शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

कथा नुमा

* कथा :- [झंडू बाम ]
- तुम्हारी शादी हुयी ?
_ हाँ ?
- पत्नी कहाँ है ?
- मेरे साथ ।
- कभी दावत दो तो हम भी देखें ।
- दावत की क्या ज़रूरत , लो अभी देखो ।
और उसने जेब से एक शीशी निकाल ली ।
- यह क्या है ?
- यही है मेरी बीवी । मेरे लिए यह झंडू बाम हो गयी है । #
###

कहानी शुरू

कथा भूमि :-
हा ! हा ! हा !
============
- पापा , इस नौकरी के लिए मेरा चयन नहीं हुआ । हा ! हा ! हा !
- मैंने तो पहले ही कहा था ,बेटा । हा ! हा ! हा !
[वे दलित थे , या मुस्लिम ,या गरीब देहाती , बिना पैसे व पहुँच वाले लोग , और उन्हें पाता था या भ्रम था कि नौकरी के लिए गुण के अतिरिक्त बहुत सारी चीज़ें ज़रूरी होती हैं , जो उनके पास नहीं थे । इसलिए वे जॉब न मिलने के प्रति आश्वस्त थे और थे मजाकिया रूप से खुश -प्रसन्न । ]
आज सुबह पुत्री फिर एक साक्षात्कार के लिए जा रही है ।
पापा :- जाओ , लेकिन जान लो होना नहीं है । हा ! हा ! हा !
बेटी :- कोई बात नहीं पापा , घर तो है न लौटने के लिए , हा ! हा ! हा !
। ।
फिर किसी दिन वह लौटती है ।

-
पापा ,आज तो गड़बड़ हो गया - हा ! हा ! हा !
- मिल गयी न तुझे नौकरी ! हा ! हा ! हा !
- हाँ पापा , हा ! हा ! हा !
- मैंने कहा था न ! हा ! हा ! हा !
- हा ! हा ! हा ! #
###########

राजनीतिक कविता

* वे इनका
मजाक बनाते रहे
ये उनका
मजाक बनते रहे

न उन्होंने पत्रकारिता ,
साहित्य की
ज़िम्मेदारी निभाई ,
न उन्होंने
आदरणीय की भूमिका का
निर्वाह किया ।
मीडिया और मंत्री
यह खेल खेलते रहे
प्रचार की प्रत्याशा में
और लोकतंत्र सड़ता रहा
जनता के दिमाग में । #

* जो भी चैनल चलाओ
वहीं विज्ञापन ,
विज्ञापन ही विज्ञापन ! ##

* धमाकों और पटाखों का
कोई सूत्र मिले न मिले ,
अपराधी पकडे जाँय
या साफ़ छूट जायं
बयान कितने भी आते रहें, पर
भारतीय जनमानस तो
अपने हिसाब से
अपने गलत सही अनुमान
लगा ही रहा है ,
उलटे सीधे निष्कर्ष तो
निकाल ही रहा है,
उसे कैसे रोकेंगे ?
उसका क्या कर लेंगे ?
भले उससे क्या होगा ,
वह क्या बिगाड़ लेगा
देश के दुश्मनों का ?
देश का नक्शा
बिगाड़ने वालों का ?
पर वह मन तो बना रहा है
और जनता का मन
बहुत बड़ा वस्तु होता है
वह कुछ भी कर सकता है
किसी भी समय ।
आखिर जनता तो
सर्वोच्च है न !
सरकार न सही ,
नेता न सही ,
पुलिस न सही । #
########

उदगार - विचार

* पहले अंग्रेजों को गाली देते थे ,
अब अमरीका को कोसते नहीं थकते
हम हिन्दुस्तानी , अपना दोष
दूसरों पर मढ़ने के अभ्यस्त
अपनी गंदगी दूसरों के कपड़ों पर
पोंछने में सिद्ध हस्त ।
कौन कहता है हम गुलाम थे
हमने तो सबको अपने
पैरों तले रखा - किसकी हिम्मत
जो हमें नीचा दिखा सके
सर्वोच्च हैं , रहे हैं ,
सदैव हम । #

* कुछ लोग , अति प्रबुद्ध , प्रगतिशील राष्ट्र को नहीं मानते , राष्ट्रवाद को बुरा मानते हैं । अति या उग्र राष्ट्रवाद का मैं भी समर्थक नहीं । लेकिन राष्ट्र तो यथार्थ है ? इसलिए राष्ट्र -राज्य के अस्तित्व को अपने भौतिक जीवन के लिए सहर्ष स्वीकार करता हूँ । उनसे एक प्रश्न है कि यदि यह देश , भारत न होता तो वे अल्पसंख्यक मुसलमान कहाँ होते जिनके पक्ष में वे खड़े हैं ? और वे बहू संख्यक हिन्दू कैसे होते जिनकी साम्प्रदायिकता के विरोध में वे जान लड़ाए हुए हैं ? #

झगड़ा [कविता]

* [कविता ] झगड़ा
======
मैं व्यक्तिवाद के विरोध में
व्यक्तिवादी हूँ , [मनीषावादी, मानुखवादी ,Individualist]
मैं इस्लाम के विरोध के सारे औज़ार
इस्लाम की ही झोली से निकालता हूँ
और हिंदुत्व का काँटा हिन्दुत्त्व से ,
उन्ही की किताबों , उपदेशों से
उनकी प्रशंसा कर्ता हूँ और
उन्हें उनका विकृत चेहरा भी
उन्ही के शीशे में दिखाता हूँ ।
इसीलिये , मैं मनुष्य , मानुख हूँ
कि मैं हिन्दू - मुसलमान .ईसाई ,कमुनिस्ट
सब एक साथ हूँ , और नहीं भी हूँ ।
ऐसे मनुष्य को परिभाषित करना
बहुत कठिन , लगभग असंभव है ,
मैं हूँ अपरिचित - अपरिभाषित
अलक्षित मनुष्य । #

एक बात

* - मुसलमानों के साथ रहना , गुज़र -बसर करना एक बात है । यहाँ आप जिन्ना से फर्क हो सकते हैं । लेकिन उनके साथ मिलकर राज्य चलाना संभव नहीं है । यहाँ आपको जिन्ना की बात माननी पड़ेगी । क्योंकि वे हिन्दू सांस्कृतिक राज्य नहीं मानेंगे , यह तो अलग बात है ,वे लोकतंत्र के वैश्विक नियमों को भी नहीं चलने देंगे । राज्य के रूप में तो उन्हें सिर्फ इस्लाम चाहिए । यह दिक्कत है जो भारतीय राज्य के समक्ष दरपेश है । और इससे भी विकत बात यह है कि भारतीय राजनीति और बढ़ाकू बुद्धि जीवी इस ज़मीनी सत्य को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं , इसका निदान क्या ढूंढेंगे !
* इन्हें इस्लाम के अतिरिक्त किसी और कि जय करना मंज़ूर नहीं । अब हिन्दुस्तान तो जैसा सेकुलर है , वह है ही । यदि इसे इस्लामी राज्य घोषित कर दिया जाय तो देखिये इनसे बड़ा देशभक्त कोई क्या होगा !
* सुब्रमणियम स्वामी ने कहा तो है कि जो मुसलमान अपने पूर्व हिन्दुत्त्व को न माने उनसे वोट देने का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए ।लेकिन यह कैसे व्यवहारिक होगा ? क्या सभी मुस्लिमों से कोई शपथ पत्र लिया जाना संभव है ? और वे लिख कर दे भी देन तो क्या फर्क पड़ जायगा ? किस पैमाने से नापेंगे उनकी आस्था ? इसकी अपेक्षा तो मेरा ही सुझाव बेहतर है कि पूरा हिन्दुस्तान केवल दलितों को वोट करे । मुसलमान भी सहमत हों और भाजपाई हिन्दू भी । दलित तो सबसे पुराने हिन्दू हैं न स्वामी जी ? फिर क्या दिक्कत है ? मुसलमान वैसे भी छंट जायेंगे । #####

एक बात

* - मुसलमानों के साथ रहना , गुज़र -बसर करना एक बात है । यहाँ आप जिन्ना से फर्क हो सकते हैं । लेकिन उनके साथ मिलकर राज्य चलाना संभव नहीं है । यहाँ आपको जिन्ना की बात माननी पड़ेगी । क्योंकि वे हिन्दू सांस्कृतिक राज्य नहीं मानेंगे , यह तो अलग बात है ,वे लोकतंत्र के वैश्विक नियमों को भी नहीं चलने देंगे । राज्य के रूप में तो उन्हें सिर्फ इस्लाम चाहिए । यह दिक्कत है जो भारतीय राज्य के समक्ष दरपेश है । और इससे भी विकत बात यह है कि भारतीय राजनीति और बढ़ाकू बुद्धि जीवी इस ज़मीनी सत्य को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं , इसका निदान क्या ढूंढेंगे !
* इन्हें इस्लाम के अतिरिक्त किसी और कि जय करना मंज़ूर नहीं । अब हिन्दुस्तान तो जैसा सेकुलर है , वह है ही । यदि इसे इस्लामी राज्य घोषित कर दिया जाय तो देखिये इनसे बड़ा देशभक्त कोई क्या होगा !
* सुब्रमणियम स्वामी ने कहा तो है कि जो मुसलमान अपने पूर्व हिन्दुत्त्व को न माने उनसे वोट देने का अधिकार छीन लिया जाना चाहिए ।लेकिन यह कैसे व्यवहारिक होगा ? क्या सभी मुस्लिमों से कोई शपथ पत्र लिया जाना संभव है ? और वे लिख कर दे भी देन तो क्या फर्क पड़ जायगा ? किस पैमाने से नापेंगे उनकी आस्था ? इसकी अपेक्षा तो मेरा ही सुझाव बेहतर है कि पूरा हिन्दुस्तान केवल दलितों को वोट करे । मुसलमान भी सहमत हों और भाजपाई हिन्दू भी । दलित तो सबसे पुराने हिन्दू हैं न स्वामी जी ? फिर क्या दिक्कत है ? मुसलमान वैसे भी छंट जायेंगे । #####

तुम्हारे बिना

* [कवितायेँ ]
१ - तुम्हारे बिना
अब तुम्हारे बिना
मेरा जी नहीं लगता कही ।
अब इस बात को
मैं कविता बनाकर
नहीं कह सकता ,
कविता बनानी ही आती तो
मैं जी न गया होता
तुम्हारे बिना !
जी नहीं पा रहा हूँ मैं
तुम्हारे बिना । #

२ - बदनाम होने का क्या
वह तो किसी भी कामपर
हो सकते हो ,
अच्छा काम करने पर भी । #

३ - मानो तो देव
नहीं तो पत्थर ,
किसी ने आज तक
उसे पत्थर माना हो
तो बताइए ! #

४ - मैं मिट्टी हूँ
मैं आकार में हूँ ।
यदि तुम मिट्टी की मूर्ति से
शिला - अहिल्या से
प्यार कर सको तो
मेरे पास आओ
मैं तुम्हे स्वीकार करूंगी
लेकिन तुम
मिट्टी की तरह नहीं
एक मनुष्य की तरह
मुझे प्यार करो । #

५ - मै हूँ तुम्हारे
बुरे दिनों का साथी
तुम्हारी ख़ुशी का
मैं हिस्सेदार नहीं ।
खुदा करे -
न बुरे दिवस आयें
तुम्हारे पास
न मैं आऊँ । ##
######

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

विचारार्थ

१ - यह तो खैर मैं काल्पनिक अनुमान से कह सकता हूँ की प्रेम , सचमुच प्रेम , यदि उसमे कोई स्वार्थ न तुड़ा हो , तो एक समय में कईयों के साथ किया जा सकता है । #
२ - दलित हमारे पूज्य देवता हैं और मुसलमान हमारे सम्मानित अतिथि । इनका हर प्रकार से संरक्षण और पालन होना चाहिए । # ३ - कम्पूटर ज़रूरी होता जा रहा है । यह आज़ादी है या गुलामी ? # ४ - कष्ट यह है कि मुसलमानों के साथ बात भी नहीं हो सकती । संवाद नहीं हो सकता । शास्त्रार्थ , वाद -विवाद की बात तो छोड़ ही दीजिये । # ५ - मंदिर छोटा होना चाहिए । दिल [का मंदिर ] बड़ा होना चाहिए । # ६ - मैं कथक [नृत्य ] खूब देखता हूँ । मैं उसके शास्त्र के बारे में कुछ नहीं जानता , पर उसका लय -ताल मेरी शिराओं को थिर -सामान्य ,शांत -क्रम बद्ध कर देता है । इसकी तुलना मैं कम्पूटर के एक आपेरशन से करता हूँ । जैसे यफ - ५ बटन दबाने से वह सामान्य [नार्मलाइज] हो जाता है । #
७ - कहा जाता है - फलां का देहांत हो गया है । इसका क्या मतलब ? देह तो अभी रखा हुआ है , लोग उसे देखने आ रहे हैं ! फिर किसका अंत हुआ ? इसका मतलब देह ही आत्मा है - देहात्मा । जो अभी पड़ा है वह शरीर है । उसका अंत तब होगा जब उसे मिट्टी में दबा - या अग्नि में जला दिया जायगा।# ८ - बद तो अच्छा
बदनाम बुरा है
अच्छी नीति है ?
[हाइकु ] #####

तीन कवितायेँ

* [कवितायेँ ]
१ - काम कर रहा हूँ तो
कुछ हो ही तो रहा है ,
कोई बैठा तो नहीं हूँ
हाथ पर हाथ धरे
कि कोई मेरा काम करे
या मुझसे प्यार ! #

२ - कवि तो वह जो
कविता में जिए
यह क्या कि साल में
एक कविता करके
कोई कवि बन जाये
चाहें वह कविता कितनी ही
साहित्यिक क्यों न हो ! #

३ - [हाइकु ]
यहाँ तो सब
बुद्धि का मामला है
कौन साथ दे ? #
######

रस्सी में गाँठ

* [कवितायेँ ]
१ - रस्सी में गाँठ कैसे लगती है ?
उसका एक सिरा अपने को ही लपेट कर
एक लूप बनाकर , उसमे घुसकर तन जाता है ,
और रस्सी में गाँठ लग जाती है ।
ऐसे ही जैसे ही , जितना ही ,
अपने आप में , अपने आप से एंठोगे ,
उतना ही तुम अपने को रस्सियों में बंधोगे
मन में गांठें लगाओगे ।
सरल रहो , सीधे रहो तो
कहाँ बंधन , कैसी गांठें ?
खुला , मुक्त रहो । #

२ - जैसे जैसे लोग
मेरी राह में
काँटा बोते जाते हैं
वैसे वैसे मैं
उन्हें राह से हटाने का
प्रयास करता जाता हूँ । #
######

तुम्हारे आने से पहले

* [कविता ]
तुम्हारे आने से पहले ही
तुम्हें खिलाने पिलाने की
व्यवस्था पक्की है ,
दाल भिगो दिया गया है
नमकीन ,मिठाइयाँ बनकर तैयार हैं ,
बढ़िया बासमती चावल आ गया है
सब्जियों से फ्रिज भरा है और
मसालों से मसालों का डिब्बा
बस थोड़ी हरी धनिया की पत्ती आनी है
वह नुक्कड़ से फ़ौरन आ जायगी
जब तुम आओगे ।
तुन आओ तो सही ! #

Said so -

* Humanism is a religion which is variously defined by human beings. #

* I support equality with a difference [ not ordinarily] .
मैं समानता का समर्थन एक अंतर के साथ कर्ता हूँ [साधारणता से नहीं ] । #

* मैं सोचता हूँ कह दूं कि मैं मरने के बाद भी कुछ अपने साथ लेकर जाऊँगा। वह होगी मेरी सभ्यता , मेरा शिष्टाचार । #

* आत्मा वह है जो आदमी के जिंदा रहने तक उसके शरीर में रहती है । मरने पर वह शरीर से निकल जाती है । वह अशांति रहती है । तभी तो उसकी शान्ति के लिए दुवाएँ की जाती हैं ! #

* हे हमारे दलित भाई , तुम दलित ही बने रहो । दलित बने रहोगे तो हम भी सवर्ण बने रहेंगे तुम्हारी तुलना में । तुम्हारे उलट , तुम्हारे प्रतिपक्ष में । तुम सामान्य साधारण मनुष्य , या अवर्ण -सवर्ण कुछ नहीं बनोगे तो हम सवर्ण कैसे बने रह पायेंगें ? इसलिए हे दलित भाई , तुम दलित बने रहो । इसमें तुम्हारी भलाई हो या नहीं , हमारी तो है ! #

* सुना है आप जाति छोड़ने जा रहे हैं । बड़ी अच्छी बात है । लेकिन ज़रा रुक जाइए । लड़के -लड़कियों की शादी हो जाने दीजिये ! #
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बुद्धिवादी सलीब

* [कविता ]
जब तुम खुद अपनी मूर्खताएँ
जीना बंद कर दोगे
तब हम तुम्हारी मूर्खताएं जियेगे ।
जब हिन्दू मूर्तिपूजा बंद कर देगा
आर्य समाजी यज्ञ करना बंद कर देंगे
बौद्ध बुद्ध को , जैन अपने तीर्थंकरों की
बात नहीं मानेंगे ,
ईसाई यीशु को परमात्मा क पुत्र और
मुस्लिम मोहम्मद को सन्देश वाहक
मानना बंद कर देंगे ,
तब मैं यह सब , इन सबको
मानना शुरू कर दूंगा ,
मैं इनमे से किसी को समाप्त
होने नहीं दूंगा , अपने धरोहर को ज़िदा ,
सुरक्षित रखने क ज़िम्मा मै उठाउँगा,
तुम्हारा सलीब मैं ढोऊंगा ।
तुम चलो अपने रास्ते
तुम बुद्धिवादी बनने में भय न खाओ ,
संकोच न करो , कहीं कुछ भी
बिगड़ने न पायेगा , निश्चिन्त - बेफिक्र रहो । #

बुधवार, 28 सितंबर 2011

नए हाइकु

* सोचते नहीं
या सोच नहीं पाते
जाने क्या बात ! #

* हम क्या करें ?
लोग सोचते नहीं
तो मैं क्या करूँ ? #

* कुछ कमी है
कुछ तो कमी है ही
धर्म संस्था में ! #

* आकर्षक हैं
क्योंकि गोपनीय हैं
वे कुछ अंग । #


*
कुछ न कुछ
कुछ बात तो है ही
वह खफा हैं । #

* कविता ले लो
मुझे क्यों ले जाते हो
मंच की ओर ? #

* जितना खुश
होना चाहिए मुझे
उतना मै हूँ ,
जितना दुखी
होना चाहिए मुझे
उतना मैं हूँ । #

* साहित्यकार
क्या होता है , अगर
आदमी नहीं ! #

* मेरी बातों को
यूँ न टाल पाओगे
टालो तो देखो ! #
##########

ठग प्रेम

* प्रेम बहुत गहरे मन का ठग [फ्राड] है , इसलिए जल्दी पहचान में नहीं आता , जब तक कि आदमी बाह्य जीवन में वास्तव में ठगा नहीं जाता । #
* क्या साहित्य वही है जो लिखा जा रहा है , पुस्तकों में , पत्र - पत्रिकाओं में ? क्या ख़बरें वही हैं जो छप रही हैं अखबारों में ? गालियों , चौबारों , यात्राओं में , ढाबे - ढाबलियों पर , घरों में जो बातें हो रही हैं , साहित्य रचा जा रहा है , ख़बरें बन रही हैं , वे साहित्य नहीं हैं ? #

राज नेता

*राजनेता कुछ न करें केवल अधिकारियों पर लोकपाल की भूमिका अदा करें तो यही बहुत होगा । #

* लोग राहुल गाँधी , नरेंद्र मोदी ,नीतीश , न जाने किस -किसका नाम लेते हैं । मुझे तो वीरप्पा मोइली भारत के प्रधान मंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त लगते हैं । #

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

तीन कविताएँ

* [शेर ]
मैं खुश होता हूँ जब मै अपनी गलती मान लेता हूँ ,
इसी से मैं ख़ुशी से अपनी गलती मान लेता हूँ । #

* [लिखो , लिखते क्यों नहीं ?]
लिखो कि तुम्हारी तबियत ख़राब है ,
चल फिर नहीं सकते , जुलूस में शैमिल
लेकिन लिख तो सकते हो
कितना अपराध तुमने किया
किसको कितना घूस दिया
अपना आय - व्यय , सब लिख डालो
कितना झूठ बोला - सच सच लिखो
कविता -कहानी लिखो
जनता की न सही
अपनी ही उम्मीदें , अपनी निराशा व्यक्त करो
कौन रोकता है तुम्हे डायरी लिखने से
अपने प्रेमी के नाम पत्र जैसा लिखो ,
लिखो सब , वक्त पर काम आएगा । #

* [हाइकु ]
धन्य हैं लोग
प्रयास किये जाते
जो निष्फल ही ! #
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अप्रिय कविताएँ

अप्रिय कवितायेँ
[एक ]
हमलावर , कुछ भाग गए ,
कुछ मरे गए ।
इस एक को हमने जिंदा पकड़ लिया
ह्मिसका क्या करें ?
सोचते है , यदि यह भी मारा गया होता तो ---
हम इसका क्या कर पाते ?
हम इसको लेकर क्यों चिंतित होते ?
पर यह तो जिंदा बच गया हमारी बंदूकों से ।
अब हम न इसे भगायेंगे , न मरेंगे
इसे हम जिंदा अपने पास रखेंगे
इसे हिन्दुस्तानी बनाएँगे ।
समस्या है , हम उनको क्या मुँह दिखाएँ
जिनके परिवारों को इसने नष्ट किया ?
हम शर्मिंदा हैं ,क्षमा प्रार्थी हैं इसके लिए
की इस एक आदमजात , मानव संतान को
हमारा धर्म इंसानियत नहीं सिखा पाया ,
इंसान नहीं बना पाया !क्यों न हम ऐसे धर्म
ऐसी शिक्षा दीक्षा -परवरिश को ही मार डालें ?
हमें नहीं चाहिए मनुष्य के लिए ऐसा ढांचा ,
लेकिन मनुष्य तो चाहिए
हम इस एक व्यक्ति को मार कर क्या पायेंगे
इसे जिंदा रखकर
शायद कुछ पायें !

शीर्षक - मजहब से घृणा करो , ऐसे मज़हब से ,
वैसे मज़हब से , सभी मज़हब से ।
थुड़ी अभियान है हमारा - मज़हब के खिलाफ
जो ऐसे इंसान बनाता है कि वह
इंसानों को मारने लगता है ।

शीर्षक -थुड़ी अभियान - मज़हब के खिलाफ
केवल एक कोर्ट नहीं
सारा देश सजा दे अजमल कसाब को
उसे मारकर नहीं
[उसे अकेला जल्लाद भी मार सकता है ]
उसके मज़हब पर थूक कर , जिससे
उसके मज़हब को भी सजा मिले और थूकने वाला
अपने भी मज़हब पर कड़ी नज़र रखे ।
यह हासिल होगा आन्दोलन का
वरना उसका मृत्यु दंड हमें कोई लाभ न देगा । #
[कसाब से समाज विज्ञानियों /एन जी ओं को यह बयान लेना चाहिए कि वह ऐसा कसे बना ? उसे ऐसा किसने बनाया ? तो उस मूल स्रोत पर भी सजा मुक़र्रर किया जाए । ]

*[दो ]
अजमल दोषी हो गया
क्योंकि वह
पकड़ में आ गया ,
और जो पकड़ में नहीं आये
वह मज़हब , वे मज़हबी
उन्हें क्या सजा दे रहे हो तुम
और तुम्हारी कचहरी ? #

* [तीन ]
अजमल तो एक खंभा है
और खिसियाने हो तुम
नोचो , खिसियानी बिल्ली !
खम्भा नोचो । #
##########

गरीबी के साथ

* गरीबी के साथ
------------
मेरा एक सिद्धांत है कि जीवन को गरीबों की तरह जियो । ज़ाहिर है , उसे जी तो पाओगे नहीं । तब तुम गरीबों का जीवन -स्तर उठाने की सोचोगे , उसके लिए प्रयास , आन्दोलन करोगे । तब तुम उनके उस नए जीवन स्तर को जीने के लिए नैतिक रूप से अधिकारी हो जाओगे । #
* विचार
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कहीं लोकपाल की तरह ही तो नहीं था अंग्रेजी शासन ? जिसको चाहता राजा बना देता , नहीं चाहता तो कुप्रबंधन -
अयोग्यता का आरोप लगाकर राज्य मुक्त कर देता ! बड़ोदा के मल्हार राव गायकवाड , दिल्ली के बहादुर शाह ज़फर , अवध के नवाब वाजिद अली शाह आदि अनेक उदहारण होंगे उस काल के इतिहास में । इसलिए मुझे तो दर लगने लगा है किन्ही लोकपालों से । #
* [हाइकु ]
कितना सोचूं
अपनी रुग्णता को ?
छोड़ो , जाने दो । #
########