शनिवार, 26 मई 2012

HURRAY !


HURRAY !  all my friends , I could name my one month old only granson  as  “ DINMAAN “ (or Dinman Srivastava ) which was my long pending ambition  , based on my favourite magazine – old DINMAN edited by Aggeya and then Raghubir Sahai . I am very pleased today that my son accepted this name for his son .


मित्रों को हार्दिक धन्यवाद मेरी और से | और शिशु दिनमान का आप सबका चरणस्पर्श आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए | दोस्तों, मज़ा और तो तब आये जब उसका नाम केवल दिनमान रहे या दिनमान नागरिक हो जाये ,लेकिन  सोचता हूँ - किसी पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं है | कोई विवाद नहीं पुनर्जीवित करना चाहता | पर इसे राजनीतिक विडंबना, या अपनी पराजय तो मानता हूँ या इस अवस्था में शक्ति की कमी  कि यदि बहू - बेटा उसका नाम स्कूल में श्रीवास्तव जोड़ कर लिखाएंगे तो मैं मना नहीं कर पाउँगा | अपना ही नाम कहाँ छिपा पाया ? बताना ही पड़ा कि मैं सवर्ण हूँ जिससे मेरे सामाजिक -राजनीतिक कर्म में कोई छद्म न पनपे , और जब सवर्ण हूँ तो कोई जाति बतानी ही थी | प्रमोद श्रीवास्तव जी के अनुसार हिन्दू धर्म का मतलब ही  जाति है , ये दोनों एक दूसरे से पृथक नहीं हो सकते ,और मैंने हार मान ली | यद्यपि कोशिश पूरी ईमानदारी से की जाति मिटाने की | लखनऊस्कूल के लोग जानते हैं , युवजन समिति के माध्यम से आन्दोलन को | अब इसका दोष सरलीकृत ढंग से आरक्षण / मंडल को दूँ तो दोषी हो जाऊँगा | इसलिए संतोष करता हूँ यह सोचकर कि तब हम नादान थे , युवा उत्साह था और  दुनिया की समझदारी में कमी थी , जिसकी  रौ में हम बह गए थे | तब भी इतना तो कर ही सका था कि बड़ी बेटी [दिनमान की एकमात्र बुआ] का नाम रजनीगंधा और छोटे एकमात्र बेटे[दिनमान के बाप] का नाम नवनीत कुमार बिना किसी उपनाम के रखा | बस वहीँ तक मेरी सीमा थी | मन थोड़ा खिन्न तो होता है , पर लोकतान्त्रिक आध्यात्मिकता के सहारे खुश होने की चेष्टा करता हूँ | आप सबका आभारी हूँ जो आज मेरे सुख / दुःख में मेरे साथी हैं |   26/5/12

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