रविवार, 17 जून 2012

बोलो बोलो , जल्दी बोलो


[ कविता ]
बोलो बोलो , क्या बोलते हो 
जल्दी बोलो 
प्रेस पर कोई प्रतिबंध नहीं है
कोई इमरजेंसी नहीं लगी है 
जितना चाहो उतना बोलो 
खूब अख़बार हैं और टी वी चैनल 
तुम्हारी बातें दूर दूर तक 
पहुँचाने के लिए 
फिर क्यों नहीं बोलते ?
बोलो कि तुम्हारी बहन बेटी को 
गुंडे उठा ले गए और 
क्या क्या करके उसकी लाश 
सड़क किनारे छोड़ गए हैं ,
बोलो कि अपने लड़के की 
पढ़ाई के लिए डोनेशन -केप्शन 
तुम नहीं दे सके ,
चीखो कि तुम्हारे माता -पिता 
मँहगे इलाज के अभाव में मर गए ,
चिल्लाओ कि मँहगाई की मार से 
घर गिरवी  पड़ा है | 
और यदि यह हाल तुम्हारा नहीं है 
तो अपनी ही हाँको - बघारो 
कि तुम बड़े सुख - चैन , अमन से हो |

गुरुवार, 14 जून 2012

मेरी नज़र में वह घर है


एक ज़माने से मुझे दो अशआर बहुत पसंद हैं | वस्तुतः ,ये मेरे जीवन मन्त्र बन गए | इन्हें मैं " प्रिय संपादक " में बाटम लाइन लगाता था | इनमे से एक तो अहसान दानिश का है , दूसरे का पता नहीं | कोई मित्र जानते हों तो कृपया बताएँ |
१ - ज़माना बदले न बदले , खयाल तो बदले ,
    न इन्कलाब सही ,   ज़िक्रे -इन्कलाब  तो हो |

२ - मेरी नज़र में वह घर है  जहाँ चिराग़ नहीं ,
     न होगी जश्ने - बहाराँ की इबादत मुझसे |

बुधवार, 13 जून 2012

dushman


बुलाया था , भला कैसे न जाते ,
मुझे मालूम था दुश्मन हैं मेरे |
or -
बुला लेते हैं तो कैसे न जाऊँ ,
जानता हूँ मेरे दुश्मन हैं वह |

मंगलवार, 12 जून 2012

खुशवंत सिंह

कोई मानता नहीं , वरना मैंने तो सुझाया था कि भारतीय संस्कृति के अनुसार  बूर्हों का आदर करते हुए एक दर्ज़न अति बूढ़े भारतीय नागरिकों को चुन कर राष्ट्रपति भवन में ठहरा लिया जाय | वे किसी भी धर्म -जाति -लिंग -संप्रदाय -पार्टी -प्रदेश के हों | आयु क्रम से ज्येष्ठता  के अनुसार , या एक के दिवंगत  होने के बाद दूसरे को , राष्ट्रपति  बनाते रहा जाय | उनकी सेवा सुश्रुषा , खान पान-इलाज सुनिश्चित हो जायगी और वे कई देशों की सभी धर्मों के पवित्र स्थलों की  तीर्थयात्रा का पुण्य- लाभ उठा कर सरकारी खर्च पर  स्वर्ग जाना  भी सुनिश्चित कर  सकेंगें | मेरी अतिरिक्त लालच यह भी थी कि  इससे मेरा प्रिय पत्रकार लेखक , राजनीति से वाकिफ अराजनीतिक शतकोन्मुख आयु का व्यक्ति खुशवंत सिंह भी लाइन में आ सकता है, जिसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है | सब राजनीति- राजनीति  चिल्लाये जे रहे हैं और हमारी पत्रकारिता के क्षेत्र को इसका देय सम्मान नहीं मिल रहा है | और एक बात मैं स्पष्ट बता  दूँ कि खुशवंत जैसा पत्रकार अब भारत में कोई पैदा नहीं होगा | जैसा गाँधी के लिए आइन्स्टीन [?] ने कहा था कि लोग आश्चर्य करेगे कि कोई ऐसा भी व्यक्ति दुनिया में पैदा हुआ था , उसी प्रकार की राय मेरी खुशवंत सिंह के लिए है |

* माननीयों की सुरक्षा


* माननीयों द्वारा क्यों अधिकाधिक सुरक्षा की माँग की जा रही है ? क्यों उनके बोडीगार्डों के लिए कार्बाइन उन्हें क्यों अपर्याप्त लग रहा है ? क्योंकि वे जान गए हैं कि उनके बुरे दिन आने वाले हैं
आ ही गए हैं
विधायक सांसद मारे ही जा रहे हैं
और हम लोग जो मारपीट में विश्वास नहीं करते उन्हें ' कौड़ी के तीन ' बनाने पर तो तुले ही हुए हैं !

रविवार, 10 जून 2012

घूस का पैसा


Gon-zo -
१- -[बदमाश चिंतन ] घूस का पैसा यदि अकेले रख लिया जाय तो वह व्यक्तिवाद है | यदि उसे मिल - बाँट कर खाया जाय तो उसे समाजवाद कहते हैं |
२ - लड़के ने लड़की से कहा आखिर किसी के प्रति तो आकर्षित होगी ही , तो मुझमे ही क्या बुराई है ?
३ - [कथा स्वरुप ] इधर साल भर से मेरा कोलकाता से दिल्ली राजधानी एक्स. से कई बार जाना हुआ | उसके कुछ सेवा कर्मी मेरी पहचान में हो गए हैं | इस बार मई में देखा तो कई कर्मचारी नदारद थे | पूछने पर पता चला कि तमाम रसोइये और वेटर उ.प्र. के जेलों में बुला लिए गए हैं, कैदियों को उच्च श्रेणी की सेवा प्रदान करने के लिए |
४ - गजगामिनी /ज्ञानगामिनी - माधुरी दीक्षित पर बनाये गए चित्रों को हुसैन ने गजगामिनी नाम दिया था| वह बड़े कलाकार थे , वह उनके और माधुरी के बीच का मामला था | लेकिन हम देख सकते हैं कि आज की प्रबुद्ध महिलाएं जब चलती / बोलती हैं,तो ज्ञान छलक -छलक कर बाहर गिरता रहता है |
५ - कुछ तो विशेषाधिकार [priviledge] अवश्य मिलता दिख रहा है | दलित और महिला रचनाकारों की किताबें प्रकाशक टप से उठा लेते हैं छापने के लिए | हम लोग रिरियाते रहते हैं पर हमें वे घास नहीं डालते |
६ - विद्वान कुछ भी कहें पर शिक्षा तो मुझे मूलतः conditioning की ही प्रणाली दिखती है | जैसे मान लीजिये हमें बच्चों को दिशा की शिक्षा देनी है तो हम उन्हें उत्तर की और मुंह करका खड़ा कर देंगें और निश्चयपूर्वक बतायेंगे कि बच्चो ! तुम्हारे सामने की दिशा उत्तर कहलाती है , तुम्हारे दायें हाथ की और पूरब , बाएं हाथ की ओर पश्चिम और पीछे की दिशा दक्षिण है | अब इसमें तर्क और reasoning और प्रश्न की क्या गुंजाईश है ?    

Emergency-like

I have no praise for Indira Gandhi , but I would like to support an  emergency-like governance in India.

अन्ना राष्ट्रद्रोही

अन्ना को लिखे गए एक पत्र में सरकार की ओर से नारायन सामी ने लिखा है कि अन्ना राष्ट्रद्रोही तत्वों से घिरे हुए हैं- - " | मैं इतनी कठिन भाषा नहीं लिख पाता | मैं आसान हिंदी में कहता हूँ कि ये सब देश के दुश्मन हैं | अन्ना यदि नहीं हैं तो वह उस घेरे से निकल कर दिखाएँ , वर्ना वह भी यही उपाधि पायें |

मेयर पद हेतु


लखनऊ ,१०/६/१२ | मेयर पद हेतु एकमात्र महिला प्रत्याशी ने शनिदेव को माथा झुका कर चुनाव प्रचार आरम्भ किया | तो , अब तो मैं उन्हें वोट का कोई टुकड़ा भी  नहीं दूंगा | वे शनिदेव से ही वोट लें | जब कि मेरी नीति यह है कि मैं केवल महिला या दलित को ही वोट देता हूँ | और मेरा दुर्भाग्य , सूची में कोई दलित भी नहीं दिख रहा है | अब मैं क्या करूँ?

लेखक के निजी विचार


[व्यंग्य ]
व्यक्ति को सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए , नेताओं को जनसेवी -ईमानदार होना चाहिए , शासन को जनता के जान -माल, दलितों के सम्मान ,औरतों की इज्ज़त की रक्षा करनी चाहिए , न्याय पालिका को त्वरित इंसाफ करना चाहिए, पत्रकारिता को सजग प्रहरी बनना चाहिए - - |  लेखक - उग्रनाथ |
[ यह लेखक के निजी विचार हैं , संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है - संपादक ]




क्रोध का अनावरण


मैं बहुत दिनों से यह महसूस कर रहा हूँ  कि जैसा मेरा नामशः स्वभाव  है ,मुझे अपने क्रोध का अनावरण करना चाहिए , सभ्यता - शिष्टाचार कि आँड़  में उसे रोकना ठीक न होगा | क्योंकि बहुत सी गलत बातें हो रही हैं और मैं उन्हें जाने देता हूँ | ये विसंगतियां समाज में भी हैं , राज्य सम्बन्धी विमर्श में और मनुष्य के मन में भी | इस हेतु मुझे असभ्य समाज , दुर्वासा दल ,क्रोधी संत मिशन, अप्रिय वार्ता, अपशब्द ,आग बबूला   जैसा कुछ होना पड़ सकता है , पर पहले प्रिय सम्पादक से तो छुट्टी मिले [बड़े प्रिय बनने चले थे] !लेकिन दिक्कत यह है कि मैं अपने दिल से भी तो  मजबूर हूँ जो सौम्य,प्रेमी ,स्नेही और शांत है| वैसे बहुत हो चुकीं चिकनी चुपड़ी बातें ,सभ्य -शालीन भाषा में ! तंग तो हूँ , तनाव उसमे भी है ,तनाव इसमें भी है | तो क्या ओशो  की लाइन पड़ेगी , एकांत में गालियाँ बकना ? शुरू तो कर ही दिया है किसी से न मिलने - जुलने का कार्यक्रम !


नास्तिक मुनि

विनम्रता पूर्वक  मैं एक बात तय जानता हूँ [ चाहे इसका कोई  बुरा माने या भला , या कोई आरोप लगाये कि मैं तो भविष्यवाणी जैसा  बोल रहा हूँ, या फ़तवा दे रहा हूँ ]  कि यदि भारत में हिंदुत्व को दलितों को नहीं सौंपा  गया तो भारत में हिन्दू राज्य की स्थापना कभी भी नहीं हो पायेगी  | और यह भी समझ लें कि दलित जो भी नीति अपनाएगा वह हिंदुत्व ही होगा , भले किसी की समझ में आने में अभी मुश्किल लगे | बस जितनी जल्दी समझ आ जाये उतना ही राष्ट्रहित में अच्छा होगा | चाहे जितनी उछल कूद में समय नष्ट कर लें , सवर्णों के वश का काम नहीं है हिंदुस्तान में हिन्दू राज्य लाना | {नास्तिक मुनि}

शनिवार, 9 जून 2012

Gon-zo Journalism


Gon-zo Journalism . [style created by Hunter S. Thomson and the name so , given by Bill Cordoso], which I am fond of , and it suits me very much .

1 - (Quote) :  - It {cricket} requiresone to assume such indecent postures .- [Oscar Wilde]

2 - "Power attracts the corruptible . Suspect all who seek it " -Frank Herbert.
Personally I have been of the view that who fight elections for power are essentially  mean and lowly persons . I call upon the citizenry not to give respect to them , rather always suspect them as Frank Herbert too suggests.

3 - On Ambedkar cartoon controversy, I would suggest reading  an article -- " A different Reading" by -S. Anand [The Indian Express- 24/5/12 OP-ED Page-11]. I could read it after returning from a long stay out of Lucknow. It confirms my view on the issue.

4 - A Blackberry addict Rahul Gandhi is a nonsense and a nuissance in the politics of our taste .

शुक्रवार, 8 जून 2012

डिब्बा लैपटॉप


* डिब्बा बनकर न रह जाये लैपटॉप ' - विरोधी विधायकों का संदेह |
-- मेरा तो कहना है यदि लैपटॉप छात्रों की माओं द्वारा रोटी बेलने के काम न आये तो कहियेगा !
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अफसरों की अशिष्टता ;- विधायकों की बड़ी शिकायत है की अधिकारी उनका महान आदर नहीं करते | विधायक उनके पास जाते ही क्यों हैं , क्या काम कराने ? इस काम के लिए एक पृथक स्पेसल अधिकारी नियत होना चाहिए , केवल उसी के पास वे अपने काम सौंप दें , वह उन्हें सम्बंधित विभाग को भेज देगा | इतने बड़े माननीय होकर क्या छोटे छोटे अफसरों के पास जाते हैं ? काम नहीं अपना धौंस  ज़माने , हनक दिखाने और उनके काम में बाधा डालने जाते हैं | आखिर अफसर इतने सारे माननीयों से आदर पूर्वक मिलने में समय गवांये या अपना कुछ काम भी करे ? आरोप है की पी जी आई के डॉक्टर उनके रिक्मेंडेसन पर ध्यान नहीं देते | तो क्या मरीजों का इलाज़ भी अब विधायकों के कहने पर होगा ? क्या हिंदुस्तान विधायकों का गुलाम बनने जा रहा है ,जिनके आदेश के बगैर पत्ता भी नहीं हिलेगा ? विधायकों द्वारा सरकारी कामों में हस्तक्षेप और विघ्न को रोकना होगा , अन्यथा ये भस्मासुर हो जायेंगे |
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* रामदेव [अब ये राजनीति में आ गए हैं ,इनके नाम के साथ श्री या बाबा लगाना पत्रकारिता के अनुसार अनावश्यक है ] को यह कैसे पता चला , वह कैसे जानते  हैं कि ४०० लाख करोड़ काला धन विदेशों में जमा है ?कहीं श्रीमान जी भी तो उसी व्यापार में लिप्त नहीं और प्रतियोगिता में असफल होने का खुन्नस निकाल रहे हैं ?इनके पास तो केवल १५०० करोड़ ही गेरुआ धन है | अब सच यह है कि न उनका धन जनता के हित के हेतु है , न इनका धन जनता के लिए उपयोगी है |
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* नरेंद्र मोदी को बी जे पी चाहे अपना नेता  नम्बर एक बना ले या अपने सर पर चढ़ा ले ,जनता नरेंद्र मोदी को अपना भारत भाग्य विधाता कभी नहीं बनाएगी | एक दिन जल्दी ही मोदी किनारे लगा दिए जायेंगे और उनके साथ बी जे पी भी चली जाएगी | भारतीय मनीषा की कुछ गुप्त नीतियाँ होती हैं, और वह अंदर अंदर उस के अनुसार काम करती है , और वह किसी पार्टी या व्यक्ति की गुलाम नहीं होती |
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* ज्ञान पीठ में गौरव सोलंकी :-- पहले तो ये लोग इसीलिये छपते और प्रशंसा पाते हैं क्योंकि ये IIT,iim , ETC  ग्रेजुएट हैं | फिर जब कभी इनकी पुस्तक नहीं छपती तो अपने graduation का धौंस दिखाते हैं | अब IAS  वगैरह आने भी लगे हैं बहुत साहित्य के क्षेत्र में ! अरे तुम जहाँ के होगे वहां के होगे तीस मार खान , यहाँ तो तुम्हे हिंदी के बड़े बूढ़ों की ही बात माननी पड़ेगी | नहीं तो सीधे चले जाओ बड़े बड़े प्रकाशकों के पास , तुम्हारा नाम तो यूँ ही चमक जायेगा |      

मसलन खजूर


[कविता ]
मैं खुद एक दूरी
बना लेता हूँ
ऊंचे पेंड़ों से
मसलन खजूर से
युक्लिप्टस - बरगद से ,
जिससे मैं उनका
शीर्ष देख सकूँ,
और नाप सकूँ उनकी ऊँचाई
दूरी के हिसाब से
गणित लगाकर |
दूरी शून्य होगी तो
पेंड़ मुझे अपनी ज़द में ले लेगा
मैं संज्ञाशून्य हो जाऊंगा -
नहीं जान पाउँगा
पेंड़ कितना ऊँचा है
या कितना ठिगना ,
पेंड़ जितना ऊँचा
उतना ही उससे दूर
जाना पड़ता है मुझे |





बुधवार, 6 जून 2012

आदमी ही है

* न अन्ना टीम
न भोगा , न योगा
न रामदेव |
* युवा , युवा हों
तब न दें उनके
हाथ शासन !
* आदमी ही है
जो कि आदमी भी है
हैवान भी है |
* औरतें जानें
औरतों की समस्या
हम क्या जानें ?
*सारे पुरुष
एक से नहीं होते
न सब नारी |
* कुछ भी शुभ
हो ही नहीं रहा है
मैं कैसे बोलूँ ?
* हो चाहे न हो
पर बातें तो हैं ही
बराबरी की !
* सुंदर हो तो
सुंदर कह दिया
नयी क्या बात ?
* कितने आये
सबको देख लिया
कितने गए |
* कोई समस्या
हिंदुस्तान के लिए
समस्या नहीं |
 * कुछ न हुआ
कुछ नहीं हुआ है
उन्ही से पूछो |
* इतना झूठ
कैसे बोल लेते हो
धारा प्रवाह ?
* बच्चे आवारा
क्या करें माता पिता
मानते नहीं !
* समाज विच
बहुत गंदगी है
हम गंदे हैं |
* परेशानी है
छोटे लोग होते हैं
छोटी सोच के |
* मुझे गाली दो
सहयोग भी चाहो
उल्टी बात है |
* दूर - दूर से
नजदीक से नहीं
प्रेम कीजिये |
* कभी ब्राह्मण
बन जाता हूँ मैं, तो
कभी चमार |
* मैं ऐसा न था
यह तो अब हुआ
परिवर्तन |
* खराब करें
क्यों अपना दिमाग
भलाई पर ?

बामन सेन्स

ब्राह्मणों में , यह देखा गया है कि, बामन सेन्स तो बहुत होता है , पर कॉमन सेन्स का नितांत अभाव होता है | [उवाच]

सामूहिक

[कविता] = सामूहिक
सामूहिक बलात्कार !
सामूहिक भ्रष्टाचार ,
सामूहिक  स्वीकार ,
सामूहिक शवदाह [mass  burial ]
क्या यही है नियति
मनुष्य की सामूहिकता की ?
सामूहिक आत्मदाह ,
सामूहिक आत्महत्या ,
सामूहिक सर्वनाश ?

आदमी की बात

[ विशिष्ट कविता ]
आदमी की बात !
किस आदमी की बात /
कर रहे हैं आप ?

बुधवार, 30 मई 2012