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शुक्रवार, 1 मई 2020

श्रावस्ती

जैसे मुसलमानों में रोहिंग्या हो गए, वैसे बौद्धों में हम श्रावस्ती हो गए । कोई समस्या ? Any problem ?

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मेरा क्या

मेरे विचार यदि किसी अन्य, या किन्हीं दूसरों के विचार नहीं बनते तो वह बेकार हैं । हथेली पर लेकर मुझे चाटना थोड़े ही है !😢

रविवार, 12 अप्रैल 2020

प्रेम

मोहब्बत करने वाले बिना ज्ञानवान, धनवान, शक्तिमान होकर भी दुनिया पर कब्ज़ा कर सकते हैं ।
(नागरिकजी @ मोहब्बत International)

Love International

घृणा को दिल से निकालने के लिए थोड़ा मशक्कत करनी होती है ।
इसी को इस तरह भी कह सकते हैं कि प्रेम मोहब्बत करने के लिए मन की घृणा को थोड़ा/बहुत दबाना, परे हटाना, उससे मुक्ति पाना होता है।
अब उच्छृंखल, आज़ाद ख़्याल लोग लोकतन्त्र और स्वतंत्रता संग्राम का हवाला देकर इस बंधन को गुलामी या पराधीनता की संज्ञा देकर नकारें नहीं, तो यह मनुष्यता के लिए हितकर होगा ।
इस बात को दो एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जाय तो विचार कुछ ठीक से जन मस्तिष्क तक पहुंचे :-
जैसे हम अधिकांश नागरिकों की प्रवृत्ति में शासन सत्ता सरकार के प्रति एक अजीब सा विक्षोभ, कहें तो घृणा उपजी है । तो क्या इसी से हम अपनी नागरिकता को संचालित होने दें ? नहीं, इस मन को मारकर ही हम अनुशासित व्यवहार द्वारा लिख पढ़कर भी सत्ता पर विचार प्रहार कर सकते हैं । सत्ता से अपना प्रेम, अपनी संलग्नता सर्वथा समाप्त तो नहीं कर सकते?
इसी प्रकार बहुलांश हिन्दू के मन में सहजीवी मुस्लिमों के प्रति आधारहीन, विचारहीन, दुष्प्रचार जनित घृणा जमकर व्याप्त हो गयी है (सरकार सम्मिलित)। हो सकता है इनके पास इसके पक्ष में मजबूत कारण हों । हम उसपर बहस विवाद न कर चलो उनका आरोप सही मान लेते हैं । तिस पर भी अपने मन से, चाहे योग ध्यान अध्यात्म पूजा पाठ द्वारा ही, इस घृणा को उन्हें निकालना ही होगा । चलिए इसे हठयोग कह लेते हैं, यह तो भारतीय है? ऐसा हर युग, सनातन से लेकर अब तक किया गया और आगे भी जब तक सृष्टि है तब तक करना ही पड़ेगा । यही धर्म है, धारण करने योग्य । इसी हठयोग, धर्म और अध्यात्म द्वारा मनुष्य से प्रेम करना ही पड़ेगा । इसे बंधन गुलामी न समझें। यह धर्म है, धर्म का अनुशासन है । इससे बंधना ही पड़ता है ।
तो अपनी घृणा से बलपूर्वक, नफ़रत से ज़बरदस्ती छुटकारा लेकर हिन्दू जमात को मुस्लिम जाति/ जनजाति से एकतरफा मोहब्बत की पैदावार करनी ही होगी, अपनी भारतीयता को सिद्ध (caa?) सफल और उच्चतर बनाने की ख़ातिर ।👍
(Love International)

ज़िद्दी

ज़िद्दी जमात (fb group)
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ज़िद्दी जमात: पिद्दी की ज़ात, खुराफ़ात ही खुराफ़ात, एकलव्य वाला पुरुषार्थ- आत्मविश्वास के साथ, डर को दे मात- बाबू उग्रनाथ!

Sense

ABSolute NONsense (fb group)
हँसते हुए महामारी कोरोना, प्रलयंकारी ईश्वर और विकासवादी राज्य का सामना करना।
(मजदूर वर्ग)

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

वचन

मुझसे कोई पवित्र वचन की प्रत्याशा न करे ।

बच्चों के नाम

प्रेम प्रहार
मुझे सन्देह है कि यदि मेरे बच्चे कल को शारजाह अथवा कनाडा में ही बस जायँ, तो दो तीन पीढ़ी बाद भी वह अपने बच्चों के नाम संस्कृत में धराएँगे ?😢

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

बहस

युवावस्था में वैचारिक तीब्रता थी, तब मित्र से बहस में डर नहीं लगता था ।
अब बहस से डरता हूँ कहीं मित्र खो न जाएँ ।

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

धर्म व्यक्तिगत नहीं , राज्य

आप धर्म की बात कर रहे हैं (सेक्युलरवाद के तहत), हम तो राजनीति को भी व्यक्तिगत बनाये हुए हैं । मजबूरन हम राज्य के मामलों में बोल नहीं सकते ।
जबकि विदेशी Secularism की अँग्रेज़ी परिभाषा के अनुसार हमें धर्म को व्यक्तिगत बनाना बताया गया था ।
तो इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अब हम धर्म को  सार्वजनिक मनाये दे रहे हैं, और राज्य को , राज्य की राजनीति को, व्यक्तिगत मान समझ छुपाकर या चुपकर मना ले रहे हैं ।
यह शोध की बात है । secularism के शास्त्रीय विद्यार्थी इस पर चर्चा कर सकते हैं । Secularism and Democracy के इस भारतीय कायापलट पर विश्वविद्यालयों के राजनीति विभाग कृपया इस पर ध्यान दें , यदि उन्होंने secularism के दर्शन को भी व्यक्तिगत न बनाया हो । और वह भी इस syndrome के शिकार न हों कि विदेशी सेक्युलरवाद भारत पर फिट नहीं बैठता, और यह कि इसमें खोट ही खोट है । भला धर्महीन राज्य का क्या मतलब ? etc etc - -  ! रामचन्द्र कहि गए सिया से - - - यही तो ?😢

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

मोहब्बत पार्टी

पूछिये मत मुल्क को हुआ क्या है?
एकतरफा की मोहब्बत ही दवा है।

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

मुशायरे में हम

तरीका है क्यों नहीं सत्ता को पकड़ने का ! इन्हीं सत्ताधिकारियों के माध्यम से सत्ता संभालने का !
ये लोग कुछ भी करें, एक शब्द भी बोलें, सही लगे तो वाह वाह बोलें । लेकिन यदि गलत लगे तो मधुमक्खी की तरह छेंक लें , लानत फेंकें, शर्म शर्म के नारे लगाएँ और हूट करें ।
मानो हम मुशायरे में शामिल हों । सुनी कैसे नहीं जायगी हमारी बात ? इसी बहाने उन्ही के माध्यम से हम सत्ता में होंगे । 👍
हीन भाव लाने की ज़रूरत नहीं । यही देखें सांसद विधायक की ही क्या हैसियत होती है सत्ताधारी पार्टी में ? मंत्रियों तक की तो होती नहीं । फिर तो उतनी सत्ता पर हमारा अंकुश पर्याप्त है राजनीति के लिए । 👌

Surgery of Philosophy

मंगलवार, 31 मार्च 2020

एकलवाद की घोषणा

मैं पाला बदल रहा हूँ । बदल क्या बस नोटिस बोर्ड पर लगा रहा हूँ । I have been Individualist since long, just affirming it in black&white. Let a man do whatever he wants to do. Leave him to make his destiny himself. Who are we to guide or instruct him. Days of evangelist are over. Gods, godmen, preachers, book holders, we are not. So, set the individual being free to decide what is good or bad for their life. This may be called Individualism, I adhere to.
Only personal, individual awakening, enlightment will work. Social evils too can vanish through personal understanding. We can't give all the whole public a right move at one time. Best wishes to our brethren fellow for their free and open minds and conscience to choose the good, better and best (since today). They can ignore whatever we bark in the streets, may that be our psycho attitude, which is in our DNA. Don't mind us, choose and lead your own path.👍

मंगलवार, 24 मार्च 2020

ब्राह्मणवाद

ब्राह्मणवाद
तो मानव स्वभाव,
किसे धिक्कारें ?

मानव सम्मान

मैं ईश्वर अल्लाह, कृष्ण मुहम्मद की आलोचना करने से परहेज़ इसलिए नहीं करता कि ये भगवान हैं, शक्तिमान हैं, या इनसे डरता हूँ । बल्कि इसलिए कि इन्हीं नामों वाले तमाम ज़िंदा, जीवधारी मनुष्य हमारे आसपास हमारे साथ रहते  हैं - - जिनसे मैं प्रेम करता हूँ। मैं आदमी का आदर करना चाहता हूँ । 👍💐

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

शरीर से ऊपर

आप औरत हैं या मर्द, मैं नहीं जानता । मुझे नहीं पता और मुझे इससे कोई मतलब भी नहीं । मैं यह कहता हूँ कि आप शरीर से ऊपर सोचो !👍

रविवार, 8 मार्च 2020

आदर प्रेम

मैं प्रेम को ही आदर समझता हूँ और आदर को ही प्रेम समझता हूँ ।
(बतर्ज़ गाँधी जी :- सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है ।☺️)
- - - उग्रनाथ

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

जीना

हर आदमी को जीने का हक़ है, और उन्हें ज़िंदगी के समान मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी हमारी है ।
(नागरिक उवाच)