गुरुवार, 15 अगस्त 2019

बीरबल का न्याय

मुझे तो बस चोर की दाढ़ी में तिनका याद आता है । यह एक कहावत बन चुका है । इस युक्ति से बीरबल ने एक चोर की शिनाख्त की थी । तब वह जज भी थे ,वकील भी थे । पीड़ित को उनके पास जाकर केवल यह बताना था कि उसका सामान चोरी गया । आगे की ज़िम्मेदारी बीरबल जी की थी । और उन्होंने उसे निभाया, जिसे दुनिया जानती है ।
न्याय व्यवस्था ऐसी ही होनी चाहिए । अपराध हुआ, न्याय विभाग सूचित हुआ । फिर उसका काम है अपराधी को पकड़ना , उसे सज़ा देना । उसके अधीन पुलिस, CID, खोजी तंत्र और सज़ा का अधिकार, और सबसे बड़ी बात अपराध नियंत्रण और न्याय की पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिए । सरकार से अलग ।
अभी तो क्या है ? सब कुछ पका पकाया, सुबूत, गवाह, अपराधी की खोज, सब पैक करके माननीय न्यायमूर्ति जी के कक्ष में प्रस्तुत करो, तब उन्हें जब फुर्सत मिली तो अभियोजन पक्ष को भी तिखाड़ डाँट डपट कर कोई निर्णय लिख देंगे । नहीं ! पुलिस, जेल, न्याय प्रशासन इनके अधीन होना चाहिए । इन्हें जासूसी करने के लिए, गवाहों के घर जाकर गुप्त तथ्य लेने के लिए बाहर भी निकलना चाहिए, केस के पूरा होने/ करने की ज़िम्मेदारी न्यायाधिकारी की होनी चाहिए ।
(उग्रनाथ नागरिक)

रविवार, 11 अगस्त 2019

जन्मभूमि विद्यालय

जन्मभूमि कन्या विद्यालय
कहते हैं जन्मभूमि है, चलिए मान लिया । तो मस्जिद न बने, चलिए मान लिया । लेकिन तब मंदिर भी न बने, यह भारत के विकास की माँग है । सारी ज़मीन आपकी है तो क्या सब पर मंदिर ही बनेगा ? जी नहीं ! उस जमीन पर विद्यालय बनाइये । कन्या विद्यालय की माँग मान लीजिये । और राम की सच्ची आराधना में लगाइए ।
विद्यालय का नाम अवश्य "जन्मभूमि कन्या विद्यालय" होना चाहिए । (राम शब्द अंतर्निहित, अव्यक्त और सर्वज्ञात है) हो । कन्याओं के लिए वह सुरक्षित, मुक्त, उपयुक्त स्थान है । रामशिलायें कटी बनी रखी हैं । और वही पैसे इसके निर्माण में इस्तेमाल होंगे जो मंदिर के लिये देशवासियों ने प्रदान किये हैं ।👍
अस्तित्व सबको सद्बुद्धि दे !
(मन दुर्वासा )

शनिवार, 10 अगस्त 2019

विरुद्ध

मैंने प्रेम खूब किया, तो प्रेम और प्रेमपात्र नारी जाति का विरोधी हो गया । मैंने पूजा बहुत की, तो पूजा पाठ, ईश्वर के विरुद्ध ही गया । 😢

इस्लाम का प्रसार

आख़िर इस्लाम में ऐसा आकर्षक है ही क्या जो कोई सिर्फ बुलाने से इसे स्वीकार कर लेगा ? एक कबीलाई ईश्वर, किताब, संदेशक के प्रति पूर्ण अन्धविशवास के साथ समर्पण ? जब मूल ही सत्यानाशी है तो आगे क्या बहस ? अब इतना तो मूर्ख समझें नहीं इस्लाम वाले इस्लाम से बची दुनिया को !☺️ और अब एक तुर्रा यह निकला है कि बस हम सुन्नी ही मुसलमान हैं । बाकी शिया,  ताबिश, अशफ़ाक़, आतंकी तो (इसमें यौन पता नहीं कहाँ से घुसा दिया गया फ्रायड की कृपा से) यौन कुंठित हैं । तो हो गया न इस्लाम पाक और साफ ? किसकी आलोचना करेंगे ?
लेकिन तब भी कुछ बातें इनकी अस्पष्ट और अनुत्तरित हैं । कितने ही बड़े विज्ञान शिक्षित हों (कलाम साहब भी शंकराचार्य के चरण में बैठे), तमाम मूर्धन्य विज्ञान वेत्ताओं (Armed chaired हॉकिन्स समेत) की बात मानने को यह कदापि तैयार नहीं, इनके दिमाग में ही नहीं घुसता childhood conditioning की वजह से, कि कोई ईश्वर कहीं नहीं है । केवल nature है जिसका exploration विज्ञान के जिम्मे है, ख्याली खिलंदड़ जन इसके लिए भरीसेमंद नहीं ।
दूसरा यह कि अपनी अज्ञानता और अंधविश्वासों को बचाने, रक्षा करने में इतने जी जान से जुट क्यों जाते हैं ? हम तो जिस किसी भी धर्म सम्प्रदाय के हैं, उसकी तो खटिया खड़ी कर देते हैं, खूब आलोचना करते हैं और विद्रोह भी ! इनके यहाँ क्यों नहीं होता, न किसी को करने दिया जाता है ? यहाँ तो धार्मिक तरक्की का परिणाम यह होता है कि कोई वहाबी खित्ता बन जाता है, कोई जैशे मोहम्मद, और तमाम आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर इस्लाम के नक्शेकदम पर, दावे के साथ । नतीजा , जो अच्छे भले नैतिक रूप से मुस्लिम बचते हैं उनकी शामत आ जाती है, और वह दुबक जाते हैं । वह भी मारे डर के कहने लगते हैं जी जी हाँ, इस्लाम बड़ा ही प्रेमी, भाईचारा वाला जीव है, तलवार का बली नहीं 😢! ऐसे ही नहीं इतनी बड़ी एरिया पर इतने सदी से राजगद्दी नशीन है ? क्या भला तलवारी ताक़त पर यह सम्भव है ? सही है, तस्लीमा ,रुश्दी तो इसलिए भागे भागे फिरते हैं कि कोई उन्हें गले लगाकर चुम्मा न ले ले ☺️! अन्यथा उन्हें कोई डर नहीं ।
औऱ यह इनकी समझ तो तब है जब कि देख रहे हैं कि पूरी दुनिया इन्हें हिकारत की नज़र देखती है। अपनी लोकतांत्रिक मानववादी सेकुलर चरित्र के कारण इन्हें सब, हर ज़मीन आसमान वाले बर्दाश्त कर रहे हैं तो इसलिए की वे सभ्य हैं और तलवार में यकीन नहीं रखते । लेकिन सच यह है कि इनकी कोई इज़्ज़त नहीं करता, न कोई इसे महान समझता है ( किसी गांधी की पैदाइश यहाँ नामुमकिन है)। Unacceptance, अग्राह्यता इसलिए भी है क्योंकि यह दार्शनिक और वैज्ञानिक विचार धारा नहीं है । यहाँ असहमति की गुंजाइश नहीं है, जो कि लोकतन्त्र की पहली शर्त है । इनका विश्वास लोकतन्त्र या आधुनिक समाजवादी साम्यवादी व्यवस्था पर नहीं है, निज़ामे मुस्तफ़ा पर है ।
अलबत्ता, तिस पर भी, इनका दावा गलत नहीं कि इस्लाम पूरी दुनिया पर राज करेगा । कारण उन्हें तो पता है ही, दुनिया को भी पता है कि यह धर्म (नीति कर्तव्य) का tentative ख़ाका नहीं, एक मजबूत , सुदृढ़-सशक्त फ़ौज़वादी मजहब है , अपने में सम्पूर्ण राजनीति अपनी समस्त कलाओं में (अंतर्निहित,अकथनीय) प्रवीण,संलग्न और हर तरह से जुटे हैं । बुला लाएंगे (आओ फलाने भाई इन नीच आधुनिक मानव वादियों से मिलो) ! तो भला कैसे जीत पाएँगे इनसे और जीतना ही ही क्यों ? इनके साधारण सदस्य से भी बात करना असम्भव है, धर्मगुरू तो भूल जाइए । संवाद अव्यवहारिक है, अनावश्यक भी । यह किसी की बात न सुन ही नहीं सकते तो मानेंगे कैसे ? सिवा एक permanent, अपरिवर्तनीय directive, दिशा निर्देश के । इनकी भी मजबूरी है, उससे इतर और परे जाना तो दूर, सोचना भी गुनाह है, जिसकी कड़ी सज़ा मुकर्रर है ।😢और मान लेने पर पुरस्कार की लालच तो आप जानते हैं वह बहत्तर वाली ! 😊
अभी अभी, बिल्कुल यहीं एक idea उभरा है । यह क्षमा के योग्य हैं (भले ईसाइयत की तरह "प्रार्थी" नहीं) । तनिक इनकी निष्ठा गौर से देखिये , यह भला किसी को क्या डराएंगे, धमकाएँगे या मारेंगे ? ये तो खुद डरे हुए हैं व्यक्तिगत रूप से । इनके विश्वासों ने खुद इन्हें इतना दबा, डरा, और मार रखा है कि इनकी तार्किक चेतना बिल्कुल समाप्त हो चुकी है, कुछ हैभ तो उसी दायरे में । मुसल्लम ईमान ने इनकी जगह बहुत थोड़ी ही छोड़ी है तो यह क्या करें ? जो बताया गया वह कर रहे हैं । फेसबुक पर भी गुर्रा तो रहे हैं । अभी और यहाँ गरजेंगे । लेकिन इनके बादल में आधुनिक और भावी मानव समाज पर बरसने, उसे शीतल करने के लिए कोई "पानी" नहीं है ।😢

वोटर पार्टी

यह डिमॉक्रेसी, यह चुनाव बड़े लोगों का खेल है । साधारण आदमी चुनाव लड़ ही नहीं सकता तो किस बात की डिमॉक्रेसी ? बन्द होना चाहिए,यह नाटक, यह तमाशा । हम वोटर पार्टी बनाने जा रहे हैं । हम इन्हें चुनाव नहीं लड़ने देंगे । इनका बहिष्कार करेंगे । आगे देखा जायेगा ।

रविवार, 4 अगस्त 2019

धिक्कार पुरस्कार

मैग्सेसे अवार्ड तो ठीक । लेकिन इसका महत्व तब तक चटक नहीं होता जब तक इसके विपरीत कोई धिक्कार पुरस्कार या "मारो ठांय ठांय" पुरस्कार नहीं कायम होता । जो अनैतिक नीति योग के तलुए चाट रहे हैं, उन्हें मिलना चाहिए यह असम्मान ।
आज एक अखबार का सम्पादकीय विपक्ष को दायित्वबोध करा रहा था । इसी बहाने सत्ता की चापलूसी ! उसको तो ज़िम्मेदारी बताने की हिम्मत नहीं है । होगा कोई - - रामजादा !
एक तो यह फैशन चल गया है कि

"क़द तो है पिद्दी भर और फोटो आदमक़द"!

संपादकीय बनाने का यह कौन सा तरीका है ? अच्छा हो कुछ दिन बाद सम्पादकीय के विकल्प में केवल तस्वीरें छापी जायँ । कभी मोदी कभी शाह सावरकर, गुरु गोलवलकर के साथ संपादक की सेल्फी, फोटोशॉप या कोलाज ! अच्छा रहेगा । हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान ज़िन्दाबाद (अरे नहीं, अमर रहे !) ☺️😊😢👍👌💐

रविवार, 28 जुलाई 2019

Urban Naxal Party

अन - UN - Urban Naxal Party
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नाम साभार भारतीय जनता पार्टी
हमें कुछ नहीं करना है । बस उनके हुक्म की तामील कर देनी है, आदेश का पालन कर देना है ।
Urban Naxal Party अर्बन नक्सल पार्टी should be formed. Without delay.
और देर हो ही किस बात की ? सब उन्होंने बना बनाया, पका पकाया दे दिया है, या रेसिपी बता दिया है । सब प्रचारित कर दिया है UN कौन होते हैं, क्या करते हैं, उनकी नीति क्या है ?
फिर तो केवल पार्टी की घोषणा कर देनी है और चुनाव की राजनीति में उतर, कूद पड़ना है ।
Urban means शहरी (उर्दू- सभ्य) अर्थात "नागरिक" (हिंदी) -- Citizen ( अँग्रेज़ी)
और यह citizen होती है वस्तुतः समझदार, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी चरित्र की जनता !
तो सचमुच वही तो हैं हम । भाजपा को धन्यवाद कि उन्होंने हमारा चरित्र तो देश को बता दिया ! अब उनके स्वप्न को हमें पूरा करना। है ।
(उग्रनाथ नागरिक)

नागरिक दर्शन

Philosophy दर्शन
Scientific Civilism
वैज्ञानिक नागरिकतावाद
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धर्म और राजनीति, वैज्ञानिक समाजवाद तथा
व्यक्तिमत्ता वाद (Individualism) का मिश्रण ।
Conbination of Scientific Socialism and Individualism
- - - - - - - - - - -  - - - - by :-  Ugranath "Nagrik"
                                Lucknow, 30 July 2019
उग्रनाथ नागरिक
लखनऊ
30 जुलाई 2019

Urban Naxal Party

https://m.facebook.com/groups/326674084040226?view=permalink&id=3074684852572455&sfnsn=mo

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

तुलसी रामायण

इसीलिये मैंने प्रस्ताव रखा है कि मनु के बजाय तुलसीदास को निशाने पर लिया । वह ज़्यादा लोकव्याप्त हैं और समाज को कलुषित करते हैं । उनकी रामायण घर घर में । अखंड रामायण आयोजन मुहल्ले मुहल्ले में । उसकी चौपाइयाँ मनुवाद ब्राह्मणवाद की असली वाहक ।मनु को तो कोई नहीं जानता । मनुस्मृति किसी के घर नहीं मिलेगा, न कहीं उसका पाठ आयोजित ।

सोमवार, 22 जुलाई 2019

अहंकार स मुक्ति

हमारे नास्तिक मित्रों के बीच अध्यात्म कुछ अरुचिकर विषय है, ऐसा कुछ मुझे उनके साथ बातचीत से लगा ।।
मैं भी कोई पारलौकिक पौराणिक आध्यात्मिक नहीं हूँ । लेकिन जीवन में इसकी उपयोगिता का स्वयंसेवी हूँ । बात ज़्यादा बढ़ाएँ नहीं, तो अपनी सम्पूर्ण हार्दिक और मानसिक शक्तियों द्वारा अपने अहंकार से लड़ना, उससे मुक्त होने को मैं अध्यात्म कहता हूँ । क्योंकि और कोई मेकेनिकल तरीका तो है नहीं उसे दूर भगाने का ? और इस गुण से तो दुनिया बदली बदली, और अपनी मुट्ठी में आई लगती है । शायद मार्क्सवाद में भी इसकी नकार नहीं है ।

रविवार, 21 जुलाई 2019

आह नहीं, चाह !

गच्चा खा गए न बाबा ?
वह और देशों की बात थी ।
धर्म भारत की चाह है, आह नहीं !

शुक्रवार, 19 जुलाई 2019

दावत कुबूल

Religion की दावत क़ुबूल करना उसकी Political Ideology को भी स्वीकार करना है । याद करें, पूज्य मोहम्मद sb Swa ने तमाम बादशाहों को इस्लाम कुबूल करने की दावत ही भेजी थी । सबने स्वीकार की । और आज देखिये इसकी सियासी ताक़त ! 👍

सहज साम्यवाद

असलियत यह है कि सामान्य संवेदनशील, समझदार हर व्यक्ति स्वाभाविक कम्युनिस्ट होता है । वह कहे भले नहीं, या इस गुण को इस वाद के नाम से न पुकार पाए । लेकिन वह प्रकृतितः शोषक हो ही नहीं सकता । वह जानता है साझा जीवन कैसे मिलजुल, मिलबाँट कर जिया जाय । इतना कठिन नहीं है समाजवाद । मार्क्स ने भी शायद इस शीर्षक से किताब लिखी - 'दर्शन कोई कठिन विषय नहीं' ! "शायद" जोड़ दिया है सुरक्षा के लिए । कोई अंतर हो किताब के नाम में तो मार्क्सवादी मित्र कृपया ठीक कर दें , मुझे लताड़ न दें !😢

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

कौवा हंकनी

माँ कौवा हँकनी, बाप !
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मेरे विचार से जो युवा अपने निर्णय लेने में समर्थ होते हैं वह ऐसी उद्घोषणा नहीं करते कि देखो मैं यह करने जा रहा हूँ और किसी साले बाप दादे से सलाह नहीं ली । समर्थ युवा बताते हैं कि मैंने घर वालों को विश्वास में के लिया है, जो सदस्य असहमत थे उन्हें विनम्रता पूर्वक अपना निर्णय बता दिया है । हेंकड़ी और बकैती नहीं दिखाते, यदि उनकी परवरिश ठीक हुई है तो ।

एक और महीन बात यहीं बता दें (इसीलिए पोस्ट लिख रहा हूँ) । यदि गौर करें तो माँ बाप शील्ड, बचाव का काम करते हैं (यह तो दकियानूसी कथन है)। लेकिन आधुनिक भी व्यवहारिक विचार यह है कि वह बचाव के किये तो इस्तेमाल किये ही जा सकते हैं । एक समस्या रखता हूँ (मैं हमेशा मित्रों से सिद्धातों को Numerical द्वारा जांचने का आग्रह करता हूँ, न कि हवाई हाँकने का)। मान लीजिए लड़की किसी से पिंड छुड़ाना चाहती है तो कह सकती है कि मेरी माँ नाराज़ होगी /मेरे घर वालों की यह पसन्द नहीं/मेरे पिता बहुत सख्त हैं,मुझे मार डालेंगे (सब बिल्कुल झूठ लेकिन)यह अस्त्र बच्चों के जीवन नाटक में बहुत काम आएगा । स्वतंत्र,स्वच्छंद हों, पर प्रदर्शित करें कि बहुत बंधन दबाव में हूँ । वरना आप देख लीजिये , देखते ही होंगे इस झूठे, चालबाज, धोखेबाज दुनिया वह निश्चय ही शोषण का शिकार होंगी । बच नहीं पाएंगी गिद्धों से । गिद्ध कौवों को डर दिखाना होगा कि माँ बाप एक छड़ी लेकर बैठे हैं , तुम मुझे चोंच न मार पाओगे । सही है , माँ बाप की भूमिका बस कौवा हाँकने भर की है । उनका उपयोग करने के लिए उनसे दुआ सलाम बनाये रखो । 👍

बाप पर कुछ आरोप तो लग भी सकता है, माँ बेचारी तो वैसे ही निरीह प्राणी है । (उसके अधिकार की कोई बात नहीं करता, न नारीवादी न नारावादी) । यही देखिये, पूरे साक्षी प्रकरण में उसकी माँ की जुबान खुलने की खबर नहीं आयी । जब कि उसी तरह की माँ साक्षी को या किसी भी लडक़ी को भी बनना है ! तो युवा लड़की को समस्त अधिकार है, वृद्ध माँ को कुछ भी नहीं ? यह आधुनिकता का न्याय है ।

मजदूर

हम सब मजदूर ! दुनिया के मजदूरों एक हो ! 👌
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मैं राजनीति में मार्क्सवाद का समर्थक हूँ, कुछ अकारण कुछ सकारण !
और धर्म को व्यक्तिगत अध्यात्म तक सीमित रखता हूँ । हिंदू मुस्लिम नामकरण से ही चिढ़ है मुझको ।
लेकिन यह जो देश हिंदुस्तान है न, वह आपसे कोई धर्म बताने को कहता है । धर्म के बिना यहाँ हवा नहीं चलती ।
ऐसी दशा में मैं कम्युनिस्टों को धार्मिक बनाना चाहता हूँ । मजदूर बन जायँ/बताएँ अपना धर्म सब । मजदूरी है कर्तव्य हम सबका । पेट पालने के लिए जो कर्तव्य हम धारण करते हैं, वही हमारा धर्म है । वह है मजदूरी । क्या नहीं ? 👍
(उग्रनाथ)

बुधवार, 17 जुलाई 2019

मजदूर

।। एक मजदूर का धर्म और कर्म।।
वैसे तो मजदूर कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति, समाज या राज्य का हो। एक मजदूर इन सभी के बंधनों से मुक्त होता है।
चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, ईसाई हो, दलित हो, सवर्ण हो, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक हो सभी ने कभी न कभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरी किया होगा। मजदूरी करने के लिए किसी विशेष जाति या मजहब, समाज या समुदाय को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती, एक मजदूर के लिए कर्म ही प्रधान होता है। निरंतर कर्म करते रहना ही एक मजदूर का परम कर्तव्य होता है, परंतु अक्सर यह देखा गया है कि निरंतरता हमेशा बनी नहीं रहती।
एक मजदूर अक्सर जाति- पांति, वर्तमान में व्याप्त तथाकथित धर्मों, वैचारिक, सामाजिक व आर्थिक असमानता के कारण अपने पथ से विमुख हो कर राजशाही के विषैले कुएं में डूब जाता है।
और इसका मुख्य कारण है कि मजदूर का कोई संवैधानिक, सर्वव्यापी धर्म के आस्तित्व का ना होना। यदि मजदूरों का भी कोई व्यापक धर्म होता और उस धर्म का पालन करने के लिए विशेष विचारधारा होती तो कोई मजदूर कभी पथभ्रष्ट नहीं होता और निरंतरता हमेशा बनी रहती।
आवश्यकता है एक ऐसी विचारधारा की जो व्यक्ति को मजदूर बनाए रखे और एक पहचान की जिससे कि विचारधारा को लागू किया जा सके। पहचान को बनाए रखने के लिए ही आज इतने धर्म आस्तित्व में आये हैं, या समझ लीजिए कि पहचान को बनाए रखने के लिए जो विधि कार्य करती है उसी को धर्म कहा जाता है।
    तो क्यों ना एक ऐसा सर्वव्यापी धर्म हो जिससे कि कर्म प्रधान व्यक्तियों का आस्तित्व कायम रह सके? क्यों ना एक एक नए धर्म को आस्तित्व में लाया जाये जिसे मजदूरों के धर्म की संज्ञा दी जा सके और एक पहचान मिल सके?

मजदूर आंदोलन

।। एक मजदूर का धर्म और कर्म।।
वैसे तो मजदूर कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति, समाज या राज्य का हो। एक मजदूर इन सभी के बंधनों से मुक्त होता है।
चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, ईसाई हो, दलित हो, सवर्ण हो, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक हो सभी ने कभी न कभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरी किया होगा। मजदूरी करने के लिए किसी विशेष जाति या मजहब, समाज या समुदाय को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती, एक मजदूर के लिए कर्म ही प्रधान होता है। निरंतर कर्म करते रहना ही एक मजदूर का परम कर्तव्य होता है, परंतु अक्सर यह देखा गया है कि निरंतरता हमेशा बनी नहीं रहती।
एक मजदूर अक्सर जाति- पांति, वर्तमान में व्याप्त तथाकथित धर्मों, वैचारिक, सामाजिक व आर्थिक असमानता के कारण अपने पथ से विमुख हो कर राजशाही के विषैले कुएं में डूब जाता है।
और इसका मुख्य कारण है कि मजदूर का कोई संवैधानिक, सर्वव्यापी धर्म के आस्तित्व का ना होना। यदि मजदूरों का भी कोई व्यापक धर्म होता और उस धर्म का पालन करने के लिए विशेष विचारधारा होती तो कोई मजदूर कभी पथभ्रष्ट नहीं होता और निरंतरता हमेशा बनी रहती।
आवश्यकता है एक ऐसी विचारधारा की जो व्यक्ति को मजदूर बनाए रखे और एक पहचान की जिससे कि विचारधारा को लागू किया जा सके। पहचान को बनाए रखने के लिए ही आज इतने धर्म आस्तित्व में आये हैं, या समझ लीजिए कि पहचान को बनाए रखने के लिए जो विधि कार्य करती है उसी को धर्म कहा जाता है।
    तो क्यों ना एक ऐसा सर्वव्यापी धर्म हो जिससे कि कर्म प्रधान व्यक्तियों का आस्तित्व कायम रह सके? क्यों ना एक एक नए धर्म को आस्तित्व में लाया जाये जिसे मजदूरों के धर्म की संज्ञा दी जा सके और एक पहचान मिल सके?

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

धर्म से निपटें

अब यह समस्या नहीं है कि धर्म को समझा कैसे जाय ।
अब तो समस्या यह है कि इनसे निपटा कैसे जाय ?

समस्या

अब यह समस्या नहीं है कि धर्म को समझा कैसे जाय ।
अब तो समस्या यह है कि इनसे निपटा कैसे जाय ?

शनिवार, 26 जनवरी 2019

बताया गया

आप जानते हैं आप आस्तिक क्यों हैं?  ईश्वर को क्यों मानते हैं, उसकी पूजा आरती करते हैं?
क्योंकि आपको यही बताया गया है कि कोई ईश्वर है जिसने दुनिया बनाई, वह बहुत ताक़तवर है, वह उपासना से खुश होता है । वह आपको कुछ भी सामान वरदान दे सकता है । और यह भी कि आपके, दुनिया के कष्ट निवारण के लिए वह अवतार लेता है/ लेगा ।
मेरे भाई, यह आपको बिल्कुल गलत और सरासर झूठ बताया गया , जिस पर आप विश्वास करते हो ।
ज्ञान विज्ञान के आदेश पर अब हम आपको बताते हैं कि कहीं कोई ईश्वर, इस सृष्टि का कोई व्यक्ति-निर्माता नहीं है । इसके पूजा पाठ से कोई फायदा नहीं है । जो भी होगा आपके कर्मों से होगा ।
अतः आज ही से किसी पारलौकिक शक्ति पर विश्वास और भरोसा मत करो ।

क़ैद ईश्वर

कविता
--  --  --  -- 
मनुष्य शिखर पर
ईश्वर मंदिर में पड़ा
सोचता है -
मनुष्य से कैसे मिलूँ ?
* * * * *
(उग्रनाथ नागरिक)

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

आज़ाद औरतें

कविता
--  --  -- 
वह सती होती थीं
अपनी इच्छानुसार
अपने पति के प्रेमवश ।
वह नक़ाब पहनती हैं
अपनी पसंद से
किसी के कहने
किसी के दबाव में नहीं ।
वह शादी करती हैं
विवाह क़ुबूल करती हैं
अपनी पूरी सहमति के साथ ।
वह रसोई में जल जाती हैं
अपनी असावधानी से
कोई उन्हें जलाता नहीं ।
यहाँ तक कि वह
बलात्कार को बुलाने
आमंत्रण देने
देर रात सफ़र करती
घर से निकलतीं
आती जाती हैं
सब अपने मन से ।
हमारी स्त्रियाँ पूरी स्वतंत्र हैं
आत्मनिर्भर, स्वावलंबी ।
क्या आपको अब भी
बात समझ नहीं आती ?
--  --  -- 
-- उग्रनाथ नागरिक

बुधवार, 16 जनवरी 2019

क्या तीर

ईश्वर नहीं है, तो हमने नहीं माना । इसमें कौन सा तीर मार लिया हमने ?
ईश्वर होता और हम न मानते तब आप हमारी पीठ थपथपाते !

मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अति

अति सर्वत्र वर्जयेत नहीं होना चाहिए ।
अतिचिन्तन से अधिक ज्ञान और बड़े निष्कर्ष प्राप्त होते हैं ।

रविवार, 13 जनवरी 2019

शनिवार, 12 जनवरी 2019

बुधवार, 9 जनवरी 2019

ताक़त

ज़मीन पर
पैर रख पाऊँ तो
ताक़त पाऊँ ।

अविष्कार ?

ईश्वर भी मनुष्य का एक आविष्कार है?
हाँ अवश्य ! शायद इसीलिए हमें अपने आविष्कार के साथ जीना सीखना चाहिए, कलात्मक/साहित्यिक तरीके से । वह अब ऊपर नहीं, इसी दुनिया का नागरिक हो गया है । मानव संसाधन के रूप में उसका सदुपयोग किया जाना चाहिए और एक दुश्मन मानकर उसके हाथों खिलौना बनने से बचना चाहिए ।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

शादी

शादी है तो वह अरेन्ज्ड ही होगी ।
प्यार में कोई arangement नहीं होता ।

दुःखद स्थिति

क्या तो नज़ारा हो गया है देश का ! धर्मनिरपेक्षता के तहत धर्म से दूर रहने, दूरी बनाने की जगह अब सरकार स्वयं पूजा करने बैठ गयी है । 😢

विकल्प

सरकार की आलोचना कर देने मात्र से उसका विकल्प तैयार नहीं हो जाता ।

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

अपनापन

अपनापन
कितना भी दुत्कारो
(भले ही दूर रहो)
बना रहेगा ।

शिक्षा

शिक्षा का केवल मतलब होना चाहिए विज्ञान की शिक्षा- समाजविज्ञान की शिक्षा, भौतिक विज्ञान की शिक्षा- वैज्ञानिक भौतिकवाद की शिक्षा ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

रविवार, 16 दिसंबर 2018

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

शोषण के खिलाफ़

मैं यह कहना चाह रहा था कि अगर ईश्वर और धर्म शोषण के औजार हैं तो  कम्युनिस्ट जन ईश्वर और धर्म का खुला विरोध क्यों नहीं करते ? केवल पूँजीवाद ही उनकी ज़ुबान पर क्यों रहे ?

अविशिष्ट

निश्चित ही हर व्यक्ति विशिष्ट है ।
लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति अपनी विशिष्टता का प्रदर्शन, दावा, हक़दारी करने लगता है, वह अशिष्ट हो जाता है ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

तीसरा आदमी

इस देश में केवल हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई रहते हैं । यही चार भाई इस देश के उत्तराधिकारी हैं, तभी तो केवल इन्ही में भाई चारा रखने के प्रयास होते हैं, गीत गाये जाते हैं ।
बल्कि इनमें भी केवल दो, हिन्दू और मुस्लिम ही प्रभावी रूप से सक्रिय हैं । कभी प्रेम से रहते कभी लड़ झगड़ लेते हैं ।
इनके अतिरिक्त कोई जनसंख्या भारत में नहीं है । होगी भी तो दिखती नहीं है । वैज्ञानिक विचारधारा वाले मानववादी, नास्तिक, धर्म-सम्प्रदाय, जाति विहीन तबका तो कहीं दिखता नहीं । और एक कम्युनिस्ट नामक अधर्मी समूह की समाज में कोई छाप दिखती नहीं है ।
परिणाम, यही दो सम्प्रदाय देश को चला रहे हैं और ले जा रहे हैं देश को हिंद महासागर की ओर ।
बात लग गयी न ? लेकिन बताइये, कोई तीसरा पक्ष होता तो एक Common Civil Code के लिए अड़ न जाता ? क्या किसी ने दावा ठोंका कि रहा होगा चप्पे चप्पे पर कभी मंदिर मस्जिद अब कानून बनाकर अयोध्या में विद्यालय बनाओ ? इस ज्वलंत मुद्दे पर दो ही फ़रीक कोर्ट में भी लड़ रहे हैं और ज़मीन पर भी संघर्षरत ।
क्या किसी धार्मिक-अधार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक समूह ने यह कहने की हिम्मत की कि कश्मीर को आज़ाद करने के विकल्प पर भी विचार किया जाना चाहिए ?
जी नहीं, कोई नहीं है ।