शनिवार, 25 अगस्त 2012

23-06-2012


[ उद्गार - कविता ]
* कुछ पाना तो है 
कुछ पाने की इच्छा तो है ,
लेकिन किसी के मुँह से 
निवाला छीन कर नहीं |
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राजनीति का मतलब = चुनाव का चक्कर और चकचक | इसी में न पड़ने के कारण अन्ना अपने आन्दोलन को अराजनीतिक बताते हैं | दूसरी ओर एक मैं हूँ जो संपादक के नाम एक पत्र लिख कर भी ताल ठोंक कर कहता हूँ कि मैं 'राजनीति' कर रहा हूँ | 
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उफ़ ! आये दिन के ये चुनाव | आज नगर निगम का चुनाव है , कल विधान सभा का चुनाव था , परसों लोक सभा का चुनाव होगा | कितने चुनावों में हम अपना अमूल्य वोट का अपव्यय करें ? एक देश , एक राष्ट्र , एक राष्ट्रपति का चुनाव हो जाता तो ----- [ जैसा कि लोग कह रहे हैं कि एक देश एक पढ़ाई , एक परीक्षा --]   23/6/12
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Be it known to all 
यह सर्वविदित हो कि देश में कुछ लोग ऐसे पैदा हो चुके हैं जो गेरुआ वस्त्र देखकर ही भड़क जाते हैं |
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* मैं ब्राह्मणवाद पर अनायास ही सोचने लगा जब कि मैं ब्राह्मण नहीं संभवतः शूद्र की श्रेणी में आता हूँ | फिर जब जन्मना श्रेष्टता न्यूनता नहीं मानता तो नहीं मानता | यह जिद है हमारी | भले  संस्कारगत या पालन पोषण , शिक्षा दीक्षा में विविधता के कारण अंतर , अथवा यूँ हर व्यक्ति की पृथक इयत्ता और प्राकृतिक विशिष्टता को स्वीकार करता हूँ | लेकिन यह भी मानने में हमें परेशानी है कि मुसलमान - दलित -ब्राह्मण के बारे में सोचने से पहले स्वयं  मुसलमान - दलित -ब्राह्मण हो लिया जाय | यह तो लोकतान्त्रिक विचारशीलता के ही विपरीत हो जायगा | तो अब सोचना है कि  ब्राह्मण को पूज्य मानने का क्या कारण हो सकता है ? एक तो यह समझ में आता है कि उसने अपने जिम्मे केवल पढ़ने- पढ़ाने का काम रखा , और ऐसे लोग स्वभावतः परजीवी होते ही हैं | जैसे आज भी विद्यालयों - विश्व विद्यालयों के अध्यापक , कवि -कलाकार क्या करते हैं ? दूसरे यह कि वह कभी राजा नहीं नहीं बना | परोक्षतः उसने अपने ज्ञान -विज्ञान से राज्य शासन को प्रभावित , किंवा संचालित भले किया , पर राजा तो क्षत्रिय ही रहा | चाणक्य का उदाहरण ज्वलंत है | तीसरे उसने कभी धन नहीं बटोरा | पुरानी किसी भी कहानी में धनी बाभन का उल्लेख नहीं मिलता | धनाढ्य सेठ वणिक-बनिया ही होता है पर " किसी गाँव में एक गरीब ब्राह्मण " ही रहता मिलेगा | प्रहार कटु हो जायगा यदि कोई कह दे कि वह दलित का पैर छूने को तैयार है यदि दलित यह घोषणा कर दे कि " दलितों का धन केवल भिक्षा " | यह मामूली बात नहीं थी कि उसने अपने लिए भिक्षावृत्ति सुनिश्चित की , न उसने एन जी ओ बनाकर या संतई का ट्रस्ट बनाकर करोडो की संपत्ति जमा की | उस ब्राह्मण की आज के ब्राह्मण से तुलना अनावश्यक है | अब ब्राह्मण भी मुख्य धारा में आ गए हैं , और तबसे धनी- मानी बनने लगे हैं जबसे सर्वजन प्रयोग करके उन्हें सत्ता , शासन और राज्य में सीधे बिठाया गया | निस्संदेह सामान्य ब्राह्मण अब भी कुछ सनातन संस्कार के वशीभूत अपने को थोड़ा अनुचित गुमान में रखता है , पर यह एक सामान्य मानुषिक दोष है जिसका परिमार्जन समय के साथ होना ही है | उसे तो मिटना ही है और सामान्य नागरिकता की श्रेणी में आना ही है | लेकिन यदि कोई वर्ग या समुदाय अपनी श्रेष्ठता की सीढ़ी विशेष तौर पर  बुलंद करना चाहता है तो क्या उसके लिए उचित न होगा वह  इसका सूक्ष्म अध्ययन और अनुकरण करे कि आखिर गरीब , दीन- हीन ब्राह्मण किस तरह  , एक- दो , दस -बीस साल नहीं सदियों तक समाज का सिरमौर बना रहा ? उससे कुछ सीखें तो आप भी वैसा बन सकते हैं , आप भी अब वेद पढ़ सकते हैं कोई नया मनुस्मृति गढ़ सकते हैं [ गढ़ा ही है संविधान ] | आप विशिष्ट ब्राह्मण नहीं बनना कहते तो आप भी सामान्य नागरिकता के पायदान पर आइये , सबको समान समझिये | वर्ना ब्राह्मण और आधुनिक लोक -मानव के बीच क्या अंतर रह जायगा ? इस लक्ष्य के लिए अब केवल उसे गाली देने या चिढ़ाने से तो कुछ हासिल होने वाला नहीं | मायावती जी ने उसका साथ लेकर शासन करना सत्य    सिद्ध कर ही दिया , और आश्चर्य क्या कि महान आंबेडकर ने अपने आह्वान में ' शिक्षित बनो ' को सर्वोच्च स्थान दिया ?
अंत में एक महाप्रश्न अपने आप से है - " यदि ब्राह्मण हमको अपने बराबर नहीं समझता था , तो क्या हम ब्राह्मण को अपने बराबर समझते हैं ? "
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एक  साहित्यिक बदमाशी जैसा कुछ सूझ रहा है | मैं ब्राह्मणों की उपमा मुग़ल बादशाह औरंगजेब से देना चाहता हूँ | औरंगजेब भी टोपियाँ सिलकर और कुरान का हस्तलेख करके अपनी आजीविका चलाता था , पर अपने शासन में बहुत कठोर था | उसी प्रकार ब्राह्मण भी अपने लिए धन केवल भिक्षा रखता था , पर सामाजिक नियमों में बहुत कठोर था  | वैसे भी यह इसके बारे में प्रसिद्ध है कि हिन्दू दूसरों के लिए दयावान पर अपने लोगों , मसलन दलितों के प्रति बहुत निर्मम है |  
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*यदि हिंदुस्तान -पाकिस्तान को एक करने की बात न करें तो क्या हिंदुस्तान में सिर्फ मंडल - कमंडल , अगड़े - पिछड़े , दलित -ब्राह्मण , भाजपा - कांग्रेस की ही राजनीति चलेगी ? इससे देश कहाँ जायगा ? यह तो ' दूसरी -तीसरी गुलामी " की ओर जाने जैसी बात होगी , यदि हम केवल अपने देश में नई - नई समस्याएँ जन्म देकर उसमे उलझते रहे और अपने आगे -पीछे , दायें -बाएँ , ऊपर -नीचे , अडोस - पड़ोस कुछ दीन -दुनिया की ओर नहीं देखेंगे ? आखिर देश भी कोई चीज़ है या नहीं ? देश रहेगा तभी आरक्षण - संरक्षण , आर्टी-पार्टी रहेगी | जिन्ना गलत थे तो भी उनके पीछे खड़े होकर तमाम मुसलमान विभाजन के पक्ष में डायरेक्ट एक्सन तक पर उतारू हो गए और जिन्ना के सिद्धांत को व्यवहृत करके पाकिस्तान बनाया | अब , जब हम उसी जिन्ना को आधार बनाकर भारत में नॉन -इस्लामिक स्टेट चाहते हैं तो हिन्दू बगलें झाँकने लगता है क्योंकि उसे नपुंसक न भी कहें तो नैतिक रूप से नासमझ और कमज़ोर तो कहा ही जायगा | और हम जानते हैं कि अंदरूनी विभाजन उसका कारण है, और वह सच है  | लेकिन आश्चर्य है कि वह और किसी न किसी प्रकार का  विभाजन हर धर्म में है पर उसका रोना वे हर समय नहीं गाया करते | मौक़ा पड़ने पर वे एक हो जाते हैं | और यह ध्यान देने और याद रखने वाली बात है कि भारत हिन्दू है तभी उसमे आरक्षण है | और यह उन वर्गों तक पहुँचने जा रहा  है जो हमेशा शासक वर्ग रहा है | यदि यह हिन्दू नहीं रहा तो यह सब कुछ नहीं रहेगा | क्या पाकिस्तान -अरब -ईरान -ईराक में आरक्षण है , इसका पता लगाना पड़ेगा | अलबत्ता यहाँ  आज दलित  - मुस्लिम एकता की मुहिम और राजनीति भारत राज्य पर फिर से  कब्ज़ा करने के तहत चलायी जा रही रणनीति है | जब कि ज़मीन का थोड़ा सा भी अनुभव रखने वाला जन यह यथार्थ जानता है कि शहर का उच्च वर्ग छोड़ दीजिये , गाँव का गरीब मुसलमान भी हमारे दलितों के प्रति वही  हेयभाव रखता है , जैसा कि ब्राह्मणों के दिलों में होता बताया जाता है , या मान लें कि होता है | फिर भी यह कोई कैसे भूल जाता है  कि भारत के सभी वर्ण किसी भी तरह एक साथ रहते तो आये थे , और उसमे बाह्य जातियाँ - मुस्लिम -ईसाई- पारसी भी शामिल होते रहे | लेकिन मुसलमान आज़ादी की भनक मिलते ही भारत से छटक कर अलग हो गाया  जहाँ उसे इस्लामी संप्रभुता मिलनी थी ? नहीं रह सके वह अपनी हनक , अपनी अलग संस्कृति और सत्ता के बगैर लोकतान्त्रिक भारत में | ठीक है उस समय नेहरु का दबदबा था , पर गुंजाइश तो थी लोकतंत्र में उनके शासन के बारी की या उसमें हिस्सेदारी की , जिसे उन्होंने गवाँ दिया | # 23/6/2012   kwt

26-06-2012


मुझे लगता है कि मेरे शरीर को कुछ होने वाला है | बहुत दिनों से मित्रों से कह रहा हूँ कि मेरी obituary [शोक सन्देश] लिख डालो | बहुत ' प्रिय ' संपादन किया है तो उसका भी प्रूफ देख दूँ , कोई व्याकरणीय चूक सुधार दूँ , कहीं कोई गलती न रह जाय | भाषा-शैली का पूर्व-रसास्वादन कर लूँ |  | और इस बहाने आश्वस्त भी हो लूँ कि हाँ मेरे लिए भी शोकसभा संभावित है , जैसा कि मैं तमाम शोक सभाओं में मैं भी तो जाता रहता हूँ | पर कोई लिखता ही नहीं, जब कि लिखना सब जानते हैं |अच्छे भले बड़े कवि- लेखक -पत्रकार हैं | अब इसके लिए कोई ज़बरदस्ती तो की नहीं जा सकती, वरना ये लिख देंगे कि वह [मैं] बहुत अशिष्ट - निकृष्ट आदमी था | इसलिए मेरा ऐसे ही सूखे-सूखे  चला जाना मेरे लिए श्रेय होगा | तथापि  सोचता हूँ कि स्वयं ही इस सम्बन्ध में कुछ कवितायेँ प्रस्तुत कर दूँ और संतुष्ट हो लूँ !
* एक सही
  वर्तनी हो तुम ,
  प्रूफ की
  तमाम गलतियाँ हूँ मैं |

* अभी कितनी घृणा कर लो मुझसे
  छीन ही लूँगा मैं तुमसे
  दो मिनट का मौन
  अपनी मृत्यु के पश्चात् |

* मैं मरूँगा नहीं
  मैं अपनी माँ के पास जाउँगा
  पीछे से चुपचाप उसका
  आँचल पकड़ लूँगा ,
  वह चौंक कर  देखेगी
  और मुझे अपने गले लगा लेगी |

* नागरिक
  कुछ कह गया
  कुछ कर गया ,
  एक अच्छा आदमी था
  मर गया |

* अब वासांसि जीर्णानि
  तो मैं लिखने से रहा ,
   मेरे जीर्ण वस्त्र होंगे
  मेरे मित्र ,
   शीर्ण होंगे मुझे
  पढ़ने वाले |
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फेसबुक पर लोग हा --हा --हा --हा लिखा करते हैं | मैं नागरी वर्णमाला के अनुसार 'ह' अक्षर की बारहखड़ी ही लिखे दे रहा हूँ =
ह - हा - हि - ही - हु - हू - हे -है - हो - हौ - हं - हः   |
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[ विचारार्थ ]
१ - मैं आश्चर्यचकित हूँ कि ये इमारतें { धर्म और ईश्वर की } , ये पिरामिड आखिर टिके कैसे हुए हैं ? जब कि इनके आधार केवल रेत और बालू है , और कहीं -कहीं तो वः भी नहीं है |

२ - मेरा ख्याल है सचमुच आदमी [ पुरुष ] को घोंघा हो जाना चाहिए | अपने सारे अंग उसे सिकोड़ लेने चाहिए | उधर हम घोंघावसंत होने की वकालत पहले ही कर चुके हैं | औरतों की सारी सफलता का राज़ यही है |

३ - सरकार टैक्स लगती है और वह सारा पैसा उसके कर्मचारी खींच ले जाते हैं |

४ - ह्रदय को तो नज़रअंदाज़ कर भी सकता हूँ , पर मैं अपनी बुद्धि के आदेश को टाल नहीं सकता |

५ - मेरा ख्याल है , उनकी सामाजिक स्थिति को देखते हुए मुसलमानों को भारत में सवर्णों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए , और उन्हें सवर्णों के समान सेवाएं और सुविधाएँ दी जानी चाहिए |

६ - कुछ याद किया जाना चाहिए हिन्दू दलितों ने कितनी मनुस्मृतियाँ जलायीं , ब्राह्मणों को - बाबा तुलसीदास, राम चरित मानस , देवी -देवताओं को कितनी गालियाँ दीं ? तब  जाकर  अब कहीं उन्हें थोडा आरक्षण  मिल  पाया | यहाँ तक कि उन्होंने  हिन्दू धर्म त्यागने  की भी धमकी  दी और छोड़ा  भी | दूसरी तरफ  मुस्लिम भाई  कभी  इस्लाम  के विरोध में नहीं गए , कभी  किंचित  भी आलोचना , उसकी शिकायत नहीं की | वे बड़े  गर्व से मुस्लिम बने रहे और कुरआन अथवा मोहम्मद साहेब की प्रतिष्ठा  पर कोई आँच आती दिखी तो उन्होंने सड़कों  पर निकलकर हंगामा भी किया | गरीब भले  हों  पर ब्राह्मणों की भाँति उन्हें भी गुमान है कि वे हज़ार वर्ष हिंदुस्तान के शासक रहे | फिर उन्हें आरक्षण  क्यों ? सवाल यह भी है कि इतने  कथित समतावादी धर्म में होकर और साथी मुसलमानों के पास इतने धन -दौलत एवं ज़कात की व्यवस्था होते हुए वे गरीब कैसे रह गए ? दलित प्रथा  हिन्दुओं की बुराई और समस्या है | सवर्ण समाज अपने पुरखों के पापों  की भरपाई अपने दलित वर्ग को तो आरक्षण देकर कर सकता है , पर उसने मुसलमानों पर तो कोई जुल्म नहीं धाय ! बल्कि वह तो उनके  अधीन रिआया ही रहा ? फिर वह उन्हें आरक्षण को समर्थन क्यों दे ? आज़ादी का नाजायज़ फायदा  तो मत उठाओ  भाई !

७ - मैं पाता हूँ कि ब्राह्मणवाद एक शाश्वत व्यवस्था है | इसे किसी ने नहीं बनाया | यह अपने आप स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप से बनती गयी , जिसका टूटना दूर - दूर तक कहीं संभव नहीं दिखता | क्योंकि यह " भेद " पर आधारित है जो कि वैज्ञानिक विधि है और मानव स्वाभाव के सर्न्था अनुकूल | तब दुसरे चातुर्वर्ण थे , अब चतुर्थ श्रेणी तक के कर्म्चाहरी हैं | पहले पंडित जी ब्राह्मण थे , अब ब्राह्मण होंगी | पाला भले बदल जाय पर व्यवस्था नहीं | अभी देखिये , कोई कवी चार पंक्ति का एक मुक्तक लिख लेता है वह अपने आप को कालिदास से कम नहीं समझता | किसी ने एक मुक्त कविता कर ली तो उसे आप मुक्तिबोध से कम समझने की गुस्ताखी नहीं कर सकते ! यही ब्राह्मणवाद है , श्रेष्ठता के दंभ का दर्शन | और यह मानव स्वभाव का स्थायी भाव है | इसलिए ब्राह्मणवाद को गाली देने में समय न गवाँकर इसका कोई सार्थक उपयोग करने की बात सोची जानी चाहिए |     26/6/12
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धार्मिक भावना रखने वालो , सावधान !
अब एक उजड्ड जनता आने वाली  है |
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जिसको आना था
जब वही नहीं आया ,
तब कोई भी आये |
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[ संवाद ]
- यह बताइए सेठ जी , इन लोगों की इतनी दुर्दशा क्यों है ?
= इनके भाग्य ही ऐसे हैं |
- तो यह समझ लीजिये  कि अब आपका भाग्य वैसा ही होने वाला है |
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[ उपन्यास अंश ]
वे क्लास - कास्ट कुछ नहीं मानते | वे रेल में जनरल से लेकर स्लीपर , एसी-१, एसी-२ , एसी-३ किसी भी तरह के डिब्बे में निःसंकोच घुस जाते हैं और निर्द्वंद्व यात्रा करते हैं |
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[ विचारणीय ]
 १ - राजनीति तुलनात्मक प्रतियोगिता का खेल है - समय सापेक्ष | इसमें निरपेक्ष और शाश्वत कुछ नहीं |

२ - हालत यह हो गयी है कि अब तो धर्म के बगैर धर्मनिरपेक्ष [ secular ] भी नहीं हुआ जा सकता !

३ - ठीक बात है , जिसको राज्य करना हो वह मांस - मछली खाए , बन्दूक चलाये , हिंसा करे | हम तो चींटी भी नहीं मारते |

४ - जिसकी तरक्की रोकनी हो ,आगे न बढ़ने देना हो , उसे राष्ट्रीयता का वास्ता देकर उकसा दो कि वह मात्र अपनी मातृभाषा में पढ़े और अंग्रेज़ी से नफ़रत करे |

५ - सच तो ज़रूर बोलते हैं हम , बीएस उन कुछ स्थितियों को छोड़कर जहाँ हमें अपनी कमजोरी या मजबूरी स्वीकार करनी होती है |

६ - अल्लाह सिर्फ ईश्वर का नाम नहीं , किसी उच्चतम जीवन लक्ष्य और सम्बल-आश्रय का भी तो नाम है !

७ - एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी - कर्मचारी का मुकाबला बड़े से बड़ा नेता, साधु संत भी नहीं कर सकता |

८ - अंग्रेज़ी राज्य इससे बेहतर था , यह कहना ठीक नहीं है | बल्कि गुलामी की दशा में यह देश स्वयं ही ठीक रहता है , ऐसा कहना ज्यादा सही है |   26/6/12
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गुलामी कुछ भी नहीं है , यह तो human protocol का एक हिस्सा है | क्या VIP
अपने मन से कुछ भी  खा -पी सकते हैं , बिना सुरक्षा की अनुमति के , कहीं भी आ - जा सकते हैं ? उसी प्रकार गुलाम का जीवन भी कुछ -कुछ प्रतिबंधित होता है | वरना वे होते तो VVIP  हैं |
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१ - खूब लगाता
मन नहीं लगता
लेकिन यहाँ |

२ - ख़ैर मनायेगी
कब तक बकरी
बकरे की माँ ?

३ - साथ निभाया
जहाँ तक हो सका
नहीं तो नहीं |

४ - पछ्ताऊँगा
पछताना तो मुझे
होगा ही होगा
हर हाल में
मैं जीतूँ या हारूँ
इस जंग में |

५ - बुरा लगता
औरतों का सजना
भला क्यों मुझे ?

६ - इतना बड़ा
कठोर कालखण्ड
बड़ा सताता |

७ - क्या - क्या होता है
यवनिका के पृष्ठ ( पीछे )
तुम क्या जानो ?

८ - गेहूँ के साथ
घुन भी पिस गया
यही समझो |


9- लिखता जाता
कहाँ ख़त्म हो पाता
तुम्हारा किस्सा !

10- नाराज़ किया
खुश भी किया होगा
मेरे लेखों ने !
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  जब मेरी अम्मा ने अपना जीवन काट दिया , और मरी तो अपने मन से | जब कि तब न तो ढंग से जलौनी ईंधन था , न गेहूं पीसने - धान कूटने की मशीन | तब तो प्रेशर कुकर भी नहीं था | नहीं था बर्तन माँजने के लिए विम साबुन , न हरे रंग का मंजना | अब तो यह सब साधन -सुविधाएँ मौजूद हैं | फिर मेरी पत्नी , लडकी , बहू इतनी झिकझिक क्यों करती हैं |
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मेरा सच्चा जीवन साथी - एक छोटा सा प्रेशर कुकर |
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* कुछ नए वाद मेरे मस्तिष्क में हैं | क्या उनके आधार पर कोई राजनीति या दर्शन की शाखा चलायी जा सकती है ? जैसे - धन्यवाद , अपवाद , बकवाद , संवाद , जव्वाद , और एक है मवाद |
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जिसे कुछ न्याय की आशा हो वह अपील करे ;
मैं तो कातिल के भरोसे हूँ , अब वह जो भी करे |26/6/12

बुधवार, 8 अगस्त 2012

Day Book - 8 Aug. 2012

* यदि हम एक पार्टी होते तो क्या करते, क्या अजेंडा होता हमारा, आधारभूत घोषणापत्र ? और हाँ, आप उसका नाम क्या रखते ? इसी सब पर राय प्राप्त करने की पत्रकारिता का नाम है यह ग्रुप - " प्रिय सम्पादक " | 
* मुनाफावादी समाज | समाज आदमियों से निर्मित होता है | और आदमी मूलतः मुनाफा वादी होता है | इसलिए न दलितों की गलती है न ब्राह्मण वादियों की | आज सवर्ण चिल्ला रहे हैं , लेकिन अभी यदि उनके लाभ की कोई योजना लागू हो जाय तो वे भी बल्ले बल्ले हो जायँगे | क्या हुआ नहीं ? वी पी सिंह ने पिछड़ी जातियों के लिए मंडल क्या लागू कर दिया कि वह आज पिछड़ों के महाप्रभु बने हुए हैं | देखिये किस प्रकार उनका गुणगान उनकी पूजा हो रही है | मानो वी पी सिंह कभी सवर्ण रहे ही न हों | वह एकायक पिछड़ों के आयकन बन गए , भले उनके सह - सवर्ण खूब गालियाँ पा रहे हैं | कोई रूककर तनिक सोचने को तैयार ही नहीं कि राजा मांडा भी ठाकुर ही थे , तो उनके सजातियों  का इतना तो अपमान न किया जाय ! यह तो तब है जब कि पिछड़ी जातियाँ [ कुर्मी यादव ] न कुछ कम ब्राह्मण हैं मांस मछली शराब छोड़ने में , और न ही इनके पास संपत्ति की आम तौर पर कमी है , अच्छे खासे ज़मींदार है ये | इसी प्रकार यदि अभी जाति विहीनों के लिए यदि कोई मलाई - योजना चलाई जाय , तो क्या सवर्ण क्या दलित सभी उसकी लालच में अपना कुल गोत्र , जाति वाति, बिस्तर विस्तर, चद्दर वद्दर , तकिया वकिया सब छोड़ कर भारत के सामान्य ' नागरिक ' बन जायँ | सब स्वार्थ , लाभ और मुनाफे की बात है | आरक्षण का थोड़ा सहारा न हो तो भला कौन इज्ज़तदार लोग अपने को दलित कहना - कहलाना पसंद करें , और समाज की अवमानना अवहेलना और झिड़की खाएँ ?      

* कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ , 
जो घर जारे आपनो चले हमारो साथ |
इसलिए मैं तो पार्टी ऐसी ही चाहूँगा जिसमें ऐसे घर जारू लोग हों - सम्पूर्ण  निजी स्वार्थ विहीन | मैं अपनी संस्था का नाम " लुकाठी " रखना चाहूँगा | 

* [ आत्मालाप ]
     १ -  मैं झूठ बोलता ही नहीं | लिखने में वर्तनी की त्रुटि हो जाय तो उसका ज़िम्मेदार नहीं |
     २ - इधर मैंने एक बात सुनी है | सुनी क्या , अनुमान लगाया है कि जो कुछ करता है पुरुष करता है  , बलात्कार तो बलात्कार , सम्भोग भी | औरतें तो मिट्टी का लोंदा होती हैं | उन्हें कुछ भी आनन्द नहीं आता |  

[कविता ?]
* कोई आग 
नहीं देखता 
मैं लोगों में 
मैं आग बबूला |
#

* तुम माओ वादी 
तो सरकार मोबाइल वादी ,
अब क्या करोगे ,
अब तो तुम्हें 
आदर ही करना पड़ेगा 
सरकार का जैसे  
करते हो नारियों का !
एक नहीं दो दो मात्राएँ 
नर से भारी नारी है ,
एक नहीं दो दो मात्राएँ 
माओ से भारी मोबाइल है |
   #
* मुझे ज्ञात हुआ है कि काला धन उसे कहते हैं जिस पर टैक्स न चुकाया गया हो | अब समझ में आया लोग बाग़ मंदिर अँजुरी में कुछ लेकर क्यों जाते हैं ? टैक्स चुकाने | 

* मुझे जिगर मुरादाबादी का यह शेर बहुत पसंद है :-
" किधर से बर्क चमकती है देखें ऐ वाइज़ , मैं अपना जाम उठाता हूँ तू किताब उठा | "
 [बर्क = बिजली , वाइज़ = धर्मोपदेशक]
इसीलिये मैं जब तब, यहाँ वहाँ, जैसे भी हो आग ढूँढता, तलाशता, मौका पाने पर सुलगाता-जलाता और उसे भुभुच्चर की तरह फेंकता -बिखराता रहता हूँ कि न जाने किधर से बिजली चमक जाये और मुल्क रौशन हो जाये ! यह सब जो कार्यवाही आप देख रहे हैं , वह इसी के निमित्त है |    
[ भुभुच्चर = गाँव में रबी की फसल के लिए तैयार खाली खुले खेतों में शाम के समय बच्चे मिट्टी का छेदयुक्त दावात बना उसमे जलता अंगारा भरकर रस्सी के स्ट्रिंग से घुमा, चक्कर देकर आकाश में फेंकते हैं जो फिर दूर ज़मीन पर जाकर गिरता है | बच्चे आनंदित हो दौड़ते - फिरते हैं ] #

* एक कुत्ता मेरे घर बहुत परका [रूचि से लगा] हुआ है | कई बार भगाने पर जब नहीं भागा तो मैंने उससे पूछा - भाई साहब , आपकी जाति क्या है ? उसने मेरा वाल पोस्ट , लगता है , पढ़ा हुआ था | फ़ौरन बोला - ' वही आप वाली ' | #

* मर्दों पर आरोप है कि वे औरतों को परदे में रखना चाहते हैं | पता नहीं किन मर्दों के लिए है यह | मैं तो भाई चाहता हूँ कि हमारी औरत बराबर और खूब घर से बाहर निकले | गेहूँ पिसवा लाये, सौदा सुल्फ, सब्जी मछली ले आये , हाट बाज़ार कर आये | बल्कि वह चाहें जितना बाहर रहे कोई नौकरी करे , कुछ कमा - धमा भी लाये | और मैं घर पर आराम से रहूँ | # 

* राजनीति ,
जहाँ  तक ठीक है -
करते हैं ;
जहाँ से ख़राब होती है -
नहीं  करते |

* कुछ खाया क्या 
क्या खाकर लड़ोगे  
जाति वाद से ?

* नहीं पसंद ?
कह दो मैं समर्थ, 
न बाँधो राखी |

* सेवा न करो  
मैं भी नहीं करूंगा  
सेवा  तुम्हारी  |

* मैं सोचता हूँ , यदि देहाती पढ़ाई वैसे ही चल रही होती उल्टी सीधी , जैसी चल रही थी / जैसी हमने पढ़ी , तो आज अंग्रेज़ी का इतना बोलबाला न होने पाता | मेरा नाती , मेरी पोती अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़ रहे हैं, आधुनिक [?] शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं | #
* मैं आश्चर्यचकित हूँ | कहना भी तो नहीं चाहिए , अभी लोग बिदक जायेंगे और झाँय - झाँय करने लगेंगे | लेकिन सोचने की बात है कि यदि दलित जन सचमुच जातिवाद से पीड़ित होते तो वे इस कुप्रथा  को मिटाना ज़रूर चाहते ! वे ऐसा बिल्कुल नहीं कर रहे हैं यह विषाद और आश्चर्य का विषय है | क्यों ? बेहतर वही जानें |  

सोमवार, 6 अगस्त 2012

कामदेव को नमन

* No doubt sex is a fundamental human force, impulse or otherwise . फ्रायड की माने तो माता संतान का रिश्ता भी सेक्स से govern होता है | लेकिन इससे हमें बहुत बड़ा जीवन सूत्र मिलता है | उसका नाम सेक्स दें या पेक्स वह हमारे बीच भाई बहन , दोस्त दोस्त और तमाम जाने अनजाने रिश्ते तो देता है, जोड़ता है, बनाता है ? मेरे अन्यान्य मित्र जिन्हें मैंने कभी छुआ तक नहीं होगा , हाथ तक नहीं मिलाया पर वे कुछ दिन न मिलें तो व्यग्रता होती है | अर्थात सेक्स [मानव प्रेम का सम्बन्ध] किसी स्पर्श, किसी सहवास का मोहताज नहीं | वह वैसे भी काम करता है ,मनुष्य और मनुष्य के बीच प्रेम- मैत्री और मिलन की व्याकुलता प्रदान करने की भूमिका निभाता है | और यदि वह ऐसा करता है तो वह घृणित तो नहीं हो सकता, इसे पाप कहना मानवता के प्रति अपराध है | हम क्यों न इस शक्ति के लिए अपने कामदेव को नमन करें, उनकी प्रार्थना करें ?    

रविवार, 5 अगस्त 2012

Chithi


[लघु कविता]

* यह तो चिट्ठी है
जिसका इंतज़ार करता हूँ ,
तुम्हें तो जानता हूँ
तुम नहीं आ पाओगे |

सोमवार, 23 जुलाई 2012

संस्थाओं के नामों की अदला बदली


मैं जिलों , सड़कों ,पार्कों , संस्थाओं के नामों की अदला बदली के सख्त खिलाफ हूँ | क्या मैं परिवर्तन विरोधी हूँ ? नहीं , मैं इसे परिवर्तन के काम में बाधा मानता हूँ | यह एक निरर्थक , नकारात्मकऔर फ़िज़ूल का काम है | कोई सार्थक काम तो है नहीं इनके पास और कुछ मेहनत का काम न करना पड़े तो इन नामलोभी नेताओं के लिए बहुत आसान होता है , कुछ नामपट बदल कर फ़ौरन ख्याति कमा लिया जाय | हर्रे लगी न फिटकिरी ,लो मैंने यह तीर मार लिया | लोग कहते हैं किंग जार्ज का नाम रहने देना गुलाम मानसिकता है | मैं उलट कहता हूँ कि जार्ज का नाम हटाना और इससे यह भ्रम पालनाकि हमारी गुलामी मिट गयी, हम आज़ाद हो गए और इस तरह की अन्य कवायदें करना ही वस्तुतः गुलामी की निशानी है | कवायद ही है , इसलिए कि इससे कुछ भी हासिल नहीं होता | ऐसा करके क्या इस तथ्य को इतिहास से मिटा सकते हैं, या सत्य को झुठला सकते हैं कि भारत पर कभी अंग्रेजों का शासन था ? नहीं | तो रहने दीजिये उनकी यादगार अवशेषों को , जिससे पीढ़ियाँ उन्हें देखकर सबक लें और गुलाम होने से अपने को बचाएँ, बचाए रहने की कोशिशें जारी रखें | कभी गाफिल न रहें | मैं तो यह भी कहने का दुस्साहस रखता हूँ कि आर्य - शक -हूण तमाम तो लोग हिंदुस्तान आये ,मिटाओगे उनकी निशानियाँ ? क्या मिटा सकोगे ? तब तो खुद ही मिट जाओगे | और सचमुच मिटना ही हो तो फिर मुग़लों के स्थापत्य - कुतुबमीनार , इमामबाड़े , ताजमहल को थोडा छू कर तो देखो | वे भी तो मूलतः बाहर से आये आक्रमणकारी थे | पर इन्हें तो सजाया- संवारा- संरक्षित किया जा रहा है | किंग जार्ज का नाम हटाया जा रहा है क्योंकि अंगेज़ यहाँ नहीं हैं | उन्हें जो कुछ करना कराना था कर के चले गए, कोई ज़मीन उठाकर नहीं ले गए | मुग़ल यादगारें इसलिए आदरणीय हैं क्योंकि मुसलमान यहाँ हैं और बाकायदा हैं | क्या यह सोच गुलामी की सोच नहीं है ? यह किसी तर्कशील , न्यायप्रिय , स्वतंत्रमना , लोकतान्त्रिक ,समतावादी समाज की नीति तो नहीं हो सकती | भाई , सबको सामान दृष्टि से देखो , और जो अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित नहीं है उस पर मौत का फरमान न जारी करो | और यदि मारने का ही निर्णय हो चूका है तो सबको मारो जो दोषी रहे हैं |
इसलिए मैं मायावती जी द्वारा जार्ज या पुराने जाने माने , उसी नाम से प्रतिष्ठित संस्थानों के नाम बदले जाने के खिलाफ था | सच थोड़ा कड़वा हो जायगा , लेकिन यह उनकी हीनभावना का द्योतक और नतीजा था | लेकिन फिर अब, जब उसका नाम बदला जा चुका था उसे फिर बदलने का कोई औचित्य नहीं है | कल और कल , कोई और कोई और आयेंगे और कोई रिक्शावाला भी मरीज को सही अस्पताल नहीं पंहुचा पायेगा | प्रश्न है ,यह सिलसिला कब तक चलेगा , कहीं विराम लगेगा या नहीं ? अरे भारत भाग्य विधाताओ, कुछ नया बनाओ तो उसका नया नाम कुछ भी रखो , पुराने से क्यों छेड़- छाड़ करते हो ? इस सम्बन्ध में कोई नए राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए | नहीं तो ये देश -प्रदेश के भी नाम  इतनी बार बदलेंगे कि उन्हें पहचाना ही न जा सकेगा | असंभव नहीं कि अपने माता पिता के भी | मेरी तो माँ निहायत साधारण गैर महत्व पूर्ण महिला थीं | मैं उनका वही नाम कायम और याद रखना चाहता हूँ जो देहातीपन , अनपढ़पन का शब्द है | गाँव पर मेरे स्कूल का नाम उसी के नाम है , और उस पर मैं अपनी गरिमा  की पहचान टिकाने में गर्व महसूस करता हूँ | ऐसा बिलकुल भय नहीं लगता कि  कहीं मैं दकियानूस न माना जाऊँ ? माना करे कोई | हाँ, यह भी हो रहा है कि कुछ नए प्रशासनिक अफसर अपनी देहाती पत्नी को गाँव छोड़ आये हैं और नयी आधुनिक शादी कर ली है | मुझे गर्व है कि मेरी अशिक्षित देहाती पत्नी मेरे साथ है | मैंने उसका नाम तक नहीं बदला , और कुछ लोग कहते हैं , मैं "कवितायेँ अच्छी कर लेता हूँ" |
मैं लोकतान्त्रिक मानस के स्थायित्व का पक्षधर हूँ | मेंढकों का कूद- फांद मुझे अच्छा नहीं लगता | स्वतंत्रता के छद्म मानकों और स्मारकों में मेरा मन नहीं लगता | सचमुच मैं अभिभूत हो जाता हूँ यह सोचकर कि यदि आप 10 , डाउनिंग स्ट्रीट के पते पर एक पोस्टकार्ड भेज दें तो वह श्रीमती मार्गरेट थैचर के पास नहीं ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के पास पँहुचेगा | # #
- उग्रनाथ नागरिक  - (अनीश्वर भारतीय) २४/७/१२

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

लिखते तो हैं


* मानें न मानें
मैं अच्छा लिखता हूँ
गौर तो करें !

* अच्छा आदमी
मुझे नहीं लगता
किंचित मैं हूँ |

* जा रहे लोग
दुनिया बदलने
मैं कहाँ जाऊँ ?

* किसी के पास
अपने विचार हों
दिखता नहीं |

* बाप गरीब
तो उसका साथ दो
माँ बीमार |

* अब इसमें
मेरी क्या गलती 
जो कुछ हुआ ?

* वैसा नहीं है
कविता बताती है
जैसा आदमी |

* किसे फिक्र है
निज सुख के आगे
पीर पराई?

* मिलती जाए
लेती जाओ आज़ादी
धैर्य न खोओ |

* सुख में सुखी 
अतिशय न होना
दुःख में दुखी |

* बहस नहीं
बस हाँ हूँ कहना
वहाँ जाकर |

* करो कुछ भी
आगा - पीछा तो सोच
ज़रूर लेना |

* लिखते तो हैं 
पर नागरिक जी 
पढ़ते नहीं |

बुधवार, 18 जुलाई 2012

मामला क्या है


* लिख चुका हूँ
जो तुम कहते हो
यह पढ़ लो |

* हिंदुस्तान जो
आध्यात्मिक देश है
अब नहीं है |

* पैसा लगाओ
तथापि अनुचित
लाभ न लेना |

* गुनहगार हैं
धुआँ उड़ाने वाले
पापी नहीं हैं |

* आयु में छोटे
मुझे प्रणाम करें
अग्रज , वन्दे !

* पत्रकारिता
कौन कर रहा है
नेतागिरी है |

* मामला क्या है
यह तो पता चले
तब न सोचें !

* मुफ्त चिकित्सा
किसकी तो होनी थी
किसकी होती !

* रोटी बनाना
जानना तो पड़ेगा
नहीं तो जाओ |

* खुश नहीं हूँ
खुशियाँ छीनता हूँ
आसपास से |

* नहीं चाहिए
चक्कर में पड़ना
ज्यादा किसी के |

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

" मान्यतावाद "

और वैशेषिक ही क्यों , सांख्य , योग , मीमांसा , न्याय {शायद कुछ अन्य भी , प्रमुख नौ दर्शनों में लगभग  छः दर्शन | बौद्ध -जैन भी एक तरह से नास्तिक दर्शन ही हैं } तब भी नास्तिक दर्शन थे , जिनकी हम दुहाई दिया करते थे , लेकिन कितनों ने नास्तिकता स्वीकार की ? इस्लाम पर इस अद्भुत खोज का क्या कोई प्रभाव प्रत्याशित है ? जिसका जो मन होता है मानता था , मानता है , मानता रहेगा | इसलिए हम बहुत दिनों से विज्ञानंवाद का नाम न लेकर " मान्यतावाद " का सहारा लेने लगे हैं | " ईश्वर है या नहीं है ईश्वर को मत मानो " जैसे आह्वान और अविरल प्रचार का | समझाने से नहीं मानता मनुष्य , उसे आदेश चाहिए , अन्धविश्वास चाहिए | हमारे [कम से कम मेरे] लिए तो ईश्वर का न होना एक अन्धविश्वास के सामान है | और मैं दृढ़तापूर्वक सुकून से हूँ |

सोमवार, 9 जुलाई 2012

हम सब दलित आन्दोलन


अब दिमाग ठंडा हो गया | इसलिए नहीं कि दोस्तों पर गुस्सा उतार लिया ,  बल्कि इसलिए कि एक नया कार्यक्रम दिमाग में आ गया | =

हम सब दलित आन्दोलन
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अब यह तो निश्चित हो चुका है कि जातियाँ इतनी आसानी से जाने वाली नहीं है | नाम - उपनाम छोड़ने की नौटंकी से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा | तो फिर यह कैसे समाप्त हो ? इस दिशा में महती काम यह है कि हम अपने ब्राह्मण , अपनी सवर्णता के छद्म और दंभ को तोड़ें | यह काम दलितों का नहीं हो सकता | उनके पास है क्या जिसे वे मिटायें ? पर हमारे पास तो बहुत कुछ है मिटाने को जिसके न मिटने के कारण ही दलित हमसे असंतुष्ट और नाराज़ हैं | तो जातियां रहेंगीं तो दलित तो रहेगा | अब अपनी सवर्णता मिटाने  के लिए हम यह करें कि हम भी दलित हो जाएँ | तब जाति तो रहेगी पर उसका नाम केवल दलित होगा और ब्राह्मणवाद का विनाश होगा | इस प्रकार हम यह करें कि ज्यादा कुछ न करें , न अनावश्यक उछल- कूद करें, न तोड़- फांद मचाएँ | एक कार्यक्रम बना लें ,पहले मनःस्थिति की, कि हम दलितों के साथ उठने बैठने  - खाने पीने - दोस्ती गाँठने इत्यादि में कोई परहेज़ ,कोई संकोच, कोई भेदभाव न बरतें , बल्कि सायास उनके साथ हों / रहें , उनके आंदोलनों के सक्रिय किन्तु मौन सहयात्री बनें | ज्यादा बढ़ चढ़कर बोलेंगे तो आप का आदर्श नहीं आपका संस्कार मुँह से निकल कर सारा कार्यक्रम चौपट कर देगा | शादी विवाह का मामला अभी रहने दें , अपने हाथ में न लें | यह पुत्र पुत्रियों पर छोड़ें | कोई ज़बरदस्ती तो है नहीं ! पर यदि उनमे प्रेम हो तो विवाह में बाधक नहीं भरसक प्रोत्साहक बनें | यह तो शायद हम लोग काफी हद तक व्यवहृत करने के लिए सहमत ही हैं |
अब आगे की बात ज्यादा महत्वपूर्ण है | शैक्षिक  प्रमाणपत्र , जिनमें जाति अंकित हो ,संदूक में बंद कर दें , या जहाँ ज़रुरत हो वहाँ दिखाएँ | समाज में हर वक्त तो कोई आपका सर्टिफिकेट माँगता/ देखता नहीं , और यह सामाजिक फिजां - वातावरण बनाने का कार्यक्रम है न कि आरक्षण प्राप्त करने की साजिश |
सामान्यतः होता यह है कि समाज में कोई अपरिचित व्यक्ति या यात्री आपकी जाति जानने के लिए -
 - ' भाई साहब/ बहन जी ,आपका शुभ नाम ? '  
- जी मेरा नाम दीपक श्रीवास्तव / धनञ्जय शुक्ल / पूनम सिंह / ज्योति पाण्डे/ इत्यादि है | [असली नाम बताएँ जो भी आपका है | लेकिन अपने वसूल पर कायम रहते हुए आप उससे उसकी जाति कदापि न पूछें ]
ज़ाहिर है अब वह चुप हो जायगा और आपसे सावर्णिक व्यवहार करने लगेगा | तब आप उसे कुरेदिए -  लेकिन भाई साहब, आपने मेरी जाति तो पूछी ही नहीं ?
- वह तो आप के नाम से ज़ाहिर है |
- नहीं भाई साहब , उससे ज़रा धीरे से कहिये , - दरअसल मैं दलित जाति का हूँ |
- फिर आपने यह  शर्मा / वर्मा / सिंह / श्रीवास्तव क्यों लगा रखा है ?
- इज्ज़त के लिए भाई साहब ! इज्ज़त बड़ी चीज़ है | यह तो मैंने आपसे बता दिया मैं कौन हूँ , सबसे थोड़े बताता हूँ ! बड़ा भेदभाव झेलना पड़ता है |
- तो आपको तो आरक्षण का फायदा मिलता होगा ?
- आप सही कहते हैं , मिल सकता था | लेकिन मैं घर से संपन्न हूँ न ! चार बीघा तो पुदीना बोया जाता है दूसरे गाँव में भी खेत है, शहर में तिमंजिला पक्का माकन है , और यह , और वह - (हाँक दीजिये , कौन खसरा खतौनी लिए बैठा है) | और भाई साहब , हमारे लोगों में मुझसे ज्यादा गिरी हुई अवस्था में बहुत सारे लोग हैं | इसलिए मैंने आरक्षण फोरगो कर दिया , यह उन्हें मिले जिन्हें इसकी सचमुच और ज्यादा ज़रुरत है | हमारा काम तो चल ही रहा है | कौम की सेवा मेरे निजी लाभ से ज्यादा ज़रूरी है | है न बही साहब ?
नोट : - जब सवर्ण दलित में घुल जायेंगे तो कैसा फर्क ? जातिवाद रहकर भी क्या बिगाड़ पायेगा | और बताइए क्या किया जा सकता है ? जेहि विधि होय नाथ हित मनुष्य का , और अमानवीय स्थिति का सत्यानाश हो ,आप ही बताएँ | हमसे तो जो बन पड़ता है सोचते हैं और करते भी हैं , तमाम विवशताओं के मध्य | पर यह कार्यक्रम ऐसा है जिसके लिए दलितों से कुछ पूंछना नहीं है | यह सवर्णों का कार्यक्रम है | और सवर्ण तो हम हैं ही | यहाँ जन्मना की बात हो रही है | और हाँ , मज़े की बात आ गयी = कर्मणा तो हम नीच ही हैं |    

अंतर्विरोध



---------- Forwarded message ----------
From: Ugra Nath Srivastava <priyasampadak@gmail.com>
Date: 2012/7/7
Subject: अंतर्विरोध - A Personal Confession
To: pramod joshi <pjoshi23@gmail.com>


To Sri Pramod Joshi 
अंतर्विरोध 
अब इसे लिखना बहुत ज़रूरी हो गया है , confession करना | काफ़ी हॉउस में बहुत पहले आपने एक प्रश्न उठाया था - क्या हम अपने अंतर्द्वंद्व पहचानते हैं ? यद्यपि वह माओ से सम्बंधित था जिसका सन्दर्भ मुझे  नहीं पता , लेकिन मुझे लगा कि आपने तो मेरे चोर की दाढ़ी में तिनका पकड़ लिया | मैंने प्रश्न को व्यक्तिगत स्तर पर ले लिया और अंतर्वीक्षण में जुट गया | मैंने पाया कि मैं तो अंतर्विरोधों का ढेर हूँ | जैसे मैं किसी का नाक में उँगली करना पसंद नहीं करता पर स्वयं करता हूँ , सी डी तिवारी जी से  भीख न देने के मुद्दे पर सहमत था पर भीख देता हूँ , राजनीति से घृणा करते हुए भी उसमे पूर्णतः लिप्त हूँ , पत्नी -परिवार से कोई लगाव नहीं है पर घर की ज़िम्मेदारियाँ पूरी निभाता हूँ , साहित्य में छंद का महत्व स्वीकारता हूँ पर छंदबद्ध कवितायेँ मुझे दो कौड़ी की लगती हैं , भीतर क्रोध का पारावार है पर लोगों से प्रेमपूर्वक  मिलता हूँ , मनुष्य में जन्म से आये व्यवहार की निम्नता को पूर्णतः लक्षित करता हूँ पर उन्हें सत्ता सौंपना चाहता हूँ , स्त्रियों का पूरा आदर -सम्मान करता हूँ पर औरतों के बारे में मेरी कोई अच्छी राय नहीं है , मैं बिलकुल गफलत में नहीं रहता सत्य को ठीक पहचानता हूँ पर अज्ञानी होने  की मासूमियत प्रदर्शित करता हूँ , " नहि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किञ्चित " मेरे जीवन का साध्य-मन्त्र है लेकिन मनुष्यों से बेहिसाब घृणा करता हूँ , हर क्षण मैं ईश्वर की आराधना में लीन रहता हूँ पर ईश्वर का विरोध करता हूँ , सांगोपांग धार्मिक हूँ पर धर्मों के नाश की रणनीतियाँ बनाता हूँ | इसकी सूची असीम होगी पर ऐसा मैं हूँ | इसका अपराध मैं स्वीकार करता हूँ | अच्छा हुआ आप मिल गए जिससे मैं यह कह सका , वरना मैं आत्मग्लानि से पीड़ित रहता | अब इसकी सफाई मैं अपनी खुशी के लिए यह देता , अपने मन को समझाता हूँ कि मेरा अंतर तो ठीक ही है पर उसके अनुकूल बाह्य जगत में कुछ नहीं मिलता तो वह विरोधाभास का कारण बनता है | बल्कि मैं तो तो कहता हूँ ये विरोधाभास ही मेरी उपलब्धियाँ हैं | इसलिए मैं शांत - संयत और स्थितप्रज्ञ रहता हूँ | सत्यतः , मुझे कोई भी शोक विचलित नहीं करता , कोई भी उत्सव मुझे आह्लाद नहीं देता | और फिर अंतर्विरोध- कि इसका विलोम भी फलित होता है | आपको धन्यवाद यदि आपने इसको पूरा पढ़ा | देखता हूँ , और अच्छा ही करते हैं कि आप फेसबुक पर अनावश्यक हम लोगों की तरह सक्रिय होकर समय नहीं गवाँते , इसलिए इस पोस्ट पर भी आपके कमेन्ट की चाह मुझे नहीं करनी चाहिए | मैं तो इसे आपके पास send करके ही पापमुक्त हो गया |