शनिवार, 19 मई 2012

ज़िन्दगी


[कविता ] :-

जीते गए 
जीतते गए 
ज़िन्दगी | #  

सवर्ण समालोचना :-

सवर्ण समालोचना :-
प्रथमतः हम यह स्पष्ट कर दें कि एक सवर्ण के तौर पर हम यह मान सकते हैं कि आंबेडकर कार्टून पर आपत्ति नहीं की जानी चाहिए | यदि वह कार्टून कोर्स में होता ही तो भी उसे सहन किया जाना चाहिए था जैसा कि दलित अन्य विसंगति सह रहे  हैं | लेकिन जब उन्होंने इसे आपत्तिजनक मानकर मामले को उठा ही दिया है तो हमारा यह कर्तव्य बनता है कि आपत्ति के औचित्य- अनौचित्य  पर पुनर्विचार करें | पहले तो हम यह मान  लें कि कोई भी कलाकार त्रुटियों से परे कोई पराप्राकृतिक प्राणी  नहीं होता | यदि आंबेडकर की व्यक्ति पूजा नहीं की जानी चाहिए तो निश्चय ही शंकर पिल्लई की भी आराधना नहीं की जानी चाहिए | दूसरे यह कि यदि किसी की कविता -कहानी -लेख -कार्टून कोर्स की किताब में  शामिल न हो पाए तो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए घातक नहीं  कहा जा सकता | तीसरे , किसी भी कला का श्रोता - दर्शक -समीक्षक सम्बंधित कलाकार से कम कलाकार नहीं होता | इसलिए हम एक जनता-पाठक की हैसियत कार्टून [की प्रासंगिकता] की चीर फाड़ साधिकार कर सकते हैं |
घोंघा [स्नेल] एक जीव है जिसका सहारा धीमी गति के प्रतीक रूप में कार्टूनिस्ट ने किया | ज़ाहिर है उस पर आंबेडकर कोड़े चला सकते थे , और नेहरु भी | उस समय के लिए तो बात आई गयी ख़त्म हो गयी | लेकिन संविधान हमेशा धीमे चलने वाला जंतु तो है नहीं , वह तो एक निर्जीव [ किन्तु पूर्ण जन समर्पित एवं देश पर लागू ] पुस्तक के रूप में हमारे सामने है और उसके निर्माता के रूप में अम्बेडकर का नाम सर्व विदित है | तो अम्बेडकर अपनी किताब को तो पीट पीट कर दौड़ा नहीं सकते थे ? अतः यह निष्कर्ष निकालने में किसी छात्र और शिक्षक को कोई  कठिनाई  नहीं होगी कि नेहरु का हंटर आंबेडकर के लिए है | और यही है उस कार्टून पर दलितों के आपत्ति का मुख्य कारण , जो पूरी तरह से वाजिब है | 
और देखें , तो क्या संविधान का धीरे या तेज बनना आज कोई महत्त्व रखता है ? या यह बताना कि संविधान निर्माण कमेटी  में कितने सदस्य , कौन - कौन थे और उन्होंने इसकी ड्राफ्टिंग में कुल कितने घंटे का समय दिया ? सारा भार अम्बेडकर पर था , और इसीलिये लगभग  अकेले संविधान के निर्माता के रूप में दलितों में जो  उनकी ख्याति है ,वह वस्तुतः तो  गलत तो नहीं है श्रेय भले कितने ही लोग लें | तो , हम भले सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हों , पर अम्बेडकर के प्रति हमें  इतना कृतघ्न तो नहीं होना चाहिए कि उनके सम्मान को एक कार्टून की बलि वेदी पर चढ़ा दें , या उनके असम्मान की कोई भी गुंजाईश किताबों में छोड़ें | यदि मान लें कि वह हमारे पूज्य या पूर्वज नहीं हैं , तो भी हमें मानना होगा कि किसी के भी पुरखों का अपमान करके हम अपने पुरखों का सम्मान बचा नहीं पाएंगे | और अंततः पुनः इस तथ्य पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है , और यह गलती व्यापक रूप से मीडिया में व्याप्त है | कि हमारी समस्या/ हमारा काम सम्प्रति  छात्रों के लिए उपयुक्त पठन सामग्री चुनने की है , न कि अख़बार चलाने की | यहाँ यह भी प्रश्न नहीं है कि अम्बेडकर का चित्र नहीं छपा जा सकता |

रास्ता ढूँढने में

[कविता]
आने में नहीं ,
रास्ता ढूँढने में 
देर लगी  |

भारत में राजनीति


भारत में राजनीति को वह स्थान नही मिला जो उसे मिलना चाहिए |  यही कारण है कि  हमारे देश में राजनीति शुद्ध नहीं हो सकी , न शुद्ध लोग ही राजनीति में आये जिससे इसकी सफाई हो सकती | गन्दगी में गंदे लोग ही आये और पले बढ़े , और उन्होंने इसे और गन्दा ही किया | कारण , कह सकते हैं कि भारत में जनता के बीच राजनीतिक संस्कृति थी ही नहीं थी | यह काम राजा के जिम्मे था | लोकतंत्र का विकास नीचे से हुआ  ही नहीं | अलबत्ता , दूसरी तरफ यहाँ धर्म को ज्यादा मान्यता मिली | जनता उसमे ज्यादा रची बसी थी | इसीलिये संतों -महात्माओं को राजनेताओं की अपेक्षा अधिक महत्त्व मिला , और उन लोगों ने उससे जो राजनीतिक काम भी कराया , उसने किया | प्रथम जन विद्रोह सेना के माध्यम से कारतूस में पशु की चर्बी के चलते हुआ , अर्थात धार्मिक चेतना के कारण , न कि राजनीतिक चेतना वश | गौर करें तो गाँधी और गाँधी की राजनीति उनकी संतई के प्रभाव में ग्राह्य और  सफल हुई और उन्हें महात्मा कहा गया | विनोबा , जे पी भी संत या संत समान थे तभी जन मानस में उनकी घुसपैठ  संभव हुई | आज के समय में भी जय गुरुदेव - रामदेव ज्यादा सम्मानित हुए , और संत छवि के कारण ही अन्ना का आन्दोलन कुछ ही सही, सफल हो रहा है | अवश्य कुछ खालिस राजनेता भी जनगण मन को जीत सके , सुभाष , नेहरु , पटेल , आंबेडकर आदि अपवाद हैं , पर वे सब स्वतंत्रता आन्दोलन की उपज या देन      
थे | तिस पर भी सूक्ष्म दृष्टि डालें तो उन पर भी धर्म की एक झीनी चादर चढ़ी है | तो फिर आज कैसे उम्मीद करें की कोई खरा राजनेता उभरे जब यहाँ राजनीति गन्दा काम माना जाता है , संत महात्मा कितने भी गंदे काम करें , पूजे जाते हैं |

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी अपने प्रदेश का काम काज देखें कि कहीं कोई उनके कार्टून तो नहीं बना रहा है , और कोई मिल जाये तो उसे जेल भिजवाने का काम करें | MCC के काम में हाथ बताने का कष्ट न करें | क्योंकि , एक तो वह घटनास्थल पर थीं नहीं और दूसरे वह देश की दीदी भले हैं , नानी या रानी नहीं हैं | 

कार्टून पर प्रतिबन्ध

- - - तो अब शंकर पिल्लई पवित्र गाय हो गए ? महान , infallible कलाकार ,जिनसे कोई गलती हो ही नहीं सकती ? [ और वैसे ही योगेन्द्र / सुहास विद्वतजन भी ] | फिर भी कोई दलित उनका निरादर कहाँ कर रहा है ? उनके कार्टून पर प्रतिबन्ध की माँग कहाँ कर रहा है ? यह तो उसी तरह से है , जैसे कि वह  उसे पुरस्कृत करने [कोर्स की किताब में रखकर] के पक्ष में नहीं हैं | बस | पता नहीं  इसे अभिव्यक्ति की हत्या कैसे माना जा रहा है ! या हो सकता है हम स्वतंत्रता प्रेमियों की बात को ठीक से समझ न पा रहे हों , पर यह इतना उलझने वाला मामला तो नहीं लगता !

नए मुल्ला

क्या सिर्फ मुस्लिम मुल्लाओं की ही आपत्ति सुनी और उस पर कार्यवाही की जायगी ? कुछ याद है कितनी कोर्स की किताबों पर बवेला मचा ? वह भी कार्टून तो जाने दीजिये , illustrations पर ? तो देश में उनके अलावा भी कुछ नए पुराने मुल्ला -मौलवी हैं, उनके भी अपने इष्ट और पैगम्बर हैं !

शाहरुख़ खान

शाहरुख़ खान के लिए हम कठोर दंड का प्रस्ताव कर सकते थे , लेकिन डर है कि फिर वही
वितंडा खड़ा हो जायगा कि उनके 'खान ' होने के नाते उन्हें सताया जा रहा है | शबाना आज़मी तक यह हथियार अपना चुकी हैं | यह सुविधा तो है ही इन लोगों के पास |

शुक्रवार, 18 मई 2012

अन - अनुशासन

 अन - अनुशासन :-
फौज के बीच झगड़ा तो होना ही था | सब जनरल के झगड़े का रंग है | 

आँसू के खून


[कविता] - आँसू के खून
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'खून के आँसू'
एक प्रचलित मुहावरा है ,
तो आँसू के भी खून
ज़रूर होते होंगे !
हैं न मेरे पास
शिराओं में दौड़ते !

दुःख का कारण

[व्यक्तिवाचक] - मेरे दुःख का कारण यह है कि मैं अपने ऊपर ज़रुरत से ज्यादा जिम्मेदारियां लाद लेता हूँ | इसका निवारण यह है कि मैं एक -एक करके इनसे मुक्त हो हो जाऊं |

देहाती औरत

कथा संभव :   देहाती औरत 
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हमारे बेटे को जब बेटा हुआ तो पत्नी ने कहा -पोते का नाम कुछ ख़राब सा रखो , उसे दीर्घ जीवन मिले | गाँव में विश्वास है कि ऐसा करने उन दम्पतियों के बच्चे जी जाते हैं जिनके बच्चे पैदा होकर मर- मर जाते  हैं | 
-लेकिन हमारा तो पहला पोता है , और बड़ी पोती भी अच्छी भली है |
- उससे क्या होता है , एक ही जिए -जागे - अम्मर रहे |
- पड़ोसी  के पूछने पर मैंने  पोते का नाम ' बेकारू ' बताया  | ख़राब नाम रखने और अच्छा नाम न रखने का कारण पूछने पर जो कारण था वह  बता  दिया | " न विश्वास हो तो चाची से पूछो " |
लेकिन चाची ने उसकी पुष्टि नहीं की | बस इतना कहा कि इन्होने रख दिया तो ठीक है |
  उनके जाने के बाद मैंने इनसे पूछा - तुमने मेरी बात को सही क्यों नहीं कहा , जब कि तुमने ही मुझसे यह बात कही थी ?
- तुम समझते नहीं हो , पड़ोसी मुझे देहाती भुच्च्रड़ समझ लेते | #

चार बातें


चार बातें 
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१- हमारी अंतरात्मा में  सीधे - सीधे वह वस्तु क्यों न हो जो आपके इष्ट संत [ जैसे साईं बाबा] की अंतरात्मा में थी या है - स्वार्थ से निकल कर जनहित -जनसेवा की भावना ?
२-जिस धन पर टैक्स न चुकाया गया हो वही काला धन हो जाता है | बाबा रामदेव टैक्स नहीं चुका रहे हैं |
३ - यह तो तय है कि हमें गुलाम बनना है | आजादी के मूल्य हमारे खून में नहीं हैं | अब हमें तय यह करना है कि हम किसकी गुलामी स्वीकार करें , अंग्रेजों की , अमरीका की , माओवादियों  की ,  आतंकवादियों की , या अपने दलित भाइयों  की ? 
४ - कोई ज़रूरी है क्या कि हम जो सोचते -लिखते हैं वह सही ही हो ? हम गलत भी हो सकते हैं , वह हमारा अधिकार है |

गुरुवार, 17 मई 2012

Pramod Joshi

इस  सम्बन्ध  में मेरे अनुभव में  एक अद्भुत - आदर्श  व्यक्ति का चित्र  है जिसके पास ज्ञान, कौशल , प्रजातान्त्रिक  सोच , विपरीत / विभिन्न विचारों को समाहित करने वाला और पत्रकारिता के अनुभवों एवं गुणों से युक्त है और "प्रिय संपादक " के मर्म को भली भाँति समझता है | वह हिंदुस्तान के दिल्ली एडिशन के एडिटर थे | अब फ्रीलांसिंग कर रहे हैं , दिल्ली [वैशाली , गाज़ियाबाद] में रहते हैं | नाम है उनका श्री प्रमोद जोशी | उनका परामर्श और सहयोग बहुत उपयोगी हो सकता है , यदि ज़रुरत पड़े तो  , और जहाँ तक मैं अनुमान कर सकता हूँ , वे सहर्ष इसे प्रदान करेंगे | लेकिन सौ की एक बात है कि सफल पत्र चलाने  के लिए पर्याप्त प्रारंभिक धन चाहिए | फिर तो यदि प्रोफेसनल तरीके से निकाला गया तो यह निश्चय ही आत्मनिर्भर और पाठकों को ग्राह्य होकर विख्यात हो जायगा , और असंभव नहीं कि कई लोगों के आमदनी का स्रोत भी | मुझे तो इसको चलते देखने के अलावा और कोई चाह नहीं है |     

बुधवार, 16 मई 2012

अध्यक्ष जी की अनुमति से


अध्यक्ष जी की अनुमति से 
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जैसे सभाओं का अध्यक्ष कुछ नहीं करता , केवल सभा की शोभा बढ़ाता है | उसके नाम पर उसकी बिना दी गयी अनुमति से संचालक अपने मन से सभा को चलाता है | अध्यक्ष को तो सबसे अंत में बोलने कि नौबत आती है , तब तक सभागार लगभग खाली हो चुका होता है | उसे बोलने की ज्यादा स्वतंत्रता भी नहीं होती , पिछले वक्ताओं की बातों को समेटने के सिवा | 
उसी प्रकार ईश्वर की अनुमति से इस संसार रूपी सभागार को कुछ धूर्त संचालक अपनी मन मर्जी से चला रहे हैं , और उसके नाम पर  सारा गुल - गपाड़ा , छल -छद्म कर रहे हैं | भोले श्रोतागण इस उम्मीद में बैठे  इनके ठगी के शिकार हो रहे हैं कि अंत में तो अध्यक्ष ईश्वर कुछ बोलेगा ! उन्हें क्या पता कि वह कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि वह गुस्से से सभागार छोड़ कर बाहर निकल गया है और अब वह वहां है ही नहीं  | #
२ - हिन्दुओं में कथा सुनने की परंपरा है | कोई भी अवसर आया , पंडित बुलाया , पंजीरी -चरणामृत बनवाया और सत्य नरेन व्रत कथा सुन ली | सुनने  वाले को आज तक यह पता नहीं चला कि वह असली कथा कहानी क्या थी जिसे कन्या कलावती आदि ने सुना , या नहीं सनने पर दंड भोगा ?
आगे सोचें तो कथा तो साहित्य का अंग है | तो क्या हिन्दू स्वभावतः , संस्कार से इतना  कथा/ साहित्य  प्रेमी हैं ? असंभव नहीं , क्योंकि आज हिंदी कहानियाँ लिखी तो वैसी ही जा रही हैं , जिनके बारे में पता नहीं कि कन्या कलावती ने कौन सी कथा सुनी थी ? हम तो उसे न सुनने की सजा भुगत रहे हैं | #
३ - जिसमे सबसे कम पैसा खर्च हो , मेरे ख्याल से वही शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम है | #
४ - मैं सोचता हूँ कि इतनी आजादी तो है सबको हिंदुस्तान में ! फिर भी कुछ मुसलमान कश्मीर में क्यों नहीं रहना चाहते ?
५ - मेरे इस ख्याल में क्या खोट है कि यदि कोई अँगरेज़ ईसाई अरब देश में जाय तो वह यह जान ले कि उसे इतवार को  छुट्टी नहीं मिलेगी ? और इसी प्रकार मुसलमान को फ़्रांस में जुम्मा की छुट्टी नहीं मिलेगी ? हिंदुस्तान की बात और है और वह निराली है | यहाँ तो कोई भी आये अपने मन में ख्याल बना कर आये कि वह इस देश का मालिक और राजा है , वह जब , जैसा चाहें , कुछ भी कर सकता है | यहाँ से एक विश्व राजनीतिक व्यवस्था की परिकल्पना करने का मन हो रहा है | वह यह कि तमाम देशों में भिन्न भिन्न प्रकार के राज्य हों -सिख , ईसाई , इस्लामी , साम्यवादी , सेकुलर [हिन्दू और नास्तिक भी] इत्यादि , और नागरिकों को कहीं भी जाने रहने की आजादी हो | जिसको जैसा शासन पसंद हो वह उसी प्रकार के देश में जाकर बसे और हार्दिक -मानसिक -आस्थिक रूप से खुशी खुर्रम से रहे | आज तो अजीब किस्म की तनातनी चल रही है | एक कमज़ोर सीधे सादे देश को कोई माओवादी बना रहा है , कोई इस्लामी बनाने के चक्कर में है तो कोई सेकुलर , तो कोई राज करेगा खालसा का उद्घोष कर रहा है, और हिन्दू तो यह खानदानी है  | इससे वह कुछ नहीं बन पा रहा है , और जनता की एकनिष्ठता और प्रतिभा का समग्र प्रयोग / उपयोग नहीं हो पा रहा है | इस प्रस्ताव को हवाई कहकर भले टाल दिया जाय , पर यह लोकतंत्र का शिखर हो सकता है | सचमुच क्यों रहें देश की सीमायें ? और कोई भी व्यवस्था  अपने देश की सीमायें क्यों लांघे ? अनेकता का पालन विश्व स्तर पर हो अपने अनुशासन के साथ |

धार्मिक भावना

धार्मिक भावना 
१- अन्य सामान्य अतिक्रमणों के विपरीत जब कभी वैध / अवैध मंदिर तोड़े जायेंगे तो उनका प्रखर -प्रबल विरोध होगा | कहा जायगा -यह जनता की धार्मिक भावना पर चोट / प्रहार / कुठाराघात है | इसलिए मेरा सुझाव है कि मंदिरों के न बनने देने को सेकुलर सरकार को अपनी धार्मिक भावना बना लेनी चाहिए और उसे इसी प्रकार प्रदर्शित / व्यवहृत करना चाहिए | अर्थात  उसे कहना चाहिए कि मंदिर बनने से उसकी धार्मिक भावना को चोट लगती है | सचमुच , हर मंदिर उसकी छाती पर मूसल समान होना चाहिए |
२- मैं सत्संगों में भाग नहीं लेता क्योंकि वहां मेरी धार्मिक भावना आहत होती है | संत और उनके भक्त ईश्वर -अल्ला चिल्लाते हैं ,जो मेरी उस आस्था के विपरीत है कि ' ईश्वर नहीं है ' |

priyasampadak

' प्रिय संपादक " [ 46167 /84 ] हिंदी मासिक
यह शीर्षक मेरे पास १९८४ से रजिस्टर्ड है | पुराना दिनमान पढ़ते , उसमे लिखते (सीखते) मेरे मन में यह सनक सवार हो गयी कि लोकतंत्र में लोक की आवाज़ को मुखर करती हुयी संपादक के नाम पत्रों की एक पत्रिका चलायी जानी चाहिए / चल सकती है | सो मैंने यह शीर्षक लेकर [संयोगवश यह मिल भी गया] इसे शुरू कर दिया | पर मैं परिवार के पालन के लिए गलत जगह सरकारी नौकरी में था | इसलिए इसे बहुत विस्तार देकर अपने सपनों के अनुकूल सफल न बना सका | कोई ग्लानि नहीं पर उल्लास को संतोष कहाँ ? मेरे मूल विश्वास में अब भी ज़रा भी कमी नहीं आई है कि ऐसा पत्र यदि संसाधनों और पत्रकारिता के कौशल के साथ डटकर चलाया जाय तो इसे दैनिक तक ले जाया जा सकता है और इसकी सफलता , जनतंत्र की सफलता होगी | कोई अभिमान नहीं पर आत्मविश्वास अवश्य है कि अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति मैंने अप्रतिम आस्था अपने भीतर विकसित की , और मिशनरी तरीके से अपनी आमदनी से पत्र को हर संभव तरीके से चलाया , यहाँ तक कि हार्ट अटेक होने पर बिस्तर पर पड़े - पड़े पोस्ट कार्ड लिखकर भी [जिसकी चर्चा उस समय टी वी पर सुरभि कार्यक्रम में भी हुई ] | सार्वजनिक रूप से असफल होने पर फिर उसे अपने व्यक्तिगत रचनाओं का पत्र / किताब बना दिया जो अब भी छिटपुट चल रही है | पर यह तो कोई बात नहीं हुई , और ६६ की उम्र के बाद तो कुछ होना भी नहीं है | उसे अब बंद करना पड़ेगा ,जो मेरी मृत्यु से पूर्व ही मेरी मृत्यु होगी | इसलिए अब प्रस्ताव करना चाहता हूँ अपने तमाम मित्रों से कि कोई इसे ले ले और चलाये | कोई शुल्क नहीं | कोई आग्रह भी नहीं कि उसे मेरे कल्पित रूप में ही चलाया जाय | कैसे भी चले एक आस ,एक प्यास ज़रूर है कि वह अभियक्ति की आग और मशाल बने तो  कितना अच्छा हो ----
उसी तरह का एक और पत्र अंग्रेज़ी में READERS write [weekly ]भी है - A journal of letters to the editor . RNI -1991
एक और पंजीकृत पत्र है " संक्षिप्त सत्य प्रतिलिपि (हिंदी मासिक )" RNI -1991,
और आख़िरी है - " नास्तिक धर्मनिरपेक्षता ( हिंदी मासिक )" RNI -1991 
मेरा ईमेल पता है - priyasampadak@gmail.com  और मोबाइल नं.है - 09415160913 .धन्यवाद !        

इस तन में


* इस तन में 
कुछ रखा नहीं है 
फिर भी पिले | #

तिस पर भी

तिस पर भी 
हमें अपने कवियों - कार्टूनिस्टों पर , पत्रकारों - पढ़ाने वाले मास्टरों - शिक्षाविदों पर, कोर्स की किताबें बनाने वालों पर, हवाई जहाज के पायलटों- बस के ड्राइवरों  पर , आपरेशन करने वाले डाक्टरों - दवा देने वाली नर्स पर , इंजीनियरों  [वगैरह -वगैरह] पर भरोसा करना ही चाहिए |
थोड़ा स्पष्ट हो लें कि यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तो है ही नहीं | वह तो १९४९ से ही सुरक्षित है | प्रश्न है क्या -क्यों - कैसे पढ़ाया जाय ? किताबों, खासकर टेक्स्ट बुक्स  में illustrations  की ज़रुरत है या कार्टूनों की [यदि वह कार्टून की किताब नहीं है ] ? संभव है दोनो  विद्वानों ने उन पर ध्यान न दिया हो क्योंकि उनके मन में  कोई खोट नहीं होगा, और प्रौढ़ बुद्धि के लिए उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है | और अनुचित नहीं है इस त्रुटि की ओर सांसदों द्वारा इंगित किया जाना [प्रो. के घर कुछ उत्पात को छोड़कर], और इसे सरकार द्वारा मान लिया भी उचित ही था | इतनी दकियानूसी  उत्तेजना भी ज़रूरी नहीं है | न इस वर्ष से पर अगले एडिशन में करेक्शन कर लिया जाना चाहिए | देखना होगा कि २०१२ , १९४९ नहीं है |तब मंडल कमीशन - सच्चर कमेटी  आदि नहीं थे, राम बिलास - मायावती नहीं थीं | उन नेताओं की  बात और थी , उनमे बराबरी का भाव और रिश्ता था | अब भले  नेहरु -पटेल -गाँधी के बीच कोई जातीय फैक्टर  नहीं है , पर जैसे  ही आंबेडकर का नाम जुड़ता है , समीकरण बदल जाता है | और यह यथार्थ है | इसलिए मानना होगा कि उस अस्पष्ट कार्टून को नासमझ अध्यापक prejudiced व्याख्या दे सकता है , और अशिक्षित छात्र उसका मजाक बना सकता है | हमारा निवेदन है ऐसी संभावित भ्रामक स्थितियों से बचना चाहिए | मुझे पक्का विश्वास है विद्वानों ने उस समय इसमें कोई बुराई नहीं देखी होगी , वस्तुतः है भी नहीं , वर्ना वे स्वयं उसे हटा देते | इसके लिए उन्हें सजा के लिए आरोपित करना तो निहायत बचकाना होगा | इन पर विश्वाश नहीं करेंगे तो कहाँ , किस देश से लायेंगे superhuman बुद्धिजीवी ? क्या जो नई कमेटी बनी है वह बिना विश्वास के चलेगी ? क्या उनका किया धरा हर किसी के आपत्ति से मुक्त होगा ? संवाद - विवाद अवश्य चलना चाहिए पर एक अनुशासन के साथ |   

मंगलवार, 15 मई 2012

गीता उपदेश

अपने आनंद के लिए गीता उपदेशक से यूँ भी बात की जा सकती है :- " हे प्रभो ! कर्म करना तो हमारा अधिकार नहीं बल्कि कर्त्तव्य है | अधिकार तो तुम्हारे पास है की तुम हमें उसका फल दो , न दो |" या " यदि कर्म करना हमारा अधिकार ही मान लो , तो फिर तुम्हारा यह निश्चित कर्त्तव्य बनता है कि तुम हमें उसका पूरा फल दो | "

सोमवार, 14 मई 2012

Geeta Gyan

हम गीता के उपदेश को दूसरी तरह से समझने का प्रयास क्यों न करें ? यह किसी भगवान ने कहा हो या न कहा हो , हमें अपना काम मन लगाकर निष्ठांपूर्वक करना ही है | यह तो जीवन व्यापार है , कभी लाभ होगा तो कभी हानि | हानि की आशंका से हम काम से तो विरत नहीं हो सकते ! और जब हम अपना काम मनोयोग से करेंगे , तो प्रकारांतर से वह ईश्वर का आज्ञा पालन , उसकी पूजा हो ही जायगी ! यही कृष्ण का उपदेश भी था | उन्होंने कहा - कर्म करना तुम्हारा अधिकार है , फल की चाह करना नहीं | हमने उसे यूँ समझा - कि कर्म तो हमारा कर्तव्य ही है , उसके लिए हमें ताकीद क्या करना ? उसे न करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता | न कर्तव्य हमारा अधिकार है , न उसके फल की हमें चिंता है |

मेरी बात मानो

मेरी बात मानो 
[कविता ]

किसी की बात मानो न मानो 
मेरी बात मानो ,
माँ -बाप का कहा न मानो ,
गुरू का आदेश न मानो ,
किसी किताब में लिखी बात  न मानो
कोई धर्म न मानो ,
किसी परंपरा का पालन न करो ,
और ऐसा बार -बार कहने वाले 
जागृत- प्रबुद्ध गौतम बुद्ध 
की भी बात न मानो |
किसी की बात न मानो , लेकिन 
मेरी बात ज़रूर मानो ||  

Cartoon Vivad

आंबेडकर कार्टून विवाद पर मैं इतना जोड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं तो हमेशा कहता रहा हूँ कि राज्य दलितों को दे दो | वही सवर्ण हिन्दुओं और मुसलमानों , सबका दिमाग दुरुस्त करेंगे / कर पाएंगे | दलितों के सम्प्रति विरोध का विरोध ज़रा अब वे मुसलमान और उनके हिमायती सेकुलर लोग ज़रा कर के तो दिखाएँ ! किस मुँह से करेंगे जब वे स्वयं ७२ छेद वाली चलनियाँ हैं ? उन्होंने तो खुद डेनमार्की कार्टूनों का आत्यंतिक विरोध या उनका समर्थन किया था | वह कार्टून तो विदेश में बना था , इसलिए भारत में उसका इतना विरोध तो ज़रूरी न था | लेकिन यह कार्टून तो भारत में बना ,तो इसका विरोध क्या अमरीका में किया जायगा ? मज़ाक भी सामने वाले की सहनशीलता का अनुमान लगा कर ही किया जाना उचित होता है | फिर यह शक्ति संतुलन और प्रदर्शन का भी मुद्दा बनता है , भले उतनी भक्ति भावना या मूर्तिपूजा का पुट इसमें न हो | और फिर देखा देखी पाप , देखा देखी पुन्य का भी तो मामला है ! तो , जैसी करनी वैसी भरनी | यह तो राजनीति है | यदि सलमान रुश्दी का आना रुक सकता है , उनकी भाषा -शैली पर कोई छात्र शोध नहीं कर सकता , तो आंबेडकर पर कार्टून -युक्त किताब भी हटानी ही पड़ेगी | अब विरोध रत दलितों का कोई विरोध करे तो हम भी देखें ! हर घटना का कोई एब्सोल्यूट उत्तर नहीं होता | सभी सत्य समय / समस्या सापेक्ष होते हैं , इनके तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता होती है | मैं तो कार्टून विरोधियों का आलोचक तब भी था , अब भी हूँ | लेकिन जब मैं हाजी याकूब का कुछ बिगाड़ नहीं पाया जिन्होंने कार्टूनिस्ट के सर पर ५ या ५० लाख या करोड़ की सुपारी घोषित की थी , तो अब मैं किस मुँह से इस उबाल का विरोध करूँ ? क्या सबको सारी डिमोक्रेसी सिखाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है ? वे खुद क्यों न कुछ समझें और उसका पालन करें , जिसकी नक़ल और लोग भी करें ? पर यह बात तो अपनी जगह पर है कि यदि मोहम्मद साहेब पर कार्टून न बनाया जाता तो इस से इस्लाम की प्रतिष्ठा कुछ बढ़ न गयी होती , या यदि आंबेडकर पर कार्टून किताब में शामिल न किया गया होता तो इस से राजनीति की पढ़ाई में कुछ कमी रह जाती |     

रविवार, 13 मई 2012

कार्टून विवाद

कार्टून विवाद में मैं इस बार नहीं पड़ूँगा । कुछ साल पहले भूलवश पड़ गया था । नतीजा , खास सेक्युलर मित्रों से हाथ गँवाना पड़ा ।

No Answer

[ कविता ]
प्रश्न करके ही 
क्या पा जायँगे बच्चे 
जब हम उनको 
कुछ बताएँगे ही नहीं , 
उन्हें अपने अलावा 
और किसी का उत्तर 
स्वीकार नहीं |

सोमवार, 7 मई 2012

भारत माता डायन है और सांसद डाकू हैं , में कितना अंतर  है?
जो आप मान जाएँ वह सत्य है. जिसे आप ना मानें वह असत्य है 
आप (जो भी कोई) जो कर रहे वह बहुत अच्छा कर रहे है. यदि ऐसा  करेंगे  नहीं तो हिंदुस्तान गुलाम कैसे होगा जो कि इसकी नियति है...
२५ रूपये रोज़ पर कितने भारतवासी गुज़र कर रहे हैं यह गिनने से कोई फायदा नहीं, उनकी खबर लीजिये जो २५ हज़ार रोज़ खर्च कर रहे हैं...
यदि आप अन्याय नहीं कर सकते , तो कोई और देश तलाशिये ..
 NCTC में प्रदेश मशीनरी को शामिल कर उन्हें संसूचित-सम्मिलित करने का प्रावधान इसलिए भी ज़रूरी है जिससे आतंकविरोधी कोई आपरेशन शुरू होने से पहले आतंकियों को सब पता चल जाये.. 
आज़ादी की लड़ाई राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए लड़ी गयी थी या राज्यों की स्वायत्तता के लिए ?
साहित्यकार कहाँ हैं साहित्य के आकार हैं सब 

रविवार, 6 मई 2012

Galatbayani


गुलाम बनाओ आन्दोलन
भारत में कुछ पागल - सिड़ी लोग 'आज़ादी बचाओ आन्दोलन ' चला रहे हैं |
यद्यपि मैं भी थोडा  पागलपन में उनके साथ हूँ , पर मैं  क्षमा चाहता हूँ
, मेरे मन में एक पाप  उदय  हो रहा है | वह यह कि भारत को अब एक गुलामी
आन्दोलन  की ज़रुरत है " हमें गुलाम बनाओ , हम गुलाम हैं , हम गुलाम रहना
चाहते हैं , हमें नहीं चाहिए आज़ादी , हम आज़ादी के काबिल नहीं हैं " etc
हमारा नारा होना चाहिए | वैसे भी चल तो रहा ही है यह आन्दोलन , बस इसे
सही नाम देकर स्वीकार भर करना है | यह कुविचार क्यों आता है कह नहीं सकता
पर निश्चय ही इसके पीछे है हमारे नेताओं का दुष्कर्म -दुराचरण | फिर अपने
वेतन -भत्ते बढ़ाने के विधायकों -सांसदों - ट्रेड यूनियनों की मांगें ,
राज्यों की हठधर्मी , इस्लाम की सक्रियता और उसका सेकुलर  स्टेट द्वारा
उचित -अनुचित पिष्टपेषण , निहित लाभ के लिए रेल पटरियों का उत्खंडन,
आतंकवाद - नक्सलवाद  का उभार, सेना में विवाद , अन्ना - रामदेव का अति की
सीमा तक आन्दोलन , अन्धविश्वास और दिमागी जड़ता में बढ़ोतरी इत्यादि , जो
निश्चय ही हमें गुलामी की ओर ही ले जायेंगे | तो फिर सीधे- सीधे हम
गुलामी की मांग क्यों न करें ? एक बात बताईये , आज़ादी की लडाई क्या
राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए लड़ी गयी थी या राज्यों की स्वायत्तता  के
लिए लड़ी गयी थी ,वह भी आखिर उन्हें कितनी चाहिए ? जब देश ही नहीं रहेगा
तो क्या खाक प्रदेश रहेंगे ? पर विकेंद्रीकरण का विचार जैसे एक फैशन हो
गया गया है | यह इतना ही शुभ होता तो पटेल हैदराबाद ही नहीं तमाम अनगिनत
राज्यों को भारत में न रख पाते | नेहरु का कश्मीर हम आज तक भुगत रहे हैं
| सबकी एक सीमा है और सबको इसे समझना चाहिए , राष्ट्रों को भी और राज्यों
को भी | क्षणिक सफलता के अहंकार में राज्य इसे भूल रहे है | सवाल कांगेस
का नहीं है , कल कोई और होगा केंद्र पर आसीन | आतंक निरोधी  केंद्र पर
राज्यों का इतना विरोध राष्ट्र के लिए शुभ नहीं है | आतंकवादी सब गौर से
देख-समझ रहे हैं ,और हमारी कमजोरी भांप कर अपनी रणनीति बना रहे हैं | यह
किसी से छिपा नहीं है | अमरीका भी तो फेडरल देश है , पर वहां राज्य अपनी
ज़िम्मेदारी समझते हैं | यही कारन है कि वह आज विश्व का दादा बना हुआ है ,उसने लादेन को उसके घर में घुसकर मारा और वहां ९/११ के बाद कोई दुर्घटना दुहरायी नहीं जा सकी , भले शाहरुख़ खान
चिल्लाते रहे कि उन्हें मुसलमान होने के कारण हवाई अड्डे पर रुकना पड़ा |
राष्ट्र ऐसे बनता है न कि व्यक्तियों और कुछ स्वार्थी समूहों के अनावश्यक
जिद से | केंद्र जितनी कमज़ोर है ,वह तो है पर उसे अनावश्यक बयान बाजियों
से हमने , अरविन्द केजरीवाल , ओम पुरी, रामदेव आदि ने अपनी झूठी महत्ता
सिद्ध करने के चक्कर में और भी कमज़ोर बनाया है | इसमें राजनीतिक दल भी
दोषी हैं , जो सत्ता के साथ हैं वे भी , जो विरोध में हैं वे भी | हमें
अपने कमज़ोर बच्चों कि भी हौसला अफजाई करनी चाहिए कि ठीक है तुमने गलती
की, असफल हुए , और इस प्रकार कोशिश करो ,तुम्हे सफल होना है , लोकतंत्र
को सफल होना है , हम तुम्हारे साथ हैं | हमें अपने लूले -लंगड़े लोकतंत्र
को अपाहिज कहकर धिक्कारना , तिरस्कार करना नहीं चाहिए , बल्कि उसे
differently abled  कहकर उसका सम्मान करना चाहिए | तभी वह आत्मविश्वास से
भर कर कुछ नया करने का साहस कर पायेगा | लेकिन नहीं , सब इसकी टांग
खींचने में अपना पुरुषार्थ समझते हैं भले स्वयं टिटहरी की टांग हों |
इसमें अपनी  मीडिया सबसे आगे  है, और किसी का नाम जुबान पर लाकर उसका
जायका क्यों ख़राब करें ?
तो क्यों अनावश्यक नाटक करें ? सीधे - सीधे यही अन्दोलन क्यों न चलायें
की हमें "फिर गुलाम होना है , हमें गुलामी पसंद है , हम गुलामी के अत्यंत
सुयोग्य पात्र है " | और इंतजार कीजिये जब कोई पीढ़ी समझदार पैदा होगी तब
वह आज़ादी की फिर कोई लडाई लड़कर उसे हासिल कर लेगी , जो कि अभी तो
मुश्किल ही दिखाई दे रही है , क्योंकि वह आखिर हम नालायकों की ही तो
संतान होगी |

बुधवार, 2 मई 2012

Baba Daii

Zahir hai jab koi baba -dayi kuchh kahta hai to hum use hi satya maan lete hain aur aage peechhe kuchh nahi sochte , chahe woh Sai baba hon ya Nirmal ya Ramdev, ya Gandhivadi Anna baba Kab hoga kuchh hamara manna ?

मंगलवार, 1 मई 2012

प्रकृति ईश्वर


यदि प्रकृति को ही ईश्वर मानना चाहें , तो भी, यह भी तो सोचें कि आदमी अब कितना प्राकृतिक यानी ईश्वरीय जीवन जी रहा है ? (satark)  

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

देश अपना धर्म है,ईमान है

[मुक्तक ]
देश का शुभनाम हिंदुस्तान है ,
राष्ट्र का हर व्यक्ति इसकी शान है ;
मातु -पितु -गुरु - बन्धु सब है देश अपना 
देश अपना धर्म है , ईमान है ||

[तरही नशिस्त, बाराबंकी ]

Halaal / Haraam

आजकल एक चर्चा फिर बहस में है | अन्ना का कहना है कि किरण बेदी ने अपनी संस्था के लिए पैसे जुटाए इसलिए वह भ्रष्टाचारी नहीं कही जा सकतीं | सही है , तमाम माँ - बाप भी अपनी लड़कियों की शादी और लड़कों की पढ़ाई के लिए घूस -पात लेते हैं | सारा का सारा अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए थोड़े  ही करते हैं | उन्हें भी भ्रष्टाचारी कहना उचित न होगा | सबके पास अपने भ्रष्टाचार के लिए हाज़िर जवाब है | एक चोर डकैत के पास भी | सबके पास अपने अपने कारण हैं | एक शेर सुनिए == " मैं अपने बच्चों की ख्वाहिशों का क़त्ल होते न देख पाया / मैं जानता था की ज़िन्दगी में हलाल क्या है , हराम क्या है | "  

Dalit Rajya

I have no doubts in my mind which I made up lately. Sanshayatma Vinashyatih. Not reservation , the whole power to rule should now be handed over to Dalits, moolnivasi ,you can say . Now it is their turn Hindus and Muslims have enjoyed their turn .Now ,if they are pious and truthful , should vote only in favour of Dalit candidates [or women of all castes, who are candid dalit ]. It is optional, no constitution ammendment needed. But this Idea is the only Saviour of India. Don't  mingle it with the Quality of  Rule and administration . It will not be worse than we witessed in the past .

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

Bhagwan ko maano

(उवाच)
भगवान को मानो, लेकिन इस बात को अपने मन में रखो । ऊपर से यही प्रकट करो कि तुम किसी अलौकिक शक्ति पर विश्वास नहीं करते । तुम तो अत्यंत वैज्ञानिक बुद्धि वाले हो ।
(पाखंड योग) 21-4-2012

Ek to gareebi

(कविता)
एक तो गरीबी
ऊपर से
बेसवा होने का आरोप
कहाँ तक झेलूँ मैं ।
(20-4-12)

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

पाखण्ड योग संस्थान

* मित्रगण मुझसे सहानुभुति रखते हुए कहते हैं - तुम्हारा कुछ भी तो सफल नहीं हुआ, न कविता, न पत्रकारिता, न नास्तिकता, न धर्मनिरपेक्षता,न दलित राज्य,न वैज्ञानिक चेतना, न राष्ट्रहित में स्वार्थविमुखता ,  कुछ भी तो नहीं ।
  तो अब मैं एक काम करने जा रहा हूँ। पाखण्ड योग संस्थान ( HYPOCRICY  YOG  INSTITUTE ) खोलकर मानवता की सेवा करूँगा । तब तो सफल हूँगा, या तब भी नहीं।                                                                        

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

विधायक सीट (कहानी)



आप की तारीफ़?
मैं यहाँ का विधायक हूँ.
तो इधर से ही लखनऊ जाते होंगे?
हाँ.
मैंने आप को कभी बस की विधायक  सीट पर  बैठे नहीं देखा इसी से भ्रम हुआ .

दोस्ती होती है कि नहीं !



भारत को हिन्दू राज्य बना दीजिये फिर देखिये भारत पाक रिश्तों में सुधर होता है की नहीं! अभी नहीं हो पा रहा है तो उसका कारण है कि नमक नमक से नहीं खाया जाता!

है तो कैसे है



  • कहने को हमारे पास विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका है पर इनका होना भी क्या होना है जब ये कुछ करते नहीं, अपना होना , अपनी सक्रियता सार्थकता सिद्ध नहीं करते , हम कैसे मान ले कि ये हैं..

दशा



  • औरतों की दशा बहुत खराब है ऐसा औरतें कहतीं हैं , लेकिन सच ये भी है कि जिनकी अच्छी है , उनकी बहुत अच्छी हैं

घूस



कोई ५ १० २५ देगा तो मैं ज़रूर मना कर दूंगा लेकिन यदि कोई १००- ५०-५०० देगा तो भला मैं कैसे इंकार कर सकता हूँ/

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

राष्ट्रीय सहमति

कभी बनी है
राष्ट्रीय सहमति
जो अब  बने !
हम ये नहीं कहते कि राष्ट्रीय मुद्दों या अमुक विषय पर राजनीति न कीजिये. बिल्कुल कीजिये . पर क्या राजनीति वही कहती है जो आप कह रहें हैं? वहां वस्तुतः  तो आप राजनीति से नीचे कहीं जा रहें हैं .

स्वायत्तता की मांग

भारत के राज्य अपने लिए अत्यधिक स्वायत्तता की  मांग कर रहे हैं. घबराएँ नहीं आतंकवादी पूरा देश ही ले जायेंगे फिर तो उन्हें सत्ता  से भी  पूरी आज़ादी मिल जाएगी.

सशक्त राष्ट्र

हमने स्वायत्त राज्य के लिए नहीं बल्कि सशक्त राष्ट्र  के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी .

ओ मेरे (नीत्शे के ) मरे हुए ईश्वर !

ओ मेरे (नीत्शे के )  मरे हुए ईश्वर !  अब  तू  जिंदा हो जा और जाग. लेकिन इस बार तू खुद कुछ मत करना.  अब तू जन जन के मन ह्रदय में समा जा  जिससे वे जाग के कल्याण में अपने स्वयं के विवेक से लग जाएँ. 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

लोकपाल

* लोकपाल लाओ , नहीं तो जाओ ।
# तब , जब जाना ही है , तो लोकपाल क्यों लाओ ?

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

प्रेम का भविष्य

ईश्वर , प्रेम और भविष्य का अस्तित्त्व नहीं है । आत्मा का भी तो अस्तित्त्व नहीं है । यदि अपनी कोई आत्मा बनायीं है , तब तो वह होगी । वरना आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं होती । इसी प्रकार देश ! क्या देश भी कहीं होता है ? या होना चाहिए ? बहुत से लोग मानते हैं कि धरती तो है , पर देश -प्रदेश ,अरांत - प्रान्त , गाँव - शहर सब मनुष्य के बनाये हुए हैं और इस हिसाब से तो घृणा भी कहीं नहीं होनी चाहिए । जो वह है तो उसे भी मनुष्यकृत माना जाना चाहिए ।

सेना और सरकार

* इतिहास में क्या किसी राज्य का राजा ऐसा हुआ है जिसकी सेना उसके अधीन न रही हो ?

* चलो जनता को यह तो पता चल गया कि उसके देश की सेना चल - फिर सकती है । विश्वास हो गया की वह मार्च भी कर सकती है । जनरल वी के सिंह ने बिला वजह ही पी एम को चिट्ठी लिख कर देश को सकते में डाल दिया ।

व्यंग्य

* हमारी सेना कितनी शांतिप्रिय है यह भी तो देखिये । वह किसी दुश्म्सं देश से लड़ने में विश्वास नहीं रखती , वह अपनी सर्कार से ही लड़ - भिड़ कर अपनी ऊर्जा शांत कर लेती है ।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

घड़ी

[कविता ]
* मेरी घड़ी कुछ दिनों से
ग़ायब थी
वह मुझे आज मिल गयी ,
घड़ी गायब हो गयी थी
लेकिन वह चल रही थी
उसने मुझे आज भी
सही समय बताया ।

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

वह औरत थी

[ कविता ]
वह औरत थी
ईंट के भट्ठे पर काम करती ,
वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बैठी
और अपने पैर खुजलाने लगी ।
मैंने कहा - क्या भूतनी जैसा वेश बना रखा है
इतने गंदे नाखून ?
पैरों की सफाई का भी
ख्याल रखा करो ,
औरत की सुन्दरता
सिर्फ चेहरे से नहीं , उसके
पैरों से भी आँकी जाती है ,
और सुंदर लहराते बालों से भी
यह नहीं कि बस कड़वा तेल चुपड़ लिया ।
यह पकड़ो फेमिना , स्टारडस्ट
देखो और पढ़ो ।

उसने मेरे हाथ से पत्रिकाएँ ले लीं
फटे आँखों से पन्ने पलटती रही
फिर खिलखिला कर जोर से हँस दी
और मेरी किताबें
मेरी ओर फेंक दी ।

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

आत्म विश्वास

*ईश्वर पर विश्वास करो तो करो , लेकिन उस पर अंध विश्वास मत करो ।
[आह्वान - आत्म विश्वास ]

सोमवार, 19 मार्च 2012

बूढ़ों मी कामना

* ये पंक्तियाँ मैं अब तक अर्जित अपनी सारी ख्याति को दाँव पर रखकर लिख रहा हूँ । इस ज़िम्मेदारी की भावना के साथ कि भावी पीढ़ी यह न कहने पाए कि कि मेरे जैसे महान विचारक के होते हुए भी एक बड़ा विचार दुनिया के सामने आने से रह गया । आज़ाद से आज़ाद समाजों में फ्री सेक्स की बात हो गयी । समलैंगिकता स्वीकार हो गयी । सेम सेक्स शादियाँ होने लगीं । स्त्री मुक्ति सभाओं में स्त्री योनिकता की भी खूब चर्चा हो गयी लेकिन यह सब युवाओं के सम्बन्ध में , युवाओं के द्वारा , युवाओं के लिए , युवाओं को ध्यान में रखकर होता है । लेकिन सबमे छूट जाती है वृद्धों की योनिकता की बात । मानो वे मरने से पहले ही सेक्सुअली मृत हो गए हों । इसकी किसी ने चिंता नहीं की , चिंता की ज़रुरत नहीं समझी । किसी धर्म , धर्म ग्रन्थ ने इस पर कोई व्याख्या नहीं दी । सबने उन्हें वानप्रस्थ या सन्यास पकड़ा दिया और देवता समान पूज्य बना कर किनारे रख दिया । आधुनिक समाज ने अधिक से अधिक उनके अकेलेपन या भरण - पोषण की समस्या दूर करने तक का ही उपाय किया । कुछ ख़बरें भले आ गयीं कि किसी अस्सी वर्ष के बूढ़े ने विवाह रचाई । पर विवाह तो स्थिर , स्थाई सामाजिक संस्था या अनुबंध होता है , जिसे वहां कर पाना हर बूढ़े के वश का नहीं होता । पर सेक्स तो हर बूढ़े - बूढ़ी को परेशान करता है । पर बूढ़े के लिए किसी फ्री सेक्स की ज़रुरत की बात या उसकी संतुष्टि के सम्बन्ध में किसी उपाय की अवधारणा किसी दार्शनिक ने नहीं की । आधुनिक से आधुनिक तक ने भी नहीं । क्या वे सोचते हैं कि हर क्रांतिकारी विचार केवल भारत के जिम्मे है ?

रविवार, 18 मार्च 2012

शपथ ग्रहण

कोई आश्चर्य नहीं कि जनाब आज़म साहेब ने जान बूझ कर अधूरा शपथ पढ़ा हो !

सोमवार, 5 मार्च 2012

एकपत्नीव्रत

* मैं एकपत्नीव्रत का समर्थक हूँ
मैं सदा एकपत्नीव्रत रहा ।
बीस वर्ष की उम्र में मेरा विवाह हुआ
२० से ३० तक मैं एकपत्नीव्रत रहा ,
फिर ३० से ४० तक मैं एकपत्नीव्रत रहा ,
और ४० से ५० तक एकपत्नीव्रत रहा ,
तथा ५० से ६० तक एकपत्नीव्रत।
अब ६० के बाद भी मैं
एकपत्नीव्रत का निर्वाह कर रहा हूँ ।
मैं सदा एकपत्नीव्रत रहा ।
####

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

कविता

* सुरक्षा कारणों से
Security issue के कारण
सलमान रूश्दी का जयपुर आना
अनिश्चित है ,
उनके आने से उनकी सुरक्षा को खतरा है
और जयपुर के जान माल की
सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है
सिर्फ इतना ही नहीं
देश की सुरक्षा भी
खतरे में पड़ सकती है
यदि लोकतंत्र यहाँ आया तो
बोलने की आजादी का
आगमन हुआ तो ।
इसीलिये देखो तो
लोकतंत्र नहीं आया , आज़ादी नहीं आई
धर्मों से मुक्त , दिमागी गुलामी से मुक्त
कोई सोच, कोई विचार , कोई व्यवहार
हिंदुस्तान में नहीं आया , वह देखो
दूर खड़ा वह थर थर काँप रहा है ।
यदि उसने भारत में कदम रखा तो
धर्म खतरे में पड़ जायगा , भारत वर्ष
धर्म को मारना नहीं चाहता ।
###

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

जो गरीब है

[कविता ] * जो गरीब है , वह सम्मान्य है आदरणीय है वह क्योंकि उसने कभी चोरी नहीं की, डकैती नहीं की , लूट नहीं की , घूस नहीं लिया , कमतोली नहीं की, कोई मिलावट नहीं की , हराम का पैसा नहीं कमाया , किसी की ज़मीन पर क़ब्ज़ा नहीं किया , अमानत में खयानत नहीं की , किसी की मजदूरी नहीं मारी , काम से ज्यादा मजदूरी नहीं माँगी , कोई अनैतिक काम नहीं किया, कभी बेईमानी नहीं की . तभी तो वह ग़रीब रह गया ? isliye wh samman योग्य है ।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

दोष मत दो

[ कविता ]
किसी का दोष मत दो
जातिवाद , धर्म - संप्रदाय के
दोषों के लिए , किसी व्यक्ति को
दोषी मत ठहराओ
न ब्राह्मण को , न मौलाना को ,
दोष न ब्राह्मणवाद का , न रूढ़िवाद का ,
सबके ज़िम्मेदार तुम हो
क्योंकि तुम इसे मानते हो ।
नहीं मानते , तो बस इतना कहो -
धार्मिक अलगाववाद बेमानी है ,
और साम्रदायिकता है ज़हर ,
ईश्वर का होना नहीं है सिद्ध ।
लेकिन इसके लिए
किसी अन्य को दोष मत दो ,
इससे व्यक्ति तो दोषी हो जायगा
मगर दोष बना रहेगा ।
###

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

वोट का आधार

* हम क्यों रोज़ी - रोटी , कपडा - मकान के वायदे के आधार पर किसी को वोट दें ? हम तो उसी पार्टी को वोट देंगें जो अयोध्या में राम मंदिर नहीं , सार्वजानिक अस्पताल बनवाने का दम भरे ।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

वोट दें

किसी भी दल को नहीं , किसी भी दलित को वोट दीजिये । इस बार , बार - बार , चुनाव में ।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

दलित को वोट

आह्वान :- किसी दल को नहीं , किसी दलित को वोट दीजिये । इस बार , बार -बार , चुनाव में ।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

चुनाव प्रचार

चुनाव प्रचार
* अन्ना तो आ नहीं रहे हैं , फिर आने दीजिये केजरीवाल को चुनाव दुष्प्रचार के मैदान में । मालूम पड़ जायगा उन्हें आटा-दाल का भाव ।

सोमवार, 9 जनवरी 2012

प्रेमिका

[कविता ]
* वही लिजलिजा मांस
वही कठोर हड्डी
माँ की , पत्नी की , प्रेमिका की
किस तो शरीर से प्यार करूँ !
फिर भी प्यार करना तो है
माँ से , पत्नी से , भाई - बहनों से
प्रेमिका से भी ।
###

रविवार, 8 जनवरी 2012

शीशे में नूंह

[कविता ]
* मेरा ख्याल है कि
प्यार जताने से पहले
मुझे अपना मुँह
शीशे में
देख लेना चाहिए ।
# #

बुधवार, 4 जनवरी 2012

अयोध्या प्रस्ताव

Proposal /
If you agree, Please Propose in whatever way you can , and let the problem end :
* KAUSHALYA MATERNITY and INFERTILITY RESEARCH CENTRE
[ at Ayodhya] " KAUSHALYA HOSPITAL"

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

एक्टिंग

[कविता ]
* एक्टिंग ?
एक्टिंग क्या चीज़ है ,
मै तो अपना काम
कर रहा था ।
#

रविवार, 1 जनवरी 2012

आरक्षण का न्याय

हमें बिल्कुल एतराज़ नहीं है लोकपाल में एक पद मुस्लिम आरक्षण पर । बस शर्त यह है कि वह मुस्लिम तसलीमा नसरीन नाम की औरत हो , जिसे हिंदुस्तान से मुसलमानों के विरोध के कारण भगाया गया । यदि वह भारत में नहीं रह सकती , तो हम भी मुसलमानों को भारत में कोई आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हो सकते ।

पैसा - प्यार

[कविता ]
* पैसा
प्यार नहीं खरीद सकता ,
पैसा
सब कुछ खरीद रहा है ।
#

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सख्त लोकपाल बिल

* अभी तो खैर लोकपाल का मामला लटक गया है । लेकिन जब कभी यह आये तो सख्त लोकपाल के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूँ । सख्त लोकपाल वही हो सकता है जिसका कार्य क्षेत्र सीमित हो उसका काम यदि साठ लाख लोगों पर छितरा दिया गया तो वह प्रभावी काम नहीं कर पायेगा । इसलिए यदि उसे सचमुच मज़बूत बनाना है तो केवल उसे सांसदों के भ्रष्टाचार पर नज़र रखने , उनकी जांच करने और उन्हें सजा देने तक सीमित रखें । पी एम को भी एम पी के रूप में उसके अधीन रखें पर पी एम के काम पर उसका कोई दबाव न हो । एक अभूत पूर्व विचार यह है कि लोकपाल को चुनाव आयोग [संवैधानिक स्तर प्राप्त ] के अन्दर एक सेल के रूप में बना दें जो सांसदों के सम्पूर्ण आचरण , उनकी उपस्थिति ,वेतन -भत्ते पर नज़र और अंकुश रखे । [आखिर मुख्य समस्या तो उन्ही के भ्रष्टाचार को लेकर है , जिस से जनता ज्यादा नाराज़ है , और उस से छुटकारा पाना चाहती है ? अन्ना ने तो अनावश्यक इतना फैला दिया कि वह असफल होने के लिए अभिशप्त हो गयी ] । शेष संस्थाओं सी बी आई , न्याय पालिका , ए बी सी डी ग्रुप और प्रदेशों के लोकायुक्त जैसे अपना काम कर रहे हैं वैसे करें । इस प्रकार बिल के तमाम जद्दो ज़हद समाप्त हो सकते हैं और इसके बहाने फैलाये जा रहे राजनीतिक ज़हर से देश को बचाया जा सकता है
और अंत में एक ख़ास बात । हम नहीं चाहते कि लोकपाल इतना सख्त हो जाय कि वह किरण बेदी के बिल चेक करने लगे , अरविन्द केजरीवाल की सेवा पुस्तिका उलटने लगे, भूषणों की संपत्ति का ब्यौरा लेने लगे या कुमार विश्वास के पढ़ाए बच्चों के इम्तिहान की कापी जांचने लगे । यदि वह इतना अधिकार संपन्न हो जायगा ,तब हम लोगों को थोड़ी दिक्कत हो जायगी । #

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

सफल अन्ना

* अन्ना का आन्दोलन सफल , यदि इसे सफल माना जाय तो , इसलिए हुआ क्योंकि अन्ना टीम ने व्यक्ति और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को छुआ तक नहीं । बल्कि उनके सदस्य व्यक्तिगत रूप से जब भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के लिए आरोपित हुए तो स्वयं उन्होंने उसे भ्रष्टाचार नहीं माना और अन्ना ने उनका बचाव ही किया । अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने चिड़िये की आँख की तरह केवल राजनीतिक , उसमे भी केवल सरकारी भ्रष्टाचार , स्कैम ,घोटालों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखकर आन्दोलन को संचालित किया । इसीलिये उन्हें एकाएक जन समर्थन मिला और वे सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हुए । यदि उन्होंने ज़रा भी अपनी भीड़ से भ्रष्टाचरण न करने की शपथ लेने की पेशकश की होती तो भीड़ का छँटना जो अब मुंबई में प्रकट हुआ , वह दिल्ली में ही शुरू हो गया होता । बल्कि जिस तरह वह आज MMRDA मैदान छोड़ कर भागे ,उस तरीके से तो वह जंतर मंतर से ही छू मंतर हो गए होते । बहरहाल अब भी अन्ना की यदि अन्ना की समझ में कुछ आ जाय तो यह उनके स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा । उन्हें समझना होगा कि सफलता व्यक्ति को बड़ी जल्दी पठार में फेंकती है ।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

अन्ना को बचाओ

* अन्ना हजारे का कहना है कि वह मृत्यु से नहीं डरते । तो उनके साथियों में इतना यो साहस होगा ही कि वे जेल का आनंद उठा सकें । अतः उन लोगों को जेल भेजकर सरकार को चाहिए कि वह अन्ना को बचाए । वर्ना यह चंडाल चौकड़ी अन्ना से भूख हड़ताल करवा - करवा कर उन्हें मार डालेगी ।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

अन्ना के नौजवान

अन्ना के नौजवान :
अन्ना अपने नौजवानों से जीवन में कभी घूस न लेने की शपथ नहीं दिला रहे हैं तो कोई बात नहीं । पर यदि ये भ्रष्टाचार विरोधी युवक स्वयं ही अपनी शादी में दहेज़ न लेने की और अपनी बहनों , तथा आगे चलकर बेटियों के विवाह में दहेज़ न देने की शपथ ले लें , तो अन्ना का आन्दोलन कुछ तो विश्वसनीय हो जाता । वर्ना तो फिर यही निष्कर्ष निकलता है कि बस राजनीतिक इच्छा वश ही ये जन लोकपाल बिल माँग रहे हैं, जिस प्रकार राजनीतिक कारणों के तहत ही कांग्रेस एवं अन्य दल इसे पास करना नहीं चाह रहे हैं ।

अन्ना के नौजवान

अन्ना के नौजवान :


अन्ना अपने नौजवानों से जीवन में कभी घूस न लेने की शपथ नहीं दिला रहे हैं तो कोई बात नहीं

यह भारत देश तमाशा है

यहाँ तानाशाह भी अपना अभियान शुरू करने से पहले महात्मा गाँधी की मूर्ति के समक्ष शीश नवाता है । और कोई आश्चर्य नहीं , यदि कभी हिन्दुओं में कसाई कौम पनपे तो वह बकरे की गर्दन पर छुरी चलाते समय मन्त्र बोले - "जय,गाँधी जी की जय" !

अब मैं अन्ना

* अपनी गलती मैं स्वीकार करता हूँ की मैं अभी तक अन्ना के साथ नहीं था । हीन भावना से ग्रस्त था मैं कि इतने बड़े ईमानदारी के कार्यक्रम में मैं भला कैसे शामिल हो सकता हूँ ? लेकिन अन्ना के सिपहसालारों के कारनामे सामने आने के बाद मैं भी अन्ना की लाइन में आने के लिए अर्ह , योग्य हो गया हूँ । शासन पर ईमानदारी का दबाव बनाना है , स्वयं ईमानदार तो होना नहीं है । और भूषण तो बहुत बड़े हैं , अरविन्द , किरनकुमार से ज्यादा भ्रष्टाचारी तो मैं कभी नहीं रहा जो मैं अन्ना आन्दोलन में किसी से पीछे रहूँ ! मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे ज्यादा ही ईमानदार रहा हूँ । अतः अगले आन्दोलन में अन्ना के पीछे चलने में मुझे कोई परेशानी नहीं होगी , यदि वह अब भी आगे चले तो । और यदि मेरी समझ में तब तक यह न आ जाय कि अन्ना का आन्दोलन तो स्वयं में एक महान राजनीतिक भ्रष्टाचार है । #

विषम समता

प्रसन्नता हुयी जानकर कि एक मुद्दे पर दोनों एकमत हैं । फारुक अब्दुल्ला और बाल ठाकरे दोनों का कहना है कि लोकपाल की कोई ज़रुरत नहीं है ।

तानाशाह

" मेरा लोकपाल बिल , या हवाई जहाज़ का बिजनेस क्लास बिल अभी , फौरन जैसा मैंने बनाया है बिल्कुल वैसा ही , बिना किसी काट -छांट के पास करो , नहीं तो जाओ " ऐसा ऐलानिया धमकी जो दे , तो समझो वह तानाशाह है । जब वह आ जायेगा तो कभी जायगा नहीं ।

रविवार, 25 दिसंबर 2011

फिर भी वामपंथी

प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में इसके अध्यक्ष नामवर सिंह के बयान को लेकर कुछ लेखक उनकी थुक्का फजीहत कर रहे हैं लेकिन जैसा उनके चरित्र में है वे अपने गिरेबान में झाँकने का कष्ट नहीं करते।
वे यह आकलन करने में असमर्थ हैं कि नामवर सिंह फिर भी वामपंथी ही हैं अपने मौलिक स्वरुप में। और उन के चरित्र में शामिल हैं झूठ छद्म और पाखण्ड, जिसे वे अब तक ओढ़े हुए थे। ज़रा सा बोल क्या दिया कि उनका छद्म खुल गया। और इतने दिनों जो उन्होंने पहना- ओढ़ा-बिछाया, खाया-पिया वह पाप किस सिद्धांत के ऊपर डाला जायेगा?
आश्चर्य नहीं, जो आज नामवर की आलोचना कर रहे हैं कल वो भी अपने केचुल उतारें या उनका भी पर्दाफाश हो।

लोकतंत्र कि ऐसीतैसी

अदम गोंडवी का १८ दिसम्बर को निधन हो गया। मुझे दुःख इसलिए है कि वह मुझसे एक साल छोटे थे और उन्हें मुझसे पहले नहीं जाना था। कविता में तो वे निश्चय ही बहुत आगे थे जिसका सबूत है अख़बारों में उनका अधिकाधिक कवरेज। और प्रगतिशील साहित्यिक सिद्धांत के अनुसार जो रचनाकार आज़ादी और लोकतंत्र की जितनी फजीहत करे, खिल्ली उड़ाए, नेताओं को गालियाँ दे सरकार को सर के बल खड़ा करे, व्यवस्था का मजाक उड़ाए वह उतना ही बड़ा शायर होता है
फ़िर भी ये लोग शायर के इलाज की ज़िम्मेदारी सरकार पर ही डालते हैं जो इनके अनुसार नाकारा है। क्या यह अनैतिक नहीं कि जिसको गालियाँ दो उसी से पैसा लो फिर उन्हीं के मुंह में डंडा भी करो । कितने बीमारों के इलाज के लिए उनके खेत बिक जाते हैं क्या इन जनवादियों को पता है?
ऊपर से इनकी
स्थापना ये है कि कवि भी उन्ही को मानो जिन्हें ये कवि की मान्यता दें . इनकी नजर में नागार्जुन, मुक्तिबोध तो कवि हैं मगर निर्मल वर्मा और अज्ञेय साहित्य के क्षेत्र में अस्वीकृत होने चाहिए।
ओर कहना न होगा, समाज को लताड़ने वाला, उसके अंधकार पक्ष को उधेड़ना, नारेबाजी करना, बिना मानसिक परिवर्तन के बगावत, विप्लव के लिए उकसाना बहुत आसान भी तो होता है, कठिन साहित्य होता है मानव के मन में प्रवेश करना ।

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

लोकपाल के प्रश्न

* अन्ना के समर्थक कृपया यह बतायें कि सरकार अब क्या करे ? उसने तो एक बिल संसद में पेश कर दिया । उस पर मतैक्य नहीं हो रहा है , और सदन में वह पारित नहीं हो पा रहा है तो सरकार क्या करे ? क्या मार्शल लगा कर सारे सदस्यों से वह ज़बरदस्ती करा ले ? क्या वह ऐसा कर सकती है ? या वह फौज लगाकर राष्ट्रपति से , वह जहाँ कहीं भी हों उनसे , दस्तखत करा ले ? अन्ना टीम तब भी खुश होगी क्या ?
* अब आरक्षण के प्रश्न पर सोचा जाये । यह तो तय है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है । भाजपा तमाम गलत बयानी करती है , पर उसका यह कहना सत्य प्रतीत होता है कि यदि इसकी तामील की गयी तो देश में गृह युद्ध की आशंका है । आखिर सहनशीलता की भी एक सीमा होती है । पाकिस्तान -बंगलादेश के बंटवारे को सहने के बाद अब देश के पास इतनी सहन शक्ति शायद नहीं बची है कि वह एक और बंटवारे की भूमिका को स्वीकार करे । अतः ऐसे आरक्षण की मांग देश हित में मुसलमानों को छोड़ देना चाहिए । यह हमारा राजनीतिक प्रस्ताव है । अब दार्शनिक बहस यह है कि मुस्लिम कोई जाति है या धर्म । अधिकांश मान्यता है कि यह धर्म है । फिर तो जैसा ऊपर बताया गया इनके लिए आरक्षण संभव नहीं है । आरक्षण हिन्दू धर्म के भीतर की त्रासदी है , जिसके तहत सवर्ण हिन्दू अपनी जातिगत विसंगति का फल भुगतने के लिए तैयार है , ख़ुशी से या नाखुशी से । पर इसने किसी धर्म पर कोई अत्याचार नहीं ढाया है, जिसकी सजा वह भुगते । फिर भी यदि कोई इसमें आरक्षण की जिद में है तो उसे हिन्दू धर्म की जातिगत व्यवस्था में आना होगा । दर्जी , जुलाहा , धुनिया बनकर तो वह आरक्षण का बन सकता है , पर उसके साथ मुसलमान जोड़कर वह आरक्षण ना ही माँगे तो अच्छा है ।
* और एक अंतिम ,अप्रिय प्रश्न । इन मूलभूत प्रश्नों से आखिर अन्ना टीम क्यों नहीं जूझती , जिसका देश हित में स्थायी महत्व है ? और हम क्या बुरा करते हैं जो उसके इसी छद्म को पहचान कर उनके साथ नहीं जुड़ते ?

अन्ना का उभार

अन्ना हजारे ने कहा है कि यदि उनसे पूछा जाता तो वे मैदान के आवंटन के लिए कोर्ट न जाने देते | मतलब साफ़ है कि अन्ना अलग हैं और उनकी टीम अलग है | टीम कई काम उनके अनुकूल नहीं करती , जिस प्रकार उनके स्वयं के काम लोकतंत्र के अनुकूल नहीं होते |अब ज़ाहिर है किराये के लिए सात लाख रूपये चंदा लेना उनके बाएं हाथ का खेल है | वह भी नम्बर एक का | काफी मेहनतकश ईमानदार जनता उनके साथ है |
दूसरी बात यह गौर करने की है कि उनके आन्दोलन का दबाव सिर्फ कांग्रेस पर ही क्यों होता है ? अन्य दल भी तो संसद के सदस्य हैं जिनकी ज़िम्मेदारी है बिल को पास करना , और वे उसमे अड़ंगे लगा रहे हैं | तो उन पर क्या अन्ना का दबाव नहीं होना चाहिए ? फिर कांग्रेस ही क्यों दबे जो कि अपना कर्तव्य संविधान के दायरे में निभा भी रही है ?
तीसरी बात , अन्ना उन आपत्तियों का जवाब क्यों नहीं देते जो संसद में उठाये जा रहे है ? दलित ,महिला , पिछड़ों के आरक्षण पर उनका कोई पक्ष नहीं है | अल्पसंख्यकों के आरक्षण पर अन्ना चुप हैं | क्यों ? क्या यह अर्थ न लगाया जाये कि वे अपनी ज़िम्मेदारी निभा नहीं रहे हैं और बस किसी अज्ञात जिद वश रट लगाये जा रहे हैं - लोकपाल बिल पास करो , लोकपाल बिल पास करो |
* [हाइकु ]
आया उभार
अन्ना - अरविन्द का
उतर गया |
#

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

आओ म्हारे देश

*
[कविता ]
आओ दोस्तों आओ
आओ दुश्मनों आओ
दोस्त बनकर दुश्मनी निभाओ
दुश्मन होकर दोस्ती निभाओ
भारत आओ ,
आओ आर्यों आओ
आओ यवनों आओ
आओ अंग्रेजो आओ
भारत का दरवाज़ा पूरा खुला है
आओ आतंकवादी आओ
मार्क्स - माओवादी आओ
आओ अन्ना हजारे आओ
हिंदुस्तान तुम्हारा
स्वागत करने के लिए
तैयार खड़ा है
आओ कोई भी आओ
सब लोग आओ । #

रविवार, 18 दिसंबर 2011

बदमाश chintan

१ - हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिये ,
एक कुइंटल धान हमसे हर फसल में लीजिये । #
२ - बंधू जी जिस काम में लागे ,
काम तो पीछे , बंधू आगे । #

सुबह आयेगी

[गायन ]
वह सुबह कभी तो आयेगी ।
जब मच्छर सब मर जायेंगे ,
सब बीमारी हट जायेंगे ।

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

बदमाश चिंतन

१- (उवाच ) = हमारी डाक्टर साहिबा अभी आउटडोर के मरीजों को देख रही हैं । हम तो इनडोर में भर्ती हैं न ! # २ - (कविता )= अभी तो पास नहीं आ रहे हो , कोई बात नहीं , जब डायरेक्टर कहेगा तब तो चिपकोगी ? # 3 - (dharm patrika ) = यदि कोई धर्म की एक पत्रिका निकालना चाहें तो उसे इसे मासिक आवर्त्तता के साथ निकालनी चाहिए और पत्रिका का नाम रखना चाहिए - "मासिक धर्म " । #

४ - (कथा भूमि) = प्रवचनकरता ने भाषण शुरू ही kiya था - "मनुष्य को अपनी काम भावना से मुक्त होना चाहिए ।"
मैं उठकर बाहर चला आया । #

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

अयोध्या समाधान

१ - (समाधान) - मित्रों से बातचीत करने पर यह लग रहा है कि अयोध्या में जो सरकारी ज़मीन है उस पर मैटरनिटी होम बनवाने की माँग राष्ट्रव्यापी बनायीं जा सकती है । विवादित स्थल का निर्णय अदालत के पास है , वह करे । लेकिन यह तो तय है कि पूरी समस्या का समाधान हमारे पास है जिसे हम सरकार के माध्यम से लागू कराना चाहेंगे । वह काम तो कोर्ट नहीं कर सकती , और हिन्दू -मुस्लिम संगठन भी नहीं करेंगे । ऐसी दशा में सरकार को कौशल्या मातृत्व केंद्र बनाने की पहल करनी ही चाहिए जिससे समस्या को स्थायी समाधान की दिशा मिल सके । #
२ - (कविता) - मस्जिद तो बन ही नहीं सकती
तो अयोध्या में
राम जन्म भूमि मंदिर भी
नहीं ही बननी चाहिए ,
यह मुसलमान नहीं
हिन्दू की चाह है ,
कट्टर ,सत्य ,आधुनिक ,
प्रगतिशील , वैज्ञानिक
हिन्दू की चाह है । #
३ - (उवाच )- आप हिन्दू हैं । और साम्प्रदायिक नहीं हैं । इसका मतलब यह नहीं कि आप साम्प्रदायिक नहीं हैं । आप बड़े आराम से मुस्लिम साम्प्रदायिक हो सकते हैं । #
४ - जैसे जातियां हैं तो उनमे जातिवाद का होना स्वाभाविक है । उसी प्रकार सम्प्रदाय हैं , तो साम्प्रदायिकता भी होगी ही । अब देखना यह है कि जिन दो सम्प्रदायों में अधिक तनाव है , उनमे से कौन अन्य सम्प्रदायों को सहने , अपनाने में कुशल रहा है और कौन हमेशा तना - अकड़ा रहा है ? इसके लिए उनके इतिहास -भूगोल में जाना होगा और उनकी वर्तमान मानसिकता का भी आकलन करना होगा । तिस पर भी किसी निर्णय पर निश्चयात्मक हो पाना कठिन ही है । #

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

Delivery

* देखा जा रहा है कि आजकल ज़्यादातर प्रसव नार्मल नहीं होते । तो क्या , पैदा होने वाले बच्चे तो नार्मल , सामान्य ही होते हैं !

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

पागल खाना

* अभी तो नहीं , लेकिन जिस तरह अन्ना टीम सोते जागते रात- दिन जन लोकपाल बिल -जन लोकपाल बिल बडबडारही है , एक दिन उनकी समर्थक जनता ही उन्हें पागल करार दे देगी । #
* जन लोकपाल भजन
हे लोकपाल , जन लोकपाल !
रहना तुम हम सब पर कृपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे चक्र के अन्दर हैं ,
हे चक्र सुदर्शन हो निहाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सोने से पहले लोकपाल,
जगने पर पहले लोकपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हर दिवस -रात , हर सुबह -शाम ,
हम अविरल करते जाप माल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम टीम बना किर्तन करते
अब तो है इज्ज़त का सवाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे सेवक टीम अना ,
रखना हम पर अपना ख्याल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
भजती अन्ना की टीम तुझे ,
भजते हैं नीम हकीम लाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सरकार मान ही नहीं रही ,
हमको है अतिशय ही मलाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल ! ####

हराम क्या है

* मैं अपने बच्चों की आरजूओं का क़त्ल होते न देख पाया , मैं जानता था कि जिंदगी में हराम क्या है , हलाल क्या है । [ मो वासिफ फ़ारूकी ]

सोमवार, 7 नवंबर 2011

ईद मुबारक

* मेरा ख्याल है , यदि मैं देश को ईद [ उज्जुहा ] का मुबारकबाद ना भी दूँ , तो भी वह इसे ख़ुशी - ख़ुशी मना ले जायेगा | कुछ मजबूरियां तो राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , राज्यपालों , मुख्य मंत्रियों की होती हैं जो वे गाहे - बगाहे होली - दीवाली - शबे बारात वगौरह की शुभकामनाएं देते रहते हैं | #
* जो मैं सूरज की मानिंद ज्क्लता रहूँगा ,
वह चाँद है , बुझेगा नहीं तब तक |
[ रवि कुमार बाबुल , भड़ास ब्लॉग पर ] #
* क्या सचमुच भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या है ? वह ऊपरी स्टारों पर ? ऊपर का पैसा तो ऊपर वाले वैसे भी खा जाते हैं | हम निचले स्तरों के भ्रष्टाचारों से पीड़ित हैं | और क्या हमारी अन्य समस्याएं नहीं हैं ? अन्ना का लोकपाल क्या पानी में मिलाना रोक देगा , वाटर सप्लाई में कीचड़ आना बंद करा देगा ? वह कुछ भी करेगा तो शिकायत मिलने पर ही न ? शिकायत कौन करेगा ? अभी तो उनकी नियुक्ति होगी , वही संदिग्ध है | कहाँ से मिलेंगे इतने दूध के धुले , और दूध भी तो वही होगा जैसे हमने ऊपर वर्णित किया ? फिर , उनकी नियुक्ति में भी घपला अवश्यम्भावी है | उस पर मुक़दमेबाजी होगी \ बरसों लगेंगे फैसले आने में | तब वे सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे | उनका इन्फ्रा स्ट्रक्चर बनेगा | अमला तैयार होगा | तब तक तो हम ६५ से ९५ हो जायेंगे | व्यक्ति की आत्मा को कोई भी कानून नहीं बाँध पायेगा | और उस आत्मा को ईमानदार बनाने के लिए कोई साहित्यकार - पत्रकार , साधू संत , अन्ना -मन्ना , काम नहीं कर रहे हैं | #
* आखिर अंततः करना आपको भी राजनीति ही है ! तो फिर यह साहित्य , संस्कृति , अध्यात्म , धर्म , योग इत्यादि की बातें क्यों कर रहे हैं ? सीधे अपने मंतव्य पर आइये | #
* उत्तराखंड का लोकपाल बिल अन्ना टीम को इसलिए भी पसंद है क्योंकि उसमे गैर सरकारी संगठनों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है , और मुख्य मंत्री को अन्दर |
* रिटायर्ड जजों से अन्ना अपनी जांच करा रहे हैं , जैसे प्राइवेट डाक्टरों से अपने स्वास्थ्य की जांच | अब खुद मुजरिम , अपने ही वकील , अपना ही मुंसिफ है | फैसला किसे नहीं पता ? वे सत्य वादी हैं तो अपना जुर्म कुबूल क्यों नहीं कर लेते ? अपने पाप स्वीकार क्यों नहीं करते , जो की उन्हें भली - भाँति ज्ञात हैं ? इतने नाटक क्यों करते हैं ?
* हम वह लोग हैं जो यह मानते हैं कि भगवान का भजन [ लक्ष्य का प्रणयन ] ज्यादा प्रभावी तरीके से भूखे रहकर ही किया जा सकता है , लगभग निराजल व्रत की तरह | तभी भजन का सार्थक फल - फूल मिलता है | वर्ना भूख का क्या ? उसका तो पेट कभी नहीं भरता | #
########ईद मुबारक

रविवार, 6 नवंबर 2011

भ्रष्टाचार की परिभाषा

* भ्रष्टाचार की परिभाषा होते होते यहाँ आ पंहुची है कि जो जन लोकपाल बिल पास कराये वह ईमानदार , और जो जन लोकपाल बिल पास होने में आनाकानी करे वह महाभ्रष्ट | जन लोकपाल भ्रष्टाचार का पर्याय हो गया है | अजीब विडम्बना की स्थिति है दार्शनिक हिंदुस्तान के लिए | शब्दों और समस्याओं कि इतनी हलकी व्याख्या इसके पहले नहीं होती थी | तो यह है हमारी असली प्रगति !
* केजरीवाल ने आय कर विभाग की नोटिस पर ९ लाख रु का चेक प्रधान मंत्री के पास भेज दिया है | क्या कोई साधारण समझदार नागरिक ऐसी बद तमीजी कर सकता है ? क्या बिजली का बकाया आप जल निगम में जमा कर सकते हैं | मैं इसके व्यवहार को देखकर हतप्रभ हूँ , कि आखिर यह लड़का अपने आप को समझता क्या है ? अन्ना संविधान से ऊपर , तो उनसे पहले श्रीमान जी संविधान से ऊपर ! अभी वह फोन टेपिंग का मसला उठा रहा है | उद्देश्य कुछ नहीं , सिर्फ यह जाताना कि देखो मैं इतना महत्त्वपूर्ण हूँ | और नहीं तो क्या ? अभी तो जूता और काले झंडे दिखाए गए हैं , आगे आगे देखिये क्या होता है ! उन्हें राजनीतिक विरोधी कहकर न टालिए राजनेताओं की तरह | वे उसी सौ करोड़ जनता के अंग हैं , जिनकी तरफ से आन्दोलन चलाने का तुम दावा ठोंकते हो |
इसीलिये मैं इन लोगों के दिखावे के मुद्दे से प्रभावित न होने और इनके असली मंतव्य को पहचानने और उसे धूल में मिलाने का आग्रह जनता जनार्दन से करता रहता हूँ | कुछ लोग इसे समझने से इंकार करके मुझ पर नाराज़ होते हैं , वह तो क्षम्य है | पर खेद है कि अन्ना महाशय भी इसे नहीं समझ रहे हैं , और अपनी तात्कालिक ख्याति , प्रशंसा और प्रचार की लालच में टीम की गिरफ्त में आते जा रहे हैं | वे नहीं समझते कि जब पोले खुलेगा , [ब्लॉगर विवाद से वह सामने आना शुरू भी हो गया है ] , और लोक की नज़रों में आसमान से गिरेंगे , तो उनका धवल वस्त्र मटियामेट हो जायगा | उनकी चांदनी चार दिनों से ज्यादा नहीं है | वे गौर करें कि यही कारण है कि अन्ना के अलावा उनकी टीम के अन्य सदस्य रंगीन कपड़े पहनते हैं , और वे उनके साथ अन्न त्याग कर अपना स्वास्थ्य ख़राब नहीं करते | दिग्विजय सिंह उनके विरोधी सही , पर निंदक को भी अपने नज़दीक रखना भारतीय जीवन शास्त्र में बड़ा ज़रूरी माना गया है | #
* मेरा प्रस्ताव है कि अन्ना टीम से यह लिखित शपथ पत्र ले लिया जाय कि वे स्वयं लोकपाल बनने के प्रत्याशी नहीं होंगे , जिससे हम जनता का उन पर अविश्वास कुछ कम हो , और उन पर थोड़ा विश्वास आये कि वे इतना उछाल कूद अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं , बल्कि जनहित में कर रहे हैं | वैसे भी ये लोग अपने अभी ही के भ्रष्टाचारों के कारण उस पद के काबिल नहीं रह गए हैं | #
* कहा और समझा यह जाता है कि जो अन्ना के साथ नहीं है वह भ्रष्ट है | ऐसी रणनीति ही बनायीं है इस टीम ने , इसीलिये यह प्राथमिक तौर पर इतना सफल भी हुआ | लेकिन दर असल हकीक़त इसके पलट है | सारे भ्रष्टाचारी अन्ना टीम में हैं या इनके आन्दोलन में हैं | जो समझदार नैतिक जन हैं वे इनसे दूर हैं इनका छल समझकर , या समर्थन में भी हैं तो कुछ आपत्तियों के साथ |#