बुधवार, 27 मई 2020

जीवन प्रपत्र

अलबत्ता मेरे प्रगतिशील, बुद्धिवादी लोग मुझसे नाराज़ हो जाते हैं, लेकिन मैं अपनी बात कहने से तो बाज़ आऊँगा नही । 
बात यह है कि हमें जीवन के किसी भी क्षेत्र Column को खाली नहीं छोड़ना चाहिए, भले उसमें Nota या N/A, not applicable ही लिखें , लेकिन कुछ दर्ज ज़रूर करें जितनी बुद्धि कहे, जानकारी हो । ऐसा नहीं करेंगे तो  हमारे जीवन का प्रपत्र, Form या Progress Report अधूरा रह जायेगा जो  प्रकृति को acceptible, मान्य न होगा । आप फेल हो जायेंगे।
अब वह क्षेत्र चाहे अपने नाम, पिता का नाम, निवासी, राष्ट्रीयता का हो या फिर आगे जाति धर्म संस्कृति,सम्प्रदाय, राजनीतिक विचारधारा का हो, और इनसे जुड़े तमाम प्रश्न ! अतिरिक्त भी कोई क्षेत्र सड़क बाग जंगल की झाड़ियों से निकाल पकड़कर उस पर अपनी बौद्धिक टाँग लगा देनी चाहिए, जो उचित लगे ।
यदि ऐसा न किया गया, और आपने कोई Field छोड़ दिया, तो उस पर काला कौआ, पैने चोंच वाले गिद्ध, नहीं तो छिपकली, चमगादड़, साँप बिच्छू कॉकरोच ही । और तब आप इनके वहाँ होने का परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिएगा । राजनीति ही नहीं, विज्ञान, अध्यात्म, धर्म देश सबके साथ यही हो रहा है क्योंकि हमने उन्हें उनके भरोसे छोड़ रखा है । अध्यात्म पाखण्ड है, धर्म की क्या ज़रूरत ? जाति कहाँ बची है , और फिर यह भी कि हम तो राजनीति से दूर हैं, बड़ी गंदी जगह है, दूर ही रहेंगे ।

बहरहाल आप विशिष्ट हों तो हों, यह सामान्य मनुष्य की संचेतना है ।👍
(उग्रनाथ)

सोमवार, 18 मई 2020

सड़क पर शूद्र

ये जो सड़क पर आ रहे हैं, सारे के सारे शूद्र हैं, भले उनमें कुछ जन्मना कथित ब्राह्मण जाति के हों । लेकिन जो कमाकर खाता है वह शूद्र है । ब्राह्मण तो बैठे ठाले दूसरे के श्रम पर खाता है । 
दूसरी ओर सत्त्ता पर ब्राह्मण शोषक विराजमान है । सत्ता सदैव ब्राह्मण कही जायगी क्योंकि वह शोषक है और सम्प्रति तो अत्याचारी भी । 
तो बंटवारा ब्राह्मण और शूद्र के बीच है । कब तक हम ब्राह्मण को पूँजीवादी, सामंतवादी, बुर्ज़ुआ, फासिस्ट आदि तमाम नामों से नवाज़ते और जनता को अस्पष्टतः भ्रमित करते रहेंगे, जबकि वह ब्राह्मण शब्द को समूल आसानी से समझ और आत्मसात कर लेता है ? जनता के बीच जनता की भाषा के साथ नहीं जाना क्या हमें कम्युनिस्टों की तरह ?
दूसरी ओर कम्युनिस्टों की तरह ही हम कब तक इंतजार करेंगे कि ये सड़क के लोग वर्गचेतना से लैस हों, मार्क्सवाद में प्रवीण हों तब हम क्रांति करेंगे ? अथवा हम कब तक इनसे इंतज़ार करेंगे कि ये अम्बेडकरवादी बनें और जय भीम का नाद करें ? अथवा ये बौद्ध धम्म ग्रहण करें , नमो बुद्धाय का उद्घोष करें तब दलित राजनीति सफल हो ? नहीं, दलित सवर्ण कुछ नहीं । ये दोनो ही जन्मना पहचानें हैं, जो सही नहीं है और हम जाति धर्म विरोधियों को स्वीकार भी नहीं होना चाहिए । विभाजन केवल ब्राह्मण (शोषक) और शूद्र (शोषित) में है, वह भी देसी शब्दावली में । गौर करें तो इस विचार में मार्क्सवाद और अंबेडकर वाद सम्मानजनक रूप में समाहित है, कहीं कोई खोट या कमी नहीं, यदि कोई वादी अपने वाद को जड़ता से पकड़े बैठा न हो ? 
तो सारे श्रमिक शूद्र हैं और सारी सत्ता ब्राह्मण । द्वंद्व केवल इन दोनों के बीच होना चाहिए, न कि जाति धर्म सम्प्रदाय के नाम पर ।
(श्रावस्ती सम्यक/suggestion)

चकमक

चकमक पत्थर रगड़ते रगड़ते आख़िर तो चिंगारी निकली । धीरे धीरे आग फैलाता रहूँगा ।
श्रावस्ती सम्यक(suggestion)
For - शूद्र सरकार

दडाकू

मारकर सामान लूटने वालों को भारत की भाषा में डाकू कहते हैं, जिसे साधारणतः नागरिकऔर जनता पसन्द नहीं करती । हम लूटी हुई वस्तुओं का उपयोग करना उचित नहीं समझते ।।इसके विपरीत हम अपनी जनता जनार्दन मालिक से उसकी सहमति से सत्ता का काम अपने सिर लेंगे और जैसा सदियों से समाज की सेवा करते रहे उसी प्रकार राज्य पर बैठकर सेवा करेंगे । 👍
- - शूद्र सरकार via श्रावस्ती सम्यक (suggestion)

शनिवार, 16 मई 2020

मेरे मित्र

मेरे लिए खुशी की बात है कि मेरी मित्र सूची में तमाम प्रबुद्ध लोग हैं । तमाम क्या, सब के सब।👍😊

लेकिन स्थानीय स्तर पर जो प्रबुद्ध जन हैं वह मेरे बारे में शायद यह जान गए हैं कि यह पागल वाहियात आदमी है और फिज़ूल का विचार नाटक, कदमताल क्रांति और दिमाग़ी खुराफ़ात किया करता है । 😢 इसलिए अब कोई मित्र, विशेषकर युवा मेरी तरफ़ झाँकने नहीं आते । आने को क्या फोन तक नहीं करते 😢। बस बूढ़े मित्र ज़रूर कभी हाल चाल पूछ लेते हैं । सबका शुक्रिया !💐
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- -  उग्रनाथ, (श्रावस्ती तीर्थ यात्रा में) @ शूद्र सरकार

अकेला

मैं भी बिल्कुल बिजूका हूँ । अजीब आदमी । मैं Individualism का समर्थक हूँ , व्यक्तिजन वाद, एकलव्य वाद का । जिसकी पहली शर्त है व्यक्ति, personal से मुक्त हो जाना । है न उल्टी बात ? तो इसे लोग कैसे समझ पाएँ? कह दूँ यह आध्यात्मिक अवस्था है तो गाली पाऊँ क्योंकि अध्यात्म को super natural शक्ति स जोड़ा जाता है और साधु संतों के कर्मों से यह बदनाम है । जब कि मेरा अंतर्मन inner sense इसी दुनिया, इसी शरीर और मन में व्याप्त है ।
कह दूँ प्रज्ञा वान होना व्यक्तिजनवाद है, तो भाई कहते हैं तुम तो गीता के शब्द बोलने लगे । कैसे धोखेबाज हो तुम भाई? तब भी कहता हूँ व्यक्तिगत स्वार्थ से परे, लाभ हानि जीवन मरण की चिंता से मुक्त होना वैयक्तिक इयत्ता को प्राप्त होना है । मैं वही एकलव्य हूँ । अकेला ही आया, पैदा हुआ, अकेला ही जाऊँगा , मतलब मरूँगा । बाकी ज़िंदगी तो इसी एकल आदमी की दुनियादारी है ।

बुधवार, 6 मई 2020

फेंको पाश , कविता

(विशुद्ध कविता -)
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फेंको पाश, 
फेंकते रहो रस्सियाँ
मेरे ऊपर मेरे आसपास
फेंको पाश !

बाँधो मुझे बाँध सको तो
देखो मैं बंधता हूँ या नहीं
तुम्हारे किसी जाल में 
फँसता हूँ या नहीं 

सम्भव है मैं फँस जाऊँ
बँध जाऊँ किनारे किसी डोर से
हिम्मत न हारो 
फेंको पाश, फेंकते रहो बंधन 

फिर भी मैं नहीं फँसूं
जिसकी पूरी संभावना है
अगर मैं नहीं बंधूँ
होना तो यही है
तो बन्द कर देना फेंकना पाश
उलीचना रस्सियाँ, और 
चले आना मेरे पास 
मैं बँध जाऊँगा

मत फेंको पाश !
- - - - उग्रनाथ

शुक्रवार, 1 मई 2020

इतिहास

मैं जो इतिहास से एक लाख प्रकाश वर्ष दूर रहता हूँ, उससे मैं बुद्धिमान / विद्वानों की गोष्ठियों में अपमानित और त्याज्य तो अवश्य हो जाता हूँ । लेकिन लाभ यह हो जाता है कि तमाम गयी गुज़री सूचनाओं से बच जाता हूँ ।  मेरा स्वास्थ्य ठीक रहता है ।

Blasphemy

लेकिन धर्म समस्या तो तब बनते हैं जब वह दूसरे धर्मों के प्रति किसी अवधारणा को धारण कर लेते हैं । ( यही इनका मूलाधार ही है। सारे धर्म अपने से पहले के धर्म की Blasphemy पर बने हैं )।
इस्लाम तो खूब बदनाम हुआ काफिरों के प्रति अपने दृष्टिकोण और सम्भवतः कार्यवाहियों के लिए ।
हिन्दू सदियों से चुप रहा , लेकिन अब तो यह भी मुसलमानों के प्रति द्रोही और घृणित अवधारणा और आचरण के लिए विश्वविख्यात हो रहा है ।
अब इसके बाद तो राजनीति का क्षेत्र आ जाता है ।

मई दिवस

कृष्ण कुमार !
अवश्य बन्धु! मैं आपसे एक निजी हलचल शेयर करना चाहता हूँ । मूर्ति बनाने में हर्ज़ क्या है? यह तो मनुष्य की रूहानी, स्वाभाविक फितरत है । बच्चे भी गुड्डा गुड़िया, बालू के घर बनाते हैं । हम निश्चय ही बड़े उग्र थे कि मूर्तिपूजा क्यों हो रही है ? बल्कि मैं तो कभी इस्लाम का प्रशंसक हुआ कि यह इसकी मुखालिफत में खड़ा हुआ। लेकिन देखिए तो यह भी इसका खूब शिकार हुआ । क्या मस्जिद अपने आप में मूर्ति नहीं?और अल्लाह की लिपि की फ़ोटो?और हार्डबाउंड कागज़ की किताब? ये हज़रत की एक बाल पर मरे जा रहे हैं, और किसी मज़ार के टूटने पर हताहत ?
तो अनुभव यही है कि इससे वंचित कोई नहीं । फिर भारत ही दोषी क्यों ? मैं तो सीधे ईश्वर से पूछता हूँ - उसने हमें मनुष्य के रूप में मूर्तिमान क्यों किया ? हमें कोरोना की तरह सूक्ष्म, अदृश्य रहने देता 😢 । लेकिन नहीं, हमारा तो बिजूका खड़ा कर दिया और खुद के लिए कहता है मेरी मूर्ति मत बनाओ ? सरासर गलत बात । हम कैसे मान सकते थे । सो मंदिर मस्जिद के नाम पर प्रेमपूर्वक रहने लगे !☺️
और एक महीन बात (आप वैचारिक घनिष्ठ हो, इसलिये)! इस्लाम से मैं पक्का सहमत हूँ । इसलिए मूर्ति तो बने लेकिन उसे मूर्ति ही मानें, ईश्वर नहीं । न मस्जिद को अल्लाह का घर । यह तो मेरी दृष्टि में अल्लाह का अपमान है । मूर्तिपूजा का विरोध लौकिक व्यवहार में इस तरह मान्य और उपयोगी है कि हम व्यक्तिपूजा से बचें । व्यक्तिगत आदर और उसके विचार का सम्मान दीगर बात है । लेकिन यदि मार्क्स लेनिन, राम कृष्ण , गौतम बुद्ध, शंकराचार्य, पीएम सीएम राष्ट्रपति महोदय आते हैं तो बराबर से बैठें, पकोड़े खाएँ चाय पियें । हम उनसे आक्रांत, झुक झुक क्यों जाएँ ? वह भी मूर्ति, हम भी मूर्ति । सभी मूर्तियों का सम्मान हो फिर ? मजदूर भी हमारी सम्मानित मूर्तियाँ हैं । 👍💐
(यह तो अच्छा खासा मई दिवस का लेख हो गया । ☺️हास्य हा 😊)
उग्रनाथ, श्रावस्ती बौद्ध/ कर्मनिष्ठ पार्टी

श्रावस्ती

जैसे मुसलमानों में रोहिंग्या हो गए, वैसे बौद्धों में हम श्रावस्ती हो गए । कोई समस्या ? Any problem ?

धर्मो रक्षति

मेरी भाषा भी धर्मो रक्षति रक्षितः जैसी हो रही है । मैं भी कह रहा हूँ  धर्म है तो तुम भी हो । आलोचना कुछ भी करो । वही आलोच्य धर्म आपकी पहचान भी है । या कोई दूसरी पहचान ग्रहण करो । फिर उसकी प्रंशसा आलोचना करो । यह खामख्याली और बचकाना उत्तेजना भर है, अव्यवहारिक - कि मेरा कोई धर्म नहीं । हो सकता है, लेकिन सामने वाला तुम्हारी पैदाइश से तुम्हारा धर्म जाति और राष्ट्रीयता पहचानता है । वह तुम्हें तुम्हारे नाम , चेहरे से पहचान लेगा। क्या कर लोगे? और जब वह आपको उसी तरह पुकारेगा-.ओ काले हिंदुस्तानी! ओ कमीने हिन्दू! ओ कटुए! तो आपको बोलना पड़ेगा । यथार्थ से मुँह चुराने से कोई लाभ नहीं । गर्व, घमंड न करो , न हवा में उड़ो। जहाँ हो उसमें द्वंद्व पूर्वक रहो, अपना निजी स्थान बनाओ । पहचानें सामूहिक विवशताएँ हैं। तुम्हारी क्रांतिकारिता से कोई लाभ नहीं हो रहा है । उल्टे क्रांति को नुकसान हो रहा है । जिसकी ज़मीन पक्की होनी चाहिए। पदार्थवादी ।