शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

Dgspn

.        (संस्कृति-समाज-सत्ता का जोड़, श्रंखला-18)

                  (व्यक्ति विरोध या विचार विरोध)

         अम्बेडकरवाद एक तरफ "सामाजिक बदलाव" से जुड़ा है,  दूसरी तरफ यह "धम्म" से भी जुड़ा है | बाबा साहेब का कार्य दो ध्रुवी है | बड़ा कठिन है यह मार्ग | दो अंतर्विरोधों को साथ लेकर चलना कितना दुरूह है ! भगवान बुद्ध ने कहा है "दो" हैं मार्ग | बाबा साहेब को दोनों मार्गों को साथ लेकर चलना पड़ रहा है | इसलिए ही अम्बेडकरवादियों में अंतर्विरोध नजर आ रहा है, द्वंद नजर आ रहा है | अम्बेडकरवादी जब "समाज" की बात करते हैं, तो धम्म बीच में आ जाता है | जब "धम्म" की बात करते हैं, तब समाज बीच में आ जाता है |  जबकि दोनों की दिशाएं अलग अलग हैं | सवाल यह है कि दोनों में सामंजस कैसे बिठाएं ? नहीं, दोनों मार्गों पर एक साथ चलना सम्भव नहीं है |
       वस्तुत: "धम्म" सम्रद्धता की नींव पर ही खड़ा हो सकता है | किसी भवन को बनाने के लिए नींव पहले ही रखनी होगी | नींव केवल पहले ही नहीं, मजबूत भी रखनी होगी | बाबा साहेब सम्रद्ध समाज के ऊपर धम्म का आलीशान भवन प्रस्थापित करना चाहते हैं | बाबा साहेब के "सामाजिक मिशन" के आधार में "धम्म के जीवन मूल्य" समाए हुए हैं | यदि बाबा साहब के मिशन में से धम्म के पहलुओं को निकाल दिया जाए, तो यह मिशन निरर्थक हो जाएगा | बाबा साहेब को यदि बौद्ध जगत ने महत्व दिया है, तो वह बुद्ध के कारण ही दिया है |
       बुद्ध ने एक मानवीय दृष्टि दी है, कि विचार से तो सहमति व असहमति हो, परन्तु व्यक्ति से सदा सहमति बिना शर्त बनी रहे | बुद्ध किसी भी परिस्थिति में "मनुष्य" को इन्कार नहीं करते | इसमें हमेशा ऊपर उठने की सम्भावना बनी रहती है | बुद्ध ने मनुष्यों के बीच जोड़ने का इन्सुलेशन (रसायन) मैत्री भावना के माध्यम से दिया है | यह मैत्री-भाव भेदभाव रहित, व बिना शर्त है | इसमें ना तो पापी और पुण्यात्मा में भेद किया है, ना ही  ब्राह्मण शुद्र में,  ना ही गरीब अमीर में, ना ही स्त्री पुरुष में |
        बुद्ध "भेदवाद" (विचार) से तो असहमत हैं, पर भेदवादियों (मनुष्य) से नहीं | बहुत बारीक अन्तर है | बुद्ध "मन" से तो असहमत हैं, पर "चित्त" से नहीं | क्यों ? क्योंकि मन परिवर्तनशील (अनित्य) है, चित्त सनातन (एस धम्मो सनन्तनो) है | क्योंकि मन के बदलने की सम्भावना के आधार पर व्यक्ति को नहीं छोड़ा जा सकता है | व्यक्ति का विरोध न होकर, विचार का विरोध हो, सोच का विरोध हो, दृष्टि का विरोध हो | सभी व्यक्तियों के तो पक्ष में होना है, सभी व्यक्तियों के प्रति तो भले का भाव रखना है, तभी तो हम बुद्ध की मैत्री "भाव-भावना" का पालन कर पाएगें | नहीं तो सारा मिशन, धम्म के जीवन मूल्यों से भटक जाएगा | अम्बेडकरवादियों से चूक इसी बिन्दु पर हो रही है | उन्होंने "विचार के विरोध को ही व्यक्ति विरोध से जोड़ दिया है |" वे इस पहलू पर विचार करते वक्त अपने अन्दर द्वेष ले आए हैं | यही अलगाव व घृणा की जड़ बन कर अम्बेडकरवादियों की छवि खराब कर रही है  |
      बुद्ध की इस दृष्टि से प्रभावित होकर बाद में संतों की व नाथ पंथों की श्रंखला ने अपनी उदार भाषा में कुछ इस ढंग से अभिव्यक्त किया है | संतों ने कहा है, "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं |" यही बुद्ध की व बाबा साहब की मूल देशना है | मेरी दृष्टि इसी पर आधारित है | मैं इसी पर चलते हुए आगे बढ रहा हूं |

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

Neglect than Opposing God IHU

Reaction -
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एक अंतरराष्ट्रीय Humanist and Ethical Union से जुड़े भारतीय मानवतावादी संघ की यह नीति है (Published 27 July) कि :-
"The idea of God is likely to suffer more from neglect than opposition. But Atheists can't leave the subject alone!"
तो जी हुज़ूर, हमने राम मंदिर के मामले को अस्सी के दशक से ही लगभग छोड़ा ही हुआ है । कुछ विरोध भी करते तो कैसे करते ? नास्तिकों के पास इतनी ताक़त कहाँ थी ? हमारी ताक़त तो आपलोग होते । लेकिन आपतो हमें पीछे खींचने में लग गए । विरोध न करो, बस नज़रअंदाज़ करो । यह तरीका ज़्यादा प्रभावी होगा और मसला जल्दी से मर जायेगा ।
जी हमारे मान्य गुरुवर, सचमुच वही फलित हुआ । मामला कचहरी से तय हो गया और अब राम मंदिर 5 अगस्त से बनना शुरू होने जा रहा है । कोई गगनचुम्बी मूर्ति भी राम की लगने जा रही है, कितने मीटर की है आप भी जानें, या पता करके मोद पाएँ । हम भी निश्चिंत घर में बैठे हैं ।
और इसी क्रम में अब आपका पेज पढ़ना भी neglect करने लगे हैं । शायद idea of god more suffer कर जाए । और हम सब अपने लक्ष्य को प्राप्त कर प्रसन्न हों !☺️😊😢
,,उग्र

बुधवार, 1 जुलाई 2020

जिसकी लाठी वही सेक्युलर

सेक्युलरवाद: तब और अब (भाग- दो, अंतिम)
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पिछला लेख पूरा न हुआ कि मेरे मोबाइल का हिंदी (हिंदू हिंदुस्तानी नहीं) कीबोर्ड ख़राब हो गया । इसलिए इस लेख का जल्दी उपसंहार कर दूँ वरना अनुकूल विषय न होने के कारण यह फिर रुष्ट न हो जाये । 
अनुभव यह कि भारत में पश्चिमी सेकुलरी तो चलने से रही । यहाँ ब्रॉडला होलियोक का सिद्धान्त नहीं चलेगा । वहाँ एक पोप था तो राज्य ने छुटकारा पा लिया । यहां तो पोप ही पोप, पाप ही पाप , कैसे इनसे तालमेल बिठाये ?
अब इसके दर्शन, धर्म व्यक्तिगत, Thisworldy, परलोक विरुद्ध, धर्म राज्य से , राज्य धर्म से दूर, और Public health आदि की पारिभाषिक अध्ययन, समीक्षा और चीर फाड़ में न जाइए वरना हम आप उलझ जाएँगे जैसे देश 70 सालों से इसमें हैरान परेशान है । 
बस खुश होने की बात यह है कि हर संस्था पार्टी इसके गुण गाती है, जैसे विज्ञान की गाती है, चाहे इनकी मानें एक नहीं । हिन्दू भारत ने इसे पंथनिरपेक्ष जैसा शब्द अपनाया, तो गौर कीजिए यह तो हिन्दू ही हुआ। इसी में अनेक पंथ गुंफित पल्लवित हैं । मतलब धर्म को छूना नहीं । यह तो देश का प्राण है, धर्म तो नैतिकता है, कर्तव्य है । आगे भी कृपा यह कहकर की कि हिन्दू तो स्वाभाविक सेक्युलर है, विश्वबंधुत्व से लैस है, कोई पश्चिम इसे नीति का पाठ न पढाये । इन्होंने यहाँ चार्वाक को उद्धृत न कर सनातन को ही सुयोग्य बताया । इस तरह यह शब्द देश में जिंदा या मरा पड़ा रहा । बाद में संविधान में इसका नाम अंग्रेज़ी में जोड़ा गया । 
तो मुक्तक यूँ बनता है :-
'हिंदुस्तान के मानी सेक्युलर
देश की बूढ़ी नानी सेक्युलर;
सती साध्वी? यानी सेक्युलर,
लालकृष्णअडवानी सेक्युलर !"
इस तर्ज़ पर शिवसेना, बजरंग दल सब सेक्युलर ।
तो मुस्लिम समाज क्यों पीछे रहता ? उसने भी दावा किया , इस्लाम भाई चारा, शांति, अम्न चैन, प्रेम मोहब्बत का मज़हब है । मानना ही पड़ेगा । बस केवल वह हम लोग सेक्युलर नहीं माने जायँगे जो सेक्युलर नाम की सतत गाली दोनो तरफ से खाने को पाते हैं । तो ऐसी दशा में निष्कर्ष क्या निकला? वही उपसंहार है । इसकी व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय परिभाषा बड़ी विनम्रता पूर्वक यह बनती है । 
कि जिस देश में जिसकी लाठी उसी के पास सेक्युलर थाती । प्रत्येक देश का बहुजन सेक्युलर माना जाय, इस ज़िम्मेदारी के साथ कि वह अल्पजन का ख्यालबात रखे । शेष तरीके से secularism सम्भव नहीं । उदाहरणार्थ -
खाड़ी मुल्कों में इस्लाम को सेकुलर स्वीकार किया जाय (तभी यह इस पर खरा भी उतरेगा)! यूरोप में Secularism को सेक्युलर मान उसकी प्राथमिकता स्वीकार किया जाय (अब पोप क्षीण शक्ति है, और जनता भी पर्याप्त नास्तिक सेक्युलर) ! चीन में मार्क्सवाद को सेकुलर संज्ञा दें।
 अब भारत की बात करना तो गैरज़रूरी है । यहाँ हिन्दू को सेक्युलर न माना गया औऱ इनपर अल्पसंख्यकों की नैतिक जिम्मेदारी न मानी गयी तो अनिष्ट होगा । सब अपने देश पर सेक्युलर राज्य फ़रमायें । 
यहीं नागरिकों का फर्ज़ भी बनता है कि अरब देश में हिंदुत्व का झंडा न लहरायें, इस्लाम के अंतर्गत रहें। यूरोप अमरीका में हिन्दू मुसलमान उत्पात करने की न सोचें । वहाँ democratic civil secular व्यवहार करें ।
दुनिया बंटी हुई है । बँटा हुआ सेक्युलरवाद ही चलेगा । जब Communist International नहीं चला तो कैसे उम्मीद करें, International Secularism चल पायेगा ? यह नितांत व्यावहारिक, practical नीति है । उसके किताबी सिद्धांत पर तो मैं इतना लचर (या अद्भुत?☺️) सुझाव देते हुए भी दृढ़ता से कायम हूँ, उसे जानता, समझता, लागू करने के प्रयास करता हूँ । साथी मित्र scientific temper के साथ, विज्ञान को जनचेतना में उतारने, हिंदी अर्थ में विज्ञान धर्म फैलाने में संलग्न हैं ।  कुछ उत्साही मित्र वैज्ञानिक समाजवाद में भी धर्म के गुण ढूँढ चुके हैं, शायद आ ही जाए। वह सब चलता रहेगा सफल भी होगा , क्योंकि यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत छूट प्राप्त है कि किसी भी महान मूल्य को धर्म की प्रतिष्ठा दी जाय । अतएव- 
जय मानव, जय व्यक्तित्व, जय विज्ञान, जय समाजवाद, जय नागरिक धर्म !👍💐
,,,उग्र