सोमवार, 9 जुलाई 2012

हम सब दलित आन्दोलन


अब दिमाग ठंडा हो गया | इसलिए नहीं कि दोस्तों पर गुस्सा उतार लिया ,  बल्कि इसलिए कि एक नया कार्यक्रम दिमाग में आ गया | =

हम सब दलित आन्दोलन
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अब यह तो निश्चित हो चुका है कि जातियाँ इतनी आसानी से जाने वाली नहीं है | नाम - उपनाम छोड़ने की नौटंकी से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा | तो फिर यह कैसे समाप्त हो ? इस दिशा में महती काम यह है कि हम अपने ब्राह्मण , अपनी सवर्णता के छद्म और दंभ को तोड़ें | यह काम दलितों का नहीं हो सकता | उनके पास है क्या जिसे वे मिटायें ? पर हमारे पास तो बहुत कुछ है मिटाने को जिसके न मिटने के कारण ही दलित हमसे असंतुष्ट और नाराज़ हैं | तो जातियां रहेंगीं तो दलित तो रहेगा | अब अपनी सवर्णता मिटाने  के लिए हम यह करें कि हम भी दलित हो जाएँ | तब जाति तो रहेगी पर उसका नाम केवल दलित होगा और ब्राह्मणवाद का विनाश होगा | इस प्रकार हम यह करें कि ज्यादा कुछ न करें , न अनावश्यक उछल- कूद करें, न तोड़- फांद मचाएँ | एक कार्यक्रम बना लें ,पहले मनःस्थिति की, कि हम दलितों के साथ उठने बैठने  - खाने पीने - दोस्ती गाँठने इत्यादि में कोई परहेज़ ,कोई संकोच, कोई भेदभाव न बरतें , बल्कि सायास उनके साथ हों / रहें , उनके आंदोलनों के सक्रिय किन्तु मौन सहयात्री बनें | ज्यादा बढ़ चढ़कर बोलेंगे तो आप का आदर्श नहीं आपका संस्कार मुँह से निकल कर सारा कार्यक्रम चौपट कर देगा | शादी विवाह का मामला अभी रहने दें , अपने हाथ में न लें | यह पुत्र पुत्रियों पर छोड़ें | कोई ज़बरदस्ती तो है नहीं ! पर यदि उनमे प्रेम हो तो विवाह में बाधक नहीं भरसक प्रोत्साहक बनें | यह तो शायद हम लोग काफी हद तक व्यवहृत करने के लिए सहमत ही हैं |
अब आगे की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है | शैक्षिक  प्रमाणपत्र , जिनमें जाति अंकित हो ,संदूक में बंद कर दें , या जहाँ ज़रुरत हो वहाँ दिखाएँ | समाज में हर वक्त तो कोई आपका सर्टिफिकेट माँगता/ देखता नहीं , और यह सामाजिक फिजां - वातावरण बनाने का कार्यक्रम है न कि आरक्षण प्राप्त करने की साजिश |
सामान्यतः होता यह है कि समाज में कोई अपरिचित व्यक्ति या यात्री आपकी जाति जानने के लिए -
 - ' भाई साहब/ बहन जी ,आपका शुभ नाम ? '  
- जी मेरा नाम दीपक श्रीवास्तव / धनञ्जय शुक्ल / पूनम सिंह / ज्योति पाण्डे/ इत्यादि है | [असली नाम बताएँ जो भी आपका है | लेकिन अपने वसूल पर कायम रहते हुए आप उससे उसकी जाति कदापि न पूछें ]
ज़ाहिर है अब वह चुप हो जायगा और आपसे सावर्णिक व्यवहार करने लगेगा | तब आप उसे कुरेदिए -  लेकिन भाई साहब, आपने मेरी जाति तो पूछी ही नहीं ?
- वह तो आप के नाम से ज़ाहिर है |
- नहीं भाई साहब , उससे ज़रा धीरे से कहिये , - दरअसल मैं दलित जाति का हूँ |
- फिर आपने यह  शर्मा / वर्मा / सिंह / श्रीवास्तव क्यों लगा रखा है ?
- इज्ज़त के लिए भाई साहब ! इज्ज़त बड़ी चीज़ है | यह तो मैंने आपसे बता दिया मैं कौन हूँ , सबसे थोड़े बताता हूँ ! बड़ा भेदभाव झेलना पड़ता है |
- तो आपको तो आरक्षण का फायदा मिलता होगा ?
- आप सही कहते हैं , मिल सकता था | लेकिन मैं घर से संपन्न हूँ न ! चार बीघा तो पुदीना बोया जाता है दूसरे गाँव में भी खेत है, शहर में तिमंजिला पक्का माकन है , और यह , और वह - (हाँक दीजिये , कौन खसरा खतौनी लिए बैठा है) | और भाई साहब , हमारे लोगों में मुझसे ज्यादा गिरी हुई अवस्था में बहुत सारे लोग हैं | इसलिए मैंने आरक्षण फोरगो कर दिया , यह उन्हें मिले जिन्हें इसकी सचमुच और ज्यादा ज़रुरत है | हमारा काम तो चल ही रहा है | कौम की सेवा मेरे निजी लाभ से ज्यादा ज़रूरी है | है न बही साहब ?
नोट : - जब सवर्ण दलित में घुल जायेंगे तो कैसा फर्क ? जातिवाद रहकर भी क्या बिगाड़ पायेगा | और बताइए क्या किया जा सकता है ? जेहि विधि होय नाथ हित मनुष्य का , और अमानवीय स्थिति का सत्यानाश हो ,आप ही बताएँ | हमसे तो जो बन पड़ता है सोचते हैं और करते भी हैं , तमाम विवशताओं के मध्य | पर यह कार्यक्रम ऐसा है जिसके लिए दलितों से कुछ पूंछना नहीं है | यह सवर्णों का कार्यक्रम है | और सवर्ण तो हम हैं ही | यहाँ जन्मना की बात हो रही है | और हाँ , मज़े की बात आ गयी = कर्मणा तो हम नीच ही हैं |    

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