गुरुवार, 14 अक्तूबर 2010

काल्पनिक संवाद / अंश-अंश उपन्यास 7 up

८ - 
७ -  जब हम डंका बजा देते हैं तब हम प्रसिद्ध तो हो जाते हैं , पर हमारा काम लम्बे समय तक खिंच नहीं पाता |
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६ - मैं क्यों समझाऊँ ?  अक्ल आएगी तब स्वयं समझ जायेंगे |
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५ - अब गाँव  क्या  जाएँ ! वहाँ मेरा कोई सपना नहीं रहता |

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*४  - मैंने ईश्वर से पूछा - आखिर दुःख की कोई सीमा है जो तुम मुझे दे रहे  हो ?
उसने कहा - कोई सीमा नहीं है | जितना तुम दुःख से दुखी होते रहोगे उतना मैं उसे तुम्हे देता रहूँगा |
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      ३ -   *    न तुम समझ पाओगे न मै समझा पाऊंगा ..
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      २ -  *  कपडे बहुत मजबूत नहीं होने चाहिए . उन्हें फटने भी चाहिए जिसे सिलकर फिर पहना जा सके  .  जिससे  होली  दिवाली ,ईद  , दशहरा में नए कपडे बनवाने कि ललक बनी रहे और बनने पर ख़ुशी हो  . न बन सकने पर मलाल और नाराज़गी भी जिंदगी का हिस्सा हो  . .
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       १   *क्या करें !  कुछ भी तो बराबर नहीं हो सका मुझसे , न खेत -खलिहान , न सम्बन्ध |
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