शनिवार, 6 जुलाई 2013

Nagrik Books 4 to 7 July 2013

* ऐसी आज़ादी भी न माँगिये जिसकी कीमत ज्यादा देनी पड़ जाय !

*हाँ, यह तो है कि " देसी भाषा विलायती ड्रेस " क्यों चुना इन लोगों ने ? फिर पश्चिनी सभ्यता का विरोध क्यों करते हैं ? लेकिन इस बात की खबर नही है कि मंत्री ने कोई बलप्रयोग किया | हमें सदैव न्याय पर रहना चाहिए अपने दुश्मन और विरोधियों के साथ भी | नौकर, या ऐसे लोग भी खूब ब्लैकमेल करते हैं |

* प्यारे दोस्तों !
इशरत जहाँ भी केवल नाम से , पैदा होने के हक से ही मुसलमां थी |

* विकेंद्रीकरण की नीति के परिपालन में ग्राम प्रधान क्यों नहीं अपने अपने गाँवों में नक्सल समस्या से निपटते ? कश्मीर में भी यदि प्रधानों को ऐसी ही सुविधा, अधिकार और बजट मिल रहे हों तो वे भी अपनी समस्या सुलझाएं | राज्य / केंद्र की सरकार क्यों उनकी स्वतंत्रता में दखल दे ?

* मैं स्वयं भी सेक्युलर हूँ | इसलिय अपने सेक्युलर साथियों से इंगित करना चाहता हूँ कि हर बात जवाब देने से नहीं सुलझती |आपको तमाम टिप्पणियां पढ़ सुन कर यह अनुमान लगाना चाहिए कि जनता की राय आपके विपरीत है | और जान धारणा का लोकतंत्र में बड़ा महत्व होता है | हम लोक धर्मी लोगों को लोकमत का आदर करना चाहिए | और तदनुसार अपनी नीतियों, सोच के तरीकों , साम्प्रदायिकता से लड़ने की रणनीतियों  में सुधार , परिवर्तन करना चाहिए |

* भारत में कोई राष्ट्रपति प्रणाली तो है नहीं | नमो को PM बनाना भी चाहें तो भाजपा को वोट देना पड़ेगा  |फिर क्या भरोसा की वह उन्ही को बनाये ? जैसे अखिलेश यादव अंत तक चुनावी भाषण में नेता जी को ही CM बनने  की बात करते रहे, पर बाद में वही बना दिए |
या फिर पार्टियाँ लिखित वायदा EC को सौंप दें |
ऐसे में ज़रूरी है कि राष्ट्रपति प्रणाली लाने के प्रयास किये जायँ |

* विचार भी पदार्थ होते हैं  कर्म भी वज़नदार | :-
विचार भी पदार्थ होते हैं | उनमें भी वज़न होता है | वे भारी होते हैं |इसलिए मैं विचारों का भार नहीं ढोता | ज्यादा नहीं सोचता | जब जहाँ पैदा हो गया, हो गया | जो खिलाया गया खा लिया | जिससे विवाह हुआ, हो गया,बच्चे होने थे , हो गए | उन्हें जोहोना था हो गए | जब तक  मन हुआ भजन गया, मन हुआ तो नास्तिक हो गया | सब अपने आप होता गया मेरी कविताओं की भांति | मैं ज्यादा विचार नहीं करता |
एक और बात है | आज सोचता हूँ पिछली बातें | यदि वे बहुत उठापटक वाले होते तो आज उनकी याद भी संभालना मुश्किल होता | अच्छा हुआ मैं ज्यादा परिवर्तन - आन्दोलन करने, प्रसिद्धि पाने के  चक्कर में नहीं पड़ता | वरना उनका बोझ आज बहुत भारी होता | असहनीय | विचारों की तरह कर्म भी पदार्थ होते हैं |
मैंने विचार एवं कर्म का कोई बोझ नहीं बढ़ाया |जो होता गया वह होता गया वह होता गया | मैंने कुछ नहीं किया |      

* Pushpendra जी , ईश्वर को धन्यवाद दो कि कोई तुमसे घृणा करने वाला तो है | मैं तो प्रार्थना करता हूँ कि वह मुझें इनसे प्रेम करने की शक्ति दे | मैं नीलाक्षी जी से परम स्नेह रखता हूँ | इनकी बातें धैर्य पूर्वक सुनो,गुनो,धुनों और यदि अपने व्यवहार में कुछ कमी हो तो सुधारो | आखिर सवर्ण जाति में जन्म लेने की सजा तो भुगतनी ही है ?|

* आजकल औरतें बड़ा घड़ा - फड़ा लेकर बिजली पानी के दफ्तरों पर प्रदर्शन कर रही हैं, अफसरों के घेराव कर रही हैं | अपने इष्ट देव भगवान, देवी -देवताओं का घेराव क्यों नहीं करतीं ? मंदिरों पर प्रदर्शन क्यों नहीं करतीं ?

* ऐसे विषय पर चटखारे लेकर चर्चा करना अपने देश की दकियानूसी प्रवृत्ति है | शर्म अपने पर करो |गिरे हैं तो हम लोग दूसरों के निजी जीवन और sexual orientations पर फतवे देकर | अब कहाँ चली गयी प्रगतिशीलता ?

* मेरी कल्पना में मैदान के तमाम बुद्धिजीवी, बड़े बड़े अधिकारी, राजनीति के कार्यकर्त्ता, किताबी प्रोफेसर "समरथ " नक्सलवादियों से भय केकारण उनका समर्थन करते हैं, कहानी कविता लेख लिखते हैं, कि पता नहीं कब भेड़िया आ जाये |या फिर उन लाल किताबों का नमक का हक चुकाने के लिए जो उन्होंने  विश्व विद्यालयों में पढ़ रखी हैं ? अंतीं रूप से कुछ कहा नही जा सकता |  [नीलाक्षी ]

* यदि " विकास " इतना ही महत्वपूर्ण मुद्दा है है भारतीय राजनीति का , तो क्यों न भारत का शासन "केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग " को सौंप दिया जाय ?

* नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 'साक्षरता संवाद 'का जून अंक मिला |उसकी एक कविता ध्यातव्य है :-
एक वृक्ष भी बचा रहे
( अनोखी लाल कोठारी )

* अंतिम समय जब कोई नहीं
जायेगा साथ
एक वृक्ष जायेगा
अपनी गौरैयों - गिलहरियों
से बिछुड़कर
साथ जायेगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले
कितनी लकड़ी लगेगी ?
श्मशान की टाल वाला पूछेगा
गरीब से गरीब भी सात मन तो लेता ही है
लिखता हूँ , अंतिम इच्छाओं में
कि बिजली के दाह घर में हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद एक बेटे और एक बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में |
- - - - - -
कविता तो अच्छी है | विशेषतः पर्यावरण दिवस 5 जून के सन्दर्भ में | और अनोखी जी ने इसे छपवा कर शुभ कार्य ही किया है , लेकिन
यह कविता नरेश सक्सेना जी [लखनऊ ] की है |

[कविता ]
* तपता तो है तवा
जलता, आँच सहता

और सिंकती है 'रोटी '
उस पर किसी और की |

* कभी ऐसा हुआ
खुदा पैसा हुआ ,
तो फिर पूछना मत
प्रलय कैसे हुआ ?

* इस गतिशील युग में कोई भी चीज़ थिर नहीं रह सकती | यदि हिन्दू धर्म को उठाया नहीं गया , सचमुच कर्ताव्योंमुख नहींकिया गया, अर्थात यह ऊपर नहीं चढ़ी तो फिर नीचे गिरेगी | और दुर्भाग्य से यही हो रहा है |इसे नास्तिकता और वास्तविक नैतिक आध्यात्मिकता के बुर्ज़ पर ले जाना ही होगा |

* THE पार्टी
[Thinker, Humanist, Atheist's ] Party

* और यही बात राजनीति के लिए भी सच है | यद्यपि यह विचार लोकतंत्र के कुछ विपरीत (?) जाती है, इसीलिए मैं इसे कहने में संकोच कर रहा था | लेकिन राज चलाना, राजकाज में हिस्सा लेना, सब के वश की बात नहीं होती   | यह विशिष्टता, विशेष योग्यता मांगती है | इसके लिए बड़ा दिल, बड़ा दिमाग , सोचने का विस्तृत दायरा, राष्ट्र और जनता के प्रति अप्रतिम लगाव, लोक कल्याण के प्रति समर्पण, निःस्वार्थ सेवा की भावना, आत्मविश्वास और दृढ़ता, निर्णय लेने की अद्वित्तीय क्षमता और सार्वजानिक जीवन के अन्य गुण व्यक्ति में होने चाहिए | राजनय में पटु और प्रवीण जन ही कुशल राजनेता बनते है | और राजनेता ही क्यों, इन गुणों से युक्त व्यक्ति ही देश का श्रेष्ठ नागरिक भी होता है |  

* हिन्दू एक जन हन्ता को अपना शासक नहीं बना सकता |
[ अपनी रियाया का नहीं ! To Dhirendra Pandey ]
Who I was talking about ? and you who about ? I meant NM . Remember please, We are yet a Hindu nation [mind the word Hindu, not Christian, not Muslim] . And I know nothing of Hindu beyond morality,justice and humanity . I don't think any "Hindu" will confirm BJP as a Hindu party . It is non - hindu . It is a shame on " Great Hinduism" .
पृथ्वी जी, अवश्य बोला जाना चाहिए, और आपने बोला तो काफी कुछ ! हम आपसे सहमत हैं | उसी कड़ी में है यह बात , वरना कोई कहता 'गुजरात ' पर कोई नहीं बोला |
धीर जी, तो हो गई न मुझसे हन्तई ?  :)  |
पृथ्वी जी, आप तो वहीँ आ गए जहाँ मैं हूँ  :)  | मुस्लिम वोटों के चक्कर में बीजेपी भी खूब है (NM जिसके अगुवा बने ) | इसीलिए मैंने उसे अ -हिन्दू कहा [नीति में भी, राजनीति में भी ] | हिन्दू की कोई पार्टी नहीं बनी , जिसे केवल भारतीय नागरिकों के वोटों की दरकार हो, साम्प्रदायिकता की नहीं | हम उसी का माहौल बना रहे हैं |  अभी आप क्रोध और जोश में हैं | भोजन करके, शांत [मौन] ध्यान करके so जाईये | कल मिल लेंगे किसी अन्य विषय के साथ |    

Nilesh Deshbhratar  posted to द जजमेंट
किसी गरीब कि मदद करने के लिए, जो हाथ बढाऔ तब उसके चेहरे को मत देखना,क्योँकि, मजबुर इन्सान कि आँख मेँ उठी शरम आपके दिल मेँ "अभिमान" पैदा कर देगी...!

Nilesh Deshbhratar

मैँ नहीँ जानता कि इस दुनिया को किसने बनाया...
पर अगर कोई सर्वशक्तिमान है... जिसकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीँ हिलता.... इस दुनिया मेँ घटने वाली हरेक छोटी से छोटी घटना भी उसकी मर्जी की मोहताज है...
दुनिया मेँ फैली
असमानता, अन्याय, शोषण, अत्याचार और हरेक चंद मिनटोँ के बाद होने वाला बलात्कार... अगर यही सबकुछ उसकी मर्जी है
तो यकीनन दुनिया बनाने वाला वो..
जो भी हो... पर कम से कम भगवान तो नहीँ हो सकता....।

* मैं ज्यादा तो नहीं कहता, लेकिन बहुजन [ मैं सोचता हूँ इन्हें इसी नाम से पुकारूँ | दलित कहना अपने को भी बुरा लगता है | ये स्वयं ऐसा कहें तो कहें ] यदि कुछ भी न पढ़ें, केवल अंग्रेजी में पारंगत हो जाएँ, तो वर्तमान बहुराष्ट्रीय में कहाँ से कहाँ पहुँच जायं |

* सार्वजनिक स्थलों पर प्रायः देखने में आता है कि वृद्ध पुरुषों के बाल तो झक सफ़ेद हैं, लेकिन उनकी वृद्ध पत्नियों के केश सम्पूर्ण श्याम रंगे हुए !
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[कविता ]

* देखो, मैंने नहीं लिखी
कोई कविता, तुम्हारे जाने के बाद
नहीं लिखा कोई विरह का गीत
तुमने मना किया था न
सो हमने माना |
लेकिन तुम्हारे जाने के पहले की
प्रेम कविताओं को तो बिना नागा
पढ़ता हूँ , गाता हूँ  
पुराने पन्नों को पलटता हूँ ;
इसके लिए तो तुमने
बरजा नहीं था न ?
रोका महीं  था
मना नहीं किया था
जाते समय !
तो इजाज़त है न
तुम्हारी  याद ह्रदय में
अक्षुण्ण रखने की ?
निश्चिन्त रहो,
सुरक्षित है |
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 [कविता ]

*उस औरत में /
जिसके लिए पुरुष /
अपनी जान छिड़कता है /
उसकी माँ - बहन भी
शामिल है /
और वह पुरुष /
जिसके लिए औरत /
तड़पती, छ्टपटाती  है /
उसका बाप और /
भाई भी हो सकता है | # #

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* छंद छछंद
नहीं कर पाया मैं
कविताओं में |

* सफलता से
हिम्मत बढ़ती है
सफलता की |

* दिल की बात
होती है, वंचितों से
प्रेम की बात !

* बादल भी तो
कहाँ बरसे, रोये
वे धार धार |

* बादल नहीं
बरसें तो बरसें
हमारी आँखें |
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* कुत्ता काट ले
या आप दिखाई दें
एक ही बात !
[कुत्ते ने काटा
या तुम्हे देख लिया
मैं पगलाया]

*निश्चय जानो
आदमी कमीना है
निज मूल में |

* मीठी लगती
बिहारी भोजपुरी
उनकी वाणी |

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