मंगलवार, 26 जून 2012

चन्द्रदत्त तिवारी : एक स्मृति

चन्द्रदत्त तिवारी-एक व्यक्ति-एक प्रवृत्ति  : एक स्मृति
सन 1980 में जब मैं लखनऊ आया तब मैं त्रिशंकु की स्थिति में था। निम्न मध्यवर्गीय अनुशासन में पला-दबा मैं स्वभाव से ही संकोची था। मन में एक विद्रोह तो था,  कुछ पढ़ाकूपन, कुछ वैचारिक ऊहोपोह, कुछ कवितार्इ गुन और ढेर सारी जिज्ञासा- यही मेरी पूँजी थी। मेरी नौकरी भी कोर्इ इज्जतदार न थी जिसके कारण मैं एक अदृश्य हीन भावना का शिकार जीवन भर रहा, जिससे मैं अभी पांच वर्ष पूर्व स्वैचिछक त्याग पत्र देकर ही मुक्त हो पाया। यहाँ आते ही मजदूर किसान नीति आर्इ आर्इ टी कानपुर के सुनील सहस्त्र बुद्वे के  एक चुनाव अभियान के संदर्भ से भार्इ ज्ञानेन्द्र (अब स्वर्गीय) और प्रमोद जोशी (अब हिंदुस्तान दिल्ली के वरिष्ठ संपादक) मेरे क्वार्टर आये और शाम मीटिंग में मैं अनुपम (अब दस्तावेज प्रकाशन) के घर गया। राजनीति तो मै क्या समझता वहीं एक जादुर्इ युवा व्यक्तित्व से भेंट हुर्इ । वह थे राजीव...........।

लेकिन मैं उनसे कम ही मिलता। पड़ोस के ज्ञानेन्द्र जी से अधिक भेंट होती। ज्ञात हुआ कि राजीव एक प्रशासनिक अधिकारी के पुत्र हैं, जय प्रकाश आंदोलन की उपज हैं राजनीतिक विश्लेषक और लेखक-संघटक हैं। साइकिल से चलते हैं सर्कुलेटिंग लाइब्रेरी चलाते हैं। उनके साथ युवाओं की बैठकें चलती रहीं। इनके बीच मुझे संतोष इसलिए मिलता कि अन्य युवक जहाँ लोफरर्इ करते हैं वहां इनको देखों कि राष्ट्र निर्माण के काम में लगे हैं। ये युवा मेरे आदरणीय हो गये जब कि आयु में मैं बड़ा था, बस आयु में ही। जाहिर है ये लोग विश्वविधालय शिक्षा रत या युक्त थे। इनके मुकाबले मैं कहीं नही ठहरता था। वैसे भी मैं ऐतिहासिक तथ्य नहीं, कथ्य या तत्व ही पकड़ता था। मैं इनकी किताबों के स्तर पर जा नहीं पाता। प्रमोद और आशुतोष जी के हास्टल के कमरे में जाता तो ये बेड पर किताबों पर ही सोते बैठे पढ़ते मिलते मुझे अपनी अशिक्षा पर ग्लानि होती। मैं इधर-उधर  से किताबें लेकर पढ़ने का नाटक करता। पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ कहकर अपनी खिसियाहट भले ही छिपा लूँ पर सत्य तो यही था कि मैं अशिक्षित था। फिर यह कबीर का जमाना तो है नहीं कि अपना सम्मान मैं बिना पढ़ा लिखा होकर भी बचा पाता और बिना अपमानित हुए विचार जगत में रह पाता। फिर मेरी सहज प्रियता और नाम व प्रतिष्ठा के प्रति-मेरी तीव्र अरूचि ने मुझे और लतखोर बना दिया साथी भी कोर्इ साधु संत योगी तो थे नहीं जो मुझे जान पाते कि मेरी कहाँ पैठ है। एक âदय के साथ थोड़ी अपनी भी बुद्वि है। मैं अपने निर्णयों पर अपनी ही तरह पहुँच कर निमग्न रहता हूँ। यह मैं किसी से कैसे बताता कि मैं भी कुछ निश्चयात्मा और अग्नि गर्भा हूँ। तो इसी अपनी कल्पना व धारणा शक्ति के साथ मैं एक चावल की खिचड़ी अपने मन में खुद बुद पकाता रहता और मुझे विश्वास होता कि मैं नमक ठीक डाल रहा हूँ। और हल्दी सही रंग ला रही है। लेकिन ज्यादा पढ़े लिखे लोग गलत फहमी में रहे। यह मेरे लिए उचित ही था परन्तु जब यह गलत फहमी जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती तो कुछ विवाद हो जाते और मेरा मन दुर्वासा हो जाता। मेरी कुछ बूँदे खून की जलती जिसे मैं तो पूरा कर ले जाता पर नुकसान साथियों का होता जो एक संत वचन और सत्संगत से वंचित हो जाते इस कथन में कोर्इ अतिशयोक्ति नहीं है। इतने क्षेपक के बाद किस्सा यह कि-युवजन समिति ने जब जाति छोड़ों आंदोलन चलाया तो यह मेरे मन की बात हो गर्इ। जातिनाम मैं पहले ही हटा चुका था। इसके लिए हमें गांधी, लोहिया, कृपालानी आदि महात्माओं का सूक्ष्म आशीर्वाद प्राप्त था। अत: मैं इसमें âदय से शामिल हुआ। मौलवीगंज की पूरी टीम प्रभात, अनूप, मुकेश, छविधाम, हमराही, अशोक आदि साथ में प्रमोद, अवधेश, हरजिन्दर, आलोक एवं अन्य इसमें थी। तो राजीव हेमकेशव हुए, प्रमोद श्री हरीश हुए और अन्य लोगों ने या तो जातिनाम पर हटाया या कोर्इ जातिहीन उपनाम लगाया। मैं, उग्रनाथ.... से उग्रनाथ हुआ। बाद मैं नागरिक तखल्लुस ज्यादा पुकारू हुआ। आंदोलन के चरण आगे नहीं बढ़े पर मुझ मोंदे मिट्टी में उत्साह-ऊर्जा का सृजन हुआ। इसी कार्यक्रम में चन्द्र दत्त तिवारी जी को सुना। वह इस नाटक के ज्यादा तरफदार न थे। इसी आयोजन में एक और उपलब्धि हुर्इ। राजीव ने मुझसे मोटर साइकिल से मान्य सुरेन्द्र मोहन जी को अतिथिगृह पहुँचाने को क्या कहा कि समाजवाद मेरे पीठ पर यूँ ही चपक गया बिना समाजवाद की कोर्इ किताब पढ़े। बाद में आचार्य नरेन्द्र देव पर किताबों का बंडल तिवारी जी के कहने पर दिल्ली सुरेन्द्र मोहन जी घर देने भी गया।

    युवा संगत ने गुल खिलाना शुरू किया। मेरी रूचि ज्यादा र्इश्वर धर्म अध्यात्म में थी। प्रश्न तो उठते थे इनके बारे में पर इनसे लड़ने में डर लगता था। हाय कहीं नैतिकता न नष्ट हो जाय। ऐसे मे राजीव ने मुझे ऐसी शख्शियत से मिलाया जो नायाब थी। मैं बड़े संकोच और विनम्र भाव से एस.एन. मुंशी जी से मिला। फिर मेरा कोर्इ साइक्लोस्टाइल परचा लेकर वे मेरे क्वार्टर आ गये तो मैने मानववाद का पाठ सीखा। वे पूरे विज्ञान मूर्ति थे और उतना ही अजूबा था उनका संस्कृति प्रेम। उनके घर का निचला हिस्सा डी.एन. मजूमदार  संग्रहालय हुआ करता था। वहीं भेंट हुर्इ डा यशोधर मठपाल से जो मेरे पुराने दिनमानी पत्र लेखक मित्र थे-अब भीमताल में लोक कला संग्रहालय चलाते हैं। मुंशी जी से क्या कितना कुछ सीखा बताना मुशिकल है पर एक सूत्र दूँ- कि विषयों में अन्तर नहीं किया जा सकता। इतिहास विज्ञान, राजनीति, कला साहित्य संस्कृति सब एक दूसरे से जुड़े हैं।

उनका घर पूरा पुस्तकालय थ। उनकी ही दो किताबें थी एक एम एन राय का नवमानववाद और दूसरी उनकी वैसी ही कहानियों का संग्रह-प्रश्नोत्तर। वैज्ञानिक मानववादी साहित्य बहुत आता था वहाँ। रेडिकल âयूमनिज्म आगे मेरे बड़ा काम आया। उल्लेखनीय यह है कि उनके घर पर विचार गोष्ठियाँ चलती थी और मैं कहीं दुबक बैठ बड़े लोगों की बातें सुनता। विषय बड़े होते कुछ समझ में आती ज्यादा सर से ऊपर गुजर जाती पर मैं पीछे लगा रहता। मैं बिल्कुल नशेड़ी था विचार गोष्ठियों का कहीं भी होती पहुँच जाता और वहां से कुछ खुराक लेकर अपना दिमाग उनमें उलझाए रखता। विचार अभ्यास में इनसे बड़ी मदद मिली। चन्द्र दत्त तिवारी जी के घर नियमित विचार केन्द्र चलता । एक और स्थान था राजा साहब कोटवारा का घर जहां नरसिंह नरायन द्वारा स्थापित इन्डियन हयूमनिस्ट यूनियन था। इन स्थानों पर तमाम वरिष्ठ विचार कर्मियों के दर्शन होते। डा. हर्ष नारायण, के.के. जोशी, भुवनेश मिश्र, डा देवराज, रघुराज गुप्ता, संकठा प्रसाद आदि। और यहीं  मिली डा. रूपरेखा वर्मा। एक स्त्री और इतनी विदुषी! मैं सपने में भी नही सोच सकता था। दकियानूसी ग्रामीण परिवेश में न कभी ऐसा देखा न सुना। सो अभिभूति हुआ उनसे।

मैं निश्चित ही ऋणी हूँ कि मुंशी जी ने मुझे मानसिक ऊहापोह से निकाला उसे फिर तार्किक रूप से मजबूत किया रूपरेखा जी ने। उन्होने मेरे पढ़े लिखे टेढे मेढ़े वक्तव्यों का शोधन करके मुझे अपने विचारों पर आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया।

यह उन्हीं की कृपा थी कि बी.एस.सी प्रथम वर्ष फेल मैं उनकी दार्शनिक सभाओं में जा सका और कालान्तर में तो उन्होने आर्इ सी पी आर (भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद) की लाइब्रेरी का सदस्य भी बनवा दिया जहां से मैं इन्डिविजुअलिज्म (व्यक्तिवाद अपनी कापी पर उतार कर भाग आया)

    अंतत: तो फिर मुंशी जी ने जोरदार ठप्पा लगा दिया। उस समय मैं बाहर डयूटी पर था। लौटकर आया तो पता चला मुंशी जी नहीं रहे। घर गया तो बस-एक सन्नाटा उनकी पत्नी मिलीं उनके अपनी कोर्इ औलाद न थी, और यह उनके वैज्ञानिक मानस के लिए कोर्इ समस्या न थी। लाश का क्या हुआ, वह तो मेडिकल कालेज दे आयी। उनकी आँखें किसको लगार्इ गर्इ मुझे पता हुआ। तो क्या कुछ नहीं मिलता नहीं वहां एक एक नस एक एक तन्तु चीर फाड़कर विधार्थी अध्ययन अनुसंधान करते फिर कुछ नहीं बचता। कोर्इ क्रिया-कर्म का सवाल ही नहीं उठता। मैं आसमान से गिरा धरती पर। क्या ऐसा हो सकता है...

हाँ, र्इश्वर और धर्म के बगैर भी काम चल सकता है मेरे दिमाग में पक्का हुआ। मानववाद मन में बैठ गया। तब तक पेपर मिल कालोनी भी आने जाने लगा था। मेरी हस्तलिखित पत्रिका के पहले वार्षिक ग्राहक पांच रू0 मेरे घर आकर देने वाले चन्द्रदत्त तिवारी जी थे। वे मेरे पड़ोस में जय प्रकाश जी के घर आते थे। उन्हीं से ही इनके बारे में ज्ञात हुआ। बड़े त्यागी है। बड़े घर खानदान के हैं। डी0ए0वी0 कालेज इन्हीं लोगों का है इनके पिता स्वतंत्रता पूर्व विधायक थे, मोटर गाड़ी से चलते थे। ये साइकिल से चलते हैं पूरी इमरजेंसी जेल में रहे। चन्द्र शेखर के दोस्त हैं। जनता पार्टी के एम एल ए का टिकट वापस कर दिया। मुझ गरीब के लिए नैतिकता या बड़प्पन का इतना बोझ बड़ा भारी था। तभी इनकी दृढ़नीति या जिद्दी चरित्र का भी परिचय मिला। जय प्रकाश के पुत्र के जन्म दिन पर वे नहीं आये तो नहीं आये। मैने दूसरे दिन कहा आपने बहुत अच्छा भोजन मिस कर दिया। मैने जीवन में बहुत कुछ मिस किया है  उनका कहना था। वह ऐसे समारोहों को निरर्थक फिजूल खर्ची बताते और इसीलिए अपना जन्म दिन भी सबसे छिपाते। तिवारी जी की खिचड़ी समाज कर्मियों के बीच बहुत लोकप्रिय थी। तमाम सब्जियों से मिश्रित यहां तक कि उसी में वह अंडा भी तोड़कर डाल देते। वह पौष्टिक तो होती पर स्वादिष्ट नहीं जिसके हम पूर्वाचंली अभ्यस्त है। लेकिन कभी-कभी तो खाना ही पड़ता। सम्पूर्ण क्रांति से जुड़े तमाम साथी इसे खा चुके हैं। सो मैने भी खार्इ। लेकिन मैने डाँट भी बड़ी खार्इ।। फोन पर 8 बजे आने को कहते। पहुँचे तो घड़ी दिखाते । यू आर लेट बार्इ एट मिनट्स ऐसे जुमले वह अंग्रेजी में बोलते । आस्कर वाइल्ड उनके प्रिय लेखक जो थे । मैं पार्टी लेस डिमाक्रेसी (जय प्रकाश नरायन का दलविहीन प्रजातंत्र) की बात करता तो डाँट खाता। कहते-जय प्रकाश ने इसकी कोर्इ रूपरेखा नहीं बतार्इ। मंडल आयोग के पक्ष में बोला तो विपिन त्रिपाठी न होते तो मैं मार खाने की कगार पर था। यदि कभी महंगी सब्जी ले आता तो फटकारा जाता । (बाद के दिनों में मैं अपने घर से झगड़ा करके उन्हीं के पास रहने-खाने लगा था। अब उनके जाने के साथ वह आश्रय भी समाप्त हुआ) लेकिन उनका यह सब मुझे बाल सुलभ लगा क्योंकि फिर वह हँसी के मूड में आ जाते। मितव्ययिता के प्रति उनके अति-अनुराग का विरोध करने पर वह मान तो जाते पर हारते नहीं कहते अपनी अपनी एटीट्यूड (प्रवृत्तिआदत) की बात है। दही बड़े के बडे़ शौकीन। बस बताने भर की देर होती तिवारी जी घर आ जाते । हाँ तब भी डाँट खाने की नौबत आती यदि कहीं टोटीं से पानी टपक रहा होता या कोर्इ बत्ती बिला वजह जल रही होती खाना खाते और अलसा जाते तो सो भी जाते। यह एहसान केवल मेरे या जय प्रकाश के ही ऊपर नहीं था। उनके ऐसे असंख्य परिचित घर थे। इसलिए उनका काम शीशे के मर्तबान में रखे चावल की मात्रा से चल जाता। उन्हें चाय का बड़ा शौक थां अंग्रेजी तरीके से बनाते। चाय की प्याली पर हरजिन्दर का थ्री एंड अ हाफ एंड अ लिटिल मोर (चम्मच चीनी) हमारे बीच हमेशा मजेदार रहा। उनकी मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व हमने इसका एक साथ पाठ किया था और खूब हँसे थे। विचार गोष्ठियों में उनकी सहभागिता भी मनोरंजक होती। सब लड़-झगड़-बहस कर रहे होते, तिवारी जी मध्यस्थ सो रहे होते। वैचारिक उत्तेजना उन्हें परेशान नहीं करती थी। इसके लिए मैं उनकी माइनस मार्किग करता। अलबत्ता वे कुछ वाक्य पकड़ते और लेकर उड़ते रहते। उनके घर पहुचँता तो कभी कम्युनिज़्म इज द ओनली वे कभी गांधी का देयर आर एज मेनी रिजीजन्स एज देयर हेडस। फिर रीइवैल्युएशन आफ एक्जिस्टिंग थाट्स। आखिरी दिनों में प्रश्न उठा रहे थे बीसवी सदी का सबसे महान नेता बताओ। गांधी नही। माकर्स नहीं। वह थे अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट जिन्होने फासीवाद के विरूद्व लड़ार्इ में बिना माँगे ही रूस को मदद दिया। ऐसी ही कमी कुछ विचार कमी कोर्इ शोशा। वह साइकिल से चलते थे। लेकिन मौका मिलने पर स्कूटर पर लिफ्ट का पूरा दुरुपयोग करते। ऐसे ही एक दिन मुझसे कहा चलो प्रमोद श्री हरीश के घर चलो। तब तक शिव वर्मा व भगत सिंह के अनुज कुलतार सिंह व अन्दमान के अन्य जीवित साथियों के साथ पुराना किला दुर्गा भाभी के आवास में शहीद स्मारक व स्वतंत्रता संग्राम शोध केन्द्र की स्थापना हो चुकी थी। दुर्गा भाभी भारत के प्रथम मान्टेसरी पद्वति विधालय- लखनऊ मान्टेसरी इन्टर कालेज का प्रबंधन चद्र दत्त तिवारी को सौपकर गाजियाबाद जा चुकी थी। और शायद प्रमोद कुमार श्रीवास्तव इतिहास में पी.एच.डी कर चुके थे। वह संस्थान के निदेशक पद के लिए संपूर्ण उपयुक्त है। उच्चशिक्षित और अति ऊर्जा वान। नतीजा यह कि आज वही प्रमोद जी इस संस्था केा मित्र प्रभात जी के सहयोग से लगभग अकेले ही सफलता पूर्वक संचालित करने में सक्षम हैं। अभी फरवरी माह में ही शिव वर्मा द्वारा लिखित नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन इसी परिसर में हुआ। यह सब उन्हीं के प्रयासों का फल है। तो हम लोगों का यह सारा सम्पर्क उस विचार केन्द्र का परिणाम था जो उनके घर पर अस्सी के दशक में चलताथा। यहां आने वाली विभूतियों में केएन कक्कड़, चद्रोदय दीक्षित, रमेश दीक्षित, रमेश नागपाल, आशुतोष मिश्रा, नवीन तिवारी, रमेश तिवारी, पारसनाथ मिश्र, डा नरेन्द्र, चन्द्रपाल, अरूण त्रिपाठी, अंबरीष, पुनीत टण्डन, पेन्टल, वीरेन्द्र यादव, अजय सिंह के नाम लिए जा सकते हैं राजीव और रूपरेखा वर्मा तो थी ही। कितने नाम गिनाएं लखनऊ के सामाजिक संपर्क का हर सूत्र तो कहीं न कहीं तिवारी जी से जुड़ता हैं उन्होने विवाह नहीं किया था, रोटी के लिए कोर्इ रोजी करनी नही थी। इसलिए उनके सम्पर्को संबंधों की भरमार थी। यूँ भी उनके घर किसी को भी आने में हिचक नहीं हो सकती थी क्योंकि वे लखनऊ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। विश्वविद्यालय से वकालत की पढ़ार्इ की थी। वाइस चांसलर तक से अभिन्नता थी और राजनीतिक नेताओं त्रिलोकी बाबू, सी.बी.गुप्ता, भगवती सिंह आदि से निकट सबंध थे। अलबत्ता इन्होने इसका कोर्इ गलत लाभ नही उठाया न प्रचार पाने के ही अभिलाषी रहे। यह कुछ कम न था। अब ऐसे लोग कहां मिलते हैं।

    अपने घर पर ही एक बार मित्रों से उन्होने कहा कोर्इ संगठन बना लो वरना यह तो (यानी मैं) मारा जायगा। तब मैं बाबरी मस्जिद सबंधी विवाद का अत्यंत विरोधी था। बल्कि मैं सांस्कृतिक विखंडन भी करने लगा था। इसी की सजा में एक वरिष्ठ राजनीतिक कार्यकर्ता ने मेरे हाथ का छुआ पानी भी पीने से मना कर दिया था। बहर हाल तब तक रूपरेखा जी विश्वविधालय में सेक्युलर संगठन की रूपरेखा बना चुकी थी। अब वह कार्यशाला तिवारी निवास पर चलने लगा। सेक्युलर वाद के विभिन्न पक्षों पर बातचीत और नास्तिकता, सशंयवाद, तर्कबुद्विवाद, रहस्यवाद, मानववाद पर सैद्धान्तिक चर्चाएं शुरू हुर्इ। इसमें मेरी पूरी रूचि थी। सो के के जोशी के साथ सेक्युलर सेन्टर की भूमिका लिखी गयी। मै सेक्रेटरी बना। तिवारी जी संयोजक बने। और कोर्इ पद नहीं था क्योंकि इसके पंजीकरण का कोर्इ ख्याल न था। मानववाद में दिली आस्था के चलते मैं इंडियन सेक्युलर सोसाइटी का आजीवन सदस्य बन चुका थां इंडियन हयूमनिस्ट यूनियन की पत्रिका मंगवाने लगा था। अथीस्ट सेंटर, रेशनलिस्ट एशोसिएशन के प्रभाव में था। पटना के डा रमेद्र बुद्विवादी के साथ उन्हीं दिनों चले। गोरा, डा कोवूर, होलिओक, चाल्र्स ब्राडला मेरे गुरू थे। सो इन पर आधारित चर्चा होती और मूल्य निर्धारित होते तब तो मैं किसी काम का था। वरना राजनीतिक सेक्युलर वाद के तो कर्इ संस्करण हैं और उनमें आपस में ही गहन विभेद हैं तो ऐसी धर्मनिरपेक्षता पर कोर्इ एक समझ सहमति सदस्यों में स्थापित होती इसके पहले ही तात्कालिक राजनीतिक आवश्यकता वश एक राष्ट्रीय अधिवेशन का फैसला ले लिया गया। मुझे राजनीति की समझ बिल्कुल न थी। मैं केवल शास्त्रीय सेक्युलर वादी था। लोकायत वादी चार्वाक फिर बुद्व, कबीर तक तो मै खींच ले जाता पर आडवानी संधवानी की धर्म निरपेक्षता मेरी समझ से बाहर थी। और मुझे स्मरण नहीं कि सांप्रदायिक हिंदू मुस्लिम पक्षों पर कोर्इ खुलकर बात हो पार्इ थी ऐसे में अधिवेशन (ग्यारह-बारह अक्तूबर 1986 का लगभग पूरा काम तिवारी जी, रूपरेखा जी, प्रमोद जी, आलोक जोशी, जय प्रकाश प्रभात जी ने हीसंभाला और धर्मनिरपेक्षता  राज्य का घोषणा पत्र पारित हुआ। उसका अपना महत्व रहा होगा लेकिन मेरे ख्याल से अन्तत: सेन्टर की राजनीति परकता ही इसके बिखराव का कारण बनी। एक दिन तिवारी जी ने सेक्युलर सेन्टर का सारा कागज मेरे ऊपर फेंक दिया। मुझे कुछ हासिल हुआ तो बस अपना लिखा एक परचा और जो परचे कुछ आये थे। कुछ और याद करूँ तो असगर अली इंजीनियर का न आना भी  एक उपलबिध थी। ओर एक था किशन पटनायक के पत्र के उत्तर में मुझे तिवारी जी द्वारा बोल-बोलकर लिखाया गया एक जवाब जिस पर एक पूरा विचार केन्द्र अलग से विशेष चलाया जा सकता है। संक्षेपत: र्इश्वर असंख्य जनता के विश्वास के जवाब में तिवारी जी ने लिखाया कि जो नहीं है उसका नहीं होना बताना ज्यादा आसान है या कि उसका होना प्रमाणित करने की जिद करना और अंधविश्वास में रहना। प्रश्न वाकयी गंभीर था पर वह हमसे भी छूट गया। प्रमोद जी लखनऊ एकता चलाने लगे एवं रूपरेखा जी और मैं नागरिक धर्म-समाज । उसकी अलग कहानी है।

    बहर हाल इन सक्रियताओं के बीच में ही तिवारी जी ने हम लोगों को स्कूल व शहीद स्मारक संस्थाओं से भी जोड़ा हुआ था यह उनका हमारे प्रति विश्वास का ही प्रतिफल था वरना हम इसके योग्य न थे। अभी साल भर ही पूर्व मुझे उन्होने चार लाख रूपये से एक ट्रस्ट बनाकर उनकी वसुधैव कुटुम्बकम् के स्वप्न को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव किया था। वह तो भला मैं क्या करता पर उनका मेरे प्रति इतना विश्वास प्रदर्शन मेरे लिए पुरस्कार था। लेकिन मानववादियों में श्रद्वासुमन पारंपरिक प्रंशसात्मक भर होकर तो नहीं रह सकता। उन त्रुटियों, खामियों का भी जिक्र होना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ी सबक ले। मुझे कहना चाहिए कि हम लोग उनसे पर्याप्त असहमत थे और उनके रूढ़ ऐटीट्यूड से पीडि़त । किसी भी व्यकित से मिलने पर वे अपने बारे में बताते ना काहू से दोस्ती न काहू से बैर। लेकिन यह पूरा सच नहीं था। उन्होने किसी से दोस्ती नहीं की यह तो ठीक लेकिन उन्होने दुश्मनी तो सबसे ही की। चाहे वह शिववर्मा रहे हो या उनके हम वयस्क अन्य, या फिर दूसरी पीढ़ी के उनके तमाम साथी। वह किसी पर विश्वास नहीं करते थे और अपने विपरीत जाने पर किसी की इज्जत धोने में उन्हे कोर्इ संकोच न था। इसलिए उनका यदि कोर्इ विश्वस्त नहीं हो पाया या वह किसी के विश्वस्त नहीं हो पाये तो इसके पीछे उनकी अपनी प्रवृत्ति की घातकता थी। उनकी आदर प्रशंसा सब करते थे, दिखाते थे पर उसमें दिल की गहराइयाँ न थी इसमें चूक गये तिवारी जी वरना उनके साथ ऐसे ऐसे प्रतिभा सम्पन्न लोग थे कि उन्हें कहीं से कहीं पहुँचा देते। दूसरी बात, हमारा ख्याल है कि यदि वह थोड़ा कम रसोर्इ प्रवृत्त, किचनोन्मुख होते, कड़वा तेल की मँहगार्इ पर इतना ध्यान न दिया होता, चवन्नी बचाने के चक्कर में इतना न रहे होते, भोजन की थाली इस तरह न चाटते  (जिसे देखकर हमे घिन होती) साइकिल के व्यामोह में इतना न डूबते, अपनी कृत्रिम महामानववादी प्रवृत्तियों के गुलाम न होते या कहे गांधी दिखने की कोशिश न करते केवल एक स्कूल से इतना न चिपकते तो वे समाज के लिए शायद कुछ ज्यादा कर जाते जिसके लिए उन्होने इतना पैसा बचा बचाकर बटोरा हुआ था, जैसा वह कहते थे आज वह राजनीति के किसी पायदान पर होते और स्कूल के बाहर की दुनिया भी उन्हें याद करती। कम से कम उनकी र्इमानदारी तो राजनीति में स्थापित हुयी होती। निश्चय ही इसके पीछे था उनमें दृढ़ विचार और आत्मविश्वास और                     धारणाशकित का न होना था जिसका होना र्इश्वर विहीन मानववादी के लिए आवश्यक समझा जाता है। वह अगनासिटक (संशयवादी)  थे। हम उनकी राजनीति धर्म निरपेक्षता पर कुछ न कहेगें पर उन्होने हम लोगों वाली सैद्वान्तिक सेक्युलर वाद को तो अच्छी और पूरी तरह निभाया, जिसके लिए हम अपने आप को अभी असमर्थ पाते है। उन्होने कभी पूजा पाठ नहीं किया, मंदिर नहीं गये तिलक जनेऊ नहीं धारण किया और अन्त में बिना किसी पाखंडी कर्मकांड के अपना शरीर वैज्ञानिक अध्ययन के लिए चिकित्सा छात्रों को सौंप दिया। उन्होने सिद्व किया कि वह जबरदस्त मानववादी थे। ऐसे पूज्य पुण्य-पुरूष को हमारा प्रणाम।

उग्रनाथ नागरिक

शोकसभा

मुझे लगता है कि मेरे शरीर को कुछ होने वाला है | बहुत दिनों से मित्रों से कह रहा हूँ कि मेरी obituary [शोक सन्देश] लिख डालो | बहुत ' प्रिय ' संपादन किया है तो उसका भी प्रूफ देख दूँ , कोई व्याकरणीय चूक सुधार दूँ , कहीं कोई गलती न रह जाय | भाषा-शैली का पूर्व-रसास्वादन कर लूँ |  | और इस बहाने आश्वस्त भी हो लूँ कि हाँ मेरे लिए भी शोकसभा संभावित है , जैसा कि मैं तमाम शोक सभाओं में मैं भी तो जाता रहता हूँ | पर कोई लिखता ही नहीं, जब कि लिखना सब जानते हैं |अच्छे भले बड़े कवि- लेखक -पत्रकार हैं | अब इसके लिए कोई ज़बरदस्ती तो की नहीं जा सकती, वरना ये लिख देंगे कि वह [मैं] बहुत अशिष्ट - निकृष्ट आदमी था | इसलिए मेरा ऐसे ही सूखे-सूखे  चला जाना मेरे लिए श्रेय होगा | तथापि  सोचता हूँ कि स्वयं ही इस सम्बन्ध में कुछ कवितायेँ प्रस्तुत कर दूँ और संतुष्ट हो लूँ !
* एक सही
  वर्तनी हो तुम ,
  प्रूफ की
  तमाम गलतियाँ हूँ मैं |
* अभी कितनी घृणा कर लो मुझसे
  छीन ही लूँगा मैं तुमसे
  दो मिनट का मौन
  अपनी मृत्यु के पश्चात् |
* मैं मरूँगा नहीं
  मैं अपनी माँ के पास जाउँगा
  पीछे से चुपचाप उसका
  आँचल पकड़ लूँगा ,
  वह चौंक कर  देखेगी
  और मुझे अपने गले लगा लेगी |

* नागरिक
  कुछ कह गया
  कुछ कर गया ,
  एक अच्छा आदमी था
  मर गया |
* अब वासांसि जीर्णानि
  तो मैं लिखने से रहा ,
   मेरे जीर्ण वस्त्र होंगे
  मेरे मित्र ,
   शीर्ण होंगे मुझे
  पढ़ने वाले |

आश्चर्यचकित


[ विचारार्थ ]
१ - मैं आश्चर्यचकित हूँ कि ये इमारतें { धर्म और ईश्वर की } , ये पिरामिड आखिर टिके कैसे हुए हैं ? जब कि इनके आधार केवल रेत और बालू है , और कहीं -कहीं तो वः भी नहीं है |

२ - मेरा ख्याल है सचमुच आदमी [ पुरुष ] को घोंघा हो जाना चाहिए | अपने सारे अंग उसे सिकोड़ लेने चाहिए | उधर हम घोंघावसंत होने की वकालत पहले ही कर चुके हैं | औरतों की सारी सफलता का राज़ यही है |

३ - सरकार टैक्स लगती है और वह सारा पैसा उसके कर्मचारी खींच ले जाते हैं |

४ - ह्रदय को तो नज़रअंदाज़ कर भी सकता हूँ , पर मैं अपनी बुद्धि के आदेश को टाल नहीं सकता |

५ - मेरा ख्याल है , उनकी सामाजिक स्थिति को देखते हुए मुसलमानों को भारत में सवर्णों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए , और उन्हें सवर्णों के समान सेवाएं और सुविधाएँ दी जानी चाहिए |

६ - कुछ याद किया जाना चाहिए हिन्दू दलितों ने कितनी मनुस्मृतियाँ जलायीं , ब्राह्मणों को - बाबा तुलसीदास, राम चरित मानस , देवी -देवताओं को कितनी गालियाँ दीं ? तब  जाकर  अब कहीं उन्हें थोडा आरक्षण  मिल  पाया | यहाँ तक कि उन्होंने  हिन्दू धर्म त्यागने  की भी धमकी  दी और छोड़ा  भी | दूसरी तरफ  मुस्लिम भाई  कभी  इस्लाम  के विरोध में नहीं गए , कभी  किंचित  भी आलोचना , उसकी शिकायत नहीं की | वे बड़े  गर्व से मुस्लिम बने रहे और कुरआन अथवा मोहम्मद साहेब की प्रतिष्ठा  पर कोई आँच आती दिखी तो उन्होंने सड़कों  पर निकलकर हंगामा भी किया | गरीब भले  हों  पर ब्राह्मणों की भाँति उन्हें भी गुमान है कि वे हज़ार वर्ष हिंदुस्तान के शासक रहे | फिर उन्हें आरक्षण  क्यों ? सवाल यह भी है कि इतने  कथित समतावादी धर्म में होकर और साथी मुसलमानों के पास इतने धन -दौलत एवं ज़कात की व्यवस्था होते हुए वे गरीब कैसे रह गए ? दलित प्रथा  हिन्दुओं की बुराई और समस्या है | सवर्ण समाज अपने पुरखों के पापों  की भरपाई अपने दलित वर्ग को तो आरक्षण देकर कर सकता है , पर उसने मुसलमानों पर तो कोई जुल्म नहीं धाय ! बल्कि वह तो उनके  अधीन रिआया ही रहा ? फिर वह उन्हें आरक्षण को समर्थन क्यों दे ? आज़ादी का नाजायज़ फायदा  तो मत उठाओ  भाई !

७ - मैं पाता हूँ कि ब्राह्मणवाद एक शाश्वत व्यवस्था है | इसे किसी ने नहीं बनाया | यह अपने आप स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से बनती गयी , जिसका टूटना दूर - दूर तक कहीं संभव नहीं दिखता | क्योंकि यह " भेद " पर आधारित है जो कि वैज्ञानिक विधि है और मानव स्वाभाव के सर्न्था अनुकूल | तब दुसरे चातुर्वर्ण थे , अब चतुर्थ श्रेणी तक के कर्म्चाहरी हैं | पहले पंडित जी ब्राह्मण थे , अब ब्राह्मण होंगी | पाला भले बदल जाय पर व्यवस्था नहीं | अभी देखिये , कोई कवी चार पंक्ति का एक मुक्तक लिख लेता है वह अपने आप को कालिदास से कम नहीं समझता | किसी ने एक मुक्त कविता कर ली तो उसे आप मुक्तिबोध से कम समझने की गुस्ताखी नहीं कर सकते ! यही ब्राह्मणवाद है , श्रेष्ठता के दंभ का दर्शन | और यह मानव स्वभाव का स्थायी भाव है | इसलिए ब्राह्मणवाद को गाली देने में समय न गवाँकर इसका कोई सार्थक उपयोग करने की बात सोची जानी चाहिए |    

कोई भी आये


जिसको आना था
जब वही नहीं आया ,
तब कोई भी आये |

विचारणीय


[ विचारणीय ]
 १ - राजनीति तुलनात्मक प्रतियोगिता का खेल है - समय सापेक्ष | इसमें निरपेक्ष और शाश्वत कुछ नहीं |

२ - हालत यह हो गयी है कि अब तो धर्म के बगैर धर्मनिरपेक्ष [ secular ] भी नहीं हुआ जा सकता !

३ - ठीक बात है , जिसको राज्य करना हो वह मांस - मछली खाए , बन्दूक चलाये , हिंसा करे | हम तो चींटी भी नहीं मारते |

४ - जिसकी तरक्की रोकनी हो ,आगे न बढ़ने देना हो , उसे राष्ट्रीयता का वास्ता देकर उकसा दो कि वह मात्र अपनी मातृभाषा में पढ़े और अंग्रेज़ी से नफ़रत करे |

५ - सच तो ज़रूर बोलते हैं हम , बीएस उन कुछ स्थितियों को छोड़कर जहाँ हमें अपनी कमजोरी या मजबूरी स्वीकार करनी होती है |

६ - अल्लाह सिर्फ ईश्वर का नाम नहीं , किसी उच्चतम जीवन लक्ष्य और सम्बल-आश्रय का भी तो नाम है !

७ - एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी - कर्मचारी का मुकाबला बड़े से बड़ा नेता, साधु संत भी नहीं कर सकता |

८ - अंग्रेज़ी राज्य इससे बेहतर था , यह कहना ठीक नहीं है | बल्कि गुलामी की दशा में यह देश स्वयं ही ठीक रहता है , ऐसा कहना ज्यादा सही है |

सोमवार, 25 जून 2012

गेहूँ के साथ



१ - खूब लगाता
मन नहीं लगता
लेकिन यहाँ |

२ - ख़ैर मनायेगी
कब तक बकरी
बकरे की माँ ?

३ - साथ निभाया
जहाँ तक हो सका
नहीं तो नहीं |

४ - पछ्ताऊँगा
पछताना तो मुझे
होगा ही होगा
हर हाल में
मैं जीतूँ या हारूँ
इस जंग में |

५ - बुरा लगता
औरतों का सजना
भला क्यों मुझे ?

६ - इतना बड़ा
कठोर कालखण्ड
बड़ा सताता |

७ - क्या - क्या होता है
यवनिका के पृष्ठ ( पीछे )
तुम क्या जानो ?

८ - गेहूँ के साथ
घुन भी पिस गया
यही समझो |

शनिवार, 23 जून 2012

कुछ पाना तो है

[ उद्गार - कविता ]
* कुछ पाना तो है 
कुछ पाने की इच्छा तो है ,
लेकिन किसी के मुँह से 
निवाला छीन कर नहीं |

शुक्रवार, 22 जून 2012

दलितों का धन

* मैं ब्राह्मणवाद पर अनायास ही सोचने लगा जब कि मैं ब्राह्मण नहीं संभवतः शूद्र की श्रेणी में आता हूँ | फिर जब जन्मना श्रेष्टता न्यूनता नहीं मानता तो नहीं मानता | यह जिद है हमारी | भले  संस्कारगत या पालन पोषण , शिक्षा दीक्षा में विविधता के कारण अंतर , अथवा यूँ हर व्यक्ति की पृथक इयत्ता और प्राकृतिक विशिष्टता को स्वीकार करता हूँ | लेकिन यह भी मानने में हमें परेशानी है कि मुसलमान - दलित -ब्राह्मण के बारे में सोचने से पहले स्वयं  मुसलमान - दलित -ब्राह्मण हो लिया जाय | यह तो लोकतान्त्रिक विचारशीलता के ही विपरीत हो जायगा | तो अब सोचना है कि  ब्राह्मण को पूज्य मानने का क्या कारण हो सकता है ? एक तो यह समझ में आता है कि उसने अपने जिम्मे केवल पढ़ने- पढ़ाने का काम रखा , और ऐसे लोग स्वभावतः परजीवी होते ही हैं | जैसे आज भी विद्यालयों - विश्व विद्यालयों के अध्यापक , कवि -कलाकार क्या करते हैं ? दूसरे यह कि वह कभी राजा नहीं नहीं बना | परोक्षतः उसने अपने ज्ञान -विज्ञान से राज्य शासन को प्रभावित , किंवा संचालित भले किया , पर राजा तो क्षत्रिय ही रहा | चाणक्य का उदाहरण ज्वलंत है | तीसरे उसने कभी धन नहीं बटोरा | पुरानी किसी भी कहानी में धनी बाभन का उल्लेख नहीं मिलता | धनाढ्य सेठ वणिक-बनिया ही होता है पर " किसी गाँव में एक गरीब ब्राह्मण " ही रहता मिलेगा | प्रहार कटु हो जायगा यदि कोई कह दे कि वह दलित का पैर छूने को तैयार है यदि दलित यह घोषणा कर दे कि " दलितों का धन केवल भिक्षा " | यह मामूली बात नहीं थी कि उसने अपने लिए भिक्षावृत्ति सुनिश्चित की , न उसने एन जी ओ बनाकर या संतई का ट्रस्ट बनाकर करोडो की संपत्ति जमा की | उस ब्राह्मण की आज के ब्राह्मण से तुलना अनावश्यक है | अब ब्राह्मण भी मुख्य धारा में आ गए हैं , और तबसे धनी- मानी बनने लगे हैं जबसे सर्वजन प्रयोग करके उन्हें सत्ता , शासन और राज्य में सीधे बिठाया गया | निस्संदेह सामान्य ब्राह्मण अब भी कुछ सनातन संस्कार के वशीभूत अपने को थोड़ा अनुचित गुमान में रखता है , पर यह एक सामान्य मानुषिक दोष है जिसका परिमार्जन समय के साथ होना ही है | उसे तो मिटना ही है और सामान्य नागरिकता की श्रेणी में आना ही है | लेकिन यदि कोई वर्ग या समुदाय अपनी श्रेष्ठता की सीढ़ी विशेष तौर पर  बुलंद करना चाहता है तो क्या उसके लिए उचित न होगा वह  इसका सूक्ष्म अध्ययन और अनुकरण करे कि आखिर गरीब , दीन- हीन ब्राह्मण किस तरह  , एक- दो , दस -बीस साल नहीं सदियों तक समाज का सिरमौर बना रहा ? उससे कुछ सीखें तो आप भी वैसा बन सकते हैं , आप भी अब वेद पढ़ सकते हैं कोई नया मनुस्मृति गढ़ सकते हैं [ गढ़ा ही है संविधान ] | आप विशिष्ट ब्राह्मण नहीं बनना कहते तो आप भी सामान्य नागरिकता के पायदान पर आइये , सबको समान समझिये | वर्ना ब्राह्मण और आधुनिक लोक -मानव के बीच क्या अंतर रह जायगा ? इस लक्ष्य के लिए अब केवल उसे गाली देने या चिढ़ाने से तो कुछ हासिल होने वाला नहीं | मायावती जी ने उसका साथ लेकर शासन करना सत्य    सिद्ध कर ही दिया , और आश्चर्य क्या कि महान आंबेडकर ने अपने आह्वान में ' शिक्षित बनो ' को सर्वोच्च स्थान दिया ?
अंत में एक महाप्रश्न अपने आप से है - " यदि ब्राह्मण हमको अपने बराबर नहीं समझता था , तो क्या हम ब्राह्मण को अपने बराबर समझते हैं ? "
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एक  साहित्यिक बदमाशी जैसा कुछ सूझ रहा है | मैं ब्राह्मणों की उपमा मुग़ल बादशाह बाबर से देना चाहता हूँ | बाबर भी टोपियाँ सिलकर और कुरान का हस्तलेख करके अपनी आजीविका चलाता था , पर अपने शासन में बहुत कठोर था | उसी प्रकार ब्राह्मण भी अपने लिए धन केवल भिक्षा रखता था , पर सामाजिक नियमों में बहुत कठोर था  | वैसे भी यह इसके बारे में प्रसिद्ध है कि हिन्दू दूसरों के लिए दयावान पर अपने लोगों , मसलन दलितों के प्रति बहुत निर्मम है |  

नॉन -इस्लामिक स्टेट

 * तो क्या हिंदुस्तान में सिर्फ मंडल - कमंडल , अगड़े - पिछड़े , दलित -ब्राह्मण , भाजपा - कांग्रेस की ही राजनीति चलेगी ? इससे देश कहाँ जायगा ? यह तो ' दूसरी -तीसरी गुलामी " की ओर जाने जैसी बात होगी , यदि हम केवल अपने देश में नई - नई समस्याएँ जन्म देकर उसमे उलझते रहे और अपने आगे -पीछे , दायें -बाएँ , ऊपर -नीचे , अडोस - पड़ोस कुछ दीन -दुनिया की ओर नहीं देखेंगे ? आखिर देश भी कोई चीज़ है या नहीं ? देश रहेगा तभी आरक्षण - संरक्षण , आर्टी-पार्टी रहेगी | जिन्ना गलत थे तो भी उनके पीछे खड़े होकर तमाम मुसलमान विभाजन के पक्ष में डायरेक्ट एक्सन तक पर उतारू हो गए और जिन्ना के सिद्धांत को व्यवहृत करके पाकिस्तान बनाया | अब , जब हम उसी जिन्ना को आधार बनाकर भारत में नॉन -इस्लामिक स्टेट चाहते हैं तो हिन्दू बगलें झाँकने लगता है क्योंकि उसे नपुंसक न भी कहें तो नैतिक रूप से नासमझ और कमज़ोर तो कहा ही जायगा | और हम जानते हैं कि अंदरूनी विभाजन उसका कारण है, और वह सच है  | लेकिन आश्चर्य है कि वह और किसी न किसी प्रकार का  विभाजन हर धर्म में है पर उसका रोना वे हर समय नहीं गाया करते | मौक़ा पड़ने पर वे एक हो जाते हैं | और यह ध्यान देने और याद रखने वाली बात है कि भारत हिन्दू है तभी उसमे आरक्षण है | और यह उन वर्गों तक पहुँचने जा रहा  है जो हमेशा शासक वर्ग रहा है | यदि यह हिन्दू नहीं रहा तो यह सब कुछ नहीं रहेगा | क्या पाकिस्तान -अरब -ईरान -ईराक में आरक्षण है , इसका पता लगाना पड़ेगा | अलबत्ता यहाँ  आज दलित  - मुस्लिम एकता की मुहिम और राजनीति भारत राज्य पर फिर से  कब्ज़ा करने के तहत चलायी जा रही रणनीति है | जब कि ज़मीन का थोड़ा सा भी अनुभव रखने वाला जन यह यथार्थ जानता है कि शहर का उच्च वर्ग छोड़ दीजिये , गाँव का गरीब मुसलमान भी हमारे दलितों के प्रति वही  हेयभाव रखता है , जैसा कि ब्राह्मणों के दिलों में होता बताया जाता है , या मान लें कि होता है | फिर भी यह कोई कैसे भूल जाता है  कि भारत के सभी वर्ण किसी भी तरह एक साथ रहते तो आये थे , और उसमे बाह्य जातियाँ - मुस्लिम -ईसाई- पारसी भी शामिल होते रहे | लेकिन मुसलमान आज़ादी की भनक मिलते ही भारत से छटक कर अलग हो गाया  जहाँ उसे इस्लामी संप्रभुता मिलनी थी ? नहीं रह सके वह अपनी हनक , अपनी अलग संस्कृति और सत्ता के बगैर लोकतान्त्रिक भारत में | ठीक है उस समय नेहरु का दबदबा था , पर गुंजाइश तो थी लोकतंत्र में उनके शासन के बारी की या उसमें हिस्सेदारी की , जिसे उन्होंने गवाँ दिया | #

डी एन ए टेस्ट


[ gon -zo ]

हाइकु=
* तन से सब
मन से कुछ नहीं
मानता हूँ मैं |

* न गर्मी ठीक
कोई मौसम नहीं
न जाड़ा ठीक |

* विशालता से
कम कुछ भी  नहीं
चाहिए मुझे |

कविता =

* हाँ यार ,
लिखना तो चाहिए ऐसा
की दुनिया हिल जाए
पूँजीवाद धूल में मिल जाए
सरकारें धराशायी हो जाएँ
जनवाद का बोलबाला ,
साम्राज्य स्थापित हो जाए |
हाँ यार '
लिखता तो हूँ ऐसा
की कोई पुरस्कार मिल जाए |
##

टीप = डी एन ए टेस्ट
* एक उदाहरण याद है अभिनेत्री नीना गुप्ता का | उन्होंने स्वयं अपनी मर्जी से संतान - प्राप्ति की , और पुरुष का नाम नहीं बताया | उनके अनुसार यह पर्याप्त था कि वह उसकी माँ है , उसने अपनी ज़िम्मेदारी पर बच्चा पैदा किया है , इसमें किसी पुरुष - बाप के नाम की ज़रुरत क्या है ? वह ही माँ -बाप हैं | यह अतीव साहस का काम था |
दूसरा उदाहरण पौराणिक है | बिना बाप के नाम के पुत्र सत्यकाम और उसकी माँ का | लोक - उलाहनों से प्रेरित सत्यकाम ने अपनी माँ से पूछा - माँ , मेरे पिता कौन हैं ? साहसी और सत्यवादी  माता ने दृढ़तापूर्वक  कहा - " बेटे मैं कई ऋषियों की सेवा में रही , तू किसका पुत्र है , मैं बता नहीं सकती ?" यही बालक सत्यकाम सत्यवाद का महान नायक बना , और पुराण पुरुष | प्राच्य विज्ञानं का गुण गाने वाले भले कहते रहें कि उस ज़माने में पुष्पक विमान था , यह था -वह था , लेकिन निश्चय ही उस काल - अवधि तक डी एन ए टेस्ट की जानकारी विज्ञानं को नहीं थी | और यह भी कि हर औरत नीना गुप्ता और सत्यकाम की माँ नहीं हो सकती |

गुरुवार, 21 जून 2012

Single/Double Haiku


* ठीक से देखो 
नज़र नीची करो
ज़मीन देखो |

*कुछ चीज़ें तो
बदलनी चाहिए
मसलन क्या ?
हमारी सोच
जन - मानसिकता
बदलेगी क्या ?

11- हाइकु



१ - पर्याप्त होता
औरत का होना ही
किसी घर में |

२ - बच्चे रहते
घर भरा रहता
आनंद पूर्ण |

३ - बिलावजह
नींद हराम किया
उनके पीछे |

४ - होना चाहिए
ईश्वर है नहीं तो
नया बनाओ |

५ - मुझे क्या पता
प्रेम किसे कहते
करना जानूँ |

६ - नाम कमाना
क़ुरबानी माँगता
हलवा नहीं |

७ - कोई न कोई
पावरफुल होगा
वह कोई हो |

८ - कोई आदमी
अपनी बराबरी    
नहीं चाहता |

९ - चिंतन कर्म
बिल्कुल आसान है
शुरू तो करो |

१० - मैं मूरख था
मैं मूरख रहूँगा
मैं मूरख हूँ |

११ - मिलता भी तो
कब तक मिलते
जीवन छोटा |

बुधवार, 20 जून 2012

कथनानुसार


१ - बीस रुपया रोज़ पाने वाले गरीब विधायक -सांसद बनें यह तो संभव नहीं है , लेकिन मेरी आकांछा आकांक्षा है कि सांसद - विधायक बीस रुपया रोज़  वेतन लें |
२ - अजीब बात है कि असली 'व्यक्ति' का उदय तब होता है जब उसका नकली ' व्यक्ति ' तिरोहित हो जाता है |
३ - यदि हिंदुस्तान को तरक्की तो क्या , जिंदा भी रहना होगा तो उसे यह भूलना होगा कि कोई व्यक्ति मात्र पैदा होने से छोटा या बड़ा होता है |
४ - किसी के कहने से नहीं , जब मेरी नानी मरीं , तब मुझे विशवास हो गया हम सबको , सारे मनुष्यों को मरना होगा |
५ - बूढ़ों को भी अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए |
६ - ' आम आदमी ' वह है जिसे अपने आम ज़रुरत के कार्यों के लिए नौकर , मजदूर न लगाना पड़े |
७ - ईश्वर को delete  मत करो तो उसे recycle bin में तो डाल ही दो |
८ - मैं स्वर्ग को न तो जानता हूँ न मानता हूँ , लेकिन यदि कहीं स्वर्ग हुआ और उसमे मुझे जाना ही पड़ा , तो चला जाऊँगा |
९ - ईश्वर को छोड़ अपने ' आदमी ' की शरण में आइये |
१० - बड़ी ज़िम्मेदारियाँ उतनी ही बड़ी नैतिक ऊँचाइयों के साथ निभाई जानी चाहिए |
११ - जो अपने आपको बहुत बुद्धिमान समझते हैं , वे सबसे अधिक मूर्ख होते हैं |
१२ -  The world is made up of ‘differences’ . Once you forget it , you will  be in a candid tension .

हिंदुस्तान - पाकिस्तान एक करो

अभी समय है , हिंदुस्तान - पाकिस्तान एक करो , चाहें जरदारी को भारत का राष्ट्रपति बना दो | दोनों देशो की समस्याएँ , परेशानियाँ एक हैं अंदरूनी भी , बाहरी  भी  | कहने दीजिये किसी को , जब बिल्कुल ठीक से बँटवारा नहीं हुआ , हो ही नहीं सकता था , कि सारे हिन्दू हिंदुस्तान  में - सारे मुस्लिम पाकिस्तान में , तो फिर यह माना जाना चाहिए कि दोनों का रहन सहन , संस्कृति एक ही है | और जो नहीं है तो भी वे अपनी अपनी मान्यताओं के साथ एक साथ सदियों से रहते आये हैं | इन्हें एक साथ रहने का पूरा अनुभव - अभ्यास है | यह काम जितना जल्दी हो जाय उतना अच्छा | भारतीय मानस इस बँटवारे को स्वीकार नहीं कर पाया है , न कभी इसे पचा पायेगा | यदि ऐसा न हुआ तो पाकिस्तान में हिन्दुओं की दशा अच्छी नहीं होगी , है भी नहीं | उसी प्रकार भारत में मुसलमान भी ढंग से नहीं रहने पायेंगे , चाहें सच्चर कमेटी लागू कर लीजिये चाहें आठ प्रतिशत आरक्षण | कैसे भूल जायेगा हिंदुस्तान जिन्ना की बात कि हम अलग हैं और एक साथ नहीं रह सकते , और इसे पाकिस्तान ने अपने यहाँ हिन्दुओं के साथ वही व्यवहार करके दिखा भी दिया ? यदि जिन्ना की बात गलत करनी है ,अल्लामा इकबाल का कौमी तराना यदि सही ठहराना हो , तो फिर एक होकर दिखाओ | अब इससे कोई लाभ नहीं कि बँटवारे में जिन्ना - -इकबाल का दोष ज्यादा था या गाँधी - नेहरु का | एक होने पर सारा मलाल मिट जायेगा | यह तो तय है कि  जनता का तो कोई दोष नहीं था ? उसने बहुत सह ली बँटवारे की त्रासदी | अब वह एक होना चाहती है | ऐसी राजनीतिक इच्छा [Political Will ] जिसके पास हो वह अब अगले चुनाव में उतरे | शेष तो लफ्फाजी बहुत हो चुकी |

मंगलवार, 19 जून 2012

लखनऊ के अन्य स्कूल


 लखनऊ के कुछ अन्य स्कूल =
------------------------------- लम्बे समय तक जब तक चन्द्र दत्त तिवारी जी D -10 /5 , पेपर मिल कॉलोनी  में थे , तब तक वह एक स्थायी विचार केंद्र के सामान रहा औपचारिक / अनौपचारिक रूप से | इसके अतिरिक्त उन दिनों जो केंद्र कार्य रहे थे मेरी स्मृति के अनुसार एक तो था माह के दो शनिवार चलने वाला नवचेतना केंद्र , अशोक मार्ग पर गोष्ठी जिसमे तमाम रिटायर्ड आई ए एस , आई पी एस , न्यायाधीश हैं , और जो अब भी नियमित चल रही है , जैसा कि अख़बार से पता चलता है , क्योंकि उसे हम लोगों ने पहले ही त्याग दिया था , जब डॉ एम एम एस सिद्धू से शिकायत  करने के बाद भी बात नहीं बनी | एक हर्ष नरायन जी का था नरही में उनके अपने घर पर , जिसका नाम लखनऊ अकादमी जैसा कुछ था | विश्वविद्यालय में कुछ थे / रहे होंगें क्योंकि वहाँ विचार केंद्र बनते बिगड़ते रहते है अकादमिक सेसन के साथ जैसे कभी ' सोच - विचार ' भी कोई था | अम्बरीश का थिंकर्स फोरम था और ज्यादा याद नहीं | हाँ जब तक राजा साहेब कोटवारा [फिल्म निर्माता मुज़फ्फर अली के पिता] जिंदा थे उनकी ह्युमनिस्ट  यूनियन में भी यदा - कदा गोष्ठी हुआ करती थी | और तो अन्य औपचारिक सभा- सेमिनार प्रेस क्लब , इप्टा ऑफिस , जय शंकर सभागार आदि स्थानों पर हुआ ही करते थे | पार्टियों और संस्थाओं की भी अपनी सभाएँ थीं | एक महान पाठक और पत्र लेखक स्व के.के .जोशी के घर भी हम लोग वक़्त ज़रुरत बैठक कर लिया करते थे | बाद में अनुराग बाल केंद्र , निराला नगर में चला | उधर लखनऊ मोंटेसरी में शिव  वर्मा जी भी सक्रिय थे | फिर जितना मैं जानता हूँ, या मुझे याद आता है , या जिनमे मैं शरीक होता था उन्ही को तो बता पाऊँगा | अन्य तमाम चलते रहे होंगे , जो उन्हें जानते हों वे जानें | #

Lucknow School of Young Thoughts


साइंटिफिक टेम्पर से साइंटिफिक टेम्पर तक : Story of Lucknow  School of Young  Thoughts   =============================
हुआ यूँ की जिस विभाग में मैं नौकरी करता था ,फील्ड कर्मी होने के नाते मुझे अपने अधिकारी के निवास पर जब -तब जाना पड़ता था , और वह महानगर में रहते थे | एक दिन वहां से लौटकर बहुत थका हुआ मैं पास के फातिमा अस्पताल के सामने ढाबे पर चाय पी रहा था | बगल में ही तख्ते पर कुछ और लोग बैठे थे  | मैंने सुना एक व्यक्ति अपने साथी से कह रहे थे कि हिंदुस्तान में साइंटिफिक टेम्पर संभव ही नहीं है | मैं चौंक गया ,आलस्य फटाफट दूर हो गया , क्योंकि यह मेरा प्रिय चिंतन और कर्म का विषय था | मैंने उनकी ओर परिचय का हाथ बढ़ाया और चर्चा में शामिल हुआ | वे थे श्री कृष्ण मुरारी यादव , यादव भवन के सबसे अग्रज और उनके मित्र श्री राय साहेब , कवि | इसी बीच संयोग से पता नहीं कहाँ से रिक्शे से प्रमोद कुमार श्रीवास्तव उधर से गुज़र रहे थे | मैंने उन्हें फ़ौरन रोका और खुशखबरी बताई | शुभ मिलन प्रारंभ हुआ | हम यादव भवन गए |
यादव जी ने बंगाल के शानिवारेर गोष्ठी की परंपरा  का इतिहास बताया और यह भी कि Lucknow  School of Young  Thoughts  उसी तरह से चलाने की उनकी मंशा थी | दोनों इतिहास के आदमी थे , सहमत हो गए = प्रत्येक शनिवार सायं ५ बजे स्थान यादव भवन , महानगर में मिल बैठने का सिलसिला शुरू हो गया | सदस्य बहुत नहीं थे पर बढ़ते गए | कोई बंधन न था पर इसका होना निश्चित होता था | उसके कुछ चेहरे थे हरजिंदर , मुकेश त्यागी , पुनीत टंडन ,विपिन त्रिपाठी  , आलोक, मैं और प्रमोद जी | हम पर तो उन दिनों इसका नशा सवार था | कभी कभी आने वालों में थे अवधेश खरे , भुवनेश मिश्र, राजीव हेमकेशव | अब इसके आगे हरजिंदर भले से बता सकते हैं क्योंकि वे अत्यंत  नियमित थे और विषयों के समझदार भी | लेकिन शुरू में बिना विषय के अनौपचारिक चर्चा ही होती थी पर होती गंभीर और दिमाग की भुजिया बनाने वाली थी | ज्यादातर तो  सूत्रधार होते यादव जी और प्रमोद जी  पर बहस में सभी खुल कर भाग लेते थे, इसलिए हमें बहुत उपयोगी और रोचक लगती थी  |
तभी एक दुर्घटना  हो गयी | मेरी एक वन लाइनर पर क्रुद्ध होकर भुवनेश जी ने कह दिया कि मैं इनके हाथ का छुआ पानी भी नहीं पियूँगा | सभा सन्न हो गयी , यह बात लोकतान्त्रिक  मूल्य के विपरीत थी | मैं तो खून के आँसू पी गया { अछूतों की दशा का मन में अनुमान -अनुभव करते  }, लेकिन युवा -उत्साही प्रमोद जी को चैन कहाँ ? तब  उन्होंने तय किया  विषय को लेकर  चर्चा करने  की और लिखित परचा पढ़ने की , जिससे विषयांतर न होने पाए | नारी मुक्ति , धर्म निरपेक्षता -- आगे याद  नहीं | इस पर प्रमोद जी प्रकाश डालें तो ही ठीक होगा | बहुत दिनों तक ऐसा चलता रहा , पर किसी दिन यादव भवन के पड़ोसी घोसियों से रंजिश में स्कूल में व्यवधान पड़ गया [ इसके समर्थ गवाह अवधेश जी हैं , मैं उस दिन  गाँव गया था ] |
 लेकिन मैं मेंढक तोलने से कहाँ बाज़ आता ? यादव जी से मुलाकातें तो होती ही थीं , तो उनकी दुकान विनायक गैस सर्विस पर ही लोग मिलने लगे , यद्यपि वह ऊर्जा अब न थी | वहीँ पर प्रगतिशील लेखक संघ के भी लोग आये | किसी से भी मिलना , वार्ता करनी होती तो उसके लिए हमारे पास यही जगह थी , जिसे बौद्धिक कह सकते थे | यहीं पर हैदराबाद एकता के सेकुलर सामाजिक - राजनीतिक कार्यकर्त्ता कुद्दूस भाई भी आये | उनसे सबकी लम्बी चर्चा हुयी | प्रमोद जी वह सब अच्छी तरह समझते थे | मुझे राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में कोई रूचि न थी, मैं उसका  आध्यात्मिक  पक्षपाती  था | सो मैंने नादानी में पूछ लिया -- " लेकिन कुद्दूस भाई ,  साइंटिफिक टेम्पर का क्या होगा ?" और उन्होंने मुझे सेट बैक दिया - " इसका अभी समय नहीं आया है " | अतः वह केंद्र भी बंद हो गया | तदन्तर मैंने तिवारी [सी डी] से उनके निवास पर परमिशन चाहा  |  
उन्होंने  पहले तो 'हाँ' कह दिया पर दुसरे  दिन शर्त लगा दी की किसी उद्देश्य के तहत बैठो तो बैठो , नहीं तो नहीं | तब सेकुलर सेंटर की भूमिका बनी और वह बना भी , जिसमे मुख्य  भूमिका निभाई के .के .जोशी ,रूपरेखा वर्मा , प्रमोद कुमार ,आलोक जोशी  और कहना चाहिए जय प्रकाश ने जिन्होंने बड़ी मेहनत की | प्रभात  जी भी शायद तब तक मैदान  में आ गए थे | थोड़ा अपने योगदान से भी इन्कार नहीं करूँगा , क्योंकि मैं  संयोजक चन्द्र दत्त तिवारी जी का एकमात्र सचिव था | उसे विस्तार से आलोक ही बता सकते हैं क्योंकि वह उस समय सबसे युवा -सक्रिय सदस्य थे , और वह और प्रमोद जी राष्ट्रीय सम्मलेन के अवसर पर रात रात भर बिहार से आये और आयीं  प्रतिभागियों से बहस रत रहते थे, और अवसर मिलने पर मुंबई से आई पत्रकार ज्योति पुनवानी के साथ | उसकी अलग कहानी है जो आडवानी की रथ यात्रा के साथ अंत को प्राप्त हुई | आगे चलकर प्रमोद जी यादव जी के साथ 'लखनऊ एकता रपट '  निकालने लगे और हम रूपरेखा जी के साथ ' नागरिक -धर्म समाज ' में सक्रिय हुए |  लेकिन मेरी फितरत समाज कार्य में कम विचार कार्य में ज्यादा थी , जिसके लिए हमारे पास जगह न थी | सो , मैंने  फिर बाँध छेंक कर रूपरेखा जी और राकेश [ इप्टा] को यादव जी के निवास पर ले जा कर गोष्ठी प्रारंभ करनी चाही | चौथे सहभागी के रूप में उपस्थित हुए प्रमोद जी | विषय साइंटिफिक टेम्पर ही था | अन्धविश्वास पर चर्चा छिड़ी तो पता नहीं क्यों बात बिगड़ गयी | यादव पक्ष यह सिद्ध करना चाह रहा था कि पोलियोड्रॉप भी तो अन्धविश्वास है , या ऐसा ही कुछ | फिर तो वहाँ दूसरी बैठक होने की नौबत नहीं आई , मैं खिसिया कर रह गया जो कि चाहता था कि एक जगह मिलने -बैठने की गुंजाइश बने | फिर तो मैं , निराश hibernation  period में आ गया | कभी- कभी यादव जी के घर चला जाता था , जो  तमाम शायरों को कलमकारान - ए - लखनऊ के नाम से हर माह के ग्यारह तारीख को नशिष्त- दरबार  चलाते थे , जो उनकी मृत्यु तक चला | 'नागरिक -धर्म समाज' [जिसमे मेरी जान थी] का कायाकल्प " साझी दुनिया "  में हो गया , जिसे वीसी पद से रिटायर होकर रूपरेखा जी यशपाल जी के घर पर अवस्थित कार्यालय से अविराम चला रही हैं | वहाँ चल रही हर वृहस्पतिवार सायं चार बजे की बैठकों में कभी जाना हो ही जाता है | पर अब कहीं कुछ नहीं बोलता, अनबोलता मशीन हो गया हूँ मैं | मैं समझ गया हूँ कि  मैं अप्रासंगिक हो चूका हूँ , शायद सदा ही रहा था , और वही मेरी असफलता का कारण | अब  मैं कुछ फुटकर- स्वतंत्र मित्रों और कविता - कहानी - पत्र लेखन -ब्लॉग लेखन और फेस बुक में अपना मनोवांछित लिख -पढ़ -कह कर  मस्त रहता हूँ | यादव जी स्वर्ग सिधार गए [ वह उसे मानते न थे] , प्रमोद जी विश्वविद्यालय में हेड हैं ,किताबें लिखने और अपने अकैदमिक्स में मशगूल हैं , आलोक मुंबई गए , हरजिंदर दिल्ली | पुनीत की दर्दनाक मौत हो गयी सपत्नीक | एक दिल  के टुकड़े हज़ार हुए , कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा |
 तो यह थी किस्सा - कोताह Lucknow School of Young Thoughts की कहानी, Scientific Temper से शुरू  , Scientific Temper पर समाप्त | लेकिन  हाँ , यंग का अर्थ विचारकों की जवानी से नहीं विचारों के जवानी से था | यह उसकी विशिष्टता भी थी और , मेरे ख्याल से यही उसकी कमजोरी भी साबित हुयी | यादव जी तो नवीनता की रेंड ही मार देते थे और कुछ अपने ख़ास बने - बनाये विचार इस तरह आगंतुक पर लाद देते थे , कि वह फिर दोबारा आने का नाम न लेता | और हम भी कुछ नया कहने के उत्साह में कुछ ऐसा कह जाते जो लगभग निरर्थक और अग्राह्य होता | तिस पर भी दुःख इस बात का नहीं है कि स्कूल बंद हो गया , शोक यह है कि सचमुच नया, प्रिजुडिस विहीन , निर्वैयक्तिक , स्वार्थ रहित मानुषिक  विचार प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई जैसा कि स्कूल का स्वप्न था [ ऐसा मुझे लगता है ] |
 यह सारी कथा अस्सी और कुछ नब्बे की दशक को छूते हुए है | इतनी पुरानी यादें लिखने में कोई त्रुटि हो गयी हो , कुछ छूट  गया हो और मेरा लेखन व्यक्तिगत होना तो निश्चित है , उसके लिए यह अकिंचन हमेशा क्षमा प्रार्थी रहेगा | #  

सोमवार, 18 जून 2012

दिलफेंक


[ कवितायेँ ]
१- कबीर चदरिया 
मैं महसूस करता हूँ 
एक चादर अपने ऊपर ,
अपने शरीर के ऊपर |
नीचे नहीं किनारे नहीं , 
न सिर के पीछे 
न  पाँव के नीचे 
बस केवल ऊपर 
छाया हुआ , लहराता 
मेरे  ऊपर आक्षादित |
मैं हर तरफ से मुक्त हूँ 
बस एक  आभास भर है -
मेरे ऊपर एक चादर है |
वह चादर मेरी नहीं है 
जो मुझे सृष्टि से मिली  होगी 
वह चादर कबीर की है ,
मैं  चादर को नहीं जानता 
लेकिन कबीर को पहचानता हूँ 
मेरे ऊपर कबीर की चदरिया है ||
-------
२ - अपना राजा 
मैं अपना राजा 
उसे बनाना  चाहता हूँ 
जो मुझसे दूर हो
मेरे  घर - परिवार
सम्बन्ध  का न हो 
जिससे वह पक्षपात न कर पाए 
तभी वह शासन कर पायेगा /
तभी मैं उससे शासित हो पाऊँगा |
मैं दलित को राजा बनाना -
मानना चाहता हूँ 
क्योंकि मैं दलित नहीं हूँ 
मेरा कोई संबंधी दलितों में नहीं है |
--------------
३ - क्षणिका  
आदमी 
अपने से 
पार पाए ,
तब न कुछ 
कर पाए ?
------------
४ - बिस्तर 
मुझे ख़ुशी है कि मैंने 
अपना बिस्तर  बाँध लिया है 
समान सब पैक कर लिया है ,
कुछ भी इधर - उधर 
बिखरा  नहीं रह गया है 
कमरा भी साफ़ कर दिया है 
और सामानों को इकठ्ठा 
एक जगह रखकर , तैयार होकर 
किनारे कुर्सी पर बैठ गया हूँ 
बस  ऑटो वाले के आने भर की देर है |
---------------
५ - आटा गीला 
गरीब हो , मतलब गरीबी है तो
आटा  थोड़ा ही गून्थो
ज्यादा तो कनस्तर में ही 
पड़ा रहने दो ,
क्योंकि आटा गीला तो 
होना ही है , गरीबी में !
यदि अलग कुछ आटा न हुआ 
तो उसे कैसे सुखाओगे , माडोगे
कैसे रोटी बनाओगे ?
---------
६ - सत्यवान 
तुम मुझे क्यों 
खींचे लिए जा रहे हो ?
मैं कोई सत्यवान नहीं जो 
कोई सावित्री मुझे तुमसे 
छुड़ा ले जायेगी ,
वस्तुतः मैं तुम्हारे साथ 
जाऊँगा ही नहीं 
मेरे पास इतना काम है  कि 
मुझे मरने की फुर्सत नहीं |
----------
७ - दिलफेंक 
यदि तुम दिल -
- फेंकना ही चाहते हो 
तो फेंक दो 
वह किसी भी चेहरे पर जाकर 
फिट हो जायगा 
यदि तुम दिलफेंक हो तो !
जैसे एन जी ओज़ के बारे में 
प्रचलित है कि 
किसी तरफ कंकड़ फेंको 
वह किसी एनजीओ पर गिरेगा |
अब यह बात और है कि 
न एनजीओ विश्वसनीय हैं 
न दिल |
---

रविवार, 17 जून 2012

बोलो बोलो , जल्दी बोलो


[ कविता ]
बोलो बोलो , क्या बोलते हो 
जल्दी बोलो 
प्रेस पर कोई प्रतिबंध नहीं है
कोई इमरजेंसी नहीं लगी है 
जितना चाहो उतना बोलो 
खूब अख़बार हैं और टी वी चैनल 
तुम्हारी बातें दूर दूर तक 
पहुँचाने के लिए 
फिर क्यों नहीं बोलते ?
बोलो कि तुम्हारी बहन बेटी को 
गुंडे उठा ले गए और 
क्या क्या करके उसकी लाश 
सड़क किनारे छोड़ गए हैं ,
बोलो कि अपने लड़के की 
पढ़ाई के लिए डोनेशन -केप्शन 
तुम नहीं दे सके ,
चीखो कि तुम्हारे माता -पिता 
मँहगे इलाज के अभाव में मर गए ,
चिल्लाओ कि मँहगाई की मार से 
घर गिरवी  पड़ा है | 
और यदि यह हाल तुम्हारा नहीं है 
तो अपनी ही हाँको - बघारो 
कि तुम बड़े सुख - चैन , अमन से हो |

गुरुवार, 14 जून 2012

मेरी नज़र में वह घर है


एक ज़माने से मुझे दो अशआर बहुत पसंद हैं | वस्तुतः ,ये मेरे जीवन मन्त्र बन गए | इन्हें मैं " प्रिय संपादक " में बाटम लाइन लगाता था | इनमे से एक तो अहसान दानिश का है , दूसरे का पता नहीं | कोई मित्र जानते हों तो कृपया बताएँ |
१ - ज़माना बदले न बदले , खयाल तो बदले ,
    न इन्कलाब सही ,   ज़िक्रे -इन्कलाब  तो हो |

२ - मेरी नज़र में वह घर है  जहाँ चिराग़ नहीं ,
     न होगी जश्ने - बहाराँ की इबादत मुझसे |

बुधवार, 13 जून 2012

dushman


बुलाया था , भला कैसे न जाते ,
मुझे मालूम था दुश्मन हैं मेरे |
or -
बुला लेते हैं तो कैसे न जाऊँ ,
जानता हूँ मेरे दुश्मन हैं वह |

मंगलवार, 12 जून 2012

खुशवंत सिंह

कोई मानता नहीं , वरना मैंने तो सुझाया था कि भारतीय संस्कृति के अनुसार  बूर्हों का आदर करते हुए एक दर्ज़न अति बूढ़े भारतीय नागरिकों को चुन कर राष्ट्रपति भवन में ठहरा लिया जाय | वे किसी भी धर्म -जाति -लिंग -संप्रदाय -पार्टी -प्रदेश के हों | आयु क्रम से ज्येष्ठता  के अनुसार , या एक के दिवंगत  होने के बाद दूसरे को , राष्ट्रपति  बनाते रहा जाय | उनकी सेवा सुश्रुषा , खान पान-इलाज सुनिश्चित हो जायगी और वे कई देशों की सभी धर्मों के पवित्र स्थलों की  तीर्थयात्रा का पुण्य- लाभ उठा कर सरकारी खर्च पर  स्वर्ग जाना  भी सुनिश्चित कर  सकेंगें | मेरी अतिरिक्त लालच यह भी थी कि  इससे मेरा प्रिय पत्रकार लेखक , राजनीति से वाकिफ अराजनीतिक शतकोन्मुख आयु का व्यक्ति खुशवंत सिंह भी लाइन में आ सकता है, जिसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है | सब राजनीति- राजनीति  चिल्लाये जे रहे हैं और हमारी पत्रकारिता के क्षेत्र को इसका देय सम्मान नहीं मिल रहा है | और एक बात मैं स्पष्ट बता  दूँ कि खुशवंत जैसा पत्रकार अब भारत में कोई पैदा नहीं होगा | जैसा गाँधी के लिए आइन्स्टीन [?] ने कहा था कि लोग आश्चर्य करेगे कि कोई ऐसा भी व्यक्ति दुनिया में पैदा हुआ था , उसी प्रकार की राय मेरी खुशवंत सिंह के लिए है |

* माननीयों की सुरक्षा


* माननीयों द्वारा क्यों अधिकाधिक सुरक्षा की माँग की जा रही है ? क्यों उनके बोडीगार्डों के लिए कार्बाइन उन्हें क्यों अपर्याप्त लग रहा है ? क्योंकि वे जान गए हैं कि उनके बुरे दिन आने वाले हैं
आ ही गए हैं
विधायक सांसद मारे ही जा रहे हैं
और हम लोग जो मारपीट में विश्वास नहीं करते उन्हें ' कौड़ी के तीन ' बनाने पर तो तुले ही हुए हैं !

रविवार, 10 जून 2012

घूस का पैसा


Gon-zo -
१- -[बदमाश चिंतन ] घूस का पैसा यदि अकेले रख लिया जाय तो वह व्यक्तिवाद है | यदि उसे मिल - बाँट कर खाया जाय तो उसे समाजवाद कहते हैं |
२ - लड़के ने लड़की से कहा आखिर किसी के प्रति तो आकर्षित होगी ही , तो मुझमे ही क्या बुराई है ?
३ - [कथा स्वरुप ] इधर साल भर से मेरा कोलकाता से दिल्ली राजधानी एक्स. से कई बार जाना हुआ | उसके कुछ सेवा कर्मी मेरी पहचान में हो गए हैं | इस बार मई में देखा तो कई कर्मचारी नदारद थे | पूछने पर पता चला कि तमाम रसोइये और वेटर उ.प्र. के जेलों में बुला लिए गए हैं, कैदियों को उच्च श्रेणी की सेवा प्रदान करने के लिए |
४ - गजगामिनी /ज्ञानगामिनी - माधुरी दीक्षित पर बनाये गए चित्रों को हुसैन ने गजगामिनी नाम दिया था| वह बड़े कलाकार थे , वह उनके और माधुरी के बीच का मामला था | लेकिन हम देख सकते हैं कि आज की प्रबुद्ध महिलाएं जब चलती / बोलती हैं,तो ज्ञान छलक -छलक कर बाहर गिरता रहता है |
५ - कुछ तो विशेषाधिकार [priviledge] अवश्य मिलता दिख रहा है | दलित और महिला रचनाकारों की किताबें प्रकाशक टप से उठा लेते हैं छापने के लिए | हम लोग रिरियाते रहते हैं पर हमें वे घास नहीं डालते |
६ - विद्वान कुछ भी कहें पर शिक्षा तो मुझे मूलतः conditioning की ही प्रणाली दिखती है | जैसे मान लीजिये हमें बच्चों को दिशा की शिक्षा देनी है तो हम उन्हें उत्तर की और मुंह करका खड़ा कर देंगें और निश्चयपूर्वक बतायेंगे कि बच्चो ! तुम्हारे सामने की दिशा उत्तर कहलाती है , तुम्हारे दायें हाथ की और पूरब , बाएं हाथ की ओर पश्चिम और पीछे की दिशा दक्षिण है | अब इसमें तर्क और reasoning और प्रश्न की क्या गुंजाईश है ?    

Emergency-like

I have no praise for Indira Gandhi , but I would like to support an  emergency-like governance in India.

अन्ना राष्ट्रद्रोही

अन्ना को लिखे गए एक पत्र में सरकार की ओर से नारायन सामी ने लिखा है कि अन्ना राष्ट्रद्रोही तत्वों से घिरे हुए हैं- - " | मैं इतनी कठिन भाषा नहीं लिख पाता | मैं आसान हिंदी में कहता हूँ कि ये सब देश के दुश्मन हैं | अन्ना यदि नहीं हैं तो वह उस घेरे से निकल कर दिखाएँ , वर्ना वह भी यही उपाधि पायें |

मेयर पद हेतु


लखनऊ ,१०/६/१२ | मेयर पद हेतु एकमात्र महिला प्रत्याशी ने शनिदेव को माथा झुका कर चुनाव प्रचार आरम्भ किया | तो , अब तो मैं उन्हें वोट का कोई टुकड़ा भी  नहीं दूंगा | वे शनिदेव से ही वोट लें | जब कि मेरी नीति यह है कि मैं केवल महिला या दलित को ही वोट देता हूँ | और मेरा दुर्भाग्य , सूची में कोई दलित भी नहीं दिख रहा है | अब मैं क्या करूँ?

लेखक के निजी विचार


[व्यंग्य ]
व्यक्ति को सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए , नेताओं को जनसेवी -ईमानदार होना चाहिए , शासन को जनता के जान -माल, दलितों के सम्मान ,औरतों की इज्ज़त की रक्षा करनी चाहिए , न्याय पालिका को त्वरित इंसाफ करना चाहिए, पत्रकारिता को सजग प्रहरी बनना चाहिए - - |  लेखक - उग्रनाथ |
[ यह लेखक के निजी विचार हैं , संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है - संपादक ]




क्रोध का अनावरण


मैं बहुत दिनों से यह महसूस कर रहा हूँ  कि जैसा मेरा नामशः स्वभाव  है ,मुझे अपने क्रोध का अनावरण करना चाहिए , सभ्यता - शिष्टाचार कि आँड़  में उसे रोकना ठीक न होगा | क्योंकि बहुत सी गलत बातें हो रही हैं और मैं उन्हें जाने देता हूँ | ये विसंगतियां समाज में भी हैं , राज्य सम्बन्धी विमर्श में और मनुष्य के मन में भी | इस हेतु मुझे असभ्य समाज , दुर्वासा दल ,क्रोधी संत मिशन, अप्रिय वार्ता, अपशब्द ,आग बबूला   जैसा कुछ होना पड़ सकता है , पर पहले प्रिय सम्पादक से तो छुट्टी मिले [बड़े प्रिय बनने चले थे] !लेकिन दिक्कत यह है कि मैं अपने दिल से भी तो  मजबूर हूँ जो सौम्य,प्रेमी ,स्नेही और शांत है| वैसे बहुत हो चुकीं चिकनी चुपड़ी बातें ,सभ्य -शालीन भाषा में ! तंग तो हूँ , तनाव उसमे भी है ,तनाव इसमें भी है | तो क्या ओशो  की लाइन पड़ेगी , एकांत में गालियाँ बकना ? शुरू तो कर ही दिया है किसी से न मिलने - जुलने का कार्यक्रम !


नास्तिक मुनि

विनम्रता पूर्वक  मैं एक बात तय जानता हूँ [ चाहे इसका कोई  बुरा माने या भला , या कोई आरोप लगाये कि मैं तो भविष्यवाणी जैसा  बोल रहा हूँ, या फ़तवा दे रहा हूँ ]  कि यदि भारत में हिंदुत्व को दलितों को नहीं सौंपा  गया तो भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना कभी भी नहीं हो पायेगी  | और यह भी समझ लें कि दलित जो भी नीति अपनाएगा वह हिंदुत्व ही होगा , भले किसी की समझ में आने में अभी मुश्किल लगे | बस जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही राष्ट्रहित में अच्छा होगा | चाहे जितनी उछल कूद में समय नष्ट कर लें , सवर्णों के वश का काम नहीं है हिंदुस्तान में हिन्दू राज्य लाना | {नास्तिक मुनि}

शनिवार, 9 जून 2012

Gon-zo Journalism


Gon-zo Journalism . [style created by Hunter S. Thomson and the name so , given by Bill Cordoso], which I am fond of , and it suits me very much .

1 - (Quote) :  - It {cricket} requiresone to assume such indecent postures .- [Oscar Wilde]

2 - "Power attracts the corruptible . Suspect all who seek it " -Frank Herbert.
Personally I have been of the view that who fight elections for power are essentially  mean and lowly persons . I call upon the citizenry not to give respect to them , rather always suspect them as Frank Herbert too suggests.

3 - On Ambedkar cartoon controversy, I would suggest reading  an article -- " A different Reading" by -S. Anand [The Indian Express- 24/5/12 OP-ED Page-11]. I could read it after returning from a long stay out of Lucknow. It confirms my view on the issue.

4 - A Blackberry addict Rahul Gandhi is a nonsense and a nuissance in the politics of our taste .

शुक्रवार, 8 जून 2012

डिब्बा लैपटॉप


* डिब्बा बनकर न रह जाये लैपटॉप ' - विरोधी विधायकों का संदेह |
-- मेरा तो कहना है यदि लैपटॉप छात्रों की माओं द्वारा रोटी बेलने के काम न आये तो कहियेगा !
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अफसरों की अशिष्टता ;- विधायकों की बड़ी शिकायत है की अधिकारी उनका महान आदर नहीं करते | विधायक उनके पास जाते ही क्यों हैं , क्या काम कराने ? इस काम के लिए एक पृथक स्पेसल अधिकारी नियत होना चाहिए , केवल उसी के पास वे अपने काम सौंप दें , वह उन्हें सम्बंधित विभाग को भेज देगा | इतने बड़े माननीय होकर क्या छोटे छोटे अफसरों के पास जाते हैं ? काम नहीं अपना धौंस  ज़माने , हनक दिखाने और उनके काम में बाधा डालने जाते हैं | आखिर अफसर इतने सारे माननीयों से आदर पूर्वक मिलने में समय गवांये या अपना कुछ काम भी करे ? आरोप है की पी जी आई के डॉक्टर उनके रिक्मेंडेसन पर ध्यान नहीं देते | तो क्या मरीजों का इलाज़ भी अब विधायकों के कहने पर होगा ? क्या हिंदुस्तान विधायकों का गुलाम बनने जा रहा है ,जिनके आदेश के बगैर पत्ता भी नहीं हिलेगा ? विधायकों द्वारा सरकारी कामों में हस्तक्षेप और विघ्न को रोकना होगा , अन्यथा ये भस्मासुर हो जायेंगे |
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* रामदेव [अब ये राजनीति में आ गए हैं ,इनके नाम के साथ श्री या बाबा लगाना पत्रकारिता के अनुसार अनावश्यक है ] को यह कैसे पता चला , वह कैसे जानते  हैं कि ४०० लाख करोड़ काला धन विदेशों में जमा है ?कहीं श्रीमान जी भी तो उसी व्यापार में लिप्त नहीं और प्रतियोगिता में असफल होने का खुन्नस निकाल रहे हैं ?इनके पास तो केवल १५०० करोड़ ही गेरुआ धन है | अब सच यह है कि न उनका धन जनता के हित के हेतु है , न इनका धन जनता के लिए उपयोगी है |
- - - - - - - - - - - -
* नरेंद्र मोदी को बी जे पी चाहे अपना नेता  नम्बर एक बना ले या अपने सर पर चढ़ा ले ,जनता नरेंद्र मोदी को अपना भारत भाग्य विधाता कभी नहीं बनाएगी | एक दिन जल्दी ही मोदी किनारे लगा दिए जायेंगे और उनके साथ बी जे पी भी चली जाएगी | भारतीय मनीषा की कुछ गुप्त नीतियाँ होती हैं, और वह अंदर अंदर उस के अनुसार काम करती है , और वह किसी पार्टी या व्यक्ति की गुलाम नहीं होती |
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* ज्ञान पीठ में गौरव सोलंकी :-- पहले तो ये लोग इसीलिये छपते और प्रशंसा पाते हैं क्योंकि ये IIT,iim , ETC  ग्रेजुएट हैं | फिर जब कभी इनकी पुस्तक नहीं छपती तो अपने graduation का धौंस दिखाते हैं | अब IAS  वगैरह आने भी लगे हैं बहुत साहित्य के क्षेत्र में ! अरे तुम जहाँ के होगे वहां के होगे तीस मार खान , यहाँ तो तुम्हे हिंदी के बड़े बूढ़ों की ही बात माननी पड़ेगी | नहीं तो सीधे चले जाओ बड़े बड़े प्रकाशकों के पास , तुम्हारा नाम तो यूँ ही चमक जायेगा |      

मसलन खजूर


[कविता ]
मैं खुद एक दूरी
बना लेता हूँ
ऊंचे पेंड़ों से
मसलन खजूर से
युक्लिप्टस - बरगद से ,
जिससे मैं उनका
शीर्ष देख सकूँ,
और नाप सकूँ उनकी ऊँचाई
दूरी के हिसाब से
गणित लगाकर |
दूरी शून्य होगी तो
पेंड़ मुझे अपनी ज़द में ले लेगा
मैं संज्ञाशून्य हो जाऊंगा -
नहीं जान पाउँगा
पेंड़ कितना ऊँचा है
या कितना ठिगना ,
पेंड़ जितना ऊँचा
उतना ही उससे दूर
जाना पड़ता है मुझे |





बुधवार, 6 जून 2012

आदमी ही है

* न अन्ना टीम
न भोगा , न योगा
न रामदेव |
* युवा , युवा हों
तब न दें उनके
हाथ शासन !
* आदमी ही है
जो कि आदमी भी है
हैवान भी है |
* औरतें जानें
औरतों की समस्या
हम क्या जानें ?
*सारे पुरुष
एक से नहीं होते
न सब नारी |
* कुछ भी शुभ
हो ही नहीं रहा है
मैं कैसे बोलूँ ?
* हो चाहे न हो
पर बातें तो हैं ही
बराबरी की !
* सुंदर हो तो
सुंदर कह दिया
नयी क्या बात ?
* कितने आये
सबको देख लिया
कितने गए |
* कोई समस्या
हिंदुस्तान के लिए
समस्या नहीं |
 * कुछ न हुआ
कुछ नहीं हुआ है
उन्ही से पूछो |
* इतना झूठ
कैसे बोल लेते हो
धारा प्रवाह ?
* बच्चे आवारा
क्या करें माता पिता
मानते नहीं !
* समाज विच
बहुत गंदगी है
हम गंदे हैं |
* परेशानी है
छोटे लोग होते हैं
छोटी सोच के |
* मुझे गाली दो
सहयोग भी चाहो
उल्टी बात है |
* दूर - दूर से
नजदीक से नहीं
प्रेम कीजिये |
* कभी ब्राह्मण
बन जाता हूँ मैं, तो
कभी चमार |
* मैं ऐसा न था
यह तो अब हुआ
परिवर्तन |
* खराब करें
क्यों अपना दिमाग
भलाई पर ?

बामन सेन्स

ब्राह्मणों में , यह देखा गया है कि, बामन सेन्स तो बहुत होता है , पर कॉमन सेन्स का नितांत अभाव होता है | [उवाच]

सामूहिक

[कविता] = सामूहिक
सामूहिक बलात्कार !
सामूहिक भ्रष्टाचार ,
सामूहिक  स्वीकार ,
सामूहिक शवदाह [mass  burial ]
क्या यही है नियति
मनुष्य की सामूहिकता की ?
सामूहिक आत्मदाह ,
सामूहिक आत्महत्या ,
सामूहिक सर्वनाश ?

आदमी की बात

[ विशिष्ट कविता ]
आदमी की बात !
किस आदमी की बात /
कर रहे हैं आप ?

बुधवार, 30 मई 2012

सोने की तरह


गीत का मुखड़ा : -
सोने की तरह तपना , तपकर सोना बनना ,-
-- - - - -

शठे शाठ्यम समाचरेत

बड़ी खेमे बंदी है भाई विचार जगत में , और वही अब साहित्य जगत भी हो गया है | ज़रा सा भी अलग सोच लो या कोई शाब्दिक क्रीड़ा करना चाहो तो डर बना रहता है कि कहीं उस टोले का न मान लिया जाऊँ ! अरे भाई मैं प्रगतिशील हूँ तो अपने मन से और दकियानूस हूँ तो स्वेच्छा  से | इस पर किसी की क्या दबंगई ? लेकिन नहीं दादागिरी की इमरजेंसी लागू है , जब कि यहाँ न मार्कंडेय काटजू हैं न मीनाक्षी नटराजन | यह तो वैसा ही हुआ जैसे दो माफियाओं का झगड़ा हो | सरकारी प्रतिबंधों का विरोध इसलिए होता है जिससे इनका आधिपत्य कायम रहे | मैं कल्पना कर सकता हूँ कि इसी कारण लेखक जन इस या उस कस्बे में बस जाते हैं और फिर वहीँ के होकर रह जाते हैं क्योंकि इस धड़ेबाजी की स्थिति में इसके अलावा और कोई चारा नहीं है | उनकी कोई गति ही नहीं  यदि वे इनमे शामिल न हों | सबके पास इतना बूता नहीं होता कि अकेले अपनी लडाई लड़ सकें , या फिर मेरी तरह अन्धकार की गर्त में जाने के लिए कटिबद्ध हों | सबको अपना  भविष्य  बनाना होता हैं , कुछ  का तो कैरियर  भी होता है |  पर मौलिक प्रश्न तो शेष है कि यह कौन सी समता स्वतंत्रता भाईचारा का नमूना हम स्थापित कर रहे हैं कि किसी से बिना उसका प्रोफाइल पक्का जाने हम हाथ मिलाने या पास बैठने में संकोच करें ? क्या यह उसी प्रकार का छुआछूत नहीं है जिसके खिलाफ गाँधी जैसे परंपरावादी हिन्दू ने भी आन्दोलन चलाया ? कोई महान तरक्की पसंद बुद्धिजीवी बताये कि इसमें और ब्राह्मणवाद में क्या तनिक भी अंतर है जिसको कोसते ये कभी नहीं थकते ? यदि इसे ये उचित मानते हैं तो हमें भी पुनर्विचार करना पड़ेगा कि अपने विस्तृत मानववादी सोच को समय रहते हम भी संकुचित कर लें और अपने सामाजिक व्यवहार को तदनुसार रेशनलाइज [तर्कसंगत ? नहीं समयसंगत ] बना लें | स्वीकार करता हूँ कि उसी को दुनिया ब्राह्मणवाद के नाम से जानती है, और फिर जानेगी  - शठे शाठ्यम समाचरेत |

मंगलवार, 29 मई 2012

कमीना आदमी


मैं अपने आप पर , मुँह क्या खोलूँ ,
कमीना आदमी है , क्या बोलूँ ?


मैं अपने आप पर मुँह खोल दूं क्या ?
यह बड़ा कमीना है बोल दूँ क्या ?

or - मैं अपने आप पर मुँह क्या खोलूँ ?
       इस कमीने को क्या मीना बोलूँ ?

or  - मैं आदमी हूँ , कमीना हूँ ,
        मैं आदमी हूँ , एक मीना हूँ |

न आदमी, न ईश्वर


* ईश्वर नहीं है , यह तो तय है और ठीक ही है | लेकिन अब मुझे कहना पड़ेगा कि आदमी भी नहीं है | क्या आदमी के अस्तित्व का कोई प्रमाण दिखता है ? क्या यह  जो आदमी है , इसी को आदमी कहते हैं ? होने न होने के बराबर - जब इसका कोई योगदान ही जग के उत्थान में नहीं है ? इस प्रकार , तब तो ईश्वर का होना भी हमें मान लेना चाहिए - उसी प्रकार निरर्थक , अपने नाम का भार ढोता हुआ | तब पूरा वचन होगा - कि इस दुनिया में न आदमी है , न ईश्वर |

मेरा सिक्का


उवाच:-
मेरी जेब खाली है , लेकिन मेरा सिक्का किसी की जेब में नहीं समाता |
[ambiguous]

जिसे बरबाद होना है


[ शेर ? ]
सुनेगा बात वह मेरी , जिसे बरबाद होना है ;
और जो हो चुका बरबाद, सुनेगा बात वह मेरी |

शौचालय

जहाँ मैं बैठा था वहां से दस फिट की दूरी पर वह शौच करने बैठ गया नालायक | क्या करता हमारा शौचालय हमसे इतनी ही दूरी पर है !  [ ललित ]

सोमवार, 28 मई 2012

अभारतीय समाज


अभारतीय समाज  [ कोई गर्व / गर्भ नहीं ] Non Indian Society  [गैर-हिन्दुतानी ज़मात]
   कुछ दिन पूर्व हम पति पत्नी के के अस्पताल लखनऊ एक सुदूर सम्बन्धी के नवजात पुत्र को देखने गए थे  | वहां नर्सों ने हमें नेग के लिए परेशान कर डाला | और ५०-५० रुपयों में उनका काम कहाँ चलता है ? अब यहाँ कोलकाता हम अपने पुत्र को देखने आये हैं | वह ओप्रेसन से कार्पोरेट अस्पताल कोलंबिया एसिया में पैदा हुआ है | मैंने पूछा तो पता चला एक पैसा किसी को नहीं देना पड़ा , न देने की इजाज़त थी | अस्पताल वालों ने जो भी लिया , तो वह तो वहां भी खूब लेते हैं | यह फर्क है भारतीय और विदेशी तरीके में  | पुत्री जन्म पर तो वे भी नहीं माँगते , यह एक और लैंगिक विभेद का कारण है | इसी प्रकार जो लोग गर्व से हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तानी कहते हैं वे देश का गर्भ - नाश करते हैं | अंग्रेज़ी और उस संस्कृति का विरोध करते हैं इसलिए उनके समय की पाबंदी कर्तव्य निष्ठां, अनुशासन प्रियता  की भी नक़ल नहीं करते | इंडियन टाइम तो मशहूर है , और उस पर वे शर्म नहीं खाते | ऐसे थोड़े हिंदुस्तान गर्त में गया है और आज़ादी का कोई लाभ इसे नहीं मिला , हाँ दुरूपयोग अवश्य हुआ | तिस पर भी पता नहीं क्या है जिस पर ये गर्व करते हैं और हमारे जैसे गर्व रहित लोगों को देश द्रोही बताते हैं | इसलिए , भले हमारा काम कुछ अतिशयोक्ति हो जाता है पर हमें अभारतीय समाज बनना चाहिए - अपनी कमियों का सूक्ष्म विश्लेष्ण और त्याग करना  चाहिए न की उस पर गर्व | और इसके लिए आलोचना सहने को तैयार रहना चाहिए |

दलितों के दोस्त


कविता :-
दलितों के दोस्त
दलित ही हैं
और कोई नहीं हो सकता ,
उन्हें किसी की हमदर्दी नहीं चाहिए
सवर्णों की सहानुभूति
उन्हें दरकार नहीं
वे छलिये , शोषक , धोखेबाज हैं |
तो दलितों के हितैषी
दलित ही हो सकते हैं -
वह भी दलित पुरुष
स्त्रियाँ भी हों तो हों
पर दिखतीं नहीं
सारे दलित पुरुष
कवि-कथाकार -चिन्तक '
एक्टिविस्ट मैदान में हैं |
सवर्ण भी पीछे -पीछे पूँछ हिला रहे हैं
दलित आन्दोलन में घुसने के लिए
पर वहाँ उनकी कोई पूँछ नहीं है ,
हो ही नहीं सकती
दलितों के समर्थक , दलितों के दोस्त
सिर्फ दलित हो सकते हैं
दलितों के दुश्मन भी दलित ही होंगे |

Three only


[ हाइकु]
दर्द मुझे है
दुखी , दोस्त होते हैं
फेसबुक के |

* अभी नहाया
अभी फिर हो गया
बदन तवा |

* छोडो , जाने दो
दिन  का सपना है
सच न होगा |


Six Haiku


[ हाइकु]
* बच्चे खेलते
बच्चे मेरा खिलौना
हम खेलते |

*मेरा ख्याल है
बंद होना चाहिए
यह नाटक |

* हम लोग तो
हारे हुए योद्धा हैं
जो भी सजा दो |

* ईश्वर है न
वर्ना कैसे रहतीं
जातियाँ - धर्म ?

* वर्जित फल
खाओगे तो क्या पुण्य
फल पाओगे ?

* स्वर्ग जाना है
वर्जित फल खाओ
मौज उड़ाओ |

उपन्यास अंश


[ उपन्यास अंश ]

- वह श्रेष्ठता- भाव से पीड़ित है |
- वह ब्राह्मण होगा !
- हो सकता है ,
  नहीं भी हो सकता है |

कमरों में ए.सी.


[ शेर ? ]

लगा तो मैं भी लूँ अपने कमरों में ए.सी. ,
मगर मैं अपने घर से तब निकल न पाऊँगा |

इतनी सी बात पर


कविता :-

कोई बहुत बड़ी आफत हो
तो रोयें भी '
चीखें - चिल्लाएँ
अब भला
इतनी सी बात पर  ---  ?

रविवार, 27 मई 2012

ख्याली पुलाव


मुझे थोड़ी चिंता है कि कुछ लोग सिर्फ शूद्रों / सवर्णों की ही भाषा में बात करते हैं | ठीक है कि वह भी  हकीकत है,पर जहाँ तक उसकी सीमा है उसी में उसको बंद रखिये | वे यह समझ ही नहीं पाते कि ब्राह्मण कुछ भी कहता रहे , शूद्र भी मनुष्य हैं, अपनी अच्छाइयों - बुराइयों  के साथ [ और इस प्रकार वे ब्राह्मण की अवधारणा और उसके औचित्य को ही सिद्ध करते हैं ] | और सवर्ण भी अपनी अज्ञानता - सांस्कारिक  गुलामी के अधीन एक मनुष्य ही है | व्यवहार में ब्राह्मण भी शूद्र है , और शूद्र भी उसकी स्थिति में होता तो ब्राह्मण ही होता! अब तो यह भी आश्चर्य करने की इच्छा  नहीं होती कि द्वंद्वात्मक भौतिकवादी भी , जो कि मनुष्य के निर्माण का दोष या श्रेय सामाजिक स्थितियों -परिस्थितियों को देते हैं , वे भी ब्राह्मण / शूद्र की उत्पत्ति उनके जन्म से मानते हैं | ज़ाहिर है , तब हम मूर्खों की सोच में ही कही कोई कमी होगी | तिस पर भी --
- ख्याल आया कि क्यों न हम सवर्णों की एक संस्था " शूद्र " बनायें , और घोषित करें -हम जन्म से नहीं कर्म से शूद्र हैं | निजी रूप से मैं तो सचमुच नीच व्यवहार अपनाने के पक्ष में हूँ जिससे हम पवित्रात्माओं की गालियाँ पायें और हमारा किंचित भी अवशेष अहंकार तिल -तिल कर तिरोहित हो | विवशता है कि हम दलितों की कोई संस्था नहीं बना सकते , हम अविश्वसनीय हो चुके हैं | पर सोच तो सकते हैं कि यदि हम शूद्र होते तो अपने को इसी व्यवस्था में क्यों न जनतांत्रिक अधिकारपूर्वक  ब्राह्मण घोषित कर देते ? हट ब्राह्मण ! सिंहासन खाली कर कि शूद्र जन आते हैं ?
-सब ख्याली पुलाव है,कुछ होने जाने वाला नहीं है | तो क्या यही जपें - होइहैं सोई जो राम रचि राखा ?         [ निर्निमेष ]

फालतू उत्पात

* अगर आप अपमान , जलालत , अपशब्द , भेदभाव नहीं बर्दाश्त क्र सकते तो अपने लिए कोई और देश देख लीजिये |
* आखिर वह दिन आएगा जब  घर का लोन चुक जायेगा , कार की किश्तें पूरी हो जायेंगी | तब खाली बच्चों की पढ़ाई का खर्च रह जायगा , तब कुछ भविष्य के लिए अवश्य बचा लेना | बुढ़ापे में हाथ खाली न रखना |
  { फालतू  फण्ड (Surplus thoughts) or /  उत्पात -- by -- उ.न.नागरिक }


Dinman Srivastava


अच्छा लगा चंचल जी ने दिनमान के अंदर की खबर दी | मैं तो बाहर का एक विनम्र पाठक था | मुझे याद है १९६३ में जब डिप्लोमा पढ़ने लखनऊ आया तब दिनमान ५० पैसे की थी | हर हफ्ते लेता था | तब संपादक अग्गेय जी थे, शीघ्र ही रघबीर सहाय जी आ गए | पर उससे मुझे क्या मतलब था | मेरी आयु थी १७ वर्ष | उसमे मेरे स्वभाव के अनुकूल गंभीर जानकारी और सोचने की सामग्री मिल जाती थी | मुझे आता जाता कुछ न था तब भी कला रंगमंच साहित्य आदि सब पर प्रयाग शुक्ल , नेत्र सिंह रावत , के एन कक्कड़ भी , के सारे आलेख निर्विकार भाव  से पढ़ जाता | बाद में कुछ प्राथमिकता भी बनी | सबसे पहले तो मत -सम्मत फिर फ़ौरन सर्वेश्वर का चरचे और चरखे , और अंत में कोई विश्व कविता | जाना कि लिखना कहते किसे हैं | फिर हॉस्टल के पते से लिखने भी लगा , सोचने / लिखने के अभ्यास के रूप में | आज चंचल जी के मापदंड पर कहूँ तो मैं "धन्य " था जो उसमे छपा और बराबर छपा |लिखने का अभ्यास यूँ हुआ कि अब सिर्फ कलम हाथ से पकड़ता हूँ , लिखता कोई और है | मुझे उसे पलट कर पढ़ने का समय नहीं होता | ज्यादा गलतियाँ भी नहीं होतीं , लिंग भेद न मानने के कारण कुछ लिंग -दोष  अवश्य हो जाता है | अतः आज की खेमेबंदी के बरक्स उन निष्पक्ष संपादकों को नमन करता हूँ |
 २० साल की उम्र में नौकरी लग गयी तो १५ साल की उम्र में जो शादी हो गयी थी उसकी ज़िम्मेदारियाँ लिए शहर शहर रहा | अब मेरी नियमित पत्रिका की सूची में थे दिनमान के अतिरिक्त  कादम्बिनी, धर्मयुग , साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता -मुक्ता, नीहारिका - सारिका [ इन नामों पर दो  भतीजियों का नामकरण किया] | कहूँ कि मेरी पूरी पढ़ाई या संस्कार- निर्मिति ही  इन्ही से हुई , वरना मैं कुछ पढ़ा लिखा तो था नहीं - इण्टर था , वह भी विज्ञानं से | जो आज हालत यह है कि रूप रेखा जी , प्रमोद , नीलाक्षी और आप लोगों जैसे विश्वविद्यालय - पठित शिक्षक विद्वत-जन मुझे अपने वार्ता कक्ष में बैठने देते हैं, सब उन्ही पत्रकों की देन और वरदान है |और हाँ , नवनीत तो बताया ही नहीं , जिसने मुझे सांस्कृतिक - दार्शनिक दृष्टि दी , अहा! ज़िन्दगी की तरह मनोरंजक , और जिसके आधार पर अपने पुत्र का नाम ' नवनीत कुमार ' रखा | 

कोई उत्तर नहीं


[उवाच ]
* यदि हमारे और आपके विचार एक से ही होने होते ,तो विश्व की जनसंख्या में एक अदद की कमी न हो जाती ? फिर एक काम के लिए ईश्वर ने  दो मनुष्य बनाया ही क्यों होता ?
* कुछ प्रश्नों का सचमुच कोई उत्तर नहीं होता, जैसे यही जातिवाद - जातीय भिन्नता - ब्राह्मणवाद का !
* सच कह रहे हैं आप ! आप मुझसे छोटे नहीं हैं | लेकिन मैं आपसे छोटा हूँ तो सही ?

शनिवार, 26 मई 2012

नानी की मौत


कविता =  ' नानी की मौत '
                  -----------
मैं नहीं जानता जीवन मृत्यु ,
आदमी क्यों पैदा होता है ?
कैसे मरता है ?
लेकिन जब तुम
मर जाओगी नानी
तब मैं बहुत रोऊँगा |

कर्म विरत


[कवितानुमा] - कर्म विरत

मैं कुछ नहीं करता
उसे भी मेरा किया
मान लिया जाता है
मैं करूँ तो क्या  करूँ
जिससे मैं निर्दोष रहूँ ?
संभव नहीं इस जग में
कर्म विरत रहना
तो क्यों न कुछ करता रहूँ ?

HURRAY !


HURRAY !  all my friends , I could name my one month old only granson  as  “ DINMAAN “ (or Dinman Srivastava ) which was my long pending ambition  , based on my favourite magazine – old DINMAN edited by Aggeya and then Raghubir Sahai . I am very pleased today that my son accepted this name for his son .


मित्रों को हार्दिक धन्यवाद मेरी और से | और शिशु दिनमान का आप सबका चरणस्पर्श आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए | दोस्तों, मज़ा और तो तब आये जब उसका नाम केवल दिनमान रहे या दिनमान नागरिक हो जाये ,लेकिन  सोचता हूँ - किसी पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं है | कोई विवाद नहीं पुनर्जीवित करना चाहता | पर इसे राजनीतिक विडंबना, या अपनी पराजय तो मानता हूँ या इस अवस्था में शक्ति की कमी  कि यदि बहू - बेटा उसका नाम स्कूल में श्रीवास्तव जोड़ कर लिखाएंगे तो मैं मना नहीं कर पाउँगा | अपना ही नाम कहाँ छिपा पाया ? बताना ही पड़ा कि मैं सवर्ण हूँ जिससे मेरे सामाजिक -राजनीतिक कर्म में कोई छद्म न पनपे , और जब सवर्ण हूँ तो कोई जाति बतानी ही थी | प्रमोद श्रीवास्तव जी के अनुसार हिन्दू धर्म का मतलब ही  जाति है , ये दोनों एक दूसरे से पृथक नहीं हो सकते ,और मैंने हार मान ली | यद्यपि कोशिश पूरी ईमानदारी से की जाति मिटाने की | लखनऊस्कूल के लोग जानते हैं , युवजन समिति के माध्यम से आन्दोलन को | अब इसका दोष सरलीकृत ढंग से आरक्षण / मंडल को दूँ तो दोषी हो जाऊँगा | इसलिए संतोष करता हूँ यह सोचकर कि तब हम नादान थे , युवा उत्साह था और  दुनिया की समझदारी में कमी थी , जिसकी  रौ में हम बह गए थे | तब भी इतना तो कर ही सका था कि बड़ी बेटी [दिनमान की एकमात्र बुआ] का नाम रजनीगंधा और छोटे एकमात्र बेटे[दिनमान के बाप] का नाम नवनीत कुमार बिना किसी उपनाम के रखा | बस वहीँ तक मेरी सीमा थी | मन थोड़ा खिन्न तो होता है , पर लोकतान्त्रिक आध्यात्मिकता के सहारे खुश होने की चेष्टा करता हूँ | आप सबका आभारी हूँ जो आज मेरे सुख / दुःख में मेरे साथी हैं |   26/5/12

तपस्या


[नागरिक उवाच ] :- बदमाश चिंतन
बड़ी तपस्या करनी पड़ती है माँ को बहू की थोड़ी सी फटकार सुनने के लिए !

प्रथमदृष्टया


प्रथमदृष्टया
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एक -एक अंग करके
पूरा शरीर बना ,
अतः , यदि शरीर की
कोई सार्थकता , प्रतिष्ठा है
तो इसका हर एक अंग
बहुत सुंदर होना चाहिए ,
अत्यंत  सुंदर है
चाहे वह कितना ही कुरूप हो ,
प्रथमदृष्टया |     

प्रिय संपादक

जो मैंने ' प्रिय संपादक '[पत्र मासिक] , के ज़रिये अस्सी के दशक से करना शुरू किया था , उसे फेस बुक और ट्विटर ने अब करके दिखा दिया | मेरी सोच और परिकल्पना असफल नहीं गयी , ऐसा मैं कह सकता हूँ, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बन सकता हूँ |

जब से मैंने होश संभाला


[गीत नहीं बन पाया ]
 जब से मैंने होश संभाला , द्वंद्व - द्वंद्व झेला ,
संगी- साथी, खेल - खिलाड़ी दंद -फंद खेला |

कथा कहूँ तो


[हाइकु]
* मज़ा आता है
बातें करते हुए
फेसबुकी से |

* कथा कहूँ तो
कहाँ से शुरू करूँ
अतः चुप हूँ |