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बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

एक सही वर्तनी हो तुम

कवितानुमा?
- - - -       -- -  
तुम मेरे नाम की
वर्तनी ग़लत लिख दो,
मेरे नाम के उच्चारण को
गालियों, तद्भव शब्दों से भर दो !
मेरे नाम की वर्तनी
सुगंधित हो जाएगी,
मेरे नाम का उच्चारण
महक उठेगा,
लेकिन तुम कोई नाम
लिखो तो सही,
कुछ बोलो तो सही !
- - -
(उग्रनाथ)

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

मज़ाक

वह मुझसे मज़ाक़ करता है
मैं उससे मज़ाक़ करता है,
उसने मुझे दुनिया में भेजा
मैं उसे भी खींच लाया । ☺️

खुला आसमान

धीरे धीरे खुल रहा है आसमान,
सूर्य निकलेगा तो चाँदनी होगी ।

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

चल तो रहा हूँ ।

कविता?
चलने की तैयारी
करता रहता हूं तो लगता है
कि चल ही तो रहा हूं ।
मेरे पास कई झोले हैं
कई आकार और प्रकार के
विभिन्न,
कम या ज्यादा सामान ले जाने के लिए
मैं तैयार रहता हूं
मेरे पैर नहीं चलते
केवल मेरा दिमाग चलता है
तो चल ही तो रहा हूं
मैं चलने की तैयारी करता रहता हूं
तो लगता है कि मैं चल ही तो रहा हूं ।
- - -  
(उग्रनाथ नागरिक)

शनिवार, 26 जनवरी 2019

क़ैद ईश्वर

कविता
--  --  --  -- 
मनुष्य शिखर पर
ईश्वर मंदिर में पड़ा
सोचता है -
मनुष्य से कैसे मिलूँ ?
* * * * *
(उग्रनाथ नागरिक)

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

आज़ाद औरतें

कविता
--  --  -- 
वह सती होती थीं
अपनी इच्छानुसार
अपने पति के प्रेमवश ।
वह नक़ाब पहनती हैं
अपनी पसंद से
किसी के कहने
किसी के दबाव में नहीं ।
वह शादी करती हैं
विवाह क़ुबूल करती हैं
अपनी पूरी सहमति के साथ ।
वह रसोई में जल जाती हैं
अपनी असावधानी से
कोई उन्हें जलाता नहीं ।
यहाँ तक कि वह
बलात्कार को बुलाने
आमंत्रण देने
देर रात सफ़र करती
घर से निकलतीं
आती जाती हैं
सब अपने मन से ।
हमारी स्त्रियाँ पूरी स्वतंत्र हैं
आत्मनिर्भर, स्वावलंबी ।
क्या आपको अब भी
बात समझ नहीं आती ?
--  --  -- 
-- उग्रनाथ नागरिक

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

शेर

सच बात कहने की दोनो को लत है,
कहीं तुम ग़लत हो कहीं हम ग़लत हैं ।

गुरुवार, 22 मार्च 2018

अमरत्व

ऐसा क्यों होता है
कि कोई हिन्दू पैदा होता है
तो हिंदुत्व पर गर्व करने लगता है
कोई मुसलमान पैदा होता है
तो इस्लाम के गुण गाने लगता है ?
ऐसे तो नहीं चलेगा भाई !
आदमी और इंसान
हिन्दू मुसलमान तो नहीं होता !
यदि हिन्दू को हिन्दू ही रहना है आजीवन,
मुसलमान को मुसलमान रहना है ताउम्र ,
तब तो आदमी को मरना ही है
इंसानियत अमर नहीं हो सकती कभी
अमरत्व की खोज क्या
कल्पना ही बेमानी है ।

मंगलवार, 13 मार्च 2018

करीब आ जाओ

पुरानी कविता, नया दम:
(इतना करीब आ जाओ)
--------------
तुम मेरे
इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाओ
कि मेरी साँस उखड़ने लगे
मेरा दम घुट जाए
और मैं मर जाऊँ ।
- - - - - - - -
पहले मैं
बड़े मेलों में जाता हूँ
फिर बड़ी सभाओं में
छोटे छोटे सम्मेलनों में
फिर छोटी गोष्ठियों
और छोटी मीटिंग में
छोटी से छोटी होती
कमरों की गुफ़्तगू में
शामिल होता हूँ ।
फिर बहुत ही छोटा
कोई गुरिल्ला ग्रुप बनकर
दुश्मन से चिपक जाता हूँ
उसके इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाता हूँ
कि उसकी साँस घुट जाए !
---   ---   ---   ---
(उग्रनाथ नागरिक) - 13 मार्च, 2018

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

अनादर्श

बिल्कुल आदर्श नहीं हो सकता
दुनिया मानवीय संबंधों पर चलती है
और मानवीय सम्बन्ध में
मनुष्यों का मुँह देखना पड़ता है
रोता हँसता गाता, मुँह चिढ़ाता, बिचकाता
आदर्श को थोड़ा जेब में रख
मनुष्य को गले लगाना पड़ता है ।

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

सिपाही

सिपाही
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तुम भी सिपाही
वह भी सिपाही
तुम सिपाही
उस सिपाही को
क्यों मारते हो ?
कहीं वह मर गया तो ?
उसके बाल बच्चों,
परिवार का क्या होगा ?
आज तुम उसे मारते हो
कल वह तुम्हें मारेगा तो ?
तो क्या होगा ?
तो क्यों मारते हो ?
क्यों अपनी जान पर तुले हो ?
मत मारो
जब मरना होगा वह मर जायेगा
जब मरना होगा तब तुम मरना ।
अभी क्यों मारते मरते हो ?
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रविवार, 7 जनवरी 2018

स्मारक

मैंने कहा था
मत बनाओ विजय स्तम्भ
मीनारें और बुर्ज
ये तुम्हें सालेंगी,
या उन्हें चिढ़ाएँगी
उकसायेंगी बदला लेने को
या पुनः करने को अपमानित
उन्हें जो भूलना चाहते हैं घाव
अपना दम्भ मत याद करो
तुम चुनौतियों से घिर जाओगे
जीत नहीं पाओगे
हार जाओगे
अब हारना हराना छोड़ो
दो रोटी दो धोती का जीवन जियो ।
मत रखो तस्वीरें पुरखों की घर में
बीत चुके गुरुओं, भगवानों की
अब कोई ज़रूरत नहीं इनकी
इतिहास से अब मुक्ति लो
देखो, बाहर चिड़िया बैठी है
चोंच फैलाये और तुम्हारे बच्चे ।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

रिनिता मजूमदार की कविता

a nice poem
by 

After the nationalistic euphoria of July 4, I think some of us, at least, are ready for anti patriarchical voices, here is my feminist poem, which was published in a while ago, and has now been translated into my "native" language (no I am a firm anti nationalist, this is for me a nostalgia perhaps) by another poet, Atanu Singha, thanks Atanu.
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A Love Poem
Tread gently into my being,
For in my pierced naked body,
You will find maze of pyramids,
Curved out of centuries of precious sorrows.
Love me gently with your soul;
Smell my sweet-bitterness
Like the venom of Kalkut.
For in me,
Ahalya is still a stone
Silent suffering.
Bring your ears
Close to my breast,
Do you hear Behula moan?
Can you see in my crimson eyes,
Draupadi in her blood-stained clothes?
Come close to my soul,
Taste in my tears a thousand flickering lights,
Holding silhouettes of nameless Devadasis
Gliding, dancing in Ujjaini,
In Vidisha,
Hollow in their body,
Hollow in their minds.
Love my body that is shamed,
Love my body that descends into the belly of my Mother Earth,
Love my body that is sacrificed
Scorched and burned.
Love my body that is drenched in crimson blood,
Cut into thousand pieces
Strewned in Holy Shrines.
Caress me gently;
Pluck my soul
String by string;
And in your caress my body will open up
Into a thousand Arabian nights;
Nameless dusky harem
Echoing pale ashavaris
Of incessant grief.

If you love me
And tread gently into my being
You will find maze of pyramids
Studded with mystical kohinoors.
Together we shall weave a net
More powerful than Indra’s,
Spun from freedom, Magic, and Myth;
In it we shall gently fly into the land of endless dreams.
And, in the shadows of a thousand graves,
I shall recaste my body;
There in my tribal self
I shall be your Apsara;
And together we shall tear our net,
And strewn the magical freedom
Like petals of white jasmine flowers;
Then, gently we shall flow out into your joy,
And in my tears …….

रविवार, 4 अगस्त 2013

14 Poems to Hindi Samay

To Hindi Samay
अभी कविताएँ         द्वारा -  उग्रनाथ नागरिक
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तूफ़ान में बहते लोग

[कविता नहीं ]

1 *मैं कविता नहीं लिख पाता
बस सोचता भर हूँ -
क्या दस- पचास हज़ार लोग सचमुच मर गए ?
क्या वे लोग भी मेरी तरह ही आदमी थे
जिन्दा, सांस लेते लोग ?
सोचता हूँ मैं उनकी तरह
मर रहा हॉता तो क्या दशा होती मेरी ?
कैसा अफनाए, छटपटाए होंगे
हाथ पैर मारे होंगे बचने के लिए
सांस फूली होगी, आँखें बाहर निकल आई होंगी
असफल प्रयास में, बच नहीं पाए
लाश होकर बह गए ?
क्या वे बच्चे, औरतें, बूढ़े, हमारे
घर के बच्चों, औरतों बूढ़े माँ - बाप
की तरह ही रहे होंगे
जिनसे मैं इतना प्यार करता हूँ ?
मैं अपने परिवार के लोगों को
निर्निमेष देखता हूँ
उनके इस तरह बिछड़ने की कल्पना से सिहर जाता हूँ |
डरा, सहमा हुआ बैठा हूँ मैं
मुझसे कविता नहीं हो पाती |
# #

[कविता ]
2 किसी के घर
एक वक़्त खा लेता हूँ
उसका शुक्रगुजार हो जाता हूँ
देश का तो रोज़ ही खाता हूँ |
#  #

[कविता ]
3- जलता तो है तवा
तपता, आँच सहता

और सिंकती है 'रोटी '
उस पर किसी और की ?
#  #

[कविता ]
4 उस औरत में
जिसके लिए पुरुष
अपनी जान
देता - छिड़कता है ,
उसकी माँ - बहन भी
शामिल है ,

और वह पुरुष
जिसके लिए औरत
तड़पती, छ्टपटाती है ,
उसका बाप और
भाई भी हो सकता है |
# #

[कविता ]
5 - मुसीबतें हमेशा
मेरे साथ चलती हैं ,
अभाव मेरे पीछे पडा रहता हैं ,
परेशानियाँ पीछे लगी रहती हैं ,
बीमारियाँ मुझे घेरे रहती हैं ,
क्या क्या कहूँ
सारे दुःख तो मेरे पीछे चलते हैं
अर्थात, मैं
उनके आगे चलने वाला,
कोई महामहिम
नेता हो गया हूँ !
#  #

[कविता ]
6 - आज मेरे बेटे ने
अपना कद नापा
वह अंदर से दौड़कर आया
पापा , मैं मम्मी के
दूध के बराबर हो गया हूँ
अब आप से नापूं
वह मेरे कलेजे तक था
और बड़ी बहन के चश्मे के बराबर .
मैंने कहा , बेटे
यह तो तुम्हारा स्थाई कद है
इससे कम तो तुम कभी न थे
इससे परे तो तुम
कभी न जाओगे |
#  #

[कविता ]
7 - मैं जानता हूँ , लोग हँसेंगे
सुनकर मेरी पीड़ा
तिस पर भी , मैं अपने दोस्तों को अपना दुःख
तार तार करके सुनाता हूँ ,
आखिर दोस्त हैं मेरे
थोडा हँस ही लें ,
वरना उन्हें भी जिंदगी में
कहाँ सुख नसीब !
#  #

[कविता ]
8 - अरे ! बारिश हो रही है
छज्जे पर मैंने
तुम्हारे लिए
आँखें बिछा रखी थीं ,
देखो, कहीं
भीग तो नहीं गयीं !
#  #

- [कविता ]
9 - हाँ बच्चो , मूर्ख तो हैं तुम्हारी दादियाँ
उन्हें अंग्रेजी डिमोक्रेसी के मूल्य पता नहीं -
व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसने जानी ही नहीं
प्राईवेसी का आदर वह क्या जाने ?
तुम आधे कपडे पहनकर बाहर निकलती हो
तो वह टोक देती है ,
भाई घुटनों के बल गिर जाता है
वह दौड़ कर धूल झाडती है
तेल मालिश करती, काजल लगा देती
और माथे पर दिठौना ,
उसके गले से नहीं उतरता कि अंग्रेजी डॉक्टर ने
यह सब करने से मना क्यों किया है ?
चलो अच्छा हुआ, अब वह गाँव भेज दी गयी
लेकिन क्या हुआ ? कल से जब से फोन आया
छुटकी को बुखार आ गया है , वह तड़प रही है |
मुझे हर घंटे बोलती है फोन करो, पूछो हाल !
बूढ़ा तो मैं भी हूँ, लेकिन थोड़ी दुनिया जानता हूँ
समझाता हूँ आज़ादी की बात - किसी की
व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल नहीं देना चाहिए ,
लेकिन वह मानती ही नहीं
मूर्ख जो है न ! तुमारी दादी |
# # #

10 -  [कविता ] " धोबी का कुत्ता "

पहले एक धोबी होता था
उसका एक घर होता था
उसका एक घाट होता था ,
उसका एक कुत्ता भी होता था
जो न घर का होता था
न घात का होता था |
लेकिन अब
सिर्फ कुत्ते होते हैं
उन्ही के घर भी होते है
उन्ही के घाट भी होते है
और विडम्बना !
उनका कोई धोबी नहीं होता |
# #

[कविता ]
11- बड़ी मुश्किल से तो
खंडहर हुयीं हैं इमारतें
जर्जर हुई थीं किताबें ,
तिस पर भी
इनके संरक्षण के लिए
पुरातत्व विभाग /
अभिलेखागार बनाये हमने !
क्या यह कम सबूत है
हमारी भलमनसाहत का ?
# #

[कविता ]
12 - मैं एक कफ़न हूँ
ज़िंदा ही जला दिया जाता हूँ
एक मुर्दा लाश के साथ
गोया कि मैं एक ज़िंदा लाश हूँ
लेकिन मुझे गर्व है कि
मैं शव का देता हूँ कब्र तक साथ
और उसके ख़ाक होने तक
उसकी लाज ढके रहता हूँ
तथा राख बनकर भी
तन से लगा रहता हूँ
फिर भी मुझे खेद है
कोई मुझे जीवन में
प्यार नहीं करता
आखिरी सांस तक
स्वीकार नहीं करता
बस चंद शहीदों के सिवा
वही तो मुझे
अपनाते हैं जीते जी
और मैं भी उन्हें
कभी मरने नहीं देता .
#  #

[कविता ]
13 - शहीद !
मर गए
चिरायु हैं ,
वे गिद्ध नहीं
जटायु हैं |
#  #

आखिरी [ कविता ]
14 - तुम जीवन में ऐसे आये ,
जैसे सुबह की पहली चाये |

शनिवार, 12 जनवरी 2013

बस इतने में


बस इतने में

मुझे याद है
उस दिन क्या हुआ था
हम तुम सड़क पर चल रहे थे
कहीं जा रहे थे
मैंने बहुत हिम्मत बटोर कर
तुमसे कहा- कह पाया था
मैं तुम से प्यार करता हूँ
तुम मुझे .... बहुत
अच्छी लगती हो
और झूट नहीं कहूँगा
तुमने भी हिम्मत की थी
मुंह खोल था
सामने सड़क को देखते हुए
बोल था - "मैं भी तुम से ---"
बस इतने में
एक बिल्ली रास्ता काट गई.
# # 


* तुम ख़ुशी से थूक दो 
मुझ  पर वह गुस्सा ,
जो सब मेरे लिए है |
# #


* हट जाऊँ 
तुम्हारे सामने से 
शायद तुम्हारे दिल में 
मेरे लिए 
प्रेम उपजे !
# #

शनिवार, 5 जनवरी 2013

किन्ही शायरों के

[ प्रातः स्मरण ]
किन्ही शायरों के कुछ अशआर :
* घर से मस्जिद है बहुत दूर, यह किया जाए -
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए |

* अमावट आ गया जब मार्केट में आम से पहले ,
तो क्यों मजदूर मजदूरी न माँगे काम से पहले ?

* यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बगैर ,
जैसे कोई गुनाह किये जा रहा हूँ मैं |


[ कविता ]

* प्रश्न था -
चुम्बन अश्लील है
या युद्ध ?
मैंने कहा -
युद्ध |
# #

* ज़िन्दगी भर
ज़िन्दगी के सामान
इकठ्ठा करता रहा ,
अब , जब सामान
इकठ्ठा हो गया
तब ज़िन्दगी
जीने का
समय ही नहीं बचा |
# #

* सोचो और
सोचते रहो कि
किसी को प्यार
करना चाहिए ,
किसी का प्यार
पाना चाहिए ,
लेकिन बस सोचो
सोचते रहो
सोच के दायरे से
आगे मत बढ़ो ,
किसी का प्यार मत लो
किसी को प्यार मत करो |
# #

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

तेरी रश्मियाँ



[गीत / ग़ज़ल ]
* जो ज़माने को बदले मेरे दरमियाँ,
ऐसी ताक़त है किसमें और वह है कहाँ ? [ मतला ]
* एकदा जो अँधेरे में मैं खो गया ,
मुझको ढूँढा करेंगी तेरी रश्मियाँ |  [ आमद का शेर ]




बुधवार, 2 जनवरी 2013

मर नहीं जायेंगे


* तुम रहो मेरे या हो जाओ गैर ,
मर नहीं जायेंगे हम तेरे बगैर |

* अब मेरी पत्नी बहुत बीमार रहती हैं ,
अब बड़ी मुश्किल से सड़कें पार होती हैं |

* गलतियों को माफ़ करना सीखिए ,
ह्रदय को शफ्फाफ करना सीखिए |

* प्ले तो प्ले था , असली वो था ,
जेब औरंग था , दारा शिको था |

* तेरे दीदार की ज़रा खातिर ,
मुसल्सल इंतज़ार तो मैं हूँ |
(To add to Gazal )