मंगलवार, 3 जुलाई 2012

एन एप्पल अ डे


* [ कहानी ] - बाप का क़र्ज़
लड़का -लड़की दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे | लड़का अच्छी नौकरी में था तो लडकी भी कुछ कम नहीं कमाती थी | लेकिन दहेज़ तो देना ही था | सो वांछित दहेज़ दिया गया और विवाह हो गया | अब लड़के के घर वालों ने गृह संचालन में लडकी की आमदनी से कुछ मदद की अपेक्षा की | लडकी ने कहा -क्षमा कीजियेगा मैंने अपनी शादी में दहेज़ के लिए अपने पिता से जो क़र्ज़ लिया था उसे मुझे दस वर्ष किश्तों में अदा करना है | उससे जो थोडा बहुत बचता है वह मेरे आने जाने और जेबखर्च भर को ही हो पाता है |

* कहानी = सफ़ेद चादर
लडकी वाले लड़के के घर शादी की बातचीत तय करने गए | सब बात तय भी हो गयी , बस शादी की तारीख तय होनी थी | तब तक लडकी के बाप की नज़र दीवान पर बिछे सफ़ेद चादर के लटकते कोने पर गयी | बेलौस उसने पूछा यह चादर आपके घर कैसे आई ? इस पर तो रेलवे का मुहर छपा है , और यह ए.सी. के मुसाफिरों को प्रयोग हेतु दिया जाता है , जिसे कुछ नीच और कमीने लोग अपने बैग में लेकर निकल भी आते हैं | मैं ऐसे घर में अपनी बेटी नहीं ब्याह सकता |
##
* [कविता ]
१ - ईश्वर एक कविता =
ईश्वर एक कविता तो है
लेकिन इतनी कठिन
कि मनुष्य इसे न समझ पाया ,
इतनी गहनायी की कविता
तुम क्यों बने प्रभु
कि उसमे मनुष्य उलझ गया
और तुम उसके मन में
उतर भी नहीं सके ?

२ - सेव का फल =
बड़े कमाल का फल है यह सेव भी
दुनिया , कहते हैं , इसी आकार की है ,
इसी को देखकर न्यूटन ने पृथ्वी के
खिंचाव को पहचाना था ,
और समझ लीजिये
ऐसा ही फल खाकर
आदम और हव्वा इस संसार में फेके गए थे
जिनसे हम मनुष्य बने , पैदा हुए
और आश्चर्य नहीं , जो डाक्टर
अब भी मनुष्यों से फरमाते हैं -
एन एप्पल अ डे - - - - |

३ - पड़ोस में जगरानी का मर्द
कल सीवर में घुस कर
सफाई करते समय
दम घुटने के कारण मर गया ,
आज जगरानी ने सातवें
मरियल बच्चे को जन्म दिया |
अब इस पर मुझसे
कोई कविता नहीं हो सकती |
##
* आप कहेंगे , और मैं भी सोचता हूँ कि यह क्या फितूर मेरे दिमाग में चला करता है , पर क्या करूँ ? आप बताइए कि हिन्दू धर्म के आलोचक तो सभी हैं | दलित भाई , कम्युनिस्ट लोग , ज्यादा पढ़े लिखे प्रगतिशील बुद्धिजीवी , मानवाधिकार कार्यकर्त्ता और सेकुलर राजनेता सभी | लेकिन क्या कभी आपने किसी छोटे - बड़े , पढ़े - अपढ़े , गवंई-शहरी , दरिद्र -दौलतमंद किसी भी मुसलमान को आप इस्लाम की आलोचना करते आप सुनते हैं ? मैं तो निष्पक्ष दर्शक की भाँति जो देख रहा हूँ , लिख रहा हूँ | अब यह तो नहीं हो सकता कि वहाँ कोई ज़रा भी विचलन न हो , यदि न भी होता तो आलोचना करने वाले उसे पाताल से खोज कर निकाल लाते | वही तो हिन्दू धर्मावलम्बी हिन्दू धर्म के साथ कर रहे हैं ? इनकी भी हर आलोचना वाजिब ही हो , ज़रूरी नहीं | जैसे उनका हर बात में इस्लाम का पिष्टपेषण तर्कसंगत नहीं |

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें