में गम हो गयी | चिन्तन में , निबंध में , दर्शन में इसके कोई परिवर्तन नहीं हुआ | और होता भी कैसे , जब इसे अपनी कोई आलोचना बर्दाश्त नहीं | और नए प्रयोगों का तो कोई सवाल ही नहीं उठता ! क्या कुछ हुआ इतने वर्षों में ? बस यह हुआ कि बहत्तर फिरकों में बंट गए , लेकिन मूल विशवास , अंधविश्वास वही रहे | मेरी तरफ से किसी परायेपन का भाव नहीं , हमारी चिंता मनुष्य का नैसर्गिक विकास है | भारत में तमाम गड़बड़ियां हुयीं , वह आलोच्य हो सकते हैं पर मानना होगा कि यहाँ इसकी गुंजाईश तो है ? विविध , विरोधी विचार धाराएं पनप तो सकती हैं | यहीं यह भी तो संभव हुआ कि जे कृष्णामूर्ति order of star तक को फेंक कर किनारे हो जाते हैं !

* खाप पंचायत की भूमिका -
एक गोत्र में शादी नहीं हो सकती , या लड़का लड़की अपनी मर्ज़ी से विवाह नहीं कर सकते | ये बातें अब आधुनिक युग में नहीं चलेंगी | फिर भी सत्ता के विकेंद्रीकरण और सामजिक दबाव के तहत पंचायतों की भूमिका से तो इन्कार नहीं किया जा सकता | तो फिर इन्हें भी अपनी मानसिकता प्रगतिशील समय के साथ बदलना होगा | अब इन्हें यह भूमिका ऐडा करनी पड़ेगी कि इनकी लडकियां  जो अन्य जाती व धर्म में विवाह करके गयी हैं , उन्हें उनके ससुराल वाले किसी प्रकार तंग - परेशान न कर सकें | और यदि वे ऐसा कुछ करने की हिमाकत करें तो इनकी खाप पंचायतें वही करें जो आज ये अपने ही मासूम संतानों के खिलाफ करते हैं |

* धर्म तब मज़हब होता है , जब कोई किताब किसी की होती है किन्तु वह दूसरे की नहीं होती | जब कुरआन हिन्दू नहीं पढ़ता , गीता मुसलमान की पुस्तक नहीं नहीं होती | लेकिन इतनी भर परिभाषा मज़हब के लिए काफी नहीं है | अब पारी आती है इस बात की , कि धर्म धर्म तब बनता है , जब उसके लिए कोई मर मिटता है , उसकी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता | यदि कोई हुसैन के चित्र नहीं देख सकता तो समझिये वह हिन्दू है | हिन्दू तब धर्म न होकर मज़हब हो जाता है | और मुसलमान है वह जो मोहम्मद के कार्टून बर्दाश्त नहीं कर सकता |

* Logic Machine : by : [ er.ugranath.nagrik@gmail.com ]
प्रवचन (sb) Tungston
बीरबल (युक्ति न्याय)

* बल जो है तो
बलात्कार करेंगे ?
अजीब बात !

* सोचिये कुछ
कुछ सोचिये भाई
लक्ष्य पूरा हो |

* काँटे ही काँटे
चुने अपने लिए
पुष्प तुम लो |

* जाने क्या बात
मन नहीं लगता
चकाचौंध में |

* जाल हटाओ 
पंछी उड़े न उड़े 
उसका काम !

* शिक्षा तो मात्र 
समानता का पाठ 
पढ़ाया जाए |

* कहानी वह 
जो जिया न जा सका 
जीवन भर |

* कुछ न कुछ 
न कुछ है न कुछ 

न कुछ कुछ |

* चाय गुमटी 
औरत चलाती है 
मर्द खाता है | 

(गीत )
* मन के भ्रम 
हम सब जीते हैं 
विष पीते हैं |
+ + + + + 

* भगवानों की 
मूर्तियाँ जो हैं वही 
रह जायेंगी |

* हर औरत 
सुंदर दिखती है 
फोटोग्राफी में |

* होली अथवा 
दीवाली , मतलब 
छुट्टियाँ , बस !

* कहाँ हम हैं
और कहाँ हो तुम
क्या मुकाबला ?

* Little touch
Makes strong connect
Lifelong .

* To make up
Your mind , some
Go behind .
(मात्रा नागरी में गिनें )

[ नागरिक पत्रिका ] 16 से 26 अक्टूबर , 2013

* श्रद्धेय स्व अमृत लाल नागर की 97 वीं जयंती 19 अक्तूबर को जयशंकर प्रसाद सभागार में संपन्न |

[ कविता ]    " चश्मा "

* चश्मा मुझे
अखबार - किताब पढ़ाता है ,
चश्मा मुझे
देश - दुनिया दिखाता है ,
लेकिन चश्मे को मैं
कहाँ देख पाता हूँ ?
वह अपने को मुझसे छिपाता है |
#  #

* मैं ही क्यों आऊँ
तुम्हारे पास ?
तुम क्यों न आओं
हमारे पास ?
#  #

* ग़ालिब के भी अशआर अब गालिबन हुए ,
कोई असर करते नहीं उजड़े दयार में |
[ कैसी रही by - ugranath ]

* " जैसा मेरा मन कहता है , वैसा मेरा ईश्वर कहता है ."

* सेक्युलर सरकार वह जो देश के धर्मों के आचरणों पर भी निगाह रखे, उनमे दखल दे और उन्हें नियंत्रण में रखे | [मजहबों]

* " देवा में दबे पाँव "
मैंने देवा मेले गया था | पीछे से से एक एम्बेसडर काफिला हूटर बजाते प्रवेश द्वार से मेले में घुसा | अच्छा नहीं लगा | It was a shear disgrace to the Holy soul , a Blasphemy ?

  • दलित और पिछड़े जब ब्राह्मणवादी काम करने लगते हैं, तब वे हिंदुत्व का बड़ा नुक्सान करते हैं | उदाहरणार्थ कल्याण सिंह का बाबरी मस्जिद ध्वन्सीकरण का कार्य देख लीजिये |




  • अन्यथा न लेंगे , सचमुच मैं अपने भीतर एक शीर्ष नेता का अनुभव कर रहा हूँ , सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक |

* " हिन्दू कोई धर्म नहीं किताबों का ढेर है | लाइब्रेरी है | तमाम लाइब्रेरियन हैं |"
[ आप भी एक लिख दो | वह भी हिन्दू हो जायगा | मसलन ' लज्जा ' ही ]

* सार्वजनिक चेहरों पर चंदन टीका [ Personal Identity Mark ] कुछ अच्छे नहीं लगते , शोभा नहीं देते | मुझे नहीं लगता इससे कोई राजनीतिक लाभ मिलने का !

* जैसे मैं कहता हूँ कि धर्म को बस धर्म होना चाहिए , जैसे हिन्दू , जिसका कोई धर्म नहीं | जब जैसा बनाना मानना चाहो , यह हाज़िर | उसी प्रकार पार्टी भी एक , यथा कांग्रेस होनी चाहिए | उसी के अंदर  तमाम विचारधाराओं के गुट - समूह हों , और अपना प्रभाव , दबाव पार्टी पर डालें | जो सशक्त होगा उसी का पी एम बने | * मुझे कोई एक व्यक्ति ढंग का नहीं मिल रहा है , जो व्यक्ति भी बेहतरीन हो और सामाजिक सोच में भी उम्दा हो | वर्ना मैं अभी एक पार्टी बनाकर उसे PM घोषित कर देता | फिर भी मैं एक "गरीब नवाज़ "  पार्टी बनाना चाहता हूँ | पटना के बुद्धिवादी मित्र डा रमेन्द्र का एक लेख ( किताब ) प्राप्त - पीटर सिंगर के विचार पर उनकी समीक्षा |
जो पढ़ना चाहें वे अपना ईमेल ID भेजें |

* यह अनुभव यूँ तो काफी पुराना है ,लेकिन इसमें नया अध्याय आज जुडा तो लिखना पड़ रहा है | मैं अपने एक समृद्ध मित्र के घर पर था | देखा बात बात पर पूरा घर छोटे से नौकर के भरोसे था | रामू , एक गिलास पानी / रामू , मेरा जूता लाना / रामू , मेरा क्रिकेट बैट / रामू , ये कपड़े फैला / रामू यह , रामू वह | तब मेरे मन में विचार कौंधा की असल मालिक कौन है और कौन असली गुलाम ?
अब पलटकर आता हूँ हिन्दुओं पर निरंतर डाले जा रहे लांछनों पर | सारांशतः हिन्दू कौम इतनी लिद्धड और नालायक है , यह दकियानूस है अन्धविश्वासी, डरपोक, राजनीति में फिसड्डी , धन दौलत से अरुचि पैदा करते इनके संत , इस दुनिया से ज्यादा स्वर्ग की चिंता करता राष्ट्र ! हुंह, इसे तो गुलाम होना ही था , शासित | कभी इनकी , कभी उनकी |
लेकिन क्या यह सच है ? मैं अपना पुराना अनुभव प्रयोग में लाता हूँ | मेरा मित्र मालिक था या उनका नौकर रामू ? दार्शनिक दिमाग लगाईये तो रामू मालिक हुआ | लेकिन सच्चाई तो यह है कि रामू नौकर था और मित्र के टुकड़ों पर पल रहा था | वह उसे गाँव से ले आये थे | इसी तरह मैं उपमा लगता हूँ कि हमारे शासक हमारे नौकर थे , हमारे सेवक जिन्हें हमने इस काम पर लगाया था | इसका मतलब यह नहीं कि वह हमारे मालिक हो गये और हम गुलामी झेलने के लिए अभिशप्त हो गये | गलत आरोप लगते हैं हिंदुत्व पर | वह जो है, जैसा है वह है | वह हिन्दू ही रहेगा | क्या वह अंग्रेजों की तरह लालची हो जाय और आक्रान्तों की भाँति हिंसक ? नहीं , यह जिनका काम है उन्ही को मुबारक | ऐसे काम मैं उन्ही से लेता हूँ | मैं शासन करने की ड्यूटी पर किन्ही को लगाऊँ , इससे मैं उनका गुलाम नहीं हो जाता | हिन्दू कौम को इसके लिए अपमानित करना , किया जाना बंद होना चाहिए |

* साहित्यकार की व्यथा =
कैसे कहूँ कि यह सचमुच एक साहित्यकार की व्यथा ही व्यथा है , लेकिन जरूर है यह मेरी दशा | भले मैं परंपरागत रूप से साहित्यकार की श्रेणी में नहीं आता | कहा जाता है साहित्यकार के कुछ सरोकार , सामाजिक दायित्व होते हैं , जिसके तहत वह लिखता है | ज़रूर होता होगा , और ऐसे साहित्यकार अनेकानेक हैं | वे पत्र - पत्रिकाओं में छपते हैं , पैसा - नाम और पुरस्कार पाते हैं | मैं इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता | मेरा लेखक अपने मन और बुद्धि के सरोकार और उत्पाद लिखता है | मैं किसी अन्य की नहीं लिखता | और यदि किसी को यह लगता है की मेरी बात तो सृष्टि और समूची मानव संस्कृति को संबोधित है तो ऐसा इसलिए होता है की वह सृष्टि वह दुनिया  मेरे भीतर होती है , वह स्वयं मैं होता हूँ |
मेरे विचार से साहित्यकार समकालीन समाज को चित्रित नहीं करता | या होते होंगे ऐसे भी साहित्य और साहित्यकार ] | साहित्यकार तो वह जो अपने समय के सीने पर पैर रखकर आगे की और छलांग लगा देता है | वह लिखता तो आज है , लेकिन कल की, भावी समय लिखता है | आज का लेखन तो पत्रकार , नेता और लेखक चिंतक जन करते हैं | लेकिन वे साहित्यकार नहीं होते | उन्हें साहित्यकार समझने की भूल की जाती है , लेकिन यह सच नहीं होता | साहित्यकार के लेखन पर तो कल का समय निर्मित होता है , क्योंकि वह आगे की पीढ़ियों के लिए होता | आगे की पीढ़ी ही उसे ठीक से समझ पाती है | इसीलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि किसी भी साहित्य को उसका सृजन काल में समझा नहीं जा पाता , और भविष्य उन्हें पलक पांवड़े उठा लेता है | मैं वैसा लिखता हूँ इसलिए मैं वस्तुतः साहित्कार हूँ यह कहना मेरा आशय नहीं है | बल्कि मैं यह कहना चाहता हूँ कि ऐसी ही रचनाओं को मैं साहित्य मानता हूँ , और इन्हें लिखने वालों को ही साहित्यकार | ज़ाहिर है , साहित्यकार एक दुर्लभ जीव है |
मेरे समसामयिक साहित्यकार न हो सकने का एक संकट और है | सामयिक जीवन को चूँकि अभी , इसी वक्त जीना होता है , इसलिए उसके साथ मैं तालमेल , सामंजस्य स्थापित कर लेता हूँ | अधिकाँश द्वंद्व तो समाप्त हो जाते हैं | तो बिना विसंगति के साहित्य कैसे रचा जा सकता है ? विसंगति तो साहित्यकार अपने भावी इच्छित , आदर्श या मनचाही स्थिति के साथ पैदा करता है, बनाता है | जिसे जीने की उसे बाध्यता -विवशता नहीं होती , और तब वह उसे खुल कर लिख पाता है | इसीलिए कहा गया है कि साहित्यकार आगे की लिखता है , अभी की नहीं |और यह भी कि जहां न जाए रवि वहाँ जाए कवि | अभी का लेखन तो जिलाधिकारी के नाम प्रार्थनापत्र अथवा पुलिस को दी जाने वाली यफ़ आई आर ही हो सकती है | और यही कारण है कि जो साहित्यकार जीते भी इसी समय को हैं और लिखते भी इसी समय को हैं ,उसे कितना भी सामाजिक सरोकारों से युक्त बता उसका गुणगान करें ,वह निम्न स्तर का ही होकर रह जाता है | फिर भी तुर्रा यह की उसे वे कालजयी कहे जाने का हठ पाल लेते हैं | कोशिश पैरवी से पुरस्कार - सम्मान पा तो लेते हैं लेकिन चूँकि वह उसे डिज़र्व नहीं करते , तो एक अतिरिक्त , अनावश्यक दंभ और घमंड से भरे हुए वे बड़ी आसानी से समाज में देखे जा सकते हैं |
#    #

कोफ़्त [agony]
संतों के सपनों में अब ईश्वर तो आते नहीं | आता है तो सोना , स्वर्ण , सुवर्ण | वह भी तोला - दस तोला नहीं, कई कई कुन्तल | और ईमानदार इतने कि खुद नहीं खोद पाए, भले इनके बताये अन्य स्थानों पर चोर बदमाश खुदाई करने लगे | लेकिन ये कोई वो तो नहीं ! इसलिए इन्होने सरकार को चिट्ठी लिखी, सपना बताया | अब पूरे देश में वैज्ञानिक दृष्टि  फ़ैलाने की ज़िम्मेदारी की तहत सरकार ने भी फौरन अपने वैज्ञानिक अंग को खुदायी पर लगा दिया | अरे नहीं नहीं,सोने के लिए नहीं भाई , पुरातात्विक अन्वेषण के लिए | अब पीटा करें माथा अपना हम जैसे लोग !
कहना था सरकार को - " संत जी सोना है तो उसे 'सोने ' दीजिये | आप का सपना हमने सुन लिया यही बहुत है | अब हम इसे अपने ढंग से देखेंगे | और अब आप सोने का सपना देखना बंद कर कुछ ईश चिन्तन कीजिये | आप के लिए स्वर्ण का दर्शन आपकी भाषा में 'पाप ' है | देखिये एक बाबा का हश्र , जो " सुवर्णा " के चक्कर में पड़े थे |"
हमें कहना पड़ेगा कि डोभालकर की हत्या का दोषी उनके हत्यारे नहीं , स्वयं यह बेपेंदी का लोटा सरकार है |
[ सपनो का भी एक विज्ञान है | घोर अवचेतन में दबी छिपी कामना , -- - ]

* मैं सोच रहा था कि चलो मोदी तो पी एम् तो हो गए | लेकिन अन्य मंत्री कौन होंगे ? क्या एम् एम् जोशी मंत्रिमंडल से बाहर होंगे ? और तब कए होगा ? मोदी राम मंदिर को हवा नहीं देते , पर अन्य जन तो उसे जीवन मरण का प्रश्न बनाये हुए हैं | तब क्या सरकार चल पाएगी ?

* You said ," that's good ". So ,  that's good . आप खुश हो सकते हैं कि आपने एक नास्तिक के कार्य की तारीफ़ की और साथ में अपने धार्मिक कार्यों की सूची भी थमा दी | लेकिन फर्क है और बहुत बड़ा है | नाज़ शहनाज़ का छोटा सा भी काम आपके बड़े बड़े कार्यों से श्रेष्ठतर है क्योंकि उसने जो भी किया अपनी मानवीय प्रेरणा से किया | जबकि धार्मिक जन जो जन हितैषी कार्य करते हैं वह स्वर्ग - जन्नत की चाह में, अपने भगवान् को खुश करने , उनकी कृपा दृष्टि प्राप्त करने के लिए करता है | इसलिए उसका कार्य दोयम और दूषित हो जाता है, क्योंकि वह स्वार्थ प्रेरित होता है | उधर नाज़ को कुछ मिलना नहीं, पाना नहीं है | फिर भी वह कर रही है, थोडा भुत, जो भी उससे बन पड़ रहा है | इसलिए उसका पलड़ा भारी है | इसलिए अपना धार्मिक कार्यों पर गुरूर न कीजिये, बावजूद इसके कि हम आपकी प्रशसा करते हैं | दो बातें और = पहला तो यह कि नाज़ की जगह पर यदि आपने मुझसे पूछा होता तो मैं गीता के प्रभाव में आपसे कहता ," जी नहीं, मैं कुछ नहीं करता, कोई सेवा मनुष्य की नहीं कर पाता " | और इस तरह मैं अपने कर्मों को दरिया में डाल देता, भले तब आपकी प्रशंसा का पात्र न होता | दुसरे यह कि मित्र, आखिर यह कौन सोचेगा कि वह कौन सा खुदा और ईश्वर है कि जिसके होते आप इतना सब दान करने की स्थिति में हैं और इतने सारे लोग आपके सामने हाथ फ़ैलाने की दशा में हैं ? इस स्तर तक सोचेंगे तब आप नास्तिक हो जायेंगे और ऐसा समाज बनाने की सोचेंगे जहाँ दान पूण्य जैसे कार्यों की ज़रूरत न हो |   आमीन !


* कह तो दिया
भूखा तो हूँ लेकिन
भेड़िया नहीं |

* मैं कुछ बोला
सुनकर हो गए
आग बबूला |

* लोग कहते
मैं सुनता रहता
सिर धुनता |

* सद्दःस्नात हूँ
विचारों से मैं कोई
व्यक्ति नहीं हूँ |

* स्वार्थ विहीन
पीड़ा से परिपूर्ण
पार्टी है मेरी |

* पैदा होना तो
एक दुर्घटना है
हिन्दू - मुस्लिम |

* छोटे से हाथ
छोटे छोटे लुकमे
फिर भी भूखे |

* अशुभ न हो
पर कुछ तो है जो
शुभ नहीं है |