[ विचारार्थ ]
१ - मैं आश्चर्यचकित हूँ कि ये इमारतें { धर्म और ईश्वर की } , ये पिरामिड आखिर टिके कैसे हुए हैं ? जब कि इनके आधार केवल रेत और बालू है , और कहीं -कहीं तो वः भी नहीं है |
२ - मेरा ख्याल है सचमुच आदमी [ पुरुष ] को घोंघा हो जाना चाहिए | अपने सारे अंग उसे सिकोड़ लेने चाहिए | उधर हम घोंघावसंत होने की वकालत पहले ही कर चुके हैं | औरतों की सारी सफलता का राज़ यही है |
३ - सरकार टैक्स लगती है और वह सारा पैसा उसके कर्मचारी खींच ले जाते हैं |
४ - ह्रदय को तो नज़रअंदाज़ कर भी सकता हूँ , पर मैं अपनी बुद्धि के आदेश को टाल नहीं सकता |
५ - मेरा ख्याल है , उनकी सामाजिक स्थिति को देखते हुए मुसलमानों को भारत में सवर्णों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए , और उन्हें सवर्णों के समान सेवाएं और सुविधाएँ दी जानी चाहिए |
६ - कुछ याद किया जाना चाहिए हिन्दू दलितों ने कितनी मनुस्मृतियाँ जलायीं , ब्राह्मणों को - बाबा तुलसीदास, राम चरित मानस , देवी -देवताओं को कितनी गालियाँ दीं ? तब जाकर अब कहीं उन्हें थोडा आरक्षण मिल पाया | यहाँ तक कि उन्होंने हिन्दू धर्म त्यागने की भी धमकी दी और छोड़ा भी | दूसरी तरफ मुस्लिम भाई कभी इस्लाम के विरोध में नहीं गए , कभी किंचित भी आलोचना , उसकी शिकायत नहीं की | वे बड़े गर्व से मुस्लिम बने रहे और कुरआन अथवा मोहम्मद साहेब की प्रतिष्ठा पर कोई आँच आती दिखी तो उन्होंने सड़कों पर निकलकर हंगामा भी किया | गरीब भले हों पर ब्राह्मणों की भाँति उन्हें भी गुमान है कि वे हज़ार वर्ष हिंदुस्तान के शासक रहे | फिर उन्हें आरक्षण क्यों ? सवाल यह भी है कि इतने कथित समतावादी धर्म में होकर और साथी मुसलमानों के पास इतने धन -दौलत एवं ज़कात की व्यवस्था होते हुए वे गरीब कैसे रह गए ? दलित प्रथा हिन्दुओं की बुराई और समस्या है | सवर्ण समाज अपने पुरखों के पापों की भरपाई अपने दलित वर्ग को तो आरक्षण देकर कर सकता है , पर उसने मुसलमानों पर तो कोई जुल्म नहीं धाय ! बल्कि वह तो उनके अधीन रिआया ही रहा ? फिर वह उन्हें आरक्षण को समर्थन क्यों दे ? आज़ादी का नाजायज़ फायदा तो मत उठाओ भाई !
७ - मैं पाता हूँ कि ब्राह्मणवाद एक शाश्वत व्यवस्था है | इसे किसी ने नहीं बनाया | यह अपने आप स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से बनती गयी , जिसका टूटना दूर - दूर तक कहीं संभव नहीं दिखता | क्योंकि यह " भेद " पर आधारित है जो कि वैज्ञानिक विधि है और मानव स्वाभाव के सर्न्था अनुकूल | तब दुसरे चातुर्वर्ण थे , अब चतुर्थ श्रेणी तक के कर्म्चाहरी हैं | पहले पंडित जी ब्राह्मण थे , अब ब्राह्मण होंगी | पाला भले बदल जाय पर व्यवस्था नहीं | अभी देखिये , कोई कवी चार पंक्ति का एक मुक्तक लिख लेता है वह अपने आप को कालिदास से कम नहीं समझता | किसी ने एक मुक्त कविता कर ली तो उसे आप मुक्तिबोध से कम समझने की गुस्ताखी नहीं कर सकते ! यही ब्राह्मणवाद है , श्रेष्ठता के दंभ का दर्शन | और यह मानव स्वभाव का स्थायी भाव है | इसलिए ब्राह्मणवाद को गाली देने में समय न गवाँकर इसका कोई सार्थक उपयोग करने की बात सोची जानी चाहिए |
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