बुधवार, 1 मई 2013

Nagrik Blog 30 / 4/ 2013

* यदि आपने Top पहना हुआ है तो फिर Bottomless होने का अहसास जाता रहता है |

* अनुमानतः, कुछ लोग फेसबुक स्वयं स्वेच्छा से नहीं आये हैं | वे कहीं से भेजे या किन्ही द्वारा लाये गए हैं, उनके काम से | [ यथा सिमोन द बोउआ ]

* किसी भी पगड़ी धारी सिख को सरदार जी कहिये, नाम जानिए या नहीं | वह बोलेगा | अर्थात यहाँ व्यक्तिवाद तिरोहित होकर एक समूहवाद / किंवा समाजवाद में तब्दील हो जाता है | फिर पता नहीं क्यों लोग जातीय समूहों [ यादव अपवाद ] से चिढ़ते हैं ? उनके नाम तक उखाड़ फेंकना चाहते हैं, चाहे उखाड़ कुछ न पायें | यहाँ तक कि कम्यून [समूह ] वादी भी जब देखो तब जातिवाद के पीछे पड़े रहते हैं | यह गलत बात है कि नहीं ?     

* यही झकाझोरी में हेराय गए कँगना |
यह हम लोगों के यहाँ का देसी गीत है | किसी को यह अश्लील भी लग सकता है, क्योंकि मामला तो वही है | हमें भी लगता यदि इसका राग इतने प्यारा न होता | इसलिए मैं कभी मौज में अकेले खूब गता हूँ | आज इसकी याद दुसरे सन्दर्भ में आई | क्योंकि मेरा मिजाज कुछ पोयटिक भी है, इसलिए इसको जोड़ा मैंने फेसबुक पर चलने वाले बहसों विवादों से | कभी कभी यह झकाझोरी इतनी तेज हो जाती है की वार्ता का असली उद्देश्य, मंतव्य यानी जिसकी उपमा मैंने कँगना से दी वही हेराय, गायब हो जाता है |

* एक कोण से और देखना होगा | आज़म खान मुसलमान थे या नहीं, वह हमारे भारत देश के राज्य प्रतिनिधि थे | किसी भी कार्यवश वह गए हों मेज़बान मुल्क को उनकी हैसियत के मुताबिक उनसे ससम्मान ही पेश आना था | इस असम्मान का विरोध वाजिब था | इधर हम हैं कि आपसी इतर विवाद  में उलझ कर देश कि कमजोरी प्रकट करते हैं |

* प्रेमचंद सरीखे, और उनके समेत, लेखक दलित लेखन नहीं कर सकते | अतः इन्हें सवर्ण लेखक कहा जाना चाहिए | साधारण - सामान्य लेखक तो कोई होता नहीं |

* एक बात तो मुझे लगभग तय दिखाई देती है | मार्क्सवादी पैदायशी मूर्ख नहीं होते | वे बाद में बनाये जाते हैं |

* अभी तरुणाई में सुना एक पंडित जी का सुमधुर स्वर में गाया निर्गुण भजन याद आया तो उन्ही की लय में गाने लगा :--
*  यही अजरोरे बिछाई लेबा हो, अंधेरवा में ना बनिहैं राम | 
क्या यहाँ अजरोरे का अर्थ - प्रकाश [ enlightenment ] से है ?

*अरुण जी , आप तो सर न कहिये | किसी के लिए भी मैं यह रिवाज़ बंद करवाना चाहता हूँ | हम किन्ही professional school में नहीं हैं, न किसी के गुरु चेला | नाम के साथ ' जी ' या और कोई मित्रवत - भाई / साथी ठीक होगा | मेरे लिए उग्र जी चलता | वैसे मेरा उपनाम ' नागरिक ' है और मैं इसे '' कामरेड " की तरह सबके लिए इस्तेमाल कर सकता हूँ | " नागरिक धर्म " का प्रचारक रहा / हूँ मैं | [Rohela ]

* आप लोगों की घृणा का पात्र बनने का खतरा तो है लेकिन यह सच है कि मेरी वैचारिक पटरी लोगों से कम ही खाती है | मैं नालायक अपने आप में सरल किन्तु विरल हूँ | इसी को उस हाइकु कविता में व्यक्त किया है | लेकिन आप कविता पर न जाइए | संपर्क न तोडिये, स्नेह भाव बनाये रखियेगा | अंशुमान जी से पूछिए, इनसे मेरा प्रेम कितने झगड़ों के बाद हुआ, और आपसे कितने संकोच के साथ  | आभारी हूँ | इतना अवश्य है कि संस्कारवश मैं अधिक अशिष्टता बर्दाश्त नहीं कर पाता, जो कि अधिकतर विमर्शों में व्याप्त है | यद्यपि मैं स्वयं उग्र हूँ | अभी आप लोगों के कमेन्ट आ रहे थे तब मैं " जनमत निर्माण " की भूमिका लिख रहा था | क्षमा !   [ अंशुमन/वन्दिता  ]    

* सवर्ण राजनीति तो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारत में इस्लामी राज्य लेन कि और अग्रसर है | ऐसे में यदि राज्य दलितों के हाथ में नहीं दिया गया तो नतीजा बुरा होने वाला है | इनके वश का नहीं भारत में हिन्दू राज्य बनाना | देख लीजिये इनके झगड़े | अवर्ण हिन्दू राज्य ही एकमात्र विकल्प है |  

* यदि ब्राह्मण ही बनना है तो अब दलित बनेंगे ब्राह्मण | ये ही उनका स्थान लेंगे, उन्हें रिप्लेस करेंगे | नव / भव ब्राह्मण नहीं, वही पुराने वाले ब्राह्मण - कुछ भी नयापन नहीं | वही पूजे जायँगे, उन्ही का वचन ब्रह्मवाक्य होगा | अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में वही सर्वोच्च होगे, शासक या शासक निर्माता | वाही चुनाव लड़ेंगे | और हम उन्ही को जितायेंगे | उनके ऊपर कोई कृपा करके नहीं | अपने स्वार्थवश, भारत में हिन्दू राज्य के लिए | इसे इस्लामी चंगुल से बचाने के लिए |     

*  आत्मरक्षा का भरोसेमंद कुदरती हथियार | बलात्कार से बचने के लिए अपने दाँत मजबूत कीजिये | अमुक वज्रदंती , फलाँ लौह्दंती मंजन इस्तेमाल कीजिये |

काहे चिल्लात हौ ? अबहीं चीन बहुत दूर है | हम तो लखनऊ में हन | बैंड बाजा बरात लेके आवत है, देखो कब तक पहुँचे | तब तनिक और पीछे खिसक लेब | काहे अब्बै से जान दिहे डारत हो ?


[त्रियक रेखाएँ ]
* एक रेखा हो 
तो उसे फोन करें 
इतनी सारी - - ?

* मैं राज्य की हिंसा का इसलिए समर्थक हूँ कि अन्यथा तो तमाम पहलवान लोग और संगठन हिंसा द्वारा समाज और मानव जीवन को अपने कब्ज़े में ले लेंगे | ध्यान से देखिये, भगत सिंह के समर्थक वे लोग हैं जो जीवन तो क्या, अपना एक कौड़ी भी त्यागने को तैयार नहीं | नारा ज़रूर ज़ोरदार लगायेंगे क्योंकि भगत,राजगुरु आदि ने इनके लिए अपनी जान दी | जिस प्रकार ईसा ने ईसाइयों के पापों के एवज में सूली पर चढ़ना स्वीकार किया | लेकिन स्वयं कोई ईसा, कोई भगत सिंह नहीं बनता | उधर अहिंसावादी गांधी के सींकिया चेले कम से कम अपना निजी जीवन तो थोडा बहुत जी जाते हैं !    

* लिखित दे रहा हूँ 
जुबानी नहीं है ,
समय पास करना 
जवानी नहीं है |

* जग में देखो, वह उतना ही लम्बरदार हुआ ;
जग में छोड़ी जिसने जितनी बदबूदार हवा |


एक बहुत अच्छा शेर हो गया है | सुनाकर फिर काम पर निकलूँगा | 
* नींद आ तो जा रही तेरे बगैर ,
अब तू आ या भाड़ या चूल्हे में जा | 

- - - - - - -- 
[ तो कैसा हो ? ]
* मैं सोचता हूँ 
शिक्षा का मतलब 
नैतिकता हो |

नैतिकता का [5]
नाम सार्वजनीन [7] 
नागरिकता [5]
मनुष्य केन्द्रीयता [7]
समता,सम्मान्यता [7]
{ हाइकू - ताँका, Poetry = 5 -7 -5 -7 -7 }

* तुम्हारी याद 
जैसे जलती हुई  
अगरबत्ती |

खुशबु भरी 
सुगन्धित करती 
धुआं उड़ाती  |

* कब आओगे 
मित्र, पड़ोसी चीन  
मेरे घर में ?   

* बच्चे हैं या हैं 
ये कोई पुष्पगुच्छ 
क्या अंतर है !

* बातें खूब हैं 
बातें हैं बातों का क्या 
खूब कीजिये |

* वही मेरा है 
जो मेरे काम आये 
शेष पराये |

* मार भगाओ 
विचार आ जाएँ तो 
ध्यान लगाओ |

* पाला पड़ता 
ऐसे ऐसे लोगों से 
जान बचाता 
कैसे कैसे लोगों से 
जैसे तैसे लोगों से |

* वह आयेंगे 
यदि विश्वास है तो 
वह आयेंगे |

* वह जानते 
जेब से निकालना 
हमारा पैसा  
बहुराष्ट्रीय हैं वे 
बड़े ताक़तवर |

* वह आये हैं 
विश्वास नहीं होता 
छूकर देखूँ !

* आप नेता हैं 
और मुझे चिढ़ है 
नेतागिरी से |

* क्या करता हूँ ?
बुद्धि का इस्तेमाल 
यथासंभव |

* समान होंगे 
आदमी से आदमी 
धर्म से धर्म 
नहीं, हिन्दू से तुर्क 
न सिख से ईसाई |

* व्यस्त रहता 
यही स्वास्थ्य का राज़ 
मस्त रहता |

* मेरी नियति 
सबसे दुश्मनी है 
वैचारिक तो !

* मेरी दृष्टि में 
हर किस्म की नारी 
आदर योग्य |

* बताईयेगा 
जब ऊब जाइए  
मेरे पोस्ट्स से |

* ऊटपटाँग    
लिखने में क्या श्रम 
मैं लिखता हूँ |

* सूरत नहीं 
सीरत से बनता 
आदमी प्यारा |

* लोग कहेंगे 
अच्छाई का ज़माना 
नहीं रहा, तो 
उन्हें चुप कराओ 
पूछो, तुम अच्छे हो ?

* रंग बिरंगे 
कुछ लोग, तो कुछ 
बदरंग क्यों ?

* माँ के मानी क्या 
परंपरा वाहिनी 
दकियानूसी ?

* ब्राह्मणवाद 
परोक्ष शासन का 
शाश्वत [शाब्दिक ] वाद 
सार्वकालिक सच 
सम्प्रति विद्यमान | 

* नास्तिकता तो 
देती बड़ा संबल 
" आत्मविश्वास " 

* लिख दीजिये 
आपका काम ख़त्म 
अब वे जानें 
उनका काम जाने 
क्या करते हैं वे ?

* आगे ही आगे 
और आगे सोचना 
रुक न जाना 
बहुत दूरस्थ है   
विचारों की मंजिल |

* जातिगत जो 
गैरबराबरी है 
न अभी बाक़ी 
शिक्षा में बराबरी 
उसे दूर करेगी |

* सस्ती हो गयी 
आसानी से मिल गयी 
जो कोई वस्तु ?

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