गुरुवार, 22 मार्च 2018

अमरत्व

ऐसा क्यों होता है
कि कोई हिन्दू पैदा होता है
तो हिंदुत्व पर गर्व करने लगता है
कोई मुसलमान पैदा होता है
तो इस्लाम के गुण गाने लगता है ?
ऐसे तो नहीं चलेगा भाई !
आदमी और इंसान
हिन्दू मुसलमान तो नहीं होता !
यदि हिन्दू को हिन्दू ही रहना है आजीवन,
मुसलमान को मुसलमान रहना है ताउम्र ,
तब तो आदमी को मरना ही है
इंसानियत अमर नहीं हो सकती कभी
अमरत्व की खोज क्या
कल्पना ही बेमानी है ।

सोमवार, 19 मार्च 2018

वेद प्रदर्शनी

अयोध्या अधिग्रहीत भूमि पर "वेद विज्ञान प्रदर्शनी" लगा कर दुनिया को दिखाओ । यह जन्मभूमि विवाद भी मिटे और इस बहाने हिन्दू हृदय सम्राट राजा राम का नाम भी प्रतिष्ठा पाये । ज़ाहिर है उस परिसर में एक कोने में राम की मूर्ति भी खड़ा लो । जैसे अनेक, लगभग सभी, केंद्रीय- राज्य सरकारी कार्यालयों, दफ्तरों में अनिवार्य रूप से होते ही हैं, और कोई उनका क्या बिगाड़ लेता है ? उसी प्रकार अयोध्या वेद विज्ञान कार्यालय / परिसर में एक मंदिर हो जाय । किसी को क्या ऐतराज़ यदि इस तरीके से सुंदर देश के एक गन्दे खेल का समापन ही जाए ।

रविवार, 18 मार्च 2018

यहूदी

अज्ञात व्यक्ति को तो आदमी ही मानकर चलना पड़ेगा । यह तो बाद में पता चलेगा कि वह कैसा आदमी है ! स्त्री है या पुरुष, उत्कृष्ट है अथवा निकृष्ट, ईसाई है या यहूदी ?

शनिवार, 17 मार्च 2018

अयोध्या उपाय

निर्दोष समाधान !
Foolproof scientific solution to Ayodhya Dispute :-
---   ---   ---   ---   ---   ---
सम्पूर्ण समस्या को संकेंद्रित, centralise करके देखें तो बात है केवल गर्भगृह की । आस्था की दुहाई दी जाती है राम जन्मभूमि की । लड़ाई है राम की पैदायशी ज़मीन की । धार्मिक भावना जुड़ी है जहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित, विराजमान है । विवाद भले पौने तीन एकड़ में फैला है ।
तो उस गर्भगृह पर मंदिर मस्जिद कोई हल नहीं है । इससे समस्या घटने के बजाय बढ़ेगी । समाप्त तो कतई नहीं होगी । इसे किसी गहरे अंधकूप, काल के विवर में डालना ही एकमात्र स्थायी उपाय है । इसे हम Black Hole Solution नाम देना चाहते हैं ।
लेकिन इसे आप सुविधा के लिए Pillar Well भी कह सकते हैं ।
उस स्थान को आप एक गोल मोटी दीवाल से घेर दें । और उस दीवाल पर वह राम मंदिर के लिए करोड़ोे की कीमत के लाये, तराशे गए सारे पत्थर एक के ऊपर एक जोड़ते हुए ऊँचा उठाते जायँ । क्या खूब कि वह राम का कुआँ बुर्ज़ खलीफ़ा से भी ऊँचा हो जाये । दुनिया देखे । पत्थर जड़ते जड़ते अगर शिखर के पत्थर आपस में जुड़कर Dome के आकार की हो जायें, और वह स्तूप बन जाये तो क्या कहने ! बौद्धों की भी आस्था का समाधान हो जाये । है न उनका भी सशक्त दावा उस स्थान पर और राज्य को सबका ख्याल रखना है । देखिये, पूरा न्याय absolute तो नहीं निकल सकता, यदि वहाँ मस्जिद वापस न की गयी तो । तो अन्याय तो होना है धार्मिक श्रद्धा पर । तो भक्तों, कारसेवकों का भी तुष्टिकरण संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के विरुद्ध होगा । लेकिन यह भी सच है कि इसका कोई सेक्युलर उपयोग भी सौंदर्य शास्त्र Secular Aesthetics के अनुकूल न होगा । इसे एक धार्मिक स्मारक, Historical-Religious Monument ही बनना उचित होगा । यही फिर बुर्ज़ खलीफ़ा की तरह secular credential को प्राप्त होगा, tourism पर्यटन का एक महान केंद्र ।

अब उपसंहार । चूँकि (दिवंगत 14 मार्च) सदी का महान ब्रम्हाण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग वेदों में विज्ञान की बड़ाई कर चुके है, तो यह तो बहुत अच्छी बात है । उन्होंने भारत का शीश संसार में ऊँचा कर दिया, हमारे लिए गर्व की बात है । इसलिए उस शेष परिसर को स्टीफन हाकिंग विज्ञान पार्क का नाम दिया जाय । वहाँ बुर्ज़ खलीफ़ा के तौर तरीके पर Light & Sound प्रदर्शनी द्वारा यह दिखाया सुनाया जाय कि पुष्पक विमान कैसे उड़ाया जाता था, गणेश के सिर की सर्जरी कैसे हुई, कैसे पत्थर को तैराया जा सकता है, किस प्रकार फल फूल आदि से गर्भाधान किया जाता था, इत्यादि इत्यादि । वेद भी खुश, विज्ञान भी प्रसन्न ।

Final resolve

निर्दोष समाधान !
Foolproof scientific solution to Ayodhya Dispute :-
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सम्पूर्ण समस्या को संकेंद्रित, centralise करके देखें तो बात है केवल गर्भगृह की । आस्था की दुहाई दी जाती है राम जन्मभूमि की । लड़ाई है राम की पैदायशी ज़मीन की । धार्मिक भावना जुड़ी है जहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित, विराजमान है । विवाद भले पौने तीन एकड़ में फैला है ।
तो उस गर्भगृह पर मंदिर मस्जिद कोई हल नहीं है । इससे समस्या घटने के बजाय बढ़ेगी । समाप्त तो कतई नहीं होगी । इसे किसी गहरे अंधकूप, काल के विवर में डालना ही एकमात्र स्थायी उपाय है । इसे हम Black Hole Solution नाम देना चाहते हैं ।
लेकिन इसे आप सुविधा के लिए Pillar Well भी कह सकते हैं ।
उस स्थान को आप एक गोल मोटी दीवाल से घेर दें । और उस दीवाल पर वह राम मंदिर के लिए करोड़ोे की कीमत के लाये, तराशे गए सारे पत्थर एक के ऊपर एक जोड़ते हुए ऊँचा उठाते जायँ । क्या खूब कि वह राम का कुआँ बुर्ज़ खलीफ़ा से भी ऊँचा हो जाये । दुनिया देखे । पत्थर जड़ते जड़ते अगर शिखर के पत्थर आपस में जुड़कर Dome के आकार की हो जायें, और वह स्तूप बन जाये तो क्या कहने ! बौद्धों की भी आस्था का समाधान हो जाये । है न उनका भी सशक्त दावा उस स्थान पर और राज्य को सबका ख्याल रखना है । देखिये, पूरा न्याय absolute तो नहीं निकल सकता, यदि वहाँ मस्जिद वापस न की गयी तो । तो अन्याय तो होना है धार्मिक श्रद्धा पर । तो भक्तों, कारसेवकों का भी तुष्टिकरण संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के विरुद्ध होगा । लेकिन यह भी सच है कि इसका कोई सेक्युलर उपयोग भी सौंदर्य शास्त्र Secular Aesthetics के अनुकूल न होगा । इसे एक धार्मिक स्मारक, Historical-Religious Monument ही बनना उचित होगा । यही फिर बुर्ज़ खलीफ़ा की तरह secular credential को प्राप्त होगा, tourism पर्यटन का एक महान केंद्र ।

अब उपसंहार । चूँकि (दिवंगत 14 मार्च) सदी का महान ब्रम्हाण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग वेदों में विज्ञान की बड़ाई कर चुके है, तो यह तो बहुत अच्छी बात है । उन्होंने भारत का शीश संसार में ऊँचा कर दिया, हमारे लिए गर्व की बात है । इसलिए उस शेष परिसर को स्टीफन हाकिंग विज्ञान पार्क का नाम दिया जाय । वहाँ बुर्ज़ खलीफ़ा के तौर तरीके पर Light & Sound प्रदर्शनी द्वारा यह दिखाया सुनाया जाय कि पुष्पक विमान कैसे उड़ाया जाता था, गणेश के सिर की सर्जरी कैसे हुई, कैसे पत्थर को तैराया जा सकता है, किस प्रकार फल फूल आदि से गर्भाधान किया जाता था, इत्यादि इत्यादि । वेद भी खुश, विज्ञान भी प्रसन्न ।

मंगलवार, 13 मार्च 2018

करीब आ जाओ

पुरानी कविता, नया दम:
(इतना करीब आ जाओ)
--------------
तुम मेरे
इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाओ
कि मेरी साँस उखड़ने लगे
मेरा दम घुट जाए
और मैं मर जाऊँ ।
- - - - - - - -
पहले मैं
बड़े मेलों में जाता हूँ
फिर बड़ी सभाओं में
छोटे छोटे सम्मेलनों में
फिर छोटी गोष्ठियों
और छोटी मीटिंग में
छोटी से छोटी होती
कमरों की गुफ़्तगू में
शामिल होता हूँ ।
फिर बहुत ही छोटा
कोई गुरिल्ला ग्रुप बनकर
दुश्मन से चिपक जाता हूँ
उसके इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाता हूँ
कि उसकी साँस घुट जाए !
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(उग्रनाथ नागरिक) - 13 मार्च, 2018

सोमवार, 12 मार्च 2018

RTR

सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट कम से कम Right to Recall में ही जनता का अप्रत्यक्ष सहयोग करें । ऐसे ही Recall करते करते , भ्रष्ट अवसरवादी नेताओं को वापस बुलाते बुलाते सम्भव है इनसे प्रभावित हो एक दिन जनता इन्हीं को सत्ता में बुला ले, Call कर ले ! सर्वहारा के अधिनायकत्व हेतु !

अहिंसा

यह हिंसा क्या चीज होती है ? इस नाम की किसी चिड़िया को हम नहीं जानते । और जब जानते नहीं तो हिंसा करेंगे क्या !
अलबत्ता हम अहिंसा से परिचित हैं । इसे बचपन से पढ़ाया जाता रहा है । अहिंसा परमो धर्मह । और अब इसका अर्थ भी समझ में आया ।
यह डाकुओं का सुरक्षा कवच है । लूटने वाले, शोषण अत्याचार करने वाले अपने संतों के माध्यम से जनता का कान भर देते हैं :- देखो , हिंसा न करना । हिंसा करना पाप है । अहिंसा ही धर्म है इसे धारण करो । तभी से हम अहिंसा को जानते हैं । हिंसा कहाँ जान पाए ?

सोमवार, 5 मार्च 2018

कम्युनिस्ट

न किसी ईश्वर के समक्ष जीभ काटकर चढ़ाना, न स्वर्ग की इच्छा, न नर्क से घबराना, न मोक्ष के लिए दुनिया से भागना । लेकिन दुनिया को बदलने के लिये पागलपन की हद तक अपना जीवन लगाना ।
ये हैं कम्युनिस्ट और उनका सपना है कम्युनिज़्म यानी साम्यवाद । इसका दर्शन है मार्क्सवाद, जिसके प्रणेता हैं बाबा कार्ल मार्क्स । खाँटी भारतीय भाषा में बोलें तो यह बाबा अगर भारत में होते तो संत कहलाते (कहीं ग़लत तो नहीं बोल दिया, क्योंकि यहाँ के सन्त तो कुछ भिन्न प्रकार के होते दिखते हैं ?)! जिनका कामरेड सम्प्रदाय भी किसी संत संप्रदाय की तरह प्रशंसित और पूज्य होता ।
लेकिन इन्हें पूजा पसन्द नहीं । ये तो अपने मार्गदर्शकों मार्क्स, लेनिन आदि की मूर्तियों पर माला नहीं चाहते । उनकी किताबों का अवगाहन करते हैं, माथापच्ची बहस मुबाहिसा करते कुछ निष्कर्ष, कुछ कार्यभार तय करते और जंगलों पहाड़ों की खाक़ छानते हैं । न खाने पीने की चिंता, न चाह में अट्टालिका ! आख़िर ये कौन हैं झोले में केवल विद्याधन की गठरी डाले ? क्या भारतीय मनीषा अपने इन सुयोग्य समर्पित नौनिहालों को कभी अपने गले लगाएगी ?

कथनी करनी

मैं कम्युनिज़्म की तरह हिंदुत्व को भी बहुत महत्व देता था ससम्मान, इसके विश्व बंधुत्व की घोषणा के कारण । दुनिया के सारे मजदूर हमारे साथी के समानांतर संसार के सभी मनुष्य हमारे बंधु ! लेकिन अपने कुछ हिन्दू साथी, संघ, संगठन यहाँ तक कि विधि दर्शन के व्याख्याता मित्रों को इसकी आड़ में निकृष्ट विचार और कर्म पर उद्धत पाया तो हताशा हुयी । जिसे कुछ यूँ समझा जा सकता है कि जैसे मार्क्सवाद कहता कुछ है, नक्सलवादी करते कुछ हैं ।

शनिवार, 3 मार्च 2018

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

दाँत

दाँत ऊपर से तो दिखती इतनी ही हैं । लेकिन इनकी जड़ें कितनी गहरी हैं कभी दाँत उखड़वाकर देखिए ।

गुरुवार, 1 मार्च 2018

उत्सव

हम तो हर रोज़ "विचार गोष्ठी" उत्सव/त्योहार मनाते हैं ।

अंतर

अगर वह
ईश्वर के प्रति आसक्त हैं
तो यह मानकर चलिए कि
वह हिन्दू मुसलमान में बंटेंगे,
फिर वह ईद और होली
मिलजुलकर सौहार्द्रपूर्वक मनाएँ
या लड़ झगड़कर
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
रहेंगे वह परस्पर अंतर पर ही ।

क्या वह है

क्या वह है ?
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इतनी सदियों से
इतने तो मनुष्यों ने
राजा से लेकर रंकों ने
हिन्दू मुसलमान
यहूदियों ईसाइयों ने
साधु संतों देवी देवताओं ने
उसकी पूजा अर्चना की
दूध फूल पानी नारियल चढ़ाए
नमाज़ें कीं भजन गाये
उसकी शान में दुसाध्य रोज़े रखे ।
उस पर कुछ असर हुआ ?
पत्थर तो छोड़िए
वह तो पिघल जाता लेकिन
वह तो ईश्वर था
कहते परमेश्वर था ?
तो प्रश्न उठता है -
क्या वह है भी
या हम व्यर्थ ही - - - ?
**************

दुश्मन

दुश्मन है !
जो तुम्हे मदिरा दे
तुम्हारा दुश्मन है,
जो तुम्हें मंदिर दे
वह महा दुश्मन है ।

NA

रज़ामन्दी हो तो कोई मित्र इस प्रयोजन हेतु विशेष group ही बना सकते हैं,  NA नाम से ।
Not Applicable Sir !
ज़्यादा दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं है । दिक्कत यह है और इसे समझने की ज़रूरत है, कि सरकारी कागजों में व्यक्ति का धर्म लिखा जाना एक राजनीतिक मामला है । आपकी आस्था से राज्य को कोई मतलब नहीं । अपना कोई धर्म बता दो जिसे वह जोड़कर अपनी जनगणना तैयार कर ले और उससे राजनीतिक लाभ उठाये । और सेक्युलर राज्य में तो वह और अतिरिक्त ही हमारी आस्था विश्वास से निरपेक्ष है, क्योंकि उसके जिम्मे हमारे लिए मंदिर मस्जिद पूजास्थल बनाना नहीं है ।
ऐसे में प्रश्न विकट है कि हम नास्तिक अपना धर्म क्या लिखाएँ ? भूलिए नहीं कि वह राजनीति का आधार बनेगा । और इसे राजनीतिक नज़रिए से देखिए । कुछ ऐसा लिखाएँ जिससे आपकी जनसंख्या बढ़े । नास्तिक ? कितने लोग नास्तिक लिखेंगे ?अल्पमत में रहना हो तो लिखिए । फिर नास्तिकों में भी अनेक श्रेणियाँ हैं । अभी कोई मित्र अधार्मिक पर जोर दे रहे थे, आदि आदि । यद्यपि दो विभाग तो समझ में आ रहे थे - धार्मिक और अधार्मिक, या आस्तिक और नास्तिक । लेकिन आस्तिक/धार्मिक लोग अपना अपना अलग अलग धर्म अवश्य लिखेंगे । बचे हम नास्तिक श्रेणियाँ, तो ऐसा क्या किया जाय कि हम बंटे न दिखें । फिर याद दिला रहा हूँ यहाँ अपने सिद्धांतों पर न जाइये, सिर्फ अपनी संख्या बढ़ाने की सोचिए सरकारी मर्दुमशुमारी में । तो
जो धार्मिक भी हैं उनसे भी लोकतंत्र और संविधान का हवाला, दुहाई देकर इस मत पर सम्मत किया जा सकता है कि राज्य को वह अपनी यह गुप्त सूचना न दें, उसे उसकी जरूरत नहीं है सिवा दुरुपयोग करने के ।
और हम आप सब लोग भी इस बात पर राज़ी हों कि हम भी नास्तिक पर ज़िद न करें (जनगणना अधिकारी लिखेगा भी नहीं )। और जैसे तमाम प्रपत्रों में कई कालम में हम N/A, NA, ( Not Applicable) लिखते हैं, वही व्यवहार धर्म के कालम से करें । सचमुच यह आप पर लागू नहीं होता/ Applicable नहीं है । सरकार और surveyor मान भी जायगा । जैसे NOTA (None Of The Above) का बटन । धर्म में चूँकि Above कोई Candidate नहीं, इसलिए NA .

होली

लगता है अब प्रेम और भाईचारा बहुत ज़्यादा उरूज़ पर आने वाला है । जब हिन्दू मुसलमान बिना किसी दावे के अपना अपना त्योहार मना लेते थे/ मनाने देते थे, बिना अधायी बिधायी, बिना एक दूसरे के त्योहारों में हस्तक्षेप के, तब मुहब्बत कम थी । अब तो राजनीति का भी काम हो गया है मोहब्बत फैलाना ! जय हो होली जी की ।

जूता

आप मेरा अपमान कर सकते हैं ।
कभी लोग कहते हैं - तुम नास्तिक कैसे हो ? तुम यह करते हो, तुम्हारे परिवार वह करते हैं, रिश्तेदार यह वह करते हैं ?
मैं कोई फ़िजूल प्रतिवाद नहीं करता । सिम्पली कहता हूँ - हाँ, इसके लिये आप मुझे अपमानित कर सकते हैं , गाली दे सकते हैं । हाथ में जूता पकड़ाऊँ क्या ?

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

जनांदोलन

जनांदोलन के भरोसे विचार कर्म को नहीं छोड़ा जा सकता । आप तार्किक विचार देते रहें, जनांदोलन तो चुटकियों में हो जायेगा ।

कच्चा घड़ा

कच्चे घड़े से बलात्कार करने से बेहतर है प्यासा मर जाना !

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

Downtrodden

दलित की परिभाषा में विद्वत्जन बिलावजह दलन आदि शब्द छानते हैं । दलित का अंग्रेज़ी में अर्थ है - The Downtrodden. बोलने में भी वैसा ही ध्वनित होता है । दलितजन !

अंतिम मार्क्स

मेरा कम्युनिज़्म से क्या सम्बन्ध ? मेरा आग्रह केवल यह होता है कि सब कुछ सोच लेने के बाद अंत मे निर्णय इस बात पर गौर करने के बाद ही लिया जाय कि इस प्रश्न पर मार्क्सवाद क्या कहता है । और मार्क्सवाद भी क्या ? जैसा कि लेनिन खुद कहते हैं - यह नहीं ढूँढना है कि अमुक समस्या पर मार्क्स ने क्या कहा है ? बल्कि यह छानना है कि मार्क्स होते तो इसका क्या हल सोचते, निकालते, बताते ? अब आज के मार्क्स तो आपही हैं न ? यही मेरा मार्क्सवाद है ।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

गरीब स्वर्ग दिलाता

ग़रीब न हों तो बहुत से लोगों का स्वर्ग बिगड़ा जा रहा है !

न्योते

मैं सोचता हूँ, सामाजिक और राजनीतिक। सम्बन्ध यदि पारिवारिक संबंध न बनें तो ही अच्छा । कितनी शादियों में शामिल हों ? किन किन को घर दावत पर बुलायें ?

वहशी

आपको संदेह ही तो हो , मुझे कोई संदेह नहीं कि धर्म आदमी को सनकी और वहशी बनाता है ।

किसको किसको

मेरे पास एक और तरीका है नास्तिक बनाने का । समझ लो मैं आस्तिक तो बनना चाहता था । पूर्ण आस्तिक, पक्का और वाकयी ईमानदार आस्तिक । तो जब ईश्वर को मानता तो अल्लाह छूट जाता, जब अल्लाह को मानता तब गॉड छूट जाता । जब राम को मानता तब मोहम्मद छूट जाते, जब मुहम्मद को मानता तब ईसा छूट जाते । इसलिए सोचा, बेईमानी न करूँ, न इनको मानो, न उनको मानो, न किसी को मानो । और इस तरह सब छूट गए ।

मन उचटा

मेरी नास्तिकता का कारण यूँ समझिये कि मैं पूजा पाठ कर नहीं पाता था । समय नहीं मिलता था और रुचि भी नहीं रह गयी थी । मन उचट गया था इससे । तो फिर ऐसे सम्बन्ध को क्या पालना जिसे निभा न सको !

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

चीन को जाओ

युद्ध के वक़्त तो हथियार बाहर से भी मंगाने ही पड़ते हैं । इस दौरान कुछ घोटाले भी हो जाते हैं ☺, तो क्या !
इन औजारों में पहले तो है शिक्षा । वह क्या तो कहा है कि ज्ञान के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाओ । फिर जब चीन, रूस जा ही रहे हो तो वहाँ से कम्युनिज़्म भी आयात कर लाओ । यह दूसरा हथियार है वर्ग युद्ध का ।

आखिर जीवन

थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि आप दलित नहीं हैं । वैसे भी कितने दिन दलित रहना ही है ! यह आरक्षण, दलितपन बस कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । यह अस्थायी स्थिति है । इसलिए इस आंदोलन को बहुत लंबा नहीं खींचा जा सकता, भले समय कुछ ज़्यादा लगे । लेकिन साम्यवाद तो मनुष्य की मानुषिक जीवन की स्थायी प्रवृत्ति है ? दलित न होकर भी साम्यवादी होना, समाजवादी जीवन जीना है । तो क्यों न अभी से अभ्यास करें, उच्चतर जीवन मूल्य और उसके लिए संघर्ष की ?

आँतें

अब इससे ज़्यादा इस शरीर की सेवा करना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं । इसका पेट भरना भर मेरा काम था । आँतें कुछ रोज़गार के लिए कुलबुला रही थीं, तड़प रही थीं । मैंने इनमें कुछ दाने डाल दिये, - लो चबाओ, पीसो इनको और चुप रहो । बस, इससे ज़्यादा नहीं । मुझसे यह न होगा कि मैं इसके लिए अच्छे कपड़े, कोई घर, कोई गाड़ी, कोई भली सी बीवी लाकर दूँ । दूँ, तब भी तो यह संतुष्ट न होगा । और और माँगता रहेगा । कहाँ तक मैं इसकी ख्वाहिशें पूरी करूँगा । इसलिए इसकी आँत भरने के अलावा मैं इसकी कोई ज़िम्मेदारी अपने सर नहीं लेता ।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

वैज्ञानिक हिन्दू मुसलमान

वह तुमसे चंदा लेने आएँगे
तुम कुछ नहीं होगे, धर्मविहीन होगे
तो दे ही डालोगे कुछ रुपये
मंदिर मस्जिद के नाम पर मानवतावश,
नहीं तो तुम कहोगे - हम वैज्ञानिक हैं,
हम नहीं देते इन सब कार्यों के लिए चंदा ।
(वैज्ञानिक समुदाय, Scientific Community)

वैज्ञानिक हिन्दू

वैज्ञानिक हिन्दू और वैदिक हिन्दू में फर्क़ करना पड़ेगा ।

अम्बेडकरी हिन्दू

अब देश का और क्षरण रोकने के लिए अम्बेडकरी हिन्दू को चाहिए कि वह हिंदुत्व को मनुवादी, सनातनी, पाखंडी, पोंगापंथी हिंदुओं से छीनकर भारत के हिंदुत्व पर कब्ज़ा कर लें ।
मुश्किल नहीं है । मन बनाने की बात है । मैदान यह कह कर छोड़ना नहीं है कि हम हिन्दू नहीं हैं , तब तो वह और शेर हो जायेंगे । कहना होगा कि हम नास्तिक, प्रगतिशील, सेकुलर, बौद्धिक, विचारशील, अभी तक के पिछड़े दलित ही असली हिन्दू हैं । तुमने तो बदनाम किया देश की संस्कृति को । यकीनन यह धार्मिक आंदोलन होगा, आम्बेडकर के आगे, उन्हीं के रास्ते, आत्मसम्मान हेतु ।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

प्रेमी

धोखे खाकर भी जो
प्रेम रखे जारी,
तब तो वह प्रेमी
अन्यथा व्यापारी ।

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अकेला

कोई आदमी अकेला नहीं होता । जिसे आप अकेला देख रहे हैं, उसके निकट कोई बहुत विश्वसनीय साथी बगल में अदृश्य बैठा होता है ।

निराशा

मुझे लगता है, मुझे वर्ग संघर्ष और सर्वहारा की तानाशाही की उम्मीद छोड़नी पड़ेगी । क्योंकि दलित जातियाँ अपनी अस्मिताएँ त्यागकर वामपंथ का वर्ग बनने को तैयार नहीं, और कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी परिभाषा झुकाकर दलित को वर्ग मानने को उत्सुक नहीं !

अनुशासन

कई बातें, अच्छी तरह मालूम होने के बावजूद खुलकर नहीं कही जा पातीं । खुलकर कही भी नहीं जानी चाहिए ।

बुधवार, 31 जनवरी 2018

कार्ल मार्क्स

मानव धर्म
मानव धर्म के संस्थापक बाबा कार्ल मार्क्स थे ।
ऐसा मैं कह रहा हूँ । आप आज़ाद हैं कुछ और कहने के लिए । आप कहिये - मानव धर्म के संस्थापक गाँधी/ विवेकानंद/ फुले आम्बेडकर/ बुद्ध ईसा / थे । लेकिन अपने धर्म को एक स्वर से मानव, और सिर्फ मानव बोलिये, बताइये । भाषा और शब्द अलग हो सकते हैं - इंसान, आदमी, Human, मनुष्य ! लेकिन शब्दार्थ एक होना चाहिए । धार्मिक स्वतंत्रता हो पर मनुष्यता बंटने न पाए ।
--  --  एक और विकल्प हो सकता है । यदि आपको हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई होने पर ही गर्व हो , तो कोई बात नहीं । पलने दीजिये उस गर्भ को । बस उसके संस्थापक का नाम कार्ल मार्क्स जानिए । वह हर जगह चलेगा, उसे हर जगह इस्तेमाल कीजिये । वैज्ञानिक युग का वह प्रतिनिधि दार्शनिक राजनेता है ।
-- और आगे चलिए । यदि आपको अपनी जाति में भी पड़ा रहना है, तब भी है न यह कल्लू मरकवा ! इसी को अपनी जाति का Icon आइकॉन पुरुष मान लीजिए । किस्सा खत्म, झगड़ा खत्म । इसी को वर्ग संघर्ष के अंतिम चरण में वाया समाजवाद, साम्यवाद की स्थापना कहते हैं । न रहेगा राज्य, न धर्म, न जाति, न देश और न फटहे बाँस की बाँसुरी !

दुर्गापूजा

क्या विडम्बना है ! बंगाल की दुर्गापूजा भी कम्युनिस्टों की बदनामी का बायस बन गया है ।

इतिहास

इतिहास पर कभी भरोसा न करो । सब झूठ होता है, सिवा साल दिन दिनाँक के ।

वामपंथी दड़बा

कम्युनिस्टों ने अपने लिए ऐसा कोटर, एक दड़बा बना लिया है कि उन्हें कोई तवज्जो नहीं देता । वह कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं कोई पूछता ही नहीं । इनका नाम दो दिशाओं से कभी कभी समाचारों में आ जाता है । एक तो जब माओवादी कोई लाश गिराते हैं । दूसरे प्रगतिशील वामपंथी जब किताबें लिखते हैं, सहित्यचर्चा करते हैं । और इन दोनों कामों से कुछ हासिल नहीं होता, सिवा "रोना धोना" के ।
(निराला कोपदृष्टि)

तिरंगा

क्या अब समय नहीं आ गया है कि इनके हाथ से तिरंगा छीन लिया जाय ? इनके हाथों नहीं संभल रहा है इसकी जिम्मेदारी, भावना और गरिमा का भार !
चर्चिल ने कहा था वह मैं नहीं कह रहा । मेरा कहना है जनता और युवा को इससे खेलने न दिया जाय । इन्हें अधिकार ही न हो इसे लेकर Flag March करने का । इसे केवल शासकीय, राजकीय उपयोग तक सीमित किया जाय जिससे इसका आदर, मान सम्मान सुरक्षित रह सके, बच सके । बंद हो प्लास्टिक का यह कारोबार । कोई जन, जनसमूह, एनजीओ इसका display न करे । सब अपना भगवा, हरा नीला पीला काला लाल झंडा लेकर चलें । तिरंगा लेकर न चलें ।
(निराला कोपदृष्टि)

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

नेता आयोग

यह प्रस्ताव मेरे अजेंडे में है । स्वतंत्र चुनाव आयोग (की तरह या उसी में) "जन प्रतिनिधि वेतन भत्ता एवं चरित्र पंजी समिति" होना चाहिए, जिसकी स्थापना और चुनाव जनता के हाथ में हो ।

आहत

धामिक भावना आहत न की जाय, यह दूसरी बात है । पहली बात यह है कि धार्मिक भावना आहत हो ही क्यों ? यह तो बड़ी उच्च और आदर्श किस्म की चीज़ होती है ? कोई कहता रहे अंट शंट, बकता रहे अंड बंड, आपसे क्या मतलब ? आप बचकर निकल जाइए ।

दलितोवस्की

मैं सवर्ण होकर यदि कम्युनिस्ट हूँ, तो इस शर्त पर कि सत्ता का हक़ दलितों को सौंपा जाय । Marxism दलित को वर्ग नहीं मानता और वर्ग के नाम पर सवर्ण कम्युनिस्ट पार्टियों पर काबिज़ हैं, यह मुझे पसंद नहीं । या फिर यदि शुद्ध कम्युनिस्ट हूँ तो मैं हिन्दू मुसलमान वाला मौजूदा वामपंथी नहीं हूँ । या तो पूरा मार्क्सवादी बनूँ , नहीं तो दलितवादी कम्युनिस्ट होना ही उचित ।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

30 जनवरी का शहीद

भगवान किसी को सन्मति नहीं देता । सन्मति के लिए मनुष्य को वैज्ञानिक चेतना धारण करना चाहिए ।
न ईश्वर, न अल्लाह ! प्रकृति और कुदरत है उसका नाम ।
अलबत्ता, गाँधी जी एक बेहतरीन मनुष्य थे  उनको नमन !