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बुधवार, 17 जुलाई 2019

मजदूर आंदोलन

।। एक मजदूर का धर्म और कर्म।।
वैसे तो मजदूर कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति, समाज या राज्य का हो। एक मजदूर इन सभी के बंधनों से मुक्त होता है।
चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, ईसाई हो, दलित हो, सवर्ण हो, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक हो सभी ने कभी न कभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरी किया होगा। मजदूरी करने के लिए किसी विशेष जाति या मजहब, समाज या समुदाय को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती, एक मजदूर के लिए कर्म ही प्रधान होता है। निरंतर कर्म करते रहना ही एक मजदूर का परम कर्तव्य होता है, परंतु अक्सर यह देखा गया है कि निरंतरता हमेशा बनी नहीं रहती।
एक मजदूर अक्सर जाति- पांति, वर्तमान में व्याप्त तथाकथित धर्मों, वैचारिक, सामाजिक व आर्थिक असमानता के कारण अपने पथ से विमुख हो कर राजशाही के विषैले कुएं में डूब जाता है।
और इसका मुख्य कारण है कि मजदूर का कोई संवैधानिक, सर्वव्यापी धर्म के आस्तित्व का ना होना। यदि मजदूरों का भी कोई व्यापक धर्म होता और उस धर्म का पालन करने के लिए विशेष विचारधारा होती तो कोई मजदूर कभी पथभ्रष्ट नहीं होता और निरंतरता हमेशा बनी रहती।
आवश्यकता है एक ऐसी विचारधारा की जो व्यक्ति को मजदूर बनाए रखे और एक पहचान की जिससे कि विचारधारा को लागू किया जा सके। पहचान को बनाए रखने के लिए ही आज इतने धर्म आस्तित्व में आये हैं, या समझ लीजिए कि पहचान को बनाए रखने के लिए जो विधि कार्य करती है उसी को धर्म कहा जाता है।
    तो क्यों ना एक ऐसा सर्वव्यापी धर्म हो जिससे कि कर्म प्रधान व्यक्तियों का आस्तित्व कायम रह सके? क्यों ना एक एक नए धर्म को आस्तित्व में लाया जाये जिसे मजदूरों के धर्म की संज्ञा दी जा सके और एक पहचान मिल सके?

सोमवार, 19 नवंबर 2012

दलित हो ? ज़रा उधर खिसको |


Notes for a Lekh :
 दलित हो ? ज़रा उधर खिसको |
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 * यह सारी लड़ाई झूठी है और हवा में लड़ी जा रही है |

* तुम ब्राह्मण को श्रेष्ठ , अपने को निम्न क्यों समझते हो ? इस से तो तुम अपने को नीच बनाते / बनाते हो | यह ठीक नहीं है , ऐसा कब तक चलेगा ?

* दलित कार्यक्रम में तुम सवर्ण विरोध के अलावा कुछ नहीं बोलते , तो सवर्णों से क्यों और कैसे आशा करते हो कि वे तुम्हारे पक्ष में बोलें ? सवर्ण भी मनुष्य हैं कोई देवता नहीं , और तुम तो किसी देवता को भी नहीं मानते , उन्हें भी अपशब्दों से सुशोभित करने से नहीं बख्शते ?

‎* दलित इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शीर्ष क्यों नहीं बनते ? लिखें नया मनुस्मृति , पढ़ें शास्त्र ! बनायें जन्मकुंडली , कराएँ मुंडन - विवाह संस्कार , गढ़ें उनके मन्त्र ! कौन ब्राह्मण रोक लेगा ?

* मैं दलितों से सहमत नहीं हूँ, पर भारत की राज्य सत्ता पर दावेदारी का पूर्ण समर्थन करता हूँ | दूसरी तरफ मैं मुसलमानों में घुलमिल कर रहता हूँ,पर भारत की सत्ता में उनकी हिस्सेदारी खारिज करता हूँ |

* अपना सारा दलितपन का मैला भरे प्लास्टिक बैग को हर समय अपनी जेबों में डाले घूमते हो कि कब कोई ब्राह्मण रूपी उचित स्थान मिले  और  तुम उस पर डालो !

* ब्राह्मण लडे न लड़े , जब तुम उसकी मूर्ति बना कर लड़ रहे हो तो वह तो तुम्हारे विपक्ष में अनायास ही आ जाता है , भले वह विपक्ष में न हो |

* मैं जाति प्रथा नहीं मानता | लेकिन सोचता हूँ ब्राह्मण वादी हो जाऊँ | फर्क अर्थात अंतर का दर्शन स्वीकार करूँ - अंतर ज्ञानी बनूँ | श्रेष्ठता और नीचता को जानूँ |  मैं क्यों न श्रेष्ठ बनूँ / बनना चाहूँ ? यह कंपटीशन, प्रतियोगिता का युग है भी तो !  तुम निम्न रहना चाहते हो तो रहो , श्रेष्ठता अधिग्रहण नहीं करना चाहते तो न करो , कुछ ख़ास न बनो |तब तो तुम दलित ही रहोगे |

* लोग आपत्ति करते हैं दलितों की भाषा पर | उन्हें इसे स्वाभाविक मानकर सहन करना चाहिए | जिसका स्वभाव , जिसका भाषा - संस्कार जैसा होगा वह वैसा ही तो बर्ताव करेगा ?

* एतदद्वारा  मैं दलित आन्दोलन इन पंक्तियों से उकसावा देकर तेज कर रहा हूँ | ठीक कर रहा हूँ , क्योंकि एक नेता का कहना है इसे इतना फेंटो , इतना फेंटो  - - कि - - |

* सवर्ण जाति में जन्म लेना हमारा भी कोई चुनाव न था | तुम मुझे गाली दोगे तो मैं भी तुमसे घृणा करूँगा | मैं जातिवादी हूँ या नहीं पर तुम्हारे मुहिम के चलते मुझे भी जातिवादी बनना पड़ेगा |

* एक विचार , मार्क्सवाद , सफल नहीं हुआ | तब भी विचारधारा के लोग उसका समर्थन छोड़ नहीं रहे हैं | ऐसे ही गांधीवाद के साथ हुआ , तो भी कोई उसे मानता है तो तुम्हे परेशानी क्यों होती है ? अब ब्राह्मणवाद यदि सफल है , या कहें - विफल नहीं हो रहा है तो तुम इसे क्यों नहीं मान रहे हो ?

* इसीलिये मैं कोई चीख चिल्लाहट नहीं पैदा करता जब कोई आरोप लगाता है - मायावती ब्राह्मणवादी हैं | पैर छुआती हैं , सबको नीचे बिठाती हैं | या सपा के कार्यकर्ता शारीरिक रूप से इतने प्रबल और सक्रिय क्यों हैं ? जिन्हें दुविधा हो , उन्हें हो | मैं तो जानता हूँ कि ऐसा ही होगा, ऐसा होगा ही | ब्राह्मणवाद ऐसा ही कहता है | माना जाना चाहिए, फिर भी लोग , वही लोग जो इसमें शामिल हैं , नहीं मानना चाहते तो क्या किया जाय कि ब्राह्मणवाद ही एक महान सफलतम सामाजिक वाद है | अमरीकी ब्राह्मणवाद , उसकी दादागिरी बराबर देखते , पर वामपंथी भी इस सत्य से मुँह चुराते हैं | ऐसी अज्ञानता को क्या कहा जाय ? और जब तक ब्राह्मणवाद को समझा नहीं जायगा , इसे अन्दर - बाहर से ठीक से पहचाना नहीं जायगा , तब तक इसे मिटाने कि हर कोशिश व्यर्थ ही तो जानी है ?

* और आरक्षण ? यदि किसी साझी संपत्ति से किसी को ज्यादा हिस्सा दिया जायगा तो तुम्हे भी तकलीफ होगी | फिर मिल तो रहा है ! लीजिये उपयोग कीजिये , उपभोग कीजिये | ऊपर से गाली क्यों देते हैं , जबकि पाने वाले को तो विनम्र होना ही चाहिए ?

* मैं आन्दोलनों में बिल्कुल विश्वास नहीं करता | इसके ज़रिये लोग न्याय संगत ही नहीं , गलत मांगें भी पूरी करा ले जाते हैं |

* तो , अब भी तुम दलित हो ? अपने को दलित समझते हो ? लेकिन मैं दलित नहीं हूँ | तब तो स्वाभाविक और अनिवार्य रूप से मैं ब्राह्मण हो गया | ज़रा उधर खिसक कर बैठो भाई !

सोमवार, 23 जुलाई 2012

संस्थाओं के नामों की अदला बदली


मैं जिलों , सड़कों ,पार्कों , संस्थाओं के नामों की अदला बदली के सख्त खिलाफ हूँ | क्या मैं परिवर्तन विरोधी हूँ ? नहीं , मैं इसे परिवर्तन के काम में बाधा मानता हूँ | यह एक निरर्थक , नकारात्मकऔर फ़िज़ूल का काम है | कोई सार्थक काम तो है नहीं इनके पास और कुछ मेहनत का काम न करना पड़े तो इन नामलोभी नेताओं के लिए बहुत आसान होता है , कुछ नामपट बदल कर फ़ौरन ख्याति कमा लिया जाय | हर्रे लगी न फिटकिरी ,लो मैंने यह तीर मार लिया | लोग कहते हैं किंग जार्ज का नाम रहने देना गुलाम मानसिकता है | मैं उलट कहता हूँ कि जार्ज का नाम हटाना और इससे यह भ्रम पालनाकि हमारी गुलामी मिट गयी, हम आज़ाद हो गए और इस तरह की अन्य कवायदें करना ही वस्तुतः गुलामी की निशानी है | कवायद ही है , इसलिए कि इससे कुछ भी हासिल नहीं होता | ऐसा करके क्या इस तथ्य को इतिहास से मिटा सकते हैं, या सत्य को झुठला सकते हैं कि भारत पर कभी अंग्रेजों का शासन था ? नहीं | तो रहने दीजिये उनकी यादगार अवशेषों को , जिससे पीढ़ियाँ उन्हें देखकर सबक लें और गुलाम होने से अपने को बचाएँ, बचाए रहने की कोशिशें जारी रखें | कभी गाफिल न रहें | मैं तो यह भी कहने का दुस्साहस रखता हूँ कि आर्य - शक -हूण तमाम तो लोग हिंदुस्तान आये ,मिटाओगे उनकी निशानियाँ ? क्या मिटा सकोगे ? तब तो खुद ही मिट जाओगे | और सचमुच मिटना ही हो तो फिर मुग़लों के स्थापत्य - कुतुबमीनार , इमामबाड़े , ताजमहल को थोडा छू कर तो देखो | वे भी तो मूलतः बाहर से आये आक्रमणकारी थे | पर इन्हें तो सजाया- संवारा- संरक्षित किया जा रहा है | किंग जार्ज का नाम हटाया जा रहा है क्योंकि अंगेज़ यहाँ नहीं हैं | उन्हें जो कुछ करना कराना था कर के चले गए, कोई ज़मीन उठाकर नहीं ले गए | मुग़ल यादगारें इसलिए आदरणीय हैं क्योंकि मुसलमान यहाँ हैं और बाकायदा हैं | क्या यह सोच गुलामी की सोच नहीं है ? यह किसी तर्कशील , न्यायप्रिय , स्वतंत्रमना , लोकतान्त्रिक ,समतावादी समाज की नीति तो नहीं हो सकती | भाई , सबको सामान दृष्टि से देखो , और जो अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित नहीं है उस पर मौत का फरमान न जारी करो | और यदि मारने का ही निर्णय हो चूका है तो सबको मारो जो दोषी रहे हैं |
इसलिए मैं मायावती जी द्वारा जार्ज या पुराने जाने माने , उसी नाम से प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम बदले जाने के खिलाफ था | सच थोड़ा कड़वा हो जायगा , लेकिन यह उनकी हीनभावना का द्योतक और नतीजा था | लेकिन फिर अब, जब उसका नाम बदला जा चुका था उसे फिर बदलने का कोई औचित्य नहीं है | कल और कल , कोई और कोई और आयेंगे और कोई रिक्शावाला भी मरीज को सही अस्पताल नहीं पंहुचा पायेगा | प्रश्न है ,यह सिलसिला कब तक चलेगा , कहीं विराम लगेगा या नहीं ? अरे भारत भाग्य विधाताओ, कुछ नया बनाओ तो उसका नया नाम कुछ भी रखो , पुराने से क्यों छेड़- छाड़ करते हो ? इस सम्बन्ध में कोई नए राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए | नहीं तो ये देश -प्रदेश के भी नाम  इतनी बार बदलेंगे कि उन्हें पहचाना ही न जा सकेगा | असंभव नहीं कि अपने माता पिता के भी | मेरी तो माँ निहायत साधारण गैर महत्व पूर्ण महिला थीं | मैं उनका वही नाम कायम और याद रखना चाहता हूँ जो देहातीपन , अनपढ़पन का शब्द है | गाँव पर मेरे स्कूल का नाम उसी के नाम है , और उस पर मैं अपनी गरिमा  की पहचान टिकाने में गर्व महसूस करता हूँ | ऐसा बिलकुल भय नहीं लगता कि  कहीं मैं दकियानूस न माना जाऊँ ? माना करे कोई | हाँ, यह भी हो रहा है कि कुछ नए प्रशासनिक अफसर अपनी देहाती पत्नी को गाँव छोड़ आये हैं और नयी आधुनिक शादी कर ली है | मुझे गर्व है कि मेरी अशिक्षित देहाती पत्नी मेरे साथ है | मैंने उसका नाम तक नहीं बदला , और कुछ लोग कहते हैं , मैं "कवितायेँ अच्छी कर लेता हूँ" |
मैं लोकतान्त्रिक मानस के स्थायित्व का पक्षधर हूँ | मेंढकों का कूद- फांद मुझे अच्छा नहीं लगता | स्वतंत्रता के छद्म मानकों और स्मारकों में मेरा मन नहीं लगता | सचमुच मैं अभिभूत हो जाता हूँ यह सोचकर कि यदि आप 10 , डाउनिंग स्ट्रीट के पते पर एक पोस्टकार्ड भेज दें तो वह श्रीमती मार्गरेट थैचर के पास नहीं ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के पास पँहुचेगा | # #
- उग्रनाथ नागरिक  - (अनीश्वर भारतीय) २४/७/१२

सोमवार, 9 जुलाई 2012

अब ब्राह्मण की सुनिए


यह तो हुई दलित की बात , अब ब्राह्मण की सुनिए |
अपशब्द दि . ९/७/१२ (भाग दो) | जिस ब्राह्मण की सामान्यतः बात की जाती है, वह न तो कोई व्यक्ति है न वाद | वह हर मनुष्य की स्वाभाविक - सांस्कारिक कमी -बेशी , अच्छाई- बुराई , दुष्टता- नीचता पर आधारित जीवन मार्ग है | और वह सबमे व्याप्त है | मुझमे तो है , आप में भी होगा ही | न मानें  तो मुझे बस एक दिन -रात अपने साथ रहने का अवसर दे दें , और बनावटी नही, सहज -स्वाभाविक दिनचर्या मेरे साथ बिताएँ तो मैं सबूत एक पन्ने पर लिखकर आपको दे दूँ | और कहीं यदि पूरा महीना अपने बरामदे में मुझे पड़ा रहने दें , तब तो मैं एक थीसिस लिख मारूँ | दूर क्यों जाएँ , यह " इनको इस ग्रुप से निकालो , इनको डालो " क्या है ब्राह्मणवाद नहीं तो { मैंने तो प्रिय सम्पादक को हमेशा खुला रखा } यही तो किया ब्राह्मण ने - तुम यह काम करो - तुम ऐसा करो ? | ' व्यवस्था है ' आप कहेंगे तो मेरे तर्कजाल में बुरी तरह फँस जायँगे | वह भी एक ऐसी ही व्यवस्था थी |
इसलिए इसे छोड़िये और अब ज़रा आँख (खोल ) उठा कर देखिये एक दूसरा  ब्राह्मण आपके द्वार खड़ा है | वह सुदामा नहीं है , न सनातनी भिक्षुक ब्राह्मण लकुटिया टेक | उसके पैर तो आपके घर के बहुत दूर ,बाहर हैं  लेकिन नाखूनी पंजे ठीक आपके सर पर | तवलीन का लेख पढ़ा आपने ? वह २६/११ का आतंकवादी नहीं , आपके देश पर "आक्रमण " है  | उसके पास सनातनी ब्राह्मण वाला जर्जर- फटा -वेदपुराण नहीं जिसकी आलोचना में आपकी साँसें नहीं थमतीं | उसके कंठ में आकंठ अकाट्य आसमानी शास्त्र है और ज़मीनी मार करने वाला अभेद्य शस्त्र भी | कह सकते हो -इससे हमें क्या , यह  हिन्दू जाने - ब्राह्मण जाने | अच्छा है वह मरे, जिसने हमें इस दशा में पहुँचाया | लेकिन जानना मित्र , यह हिन्दू ही है जिसके तहत तुम दलित हो | हिन्दू -हिंदुस्तान न होगा तो तुम सिर्फ दलित नहीं गुलाम भी होगे और तुम्हारी स्थिति उससे भी बदतर होगी | कहोगे , मैं अतिशयोक्ति कर रहा हूँ | अभी कल ही की तो खबर में है भारत के मुसलमानों को अपने विवाहों के पंजीकरण जैसी छोटी सी कागजी सरकारी कार्यवाही भी अस्वीकार है , उनका मज़हब इजाज़त नहीं देता , यह उनके अधिकारों में हस्तक्षेप है, जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकते | बेगुनाह मुस्लिम {ऐसा वे उन्हें पहले से ही निश्चित मानते हैं - भला मुसलमान कहीं आतंकवादी हो सकता है ? कदापि नहीं , कभी नहीं रहे , सदियों का इतिहास गवाह है , इतनी दूर से अल्लाह के बन्दे शांतिपूर्वक, बिना लड़े - भिड़े भारत आये और प्रेमपूर्वक राज करने लगे क्योंकि इस्लाम तो मोहब्बत का मज़हब है, पैगाम है , जिसे वेबड़ी शिद्दत-मशक्कत  के साथ फैला रहे हैं } युवकों को फँसाया जा रहा है , इसके लिए लिए जगह जगह सभा सेमिनार हो रहे हैं | मा.सं.मंत्रालय का मदरसों में पढ़ाई सम्बन्धी कोई कानून गँवारा नहीं | हिन्दू राज्य [राष्ट्र] की टिटपुंजिया सरकार की यह जुर्रत ? मुलायम का मंत्रिमंडल बुखारी की पसंदगी के विपरीत बन जाये ? सलमान रुश्दी -तसलीमा नसरीन हिंदुस्तान आ जाएँ , हो नहीं सकता | कितना गिनियेगा ? वन्दे मातरम वे नहीं गायेंगे , तो आपको भी उसमे ब्राह्मणवाद की बू ही आ रही होगी ? तो यह है २० -२५ फीसद  की ताकत और आप भ्रम में हैं कि आप बहुसंख्यक हैं मूल निवासी हैं | रहिये, आप अवश्य रहिये बहुसंख्यक ( वरना उन्हें नौकर- चाकरों की फौज कहाँ से मिलेगी ), बस उन्हें मुल्क का शासन दे दीजिये | आने वाले कल वे कहने वाले हैं कि  हमारा काजी सारे विवाहों का रजिस्ट्रेशन करेगा , और वही जो न्याय , जो फैसला करेगा वही भारत सरकार को मान्य हो , शेष अमान्य | हैं न दारुलउलूम भारत को दारुल इस्लाम बनाने के लिए ! देख सकते हों तो देखिये अब तक और अभी भी वे अपनी शर्तों पर भारत में रह रहे हैं  { ध्यान दे दीजिये -कहना चाहिए यह भी हिंदुत्व का एक हिस्सा है }, और अपनी ही शर्तों पर रख रहे हैं हिन्दुओं को पाकिस्तान में | घटना  प्राचीन या मनगढ़ंत तो नहीं है कि वहाँ लड़कियों को ज़बरन मुसलमान बना कर दूल्हनें या ? बनायीं जा रही हैं ?    
इधर यहाँ हम हैं कि पैदल सेना , घुड़सवार , गजवाहिनी , जल / वायु सेना सब आपस में लड़ रही है , और एक दूसरे को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं | खुशी मनाइए कि आप शीघ्र ही अपने चिरद्रोही-चिरशत्रु ब्राह्मण से छुटकारा पाने जा रहे हैं | ब्राह्मणवाद नया चोला , नया रूप रंग धारण करके आपकी सेवा में आपका उद्धार  करने हेतु पधार रहा है | स्वागत कीजिये | यह बिलकुल मत देखिये न चिंता कीजिये ,कि जो कहता है मेरा मज़हब सर्वश्रेष्ठ , मेरा अल्लाह सर्वशक्तिमान , और हम उसके बन्दे मुसलमान , वह निश्चयतः ब्राह्मण ही है और ब्राह्मण के आलावा कुछ नहीं है | ब्राह्मणवाद यही तो कहता है ? [नहीं अब इसे "था" कहना अधिक उत्तम होगा] | कि तुम नीच हो और हम उत्तम ? यह भी न गौर कीजिये कि मुसलमान भी जन्म से ही मुसलमान होता है | गाड पार्टिकल उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा | बहरहाल
रात ज्यादा हो गयी - अब शब्बखैर , यानी - -  

यह तो हुई दलित की बात


अपशब्द , दिनांक  - ९/७/१२ | नीलाक्षी जी संदीप एवं अन्य सभी मित्रो,जो इससे अपने को सम्बंधित समझते हों ! मैं आज सुबह से बहुत गुस्से में हूँ | कल इतना उद्विग्न था कि नींद की गोली खाकर ही सो पाया |  मेरे प्रातिभज्ञान [intuition] में यह पहले से ही था और उसे व्यक्त भी करता रहता था ,पर मुझे कहीं से सप्रमाण समर्थन प्राप्त नहीं था , और प्रबुद्ध साथियों  के निरंतर विरोध कारण एकाकीपन महसूस कर रहा था | लेकिन कल जब तवलीन सिंह को एक्सप्रेस में पढ़ा तो विश्वास हो गया कि मैं गलत नहीं,सही था | इस पर बस मैंने इतना किया कि उसे काटकर fb पर पोस्ट करना चाहा | टेक्निकली नहीं कर सका तो लिख दिया कि कृपया उस लेख को epaper  में पढ़ लें | काफी हाउस ग्रुप में मैं पोस्ट्स पर प्रतिक्रिया भले दे दूं पर मैं अपना कोई पोस्ट उस पर नहीं डालता , इस धारणा के भयवश कि इसमें बहुत बड़े बुद्धिपूर्ण लोग हैं , कौवे की तरह चालाक और होशियार जो सवेरे सवेरे गू खोदता है | कहें भले कि केवल राजनेता झूठ बोलते हैं पर बुद्धिजीवी भी केरियर या प्रतिष्ठा के लिए political correctness के तहत तमाम झूठ बोलते हैं और तमाम सत्य छिपाते हैं , सब मेरी तरह मूर्खता नहीं करते |
तिस पर भी आज सुबह जब ग्रुप खोला तो मुझे मेरी भी लाइनें गायब मिलीं तो मेरा पारा आसमान पर चढ़ गया | [यद्यपि बाद में वह दिखा जब बिपेंद्र जी ने पेपर कटिंग लगा दी | अब तो यह ग्रुप ओपन भी कर दिया गया पर मैं किसी घर में क्यों घुसूँ भले उसका दरवाज़ा खुला हो ?] लेकिन क्रोध / अवसाद का क्या , जो चढ़ गया तो चढ़ गया | वह बना रहा क्योंकि किसी ने उसे पढ़ा नहीं | इतनी फुर्सत किसे है ? वैसे ही वे इतना पढ़ लिए हैं कि ज्ञान साला छलका पड़ रहा है | और यह तो तय है कि देश किसी के अजेंडे पर नहीं है | जीवन और कर्म का कोई मकसद हो तब न वह सार्थक हो ? तो नीलाक्षी जी , भले आप की बात में सच्चाई ( सच्चाईयां भी एबसोलुट नहीं रिलेटिव होती हैं मैडम !) हो , पर मैं आप के हाथों "मूर्ख " का खिताब पाने की लालच में उसे सिरे से नकारने की धृष्टता करना चाहता हूँ | तो भी मैं "विप्र सकल गुन हीना " पूज्य हूँगा क्योंकि - - - -
जब देखो तब वही दलित , वही ब्राह्मण , वही जातिवाद , आरक्षण -अगड़ा पिछड़ा ! क्या और कोई विषय / समस्या नहीं दिखती ? हरदम सर पर ढोते फिरते हैं मानो कभी सामान्य आदमी नहीं होते | जातिवाद ख़त्म नहीं हुआ , तो यह कहाँ नहीं है ? वहाँ भी है जहाँ नहीं होनी चाहिए, जिनकी किताबें बड़ी पाक साफ़ हैं  | मुस्लिमों में कितनी जातियां हैं और उनमे कितना फर्क ,भेदभाव है क्या आप जानते है ? वहाँ भी सबकी अलग अलग टोपियाँ है और अलग मस्जिदें | नहीं जानेंगे क्योंकि दूर से फर्जी समर्थक हैं | सुबूत स्पष्ट है कि इसी कारण वहाँ से भी आरक्षण कि माँग है | मैं unka विरोध नहीं कर रहा हूँ | सबकी अपनी मजबूरियाँ है | उनकी वकालत भी नहीं कर रहा हूँ पर खूबी तो है कि वे विभेदों के साथ जीने - रहने के आगे एकजुट भी रहना जानते है, वरना वहाँ भी अल्लाह , मोहम्मद और कुरान पर सह मति के साथ तमाम असहमतियां हैं | अन्य धर्मों की भी यही हालत है | तो क्या केवल हमीं हैं जो हर वक्त सिर्फ विभेदों का रोना रोयेंगे और उनके  साथ जीवन को  जियेंगे नहीं ? क्या किसी भी दशा में सबके साथ निर्वाह संभव नहीं है | अभी तक तो हो रहा था , अब ऐसा क्या हो गया ?अख़बारों में ही देखिये "चमार " , 'कूर्मी ' आदि श्रेणियों के भी वैवाहिक विज्ञापन छपते हैं | वैसे भी चमार भंगी पासी कोहाँर कुर्मी अहीर कोई भी जाति बाहर विवाह नहीं करता /करना चाहता | सब अपने मानस -संस्कार के गुलाम हैं ,तो ब्राह्मण भी है | वह भी दरिद्र है ,आप की दया का पात्र है | कोई ब्राह्मण लड़की आपके घर क्यों आयेगी जब सुहागरात में पहले तो उसके बाप की जाति को १८ गालियाँ सुनाएँगे, उसका मूड उखड जायगा | फिर उसका पैर भी  नहीं सहलायेंगे कि "साली , तुम कोई ब्राह्मण नहीं हो " ? तो क्या वह आजीवन कुँवारी रहने और तिरस्कार सहने के लिए तुम्हारे घर आयेगी ? इस प्रकार के द्वेषभाव से तो कोई समाज नहीं बनता ,न बना है , तरक्की तो दूर | युद्ध / गृहयुद्ध की स्थिति भले आ जाय | तो जिसमे आपका भला हो वही कीजिये हुज़ूर क्योंकि  अपने अलावा किसी की ,और आगे कुछ देखने की चाहत तो दिखाई नहीं पड़ती | आरक्षण बहुत कमजोर साथी है और दलित होने के असम्मानजनक पहचान और ख़िताब को खुद उसकी लालच में छोड़ नहीं पा रहे हैं , दलित नामक मैले के टोकरे को कुछ टुकड़ों के चलते फेंक नहीं पा रहे हैं मानो वह हमेशा के लिए व्यवस्था हो ! आंबेडकर के अनुसार तो वह समय सीमा समाप्त है पर नालायक कार्यपालिका के कारण बढ़ाना पड़ा , तो वोट की राजनीति के चलते पिछड़े भी रेवड़ी लेने पहुँच गए | अपनी ईज्ज़त का कुछ ख्याल नहीं, तिस पर कहते  हैं हमारी कोई इज्ज़त नहीं करता {सामाजिक सम्मान के लिए है आरक्षण !} | बताइए जब जन्म से लेकर जीवन भर 'पिछड़ा ' ही होना/ बने रहना है तो "प्रगतिशील" कैसे हो सकते हो ?और तुर्रा यह कि कम्युनिस्ट बनेंगे | अब यह तो आसान है सारी स्थितियों के लिए दो हड्डी  के सींकिया पहलवान ब्राह्मण को दोष देकर छुट्टी पा लीजिये | खुद कुछ करना न पड़े , कोई ज़िम्मेदारी स्वयं न उठानी पड़े यह ब्राह्मणी नीति हो न हो , हिंदुस्तान का तो राष्ट्रीय चरित्र है | इसमें आपका कोई दोष नहीं है | दोष मेरा भी नहीं है जो मैं मूर्ख हूँ |
यह तो हुई दलित की बात , अब ब्राह्मण की सुनिए | लेकिन लगता है पन्ना कुछ बड़ा हो गया | उसे आगे पोस्ट पर लिखता हूँ , यदि नेट ने साथ दिया तो = =

मंगलवार, 26 जून 2012

चन्द्रदत्त तिवारी : एक स्मृति

चन्द्रदत्त तिवारी-एक व्यक्ति-एक प्रवृत्ति  : एक स्मृति
सन 1980 में जब मैं लखनऊ आया तब मैं त्रिशंकु की स्थिति में था। निम्न मध्यवर्गीय अनुशासन में पला-दबा मैं स्वभाव से ही संकोची था। मन में एक विद्रोह तो था,  कुछ पढ़ाकूपन, कुछ वैचारिक ऊहोपोह, कुछ कवितार्इ गुन और ढेर सारी जिज्ञासा- यही मेरी पूँजी थी। मेरी नौकरी भी कोर्इ इज्जतदार न थी जिसके कारण मैं एक अदृश्य हीन भावना का शिकार जीवन भर रहा, जिससे मैं अभी पांच वर्ष पूर्व स्वैचिछक त्याग पत्र देकर ही मुक्त हो पाया। यहाँ आते ही मजदूर किसान नीति आर्इ आर्इ टी कानपुर के सुनील सहस्त्र बुद्वे के  एक चुनाव अभियान के संदर्भ से भार्इ ज्ञानेन्द्र (अब स्वर्गीय) और प्रमोद जोशी (अब हिंदुस्तान दिल्ली के वरिष्ठ संपादक) मेरे क्वार्टर आये और शाम मीटिंग में मैं अनुपम (अब दस्तावेज प्रकाशन) के घर गया। राजनीति तो मै क्या समझता वहीं एक जादुर्इ युवा व्यक्तित्व से भेंट हुर्इ । वह थे राजीव...........।

लेकिन मैं उनसे कम ही मिलता। पड़ोस के ज्ञानेन्द्र जी से अधिक भेंट होती। ज्ञात हुआ कि राजीव एक प्रशासनिक अधिकारी के पुत्र हैं, जय प्रकाश आंदोलन की उपज हैं राजनीतिक विश्लेषक और लेखक-संघटक हैं। साइकिल से चलते हैं सर्कुलेटिंग लाइब्रेरी चलाते हैं। उनके साथ युवाओं की बैठकें चलती रहीं। इनके बीच मुझे संतोष इसलिए मिलता कि अन्य युवक जहाँ लोफरर्इ करते हैं वहां इनको देखों कि राष्ट्र निर्माण के काम में लगे हैं। ये युवा मेरे आदरणीय हो गये जब कि आयु में मैं बड़ा था, बस आयु में ही। जाहिर है ये लोग विश्वविधालय शिक्षा रत या युक्त थे। इनके मुकाबले मैं कहीं नही ठहरता था। वैसे भी मैं ऐतिहासिक तथ्य नहीं, कथ्य या तत्व ही पकड़ता था। मैं इनकी किताबों के स्तर पर जा नहीं पाता। प्रमोद और आशुतोष जी के हास्टल के कमरे में जाता तो ये बेड पर किताबों पर ही सोते बैठे पढ़ते मिलते मुझे अपनी अशिक्षा पर ग्लानि होती। मैं इधर-उधर  से किताबें लेकर पढ़ने का नाटक करता। पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ कहकर अपनी खिसियाहट भले ही छिपा लूँ पर सत्य तो यही था कि मैं अशिक्षित था। फिर यह कबीर का जमाना तो है नहीं कि अपना सम्मान मैं बिना पढ़ा लिखा होकर भी बचा पाता और बिना अपमानित हुए विचार जगत में रह पाता। फिर मेरी सहज प्रियता और नाम व प्रतिष्ठा के प्रति-मेरी तीव्र अरूचि ने मुझे और लतखोर बना दिया साथी भी कोर्इ साधु संत योगी तो थे नहीं जो मुझे जान पाते कि मेरी कहाँ पैठ है। एक âदय के साथ थोड़ी अपनी भी बुद्वि है। मैं अपने निर्णयों पर अपनी ही तरह पहुँच कर निमग्न रहता हूँ। यह मैं किसी से कैसे बताता कि मैं भी कुछ निश्चयात्मा और अग्नि गर्भा हूँ। तो इसी अपनी कल्पना व धारणा शक्ति के साथ मैं एक चावल की खिचड़ी अपने मन में खुद बुद पकाता रहता और मुझे विश्वास होता कि मैं नमक ठीक डाल रहा हूँ। और हल्दी सही रंग ला रही है। लेकिन ज्यादा पढ़े लिखे लोग गलत फहमी में रहे। यह मेरे लिए उचित ही था परन्तु जब यह गलत फहमी जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती तो कुछ विवाद हो जाते और मेरा मन दुर्वासा हो जाता। मेरी कुछ बूँदे खून की जलती जिसे मैं तो पूरा कर ले जाता पर नुकसान साथियों का होता जो एक संत वचन और सत्संगत से वंचित हो जाते इस कथन में कोर्इ अतिशयोक्ति नहीं है। इतने क्षेपक के बाद किस्सा यह कि-युवजन समिति ने जब जाति छोड़ों आंदोलन चलाया तो यह मेरे मन की बात हो गर्इ। जातिनाम मैं पहले ही हटा चुका था। इसके लिए हमें गांधी, लोहिया, कृपालानी आदि महात्माओं का सूक्ष्म आशीर्वाद प्राप्त था। अत: मैं इसमें âदय से शामिल हुआ। मौलवीगंज की पूरी टीम प्रभात, अनूप, मुकेश, छविधाम, हमराही, अशोक आदि साथ में प्रमोद, अवधेश, हरजिन्दर, आलोक एवं अन्य इसमें थी। तो राजीव हेमकेशव हुए, प्रमोद श्री हरीश हुए और अन्य लोगों ने या तो जातिनाम पर हटाया या कोर्इ जातिहीन उपनाम लगाया। मैं, उग्रनाथ.... से उग्रनाथ हुआ। बाद मैं नागरिक तखल्लुस ज्यादा पुकारू हुआ। आंदोलन के चरण आगे नहीं बढ़े पर मुझ मोंदे मिट्टी में उत्साह-ऊर्जा का सृजन हुआ। इसी कार्यक्रम में चन्द्र दत्त तिवारी जी को सुना। वह इस नाटक के ज्यादा तरफदार न थे। इसी आयोजन में एक और उपलब्धि हुर्इ। राजीव ने मुझसे मोटर साइकिल से मान्य सुरेन्द्र मोहन जी को अतिथिगृह पहुँचाने को क्या कहा कि समाजवाद मेरे पीठ पर यूँ ही चपक गया बिना समाजवाद की कोर्इ किताब पढ़े। बाद में आचार्य नरेन्द्र देव पर किताबों का बंडल तिवारी जी के कहने पर दिल्ली सुरेन्द्र मोहन जी घर देने भी गया।

    युवा संगत ने गुल खिलाना शुरू किया। मेरी रूचि ज्यादा र्इश्वर धर्म अध्यात्म में थी। प्रश्न तो उठते थे इनके बारे में पर इनसे लड़ने में डर लगता था। हाय कहीं नैतिकता न नष्ट हो जाय। ऐसे मे राजीव ने मुझे ऐसी शख्शियत से मिलाया जो नायाब थी। मैं बड़े संकोच और विनम्र भाव से एस.एन. मुंशी जी से मिला। फिर मेरा कोर्इ साइक्लोस्टाइल परचा लेकर वे मेरे क्वार्टर आ गये तो मैने मानववाद का पाठ सीखा। वे पूरे विज्ञान मूर्ति थे और उतना ही अजूबा था उनका संस्कृति प्रेम। उनके घर का निचला हिस्सा डी.एन. मजूमदार  संग्रहालय हुआ करता था। वहीं भेंट हुर्इ डा यशोधर मठपाल से जो मेरे पुराने दिनमानी पत्र लेखक मित्र थे-अब भीमताल में लोक कला संग्रहालय चलाते हैं। मुंशी जी से क्या कितना कुछ सीखा बताना मुशिकल है पर एक सूत्र दूँ- कि विषयों में अन्तर नहीं किया जा सकता। इतिहास विज्ञान, राजनीति, कला साहित्य संस्कृति सब एक दूसरे से जुड़े हैं।

उनका घर पूरा पुस्तकालय थ। उनकी ही दो किताबें थी एक एम एन राय का नवमानववाद और दूसरी उनकी वैसी ही कहानियों का संग्रह-प्रश्नोत्तर। वैज्ञानिक मानववादी साहित्य बहुत आता था वहाँ। रेडिकल âयूमनिज्म आगे मेरे बड़ा काम आया। उल्लेखनीय यह है कि उनके घर पर विचार गोष्ठियाँ चलती थी और मैं कहीं दुबक बैठ बड़े लोगों की बातें सुनता। विषय बड़े होते कुछ समझ में आती ज्यादा सर से ऊपर गुजर जाती पर मैं पीछे लगा रहता। मैं बिल्कुल नशेड़ी था विचार गोष्ठियों का कहीं भी होती पहुँच जाता और वहां से कुछ खुराक लेकर अपना दिमाग उनमें उलझाए रखता। विचार अभ्यास में इनसे बड़ी मदद मिली। चन्द्र दत्त तिवारी जी के घर नियमित विचार केन्द्र चलता । एक और स्थान था राजा साहब कोटवारा का घर जहां नरसिंह नरायन द्वारा स्थापित इन्डियन हयूमनिस्ट यूनियन था। इन स्थानों पर तमाम वरिष्ठ विचार कर्मियों के दर्शन होते। डा. हर्ष नारायण, के.के. जोशी, भुवनेश मिश्र, डा देवराज, रघुराज गुप्ता, संकठा प्रसाद आदि। और यहीं  मिली डा. रूपरेखा वर्मा। एक स्त्री और इतनी विदुषी! मैं सपने में भी नही सोच सकता था। दकियानूसी ग्रामीण परिवेश में न कभी ऐसा देखा न सुना। सो अभिभूति हुआ उनसे।

मैं निश्चित ही ऋणी हूँ कि मुंशी जी ने मुझे मानसिक ऊहापोह से निकाला उसे फिर तार्किक रूप से मजबूत किया रूपरेखा जी ने। उन्होने मेरे पढ़े लिखे टेढे मेढ़े वक्तव्यों का शोधन करके मुझे अपने विचारों पर आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया।

यह उन्हीं की कृपा थी कि बी.एस.सी प्रथम वर्ष फेल मैं उनकी दार्शनिक सभाओं में जा सका और कालान्तर में तो उन्होने आर्इ सी पी आर (भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद) की लाइब्रेरी का सदस्य भी बनवा दिया जहां से मैं इन्डिविजुअलिज्म (व्यक्तिवाद अपनी कापी पर उतार कर भाग आया)

    अंतत: तो फिर मुंशी जी ने जोरदार ठप्पा लगा दिया। उस समय मैं बाहर डयूटी पर था। लौटकर आया तो पता चला मुंशी जी नहीं रहे। घर गया तो बस-एक सन्नाटा उनकी पत्नी मिलीं उनके अपनी कोर्इ औलाद न थी, और यह उनके वैज्ञानिक मानस के लिए कोर्इ समस्या न थी। लाश का क्या हुआ, वह तो मेडिकल कालेज दे आयी। उनकी आँखें किसको लगार्इ गर्इ मुझे पता हुआ। तो क्या कुछ नहीं मिलता नहीं वहां एक एक नस एक एक तन्तु चीर फाड़कर विधार्थी अध्ययन अनुसंधान करते फिर कुछ नहीं बचता। कोर्इ क्रिया-कर्म का सवाल ही नहीं उठता। मैं आसमान से गिरा धरती पर। क्या ऐसा हो सकता है...

हाँ, र्इश्वर और धर्म के बगैर भी काम चल सकता है मेरे दिमाग में पक्का हुआ। मानववाद मन में बैठ गया। तब तक पेपर मिल कालोनी भी आने जाने लगा था। मेरी हस्तलिखित पत्रिका के पहले वार्षिक ग्राहक पांच रू0 मेरे घर आकर देने वाले चन्द्रदत्त तिवारी जी थे। वे मेरे पड़ोस में जय प्रकाश जी के घर आते थे। उन्हीं से ही इनके बारे में ज्ञात हुआ। बड़े त्यागी है। बड़े घर खानदान के हैं। डी0ए0वी0 कालेज इन्हीं लोगों का है इनके पिता स्वतंत्रता पूर्व विधायक थे, मोटर गाड़ी से चलते थे। ये साइकिल से चलते हैं पूरी इमरजेंसी जेल में रहे। चन्द्र शेखर के दोस्त हैं। जनता पार्टी के एम एल ए का टिकट वापस कर दिया। मुझ गरीब के लिए नैतिकता या बड़प्पन का इतना बोझ बड़ा भारी था। तभी इनकी दृढ़नीति या जिद्दी चरित्र का भी परिचय मिला। जय प्रकाश के पुत्र के जन्म दिन पर वे नहीं आये तो नहीं आये। मैने दूसरे दिन कहा आपने बहुत अच्छा भोजन मिस कर दिया। मैने जीवन में बहुत कुछ मिस किया है  उनका कहना था। वह ऐसे समारोहों को निरर्थक फिजूल खर्ची बताते और इसीलिए अपना जन्म दिन भी सबसे छिपाते। तिवारी जी की खिचड़ी समाज कर्मियों के बीच बहुत लोकप्रिय थी। तमाम सब्जियों से मिश्रित यहां तक कि उसी में वह अंडा भी तोड़कर डाल देते। वह पौष्टिक तो होती पर स्वादिष्ट नहीं जिसके हम पूर्वाचंली अभ्यस्त है। लेकिन कभी-कभी तो खाना ही पड़ता। सम्पूर्ण क्रांति से जुड़े तमाम साथी इसे खा चुके हैं। सो मैने भी खार्इ। लेकिन मैने डाँट भी बड़ी खार्इ।। फोन पर 8 बजे आने को कहते। पहुँचे तो घड़ी दिखाते । यू आर लेट बार्इ एट मिनट्स ऐसे जुमले वह अंग्रेजी में बोलते । आस्कर वाइल्ड उनके प्रिय लेखक जो थे । मैं पार्टी लेस डिमाक्रेसी (जय प्रकाश नरायन का दलविहीन प्रजातंत्र) की बात करता तो डाँट खाता। कहते-जय प्रकाश ने इसकी कोर्इ रूपरेखा नहीं बतार्इ। मंडल आयोग के पक्ष में बोला तो विपिन त्रिपाठी न होते तो मैं मार खाने की कगार पर था। यदि कभी महंगी सब्जी ले आता तो फटकारा जाता । (बाद के दिनों में मैं अपने घर से झगड़ा करके उन्हीं के पास रहने-खाने लगा था। अब उनके जाने के साथ वह आश्रय भी समाप्त हुआ) लेकिन उनका यह सब मुझे बाल सुलभ लगा क्योंकि फिर वह हँसी के मूड में आ जाते। मितव्ययिता के प्रति उनके अति-अनुराग का विरोध करने पर वह मान तो जाते पर हारते नहीं कहते अपनी अपनी एटीट्यूड (प्रवृत्तिआदत) की बात है। दही बड़े के बडे़ शौकीन। बस बताने भर की देर होती तिवारी जी घर आ जाते । हाँ तब भी डाँट खाने की नौबत आती यदि कहीं टोटीं से पानी टपक रहा होता या कोर्इ बत्ती बिला वजह जल रही होती खाना खाते और अलसा जाते तो सो भी जाते। यह एहसान केवल मेरे या जय प्रकाश के ही ऊपर नहीं था। उनके ऐसे असंख्य परिचित घर थे। इसलिए उनका काम शीशे के मर्तबान में रखे चावल की मात्रा से चल जाता। उन्हें चाय का बड़ा शौक थां अंग्रेजी तरीके से बनाते। चाय की प्याली पर हरजिन्दर का थ्री एंड अ हाफ एंड अ लिटिल मोर (चम्मच चीनी) हमारे बीच हमेशा मजेदार रहा। उनकी मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व हमने इसका एक साथ पाठ किया था और खूब हँसे थे। विचार गोष्ठियों में उनकी सहभागिता भी मनोरंजक होती। सब लड़-झगड़-बहस कर रहे होते, तिवारी जी मध्यस्थ सो रहे होते। वैचारिक उत्तेजना उन्हें परेशान नहीं करती थी। इसके लिए मैं उनकी माइनस मार्किग करता। अलबत्ता वे कुछ वाक्य पकड़ते और लेकर उड़ते रहते। उनके घर पहुचँता तो कभी कम्युनिज़्म इज द ओनली वे कभी गांधी का देयर आर एज मेनी रिजीजन्स एज देयर हेडस। फिर रीइवैल्युएशन आफ एक्जिस्टिंग थाट्स। आखिरी दिनों में प्रश्न उठा रहे थे बीसवी सदी का सबसे महान नेता बताओ। गांधी नही। माकर्स नहीं। वह थे अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट जिन्होने फासीवाद के विरूद्व लड़ार्इ में बिना माँगे ही रूस को मदद दिया। ऐसी ही कमी कुछ विचार कमी कोर्इ शोशा। वह साइकिल से चलते थे। लेकिन मौका मिलने पर स्कूटर पर लिफ्ट का पूरा दुरुपयोग करते। ऐसे ही एक दिन मुझसे कहा चलो प्रमोद श्री हरीश के घर चलो। तब तक शिव वर्मा व भगत सिंह के अनुज कुलतार सिंह व अन्दमान के अन्य जीवित साथियों के साथ पुराना किला दुर्गा भाभी के आवास में शहीद स्मारक व स्वतंत्रता संग्राम शोध केन्द्र की स्थापना हो चुकी थी। दुर्गा भाभी भारत के प्रथम मान्टेसरी पद्वति विधालय- लखनऊ मान्टेसरी इन्टर कालेज का प्रबंधन चद्र दत्त तिवारी को सौपकर गाजियाबाद जा चुकी थी। और शायद प्रमोद कुमार श्रीवास्तव इतिहास में पी.एच.डी कर चुके थे। वह संस्थान के निदेशक पद के लिए संपूर्ण उपयुक्त है। उच्चशिक्षित और अति ऊर्जा वान। नतीजा यह कि आज वही प्रमोद जी इस संस्था केा मित्र प्रभात जी के सहयोग से लगभग अकेले ही सफलता पूर्वक संचालित करने में सक्षम हैं। अभी फरवरी माह में ही शिव वर्मा द्वारा लिखित नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन इसी परिसर में हुआ। यह सब उन्हीं के प्रयासों का फल है। तो हम लोगों का यह सारा सम्पर्क उस विचार केन्द्र का परिणाम था जो उनके घर पर अस्सी के दशक में चलताथा। यहां आने वाली विभूतियों में केएन कक्कड़, चद्रोदय दीक्षित, रमेश दीक्षित, रमेश नागपाल, आशुतोष मिश्रा, नवीन तिवारी, रमेश तिवारी, पारसनाथ मिश्र, डा नरेन्द्र, चन्द्रपाल, अरूण त्रिपाठी, अंबरीष, पुनीत टण्डन, पेन्टल, वीरेन्द्र यादव, अजय सिंह के नाम लिए जा सकते हैं राजीव और रूपरेखा वर्मा तो थी ही। कितने नाम गिनाएं लखनऊ के सामाजिक संपर्क का हर सूत्र तो कहीं न कहीं तिवारी जी से जुड़ता हैं उन्होने विवाह नहीं किया था, रोटी के लिए कोर्इ रोजी करनी नही थी। इसलिए उनके सम्पर्को संबंधों की भरमार थी। यूँ भी उनके घर किसी को भी आने में हिचक नहीं हो सकती थी क्योंकि वे लखनऊ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ार्इ की थी। वाइस चांसलर तक से अभिन्नता थी और राजनीतिक नेताओं त्रिलोकी बाबू, सी.बी.गुप्ता, भगवती सिंह आदि से निकट सबंध थे। अलबत्ता इन्होने इसका कोर्इ गलत लाभ नही उठाया न प्रचार पाने के ही अभिलाषी रहे। यह कुछ कम न था। अब ऐसे लोग कहां मिलते हैं।

    अपने घर पर ही एक बार मित्रों से उन्होने कहा कोर्इ संगठन बना लो वरना यह तो (यानी मैं) मारा जायगा। तब मैं बाबरी मस्जिद सबंधी विवाद का अत्यंत विरोधी था। बल्कि मैं सांस्कृतिक विखंडन भी करने लगा था। इसी की सजा में एक वरिष्ठ राजनीतिक कार्यकर्ता ने मेरे हाथ का छुआ पानी भी पीने से मना कर दिया था। बहर हाल तब तक रूपरेखा जी विश्वविधालय में सेक्युलर संगठन की रूपरेखा बना चुकी थी। अब वह कार्यशाला तिवारी निवास पर चलने लगा। सेक्युलर वाद के विभिन्न पक्षों पर बातचीत और नास्तिकता, सशंयवाद, तर्कबुद्विवाद, रहस्यवाद, मानववाद पर सैद्धान्तिक चर्चाएं शुरू हुर्इ। इसमें मेरी पूरी रूचि थी। सो के के जोशी के साथ सेक्युलर सेन्टर की भूमिका लिखी गयी। मै सेक्रेटरी बना। तिवारी जी संयोजक बने। और कोर्इ पद नहीं था क्योंकि इसके पंजीकरण का कोर्इ ख्याल न था। मानववाद में दिली आस्था के चलते मैं इंडियन सेक्युलर सोसाइटी का आजीवन सदस्य बन चुका थां इंडियन हयूमनिस्ट यूनियन की पत्रिका मंगवाने लगा था। अथीस्ट सेंटर, रेशनलिस्ट एशोसिएशन के प्रभाव में था। पटना के डा रमेद्र बुद्विवादी के साथ उन्हीं दिनों चले। गोरा, डा कोवूर, होलिओक, चाल्र्स ब्राडला मेरे गुरू थे। सो इन पर आधारित चर्चा होती और मूल्य निर्धारित होते तब तो मैं किसी काम का था। वरना राजनीतिक सेक्युलर वाद के तो कर्इ संस्करण हैं और उनमें आपस में ही गहन विभेद हैं तो ऐसी धर्मनिरपेक्षता पर कोर्इ एक समझ सहमति सदस्यों में स्थापित होती इसके पहले ही तात्कालिक राजनीतिक आवश्यकता वश एक राष्ट्रीय अधिवेशन का फैसला ले लिया गया। मुझे राजनीति की समझ बिल्कुल न थी। मैं केवल शास्त्रीय सेक्युलर वादी था। लोकायत वादी चार्वाक फिर बुद्व, कबीर तक तो मै खींच ले जाता पर आडवानी संधवानी की धर्म निरपेक्षता मेरी समझ से बाहर थी। और मुझे स्मरण नहीं कि सांप्रदायिक हिंदू मुस्लिम पक्षों पर कोर्इ खुलकर बात हो पार्इ थी ऐसे में अधिवेशन (ग्यारह-बारह अक्तूबर 1986 का लगभग पूरा काम तिवारी जी, रूपरेखा जी, प्रमोद जी, आलोक जोशी, जय प्रकाश प्रभात जी ने हीसंभाला और धर्मनिरपेक्षता  राज्य का घोषणा पत्र पारित हुआ। उसका अपना महत्व रहा होगा लेकिन मेरे ख्याल से अन्तत: सेन्टर की राजनीति परकता ही इसके बिखराव का कारण बनी। एक दिन तिवारी जी ने सेक्युलर सेन्टर का सारा कागज मेरे ऊपर फेंक दिया। मुझे कुछ हासिल हुआ तो बस अपना लिखा एक परचा और जो परचे कुछ आये थे। कुछ और याद करूँ तो असगर अली इंजीनियर का न आना भी  एक उपलबिध थी। ओर एक था किशन पटनायक के पत्र के उत्तर में मुझे तिवारी जी द्वारा बोल-बोलकर लिखाया गया एक जवाब जिस पर एक पूरा विचार केन्द्र अलग से विशेष चलाया जा सकता है। संक्षेपत: र्इश्वर असंख्य जनता के विश्वास के जवाब में तिवारी जी ने लिखाया कि जो नहीं है उसका नहीं होना बताना ज्यादा आसान है या कि उसका होना प्रमाणित करने की जिद करना और अंधविश्वास में रहना। प्रश्न वाकयी गंभीर था पर वह हमसे भी छूट गया। प्रमोद जी लखनऊ एकता चलाने लगे एवं रूपरेखा जी और मैं नागरिक धर्म-समाज । उसकी अलग कहानी है।

    बहर हाल इन सक्रियताओं के बीच में ही तिवारी जी ने हम लोगों को स्कूल व शहीद स्मारक संस्थाओं से भी जोड़ा हुआ था यह उनका हमारे प्रति विश्वास का ही प्रतिफल था वरना हम इसके योग्य न थे। अभी साल भर ही पूर्व मुझे उन्होने चार लाख रूपये से एक ट्रस्ट बनाकर उनकी वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वप्न को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव किया था। वह तो भला मैं क्या करता पर उनका मेरे प्रति इतना विश्वास प्रदर्शन मेरे लिए पुरस्कार था। लेकिन मानववादियों में श्रद्वासुमन पारंपरिक प्रंशसात्मक भर होकर तो नहीं रह सकता। उन त्रुटियों, खामियों का भी जिक्र होना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ी सबक ले। मुझे कहना चाहिए कि हम लोग उनसे पर्याप्त असहमत थे और उनके रूढ़ ऐटीट्यूड से पीडि़त । किसी भी व्यकित से मिलने पर वे अपने बारे में बताते ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर। लेकिन यह पूरा सच नहीं था। उन्होने किसी से दोस्ती नहीं की यह तो ठीक लेकिन उन्होने दुश्मनी तो सबसे ही की। चाहे वह शिववर्मा रहे हो या उनके हम वयस्क अन्य, या फिर दूसरी पीढ़ी के उनके तमाम साथी। वह किसी पर विश्वास नहीं करते थे और अपने विपरीत जाने पर किसी की इज्जत धोने में उन्हे कोर्इ संकोच न था। इसलिए उनका यदि कोर्इ विश्वस्त नहीं हो पाया या वह किसी के विश्वस्त नहीं हो पाये तो इसके पीछे उनकी अपनी प्रवृत्ति की घातकता थी। उनकी आदर प्रशंसा सब करते थे, दिखाते थे पर उसमें दिल की गहराइयाँ न थी इसमें चूक गये तिवारी जी वरना उनके साथ ऐसे ऐसे प्रतिभा सम्पन्न लोग थे कि उन्हें कहीं से कहीं पहुँचा देते। दूसरी बात, हमारा ख्याल है कि यदि वह थोड़ा कम रसोर्इ प्रवृत्त, किचनोन्मुख होते, कड़वा तेल की मँहगार्इ पर इतना ध्यान न दिया होता, चवन्नी बचाने के चक्कर में इतना न रहे होते, भोजन की थाली इस तरह न चाटते  (जिसे देखकर हमे घिन होती) साइकिल के व्यामोह में इतना न डूबते, अपनी कृत्रिम महामानववादी प्रवृत्तियों के गुलाम न होते या कहे गांधी दिखने की कोशिश न करते केवल एक स्कूल से इतना न चिपकते तो वे समाज के लिए शायद कुछ ज्यादा कर जाते जिसके लिए उन्होने इतना पैसा बचा बचाकर बटोरा हुआ था, जैसा वह कहते थे आज वह राजनीति के किसी पायदान पर होते और स्कूल के बाहर की दुनिया भी उन्हें याद करती। कम से कम उनकी र्इमानदारी तो राजनीति में स्थापित हुयी होती। निश्चय ही इसके पीछे था उनमें दृढ़ विचार और आत्मविश्वास और                     धारणाशकित का न होना था जिसका होना र्इश्वर विहीन मानववादी के लिए आवश्यक समझा जाता है। वह अगनासिटक (संशयवादी)  थे। हम उनकी राजनीति धर्म निरपेक्षता पर कुछ न कहेगें पर उन्होने हम लोगों वाली सैद्वान्तिक सेक्युलर वाद को तो अच्छी और पूरी तरह निभाया, जिसके लिए हम अपने आप को अभी असमर्थ पाते है। उन्होने कभी पूजा पाठ नहीं किया, मंदिर नहीं गये तिलक जनेऊ नहीं धारण किया और अन्त में बिना किसी पाखंडी कर्मकांड के अपना शरीर वैज्ञानिक अध्ययन के लिए चिकित्सा छात्रों को सौंप दिया। उन्होने सिद्व किया कि वह जबरदस्त मानववादी थे। ऐसे पूज्य पुण्य-पुरूष को हमारा प्रणाम।

उग्रनाथ नागरिक

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

कश्मीर

मुसलमानों का जनमत संग्रह
* प्रशांत भूषण पर हमले से एक संकेत तो मिलता ही है कि अभी तो जनमत संग्रह [ Plebiscite] की बात है यदि कहीं कश्मीर इन लोगों की मूर्खता से सचमुच भारत से निकल गया तब हिंदुस्तान के मुसलमानों की क्या दशा होगी , और साथ ही , इन लोगों की भी ? राजनीति और देश का मामला इतना सीधा नहीं होता जैसा ये बयान कर देते हैं कि जो , जो कुछ मांग रहा है उसे वह दे दो | क्यों दे दें ? कौन हैं लोग जो अलगाव चाहते हैं ? उनके अलग होने से हमें , हमारे देश को क्या मिलेगा ? कहीं पड़ोस से स्थायी अशांति तो नहीं ? बंगला देश बनने से हमें क्या मिला ? उसे भारत में ही रखना था पूरी आज़ादी देते हुए | भले मुजीब या अब हसीना तब पूरे हिन्दुस्तान की प्रधान मंत्री होतीं | राष्ट्र का काम काज लुंज पुंज होने से नहीं चलता | डिमोक्रेसी में थोड़ा तानाशाही का रंग होता है तभी डेमोक्रेसी भी चलती है , अन्यथा वह अराजकता की स्थिति हो जाती है [जैसा अन्ना हजारे के आन्दोलन में किंचित निहित हुआ] | चाणक्य का उदाहरण दूंगा तो बुरा कहलाऊंगा , इसलिए चर्चिल को ही ले लीजिये | उसने अपने शासन काल में हिन्दुस्तान को आज़ाद नहीं ही होने दिया , क्योंकि वह इसे उचित नहीं समझता था | यह तो तब ,जब कि उसकी सीमायें हमसे नहीं मिलती थीं | वह एक राजनयिक [diplomat] का राजनय [diplomacy] था | इसकी हमारे नेताओं में बड़ी कमी है | ये ढीले पड़ते हैं वोट की दुहाई देकर , जब कि इन्हें वोट , जन समर्थन इनकी इसी ढिलाई के कारण नहीं मिलता , और इनकी हालत दो कौड़ी की हो गयी है | एटली ने भी , उग्र राष्ट्रवादी क्षमा करेंगे , भारत को आज़ादी कोई हिंसक - अहिंसक आंदोलनों , सुभाष -गाँधी- भगत सिंह से भयभीत होकर नहीं दी | उन्होंने भारत को आज़ादी तब दी जब उनका हित यहाँ नहीं रह गया था , और उनके लिए हिंदुस्तान पर राज्य करना खर्चीला लगने लगा था | तिस पर भी उन्होंने भारत को आज़ाद अपनी शर्तों पर किया | एक पाकिस्तान तो बनवा ही दिया | इसे आप बांटो और राज करो [divide and rule] कहकर टालना चाहें तो टाल दें , पर इसी को राजनीति कहते हैं | तो फिर कोई , किसी भी देश का राजनीति का साधारण सा छात्र बता दे कि हम अपने बगल में एक दुश्मन इस्लामी राज्य के रूप में एक स्थायी आस्तीन के सांप , कश्मीर को क्यों पालना चाहेंगे ? अब हमारे देश की ही सिविल सोसायटी इसके लिए भारत राज्य को विवश कर दे तो बात और है , पर ख़ुशी ख़ुशी तो हम अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारेंगे | अभी पकिस्तान क्या कम सर दर्द है | ये बुद्धिजीवी , आखिर कोई सबक क्यों नहीं लेते | ये पकिस्तान से भी प्रेम करने को कहते हैं , जैसे अभी कश्मीर के लिए भूषण जी कह गए | पर कैसे रहे प्रेम के साथ , उसके साथ , जो निरंतर हर मुद्दे पर हमसे दुश्मनी रखता हो ? प्रेम से रहना होता तो वे अलग ही क्यों हुए होते ? वहां तो तानाशाही जैसा इस्लामी राज्य है , यह भूषणों - पद्म विभूषणों को समझना चाहिए | ऐसे राज्य से विश्व को विमुक्त करना भी उनके कर्तव्य की सीमा में है | और इधर हम घोषित रूप से सेकुलर , समाजवादी , प्रजातान्त्रिक देश हैं | तो जिसे हिंदुस्तान जैसे खुले मिजाज़ के देश में रहने में परेशानी हो , उसे लोकतंत्र क्या मनुष्यता का दुश्मन समझने में हमें कोई देर नहीं करनी चाहिए |
तो कहना यह था कि कश्मीर जाय , और अभी तो यह वह नामक सेना के तीन तेरह गुंडों ने मारपीट की , यदि कहीं पूरा देश गुंडई पर उतारू हो जायगा तो उसकी ज़िम्मेदारी किस पर होगी ? अतः बयान भी , हम यह तो नहीं कहेंगे कि उसे भी sedation , राष्ट्र द्रोह के दायरे में लाया जाय पर , तनिक सजीदगी से दिए जायं | मुसलमानों के प्रति एक बड़ी ज़िम्मेदारी राष्ट्र राज्य और इसके बुद्धिजीवियों पर है | यह समझते हुए कि उनकी जिंदगियां खतरे में पड़ जायंगी , पड़ सकती हैं , कश्मीर को और फिर महादेश की भलाई और तरक्की के लिए पाकिस्तान को भी वापस हिंदुस्तान में लाने की राजनयिक कोशिशें की जानी चाहिए | ये सीमायें स्थायी नहीं हैं , बनावटी हैं , खासकर हिंदुस्तान - पाकिस्तान की | अभी ६४ साल पहले जब यह लकीर नहीं थी तो क्या हम अमन चैन से नहीं थे ? या फिर किसी विदेशी शासन की ज़रूरत होगी इन्हें एक करने के लिए ? क्या हम में यह स्वतंत्र माद्दा नहीं बन सकती ? चलिए नहीं सही , पर जो बचा है उसमे विष के बीज तो न बोइये |
अभी मुसलमानों के तमाम संगठन जो बाबरी मस्जिद , पर्सनल ला , मदरसे और डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सर के लिए लड़ रहे हैं , वे ज़रा इधर भी ध्यान दें | कश्मीर से उनका भारत में भविष्य तय होना होगा | बल्कि यह समस्या सुलझाने के लिए क्यों न उन्ही से कह दिया जाय , जिससे यह स्वयं अपना भविष्य चुन लें ? जनमत संग्रह केवल कश्मीर के ही क्यों , पूरे भारत के मुसलमानों का क्यों न करा लिया जाय ? लेकिन तब , याद रहे , यदि कश्मीर को भारत से वे निकाल लेगे तो फिर शेष भारत में एक भी मुसलमान नहीं रहेगा | १९४७ की गलती बार बार भारत दुहराए यह ज़रूरी तो नहीं ? अब गाँधी सरीखा नेता भी नहीं कोई ! उस दशा में यदि जिन्ना उधर होंगे , तो जिन्ना ही इधर भी होंगे | ##

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

कठौती में कुकरैल

सच  कहने  के  वास्ते  , रखिये  सबसे  बैर
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सच  कहना जो चाहते  , रखते   सबसे  बैर   
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* अभी एक राजनीतिक मित्र का कथन याद आया | उनका कहना था कि पहले (लोहिया के ज़माने में) संसद कि बहसें अख़बारों के समाचार बनते थे | अब अख़बारों के समाचार संसद में बहस के विषय बनते हैं | कितना सच है ! सवाल यह है कि क्या अब पुराने समाचार , देशी-विदेशी एजेंसियों के लीक- पाद ही देशों की राजनीति चलाएंगे , और वे समय को पीछे , और पीछे ढकेलते जायेंगे ? आखिर उनका इरादा क्या है ? कहीं हम साधारण जनता  अपनी पूरी पाक-नीयतों के साथ अनजाने में उनके शिकार तो नहीं बन रहे हैं ?   


* कामतानाथ की संकलित कहानियाँ पढ़ रहा था | तमाम कहानियों पर तो मन इधर-उधर होता रहा , पर 'खलनायक ' पर जाकर चिपक गया | हालाँकि उसका शीर्षक मैं कहानी के असली नायक (नायिका) के नाम पर उसके असली नाम सुनीता के बजाय ' बिल्लो' ही बताऊंगा | खलनायक भी भला कोई शीर्ष पर रखने की चीज़  है ? मैं इस कहानी से यह एक मछली मार कर पाठकों को देना चाहता हूँ कि यदि शादी की सम्भावना या जुगत -साहस न हो तो किसी लड़की से प्रेम की अनुभूति नहीं बनानी  चाहिए , और यदि कुछ कोमल अहसास  जगें भी, तो  कन्या -विशेष को उसका आभास नहीं होने देना चाहिए |आखिर कहानियों से कुछ सबक तो लेनी चाहिए | बिल्लो का कहा एक संवाद तो शाश्वत  और avismrneey   है की - 'पाँच दिन में तो दुनिया idhar  se  udhar  ho  sakti  थी '  


* उसने कहा - तुम राज ले लो   ,   ले लिया ;
   उसने कहा फिर - पाट  ले लो ,  ले लिया |
   उम्र के  दालान में इस छोर पर  ,
   उसने कहा - अब खाट ले लो , ले लिया || 
                   ##    [ लल्लू बस्तवी द्वारा प्रेषित ]


* जाट आन्दोलनकारी रेल की पटरियों  पर लेटे हैं | इसमें कोई ज्यादा खतरा नहीं है
 वे लेटे रहें तो भी रेल उनके ऊपर से सुरक्षित गुज़र जाएगी | लेकिन एक समस्या है कि यदि कहीं उन्हें जम्हाई आ गयी , और कोई रेल यात्री उसी समय टॉयलेट  में हुआ तो स्थिति बिगड़ सकती है  |
मनोरंजन वार्ता,(दिमाग से)

मंगलवार, 1 मार्च 2011

अभिजात्य इस्लाम

                                                         आरक्षण  से  क्षमा 
     *        भारत से पाकिस्तान  के बंटवारे पर जब भी सभा सेमिनारों में चर्चा चली है , उस पर पानी फेरने के लिए मुस्लिम वक्ताओं की जुबानी  बार- बार यह सुना गया है कि वह सब कुछ अभिजात्य मुसलमानों की कारस्तानी थी और साधारण मुस्लिम जनता की कोई चाह न थी | इसे मानना पड़ता है और हम मान भी लेते हैं | चलिए  उसे भूल जाते हैं | लेकिन अब देखते हैं सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को लागू करने मांग करने वालों की हैसियत को , तो फिर वही मंज़र याद आता है | ये सब के सब इलीट या अभिजात्य वर्ग के लोग हैं | कम से कम  ये वे लोग तो नहीं हैं जिन्हें लाभ मिलने वाला है | ऐसी दशा में फिर कोई गलती दुहरायी क्यों जाये और इनकी रपटों को लागू करके एक और बंटवारे का मार्ग क्यों प्रशस्त किया जाय ? देश हित में , राष्ट्रीय एकता को अक्षुण   रखने की गरज से उन्हें कूड़ेदान में क्यों न फेंक दिया जाय | ध्यान देने की बात है कि इससे केवल  अभिजात्य मुसलमानों की राजनीतिक कुचेष्टाओं को ही क्षति पंहुचेगा और कथित लाभार्थी साधारण मुस्लिम जनता का कोई नुकसान नहीं होगा |
                  कारण , प्रथम तो यह कि उनके  अभिजात्य उन लाभों को उन तक पहुँचने ही न देंगे , जैसा कि हिन्दू दलितों के आरक्षण के साथ हुआ , दूसरे इसलिए कि आरक्षण की मांग उनकी है ही नहीं | वह उसी प्रकार की  कटेगरी के अभिजात्य मानवाधिकार प्रेमी हिन्दुओं  की ऋषि दधीचवादी दान या वरदान ज्यादा और दलित मुस्लिम - ईसाईयों की आवश्यकता कम है |
       इन निष्कर्षों में कोई अतिशयोक्ति नहीं है | स्पष्ट देखा जा सकता  है कि उन्होंने इसके लिए कोई संघर्ष नहीं
किया | करने की ज़रुरत भी नहीं  थी क्योंकि वे गरीब भले रहे हों पर दमन के शिकार नहीं थे | उन्हें अपनी धार्मिक व्यवस्था से कोई शिकायत  नहीं थी न उसमे उन्हें कोई परेशानी थी | फिर वे दलित कैसे कहे जाएँ और क्यों | यहीं यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि हिन्दू दलितों को आरक्षण उनके आर्थिक उत्थान के लिए नहीं , बल्कि उनके सामाजिक  सम्मान के हेतु है , और दरअसल इसी सम्मान कि लडाई  थी ही उनकी | ऐसा वे स्वयं समझते और कहते हैं | ऐसा न होता तो आर्थिक दशा अच्छी हो जाने के बाद भी बड़े बड़े दलित अधिकारी आरक्षण छोड़ चुके होते |
     अब देखना है कि इस  सामाजिक प्रतिष्टा  को हासिल करने   के लिए उन्हें क्या क्या  करना  पड़ा | कहाँ  से शुरू कीजियेगा  ? आंबेडकर  युग  से ही ले  लीजिये  | क्या  क्या  पापड़ नहीं  बेले  और क्या  क्या  नहीं किया | हिन्दू धर्म  की  व्याख्या  में उसकी  बखिया  उधेड़  डाली  , तार तार ,रेशा रेशा छिन्न भिन्न करके तहस -नहस किया |  कथित पवित्र  किताबों    वेद  - पुराणों  की अवमानना  की , मनुस्मृति   जलाई  , देवी  देवताओं  को गालियाँ  दीं  , संतों  - महात्माओं  पर कीचड़  उछाले , ब्राह्मणवाद की ऐसी - तैसी की, गाँधी से पंगा लिया , वाइसराय से जिद किया , और कुछ भी तो करना बाक़ी नहीं  रखा ,यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन करके बौद्ध भी बने  | तब  जाकर  अभी  थोड़ा  सा  पा  सके  हैं | अब भी उन पर उत्पीड़न  जारी  है और उनका  संघर्ष भी |
      इसके बरक्स    मुसलमान  भाइयों ने क्या किया ! वे  इस्लाम  से चिपके रहे ,उसके वफादार बने रहे , उसका गुणगान करते रहे , रोजे नमाज़ के पाबंद रहे ,मजारों पर चादरें चढाते रहे | फिर क्या परेशानी है ? इस्लाम  तो पूरी सामाजिक व्यवस्था है, उसमे गरीबी का भी उपचार और इंतजाम है | दान , ज़कात की व्यवस्था इसीलिये की गयी है जिससे गरीबों , मजलूमों का भरण - पोषण हो और वे धर्म के अंतर्गत और अधीन बने रहें | इस कथन में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है , क्योंकि इनकी इन्ही व्यवस्थाओं के कारण आज तक कोई उदहारण नहीं है कि इस्लाम या ईसाई धर्म से निकलकर किसी ने कोई दूसरा धर्म अपनाया हो | यह तो महज़ एकमात्र  नालायक हिन्दू धर्म है जिसके तमाम लोग इस्लाम और ईसाई मजहबों में समता , बराबरी  ,भाईचारा , मानवाधिकार , स्त्री अधिकार और क्या -क्या के स्वर्ग का सब्जबाग देखकर इससे निकलकर इन मजहबों कि गोदें भरते रहे | ज़ाहिर है उन्हें हिन्दू धर्म में परेशानी थी | यह भी सच है कि उन मजहबों के गुण अब भी उसी प्रकार गाये जाते हैं | कही कोई क्षोभ नहीं , कोई पश्चाताप , कोई पुनरीक्षण नहीं | वे अब भी वैसे ही समतावादी , मानववादी होने के लिए ख्याति प्राप्त करने की होड़ में संलग्नरत - प्रयासरत हैं | उसे सबसे उचित और सबसे श्रेष्ठ सिद्ध करने में लादेन की अलक़ायदा से लेकर डाक्टर  जाकिर नाइक व एक छोटे से छोटे गाँव का गरीब से गरीब  मोलवी-मौलाना  तक लगा हुआ  है | उधर सुदूर जंगलों और आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियां भी यही काम कर रही हैं | इनकी वकालत में भारत के महान  बुद्धिजीवी भी यही कहते हैं कि आतताई हिन्दू धर्म से ये निकल न जायं तो क्या  करें ! ज़ाहिर है कि वहां निश्चय ही उनका अच्छा भविष्य  है |
               यह तथ्य इस बात से भी प्रमाणित होता है कि जहाँ तक हमारी जानकारी है , इन मजहबों के इन्ही सदगुणों के कारण किन्ही ईसाई देशों और पाकिस्तान , ईराक -ईरान , अरब मुल्कों में आरक्षण की  कोई मांग या कोई  व्यवस्था सुनाई नहीं देती  | सब उनकी सुराज के कारण है , जो हिन्दू धर्म में नहीं है  | और यह हिन्दू  धर्म केवल हिंदुस्तान में है |
                ऐसी दशा  में प्यारे गरीब ईसाई - मुस्लिम भाइयों से यह पूछना है कि वे हिन्दू धर्म की जेहालत - जलालत में क्यों लौटना चाहते हैं ? आरक्षण व्यवस्था इनके अपने दलितों के लिए की  गयी व्यवस्था है | वह भी इनकी गरीबे दूर करने के लिए नहीं , इन्हें सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए | गरीबी के लिए तो बी  पी एल कार्ड है | यदि आप में तनिक भी ईमान है तो इनके हक में आप कृपया छीछा   न करें , छीजन न करें | यही न्याय की बात होगी , अन्यथा उनके ऊपर आप और अन्याय डाल रहे होंगे , जिससे वे पर्याप्त पहले से दबे हैं |
      निवेदन है कि इन सच्चर , रंगनाथ  मिश्र लोगों   पर न जाएँ और अपनी नैतिकता की आवाज़ सुनें  | हिन्दू धर्म की तमाम बुराईयों  में एक बुराई यह भी शामिल है कि यहाँ एक ईश्वर और उनका एक सन्देशवाहक नहीं होता | यहाँ तमाम देवता होते हैं | इसी प्रकार के देवता हैं हमारे ये सच्चर , रंगनाथ  मिश्र  लोग | महात्मा गाँधी ने तो जान ही गँवा दी पाकिस्तान को कुछ करोड़ रूपये भारत सरकार से दिलवाने के लिए | हिन्दू के दधीच तो आपके लिए अपना  अंग -अंग दान देने को तैयार हो जायेंगे | पर क्या उसे लेना  आप के लिए उचित और शोभाकर होगा ?
          इस पर गंभीरता से सोचा जाना है  कि देश  का हर आदमी देवता नहीं है , वह दुनियादार भी है  | सेकुलरिज्म या धर्म निरपेक्षता का एक अर्थ पारलौकिकता से परे इहलौकिकता भी है | अब वह अपने महात्माओं के विपरीत धर्मों की साजिशें और उनकी राजनीतिक रणनीतियां भी बखूबी
 समझता है | अब हर भारतीय को हर समय मूर्ख नहीं बनाया जा सकता | उसने देखा कि आयोग के ही एक सदस्य ने दलित अन्य धार्मिक समुदायों के लिए आरक्षण के विरुद्ध आख्या दी है और वह सर्व सम्मत नहीं है |  हिन्दू दलितों की फर्क स्थिति को वहां भी रेखांकित किया गया है | आरक्षण का समर्थक  कोई सचमुच यह बताये कि मोहम्मद साहेब के कार्टून के विरोध में जो लाखों गरीब मुसलमान लखनऊ और अन्य जगहों पर निकल आये ,क्या उतने अपनी गरीबी के विरोध में कभी उतर  सकते हैं ? इस्लाम का कोई विरोध , जिसमे उन्हें कथित दलितावस्था झेलनी पद रही है, क्या वे कुछ कर रहे हैं? तसलीमा नसरीन को वीजा मुसलमानों के भय से नहीं दिया जा रहा है , और भारत में इस्लाम की ताक़त इनके  गरीब मुसलमान ही  है, न की सारे अमीर लोग | इसीलिये , गौर से देखें , सारे अमीर इन्हे आरक्षण दिलाने के लिए ऐंडी चोटी एक कर रहे हैं |
          लेकिन बन्धु , अब यह तो नहीं चलेगा  कि जब समता का मज़ा लेना हो तो ईसाई बन जांयें , इस्लाम ग्रहण कर लें , और जब आर्थिक सुविधा लेनी हो तो जय श्री राम का नारा लगायें | हाँ , लें ही है तो हिन्दू धर्म के दोज़ख और नर्क में आइये | यहीं से गए थे तो अब क्यों पड़े हैं उस स्वर्ग और जन्नत में ! वरना तो यदि सेकुलर देश में आप तसलीमा को वीजा नहीं देने देंगे , तो हिन्दू देश आपको कोई आरक्षण देने में असमर्थ है | कृपया क्षमा करें |    
07/01/2011                                                                                      --- उग्रनाथ श्रीवास्तव  ' नागरिक '
L-5 / 185 / L , Aliganj , Lucknow. 226024
email :  priyasampadak@gmail.com               [Published , Hindi Pioneer , Lucknow , 15/1/2011]
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