शनिवार, 25 अगस्त 2012

24-05-2012


* अगर आप अपमान , जलालत , अपशब्द , भेदभाव नहीं बर्दाश्त कर सकते तो अपने लिए कोई और देश देख लीजिये |
* आखिर वह दिन आएगा जब  घर का लोन चुक जायेगा , कार की किश्तें पूरी हो जायेंगी | तब खाली बच्चों की पढ़ाई का खर्च रह जायगा , तब कुछ भविष्य के लिए अवश्य बचा लेना | बुढ़ापे में हाथ खाली न रखना |
  { फालतू  फण्ड (Surplus thoughts) or /  उत्पात -- by -- उ.न.नागरिक }
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अच्छा लगा चंचल जी ने दिनमान के अंदर की खबर दी | मैं तो बाहर का एक विनम्र पाठक था | मुझे याद है १९६३ में जब डिप्लोमा पढ़ने लखनऊ आया तब दिनमान ५० पैसे की थी | हर हफ्ते लेता था | तब संपादक अग्गेय जी थे, शीघ्र ही रघबीर सहाय जी आ गए | पर उससे मुझे क्या मतलब था | मेरी आयु थी १७ वर्ष | उसमे मेरे स्वभाव के अनुकूल गंभीर जानकारी और सोचने की सामग्री मिल जाती थी | मुझे आता जाता कुछ न था तब भी कला रंगमंच साहित्य आदि सब पर प्रयाग शुक्ल , नेत्र सिंह रावत , के एन कक्कड़ भी , के सारे आलेख निर्विकार भाव  से पढ़ जाता | बाद में कुछ प्राथमिकता भी बनी | सबसे पहले तो मत -सम्मत फिर फ़ौरन सर्वेश्वर का चरचे और चरखे , और अंत में कोई विश्व कविता | जाना कि लिखना कहते किसे हैं | फिर हॉस्टल के पते से लिखने भी लगा , सोचने / लिखने के अभ्यास के रूप में | आज चंचल जी के मापदंड पर कहूँ तो मैं "धन्य " था जो उसमे छपा और बराबर छपा |लिखने का अभ्यास यूँ हुआ कि अब सिर्फ कलम हाथ से पकड़ता हूँ , लिखता कोई और है | मुझे उसे पलट कर पढ़ने का समय नहीं होता | ज्यादा गलतियाँ भी नहीं होतीं , लिंग भेद न मानने के कारण कुछ लिंग -दोष  अवश्य हो जाता है | अतः आज की खेमेबंदी के बरक्स उन निष्पक्ष संपादकों को नमन करता हूँ |
 २० साल की उम्र में नौकरी लग गयी तो १५ साल की उम्र में जो शादी हो गयी थी उसकी ज़िम्मेदारियाँ लिए शहर शहर रहा | अब मेरी नियमित पत्रिका की सूची में थे दिनमान के अतिरिक्त  कादम्बिनी, धर्मयुग , साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता -मुक्ता, नीहारिका - सारिका [ इन नामों पर दो  भतीजियों का नामकरण किया] | कहूँ कि मेरी पूरी पढ़ाई या संस्कार- निर्मिति ही  इन्ही से हुई , वरना मैं कुछ पढ़ा लिखा तो था नहीं - इण्टर था , वह भी विज्ञानं से | जो आज हालत यह है कि रूप रेखा जी , प्रमोद , नीलाक्षी और आप लोगों जैसे विश्वविद्यालय - पठित शिक्षक विद्वत-जन मुझे अपने वार्ता कक्ष में बैठने देते हैं, सब उन्ही पत्रकों की देन और वरदान है |और हाँ , नवनीत तो बताया ही नहीं , जिसने मुझे सांस्कृतिक - दार्शनिक दृष्टि दी , अहा! ज़िन्दगी की तरह मनोरंजक , और जिसके आधार पर अपने पुत्र का नाम ' नवनीत कुमार ' रखा |
दिनमान के अंक मैंने कन्हैया लाल नंदन के भी संपादकत्व का रखा पर फिर छोड़ दिया| सहाय जी के पदच्युत किये जाने के खिलाफ भी पत्र -विरोध किया | दिनमान की लगभग सभी प्रतियाँ मेरे पास हैं , जो मोटे -मोटे सात जिल्दों में "साझी दुनिया" [सं- प्रो. रूप रेखा वर्मा, पूर्व V ,C ,L .U ] की लाइब्रेरी में रखी है |
कहना होगा कि हर की अपनी खासियत थी पर दिनमान सबकी थी | पाठकों की मार्मिक कवितायेँ भी छपती थीं | मैंने सोचा यदि इस प्रकार भी कविता लिखी जा सकती है और वह कविता कही जा सकती है तब तो मैं भी कविता लिख सकता हूँ | सर्वेश्वर की एक कविता से मैं कवि बन गया | अब भी आप देख सकते हैं मैं उसी प्रकार की पाठकीय कवितायेँ लिखता हूँ जो पारंपरिक कवियों को मान्य नहीं होती | पर मैंने अपना जीवन धुन बनाना भी तो उन्ही से सीखा | और सीखा "सामान्य होना "| विशिष्टता [क्या ब्राह्मणवाद ?]से मुझे सख्त नफरत है और इसके खिलाफ सतत युद्ध मेरा मूल जीवन कर्म | अपने को बहुत महान समझने वाले को मैं घास नहीं डालता [शिष्टाचार - आदर अपवाद ], और साधारण सामान्य व्यक्ति के पैर भी धोने  को होता हूँ  तत्पर | इससे , लेकिन , जीवन में नुकसान बहुत उठाया | किसी की जेब में नहीं आया तो मैं खोटा सिक्का ही मूल्यांकित  रहा , कोई दोस्त दोस्त न रहा | स्वार्थ नहीं चाहा तो किसी के स्वार्थ में सहायक भी नहीं बना | खैर , मूल्यों या अपने स्वभाव की कीमत तो चुकानी  ही पड़ती है| यह मेरे अनुकूल भी है | बड़ा - सम्मानित होने का मोह साधारणता की ताक़त के आगे दब गया तो अच्छा ही हुआ | कुछ बड़ा करना और बात है , वह भी अपने हिसाब से , दूसरे की तराजू से नहीं | आश्चर्य नहीं कि कोई मेरी तराजू पर जल्दी खरा नहीं उतरता | हाय ! कितना तो लिख गया ? कोई बात नहीं चंचल जी एडिट कर लेंगे | तो और पुनश्च - रघुबीर जी हिंदी के शब्दों को बिगाड़ने का अभियान मुझे पसंद नहीं था , जैसे निस्तब्ध को जनभाषा में निसबध | प्रभाष जी का "अमदाबाद " भी कहाँ पचा पाया ? अब बिल्कुल बस | ###           . 
थोड़ा और दिनमान जी की तारीफ में | आज जब उसके अंक देखता हूँ तो सब सामान्य ही लगता है पर मेरे लिए तब के उनकी ही यह देन है कि मेरी एक कविता की किताब की भूमिका अनामिका जी ने लिखी और डी.यू. के मिरान्डाहॉउस में काव्य पाठ भी कर आया | उनके बारे में अपने मुंह से अब क्या कहना !इसलिए दिनमान को विनम्र श्रद्धांजलि देता उसके बजाए उसे अपने मन में जिंदा रखने के लिए अपने पौत्र का नाम दिनमान ही रख लिया | साथियों ने इतनी रूचि दिखाई और आशीर्वाद दिया वह प्रफुल्लित करने वाला है , जब कि मामला नितांत व्यक्तिगत ही तो था !
और फिर उसी से तो प्रेरित होकर मैंने पत्रकारिता की । पोस्ट कार्ड से लेकर साइक्लो परचे तक , और फिर प्रिय सम्पादक -----   kwt
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[उवाच ]
* यदि हमारे और आपके विचार एक से ही होने होते ,तो विश्व की जनसंख्या में एक अदद की कमी न हो जाती ? फिर एक काम के लिए ईश्वर ने  दो मनुष्य बनाया ही क्यों होता ?
* कुछ प्रश्नों का सचमुच कोई उत्तर नहीं होता , जैसे यही जातिवाद - जातीय भिन्नता - ब्राह्मणवाद का !
* सच कह रहे हैं आप ! आप मुझसे छोटे नहीं हैं | लेकिन मैं आपसे छोटा हूँ तो सही ? 27/5/12
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कविता =  ' नानी की मौत '
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मैं नहीं जानता जीवन मृत्यु ,
आदमी क्यों पैदा होता है ?
कैसे मरता है ?
लेकिन जब तुम
मर जाओगी नानी
तब मैं बहुत रोऊँगा |
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मित्रों को हार्दिक धन्यवाद मेरी और से | और शिशु दिनमान का आप सबका चरणस्पर्श आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए | दोस्तों, मज़ा और तो तब आये जब उसका नाम केवल दिनमान रहे या दिनमान नागरिक हो जाये ,लेकिन  सोचता हूँ - किसी पर ज्यादा जोर डालना ठीक नहीं है | कोई विवाद नहीं पुनर्जीवित करना चाहता | पर इसे राजनीतिक विडंबना, या अपनी पराजय तो मानता हूँ या इस अवस्था में शक्ति की कमी  कि यदि बहू - बेटा उसका नाम स्कूल में श्रीवास्तव जोड़ कर लिखाएंगे तो मैं मना नहीं कर पाउँगा | अपना ही नाम कहाँ छिपा पाया ? बताना ही पड़ा कि मैं सवर्ण हूँ जिससे मेरे सामाजिक -राजनीतिक कर्म में कोई छद्म न पनपे , और जब सवर्ण हूँ तो कोई जाति बतानी ही थी | प्रमोद श्रीवास्तव जी के अनुसार हिन्दू धर्म का मतलब ही  जाति है , ये दोनों एक दूसरे से पृथक नहीं हो सकते ,और मैंने हार मान ली | यद्यपि कोशिश पूरी ईमानदारी से की जाति मिटाने की | लखनऊस्कूल के लोग जानते हैं , युवजन समिति के माध्यम से आन्दोलन को | अब इसका दोष सरलीकृत ढंग से आरक्षण / मंडल को दूँ तो दोषी हो जाऊँगा | इसलिए संतोष करता हूँ यह सोचकर कि तब हम नादान थे , युवा उत्साह था और  दुनिया की समझदारी में कमी थी , जिसकी  रौ में हम बह गए थे | तब भी इतना तो कर ही सका था कि बड़ी बेटी [दिनमान की एकमात्र बुआ] का नाम रजनीगंधा और छोटे एकमात्र बेटे[दिनमान के बाप] का नाम नवनीत कुमार बिना किसी उपनाम के रखा | बस वहीँ तक मेरी सीमा थी | मन थोड़ा खिन्न तो होता है , पर लोकतान्त्रिक आध्यात्मिकता के सहारे खुश होने की चेष्टा करता हूँ | आप सबका आभारी हूँ जो आज मेरे सुख / दुःख में मेरे साथी हैं |   26/5/12
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HURRAY !  all my friends , I could name my one month old only granson  as  “ DINMAAN “ (or Dinman Srivastava ) which was my long pending ambition  , based on my favourite magazine – old DINMAN edited by Aggeya and then Raghubir Sahai . I am very pleased today that my son accepted this name for his son . 26/5/12
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[नागरिक उवाच ] :- बदमाश चिंतन
बड़ी तपस्या करनी पड़ती है माँ को बहू की थोड़ी सी फटकार सुनने के लिए !
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[कवितानुमा] - कर्म विरत

मैं कुछ नहीं करता
उसे भी मेरा किया
मान लिया जाता है
मैं करूँ तो क्या  करूँ
जिससे मैं निर्दोष रहूँ ?
संभव नहीं इस जग में
कर्म विरत रहना
तो क्यों न कुछ करता रहूँ ?

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[कवितानुमा] :- प्रथमदृष्टया
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एक -एक अंग जुड़ करके
पूरा शरीर बना ,
अतः , यदि शरीर की
कोई सार्थकता , प्रतिष्ठा है
तो इसका हर एक अंग
बहुत सुंदर होना चाहिए ,
अत्यंत  सुंदर है
चाहे वह कितना ही कुरूप हो ,
प्रथमदृष्टया |    
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जो मैंने ' प्रिय संपादक '[पत्र मासिक] , के ज़रिये अस्सी के दशक से करना शुरू किया था , उसे फेस बुक और ट्विटर ने अब करके दिखा दिया | मेरी सोच और परिकल्पना असफल नहीं गयी , ऐसा मैं कह सकता हूँ, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू बन सकता हूँ |
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[ कथा भूमि ]     कुछ ख़ास नहीं 

मैंने ' ' की तारीफ की तो ' ' ने ' ' को बताया | मैंने ' ' की तारीफ की तो उसने ' ' को बताया | मैंने ' की प्रशंसा की तो उसने ' ज्ञ ' को चहक कर बताया की अमुक मेरी बड़ाई कर रहा था | मैंने ' ज्ञ ' की बड़ाई की तो उसने ' ' के कान में फुसफुसा कर कहा कि फलाने तो मुझे पसंद करते हैं | ' ' ने ठहाका लगाया और बोली - पगली उसकी बात पर न जा , उसने सबसे पहले मुझसे भी यही बात कही थी |
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ज़माना तो बदलेगा
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ज़माना ' यूँ ' न बदलेगा ,
ज़माना ' वूँ ' न बदलेगा ,
ज़माना ' यूँ ' तो  बदलेगा ,
ज़माना ' क्यूँ ' न बदलेगा ?
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सरकार इतना धन कहाँ से पाती है खर्च करने के लिए ? उसके पास बहुत सारा पैसा है | उसके पास तमाम फिजूल पैसा है अपने सांसदों के वेतन - भत्ते बढ़ाने के लिए , अपार धन है जिससे उसमे बैठे आदमी , विधायिका  एवं कार्यपालिका के लोग खूब गुलछर्रे उड़ाते हैं , गड़बड़ घोटाले करते हैं  इसलिए यदि पैसे की बर्बादी बचानी है तो सरकार की आमदनी रोको | उसकी आमदनी मुख्यतः कर द्वारा होती है | उसे सीमित कर दो | सरकार को सिर्फ चिड़िये की प्यास बुझाने भर को पैसे दो | इनकम टैक्स बिलकुल बंद करो | कर्मचारियों का वेतन उनका इनकम नहीं है | ऐसे तो कुछ दिन बाद साधारण मजदूर भी इसके अंदर आ जायेंगे ! यह पैसा जिनके पास है उन्ही के पास रहने दो वे इसका ज्यादा सदुपयोग हिफाजत से  करेंगे | बजे इसके कि सरकार इनसे टैक्स ले और इनके ऊपर जनहित के नाम खर्च करने के बहाने घोटाले करे | शायद आप कहना चाहें कि घोटालों का पैसा भी तो इन्ही के बीच जाता है ? जी नहीं , तब वह गलत पैसा होने की भावना के साथ उनके पास जाता है और इससे उनकी आत्मा कलुषित होती है | उनके द्वारा कमाए गए उचित धन को उन्ही के पास रहने दो |      kwt
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*Slut walk  is a spiritual journey . Get away with the load of thoughts and prejudices . Let your mind be uncovered, unclothed and dress it like a slut.
*If I can support you , why can’t I oppose you ?
*Ladies can go bare for a slut walk , but they can not breastfeed their child , in public what to say , in private even.
*It is very expensive to wear clothes , even the shortest most . Then why not go naked ? Why this body-covering DEE ?
* In fact ,who cares what you wear if you dare so . it is you who are sensitive about it  . Why do you not attend a marriage party in Lungi , and your class room in a spaghetti dress ?
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[शेर ]
*मैं बुरा हूँ , बुरा कहे कोई  ;
क्यों न मुझको बुरा कहे कोई ?
or -
[क्या बुरा है जो सच कहे कोई ?]
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[गीत नहीं बन पाया ]
 जब से मैंने होश संभाला , द्वंद्व - द्वंद्व झेला ,
संगी- साथी, खेल - खिलाड़ी दंद -फंद खेला |
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* मैं शुरू से यह आभास कर रहा हूँ कि हमारा जरनैल सिंह निहायत नामाकूल सख्श है | क्या ३१ मई से पहले इनसे छुटकारा नहीं लिया जा सकता ?
[विचारहीन]
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* मेरा ख्याल है - दुःख में आदमी का दुखी होना तो स्वाभाविक है ,पर अपने दुःख को छिपाकर झेलना चाहिए , प्रकट नहीं करना चाहिए , ज्यादा हाय -तौबा नहीं मचाना चाहिए | लेकिन आदमी को अपने अपने सुख में सुखी होने और दिखने का कुछ ज्यादा ही नाटक करना चाहिए | जिससे दुनिया सुखी रहे |     kwt
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[हाइकु]

* मज़ा आता है
बातें करते हुए
फेसबुकी से |

* कथा कहूँ तो
कहाँ से शुरू करूँ
अतः चुप हूँ |

* मजबूरी है
सासुओं -ससुरों की
बहू अच्छी है !

* खिलाड़ी जन
सब बिके हुए हैं
खेल क्या देखें ?

* थोड़ी व्यवस्था
थोड़ी प्रकृति रहे
जीवन चले !

* ज्यादा खर्चा है
थोड़ा पहनने में
ज्यादा पहनें !

* कोई संतान
लायक नहीं होती
पितृ - दृष्टि में |

* इस तन में
कुछ रखा नहीं है
मैं जान गया |
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स्लट वाक-
अप्रेल २०११ में किसी देश की  पुलिस ने लड़कियों के लिए कह दिया कि वे स्लट की तरह कपडे न  पहना करें | इस पर पूरे विश्व में हाहाकार मच गया | औरतों ने इसे अपनी आज़ादी का मुद्दा बना लिया | उनका कहना है कि वे जो चाहेंगी पहनेंगी ,स्लट की तरह कपडे पहनेंगी  कोई उनसे छेड़खानी या बलात्कार क्यों करे | अपनी इस बात को लेकर अपने आन्दोलन में वे कम से कम कपड़ों में मार्च करती हैं , जिसे स्लट वाक कहा जाता है | उनका एक तख्ती यह भी कहती है - आओ बलात्कार करो | अब पुरुष इतना कमीना तो है नहीं , कामुक पुरुष तो वैसे भी कमज़ोर होते हैं | अतः उनका आन्दोलन अख़बार की सुर्ख़ियों में सफल होता है , और लडकियाँ फिर सामान्य कपडे पहन लेती हैं | इस तरह के विरोध पर एक लोक कथा है कि एक आदमी ने ठान लिया कि उसे अपने साथी की बात नहीं माननी है | साथी ने कहा देखो नदी में न उतरना , वह नदी में घुस गया | साथी ने कहा -देखो जाओ तो जाओ ,लेकिन गले में पत्थर बाँध कर मत जाना , उसने भरसक वज़नदार पत्थर रस्सी में बाँधकर गले से लटका लिया | साथी ने कहा -अच्छा, पर गहरे पानी में न उतरना , वह गहरे , और गहरे पानी में उतरता चला गया |नतीजा हमें नहीं पता , आप शायद कुछ अनुमान कर पायें | क्या दोनों कहानियों में कुछ साम्य दिखता है ? एक पुलिस वाले की साधारण -सामान्य बात को इतने अतिशयोक्ति में ले लिया गया कि यह सोचा ही न गया कि शायद  साथी ने  कुछ थोडा सा सच न कहा हो, या तब भी इतना तो विरोध न करें , पहनें चाहे जो पहनें | वे जाने , उनका खर्च चलने वाले माँ-बाप जाने | हम कौन होते हैं बीच में बोलने वाले और वैसे भी हम औरतों के बारे में कुछ कह नहीं सकते  , उनकी आलोचना नहीं कर सकते | पुलिस ही मूर्ख थी , होती ही है |     
विचारहीन प्रोडक्श्न्स (प्राइवेट लिमिटेड )
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भूमि अधिग्रहण
वह एक शेर है - मुझे मस्जिद में बैठकर शराब पीने दे , या वह जगह बता की जहाँ पर खुदा नहीं | उसी तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि विकास के लिए मुझको ज़मीन लेने दे , या वह ज़मीं बता कि जो कीमती न हो | कहा जाता है कि उपजाऊ ज़मीं न लिया जाय | तो भला ऐसी कौन सी ज़मीन है जो उपजाऊ या किसी अन्य उत्पादक कार्य के लिए उपयुक्त न हो ? चीन ने जब भारत का भूभाग ले लिया था तो नेहरु जी ने यही तो कहा था कि छोडो , वहां कुछ नहीं उगता | अर्थात उसे चीन  ने ले लिया तो हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ | लेकिन उनके इस वक्तव्य की तो बड़ी आलोचना हुई ! यहाँ तो ऊसर ज़मीनों को भी उपचार द्वारा उपजाऊ बनाया जा रहा है , और उसके लिए सरकारतमाम धन व्यय कर रही है इस प्रकार किसी भी धरती को बेकार नहीं कहा जा सकता | हर ज़मीन , धरती का हर टुकड़ा किसी न किसी प्रकार सार्थक है , तो क्या सड़कें न बनें ? दूसरी राजनीतिक माँग है कि मालिक की मर्जी के बगैर उसकी ज़मीन न ली जाय ! तो , मर्जी होने , न होने के पीछे तो कई तरह की प्रेरणाएँ होती हैं , लेकिन उस विवाद में मैं नहीं जाऊंगा | लेकिन तब स्थिति यह हो सकती है कि सड़क के रास्ते में कुछ टुकड़ों में सड़क होगी और बीच - बीच में कृषि योग्य खाली ज़मीन | तब वहां या तो कैंटीलीवर फ्लाई ओवर बने , या ऐसी गाड़ियाँ बनें जो आवश्यकतानुसार उछल - उछलकर चलें | दूसरा विकल्प मेरे विचार से ज्यादा मज़ेदार होगा | [विभास]   
(विचारहीन भारतीय समाज)
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खुशवंत सिंह निकट शतायु हैं , अर्थात मेरे पैमाने पर काफी बुज़ुर्ग | और वह सजग , बुद्धिमान ,पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी हैं | राष्ट्रपति पद के लिए मैं उनका नाम प्रस्तावित करता हूँ | [निर्विवाद = निर्विचार (thoughtless) वार्ताकार दल]
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[हाइकु]
अच्छा शासन
मैं अवश्य चाहूँगा
अच्छा ईश्वर !

इस दिल में
प्यार की क्या कमी है
जो भी ले जाये |

लालच तो था
मेरे मन में , पर
कह न पाया |

मानो न मानो
कोई दबाव नहीं है
मान भी जाओ |

याद आ गया
एक वह समय
हम युवा थे |
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[उवाच]
वह मुझको कुछ नहीं समझते /
मैं उनको कुछ नहीं समझता /
दुनिया हमको कुछ नहीं समझती |
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कविता -
डाक्टरों की पर्चियां
कुछ दवाओं की रसीदें
मिलेंगी तुमको
सिरहाने से मेरे ,
मत खौफ़ खाना
इन्होने ने ही तो
बचायी ज़िन्दगी मेरी
अभी तक , अभी
थोड़ी देर पहले तक !
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हाइकु -
१ - सब झूठ है
सचमुच भ्रामक
ईश्वर - धर्म |

२ - प्यास बढ़ाने से
कोई फायदा नहीं
प्यास मिटाने से |
[यह हाइकु नियम पर खरा नहीं है]
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[कविता]
बर्तन मायके में भी माँजती थी
बर्तन ससुराल में भी माँजती हूँ,
गोबर चारा वहां भी करती थी
गोबर चारा यहाँ भी करती हूँ ,
वहां भाई पीटता था
यहाँ मर्द लतियाता है ,
वहां माँ- बाप थे
यहाँ सास -ससुर हैं
मुझे पसाने के लिए ,
मेरा नर्क तो हर जगह है | 24/5/12
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