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सोमवार, 20 अप्रैल 2020

हाथ में हाथ

धार्मिकों की जब आलोचना करो तो वह अपने धर्म पर और दृढ़ आरूढ़ हो जाते हैं । खूंटा कसकर पकड़ लेते हैं । उन्हें छेड़ो नहीं तो वह हाथ ढीले रखते हैं ।
इसलिए मैं उन्हें छेड़ता नहीं । जब उनके हाथ ढीले होते हैं, उन हाथों को अपने हाथ में ले लेता हूँ ।

कॉकरोच

कल आपको हमने अपने धर्म के बारे में बताया । पाखण्ड नाम है हमारे धर्म का । संस्कारों, त्योहारों की नौटंकी । 😢
तदन्तर अपने भगवान को ढूंढने में लग गया । आखिर कौन है मेरा ईश्वर ? तब तो जिन ढूंढा तिन पाइयाँ ।
आख़िर मिल ही गया मुझे मेरे ईश्वर । हिट spray छिड़ककर आखिरी कॉकरोच को घर से भगाया । तो पकड़ में आ गया । कॉकरोच है मेरे ईश्वर का नाम । ये दोनों मेरे घर में नहीं रहने पाते ।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मुराद

Democracy, और democracy के साथ साथ साम्यवाद, communism का कैसे तालमेल बिठाऊँ, यह मेरे लिए बहुत बड़ा उलझन का कारण रहा ।
कल युवा मित्र Gaurav Pratap Singh ने अंबेडकर का विचार उद्धृत कर बहुत कुछ/ क्या पूरा रास्ता साफ किया । उनका आभार, अंबेडकर जी के प्रति अनुग्रहीत ।
लोकतंत्र, democracy के आधार मूल्य समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व (बुद्ध के term में मैत्री) को भारतीय भावभूमि में मैंने केवल "मुहब्बत" के शाश्वत गुण से जोड़ एक कार्यस्थल चुना ।:-
"मुराद" : मुहब्बत राजनीतिक दल

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

कोरोना मंदिर

देखिये, क्रोनोलॉजी पकड़िये । बहुत पहले कभी एक निर्जीव वायरस ने मनुष्य के मस्तिष्क पर हमला किया था । तो मनुष्य ने उस अदृश्य अज्ञात को ईश्वर बताकर मंदिर में बैठा दिया । पूजा पाठ आराधना संकीर्त्तन में संलग्न मनुष्य को अब महसूस ही नहीं होता कि यह वही संहारक प्रलयंकारी वायरस है, जिससे संक्रमित होकर अब यह अभ्यस्त, conditioned हो गया है । 👍right?
उसी प्रकार इस नए निर्जीव, अदृश्य महाविनाशक किरोना के समक्ष नतमस्तक होकर इसका मंदिर बना देना चाहिए जिसमें वह पड़ा रहे मुँह पर मास्क लगाकर । अन्यथा तो यह भी सर्वव्यापी की तरह घूमता रहेगा और कहर मचाता रहेगा ।😢

रविवार, 12 अप्रैल 2020

प्रेम

मोहब्बत करने वाले बिना ज्ञानवान, धनवान, शक्तिमान होकर भी दुनिया पर कब्ज़ा कर सकते हैं ।
(नागरिकजी @ मोहब्बत International)

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

बच्चों के नाम

प्रेम प्रहार
मुझे सन्देह है कि यदि मेरे बच्चे कल को शारजाह अथवा कनाडा में ही बस जायँ, तो दो तीन पीढ़ी बाद भी वह अपने बच्चों के नाम संस्कृत में धराएँगे ?😢

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

धारणा की स्वतंत्रता

कोई व्यक्ति कोई भी विचार, वाद सिद्धांत कभी भी धारण कर सकता है , इसकी आज़ादी है, होनी ही चाहिए ।
और आगे वह उससे विमत, विरत, असहमत, बल्कि उसका आलोचक और विद्रोही भी हो सके, इसकी स्वतंत्रता भी उसे होनी चाहिये । किसी व्यक्ति या संस्था को उस पर उँगली उठाना नहीं चाहिए । इसी में democracy है, इसी में secularism है ।
- - मित्र नागरिक

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

आसमानी

मुझे आसमानी / Transcedental किताबों, ईश्वरों, देवदूतों, शिक्षाओं के बारे में कुछ नहीं कहना ।
उसी क्रम में मैं यह जोड़ना, बात आगे बढ़ाना चाहता हूँ कि मनुष्य, नर नारी भी तो आसमानी इयत्ताएँ, Identities हैं बिल्कुल material और चेतन भी ?
और ये लोग भी तो जीवंत, बोलते बतियाते, कुछ कहते सुनते हैं ?
तो ये लोग भी तो आसमानी हैं ? इनकी बात भी सुनी, विवेकानुसार मानी जानी चाहिए ?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

मुल्ला सेकुलर

सेकुलर मुल्ला
सेकुलरों के ऊपर आपको एक आरोप का फेनामेना आपको याद है ? जो हिन्दू अतिरेक के विरुद्ध बोले और मुस्लिम को तंग करने की नीति की आलोचना करे उसे मुल्ला की संज्ञा दी दी जाती थी । चिढ़ाया जाता था, खिल्ली उड़ाई जाती थी , एक तरह से अपमानित करने के भाव से । मुलायम सिंह यादव मुल्ला मुलायम प्रसिद्ध हुए । और हम बाबरी विनष्टि के विरोधी भी खूब छींटें खाये । यह क्रम अभी भी रुका नहीं है ।
यहाँ तक कि छद्म विश्व बंधुत्व वाले संघ की छतरी तले विदेशी अवधारणा , सेक्युलरवाद का देसी भारतीय version, परिभाषा ही हो गया - हिन्दू विरोध मुस्लिम तुष्टीकरण ।
कितना भी हमने किया मुस्लिम ताड़न की उनकी मंशा न गयी और अब तो - सत्ता पाई काहि मद नाहीं हो गया । बल्कि इसमें 5000 सालों पुराना राष्ट्रीय सांस्कृतिक दम्भ भी जुड़कर सेक्युलरिज़्म के लोकतांत्रिक, न्यायमूलक अवधारणा को सफ़लतापूर्वक रौंदने लगा ।
ऐसे में मस्तिष्क में एक बदमाश चिंतन आता है । जब आरोप है ही, और वह आरोप माथे पर रहना ही है, तो उसे अपना आई कार्ड, अपना बैज क्यों न बना लें ?
एक ऐसा ग्रुप जो घोषित रूप से मुस्लिम समर्थक हो ?
मतलब उसका नाम ही हो - " मुस्लिम समर्थक सेक्युलर संघ" !👍
अब न्याय के लिए राजनीति का तकाज़ा तो यही है, पूरा हो या नहीं । पूरा हो या नहीं लेकिन राममंदिर भव्य बनेगा । रामायण महाभारत चलेगा, scientific temper का मटियामेट किया जायेगा । फिर मुसलमान से पूछा जायगा तुम नमाज़ क्यों पढ़ते हो, जलसा क्यों करते हो ?
क्या इस दोहरे चरित्र को तोड़ना स्वतंत्रता की देवी के पुजारियों का कार्यभार नहीं बनता ?👍

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

निज़ामुद्दीन

मेरे आदरणीय बड़े भाई ! पहले आरोप तो तय कर लीजिये निज़ामुद्दीन पर । फिर बात करें ।
आपका आरोप यदि ईश्वर अल्ला पर विश्वास, धार्मिक अंधविश्वास पर है तो आपके साथ तमाम भारत है । चलिए इस दिशा में काम किया जाय । हम तो वह कर रहे हैं । नास्तिकता प्रचार ग्रुप में डेढ़ लाख सदस्य जुटे हैं।

और यदि आस्थाओं से कोई ऐतराज़ नहीं, केवल धार्मिक जमावड़े पर आपका प्रहार है, तब भी हम आपके साथ है और हैं तमाम AKSiddiqui, Asghar Mehdi सरीखे मुस्लिम बुद्धिजीवी, नाम बहुत सारे, कहाँ तक गिनाऊँ ।

लेकिन तब यह- वैष्णव देवी में "फँसे" और निज़ामुद्दीन में "छुपे" की शब्दावली नहीं चलेगी । आपको दोनो ही कि मज़ामत करनी होगी । क्या आपको याद नहीं मक्का हज ज़ियारत में भी लोग जानें दे चुके हैं? और कोरोना से कहीं अधिक बलिदान हमसे हिंदुस्तान का "तीर्थयात्रा" वायरस हर वर्ष लेता रहा है - भगदड़ में दुर्घटनाओं में । आस्थाओं की बड़ी कीमतें चुकायी और चुका रहे हैं हिन्दू और मुसलमान सभी । एक को अलग क्यों छोड़ रहे हैं यदि सचमुच न्याय दृष्टि वादी हैं आप ?
अभी ही ताज़ा एक "राम मंदिर" वायरस कुछ दशकों में कितना कहर ढाकर गया (?) क्यों भूल रहे हैं आप ? तब तो इसे आस्थाओं का देश, धर्मप्राण मुल्क बता रहे थे । तो इसी धार्मिक भावभूमि पर मुसलमान भी अपना धर्म निभा रहे हैं । उसी का कार्यक्रम था निज़ामुद्दीन । फ़र्क़ न कीजिये।
अब और अगर इससे भी कोई एतराज नहीं, आरोप केवल तकनीकी पक्ष को लेकर है - क्या सरकारी आदेश था, वीजा की वैधता, एडमिन को सूचित करने को लेकर है तो दीगर बात है । जाँच हो, होगी ही , तो दोषी नियमानुसार सज़ा पाएँगे । दोषी न हों तो बनावटी धाराओं में न फँसायें । वह राजकीय काम हॉ, हम हस्तक्षेप नहीं करते ।
कानून से अलग आपकी मानसिक शुद्धि के लिए सूचित कर दें कि पूरे प्रतिबंध के बावजूद अयोध्या में रामलला जी के मूर्ति की नए घर में shifting बड़े भावपूर्ण तरीके से किया गया, वह भी सरकार के मुखिया द्वारा जिनके जिम्मे पूरे प्रदेश का स्वास्थ्य, सुरक्षा, कानून और व्यवस्था है । क्या कहिएगा ? चूक हो गयी, आस्था की बात थी ?  निज़ामुद्दीन के प्रबंधकों से भी ऐसी चूक होने की गुंजाइश दीजिये ।
तो पहले यह तय तय कीजिये कि आपका आरोप क्या है निज़ामुद्दीन पर । फिर अपनी आस्तीन भी झाँक लीजिये ।
हमें तो किसी भी धार्मिक भावना से सहानुभूति है । क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, आस्था तो मारक यंत्र है सबके लिए । लेकिन क्या करें इन्हें धारण करने वाले मनुष्यों से तो हमें प्रेम महब्बत है !
तमाम किस्म के कोरोनाओं से लड़ना है । अज्ञान अशिक्षा बेरोजगारी तो प्रमुख थे । बीच में यह नया, Novel कोरोना आ गया । तो इससे लड़िये । सब मिलकर । इसने तो अपने खिलाफ़ पूरी दुनिया को एक कर दिया । इधर एक हम विश्व बंधुत्व वाले हैं जो हिन्दू मुसलमान किये जा रहे हैं । फिर तो जय कोरोना !

मंगलवार, 31 मार्च 2020

एकलवाद की घोषणा

मैं पाला बदल रहा हूँ । बदल क्या बस नोटिस बोर्ड पर लगा रहा हूँ । I have been Individualist since long, just affirming it in black&white. Let a man do whatever he wants to do. Leave him to make his destiny himself. Who are we to guide or instruct him. Days of evangelist are over. Gods, godmen, preachers, book holders, we are not. So, set the individual being free to decide what is good or bad for their life. This may be called Individualism, I adhere to.
Only personal, individual awakening, enlightment will work. Social evils too can vanish through personal understanding. We can't give all the whole public a right move at one time. Best wishes to our brethren fellow for their free and open minds and conscience to choose the good, better and best (since today). They can ignore whatever we bark in the streets, may that be our psycho attitude, which is in our DNA. Don't mind us, choose and lead your own path.👍

आदमी अलग हो

मैं अब इस चिंता में नहीं हूँ कि हम कैसे एक हों ? मैं नास्तिक हूँ या आस्तिक, संगठित होने की चेष्टा में नहीं हूँ । नास्तिक संगठन की सोचूँगा तो आस्तिक संगठनों के बारे में सोचना पड़ेगा । उन पर नज़र डालूँ तो पाता हूँ कि वे एकताबद्ध होने में बहुत आगे निकल चुके हैं, कोई कम कोई ज़्यादा मजबूत । हम उनसे अपनी तुलना इस तराजू पर न कर पाएँगे । कर पाएँगे तो अकेले अकेले । अकेला आत्मविश्वासी नास्तिक किसी भी अकेले आध्यात्मिक आस्तिक से निपट सकता है।
इसलिए मेरा तो एजेंडा है नास्तिकों को ही नहीं, धार्मिकों को भी अकेला Individual human being, एक इकाई आदमी बनाने का । प्रत्येक नास्तिक प्रत्येक नास्तिक से/ हर आस्तिक हर आस्तिक से कैसे अलग हो, विशिष्ट और विलक्षण मनुष्य, स्वतंत्रता पूर्वक अपने जीवन का जिम्मेदार ! तभी नास्तिक सही नास्तिक हो सकेगा । तब नास्तिक आस्तिक में सामूहिक कोई भेद न होगा । क्योंकि तब तो आस्तिक भी सही आस्तिक होगा ? और हमारी कोई लड़ाई नहीं है सिवा इस उद्देश्य के कि आदमी नेक और नैतिक हो । ज़रूरी है कि हम यह काम उसी पर छोड़ दें । हम गुरुडम के शिकार न हों, यही बेहतर, कारगर रणनीति होगी ।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

प्रचार बेकार

स्थिति तो आशावादी है, इसलिए मैं निराश नहीं हूँ । लेकिन निराशावादी बात जरूर कह रहा हूँ ।-
अब हमें नास्तिकता के प्रचार की ज़रूरत नहीं है। इसका प्रचार तो नन्हे से, ईश्वर की तरह से ही 'न दिखने वाले वायरस' ने सशक्त तरीके से कर दिया है । जिसके पास तनिक भी बुद्धि और अनुभव क्षमता हो वह बड़ी सरलता से नास्तिकता को प्राप्त हो सकता है, यदि वह चाहे । इसलिये मैं तो इस group को बंद करने की सलाह दूँगा । क्योंकि अब इतने साक्षात उदाहरण के बाद भी कोई नास्तिक न हो जाय (और होंगे भी नहीं), तो हमारे प्रचार प्रसार और कहने से भी नहीं होंगे । फिर आवश्यकता क्या है ऐसा निष्फल प्रयास करने की? हमें अब भगत सिंह, राहुल सांकृत्यायन और प्राचीन लोकायतन से क्षमा माँग लेनी चाहिए । प्रणाम गुरुदेव !
बहरहाल, मैं व्यक्तिगत तो यह group छोड़ने का मन बना चुका हूँ । - (उग्रनाथ नागरिक)

मंगलवार, 24 मार्च 2020

कोरोना

भक्तो, और संघियो! आँखें खोलो! अब तो सेक्युलरवाद, धर्मनिरपेक्षता का आदर करो ! पालन करना, हृदय में धारण करना सीखो ! आदमी आदमी बराबर है । सबक खून एक है । मानव जाति एक ही प्रकृति की संतान है । अब तो मानो!
#कोरोना

मानव सम्मान

मैं ईश्वर अल्लाह, कृष्ण मुहम्मद की आलोचना करने से परहेज़ इसलिए नहीं करता कि ये भगवान हैं, शक्तिमान हैं, या इनसे डरता हूँ । बल्कि इसलिए कि इन्हीं नामों वाले तमाम ज़िंदा, जीवधारी मनुष्य हमारे आसपास हमारे साथ रहते  हैं - - जिनसे मैं प्रेम करता हूँ। मैं आदमी का आदर करना चाहता हूँ । 👍💐

धर्म की निंदा

कोई विचार जब धर्म बन जाये तो उससे दूरी रखना ही श्रेयस्कर । दूरी रखने या अलग रहने से मेरा आशय यह नहीं कि उससे हम कोई उपयोगी रास्ता उनसे न लें । बल्कि यह कि उनकी आलोचना- निंदा के पचड़े में न पड़ें । तारीफ़ तो कर दें लेकिन बुराई करने से दूर रहें वरना आदमियों में दूरियाँ बढ़ेगी। लोगों से सम्पर्क में उनसे अन्य विषयों पर चरचा करें, धर्म खासकर सामने वाले के धर्म पर तो बिल्कुल नहीं ।
क्योंकि आख़िर सामाजिक समरसता भी तो एक उच्चकोटिक विचार है ?
वस्तुतः होता क्या है कि धर्म निगोड़ी ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के जन्मते ही व्यक्ति की अपनी/परायी हो जाता है (यदि धर्म को secular/ व्यक्तिगत बना लें तो भी), जिससे पिंड छुड़ाना सबके लिए मुश्किल होता है । आपके लिए आसान है क्या ? फिर कैसे उम्मीद करते हैं कि दूसरा उससे विमुक्त होगा?
यह समझदारी की माँग है ।
इसलिए नास्तिकता की आलोचना कर लीजिए, वामपंथ को गाली दे दीजिए, अंबेडकर और संविधान की शल्य क्रिया कर लीजिए, क्योंकि ये धर्म नहीं बने हैं और इसीलिए इन्हें धर्म कहने का विरोध भी हो रहा है, लेकिन यीशु, मुहम्मद, कृष्ण, बुद्ध को कुछ मत कहिये। इन्हें पौराणिक ही सही, काल्पनिक कहानियों का साहित्यिक सरोकार समझ जीवन का आनंद लें। अन्यथा आपके बंधु मनुष्य मित्रों के मन को ठेस लगेगी/ लगती है । और करें भी क्यों ? करके कुछ हासिल न होगा । इतने दिनों के धर्मविरोधी अभियान तो इनके अप्रभावी होने का अनुभव देते हैं । तो इससे लाभ लिया जाय और कान को थोड़ा मानववादी तरीके से घुमाकर पकड़ा और फिर ऐंठा जाय । ये अपनी मौत मरेंगे, मरें तो मरें, विज्ञान की गति के आलोक में । इन्हें चिढ़ाएँगे तो बंदरिया मरे हुए बच्चे को और कसकर सीने से चिपका लेगी । सड़ांध और फैलेगी । (उग्रनाथ)

गुरुवार, 19 मार्च 2020

कोरोना मंदिर

अभी एक ख़ास खबर सुननी, पढ़नी बाक़ी है (ख़ैर अभी सुबह होने में भी तो 12 घण्टे बाकी हैं?)।
कि योगी जी कहीं हज़ार, दो हज़ार एकड़ जमीन दें और कोरोना माता मंदिर का निर्माण सरकारी खजाने से करवायें । (मोदी पीएम से उद्घाटन की घोषणा सहित)!

क्यों नहीं? यह तो जनता के स्वास्थ्य के हित में होगा ?
कोरोना देवी की मूर्ति चीन से बनवाकर मंगवाएँ और स्थापित करें । कितनी ऊँची? इसे पण्डित पुरोहितों से परामर्श कर तय करें । खर्चा जो भी लगे । जनकल्याण का प्रश्न है ।

रविवार, 8 मार्च 2020

रामराज्य

रामराज्य का मतलब ब्राह्मण राज है । या फिर ब्राह्मणवादी राज्य कह लीजिए । इसमें संदेह किस बात का ? देख ही रहे हैं । योगी मोदी शाह, सब ब्राह्मण हैं । ब्राह्मण ने तो हमेशा कहा, वर्ण को परिभाषित किया कि ब्राह्मण कोई भी अपने कर्मों से बन सकता है । तो यदि गवर्नर आरिफ़ मुहम्मद साहेब ब्राह्मण बन जायँ तो किमाश्चर्यम ?

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

घर से मस्जिद है बहुत दूर

बाबरी मस्जिद के लिए ज़मीन अयोध्या शहर से बहुत दूर दी गयी ।
कहते हैं बेग़म हज़रत महल ने पुराना हनुमान मंदिर अलीगंज के लिए भी ज़मीन दी थी । तब तो यह भी लखनऊ शहर से बहुत बाहर रहा होगा ?
सोचता हूँ , क्या यह सही हुआ ? क्या यह ज़रूरी था ? इससे सद्भावना बढ़ी, या धार्मिक अंधता और उन्माद ?

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

वैकल्पिक बाबर

बाबरी मस्जिद नाम कोई रखेगा थोड़े ही । ख़ुद हिन्दू ही अपने आप इसे पुकारने लगेंगे । ऐसे कि यह बाबरी मस्जिद के विकल्प में बना है । यह गलती तो सुप्रीम कोर्ट ने की । मुस्लिम पक्ष ने इसकी demand तो की नहीं थी । मुकदमे पर न्याय के अनुसार इसे वहीं मिलना था । न्याय न मिला तो वैकल्पिक जमीन तो उन्होंने माँगी न थी । नहीं देनी चाहिए थी ।