शनिवार, 25 अगस्त 2012

16/5/12


[कविता ] :-

जीते गए 
जीतते गए 
ज़िन्दगी | #  
------------------------------------------------------

सरकारी किताबें ऐसी होनी चाहिए जिससे देश में ऐसे नेता -अधिकारी तैयार  हों अन्ना टीम  जिनके गुणगान करते नहीं थकती ! 20/5/12
-------------------------------------------------------
KWT

सवर्ण समालोचना :-
प्रथमतः हम यह स्पष्ट कर दें कि एक सवर्ण के तौर पर हम यह मान सकते हैं कि आंबेडकर कार्टून पर आपत्ति नहीं की जानी चाहिए | यदि वह कार्टून कोर्स में होता ही तो भी उसे सहन किया जाना चाहिए था जैसा कि दलित अन्य विसंगति सह रहे  हैं | हम तो हिन्दू देवी देवताओं के नग्न चित्रों पर भी कोई  प्रतिबन्ध , या  बावेला नहीं चाहते थे | लेकिन जब उन्होंने इसे आपत्तिजनक मानकर मामले को उठा ही दिया है तो हमारा यह कर्तव्य बनता है कि आपत्ति  औचित्य- अनौचित्य  पर निष्पक्ष- निरपेक्ष भाव से पुनर्विचार करें | पहले तो हम यह मान  लें कि कोई भी कलाकार त्रुटियों से परे कोई पराप्राकृतिक प्राणी  नहीं होता | यदि आंबेडकर की व्यक्ति पूजा नहीं की जानी चाहिए तो निश्चय ही शंकर पिल्लई की भी आराधना नहीं की जानी चाहिए | दूसरे यह कि यदि किसी की कविता -कहानी -लेख -कार्टून कोर्स की किताब में  शामिल  हो पाए तो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए घातक नहीं  कहा जा सकता | तीसरे , किसी भी कला का श्रोता - दर्शक -समीक्षक सम्बंधित कलाकार से कम कलाकार नहीं होता | इसलिए हम एक जनता-पाठक की हैसियत कार्टून [की प्रासंगिकता] की चीर फाड़ साधिकार कर सकते हैं |
घोंघा [स्नेल] एक जीव है जिसका सहारा धीमी गति के प्रतीक रूप में कार्टूनिस्ट ने किया | ज़ाहिर है उस पर आंबेडकर कोड़े चला सकते थे , और नेहरु भी | उस समय के लिए तो बात आई गयी ख़त्म हो गयी | लेकिन संविधान हमेशा धीमे चलने वाला जंतु तो है नहीं , वह तो एक निर्जीव [ किन्तु पूर्ण जन समर्पित एवं देश पर लागू ] पुस्तक के रूप में हमारे सामने है और उसके निर्माता के रूप में अम्बेडकर का नाम सर्व विदित है | तो अम्बेडकर अपनी किताब को तो पीट पीट कर दौड़ा नहीं सकते थे ? अतः यह निष्कर्ष निकालने में किसी छात्र और शिक्षक को कोई  कठिनाई  नहीं होगी कि नेहरु का हंटर आंबेडकर के लिए है | और यही है उस कार्टून पर दलितों के आपत्ति का मुख्य कारण , जो पूरी तरह से वाजिब है
और देखें , तो क्या संविधान का धीरे या तेज बनना आज कोई महत्त्व रखता है ? या यह बताना कि संविधान निर्माण कमेटी  में कितने सदस्य , कौन - कौन थे और उन्होंने इसकी ड्राफ्टिंग में कुल कितने घंटे का समय दिया ? सारा भार अम्बेडकर पर था , और इसीलिये लगभग  अकेले संविधान के निर्माता के रूप में दलितों में जो  उनकी ख्याति है ,वह वस्तुतः तो  गलत तो नहीं है श्रेय भले कितने ही लोग लें | तो , हम भले सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त हों , पर अम्बेडकर के प्रति हमें  इतना कृतघ्न तो नहीं होना चाहिए कि उनके सम्मान को एक कार्टून की बलि वेदी पर चढ़ा दें , या उनके असम्मान की कोई भी गुंजाईश किताबों में छोड़ें | यदि मान लें कि वह हमारे पूज्य या पूर्वज नहीं हैं , तो भी हमें मानना होगा कि किसी के भी पुरखों का अपमान करके हम अपने पुरखों का सम्मान बचा नहीं पाएंगे | और अंततः पुनः इस तथ्य पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है , और यह गलती व्यापक रूप से मीडिया में व्याप्त है | कि हमारी समस्या/ हमारा काम सम्प्रति  छात्रों के लिए उपयुक्त पठन सामग्री चुनने की है , न कि अख़बार चलाने की |
यहाँ यह भी प्रश्न नहीं है कि अम्बेडकर का चित्र नहीं छापा जा सकता |20/5/12
---------------------------------------------

[कविता]
आने में नहीं ,
रास्ता ढूँढने में 
देर लगी  |
----------------------------------------------------

भारत में राजनीति को वह स्थान नही मिला जो उसे मिलना चाहिए यही कारण है कि  हमारे देश में राजनीति शुद्ध नहीं हो सकी , न शुद्ध लोग ही राजनीति में आये जिससे इसकी सफाई हो सकती | गन्दगी में गंदे लोग ही आये और पले बढ़े , और उन्होंने इसे और गन्दा ही किया | कारण , कह सकते हैं कि भारत में जनता के बीच राजनीतिक संस्कृति थी ही नहीं थी | यह काम राजा के जिम्मे था | लोकतंत्र का विकास नीचे से हुआ  ही नहीं | अलबत्ता , दूसरी तरफ यहाँ धर्म को ज्यादा मान्यता मिली | जनता उसमे ज्यादा रची बसी थी | इसीलिये संतों -महात्माओं को राजनेताओं की अपेक्षा अधिक महत्त्व मिला , और उन लोगों ने उससे जो राजनीतिक काम भी कराया , उसने किया | प्रथम जन विद्रोह सेना के माध्यम से कारतूस में पशु की चर्बी के चलते हुआ , अर्थात धार्मिक चेतना के कारण , न कि राजनीतिक चेतना वश | गौर करें तो गाँधी और गाँधी की राजनीति उनकी संतई के प्रभाव में ग्राह्य और  सफल हुई और उन्हें महात्मा कहा गया | विनोबा , जे पी भी संत या संत समान थे तभी जन मानस में उनकी घुसपैठ  संभव हुई | आज के समय में भी जय गुरुदेव - रामदेव ज्यादा सम्मानित हुए , और संत छवि के कारण ही अन्ना का आन्दोलन कुछ ही सही, सफल हो रहा है | अवश्य कुछ खालिस राजनेता भी जनगण मन को जीत सके , सुभाष , नेहरु , पटेल , आंबेडकर आदि अपवाद हैं , पर वे सब स्वतंत्रता आन्दोलन की उपज या देन      
थे | तिस पर भी सूक्ष्म दृष्टि डालें तो उन पर भी धर्म की एक झीनी चादर चढ़ी है | तो फिर आज कैसे उम्मीद करें की कोई खरा राजनेता उभरे जब यहाँ राजनीति गन्दा काम माना जाता है , संत महात्मा कितने भी गंदे काम करें , पूजे जाते हैं |
---------------------------------

ममता बनर्जी अपने प्रदेश का काम काज देखें कि कहीं कोई उनके कार्टून तो नहीं बना रहा है , और कोई मिल जाये तो उसे जेल भिजवाने का काम करें | MCC के काम में हाथ बताने का कष्ट न करें | क्योंकि , एक तो वह घटनास्थल पर थीं नहीं और दूसरे वह देश की दीदी भले हैं , नानी या रानी नहीं हैं |
-------------------------------

- - - तो अब शंकर पिल्लई पवित्र गाय हो गए ? महान , infallible कलाकार ,जिनसे कोई गलती हो ही नहीं सकती ? [ और वैसे ही योगेन्द्र / सुहास विद्वतजन भी ] | फिर भी कोई दलित उनका निरादर कहाँ कर रहा है ? उनके कार्टून पर प्रतिबन्ध की माँग कहाँ कर रहा है ? यह तो उसी तरह से है , जैसे कि वह  उसे पुरस्कृत करने [कोर्स की किताब में रखकर] के पक्ष में नहीं हैं | बस | पता नहीं  इसे अभिव्यक्ति की हत्या कैसे माना जा रहा है ! या हो सकता है हम स्वतंत्रता प्रेमियों की बात को ठीक से समझ न पा रहे हों , पर यह इतना उलझने वाला मामला तो नहीं लगता !
-------------------------

शाहरुख़ खान के लिए हम कठोर दंड का प्रस्ताव कर सकते थे , लेकिन डर है कि फिर वही
वितंडा खड़ा हो जायगा कि उनके 'खान ' होने के नाते उन्हें सताया जा रहा है | शबाना आज़मी तक यह हथियार अपना चुकी हैं | यह सुविधा तो है ही इन लोगों के पास |- - - और उनके पास भी आस्था और जनमत की ताकत है --------------------------

अन - अनुशासन :-
फौज के बीच झगड़ा तो होना ही था | सब जनरल के झगड़े का रंग है
--------------------------------

[कविता] - आँसू के खून
------
'खून के आँसू'
एक प्रचलित मुहावरा है ,
तो आँसू के भी खून 
ज़रूर होते होंगे !
हैं न मेरे पास 
शिराओं में दौड़ते ! #
---------------------------

[व्यक्तिवाचक] - मेरे दुःख का कारण यह है कि मैं अपने ऊपर ज़रुरत से ज्यादा जिम्मेदारियां लाद लेता हूँ | इसका निवारण यह है कि मैं एक -एक करके इनसे मुक्त हो हो जाऊं | 19/5/12
-------------------------------------------------------------------------------------

कथा संभव :   देहाती औरत 
-------------
हमारे बेटे को जब बेटा हुआ तो पत्नी ने कहा -पोते का नाम कुछ ख़राब सा रखो , उसे दीर्घ जीवन मिले | गाँव में विश्वास है कि ऐसा करने उन दम्पतियों के बच्चे जी जाते हैं जिनके बच्चे पैदा होकर मर- मर जाते  हैं
-लेकिन हमारा तो पहला पोता है , और बड़ी पोती भी अच्छी भली है |
- उससे क्या होता है , एक ही जिए -जागे - अम्मर रहे |
- पड़ोसी  के पूछने पर मैंने  पोते का नाम ' बेकारू ' बताया  | ख़राब नाम रखने और अच्छा नाम न रखने का कारण पूछने पर जो कारण था वह  बता  दिया | " न विश्वास हो तो चाची से पूछो " |
लेकिन चाची ने उसकी पुष्टि नहीं की | बस इतना कहा कि इन्होने रख दिया तो ठीक है |
  उनके जाने के बाद मैंने इनसे पूछा - तुमने मेरी बात को सही क्यों नहीं कहा , जब कि तुमने ही मुझसे यह बात कही थी ?
- तुम समझते नहीं हो , पड़ोसी मुझे देहाती भुच्च्रड़ समझ लेते | # 19/5/12
----------------------------------------------------------------------------

चार बातें 
----------
- हमारी अंतरात्मा में  सीधे - सीधे वह वस्तु क्यों न हो जो आपके इष्ट संत [ जैसे साईं बाबा] की अंतरात्मा में थी या है - स्वार्थ से निकल कर जनहित -जनसेवा की भावना ?
-जिस धन पर टैक्स न चुकाया गया हो वही काला धन हो जाता है | बाबा रामदेव टैक्स नहीं चुका रहे हैं |
- यह तो तय है कि हमें गुलाम बनना है | आजादी के मूल्य हमारे खून में नहीं हैं | अब हमें तय यह करना है कि हम किसकी गुलामी स्वीकार करें , अंग्रेजों की , अमरीका की , माओवादियों  की ,  आतंकवादियों की , या अपने दलित भाइयों  की
- कोई ज़रूरी है क्या कि हम जो सोचते -लिखते हैं वह सही ही हो ? हम गलत भी हो सकते हैं , वह हमारा अधिकार है |18/5/12

===============================================================================

शाहरुख़  खान अमरीका जाते रहते हैं और उसकी गुण्डई से अपमानित होने का पर्याप्त अनुभव है उन्हें । तो उससे कुछ सीख भी ले लें | डाॅनगिरी करें और माफी माँग लें ।  18/5/12
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

अध्यक्ष जी की अनुमति से 
----------------------------
जैसे सभाओं का अध्यक्ष कुछ नहीं करता , केवल सभा की शोभा बढ़ाता है | उसके नाम पर उसकी बिना दी गयी अनुमति से संचालक अपने मन से सभा को चलाता है | अध्यक्ष को तो सबसे अंत में बोलने कि नौबत आती है , तब तक सभागार लगभग खाली हो चुका होता है | उसे बोलने की ज्यादा स्वतंत्रता भी नहीं होती , पिछले वक्ताओं की बातों को समेटने के सिवा
उसी प्रकार ईश्वर की अनुमति से इस संसार रूपी सभागार को कुछ धूर्त संचालक अपनी मन मर्जी से चला रहे हैं , और उसके नाम पर  सारा गुल - गपाड़ा , छल -छद्म कर रहे हैं | भोले श्रोतागण इस उम्मीद में बैठे  इनके ठगी के शिकार हो रहे हैं कि अंत में तो अध्यक्ष ईश्वर कुछ बोलेगा ! उन्हें क्या पता कि वह कुछ नहीं बोलेगा क्योंकि वह गुस्से से सभागार छोड़ कर बाहर निकल गया है और अब वह वहां है ही नहीं  | #
- हिन्दुओं में कथा सुनने की परंपरा है | कोई भी अवसर आया , पंडित बुलाया , पंजीरी -चरणामृत बनवाया और सत्य नरेन व्रत कथा सुन ली | सुनने  वाले को आज तक यह पता नहीं चला कि वह असली कथा कहानी क्या थी जिसे कन्या कलावती आदि ने सुना , या नहीं सनने पर दंड भोगा ?
आगे सोचें तो कथा तो साहित्य का अंग है | तो क्या हिन्दू स्वभावतः , संस्कार से इतना  कथा/ साहित्य  प्रेमी हैं ? असंभव नहीं , क्योंकि आज हिंदी कहानियाँ लिखी तो वैसी ही जा रही हैं , जिनके बारे में पता नहीं कि कन्या कलावती ने कौन सी कथा सुनी थी ? हम तो उसे न सुनने की सजा भुगत रहे हैं | #
- जिसमे सबसे कम पैसा खर्च हो , मेरे ख्याल से वही शिक्षा पद्धति सर्वोत्तम है | #
- मैं सोचता हूँ कि इतनी आजादी तो है सबको हिंदुस्तान में ! फिर भी कुछ मुसलमान कश्मीर में क्यों नहीं रहना चाहते ?
- मेरे इस ख्याल में क्या खोट है कि यदि कोई अँगरेज़ ईसाई अरब देश में जाय तो वह यह जान ले कि उसे इतवार को  छुट्टी नहीं मिलेगी ? और इसी प्रकार मुसलमान को फ़्रांस में जुम्मा की छुट्टी नहीं मिलेगी ? हिंदुस्तान की बात और है और वह निराली है | यहाँ तो कोई भी आये अपने मन में ख्याल बना कर आये कि वह इस देश का मालिक और राजा है , वह जब , जैसा चाहें , कुछ भी कर सकता है | यहाँ से एक विश्व राजनीतिक व्यवस्था की परिकल्पना करने का मन हो रहा है | वह यह कि तमाम देशों में भिन्न भिन्न प्रकार के राज्य हों -सिख , ईसाई , इस्लामी , साम्यवादी , सेकुलर [हिन्दू और नास्तिक भी] इत्यादि , और नागरिकों को कहीं भी जाने रहने की आजादी हो | जिसको जैसा शासन पसंद हो वह उसी प्रकार के देश में जाकर बसे और हार्दिक -मानसिक -आस्थिक रूप से खुशी खुर्रम से रहे | आज तो अजीब किस्म की तनातनी चल रही है | एक कमज़ोर सीधे सादे देश को कोई माओवादी बना रहा है , कोई इस्लामी बनाने के चक्कर में है तो कोई सेकुलर , तो कोई राज करेगा खालसा का उद्घोष कर रहा है, और हिन्दू तो यह खानदानी है  | इससे वह कुछ नहीं बन पा रहा है , और जनता की एकनिष्ठता और प्रतिभा का समग्र प्रयोग / उपयोग नहीं हो पा रहा है | इस प्रस्ताव को हवाई कहकर भले टाल दिया जाय , पर यह लोकतंत्र का शिखर हो सकता है | सचमुच क्यों रहें देश की सीमायें ? और कोई भी व्यवस्था  अपने देश की सीमायें क्यों लांघे ? अनेकता का पालन विश्व स्तर पर हो अपने अनुशासन के साथ |
16/5/12

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें