अभी समय है , हिंदुस्तान - पाकिस्तान एक करो , चाहें जरदारी को भारत का राष्ट्रपति बना दो | दोनों देशो की समस्याएँ , परेशानियाँ एक हैं अंदरूनी भी , बाहरी भी | कहने दीजिये किसी को , जब बिल्कुल ठीक से बँटवारा नहीं हुआ , हो ही नहीं सकता था , कि सारे हिन्दू हिंदुस्तान में - सारे मुस्लिम पाकिस्तान में , तो फिर यह माना जाना चाहिए कि दोनों का रहन सहन , संस्कृति एक ही है | और जो नहीं है तो भी वे अपनी अपनी मान्यताओं के साथ एक साथ सदियों से रहते आये हैं | इन्हें एक साथ रहने का पूरा अनुभव - अभ्यास है | यह काम जितना जल्दी हो जाय उतना अच्छा | भारतीय मानस इस बँटवारे को स्वीकार नहीं कर पाया है , न कभी इसे पचा पायेगा | यदि ऐसा न हुआ तो पाकिस्तान में हिन्दुओं की दशा अच्छी नहीं होगी , है भी नहीं | उसी प्रकार भारत में मुसलमान भी ढंग से नहीं रहने पायेंगे , चाहें सच्चर कमेटी लागू कर लीजिये चाहें आठ प्रतिशत आरक्षण | कैसे भूल जायेगा हिंदुस्तान जिन्ना की बात कि हम अलग हैं और एक साथ नहीं रह सकते , और इसे पाकिस्तान ने अपने यहाँ हिन्दुओं के साथ वही व्यवहार करके दिखा भी दिया ? यदि जिन्ना की बात गलत करनी है ,अल्लामा इकबाल का कौमी तराना यदि सही ठहराना हो , तो फिर एक होकर दिखाओ | अब इससे कोई लाभ नहीं कि बँटवारे में जिन्ना - -इकबाल का दोष ज्यादा था या गाँधी - नेहरु का | एक होने पर सारा मलाल मिट जायेगा | यह तो तय है कि जनता का तो कोई दोष नहीं था ? उसने बहुत सह ली बँटवारे की त्रासदी | अब वह एक होना चाहती है | ऐसी राजनीतिक इच्छा [Political Will ] जिसके पास हो वह अब अगले चुनाव में उतरे | शेष तो लफ्फाजी बहुत हो चुकी |
उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
बुधवार, 20 जून 2012
मंगलवार, 19 जून 2012
लखनऊ के अन्य स्कूल
लखनऊ के कुछ अन्य स्कूल =
------------------------------- लम्बे समय तक जब तक चन्द्र दत्त तिवारी जी D -10 /5 , पेपर मिल कॉलोनी में थे , तब तक वह एक स्थायी विचार केंद्र के सामान रहा औपचारिक / अनौपचारिक रूप से | इसके अतिरिक्त उन दिनों जो केंद्र कार्य रहे थे मेरी स्मृति के अनुसार एक तो था माह के दो शनिवार चलने वाला नवचेतना केंद्र , अशोक मार्ग पर गोष्ठी जिसमे तमाम रिटायर्ड आई ए एस , आई पी एस , न्यायाधीश हैं , और जो अब भी नियमित चल रही है , जैसा कि अख़बार से पता चलता है , क्योंकि उसे हम लोगों ने पहले ही त्याग दिया था , जब डॉ एम एम एस सिद्धू से शिकायत करने के बाद भी बात नहीं बनी | एक हर्ष नरायन जी का था नरही में उनके अपने घर पर , जिसका नाम लखनऊ अकादमी जैसा कुछ था | विश्वविद्यालय में कुछ थे / रहे होंगें क्योंकि वहाँ विचार केंद्र बनते बिगड़ते रहते है अकादमिक सेसन के साथ जैसे कभी ' सोच - विचार ' भी कोई था | अम्बरीश का थिंकर्स फोरम था और ज्यादा याद नहीं | हाँ जब तक राजा साहेब कोटवारा [फिल्म निर्माता मुज़फ्फर अली के पिता] जिंदा थे उनकी ह्युमनिस्ट यूनियन में भी यदा - कदा गोष्ठी हुआ करती थी | और तो अन्य औपचारिक सभा- सेमिनार प्रेस क्लब , इप्टा ऑफिस , जय शंकर सभागार आदि स्थानों पर हुआ ही करते थे | पार्टियों और संस्थाओं की भी अपनी सभाएँ थीं | एक महान पाठक और पत्र लेखक स्व के.के .जोशी के घर भी हम लोग वक़्त ज़रुरत बैठक कर लिया करते थे | बाद में अनुराग बाल केंद्र , निराला नगर में चला | उधर लखनऊ मोंटेसरी में शिव वर्मा जी भी सक्रिय थे | फिर जितना मैं जानता हूँ, या मुझे याद आता है , या जिनमे मैं शरीक होता था उन्ही को तो बता पाऊँगा | अन्य तमाम चलते रहे होंगे , जो उन्हें जानते हों वे जानें | #
Lucknow School of Young Thoughts
साइंटिफिक टेम्पर से साइंटिफिक टेम्पर तक : Story of Lucknow School of Young Thoughts =============================
हुआ यूँ की जिस विभाग में मैं नौकरी करता था ,फील्ड कर्मी होने के नाते मुझे अपने अधिकारी के निवास पर जब -तब जाना पड़ता था , और वह महानगर में रहते थे | एक दिन वहां से लौटकर बहुत थका हुआ मैं पास के फातिमा अस्पताल के सामने ढाबे पर चाय पी रहा था | बगल में ही तख्ते पर कुछ और लोग बैठे थे | मैंने सुना एक व्यक्ति अपने साथी से कह रहे थे कि हिंदुस्तान में साइंटिफिक टेम्पर संभव ही नहीं है | मैं चौंक गया ,आलस्य फटाफट दूर हो गया , क्योंकि यह मेरा प्रिय चिंतन और कर्म का विषय था | मैंने उनकी ओर परिचय का हाथ बढ़ाया और चर्चा में शामिल हुआ | वे थे श्री कृष्ण मुरारी यादव , यादव भवन के सबसे अग्रज और उनके मित्र श्री राय साहेब , कवि | इसी बीच संयोग से पता नहीं कहाँ से रिक्शे से प्रमोद कुमार श्रीवास्तव उधर से गुज़र रहे थे | मैंने उन्हें फ़ौरन रोका और खुशखबरी बताई | शुभ मिलन प्रारंभ हुआ | हम यादव भवन गए |
यादव जी ने बंगाल के शानिवारेर गोष्ठी की परंपरा का इतिहास बताया और यह भी कि Lucknow School of Young Thoughts उसी तरह से चलाने की उनकी मंशा थी | दोनों इतिहास के आदमी थे , सहमत हो गए = प्रत्येक शनिवार सायं ५ बजे स्थान यादव भवन , महानगर में मिल बैठने का सिलसिला शुरू हो गया | सदस्य बहुत नहीं थे पर बढ़ते गए | कोई बंधन न था पर इसका होना निश्चित होता था | उसके कुछ चेहरे थे हरजिंदर , मुकेश त्यागी , पुनीत टंडन ,विपिन त्रिपाठी , आलोक, मैं और प्रमोद जी | हम पर तो उन दिनों इसका नशा सवार था | कभी कभी आने वालों में थे अवधेश खरे , भुवनेश मिश्र, राजीव हेमकेशव | अब इसके आगे हरजिंदर भले से बता सकते हैं क्योंकि वे अत्यंत नियमित थे और विषयों के समझदार भी | लेकिन शुरू में बिना विषय के अनौपचारिक चर्चा ही होती थी पर होती गंभीर और दिमाग की भुजिया बनाने वाली थी | ज्यादातर तो सूत्रधार होते यादव जी और प्रमोद जी पर बहस में सभी खुल कर भाग लेते थे, इसलिए हमें बहुत उपयोगी और रोचक लगती थी |
तभी एक दुर्घटना हो गयी | मेरी एक वन लाइनर पर क्रुद्ध होकर भुवनेश जी ने कह दिया कि मैं इनके हाथ का छुआ पानी भी नहीं पियूँगा | सभा सन्न हो गयी , यह बात लोकतान्त्रिक मूल्य के विपरीत थी | मैं तो खून के आँसू पी गया { अछूतों की दशा का मन में अनुमान -अनुभव करते }, लेकिन युवा -उत्साही प्रमोद जी को चैन कहाँ ? तब उन्होंने तय किया विषय को लेकर चर्चा करने की और लिखित परचा पढ़ने की , जिससे विषयांतर न होने पाए | नारी मुक्ति , धर्म निरपेक्षता -- आगे याद नहीं | इस पर प्रमोद जी प्रकाश डालें तो ही ठीक होगा | बहुत दिनों तक ऐसा चलता रहा , पर किसी दिन यादव भवन के पड़ोसी घोसियों से रंजिश में स्कूल में व्यवधान पड़ गया [ इसके समर्थ गवाह अवधेश जी हैं , मैं उस दिन गाँव गया था ] |
लेकिन मैं मेंढक तोलने से कहाँ बाज़ आता ? यादव जी से मुलाकातें तो होती ही थीं , तो उनकी दुकान विनायक गैस सर्विस पर ही लोग मिलने लगे , यद्यपि वह ऊर्जा अब न थी | वहीँ पर प्रगतिशील लेखक संघ के भी लोग आये | किसी से भी मिलना , वार्ता करनी होती तो उसके लिए हमारे पास यही जगह थी , जिसे बौद्धिक कह सकते थे | यहीं पर हैदराबाद एकता के सेकुलर सामाजिक - राजनीतिक कार्यकर्त्ता कुद्दूस भाई भी आये | उनसे सबकी लम्बी चर्चा हुयी | प्रमोद जी वह सब अच्छी तरह समझते थे | मुझे राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में कोई रूचि न थी, मैं उसका आध्यात्मिक पक्षपाती था | सो मैंने नादानी में पूछ लिया -- " लेकिन कुद्दूस भाई , साइंटिफिक टेम्पर का क्या होगा ?" और उन्होंने मुझे सेट बैक दिया - " इसका अभी समय नहीं आया है " | अतः वह केंद्र भी बंद हो गया | तदन्तर मैंने तिवारी [सी डी] से उनके निवास पर परमिशन चाहा |
उन्होंने पहले तो 'हाँ' कह दिया पर दुसरे दिन शर्त लगा दी की किसी उद्देश्य के तहत बैठो तो बैठो , नहीं तो नहीं | तब सेकुलर सेंटर की भूमिका बनी और वह बना भी , जिसमे मुख्य भूमिका निभाई के .के .जोशी ,रूपरेखा वर्मा , प्रमोद कुमार ,आलोक जोशी और कहना चाहिए जय प्रकाश ने जिन्होंने बड़ी मेहनत की | प्रभात जी भी शायद तब तक मैदान में आ गए थे | थोड़ा अपने योगदान से भी इन्कार नहीं करूँगा , क्योंकि मैं संयोजक चन्द्र दत्त तिवारी जी का एकमात्र सचिव था | उसे विस्तार से आलोक ही बता सकते हैं क्योंकि वह उस समय सबसे युवा -सक्रिय सदस्य थे , और वह और प्रमोद जी राष्ट्रीय सम्मलेन के अवसर पर रात रात भर बिहार से आये और आयीं प्रतिभागियों से बहस रत रहते थे, और अवसर मिलने पर मुंबई से आई पत्रकार ज्योति पुनवानी के साथ | उसकी अलग कहानी है जो आडवानी की रथ यात्रा के साथ अंत को प्राप्त हुई | आगे चलकर प्रमोद जी यादव जी के साथ 'लखनऊ एकता रपट ' निकालने लगे और हम रूपरेखा जी के साथ ' नागरिक -धर्म समाज ' में सक्रिय हुए | लेकिन मेरी फितरत समाज कार्य में कम विचार कार्य में ज्यादा थी , जिसके लिए हमारे पास जगह न थी | सो , मैंने फिर बाँध छेंक कर रूपरेखा जी और राकेश [ इप्टा] को यादव जी के निवास पर ले जा कर गोष्ठी प्रारंभ करनी चाही | चौथे सहभागी के रूप में उपस्थित हुए प्रमोद जी | विषय साइंटिफिक टेम्पर ही था | अन्धविश्वास पर चर्चा छिड़ी तो पता नहीं क्यों बात बिगड़ गयी | यादव पक्ष यह सिद्ध करना चाह रहा था कि पोलियोड्रॉप भी तो अन्धविश्वास है , या ऐसा ही कुछ | फिर तो वहाँ दूसरी बैठक होने की नौबत नहीं आई , मैं खिसिया कर रह गया जो कि चाहता था कि एक जगह मिलने -बैठने की गुंजाइश बने | फिर तो मैं , निराश hibernation period में आ गया | कभी- कभी यादव जी के घर चला जाता था , जो तमाम शायरों को कलमकारान - ए - लखनऊ के नाम से हर माह के ग्यारह तारीख को नशिष्त- दरबार चलाते थे , जो उनकी मृत्यु तक चला | 'नागरिक -धर्म समाज' [जिसमे मेरी जान थी] का कायाकल्प " साझी दुनिया " में हो गया , जिसे वीसी पद से रिटायर होकर रूपरेखा जी यशपाल जी के घर पर अवस्थित कार्यालय से अविराम चला रही हैं | वहाँ चल रही हर वृहस्पतिवार सायं चार बजे की बैठकों में कभी जाना हो ही जाता है | पर अब कहीं कुछ नहीं बोलता, अनबोलता मशीन हो गया हूँ मैं | मैं समझ गया हूँ कि मैं अप्रासंगिक हो चूका हूँ , शायद सदा ही रहा था , और वही मेरी असफलता का कारण | अब मैं कुछ फुटकर- स्वतंत्र मित्रों और कविता - कहानी - पत्र लेखन -ब्लॉग लेखन और फेस बुक में अपना मनोवांछित लिख -पढ़ -कह कर मस्त रहता हूँ | यादव जी स्वर्ग सिधार गए [ वह उसे मानते न थे] , प्रमोद जी विश्वविद्यालय में हेड हैं ,किताबें लिखने और अपने अकैदमिक्स में मशगूल हैं , आलोक मुंबई गए , हरजिंदर दिल्ली | पुनीत की दर्दनाक मौत हो गयी सपत्नीक | एक दिल के टुकड़े हज़ार हुए , कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा |
तो यह थी किस्सा - कोताह Lucknow School of Young Thoughts की कहानी, Scientific Temper से शुरू , Scientific Temper पर समाप्त | लेकिन हाँ , यंग का अर्थ विचारकों की जवानी से नहीं विचारों के जवानी से था | यह उसकी विशिष्टता भी थी और , मेरे ख्याल से यही उसकी कमजोरी भी साबित हुयी | यादव जी तो नवीनता की रेंड ही मार देते थे और कुछ अपने ख़ास बने - बनाये विचार इस तरह आगंतुक पर लाद देते थे , कि वह फिर दोबारा आने का नाम न लेता | और हम भी कुछ नया कहने के उत्साह में कुछ ऐसा कह जाते जो लगभग निरर्थक और अग्राह्य होता | तिस पर भी दुःख इस बात का नहीं है कि स्कूल बंद हो गया , शोक यह है कि सचमुच नया, प्रिजुडिस विहीन , निर्वैयक्तिक , स्वार्थ रहित मानुषिक विचार प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई जैसा कि स्कूल का स्वप्न था [ ऐसा मुझे लगता है ] |
यह सारी कथा अस्सी और कुछ नब्बे की दशक को छूते हुए है | इतनी पुरानी यादें लिखने में कोई त्रुटि हो गयी हो , कुछ छूट गया हो और मेरा लेखन व्यक्तिगत होना तो निश्चित है , उसके लिए यह अकिंचन हमेशा क्षमा प्रार्थी रहेगा | #
सोमवार, 18 जून 2012
दिलफेंक
[ कवितायेँ ]
१- कबीर चदरिया
मैं महसूस करता हूँ
एक चादर अपने ऊपर ,
अपने शरीर के ऊपर |
नीचे नहीं किनारे नहीं ,
न सिर के पीछे
न पाँव के नीचे
बस केवल ऊपर
छाया हुआ , लहराता
मेरे ऊपर आक्षादित |
मैं हर तरफ से मुक्त हूँ
बस एक आभास भर है -
मेरे ऊपर एक चादर है |
वह चादर मेरी नहीं है
जो मुझे सृष्टि से मिली होगी
वह चादर कबीर की है ,
मैं चादर को नहीं जानता
लेकिन कबीर को पहचानता हूँ
मेरे ऊपर कबीर की चदरिया है ||
-------
२ - अपना राजा
मैं अपना राजा
उसे बनाना चाहता हूँ
जो मुझसे दूर हो
मेरे घर - परिवार
सम्बन्ध का न हो
जिससे वह पक्षपात न कर पाए
तभी वह शासन कर पायेगा /
तभी मैं उससे शासित हो पाऊँगा |
मैं दलित को राजा बनाना -
मानना चाहता हूँ
क्योंकि मैं दलित नहीं हूँ
मेरा कोई संबंधी दलितों में नहीं है |
--------------
३ - क्षणिका
आदमी
अपने से
पार पाए ,
तब न कुछ
कर पाए ?
------------
४ - बिस्तर
मुझे ख़ुशी है कि मैंने
अपना बिस्तर बाँध लिया है
समान सब पैक कर लिया है ,
कुछ भी इधर - उधर
बिखरा नहीं रह गया है
कमरा भी साफ़ कर दिया है
और सामानों को इकठ्ठा
एक जगह रखकर , तैयार होकर
किनारे कुर्सी पर बैठ गया हूँ
बस ऑटो वाले के आने भर की देर है |
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५ - आटा गीला
गरीब हो , मतलब गरीबी है तो
आटा थोड़ा ही गून्थो
ज्यादा तो कनस्तर में ही
पड़ा रहने दो ,
क्योंकि आटा गीला तो
होना ही है , गरीबी में !
यदि अलग कुछ आटा न हुआ
तो उसे कैसे सुखाओगे , माडोगे
कैसे रोटी बनाओगे ?
---------
६ - सत्यवान
तुम मुझे क्यों
खींचे लिए जा रहे हो ?
मैं कोई सत्यवान नहीं जो
कोई सावित्री मुझे तुमसे
छुड़ा ले जायेगी ,
वस्तुतः मैं तुम्हारे साथ
जाऊँगा ही नहीं
मेरे पास इतना काम है कि
मुझे मरने की फुर्सत नहीं |
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७ - दिलफेंक
यदि तुम दिल -
- फेंकना ही चाहते हो
तो फेंक दो
वह किसी भी चेहरे पर जाकर
फिट हो जायगा
यदि तुम दिलफेंक हो तो !
जैसे एन जी ओज़ के बारे में
प्रचलित है कि
किसी तरफ कंकड़ फेंको
वह किसी एनजीओ पर गिरेगा |
अब यह बात और है कि
न एनजीओ विश्वसनीय हैं
न दिल |
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रविवार, 17 जून 2012
बोलो बोलो , जल्दी बोलो
[ कविता ]
बोलो बोलो , क्या बोलते हो
जल्दी बोलो
प्रेस पर कोई प्रतिबंध नहीं है
कोई इमरजेंसी नहीं लगी है
जितना चाहो उतना बोलो
खूब अख़बार हैं और टी वी चैनल
तुम्हारी बातें दूर दूर तक
पहुँचाने के लिए
फिर क्यों नहीं बोलते ?
बोलो कि तुम्हारी बहन बेटी को
गुंडे उठा ले गए और
क्या क्या करके उसकी लाश
सड़क किनारे छोड़ गए हैं ,
बोलो कि अपने लड़के की
पढ़ाई के लिए डोनेशन -केप्शन
तुम नहीं दे सके ,
चीखो कि तुम्हारे माता -पिता
मँहगे इलाज के अभाव में मर गए ,
चिल्लाओ कि मँहगाई की मार से
घर गिरवी पड़ा है |
और यदि यह हाल तुम्हारा नहीं है
तो अपनी ही हाँको - बघारो
कि तुम बड़े सुख - चैन , अमन से हो |
गुरुवार, 14 जून 2012
मेरी नज़र में वह घर है
एक ज़माने से मुझे दो अशआर बहुत पसंद हैं | वस्तुतः ,ये मेरे जीवन मन्त्र बन गए | इन्हें मैं " प्रिय संपादक " में बाटम लाइन लगाता था | इनमे से एक तो अहसान दानिश का है , दूसरे का पता नहीं | कोई मित्र जानते हों तो कृपया बताएँ |
१ - ज़माना बदले न बदले , खयाल तो बदले ,
न इन्कलाब सही , ज़िक्रे -इन्कलाब तो हो |
२ - मेरी नज़र में वह घर है जहाँ चिराग़ नहीं ,
न होगी जश्ने - बहाराँ की इबादत मुझसे |
बुधवार, 13 जून 2012
dushman
बुलाया था , भला कैसे न जाते ,
मुझे मालूम था दुश्मन हैं मेरे |
or -
बुला लेते हैं तो कैसे न जाऊँ ,
जानता हूँ मेरे दुश्मन हैं वह |
मंगलवार, 12 जून 2012
खुशवंत सिंह
कोई मानता नहीं , वरना मैंने तो सुझाया था कि भारतीय संस्कृति के अनुसार बूर्हों का आदर करते हुए एक दर्ज़न अति बूढ़े भारतीय नागरिकों को चुन कर राष्ट्रपति भवन में ठहरा लिया जाय | वे किसी भी धर्म -जाति -लिंग -संप्रदाय -पार्टी -प्रदेश के हों | आयु क्रम से ज्येष्ठता के अनुसार , या एक के दिवंगत होने के बाद दूसरे को , राष्ट्रपति बनाते रहा जाय | उनकी सेवा सुश्रुषा , खान पान-इलाज सुनिश्चित हो जायगी और वे कई देशों की सभी धर्मों के पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा का पुण्य- लाभ उठा कर सरकारी खर्च पर स्वर्ग जाना भी सुनिश्चित कर सकेंगें | मेरी अतिरिक्त लालच यह भी थी कि इससे मेरा प्रिय पत्रकार लेखक , राजनीति से वाकिफ अराजनीतिक शतकोन्मुख आयु का व्यक्ति खुशवंत सिंह भी लाइन में आ सकता है, जिसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है | सब राजनीति- राजनीति चिल्लाये जे रहे हैं और हमारी पत्रकारिता के क्षेत्र को इसका देय सम्मान नहीं मिल रहा है | और एक बात मैं स्पष्ट बता दूँ कि खुशवंत जैसा पत्रकार अब भारत में कोई पैदा नहीं होगा | जैसा गाँधी के लिए आइन्स्टीन [?] ने कहा था कि लोग आश्चर्य करेगे कि कोई ऐसा भी व्यक्ति दुनिया में पैदा हुआ था , उसी प्रकार की राय मेरी खुशवंत सिंह के लिए है |
* माननीयों की सुरक्षा
* माननीयों द्वारा क्यों अधिकाधिक सुरक्षा की माँग की जा रही है ? क्यों उनके बोडीगार्डों के लिए कार्बाइन उन्हें क्यों अपर्याप्त लग रहा है ? क्योंकि वे जान गए हैं कि उनके बुरे दिन आने वाले हैं
आ ही गए हैं
विधायक सांसद मारे ही जा रहे हैं
और हम लोग जो मारपीट में विश्वास नहीं करते उन्हें ' कौड़ी के तीन ' बनाने पर तो तुले ही हुए हैं !
रविवार, 10 जून 2012
घूस का पैसा
Gon-zo -
१- -[बदमाश चिंतन ] घूस का पैसा यदि अकेले रख लिया जाय तो वह व्यक्तिवाद है | यदि उसे मिल - बाँट कर खाया जाय तो उसे समाजवाद कहते हैं |
२ - लड़के ने लड़की से कहा आखिर किसी के प्रति तो आकर्षित होगी ही , तो मुझमे ही क्या बुराई है ?
३ - [कथा स्वरुप ] इधर साल भर से मेरा कोलकाता से दिल्ली राजधानी एक्स. से कई बार जाना हुआ | उसके कुछ सेवा कर्मी मेरी पहचान में हो गए हैं | इस बार मई में देखा तो कई कर्मचारी नदारद थे | पूछने पर पता चला कि तमाम रसोइये और वेटर उ.प्र. के जेलों में बुला लिए गए हैं, कैदियों को उच्च श्रेणी की सेवा प्रदान करने के लिए |
४ - गजगामिनी /ज्ञानगामिनी - माधुरी दीक्षित पर बनाये गए चित्रों को हुसैन ने गजगामिनी नाम दिया था| वह बड़े कलाकार थे , वह उनके और माधुरी के बीच का मामला था | लेकिन हम देख सकते हैं कि आज की प्रबुद्ध महिलाएं जब चलती / बोलती हैं,तो ज्ञान छलक -छलक कर बाहर गिरता रहता है |
५ - कुछ तो विशेषाधिकार [priviledge] अवश्य मिलता दिख रहा है | दलित और महिला रचनाकारों की किताबें प्रकाशक टप से उठा लेते हैं छापने के लिए | हम लोग रिरियाते रहते हैं पर हमें वे घास नहीं डालते |
६ - विद्वान कुछ भी कहें पर शिक्षा तो मुझे मूलतः conditioning की ही प्रणाली दिखती है | जैसे मान लीजिये हमें बच्चों को दिशा की शिक्षा देनी है तो हम उन्हें उत्तर की और मुंह करका खड़ा कर देंगें और निश्चयपूर्वक बतायेंगे कि बच्चो ! तुम्हारे सामने की दिशा उत्तर कहलाती है , तुम्हारे दायें हाथ की और पूरब , बाएं हाथ की ओर पश्चिम और पीछे की दिशा दक्षिण है | अब इसमें तर्क और reasoning और प्रश्न की क्या गुंजाईश है ?
Emergency-like
I have
no praise for Indira Gandhi , but I would like to support an emergency-like governance in India.
अन्ना राष्ट्रद्रोही
अन्ना को लिखे गए एक पत्र में सरकार की ओर से नारायन सामी ने लिखा है कि अन्ना राष्ट्रद्रोही तत्वों से घिरे हुए हैं- - " | मैं इतनी कठिन भाषा नहीं लिख पाता | मैं आसान हिंदी में कहता हूँ कि ये सब देश के दुश्मन हैं | अन्ना यदि नहीं हैं तो वह उस घेरे से निकल कर दिखाएँ , वर्ना वह भी यही उपाधि पायें |
मेयर पद हेतु
लखनऊ ,१०/६/१२ | मेयर पद हेतु एकमात्र महिला प्रत्याशी ने शनिदेव को माथा झुका कर चुनाव प्रचार आरम्भ किया | तो , अब तो मैं उन्हें वोट का कोई टुकड़ा भी नहीं दूंगा | वे शनिदेव से ही वोट लें | जब कि मेरी नीति यह है कि मैं केवल महिला या दलित को ही वोट देता हूँ | और मेरा दुर्भाग्य , सूची में कोई दलित भी नहीं दिख रहा है | अब मैं क्या करूँ?
लेखक के निजी विचार
[व्यंग्य ]
व्यक्ति को सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए , नेताओं को जनसेवी -ईमानदार होना चाहिए , शासन को जनता के जान -माल, दलितों के सम्मान ,औरतों की इज्ज़त की रक्षा करनी चाहिए , न्याय पालिका को त्वरित इंसाफ करना चाहिए, पत्रकारिता को सजग प्रहरी बनना चाहिए - - | लेखक - उग्रनाथ |
[ यह लेखक के निजी विचार हैं , संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है - संपादक ]
क्रोध का अनावरण
मैं बहुत दिनों से यह महसूस कर रहा हूँ
कि जैसा मेरा नामशः स्वभाव है ,मुझे अपने क्रोध का अनावरण करना चाहिए , सभ्यता - शिष्टाचार कि आँड़ में उसे रोकना ठीक न होगा | क्योंकि बहुत सी गलत बातें हो रही हैं और मैं उन्हें
जाने देता हूँ | ये विसंगतियां समाज में भी
हैं , राज्य सम्बन्धी विमर्श में और मनुष्य
के मन में भी | इस हेतु मुझे असभ्य समाज
, दुर्वासा दल ,क्रोधी संत मिशन, अप्रिय वार्ता, अपशब्द ,आग बबूला जैसा
कुछ होना पड़ सकता है , पर पहले प्रिय सम्पादक से
तो छुट्टी मिले [बड़े प्रिय बनने चले थे] !लेकिन दिक्कत यह है कि मैं अपने दिल से भी
तो मजबूर हूँ जो सौम्य,प्रेमी ,स्नेही
और शांत है| वैसे बहुत हो चुकीं चिकनी
चुपड़ी बातें ,सभ्य -शालीन भाषा में ! तंग
तो हूँ , तनाव उसमे भी है ,तनाव इसमें भी है | तो क्या ओशो की लाइन पड़ेगी , एकांत में गालियाँ बकना ? शुरू तो कर ही दिया है किसी से न मिलने - जुलने का कार्यक्रम
!
नास्तिक मुनि
विनम्रता पूर्वक मैं एक बात तय जानता हूँ [ चाहे इसका कोई बुरा माने या भला , या कोई आरोप लगाये कि मैं तो भविष्यवाणी जैसा बोल रहा हूँ, या फ़तवा दे रहा हूँ ] कि यदि भारत में हिंदुत्व को दलितों को नहीं सौंपा गया तो भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना कभी भी नहीं हो पायेगी | और यह भी समझ लें कि दलित जो भी नीति अपनाएगा वह हिंदुत्व ही होगा , भले किसी की समझ में आने में अभी मुश्किल लगे | बस जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही राष्ट्रहित में अच्छा होगा | चाहे जितनी उछल कूद में समय नष्ट कर लें , सवर्णों के वश का काम नहीं है हिंदुस्तान में हिन्दू राज्य लाना | {नास्तिक मुनि}
शनिवार, 9 जून 2012
Gon-zo Journalism
Gon-zo Journalism . [style created by Hunter S. Thomson and the name so , given by Bill Cordoso], which I am fond of , and it suits me very much .
1 - (Quote) : - It {cricket} requiresone to assume such indecent postures .- [Oscar Wilde]
2 - "Power attracts the corruptible . Suspect all who seek it " -Frank Herbert.
Personally I have been of the view that who fight elections for power are essentially mean and lowly persons . I call upon the citizenry not to give respect to them , rather always suspect them as Frank Herbert too suggests.
3 - On Ambedkar cartoon controversy, I would suggest reading an article -- " A different Reading" by -S. Anand [The Indian Express- 24/5/12 OP-ED Page-11]. I could read it after returning from a long stay out of Lucknow. It confirms my view on the issue.
4 - A Blackberry addict Rahul Gandhi is a nonsense and a nuissance in the politics of our taste .
शुक्रवार, 8 जून 2012
डिब्बा लैपटॉप
* डिब्बा बनकर न रह जाये लैपटॉप ' - विरोधी विधायकों का संदेह |
-- मेरा तो कहना है यदि लैपटॉप छात्रों की माओं द्वारा रोटी बेलने के काम न आये तो कहियेगा !
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अफसरों की अशिष्टता ;- विधायकों की बड़ी शिकायत है की अधिकारी उनका महान आदर नहीं करते | विधायक उनके पास जाते ही क्यों हैं , क्या काम कराने ? इस काम के लिए एक पृथक स्पेसल अधिकारी नियत होना चाहिए , केवल उसी के पास वे अपने काम सौंप दें , वह उन्हें सम्बंधित विभाग को भेज देगा | इतने बड़े माननीय होकर क्या छोटे छोटे अफसरों के पास जाते हैं ? काम नहीं अपना धौंस ज़माने , हनक दिखाने और उनके काम में बाधा डालने जाते हैं | आखिर अफसर इतने सारे माननीयों से आदर पूर्वक मिलने में समय गवांये या अपना कुछ काम भी करे ? आरोप है की पी जी आई के डॉक्टर उनके रिक्मेंडेसन पर ध्यान नहीं देते | तो क्या मरीजों का इलाज़ भी अब विधायकों के कहने पर होगा ? क्या हिंदुस्तान विधायकों का गुलाम बनने जा रहा है ,जिनके आदेश के बगैर पत्ता भी नहीं हिलेगा ? विधायकों द्वारा सरकारी कामों में हस्तक्षेप और विघ्न को रोकना होगा , अन्यथा ये भस्मासुर हो जायेंगे |
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* रामदेव [अब ये राजनीति में आ गए हैं ,इनके नाम के साथ श्री या बाबा लगाना पत्रकारिता के अनुसार अनावश्यक है ] को यह कैसे पता चला , वह कैसे जानते हैं कि ४०० लाख करोड़ काला धन विदेशों में जमा है ?कहीं श्रीमान जी भी तो उसी व्यापार में लिप्त नहीं और प्रतियोगिता में असफल होने का खुन्नस निकाल रहे हैं ?इनके पास तो केवल १५०० करोड़ ही गेरुआ धन है | अब सच यह है कि न उनका धन जनता के हित के हेतु है , न इनका धन जनता के लिए उपयोगी है |
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* नरेंद्र मोदी को बी जे पी चाहे अपना नेता नम्बर एक बना ले या अपने सर पर चढ़ा ले ,जनता नरेंद्र मोदी को अपना भारत भाग्य विधाता कभी नहीं बनाएगी | एक दिन जल्दी ही मोदी किनारे लगा दिए जायेंगे और उनके साथ बी जे पी भी चली जाएगी | भारतीय मनीषा की कुछ गुप्त नीतियाँ होती हैं, और वह अंदर अंदर उस के अनुसार काम करती है , और वह किसी पार्टी या व्यक्ति की गुलाम नहीं होती |
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* ज्ञान पीठ में गौरव सोलंकी :-- पहले तो ये लोग इसीलिये छपते और प्रशंसा पाते हैं क्योंकि ये IIT,iim , ETC ग्रेजुएट हैं | फिर जब कभी इनकी पुस्तक नहीं छपती तो अपने graduation का धौंस दिखाते हैं | अब IAS वगैरह आने भी लगे हैं बहुत साहित्य के क्षेत्र में ! अरे तुम जहाँ के होगे वहां के होगे तीस मार खान , यहाँ तो तुम्हे हिंदी के बड़े बूढ़ों की ही बात माननी पड़ेगी | नहीं तो सीधे चले जाओ बड़े बड़े प्रकाशकों के पास , तुम्हारा नाम तो यूँ ही चमक जायेगा |
मसलन खजूर
[कविता ]
मैं खुद एक दूरी
बना लेता हूँ
ऊंचे पेंड़ों से
मसलन खजूर से
युक्लिप्टस - बरगद से ,
जिससे मैं उनका
शीर्ष देख सकूँ,
और नाप सकूँ उनकी ऊँचाई
दूरी के हिसाब से
गणित लगाकर |
दूरी शून्य होगी तो
पेंड़ मुझे अपनी ज़द में ले लेगा
मैं संज्ञाशून्य हो जाऊंगा -
नहीं जान पाउँगा
पेंड़ कितना ऊँचा है
या कितना ठिगना ,
पेंड़ जितना ऊँचा
उतना ही उससे दूर
जाना पड़ता है मुझे |
बुधवार, 6 जून 2012
आदमी ही है
* न अन्ना टीम
न भोगा , न योगा
न रामदेव |
* युवा , युवा हों
तब न दें उनके
हाथ शासन !
* आदमी ही है
जो कि आदमी भी है
हैवान भी है |
* औरतें जानें
औरतों की समस्या
हम क्या जानें ?
*सारे पुरुष
एक से नहीं होते
न सब नारी |
* कुछ भी शुभ
हो ही नहीं रहा है
मैं कैसे बोलूँ ?
* हो चाहे न हो
पर बातें तो हैं ही
बराबरी की !
* सुंदर हो तो
सुंदर कह दिया
नयी क्या बात ?
* कितने आये
सबको देख लिया
कितने गए |
* कोई समस्या
हिंदुस्तान के लिए
समस्या नहीं |
* कुछ न हुआ
कुछ नहीं हुआ है
उन्ही से पूछो |
* इतना झूठ
कैसे बोल लेते हो
धारा प्रवाह ?
* बच्चे आवारा
क्या करें माता पिता
मानते नहीं !
* समाज विच
बहुत गंदगी है
हम गंदे हैं |
* परेशानी है
छोटे लोग होते हैं
छोटी सोच के |
* मुझे गाली दो
सहयोग भी चाहो
उल्टी बात है |
* दूर - दूर से
नजदीक से नहीं
प्रेम कीजिये |
* कभी ब्राह्मण
बन जाता हूँ मैं, तो
कभी चमार |
* मैं ऐसा न था
यह तो अब हुआ
परिवर्तन |
* खराब करें
क्यों अपना दिमाग
भलाई पर ?
न भोगा , न योगा
न रामदेव |
* युवा , युवा हों
तब न दें उनके
हाथ शासन !
* आदमी ही है
जो कि आदमी भी है
हैवान भी है |
* औरतें जानें
औरतों की समस्या
हम क्या जानें ?
*सारे पुरुष
एक से नहीं होते
न सब नारी |
* कुछ भी शुभ
हो ही नहीं रहा है
मैं कैसे बोलूँ ?
* हो चाहे न हो
पर बातें तो हैं ही
बराबरी की !
* सुंदर हो तो
सुंदर कह दिया
नयी क्या बात ?
* कितने आये
सबको देख लिया
कितने गए |
* कोई समस्या
हिंदुस्तान के लिए
समस्या नहीं |
* कुछ न हुआ
कुछ नहीं हुआ है
उन्ही से पूछो |
* इतना झूठ
कैसे बोल लेते हो
धारा प्रवाह ?
* बच्चे आवारा
क्या करें माता पिता
मानते नहीं !
* समाज विच
बहुत गंदगी है
हम गंदे हैं |
* परेशानी है
छोटे लोग होते हैं
छोटी सोच के |
* मुझे गाली दो
सहयोग भी चाहो
उल्टी बात है |
* दूर - दूर से
नजदीक से नहीं
प्रेम कीजिये |
* कभी ब्राह्मण
बन जाता हूँ मैं, तो
कभी चमार |
* मैं ऐसा न था
यह तो अब हुआ
परिवर्तन |
* खराब करें
क्यों अपना दिमाग
भलाई पर ?
बामन सेन्स
ब्राह्मणों में , यह देखा गया है कि, बामन सेन्स तो बहुत होता है , पर कॉमन सेन्स का नितांत अभाव होता है | [उवाच]
सामूहिक
[कविता] = सामूहिक
सामूहिक बलात्कार !
सामूहिक भ्रष्टाचार ,
सामूहिक स्वीकार ,
सामूहिक शवदाह [mass burial ]
क्या यही है नियति
मनुष्य की सामूहिकता की ?
सामूहिक आत्मदाह ,
सामूहिक आत्महत्या ,
सामूहिक सर्वनाश ?
सामूहिक बलात्कार !
सामूहिक भ्रष्टाचार ,
सामूहिक स्वीकार ,
सामूहिक शवदाह [mass burial ]
क्या यही है नियति
मनुष्य की सामूहिकता की ?
सामूहिक आत्मदाह ,
सामूहिक आत्महत्या ,
सामूहिक सर्वनाश ?
बुधवार, 30 मई 2012
शठे शाठ्यम समाचरेत
बड़ी खेमे बंदी है भाई विचार जगत में , और वही अब साहित्य जगत भी हो गया है | ज़रा सा भी अलग सोच लो या कोई शाब्दिक क्रीड़ा करना चाहो तो डर बना रहता है कि कहीं उस टोले का न मान लिया जाऊँ ! अरे भाई मैं प्रगतिशील हूँ तो अपने मन से और दकियानूस हूँ तो स्वेच्छा से | इस पर किसी की क्या दबंगई ? लेकिन नहीं दादागिरी की इमरजेंसी लागू है , जब कि यहाँ न मार्कंडेय काटजू हैं न मीनाक्षी नटराजन | यह तो वैसा ही हुआ जैसे दो माफियाओं का झगड़ा हो | सरकारी प्रतिबंधों का विरोध इसलिए होता है जिससे इनका आधिपत्य कायम रहे | मैं कल्पना कर सकता हूँ कि इसी कारण लेखक जन इस या उस कस्बे में बस जाते हैं और फिर वहीँ के होकर रह जाते हैं क्योंकि इस धड़ेबाजी की स्थिति में इसके अलावा और कोई चारा नहीं है | उनकी कोई गति ही नहीं यदि वे इनमे शामिल न हों | सबके पास इतना बूता नहीं होता कि अकेले अपनी लडाई लड़ सकें , या फिर मेरी तरह अन्धकार की गर्त में जाने के लिए कटिबद्ध हों | सबको अपना भविष्य बनाना होता हैं , कुछ का तो कैरियर भी होता है | पर मौलिक प्रश्न तो शेष है कि यह कौन सी समता स्वतंत्रता भाईचारा का नमूना हम स्थापित कर रहे हैं कि किसी से बिना उसका प्रोफाइल पक्का जाने हम हाथ मिलाने या पास बैठने में संकोच करें ? क्या यह उसी प्रकार का छुआछूत नहीं है जिसके खिलाफ गाँधी जैसे परंपरावादी हिन्दू ने भी आन्दोलन चलाया ? कोई महान तरक्की पसंद बुद्धिजीवी बताये कि इसमें और ब्राह्मणवाद में क्या तनिक भी अंतर है जिसको कोसते ये कभी नहीं थकते ? यदि इसे ये उचित मानते हैं तो हमें भी पुनर्विचार करना पड़ेगा कि अपने विस्तृत मानववादी सोच को समय रहते हम भी संकुचित कर लें और अपने सामाजिक व्यवहार को तदनुसार रेशनलाइज [तर्कसंगत ? नहीं समयसंगत ] बना लें | स्वीकार करता हूँ कि उसी को दुनिया ब्राह्मणवाद के नाम से जानती है, और फिर जानेगी - शठे शाठ्यम समाचरेत |
मंगलवार, 29 मई 2012
कमीना आदमी
मैं अपने आप पर , मुँह क्या खोलूँ ,
कमीना आदमी है , क्या बोलूँ ?
मैं अपने आप पर मुँह खोल दूं क्या ?
यह बड़ा कमीना है बोल दूँ क्या ?
or - मैं अपने आप पर मुँह क्या खोलूँ ?
इस कमीने को क्या मीना बोलूँ ?
or - मैं आदमी हूँ , कमीना हूँ ,
मैं आदमी हूँ , एक मीना हूँ |
न आदमी, न ईश्वर
* ईश्वर नहीं है , यह तो तय है और ठीक ही है | लेकिन अब मुझे कहना पड़ेगा कि आदमी भी नहीं है | क्या आदमी के अस्तित्व का कोई प्रमाण दिखता है ? क्या यह जो आदमी है , इसी को आदमी कहते हैं ? होने
न होने के बराबर - जब इसका कोई योगदान ही जग के उत्थान में नहीं है ? इस प्रकार , तब तो ईश्वर का होना भी हमें मान लेना चाहिए - उसी प्रकार निरर्थक , अपने नाम का भार ढोता हुआ | तब पूरा वचन होगा - कि इस दुनिया में न आदमी है
, न ईश्वर |
जिसे बरबाद होना है
[ शेर ? ]
सुनेगा बात वह मेरी , जिसे बरबाद होना है ;
और जो हो चुका बरबाद, सुनेगा बात वह मेरी |
शौचालय
जहाँ मैं बैठा था वहां से दस फिट की दूरी पर वह शौच करने बैठ गया नालायक | क्या करता हमारा शौचालय हमसे इतनी ही दूरी पर है ! [ ललित ]
सोमवार, 28 मई 2012
अभारतीय समाज
अभारतीय समाज [ कोई गर्व / गर्भ नहीं ] Non Indian Society [गैर-हिन्दुतानी ज़मात]
कुछ दिन पूर्व हम पति पत्नी के के अस्पताल लखनऊ एक सुदूर सम्बन्धी के नवजात पुत्र को देखने गए थे | वहां नर्सों ने हमें नेग के लिए परेशान कर डाला | और ५०-५० रुपयों में उनका काम कहाँ चलता है ? अब यहाँ कोलकाता हम अपने पुत्र को देखने आये हैं | वह ओप्रेसन से कार्पोरेट अस्पताल कोलंबिया एसिया में पैदा हुआ है | मैंने पूछा तो पता चला एक पैसा किसी को नहीं देना पड़ा , न देने की इजाज़त थी | अस्पताल वालों ने जो भी लिया , तो वह तो वहां भी खूब लेते हैं | यह फर्क है भारतीय और विदेशी तरीके में | पुत्री जन्म पर तो वे भी नहीं माँगते , यह एक और लैंगिक विभेद का कारण है | इसी प्रकार जो लोग गर्व से हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तानी कहते हैं वे देश का गर्भ - नाश करते हैं | अंग्रेज़ी और उस संस्कृति का विरोध करते हैं इसलिए उनके समय की पाबंदी कर्तव्य निष्ठां, अनुशासन प्रियता की भी नक़ल नहीं करते | इंडियन टाइम तो मशहूर है , और उस पर वे शर्म नहीं खाते | ऐसे थोड़े हिंदुस्तान गर्त में गया है और आज़ादी का कोई लाभ इसे नहीं मिला , हाँ दुरूपयोग अवश्य हुआ | तिस पर भी पता नहीं क्या है जिस पर ये गर्व करते हैं और हमारे जैसे गर्व रहित लोगों को देश द्रोही बताते हैं | इसलिए , भले हमारा काम कुछ अतिशयोक्ति हो जाता है पर हमें अभारतीय समाज बनना चाहिए - अपनी कमियों का सूक्ष्म विश्लेष्ण और त्याग करना चाहिए न की उस पर गर्व | और इसके लिए आलोचना सहने को तैयार रहना चाहिए |
दलितों के दोस्त
कविता :-
दलितों के दोस्त
दलित ही हैं
और कोई नहीं हो सकता ,
उन्हें किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए
सवर्णों की सहानुभूति
उन्हें दरकार नहीं
वे छलिये , शोषक , धोखेबाज हैं |
तो दलितों के हितैषी
दलित ही हो सकते हैं -
वह भी दलित पुरुष
स्त्रियाँ भी हों तो हों
पर दिखतीं नहीं
सारे दलित पुरुष
कवि-कथाकार -चिन्तक '
एक्टिविस्ट मैदान में हैं |
सवर्ण भी पीछे -पीछे पूँछ हिला रहे हैं
दलित आन्दोलन में घुसने के लिए
पर वहाँ उनकी कोई पूँछ नहीं है ,
हो ही नहीं सकती
दलितों के समर्थक , दलितों के दोस्त
सिर्फ दलित हो सकते हैं
दलितों के दुश्मन भी दलित ही होंगे |
Three only
[ हाइकु]
दर्द मुझे है
दुखी , दोस्त होते हैं
फेसबुक के |
* अभी नहाया
अभी फिर हो गया
बदन तवा |
* छोडो , जाने दो
दिन का सपना है
सच न होगा |
Six Haiku
[ हाइकु]
* बच्चे खेलते
बच्चे मेरा खिलौना
हम खेलते |
*मेरा ख्याल है
बंद होना चाहिए
यह नाटक |
* हम लोग तो
हारे हुए योद्धा हैं
जो भी सजा दो |
* ईश्वर है न
वर्ना कैसे रहतीं
जातियाँ - धर्म ?
* वर्जित फल
खाओगे तो क्या पुण्य
फल पाओगे ?
* स्वर्ग जाना है
वर्जित फल खाओ
मौज उड़ाओ |
उपन्यास अंश
[ उपन्यास अंश ]
- वह श्रेष्ठता- भाव से पीड़ित है |
- वह ब्राह्मण होगा !
- हो सकता है ,
नहीं भी हो सकता है |
कमरों में ए.सी.
[ शेर ? ]
लगा तो मैं भी लूँ अपने कमरों में ए.सी. ,
मगर मैं अपने घर से तब निकल न पाऊँगा |
इतनी सी बात पर
कविता :-
कोई बहुत बड़ी आफत हो
तो रोयें भी '
चीखें - चिल्लाएँ
अब भला
इतनी सी बात पर --- ?
रविवार, 27 मई 2012
ख्याली पुलाव
मुझे थोड़ी चिंता है कि कुछ लोग सिर्फ शूद्रों / सवर्णों की ही भाषा में बात करते हैं | ठीक है कि वह भी हकीकत है,पर जहाँ तक उसकी सीमा है उसी में उसको बंद रखिये | वे यह समझ ही नहीं पाते कि ब्राह्मण कुछ भी कहता रहे , शूद्र भी मनुष्य हैं, अपनी अच्छाइयों - बुराइयों के साथ [ और इस प्रकार वे ब्राह्मण की अवधारणा और उसके औचित्य को ही सिद्ध करते हैं ] | और सवर्ण भी अपनी अज्ञानता - सांस्कारिक गुलामी के अधीन एक मनुष्य ही है | व्यवहार में ब्राह्मण भी शूद्र है , और शूद्र भी उसकी स्थिति में होता तो ब्राह्मण ही होता! अब तो यह भी आश्चर्य करने की इच्छा नहीं होती कि द्वंद्वात्मक भौतिकवादी भी , जो कि मनुष्य के निर्माण का दोष या श्रेय सामाजिक स्थितियों -परिस्थितियों को देते हैं , वे भी ब्राह्मण / शूद्र की उत्पत्ति उनके जन्म से मानते हैं | ज़ाहिर है , तब हम मूर्खों की सोच में ही कही कोई कमी होगी | तिस पर भी --
- ख्याल आया कि क्यों न हम सवर्णों की एक संस्था " शूद्र " बनायें , और घोषित करें -हम जन्म से नहीं कर्म से शूद्र हैं | निजी रूप से मैं तो सचमुच नीच व्यवहार अपनाने के पक्ष में हूँ जिससे हम पवित्रात्माओं की गालियाँ पायें और हमारा किंचित भी अवशेष अहंकार तिल -तिल कर तिरोहित हो | विवशता है कि हम दलितों की कोई संस्था नहीं बना सकते , हम अविश्वसनीय हो चुके हैं | पर सोच तो सकते हैं कि यदि हम शूद्र होते तो अपने को इसी व्यवस्था में क्यों न जनतांत्रिक अधिकारपूर्वक ब्राह्मण घोषित कर देते ? हट ब्राह्मण ! सिंहासन खाली कर कि शूद्र जन आते हैं ?
-सब ख्याली पुलाव है,कुछ होने जाने वाला नहीं है | तो क्या यही जपें - होइहैं सोई जो राम रचि राखा ? [ निर्निमेष ]
फालतू उत्पात
* अगर आप अपमान , जलालत , अपशब्द , भेदभाव नहीं बर्दाश्त क्र सकते तो अपने लिए कोई और देश देख लीजिये |
* आखिर वह दिन आएगा जब घर का लोन चुक जायेगा , कार की किश्तें पूरी हो जायेंगी | तब खाली बच्चों की पढ़ाई का खर्च रह जायगा , तब कुछ भविष्य के लिए अवश्य बचा लेना | बुढ़ापे में हाथ खाली न रखना |
{ फालतू फण्ड (Surplus thoughts) or / उत्पात -- by -- उ.न.नागरिक }
* आखिर वह दिन आएगा जब घर का लोन चुक जायेगा , कार की किश्तें पूरी हो जायेंगी | तब खाली बच्चों की पढ़ाई का खर्च रह जायगा , तब कुछ भविष्य के लिए अवश्य बचा लेना | बुढ़ापे में हाथ खाली न रखना |
{ फालतू फण्ड (Surplus thoughts) or / उत्पात -- by -- उ.न.नागरिक }
Dinman Srivastava
अच्छा लगा चंचल जी ने दिनमान के अंदर की खबर दी
| मैं
तो बाहर का एक विनम्र पाठक था |
मुझे याद है १९६३ में जब डिप्लोमा पढ़ने लखनऊ आया तब दिनमान
५० पैसे की थी | हर हफ्ते लेता था | तब संपादक अग्गेय जी थे, शीघ्र ही रघबीर सहाय जी आ गए | पर उससे मुझे क्या मतलब था | मेरी आयु थी १७ वर्ष
| उसमे
मेरे स्वभाव के अनुकूल गंभीर जानकारी और सोचने की सामग्री मिल जाती थी | मुझे आता जाता कुछ न
था तब भी कला रंगमंच साहित्य आदि सब पर प्रयाग शुक्ल , नेत्र सिंह रावत , के एन कक्कड़ भी , के सारे आलेख निर्विकार
भाव से पढ़ जाता | बाद में कुछ प्राथमिकता
भी बनी | सबसे पहले तो मत -सम्मत फिर फ़ौरन सर्वेश्वर का चरचे और चरखे , और अंत में कोई विश्व
कविता | जाना
कि लिखना कहते किसे हैं | फिर हॉस्टल के पते से लिखने भी लगा , सोचने / लिखने के अभ्यास के रूप में | आज चंचल जी के मापदंड
पर कहूँ तो मैं "धन्य " था जो उसमे छपा और बराबर छपा |लिखने का अभ्यास यूँ
हुआ कि अब सिर्फ कलम हाथ से पकड़ता हूँ , लिखता कोई और है | मुझे उसे पलट कर पढ़ने
का समय नहीं होता | ज्यादा गलतियाँ भी नहीं होतीं , लिंग भेद न मानने के कारण कुछ लिंग -दोष अवश्य हो जाता है | अतः आज की खेमेबंदी के
बरक्स उन निष्पक्ष संपादकों को नमन करता हूँ |
२० साल की उम्र में नौकरी लग गयी तो १५ साल की उम्र में जो शादी हो गयी थी उसकी
ज़िम्मेदारियाँ लिए शहर शहर रहा |
अब मेरी नियमित पत्रिका की सूची में थे दिनमान के अतिरिक्त कादम्बिनी, धर्मयुग , साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता -मुक्ता, नीहारिका - सारिका [
इन नामों पर दो भतीजियों का नामकरण किया] | कहूँ कि मेरी पूरी पढ़ाई
या संस्कार- निर्मिति ही इन्ही से हुई , वरना मैं कुछ पढ़ा लिखा
तो था नहीं - इण्टर था , वह भी विज्ञानं से | जो आज हालत यह है कि रूप रेखा जी , प्रमोद , नीलाक्षी और आप लोगों जैसे विश्वविद्यालय - पठित
शिक्षक विद्वत-जन मुझे अपने वार्ता कक्ष में बैठने देते हैं, सब उन्ही पत्रकों की
देन और वरदान है |और हाँ , नवनीत तो बताया ही नहीं , जिसने मुझे सांस्कृतिक - दार्शनिक दृष्टि दी , अहा! ज़िन्दगी की तरह मनोरंजक , और जिसके आधार पर अपने
पुत्र का नाम ' नवनीत कुमार ' रखा |
कोई उत्तर नहीं
[उवाच ]
* यदि हमारे और आपके विचार एक से ही होने होते ,तो विश्व की जनसंख्या में एक अदद की कमी न हो जाती ? फिर एक काम के लिए ईश्वर ने दो मनुष्य बनाया ही क्यों होता ?
* कुछ प्रश्नों का सचमुच कोई उत्तर नहीं होता, जैसे यही जातिवाद - जातीय भिन्नता - ब्राह्मणवाद का !
* सच कह रहे हैं आप ! आप मुझसे छोटे नहीं हैं | लेकिन मैं आपसे छोटा हूँ तो सही ?
शनिवार, 26 मई 2012
नानी की मौत
कविता = ' नानी की मौत '
-----------
मैं नहीं जानता जीवन मृत्यु ,
आदमी क्यों पैदा होता है ?
कैसे मरता है ?
लेकिन जब तुम
मर जाओगी नानी
तब मैं बहुत रोऊँगा |
कर्म विरत
[कवितानुमा] - कर्म विरत
मैं कुछ नहीं करता
उसे भी मेरा किया
मान लिया जाता है
मैं करूँ तो क्या करूँ
जिससे मैं निर्दोष रहूँ ?
संभव नहीं इस जग में
कर्म विरत रहना
तो क्यों न कुछ करता रहूँ ?
HURRAY !
HURRAY !
all my friends , I could name my one month old only granson as “
DINMAAN “ (or Dinman Srivastava ) which was my long pending ambition , based on my favourite magazine – old DINMAN
edited by Aggeya and then Raghubir Sahai . I am very pleased today that my son
accepted this name for his son .
मित्रों को हार्दिक धन्यवाद मेरी और से | और शिशु दिनमान का आप सबका चरणस्पर्श आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए | दोस्तों, मज़ा और तो तब आये जब उसका नाम केवल दिनमान रहे या दिनमान नागरिक हो जाये ,लेकिन सोचता हूँ - किसी पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं है | कोई विवाद नहीं पुनर्जीवित करना चाहता | पर इसे राजनीतिक विडंबना, या अपनी पराजय तो मानता हूँ या इस अवस्था में शक्ति की कमी कि यदि बहू - बेटा उसका नाम स्कूल में श्रीवास्तव जोड़ कर लिखाएंगे तो मैं मना नहीं कर पाउँगा | अपना ही नाम कहाँ छिपा पाया ? बताना ही पड़ा कि मैं सवर्ण हूँ जिससे मेरे सामाजिक -राजनीतिक कर्म में कोई छद्म न पनपे , और जब सवर्ण हूँ तो कोई जाति बतानी ही थी | प्रमोद श्रीवास्तव जी के अनुसार हिन्दू धर्म का मतलब ही जाति है , ये दोनों एक दूसरे से पृथक नहीं हो सकते ,और मैंने हार मान ली | यद्यपि कोशिश पूरी ईमानदारी से की जाति मिटाने की | लखनऊस्कूल के लोग जानते हैं , युवजन समिति के माध्यम से आन्दोलन को | अब इसका दोष सरलीकृत ढंग से आरक्षण / मंडल को दूँ तो दोषी हो जाऊँगा | इसलिए संतोष करता हूँ यह सोचकर कि तब हम नादान थे , युवा उत्साह था और दुनिया की समझदारी में कमी थी , जिसकी रौ में हम बह गए थे | तब भी इतना तो कर ही सका था कि बड़ी बेटी [दिनमान की एकमात्र बुआ] का नाम रजनीगंधा और छोटे एकमात्र बेटे[दिनमान के बाप] का नाम नवनीत कुमार बिना किसी उपनाम के रखा | बस वहीँ तक मेरी सीमा थी | मन थोड़ा खिन्न तो होता है , पर लोकतान्त्रिक आध्यात्मिकता के सहारे खुश होने की चेष्टा करता हूँ | आप सबका आभारी हूँ जो आज मेरे सुख / दुःख में मेरे साथी हैं | 26/5/12
मित्रों को हार्दिक धन्यवाद मेरी और से | और शिशु दिनमान का आप सबका चरणस्पर्श आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए | दोस्तों, मज़ा और तो तब आये जब उसका नाम केवल दिनमान रहे या दिनमान नागरिक हो जाये ,लेकिन सोचता हूँ - किसी पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं है | कोई विवाद नहीं पुनर्जीवित करना चाहता | पर इसे राजनीतिक विडंबना, या अपनी पराजय तो मानता हूँ या इस अवस्था में शक्ति की कमी कि यदि बहू - बेटा उसका नाम स्कूल में श्रीवास्तव जोड़ कर लिखाएंगे तो मैं मना नहीं कर पाउँगा | अपना ही नाम कहाँ छिपा पाया ? बताना ही पड़ा कि मैं सवर्ण हूँ जिससे मेरे सामाजिक -राजनीतिक कर्म में कोई छद्म न पनपे , और जब सवर्ण हूँ तो कोई जाति बतानी ही थी | प्रमोद श्रीवास्तव जी के अनुसार हिन्दू धर्म का मतलब ही जाति है , ये दोनों एक दूसरे से पृथक नहीं हो सकते ,और मैंने हार मान ली | यद्यपि कोशिश पूरी ईमानदारी से की जाति मिटाने की | लखनऊस्कूल के लोग जानते हैं , युवजन समिति के माध्यम से आन्दोलन को | अब इसका दोष सरलीकृत ढंग से आरक्षण / मंडल को दूँ तो दोषी हो जाऊँगा | इसलिए संतोष करता हूँ यह सोचकर कि तब हम नादान थे , युवा उत्साह था और दुनिया की समझदारी में कमी थी , जिसकी रौ में हम बह गए थे | तब भी इतना तो कर ही सका था कि बड़ी बेटी [दिनमान की एकमात्र बुआ] का नाम रजनीगंधा और छोटे एकमात्र बेटे[दिनमान के बाप] का नाम नवनीत कुमार बिना किसी उपनाम के रखा | बस वहीँ तक मेरी सीमा थी | मन थोड़ा खिन्न तो होता है , पर लोकतान्त्रिक आध्यात्मिकता के सहारे खुश होने की चेष्टा करता हूँ | आप सबका आभारी हूँ जो आज मेरे सुख / दुःख में मेरे साथी हैं | 26/5/12
तपस्या
[नागरिक उवाच ] :- बदमाश चिंतन
बड़ी तपस्या करनी पड़ती है माँ को बहू की थोड़ी सी फटकार सुनने के लिए !
प्रथमदृष्टया
प्रथमदृष्टया
--------
एक -एक अंग करके
पूरा शरीर बना ,
अतः , यदि शरीर की
कोई सार्थकता , प्रतिष्ठा है
तो इसका हर एक अंग
बहुत सुंदर होना चाहिए ,
अत्यंत
सुंदर है
चाहे वह कितना ही कुरूप हो ,
प्रथमदृष्टया |
प्रिय संपादक
जो मैंने ' प्रिय संपादक '[पत्र मासिक] , के ज़रिये अस्सी के दशक से करना शुरू किया था , उसे फेस बुक और ट्विटर ने अब करके दिखा दिया | मेरी सोच और परिकल्पना असफल नहीं गयी , ऐसा मैं कह सकता हूँ, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बन सकता हूँ |
जब से मैंने होश संभाला
[गीत नहीं बन पाया ]
जब से मैंने होश संभाला , द्वंद्व - द्वंद्व झेला ,
संगी- साथी, खेल - खिलाड़ी दंद -फंद खेला |
कथा कहूँ तो
[हाइकु]
* मज़ा आता है
बातें करते हुए
फेसबुकी से |
* कथा कहूँ तो
कहाँ से शुरू करूँ
अतः चुप हूँ |
कुछ ख़ास नहीं
[ कथा भूमि ] कुछ ख़ास नहीं
मैंने ' क ' की तारीफ की तो ' क ' ने ' ख ' को बताया | मैंने ' ख ' की तारीफ की तो उसने ' ग ' को बताया | मैंने ' ग ' की प्रशंसा की तो उसने ' ज्ञ ' को चहक कर बताया की अमुक मेरी बड़ाई कर रहा था | मैंने ' ज्ञ ' की बड़ाई की तो उसने ' क ' के कान में फुसफुसा कर कहा कि फलाने तो मुझे पसंद करते हैं | ' क ' ने ठहाका लगाया और बोली - पगली उसकी बात पर न जा , उसने सबसे पहले मुझसे भी यही बात कही थी |
ज़माना तो बदलेगा
ज़माना तो बदलेगा
ज़माना ' यूँ ' न बदलेगा ,
ज़माना ' वूँ ' न बदलेगा ,
ज़माना ' यूँ ' तो बदलेगा ,
ज़माना ' क्यूँ ' न बदलेगा ?
इनकम टैक्स बंद करो
* सरकार इतना धन कहाँ से पाती है खर्च करने के लिए ? उसके पास बहुत सारा पैसा है | उसके पास तमाम फिजूल पैसा है अपने सांसदों के वेतन - भत्ते बढ़ाने के लिए , अपार धन है जिससे उसमे बैठे आदमी , विधायिका एवं कार्यपालिका के लोग खूब गुलछर्रे उड़ाते हैं , गड़बड़ घोटाले करते हैं इसलिए यदि पैसे की बर्बादी बचानी है तो सरकार की आमदनी रोको | उसकी आमदनी मुख्यतः कर द्वारा होती है | उसे सीमित कर दो | सरकार को सिर्फ चिड़िये की प्यास बुझाने भर को पैसे दो | इनकम टैक्स बिलकुल बंद करो | कर्मचारियों का वेतन उनका इनकम नहीं है | ऐसे तो कुछ दिन बाद साधारण मजदूर भी इसके अंदर आ जायेंगे ! यह पैसा जिनके पास है उन्ही के पास रहने दो वे इसका ज्यादा सदुपयोग हिफाजत से करेंगे | बजे इसके कि सरकार इनसे टैक्स ले और इनके ऊपर जनहित के नाम खर्च करने के बहाने घोटाले करे | शायद आप कहना चाहें कि घोटालों का पैसा भी तो इन्ही के बीच जाता है ? जी नहीं , तब वह गलत पैसा होने की भावना के साथ उनके पास जाता है और इससे उनकी आत्मा कलुषित होती है | उनके द्वारा कमाए गए उचित धन को उन्ही के पास रहने दो |
Slut walk-a spiritual journey
*Slut walk is a spiritual journey . Get away with the
load of thoughts and prejudices . Let your mind be uncovered, unclothed and
dress it like a slut.
*If I can support you , why can’t I oppose
you ?
*Ladies can go bare for a slut walk , but
they can not breastfeed their child , in public what to say , in private even.
*It is very expensive to wear clothes , even the
shortest most . Then why not go naked ? Why this body-covering DEE ?
* In fact ,who cares
what you wear if you dare so . it is you who are sensitive about it . Why do you not attend a marriage party in
Lungi , and your class room in a spaghetti dress ?मैं बुरा हूँ
[शेर ]
मैं बुरा हूँ , बुरा कहे कोई ;
क्यों न मुझको बुरा कहे कोई ?
or -
[क्या बुरा है जो सच कहे कोई ?]
शुक्रवार, 25 मई 2012
vicharheen
* मैं शुरू से यह आभास कर रहा हूँ कि हमारा जरनैल सिंह निहायत नामाकूल सख्श है | क्या ३१ मई से पहले इनसे छुटकारा नहीं लिया जा सकता ?
[विचारहीन]
दुनिया सुखी रहे
* मेरा ख्याल है - दुःख में आदमी का दुखी होना तो स्वाभाविक है ,पर अपने दुःख को छिपाकर झेलना चाहिए , प्रकट नहीं करना चाहिए , ज्यादा हाय -तौबा नहीं मचाना चाहिए | लेकिन आदमी को अपने अपने सुख में सुखी होने और दिखने का कुछ ज्यादा ही नाटक करना चाहिए | जिससे दुनिया सुखी रहे |
कोई संतान
[हाइकु]
* मजबूरी है
सासुओं -ससुरों की
बहू अच्छी है !
* खिलाड़ी जन
सब बिके हुए हैं
खेल क्या देखें ?
* थोड़ी व्यवस्था
थोड़ी प्रकृति रहे
जीवन चले !
* ज्यादा खर्चा है
थोड़ा पहनने में
ज्यादा पहनें !
* कोई संतान
लायक नहीं होती
पितृ - दृष्टि में |
* इस तन में
कुछ रखा नहीं है
मैं जान गया |
गुरुवार, 24 मई 2012
स्लट वाक
स्लट वाक-
अप्रेल २०११ में किसी देश की पुलिस ने लड़कियों के लिए कह दिया कि वे स्लट की तरह कपडे न पहना करें | इस पर पूरे विश्व में हाहाकार मच गया | औरतों ने इसे अपनी आज़ादी का मुद्दा बना लिया | उनका कहना है कि वे जो चाहेंगी पहनेंगी ,स्लट की तरह कपडे पहनेंगी कोई उनसे छेड़खानी या बलात्कार क्यों करे | अपनी इस बात को लेकर अपने आन्दोलन में वे कम से कम कपड़ों में मार्च करती हैं , जिसे स्लट वाक कहा जाता है | उनका एक तख्ती यह भी कहती है - आओ बलात्कार करो | अब पुरुष इतना कमीना तो है नहीं , कामुक पुरुष तो वैसे भी कमज़ोर होते हैं | अतः उनका आन्दोलन अख़बार की सुर्ख़ियों में सफल होता है , और लडकियाँ फिर सामान्य कपडे पहन लेती हैं | इस तरह के विरोध पर एक लोक कथा है कि एक आदमी ने ठान लिया कि उसे अपने साथी की बात नहीं माननी है | साथी ने कहा देखो नदी में न उतरना , वह नदी में घुस गया | साथी ने कहा -देखो जाओ तो जाओ ,लेकिन गले में पत्थर बाँध कर मत जाना , उसने भरसक वज़नदार पत्थर रस्सी में बाँधकर गले से लटका लिया | साथी ने कहा -अच्छा, पर गहरे पानी में न उतरना , वह गहरे , और गहरे पानी में उतरता चला गया |नतीजा हमें नहीं पता , आप शायद कुछ अनुमान कर पायें | क्या दोनों कहानियों में कुछ साम्य दिखता है ? एक पुलिस वाले की साधारण -सामान्य बात को इतने अतिशयोक्ति में ले लिया गया कि यह सोचा ही न गया कि शायद साथी ने कुछ थोडा सा सच न कहा हो, या तब भी इतना तो विरोध न करें , पहनें चाहे जो पहनें | वे जाने , उनका खर्च चलने वाले माँ-बाप जाने | हम कौन होते हैं बीच में बोलने वाले और वैसे भी हम औरतों के बारे में कुछ कह नहीं सकते , उनकी आलोचना नहीं कर सकते | पुलिस ही मूर्ख थी , होती ही है |
भूमि अधिग्रहण
भूमि अधिग्रहण
वह एक शेर है - मुझे मस्जिद में बैठकर शराब पीने दे , या वह जगह बता की जहाँ पर खुदा नहीं | उसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि विकास के लिए मुझको ज़मीन लेने दे , या वह ज़मीं बता कि जो कीमती न हो | कहा जाता है कि उपजाऊ ज़मीं न लिया जाय | तो भला ऐसी कौन सी ज़मीन है जो उपजाऊ या किसी अन्य उत्पादक कार्य के लिए उपयुक्त न हो ? चीन ने जब भारत का भूभाग ले लिया था तो नेहरु जी ने यही तो कहा था कि छोडो , वहां कुछ नहीं उगता | अर्थात उसे चीन ने ले लिया तो हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ | लेकिन उनके इस वक्तव्य की तो बड़ी आलोचना हुई ! यहाँ तो ऊसर ज़मीनों को भी उपचार द्वारा उपजाऊ बनाया जा रहा है , और उसके लिए सरकारतमाम धन व्यय कर रही है | इस प्रकार किसी भी धरती को बेकार नहीं कहा जा सकता | हर ज़मीन , धरती का हर टुकड़ा किसी न किसी प्रकार सार्थक है , तो क्या सड़कें न बनें ? दूसरी राजनीतिक माँग है कि मालिक की मर्जी के बगैर उसकी ज़मीन न ली जाय ! तो , मर्जी होने , न होने के पीछे तो कई तरह की प्रेरणाएँ होती हैं , लेकिन उस विवाद में मैं नहीं जाऊंगा | लेकिन तब स्थिति यह हो सकती है कि सड़क के रास्ते में कुछ टुकड़ों में सड़क होगी और बीच - बीच में कृषि योग्य खाली ज़मीन | तब वहां या तो कैंटीलीवर फ्लाई ओवर बने , या ऐसी गाड़ियाँ बनें जो आवश्यकतानुसार उछल - उछलकर चलें | दूसरा विकल्प मेरे विचार से ज्यादा मज़ेदार होगा | [विभास]
(विचारहीन भारतीय समाज)
खुशवंत सिंह
खुशवंत सिंह निकट शतायु हैं , अर्थात मेरे पैमाने पर काफी बुज़ुर्ग | और वह सजग , बुद्धिमान ,पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी हैं | राष्ट्रपति पद के लिए मैं उनका नाम प्रस्तावित करता हूँ | [निर्विवाद = निर्विचार (thoughtless) वार्ताकार दल]
अच्छा शासन
[हाइकु]
अच्छा शासन
मैं अवश्य चाहूँगा
अच्छा ईश्वर !
इस दिल में
प्यार की क्या कमी है
जो भी ले जाये |
लालच तो था
मेरे मन में , पर
कह न पाया |
मानो न मानो
कोई दबाव नहीं है
मान भी जाओ |
याद आ गया
एक वह समय
हम युवा थे |
कुछ नहीं समझती
[उवाच]
वह मुझको कुछ नहीं समझते / मैं उनको कुछ नहीं समझता / दुनिया हमको कुछ नहीं समझती |
डाक्टरों की पर्चियां
कविता -
डाक्टरों की पर्चियां
कुछ दवाओं की रसीदें
मिलेंगी तुमको
सिरहाने से मेरे ,
मत खौफ़ खाना
इन्होने ने ही तो
बचायी ज़िन्दगी मेरी
अभी तक , अभी
थोड़ी देर पहले तक !
खरा नहीं है
हाइकु -
१ - सब झूठ है
सचमुच भ्रामक
ईश्वर - धर्म |
२ - प्यास बढ़ाने से
कोई फायदा नहीं
प्यास मिटाने से |
[यह हाइकु नियम पर खरा नहीं है]
बुधवार, 23 मई 2012
मायके ससुराल
[कविता]
बर्तन मायके में भी माँजती थी
बर्तन ससुराल में भी माँजती हूँ,
गोबर चारा वहां भी करती थी
गोबर चारा यहाँ भी करती हूँ ,
वहां भाई पीटता था
यहाँ मर्द लतियाता है ,
वहां माँ- बाप थे
यहाँ सास -ससुर हैं
मुझे पसाने के लिए ,
मेरा नर्क तो हर जगह है |
आत्मा अवस्थित
[बदमाश चिंतन]
आत्मा उसको कहते हैं जिसमें मनुष्य का मन बहुत रमता हो | अतः मैं विश्वासपूर्वक,निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि मनुष्य में आत्मा है और वह उसकी टाँगों के बीच में अवस्थित है |
देश की सीमा
[उवाच] - देश की सीमा
आप देश की सीमा की बात कर रहे हो , यहाँ एक-एक संस्थान,गृह समिति , सुपर बाज़ार , के परिसरों की सुरक्षा भी चुस्त
- दुरुस्त रहती है | #
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Plan = Thoughtless Productions By u.n.nagrik
बलात्कारी
कविता - [बलात्कारी]
पता नहीं क्या
मरे जाते हैं बलात्कारी
दो इंच ज़मीन के लिए ,
फ़िज़ूल बदनाम करते हैं
पुरुष और पौरुष को
हासिल कुछ नहीं होता
देश के चेहरे पर कालिख पोतते हैं
बलात्कारी |
नया बाबा
कथानक :- नया बाबा
उसने अपने शिष्यों को सुझाया कि मंदिर जाना छोड़ दो ,पूजा -पाठ छोड़ दो | ईश्वर चाहेगा तो सब ठीक हो जायगा| ( निर्धन बाबा)
काजू भरा पलेट में
कथानक :- काजू भरा पलेट में
* खालिस काजू नहीं , काजू वाला नमकीन था प्लेटों में जो मेहमानों को दिए गए | कुछ ने केवल काजू बीन बीन कर खाए और नमकीन छोड़ दिया | वे सब अभी थोड़ी देर ही पहले काफी कुछ खा चुके थे | लेकिन कथा नायक ने केवल कुछ नमकीन खाया और काजू सारा ही छोड़ दिया | लोगों को यह अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त था की वह टुच्चा भुक्खड़ नहीं , एक खानदानी सुसंस्कृत मेहमान है | उसका अपना तो बस यही कहना था कि काजू गरिष्ठ हो जाता |
fb haiku
हाइकु कविता [इस विधा में तीन लाइनों में ५-७-५ अक्षर संयोजित किये जाते हैं]
१ - कोई ट्रेन हो
आदमी भरे पड़े
उप - डाउन |
२ - मुंह मोड़ लो
इस आकर्षण से
कुफलदायी |
३ - पैसे लेकर
हार गए हम तो
जीवन - मैच |
४ - घूम घूम के
बुद्धू लौट करके
घर को आये |
५ - तोड़ पाओ तो
तोड़ दो , न टूटे तो
जान मत दो |
६ - टूट पाए तो
तोड़ दो , न टूटे तो
रहने ही दो ,
परम्पराएं
ज़िन्दगी के तमाम
रीति - रिवाज़ |
मंगलवार, 22 मई 2012
6 Poems
कविताएँ :
१ - बच्चे जैसे जैसे
बड़े होते जाते हैं ,
मैं बूढ़ा होता जाता हूँ |
२ - इसी कारण
सदा मैं काम
जोखम के उठता हूँ ,
कि आखिर मौत को भी तो
बहाना चाहिए कोई !
३ - इसके चलते मैं युगों से
इस कदर हैरान हूँ ,
किसने मेरे सर पे रखा
बुद्धि का जलता दिया ?
४ - इसी से वक्त मुझको देख
इतना तेज़ भगता है ,
कहीं यह आदमी
मुझसे भी न
आगे निकल जाये !
५ - सब स्वयं अच्छे हों
यह तो बहुत अच्छा है
लेकिन यह पर्याप्त नहीं ,
सबके ऊपर सब
नज़र भी रखें
जिससे आदमी
बिगड़ने न पाए ,
ताला दोनों तरफ से हो
वह ज्यादा अच्छा है |
6 - Whom I loved
Means , whom I kissed ,
Or , who kissed me .
समय प्रवाह
कविता :-
समय प्रवाह
- " ज़माने की धार को
हम रोक नहीं सकते |"
- क्या मतलब ? क्या
उसका प्रवाह इतना ऊपर से
इतना नीचे की ओर है ,
जो इतनी तेज़ है ?
- हाँ , शायद !
या ऊपर - नीचे का प्रश्न नहीं
बस पहाड़ से
समतल धरती की ओरे है |
हम इसके प्रवाह को रोक नहीं सकते | #
तनिक नीचे झाँकिए
कवितानुमा -
यदि आप
अपने कमरे में बंद हैं
तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
कि आप का फ्लैट किस मंजिल पर है,
तनिक नीचे झाँकिए |
रविवार, 20 मई 2012
आइ पी एल को बंद
कीर्ति आज़ाद ठीक कहते हैं | आइ पी एल खेल के नाम पर अपराध और व्यापार का घिनौना खेल चलता है | ये देशों कि टीमें नहीं , व्यवसायियों की अंतरराष्ट्रीय दुकानें हैं | ऐसे आइ पी एल को बंद होना ही चाहिए |
चेतना के उफान से जागो
कविता -
सवेरा हो गया है , अब जागो
अँधेरा खो गया है , अब जागो ;
अब जो जागो तो आँख से ही नहीं
चेतना के उफान से जागो |
कविताएँ - २०/५/१२
कविताएँ - २०/५/१२
१ - साहेब और सहिबाइन तो चले गए
सांस्कृतिक कार्यक्रम में ,
गाड़ी में बैठे , उनका इन्तज़ार करते
ड्राइवर और चपरासी ने
क्या देखा ? #
२ - वही एक स्टेज
कभी जंगल , कभी पहाड़ ,
कभी नाचघर का रूप लेता ,
कभी अट्टालिका ,
कभी गरीब का घर बनता
सब एक यही स्टेज
कई पात्र , सब अपने - अपने निर्देशक
अपना संवाद बोलते ,
भूमिका निभाते ! #
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योजना -[संस्था]
१ - नया विश्वास [ A Faith in Democracy] & / or
२ - सांस्कृतिक सरोकार [सांस] / सांस्कृतिक सरोकार दल [ सांसद ]
ताड़न के अधिकारी
ताड़न के अधिकारी
हर चीज़ का एक स्थान होता है , और वह वहीँ शोभा देता है | सिन्दूर को माँग की बजाय औरत यदि नाक पर लगा ले तो वह हास्यास्पद ही लगेगी | अब मान लीजिये हम तय करें कि छात्रों को धर्मग्रंथों के अंश पढ़ाए जायं , तो क्या हमारे विशेषज्ञ राम चरित मानस का वह अंश पाठ्य पुस्तक में डाल दें कि :- " ढोल गवांर शूद्र पशु नारी , ये सब ताड़न के अधिकारी | " और यदि हम कुछ बोल दें , एतराज़ कर दें तो हमसे कहा जायगा - "चुप रहो, यह गोस्वामी की अभिव्यक्ति और काव्य -कला और साहित्यकार की स्वतंत्रता का प्रश्न है , ? " | मित्र बताएँ क्या मैं संकुचित जातिवादी धारणा से ग्रस्त हूँ ?
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