सोमवार, 14 मार्च 2016

+श्री श्री रविशंकर , पत्रकार अम्बरीश कुमार रामेन्द्र जेनवार और मै !



श्री श्री के दिल्ली में  हुए  कार्यक्रम के  सम्बन्ध में रोचक संवाद !

Courtesy Ambrish Kumar
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14 मार्च 2016
श्री श्री के कार्यक्रम में एक महिला और पुरुष के प्रेम के सार्वजनिक इजहार से वरिष्ठ पत्रकार ' नागरिक .जी को जो संजीवनी और प्रेरणा मिली उससे उनका हौंसला बुलंद है .उन्होंने लिखा है अभी कम से कम तीस साल और जीने की इच्छा है ,अभी कौन ज्यादा उम्र हुई सिर्फ सत्तर. उनके इस जज्बे को सलाम और श्री श्री का आभार .कौन न और जीना चाहेगा इस आर्ट आफ लिविंग से.यह होता है असर .भले हम कितना भी जलें.फोटो -जनवार की वाल से साभार.
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Devendra Yadav फिर...ओशो कौन से बुरे थे।
Ugra Nath Nagrik ओशो सन्यासी भी हूँ मित्र , - स्वामी नीरव आनंद !
संजीव तिवारी गौकिन, डोकरा बबा कहय 'गुरु बनावै जान के अउ पानी पियै छान के!' तमंचा के डिमाग फेल हो गए हे गौंटिया ...

Tahira Hasan Asaram bhi to ise rah par the

Ugra Nath Nagrik आसाराम की कथनी हमारे लिए नीरस थी । अपनी करनी उन्होंने केवल अपने लिए सरस रखी ।

Ambrish Kumar आशाराम छोटे बाबा है उनसे श्री श्री की तुलना ठीक नहीं वे जेल में है और श्री श्री सर्वोच्च अदालत को सीधी चुनौती देते है और पीएम से लेकर गृह मंत्री उनके आर्ट आफ लिविंग का हिस्सा बनते हैं.
Jail jane se pahle unke bhi bade bade chale the
Sushil Kaul Ambrish इसको Art of Living कहते है

Harishankar Shahi सर नागरिक जी वरिष्ठ पत्रकार हैं,,, इस तथ्य से अंजान था, चूंकि कोई परिचय नहीं है, लेकिन उनके बहुत से परिचितों से सुना है की वो सरकारी कर्मी थे.... खैर यह टिप्पणी विषय से इतर है....
इतर सही, जानकारी सही है । नौकरी में था भी, नहीं भी था । पत्रकारिता में हूँ भी, नही भी हूँ ।
Ambrish Kumar जब हम पत्रकारिता में नहीं आये थे तब वे प्रिय संपादक अख़बार निकालते थे और संपादक थे.

Nagendra Pratap नागरिक जी वरिष्ठ ही नहीं क्रॉनिक पत्रकार हैं। हम सबसे पहले के। वैसे वे "उग्र" भी हैं सो इतनी शालीनता से सिर्फ 30 साल और के लिए तैयार हो जायेंगे इस पर मुझे संदेह है। Ambrish Kumar जी फिर से तस्दीक कर लें। 

Ugra Nath Nagrik आकांक्षा सार्वजनिक कर दी गयी है, वह भी भरोसेमन्द पत्रकार द्वारा, तो जीने का प्रबन्ध हुआ समझो । प्रियतमा " प्रिय संपादक" पुनः मेरी मेज पर आ बैठी, यह क्या कम है ? smile emoticon

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    पूर्व पीठिका = 
    Ramendra Jenwar का फोटो पोस्ट | Art of Living पर मेरी टिप्पणी :
    Ugra Nath Nagrik मैं भी जियूँगा । मृत्यु को पास फटकने न दूँगा । अभी 70 ही तो है ! तो 30 तो कम से कम !

    Ramendra Jenwar खाली जीने से क्या होगा नागरिक जी...फ़ोटो वाली आर्ट आफ लिविँग के साथ जिएँ तब तो असली जीना होगा...
    Ugra Nath Nagrik तभी तो smile emoticon जीने की कला की शर्त ही वही है
    १५ मार्च २०१६ Cpd from fb .

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

PS जनवरी , फरवरी 2016 TIMELINE

PS जनवरी , फरवरी 2016
साथ रहना 
साथ साथ रहना 
ही ज़िन्दगी है !

गिर न जाऊँ
अपनी नज़र में कहीं
तो नैतिकता |

करो या मरो 
मरना तो तय है 
तो कुछ करो !

प्रेम का घूँट
माँगता है कलेजा 
गर्म ठंडाई !

दिल को जीतो !
अच्छा था जो कहते -
पत्थर तोड़ो !

रोज़ाना पूजा 
रोज़ाना राजनीति 
रोज़ाना झूठ !

ज़िन्दगी ने की 
मेहनत बहुत 
तब मैं बना !

सारी शक्तियाँ 
जनता में निहित 
मैं भी जनता !

सूरज उगा 
सवेरा गरमाया 
चिड़िया उड़ी ।

परिवर्त्तन 
कोई मत कीजिए 
होने दीजिये ।

सच का जो भी काम करेगा , 
सच भी उसका नाम करेगा !

आदमी, निरपेक्ष बन, हो सके तो ;
सत्य के सापेक्ष बन, हो सके तो !

आँख मेरी अगर नम है ,
ज़िन्दगी में बहुत दम है ।

नहीं बदले तो मत बदले ज़माना , 
यह आदमजात बदले, कम नहीं है ।

यदि कोई क़ौम पैदाइश के आधार पर अपने आपको सर्वश्रेष्ठ होने का दम्भ घोषित करती है, तो मुझे यह पूरा हक़ है कि मैं उसे अत्यन्त मूर्ख, नीच ; और नहीं तो एकदम धूर्त्त होने का ऐलान कर दूँ !

हम सम्पूर्ण रेशनल शायद कभी नहीं हो सकते । यह स्वीकारोक्ति मैं पूरी सत्यनिष्ठा और Rationality के आधार पर कर रहा हूँ । एक rationalist मित्र नाराज़गी से कहते हैं हिन्दू संस्कृति की इस प्रकार आलोचना गलत है । लेकिन हम करते हैं । या कहें, हमसे हो जाती है । इसमें पैदा हुए, पले बढ़े, इसे भुगता । तो इसका विरोध हमसे अतिशय मात्रा में, अतर्क- कुतर्क की सीमा तक हो जाता है । स्वाभाविक है । और हम देख रहे होते हैं कि बात कुछ हद से ज़्यादा हो रही है । यह हमारी Rationality है, हमने तर्क का दमन छोड़ा नहीं है । लेकिन यह दुनियावी ज़िन्दगी है न ! कई अपराध जान बूझ कर करने पड़ जाते हैं , जीने की राह में ।
हम भी कोई Icon बना लेते हैं । गाँधी बुद्ध अम्बेडकर की अपनी रूचि के साथ । और उनकी मूर्तियों और विचारों के साथ उन्हीं पाखण्डों में जुट जाते हैं, जिनका विरोध उन्होंने सिखाया । जब कि न हम अंधविश्वासी हैं, न मूर्तिपूजक । लेकिन हम सामाजिक राजनीतिक युद्धों-संघर्षों में पाखण्ड रचने को विवश होते हैं । इसे क्षणिक और नितांत समसामयिक माना जाय । शीघ्र ही हम बुद्ध कबीर रैदास अम्बेडकर को भी दूर फेंक देंगे । ऐसी मानसिक तैयारी है हमारे पास !


नरेंद्र मोदी ने सेक्युलरों और मण्डल वादियों का एक काम तो किया ! कमण्डल जी को तो किनारे कर ही दिया !

हम राष्ट्रवादियों से अच्छे भले मनुष्य तो वे दरवेश जन और घुमक्कड़ बंजारा जन-जातियाँ हैं, जो धरती का कोई टुकड़ा कब्ज़ा नहीं करते । रोज़ कोई ज़मीन साफ़ सुथरा करके रहते हैं । फिर छोड़कर चले जाते है ।

 मैं नागरिक समाज के समक्ष यह प्रस्ताव रखता हूँ कि इस GIFT देने की प्रथा को बन्द कर दिया जाय ! बड़ी दिक्कतें हो रही हैं इससे ।
इस प्रकार हमारे इस रंग के दो संकल्प बनते हैं :- न घूस लेंगे , न गिफ्ट देंगे !


आतंकवाद स्वयं जाय तो जाय, कोई दूसरा इसका खात्मा नहीं कर सकता । चाहे अमेरिका हो या अमेरिका का बाप । कारण यह है कि आतंक में मनुष्य के हाथ में बन्दूक नहीं होती, बन्दूक के वश में मनुष्य होता है ।

मेरा तो भाई, कहें तो पूरा जीवन बर्बाद गया । मेरे काम की सारी भैंसें पानी में गयीं प्रतीत होती हैं । मैंने ज़िन्दगी भर नागरिकता पर काम किया । पढ़ते समय श्री प्रकाश जी के तदविषयक लेख से ग्रस्त हुआ । तदन्तर नागरिक उपनाम लगाया और नागरिक समाज निर्माण के काम में लगा , जिसकी परिणति नागरिक धर्म तक गयी । दिनमान पत्रिका से प्रभावित होकर अभिव्यक्ति की आज़ादी की दिशा में सारा समय लगा दिया । प्रिय संपादक अखबार सन् 84 से चलाया । सब व्यर्थ गया ! जेठ पूत पढ़ाकर 16 दुनी 8 हो गया । यही दिन देखना था ? क्या सोचा था अच्छी नागरिकता का मतलब ऐसा ही बुद्धिहीन, जड़ देशभक्ति हो जायगा ? मानना पड़ेगा मेरे ही प्रयासों में कोई कमी रह गयी ।

आधुनिक काल में आध्यात्मिकता की खोज और उसकी संप्राप्ति वैज्ञानिक सोच और नास्तिकता द्वारा ही की जा सकती है ।

ईश्वर को नकारना आसान है, धर्म से निकलना सरल है, चलो किसी दिन शायद जाति भी छूट ही जाय ! लेकिन राष्ट्रवाद वह गुड़ की लसेटी, देसी कम्पनी की चॉकलेट है, जिससे मुक्त हो पाना नाकों चने चबाना है । पता ही नहीं चलता कि यह मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकर है !

ब्रेड मत छोड़ो, बटर छोड़ दो ! यही साम्यवाद है । मार्क्स से मत पूछो ।

अब सामाजिक व्यवस्था यह तो होनी ही चाहिए कि बेटी का बाप होना अभिशाप तो न हो !

शासन में आते ही शासक को "सबका" हो जाना चाहिए, किसी एक पार्टी, जाति धर्म समुदाय का नहीं !

मुझे तो शक़ है आदमी के आकार में सारे लोग आदमी हैं !

लेकिन 
जब मैं उसे जानता नहीं 
तब कैसे कह सकता हूँ 
उसका नाम ईश्वर है ?


अगर केवल एक सूत्र मान लिया जाय तो तमाम समस्याएँ हल हो जायँ । लेकिन वह भी तर्क से हासिल नहीं होगा । उसके लिए जिद करनी पड़ेगी ।
कि हम किसी से घृणा नहीं करेंगे । करेंगे ही नहीं नफरत हम किसी से ।
उसने गोमांस खाया है, वह जाने । वह मुझे मन्दिर जाने नहीं दे रहा हा, कोई बात नहीं । उसने हमारे पूज्य ईश्वर पैगम्बर को गाली दी, वह भुगतेगा । हम क्या करें ? हम घृणा तो करेंगे ही नहीं किसी से !


Sanjay Bhalotia


जो सहनशील नहीं है वे चाहे धार्मिक हो या नास्तिक खतरनाक होते है ।
मेरा ख्याल है कि कमलेश तिवारी के वचनों ने इस्लाम का कितना नुकसान किया, यह तो वही जानें ; लेकिन कमलेश की गिरफ्तारी मुसलमानों का बड़ा नुकसान कर रही है |
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मुझे देखो
मेरी ओर देखो
सर उठाकर
मेरी आँखों में देखो -
क्या मैंने तुम्हारा नाम पूछा ?
क्या मैंने तुम्हारी जाति,
धर्म, और तुम क्या करते हो
तुम्हारा पेशा पूछा ?
तुम कहाँ से आये हो,
तुम्हारी राष्ट्रीयता का सबूत माँगा ?
किसी ईश्वर-भगवान को मानते हो
ऐसा कुछ ? नहीं न !
मैंने तुम्हे छुआ भी तो नहीं,
मैंने जाना क्या कि तुम स्त्री हो या पुरुष ?
बिल्कुल नहीं |
फिर तुम मुझे क्यों बताते हो तुम कौन हो ?
मुझसे क्यों पूछते हो मैं कौन हूँ ?
क्या तुम जानते नहीं ?
मेरे पास बैठो
मेरी तरफ देखो |
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मैं मरूँगा नहीं
मैं अपनी माँ के पास जाऊँगा
'मृत्यु माँ ' के पास,
धीरे से उसकी उँगली पकड़ लूँगा
वह चौंक कर मुझे देखेगी
और अपनी छाती से चिपका लेगी।
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मैं बुद्धिजीविता मेभी सबसे पीछे रहने की कोशिश करता हूँ । क्योंकि यदि कभी बुद्धिजीवियों की सफाये कीबात आई, जैसा कि इतिहास में बहुतसी जगहों पर होचुका है , तो मैं सबस बाद में मारा जाऊँ ।
चुपचाप रहिये, चुपचाप सहिये !
आतंकवाद पर न कुछ बोलिये न कोई विरोध कीजिये । आपके ऐसा करने से कुछ होगा भी नहीं । बड़ी बड़ी सरकारें नाकाम हो रही हैं तो हम आप किस खेत के मूली हैं ? लेकिन जो मैं कह रहा हूँ वह करने से आतंकवाद nullyfy हो जायगा । जब आतंक से कोई पत्ता नहीं हिलेगा, इस्लाम को कोई नाम न मिलेगा तो कोई आतंकवादी IS में शामिल न होगा । आखिर उन्हें भी एक adventure, एक वाहवाही खबर की सुर्खियाँ चाहिए होती है हर युवा की तरह ! जब वही नहीं, कोई हलचल नहीं, कोई तमाशा नहीं तो क्या फायदा अपनी जान देने से ?
और फिर वह जैसा भी निर्णय करें वह जानें, हमारी समझ से तो इसे ignore करना ही बेहतर ।

धर्मविहीन कोई आतंकवाद नहीं होता । हिन्दू मुस्लिम नक्सल में भेद व्यर्थ है । आतंकवादी का अवश्य एक उभयनिष्ठ, common धर्म, दृढ़ संकल्प होता है - किसी बात - व्यक्ति - विचार पर अटूट आस्था !

ईश्वर को मानोगे और मुसलमान से घृणा, आतंकवादियों को गाली दोगे ! यह तो छद्म है मित्र, जो ज्यादा दिन नहीं चलेगा । आपकी यही सोच आज की परेशानी का सबब है । आप मुसलमान से ज्यादा आस्तिक हो क्या जो उसकी आलोचना अपनी आस्तिकता को बचाकर करते हो ? तो या तो नास्तिक बनो , और यदि आस्तिक बनते हो तो आप कहीं न कहीं मुसलमान ही हो । भ्रम में न रहो, न हम दुनियावालों को धोखे में रखने की चेष्टा करो । या तो आप ईमान वाले मुसल्लम ईमान हैं अथवा फिर ईमान न रखने वाले नास्तिकजन । बीच की सारी बातें लफ़्फ़ाज़ियाँ हैं । सबके मूल में जाओ और सोचो ! तुम्हारा और उनका मूल एकमात्र ईश्वर है ।

ध्यान में रखने की बात है । निकट भविष्य में यह होने वाला है कि यदि आप किसी से दबे नहीं, झुके नहीं, प्रताड़ना नहीं सही, उससे नीचा होना स्वीकार नहीं किया तो आपका यह व्यवहार आप द्वारा उस व्यक्ति पर अन्याय और अत्याचार मान लिया जायगा । और इस अपराध के लिए आप पर क़ानूनी कार्यवाही भी असंभव नहीं ।

यह भला अच्छे भले नेताओं के चरित्र क्यों बदल जाते हैं ?
आप नहीं जानते ! जैसे जाड़े में टोपियाँ लगाने से बाल बिगड़ जाते हैं । 


PS जनवरी फरवरी NASTIK

PS जनवरी फरवरी NASTIK

एक तरह से देखें तो हम नास्तिक लोग अमर ही हैं । जब हमें ऊपर जाना ही नहीं है, न स्वर्ग-नर्क में वास करना है , तो हमारे मरने का क्या मतलब ?

वह कहते हैं, ज़रा दूसरे धर्म की भी बात करो ! मैं कहता हूँ अपने धर्म को भी देख लिया करो !

ईश्वर के विरुद्ध न बोलूँ ?
क्या आप चाहते हैं मैं मनुष्य के खिलाफ़ खड़ा हो जाऊँ ?

ईश्वर एक शब्द है । लगभग सारी भाषाओँ में उपस्थित एक भाव वाचक संज्ञा । ऐसी किसी भाषा की हमें सूचना नहीं है जिसमें यह शब्द न हो । ज़रूर हम नास्तिकों की भाषा में यह नहीं है, तो हम दूसरी भाषाओँ से काम चलाते हैं उन भाषा भाषियों से संवाद के निमित्त ! हर भाषा में इसका पर्यायवाची उपलब्ध है । अलबत्ता जैसा अन्य तमाम शब्दों के साथ ऐसा होता है, एक भाषा का दूसरी भाषा में ईश्वर का पर्यायवाची बिल्कुल वही अर्थ नहीं बताता जो अर्थ उसकी मूल भाषा में होता है । और हास्यास्पद विडम्बना यह कि हर भाषा इस शब्द को अपनी भाषा में मौलिक बताती है और अन्य भाषाओँ में इसके पर्यायवाची को गलत !

यदि आप आतंकवाद से नफरत करते हैं, और इस बात के लिए नाराज़गी मुसलमानों के ऊपर ही हो तो भी ज़रा उस अल्लाह के बारे में सोचिये जिसने उन्हें बनाया | आखिर दोष की कुछ ज़िम्मेदारी तो निर्माता की बनेगी न ? और तब, फिर पलटकर तनिक अपने ईश्वर के बारे में तो सोचेंगे ही जिसने आपको बनाया ! दोनों एक हैं क्या ? है, तो फिरआपका ईश्वर भी दोषी है और आप भी | ईश्वर, और उसपर अंधविश्वास पर प्रश्न उठाये बिना न मुसलमान की आलोचना की जा सकती है, न आतंकवाद की |

ऊपर वाले 
ऊपर ही रहना 
नीचे हम हैं

ब्राह्मण दलित को आदमी नहीं समझता, हिन्दू ईसाई-मुसलमान को मनुष्य नहीं मानता, मुसलमान यहूदी को आदमी नहीं समझता, ईसाई मुसलमान को आदमी नहीं समझता, मुसलमान काफिर को आदमी नहीं समझता - & - & -
मैं इनके ही आदमी होने पर संदेह व्यक्त करता हूँ |

हो सकता है गलत हो , लेकिन कुछ काम प्रतिक्रियास्वरूप विरोध में करना सही तो लगता है ! बल्कि वही एकमात्र उपाय प्रतीत होता है । जैसे मैं दाढ़ी- बाल सोमवार,बृहस्पति या शनिवार को ही बनवाता हूँ ।

ईश्वर को कोई नहीं मानता तो मैं भी नहीं मानता ! जाँचकर देखिये कौन मानता है ईश्वर को ? सब मनमानी करते हैं, उसके मन की कोई नहीं सुनता |

PS जनवरी फरवरी DINMAAN

PS जनवरी फरवरी DINMAAN

पत्रकारिता को सत्ता से घुलमिलाना नहीं चाहिए !

मुझे पता नहीं था । केवल नाम भर सुना था । इधर जानकर आश्चर्य हुआ जानकर कि JNU जैसा भी विश्वविद्यालय हमारे देश में था । अब तो खैर, नहीं रहने पायेगा !

मुझे यह बात मानने में पर्याप्त आपत्ति है कि भारत की कोई नस्ल स्वभावशः बिगड़ैल और आतंकी हो । चाहे वह जाट हों, पटेल, गुर्जर, नक्सली, या अन्य, या मुस्लिम ! 
मुझे पूरा संदेह है, कहीं राजनीति ही इन्हें ऐसा तो नहीं बना रही ?


कैसा समाज बनाना चाहते हो भाई ?
जिसमें मनुष्य या तो आत्महत्या करे, या फिर जेल जाए !
कैसा समाज बनाना चाहता है यह राष्ट्र ?


हम क्यों किसी देश पर गर्व करें ? कोई देश मुझ पर करे तो करे !

जो सियासत घोलती है,
उस ज़हर में क्यों घुलें हम ?


मच्छरदानी
हैं देश की सीमाएँ 
बाड़ नहीं है !


हम क़ायल
तुम्हारी आज़ादी के 
तुम हमारी ।


अतिव्याप्त है 
राजनीतिक रोग 
नाम की चाह !


आस्तिक ही था 
मन को नहीं भाया
स्वार्थ- पाखण्ड !


दिमागों में भरा
ज़हर तो निकले
तो बात करें !


नाम के लिए काम करोगे,
नाम न होगा काम न होगा !


मुझे इस बात का बाकायदा शक था ,
मैंने खाया, किसी और का हक था |


सच का जो काम करेगा,
सच उसका काम करेगा !


मुझे सबसे अकुशल काम लगता है व्यवहार कुशलता।!

यदि किसी देश में द्रोही ज्यादा पैदा हो रहे हों, तो माता को अपनी कोख, घर-आँगन भी देख लेना चाहिए !

प्रेम करना मुझे गुलामी जैसी बात लगती है । वाहियात लोगों की वाहवाही करना !

ब्राह्मण दलित को आदमी नहीं समझता, हिन्दू ईसाई-मुसलमान को मनुष्य नहीं मानता, मुसलमान यहूदी को आदमी नहीं समझता, ईसाई मुसलमान को आदमी नहीं समझता, मुसलमान काफिर को आदमी नहीं समझता - & - & -
मैं इनके ही आदमी होने पर संदेह व्यक्त करता हूँ |


देश की हड्डी जितनी चूसनी हो उतनी जोर से बोलो जय भारत माता की !
और यदि किसी की पिटाई करनी हो तो जोर का शोर मचा दो , यह नारे लगा रहा था पाकिस्तान जिंदाबाद की !

रविवार, 27 सितंबर 2015

इस्लामी manrega


इस्लामी प्रोटीन गारण्टी योजना :-

बकरीद पर बातें तो बहुत हुईं, लेकिन जितनी ऊँचाई पर इसे बुद्धि से सोचा जाना था और जितनी गहराई में इस पर हृदय से विचार किया जाना चाहिए , वह न हो सका । और अधिकाँश वार्ता सतही तर्क और हिंसा अहिंसा की भावना आधारित बात हिन्दू मुसलमान होकर रह गयी ।
कहाँ से बात शुरू की जाय ? पहला सवाल यह उठता है कि इतने बकरे कटे वह सब, मतलब उनका मांस गया कहाँ ? कुछ भी गंगा, गोमती, घाघरा में तो विसर्जित करके उसे प्रदूषित तो नहीं किया गया । तो मतलब, सारा पदार्थ मनुष्य का भोजन बना, उसके उदर में गया और वह प्रोटीन प्रदान कर उसके संपोषण में काम आया । उनका चमड़ा और बाल सबका उपयोग ही हुआ | तो आगे :-
ठीक है, यदि आप शाकाहारी हैं तो कोई आप का आदर है, और आप इसे कितना भी धिक्कारें, हमें स्वीकार है | लेकिन यदि आप माँसाहारी हैं तो बकरीद के दिन भी इसे खाने में, ईदुज्जुहा मनाने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए ।
लेकिन, ऐतराज़ क्या हैं ? प्रथम तो जीव हत्या को एक उत्सव मनाना । प्रथमदृष्ट्या बात तो सही है, और आगामी मुस्लिम पीढ़ी निश्चय ही इसका विकल्प लाएगी | क्योंकि जिस तरह दुनिया में शाकाहार ही ओर झुकाव हो रहा है, और इसकी मान्यता बढ़ रही है, तो इस्लाम भी उससे अछूता न रहेगा | और जब मांसाहार ही न होगा तो कहे की जीवहत्या ? लेकिन अभी तो वस्तुतः यदि समग्रता में देखें तो बकरीदी हिंसा का विरोध एक सरलीकरण भर है | और इसके लिए हम सब माँसाहारी दोषी हैं | फिर इसके लिए मुसलमानों का जलीलीकरण तो बिल्कुल ही गलत ।
अब इसका दूसरा पहलु देखें | अर्थशास्त्री गुणा भाग करके बता सकते हैं कि भारत के मांसाहारियों के प्रति यूनिट प्रोटीन की मात्रा और उसके लिए आवश्यक मांस की ज़रूरत से बहुत कम ही ठहरेगा वह मांस जो बकरीद के दिन उपलब्ध हुआ । और बकरीद के दिन जितने बकरे कटे उनकी संख्या साल के बाकी दिनों में ज़िब्ह किये जानवरों की कुल संख्या से बहुत कम ही होगी ।
तो फिर परेशानी क्या है ? मैंने पहले ही अर्ज़ किया कि यह बात तब के लिए है जब मांसाहार का सेवन चल रहा है और यह किसी जाति संप्रदाय तक सीमित नहीं । मांसाहार के ही विरोध में आप हों तो आपका स्वागत है । वरना यह तो सम्भव नहीं कि बकरा भी न कटे और आपको मटन बिरयानी मिल जाए ? अब आप यदि इसे उत्सव बनाने के विरोध में हैं, तो भी हम आपके साथ हैं । लेकिन तब इस इस्लामी धार्मिक उत्सव के साथ अन्य धार्मिक उत्सवों पर भी प्रश्न उठाना होगा । आप selective नहीं हो सकते, और आप यह भी नहीं कह सकते कि शेष सारे त्योहार तो बड़े शुभ शुभ और आलोचना से परे हैं । मैं यह भी कहकर अपना हाथ नहीं फंसाने वाला कि होली के दिन गुझिया ही क्यों बनती है, और इसी दिन मांस की दुकानों पर अहिंसक सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की भीड़ बढ़ क्यों जाती है ? आखिर, वे बकरे भी बकरे होते हैं, और कुर्रेशी साहब उन्हें भी कलमा पढ़कर उसी विधि-प्रकार से ज़िबह हलाल करते हैं, जैसे बकरीद में | झटका का मांस मुसलमान न खाता है, न बेचता है | आपत्ति ज्यादा जोरदार हो, तो कुछ कष्ट कीजिये, थोड़ा खुद ज़हमत उठाइए | झटका काटिए, झटका मांस की दुकानों से सामान खरीदिये, तो हलाल का व्यवसाय-व्यापार का सूचकांक वैसे ही गिर जायगा |
अब आगे यदि आप कहें कि लोग हिन्दू मुसलमान हैं ही क्यों, तब तो आपका हार्दिक अभिनंदन है | और कहीं आप यह कह दें कि चूँकि सारे ही धर्म किसी न किसी ईश्वर आधारित हैं इसलिए ईश्वर को ही ख़ारिज किया जाना चाहिए , तब तो हम आपके चरण चूमने वाले हैं । लेकिन कहिये तो जनाब !- श्रीमान !
लेकिन तब तक आप इसे यूँ क्यूँ न समझें कि मानो यह सरकारी "मनरेगा" सरीखा कोई असरकारी प्रोटीन गारन्टी योजना-उत्सव हो ! जिसमे लगभग प्रत्येक मांसाहारी को थोड़ा मांस मिलना सुनिश्चित हो जाता है | बलिदानी बकरे का मांस बाँटने की एक ख़ास व्यवस्था इस्लाम में है | सब कोई एक परिवार ही हजम नहीं कर सकता | अतार्किक सांप्रदायिक आलोचना उचित नहीं है |आप देखें तो इस दिवस तमाम गरीब मुसलमानों, वंचितों, भिक्षुकों को जो इसे afford नहीं कर सकते उन्हें भी मांस का स्वाद चखने को मिल जाता है | और गोबध विरोधी मांसाहारी चुटियाधारी पंडित जी भी इस दिन अपने मुस्लिम मित्रों के घर इसे छककर खा पाते हैं, जिनके घरों में इसका सेवन प्रतिबंधित होता है !
तो चिंता होली दीवाली ईद बकरीद की मत कीजिये | ये तो आ आकर चले जाने के लिए होते हैं | करना हो तो कीजिये मांस के खपत के उस परिमाण पर जो रोजाना घर-घरों में और प्रेस क्लब के बगल में दस्तारख्वानों पर होता है |

सोमवार, 17 अगस्त 2015

Hindi Atheist - 8 , August,15 / 2015 Issue


Hindi Atheist - 8 , August,15 / 2015 Issue
Email weekly magazine : by - Ugra Nath @ Lucknow, U.P. (India)
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Title - संबंधों का विकास ही सभ्यता है !
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1  - अद्भुत साहचर्य है दोनो धर्मों के बीच यहाँ !
यहाँ का हिंदुत्व मुसलमानों को इस्लाम में कोई परिवर्तन नहीं होने देगा ।
यहाँ का इस्लाम हिंदुओं में कोई सुधार नहीं होने देगा ।
कुछ भी कहिये तो
मुसलमान कहेगा हिंदुओं को संभालिये ,
कोई तरक्की की बात कहो तो
हिन्दू कहेगा हमको कहते हो
ज़रा उनसे भी कहकर देखो !

2 - माना जाना चाहिए कि मैं एक अजीब आदमी हूँ | अजीब का मतलब अजीब ही , अद्भुत और अनोखा नहीं |
मेरा अजीबपन आज इससे प्रकट होता है कि कहाँ तो मुझे उलझनों को सुलझाना चाहिए , और कहाँ मै सुलझी हुई बातों को उलझाता फिरता हूँ |
यथा , बिल्कुल सुलझी हुई बात है कि जानने को ज्ञान कहते हैं , न जानने को अज्ञान ! लेकिन नहीं , मैं कहना चाहता हूँ - न जानना ज्यादा बड़ा ज्ञान है , और जानना सबसे बड़ा अज्ञान |
उदहारण , ईश्वर को जानना ज्ञान होना चाहिए | Stop please ! यह सबसे बड़ा अज्ञानता का लक्षण है | जो जितना ही कहता है कि वह ईश्वर को जितना ज्यादा जानता है , वह उतना ही बड़ा अहंकारी और अज्ञानी है | मिथ्यावादी , असत्यवादी |
दूसरी तरफ वह कथित अज्ञानी है जो ईश्वर को नही जानता , और जाने बगैर उसे मानने से इन्कार करता है , मतलब नास्तिक है , वह बहुत बड़ा ज्ञानी है |
अतएव ,
नास्तिकता ज्ञान का स्वरुप है , आस्तिकता घोर अज्ञान है !
है न अजीब बात ? और अजीब बात हम करते हैं !

3 - एक युवा मित्र ने मित्रता निवेदन के साथ inbox में जो लिखा वह इतना स्वच्छ , स्पष्ट और ईमानदार था कि उसने मुझे अभिभूत कर दिया | सहर्ष , सप्रेम उन्हें मित्र बनाया | किसी ने ऐसा बोलने का साहस तो किया !
नाम बताने में कोई हर्ज़ नहीं है , न इसमें उनका अपमान | मुस्लिम नामधारी हैं - जनाब शफीक उर रहमान खां | वह लिखते हैं :-
" वैसे धार्मिक तौर तौर पर घोर नास्तिक हूँ मगर खान पान और रहन सहन में थोड़ा कल्चरल बायस आ ही जाता है | बाक़ी राजनीतिक तौर पर मुसलमान होना सच में मज़बूरी है | "
कितनी सच्ची बात की भाई ने, दिल खोलकर !
यह मज़बूरी हमारी और शायद सबकी है , भले वह सम्पूर्ण नास्तिक हैं | हम विवश हैं / हो जाते हैं / हो रहे हैं हिन्दू मुसलमान होने के लिए | यह विवशता तोड़ें , इस पर तो बाद में चर्चा करेंगे | अविलम्ब हमें यह मानना चाहिए कि हम बहुत बड़ी गलती पर हैं जो मुसलमान को मुसलमान और हिन्दू को हिन्दू मान लेते हैं ( मात्र नाम देखकर ही , यह बात अभी अलग रखें तो भी ! वह भी एक विवशता है उसकी ) |
और एक बार यह संदेह मन में बैठ जाय कि हिन्दू मुस्लिम नामधारी व्यक्ति बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि हिन्दू मुसलमान हो ही , तो हमारा आधा काम पूरा हो जाय | समझें कि हिन्दू मुसलमान होना एक राजनीतिक मजबूरी भी है व्यक्ति की , वह वहाँ स्वेच्छा से नहीं है , और वह वहां खुश नहीं है |
बाकी रही बात राजनीतिक तौर पर हिन्दू मुसलमान होने की मज़बूरी मिटाने की
, तो वह भी हो जायगा जब ऐसे ऐसे सत्यनिष्ठ जन खुले दिल से , परस्पर प्यार और विश्वास का भाव लेकर एक साथ बैठेंगे | और इसका उपाय तो है , यह हम अच्छी तरह जानते हैं | याद है न वह आप्त वचन - यदि हम जान जायँ कि हम गुलाम हैं , तो हमारी गुलामी आधी समाप्त हो जाती है ?

4 - Islam is the way .
इस पोस्ट पर भाई कुछ भड़केंगे , यदि मैं कहूँ कि सारे रास्ते इस्लाम से होकर गुज़रते हैं | लेकिन यह एक निष्पक्ष विवेचन है |
जब भी आप कोई काम करेंगे , आपको इस्लाम का रास्ता अपनाना पड़ेगा | एक संगठन बनाइये , तो सबक लीजये इससे | वही सख्ती , वही निष्ठां , वही दृढ़ता दरकार होगी | इस्लाम की सांगठनिक गुणवत्ता और प्रबंधन से सभी परिचित है | पाँच वक़्त नमाज़ , जुम्मे की नमाज , ईद बकरीद और दिवंगतों के लिए त्यौहार , बुजुर्गों के प्रति उनकी भावना और व्यवहार , हिफाजत की व्यवस्था कि कुरआन कि सारी प्रतियां नष्ट हो जायँ और एक भी हाफ़िज़ जिंदा बचे तो हुबहू कुरान लिख ली जाय | इत्यादि -- सब अनुकरणीय ही नहीं श्लाघ्य है इनकी व्यवस्था | क्या समझते हैं सब ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए है ? जी नहीं , सब इस ज़िंदगी के लिए है , बिल्कुल practical , और दूरदर्शी , जिसका परिणाम हम देख रहे हैं |
यहाँ तक कि जिनकी कठोर आलोचना की जाती है , उन कथित इस्लामी अवगुणों को वही लोग अपनाते भी है | कुछ अपनी ओर से समीक्षा कीजिये | जिस हिंसकता , आक्रामकता , जड़ता का हम विरोध करते हैं , अपनी परी आने पर हम उन्ही को अपनाने की वकालत भी करते है | किसी भी हिन्दू मानस और संगठन को देख लीजिये | क्या वह वस्तुतः Hinduist है ? क्या वह इस्लामियत से वंचित है ? कह दें तो कटु हो जायगा , हिन्दू कि रक्षा के लिए बना ( अब तो एक अलग धर्म ) को वही तलवार उठाना पड़ा , जिसके लिए उनका आरोप था कि तलवार के बल पर इस्लाम फैला |
हम कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं | वह तो करना ही पड़ेगा | लेकिन कहना यह है कि फर्क कहाँ रहा ? क्या हम परोक्ष islamist नहीं हुए ? इसे स्वीकार करने में क्या हर्ज़ ? भय बिन प्रीत को चाहे हिन्दू नीति कहिये चाहे मुसलमान | जब भी आप कुछ निष्ठापूर्वक कुछ करने पर उतारू होंगे , आपको उसी रास्ते पर जाना होगा जिसे आप कहते हैं यह इस्लाम का दूषित और गलत रास्ता है | यूँ केवल हवाई बात करके आत्मसंतोष प्राप्त करना हो तो अवश्य गर्व से कहो हम हिन्दू हैं | निश्चयतः , हिन्दू जीवन का एक मार्ग है / होगा, लेकिन वह बचेगा कैसे ?

5 - जो भी जन इस मानसिकता से ग्रस्त होंगे कि हिन्दू मेरा धर्म है, इस्लाम उनका धर्म है ( or vice versa ) वह मेरी बात समझ , पचा नहीं पायेंगे | बहतर होगा वह चुपचाप उसे पढ़ लें | अनावश्यक टिप्पणी करके उसे बरबाद न करें |

6 - समरथ को नहिं दोष गुसाईँ
यह तो समझ में आती है जनता कि मजबूरी कि वह शक्तिशाली , बाहुबली , धनबली के समक्ष झुकता है | लेकिन ईश्वर के आगे क्या नाक रगड़ना जो अशक्त है , शक्तिहीन है ? उसका कोई वश चलता तो नहीं दीखता !

7 - मान लीजिये कोई पुलिस वाला या प्रशासक या न्याधिकारी राधे माँ का भक्त हुआ , तो वह उनके खिलाफ जांच क्या करेगा ? सज़ा क्या दिलाएगा ?

8 - मैं कभी कभी ब्राह्मणवाद को श्रेष्ठता का मार्ग , भले थोड़ा अहंकार मिश्रित , समझता हूँ | और उसमें कोई बुराई न मान सबसे कहता हूँ कि ब्राह्मण बनो | लेकिन , लगता है ऐसा है नहीं | यह केवल श्रेष्ठता के दंभ से ग्रस्त / पीड़ित होने की भावना नहीं है | इसका मूल है , मनुष्यों के बीच विभाजन , श्रेणीबद्धता | और वह भी जन्मजात अर्जित | भले कहते हैं कि कोई भी अपने कर्मों से ब्राह्मण या शुद्र बन सकता है , लेकिन इसके उदहारण तो सामने आये नहीं | तो ऊँच नीच का तफरका , भेदभाव और इसकी शास्त्रीय मान्यता , स्वीकार्यता इसकी असली परिभाषा है |
अब यह बात तो खैर गलत है ही !

9 - बात में दम है कि धर्म निजी मामला है |
secularism की परिभाषा का मूल प्रस्थान बिंदु है | किसी भी seminar में पहले इसका अर्थ " इह्लौकिकता, this worldly " के बाद यही कहा जाता है कि Religion is a personal matter .
इसकी व्याख्या अधिक न कर मुझे जो एक आसान उदहारण इसके समर्थन में मिला , उसे बताना चाहता हूँ |
मान लीजिये आप या मैं ईसाई हैं , या ईसाईयत से प्रभावित हैं | तो अपनी इस धार्मिक भावना और आस्था को दिल में छिपाकर ही रखना श्रेयस्कर होगा | क्योंकि यदि लोग जान जायेंगे कि आप ईसाई हैं तो वह इसका नाजायज़ फायदा उठाएंगे | आपको तंग करेंगे , क्योंकि उन्हें पता होगा कि आपतो उन्हें क्षमा ही करेंगे |
याद कीजिये ईसाई स्टेन्स को जीप में जलने वाली घटना | और उसके बाद उनकी ईसाई पत्नी ने जो कहा _ " हे ईश्वर इन्हें क्षमा करना , क्योंकि इन्हें नहीं पता ये क्या कर रहे हैं | "

10 - अभी हमारी एक महिला मित्र की बेटियों को आशीर्वाद देने के लिए एक कमेन्ट आया जनाब Mazhar Mudassir जी का :- " बेशक।अल्लाह सलामत रखें | "
है कोई इसके टक्कर की शुभकामना हम नास्तिकों के पास ?
होनी चाहिए | ईश्वर - अल्लाह की इतनी / इसलिए तो उपस्थिति होनी चाहिए !
आखिर ये मनुष्य के आविष्कार हैं |

11  - तो क्या निकट भविष्य में हिन्दू और मुसलमान की परिभाषा यह होने जा रही है , कि जो अल्लाह का नाम लेकर शुभकामना ( नमाज़ नहीं ) करे वह मुसलमान , और जो ईश्वर का नाम बोलकर आशीर्वाद ( पूजा नहीं ) दे वह हिन्दू ?
( मात्र यही अंतर रह जायगा सभ्य शिक्षित हिन्दू मुसलमान में ? )

12 - ( feeling depressed )   ऐसी स्थिति में मन में विचार आता है कि कोई तलवार लेकर अपना धर्म फ़ैलाने आये , या तोप चलाकर अपना साम्राज्य बढ़ाए ( like Islam & British, as it is said ) , उसका विरोध भी हिंसा है | क्योंकि वह भी मारकाट, खूनखराबा और युद्ध का कारण बनता है | अन्याय को थोड़ा सह जाना शांति में सहायक होता है | खींचते खींचते यह बात वहाँ तक पहुँचती है कि यदि न्याय का व्यवहार होता रहे तो अशांति और हिंसा की नौबत न आये !
यदि कौरव पाण्डवों को उनका  हिस्सा दे देते , तो क्या महाभारत बच न जाता ?


13 (a) - थोड़ा सा नमक रहने दो
थोड़ा सा शक्कर ,
थोड़ी नास्तिकता , तो
थोड़ा सा ईश्वर !

13 (b) - शायद ऐसा हो
कि ईश्वर मर जाए
और उसके चरणचिन्ह
रह जाएँ !
( feeling suspicious )

13 (c) - बच्चन का एक प्यारा गीत है हिंदी में =
पूछ मत आराध्य कैसा जब कि पूजा भाव उमड़े ,
मृत्तिका के पात्र से कह दे कि तू भगवान बन जा ।
आज तू इंसान बन जा ।

13 (d ) - ( The end ) = अंधविश्वासी भारत को राधे माँ से अच्छी माँ मिल ही कैसे सकती है ?

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Honestly yours'
ugranath

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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

Hindi Atheist - 7 , August,8 / 2015 Issue

Hindi Atheist  - 7 , August,8 / 2015  Issue   
Weekly : by , Ugra Nath @ Lko
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Title - सबका मालिक फेक Fake है ।
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1 - सबका मालिक फेक ( Fake ) है ।
( इसे बार बार दुहराना पड़ेगा , इसका परचा छपवाकर बाँटना होगा, इसका sticker जगह जगह चिपकाना होगा , इसका glow sign board लगाना होगा । )
1 ( b ) - अपना तो है बस यह टेक , 
ऊपर वाला बिल्कुल FAKE !

2 - पता नहीं क्यों मैं अप्रिय बातें बोल जाता हूँ । मैं अपने को रोक नहीं पाता उन्हें लिखने से , क्योंकि वे सत्य के बहुत निकट होती हैं । 
मैं सोच रहा था कि इस्लाम की आलोचना करने वाला व्यक्ति आस्तिक नहीं हो सकता । ऐसा इसलिए कि ईश्वर के प्रति उनका अडिग विश्वास अपरिमित है और उस पर संदेह नहीं किया जा सकता, प्रश्न चिन्ह नहीं उठाया जा सकता ।
आप अब इस पर अगर मगर, किन्तु परंतु, if and but मत ठोंकिए । मैं विशुद्ध आस्था की बात कर है, जो मुसलमान में अल्लाह के प्रति अविच्छिन्न है |

3 - आप क्यों परेशान हैं मित्र ! मारे तो secular जा रहे हैं । अब उनकी सेकुलरवाद की परिभाषा और समझ भारतीय संस्कृतिवादी जानने की कोशिश न करें । आप नहीं पचा पाएँगे , उनकी छीछालेदर करना आप अवश्य जानते हैं। लेकिन यह तो जान लें कि उन्हीं सेकुलरों ( ज़ाहिर है, यहाँ वह हिंदुत्व की आलोचना करते होंगे ) को भारत में फेकुलर कहा जाता है । अब बांगला देश में दूसरा फेकुलर मारा गया तो भले टेसू बहा लें। वरना सेकुलर और नास्तिक यहाँ भी गरियाये जा रहे हैं । Rationalist की हत्या यहाँ भी हो रही है । डॉ नरेंद्र डाभोलकर हिन्दुस्तान के ही निवासी थे ।

4 - एक भाई बिल्कुल सही कहते हैं । आलोचना करोगे तो अध्ययन तो होगा !
सचमुच इधर भारतीय संस्कृति ने क़ुरआन की तिलावत बड़ी मशक्कत से की ।

5 - माना जाना चाहिए कि मैं एक अजीब आदमी हूँ | अजीब का मतलब अजीब ही , अद्भुत और अनोखा नहीं | 
मेरा अजीबपन आज इससे प्रकट होता है कि कहाँ तो मुझे उलझनों को सुलझाना चाहिए , और कहाँ मै सुलझी हुई बातों को उलझाता फिरता हूँ | 
यथा , बिल्कुल सुलझी हुई बात है कि जानने को ज्ञान कहते हैं , न जानने को अज्ञान ! लेकिन नहीं , मैं कहना चाहता हूँ - न जानना ज्यादा बड़ा ज्ञान है , और जानना सबसे बड़ा अज्ञान |
उदहारण , ईश्वर को जानना ज्ञान होना चाहिए | Stop please ! यह सबसे बड़ा अज्ञानता का लक्षण है | जो जितना ही कहता है कि वह ईश्वर को जितना ज्यादा जानता है , वह उतना ही बड़ा अहंकारी और अज्ञानी है | मिथ्यावादी , असत्यवादी |
दूसरी तरफ वह कथित अज्ञानी है जो ईश्वर को नही जानता , और जाने बगैर उसे मानने से इन्कार करता है , मतलब नास्तिक है , वह बहुत बड़ा ज्ञानी है |
अतएव ,
नास्तिकता ज्ञान का स्वरुप है , आस्तिकता घोर अज्ञान है !
है न अजीब बात ? और अजीब बात हम करते हैं !

6 - एक युवा मित्र ने मित्रता निवेदन के साथ inbox में जो लिखा वह इतना स्वच्छ , स्पष्ट और ईमानदार था कि उसने मुझे अभिभूत कर दिया | सहर्ष , सप्रेम उन्हें मित्र बनाया | किसी ने ऐसा बोलने का साहस तो किया ! 
नाम बताने में कोई हर्ज़ नहीं है , न इसमें उनका अपमान | मुस्लिम नामधारी हैं - जनाब शफीक उर रहमान खां | वह लिखते हैं :-
" वैसे धार्मिक तौर तौर पर घोर नास्तिक हूँ मगर खान पान और रहन सहन में थोड़ा कल्चरल बायस आ ही जाता है | बाक़ी राजनीतिक तौर पर मुसलमान होना सच में मज़बूरी है | "
कितनी सच्ची बात की भाई ने, दिल खोलकर !
यह मज़बूरी हमारी और शायद सबकी है , भले वह सम्पूर्ण नास्तिक हैं | हम विवश हैं / हो जाते हैं / हो रहे हैं हिन्दू मुसलमान होने के लिए | यह विवशता तोड़ें , इस पर तो बाद में चर्चा करेंगे | अविलम्ब हमें यह मानना चाहिए कि हम बहुत बड़ी गलती हैं जो मुसलमान को मुसलमान और हिन्दू को मान लेते हैं ( मात्र नाम देखकर ही , यह बात अभी अलग रखें तो भी ! वह भी एक विवशता है उसकी ) | और एक बार यह संदेह मन में बैठ जाय कि हिन्दू मुस्लिम नामधारी व्यक्ति बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि हिन्दू मुसलमान हो ही , तो हमारा आधा काम पूरा हो जाय | समझें कि हिन्दू मुसलमान होना एक राजनीतिक मजबूरी भी है व्यक्ति की , वह वहाँ स्वेच्छा से नहीं है , और वह वहां खुश नहीं है |
बाकी रही बात राजनीतिक तौर पर हिन्दू मुसलमान होने कि मज़बूरी मिटाने की
, तो वह भी हो जायगा जब ऐसे ऐसे सत्यनिष्ठ जन खुले दिल से , परस्पर प्यार और विश्वास का भाव लेकर एक साथ बैठेंगे | और इसका उपाय तो है , यह हम अच्छी तरह जानते हैं | याद है न वह आप्त वचन - यदि हम जान जायँ कि हम गुलाम हैं , तो हमारी गुलामी आधी समाप्त हो जाती है ?
तो , जय हो शफीक भाई की , और ऐसे समस्त नास्तिकों की , उनकी तमाम विवशताओं के बावजूद !

7 - Islam is the way .
इस पोस्ट पर भाई कुछ भड़केंगे , यदि मैं कहूँ कि सारे रास्ते इस्लाम से होकर गुज़रते हैं | लेकिन यह एक निष्पक्ष विवेचन है |
जब भी आप कोई काम करेंगे , आपको इस्लाम का रास्ता अपनाना पड़ेगा | एक संगठन बनाइये , तो सबक लीजये इससे | वही सख्ती , वही निष्ठां , वही दृढ़ता दरकार होगी | इस्लाम की सांगठनिक गुणवत्ता और प्रबंधन से सभी परिचित है | पाँच वक़्त नमाज़ , जुम्मे की नमाज , ईद बकरीद और दिवंगतों के लिए त्यौहार , बुजुर्गों के प्रति उनकी भावना और व्यवहार , हिफाजत की व्यवस्था कि कुरआन कि सारी प्रतियां नष्ट हो जायँ और एक भी हाफ़िज़ जिंदा बचे तो हुबहू कुरान लिख ली जाय | इत्यादि -- सब अनुकरणीय ही नहीं श्लाघ्य है इनकी व्यवस्था | क्या समझते हैं सब ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए है ? जी नहीं , सब इस ज़िंदगी के लिए है , बिल्कुल practical , और दूरदर्शी , जिसका परिणाम हम देख रहे हैं |
यहाँ तक कि जिनकी कठोर आलोचना की जाती है , उन कथित इस्लामी अवगुणों को वही लोग अपनाते भी है | कुछ अपनी ओर से समीक्षा कीजिये | जिस हिंसकता , आक्रामकता , जड़ता का हम विरोध करते हैं , अपनी परी आने पर हम उन्ही को अपनाने की वकालत भी करते है | किसी भी हिन्दू मानस और संगठन को देख लीजिये | क्या वह वस्तुतः Hinduist है ? क्या वह इस्लामियत से वंचित है ? कह दें तो कटु हो जायगा , हिन्दू कि रक्षा के लिए बना ( अब तो एक अलग धर्म ) को वही तलवार उठाना पड़ा , जिसके लिए उनका आरोप था कि तलवार के बल पर इस्लाम फैला |
हम कोई आपत्ति नहीं कर रहे हैं | वह तो करना ही पड़ेगा | लेकिन कहना यह है कि फर्क कहाँ रहा ? क्या हम परोक्ष islamist नहीं हुए ? इसे स्वीकार करने में क्या हर्ज़ ? भय बिन प्रीत को चाहे हिन्दू नीति कहिये चाहे मुसलमान | जब भी आप कुछ निष्ठापूर्वक कुछ करने पर उतारू होंगे , आपको उसी रास्ते पर जाना होगा जिसे आप कहते हैं यह इस्लाम का दूषित और गलत रास्ता है | यूँ केवल हवाई बात करके आत्मसंतोष प्राप्त करना हो तो अवश्य गर्व से कहो हम हिन्दू हैं | निश्चयतः , हिन्दू जीवन का एक मार्ग है / होगा, लेकिन वह बचेगा कैसे ?

8 - समरथ को नहिं दोष गुसाईँ 
यह तो समझ में आती है जनता कि मजबूरी कि वह शक्तिशाली , बाहुबली , धनबली के समक्ष झुकता है | लेकिन ईश्वर के आगे क्या नाक रगड़ना जो अशक्त है , शक्तिहीन है ? उसका कोई वश चलता तो नहीं दीखता !

9 - मान लीजिये कोई पुलिस वाला या प्रशासक या न्याधिकारी राधे माँ का भक्त हुआ , तो वह उनके खिलाफ जांच क्या करेगा ? सज़ा क्या दिलाएगा ?

10 - मैं कभी कभी ब्राह्मणवाद को श्रेष्ठता का मार्ग , भले थोड़ा अहंकार मिश्रित , समझता हूँ | और उसमें कोई बुराई न मान सबसे कहता हूँ कि ब्राह्मण बनो | लेकिन , लगता है ऐसा है नहीं | यह केवल श्रेष्ठता के दंभ से ग्रस्त / पीड़ित होने की भावना नहीं है | इसका मूल है , मनुष्यों के बीच विभाजन , श्रेणीबद्धता | और वह भी जन्मजात अर्जित | भले कहते हैं कि कोई भी अपने कर्मों से ब्राह्मण या शुद्र बन सकता है , लेकिन इसके उदहारण तो सामने आये नहीं | तो ऊँच नीच का तफरका , भेदभाव और इसकी शास्त्रीय मान्यता , स्वीकार्यता इसकी असली परिभाषा है |
अब यह बात तो खैर गलत है ही !

11 - नये सिरे से 
विचार करना है 
स्थितियों पर !

12 - पैर छुएँ या न छुएँ, मेरा इस पर कहना यह है कि पैर कोई गन्दा अंग नहीं है , किसी का भी !

13 - ( Last )  बात में दम मुझे भी लगता है । हिन्दू अवश्य ही उदार हैं । मुसलमानों के प्रति तो और भी ज़्यादा । देखिये मांसाहार ये इसीलिए करते हैं , और इसमें सुना कि ब्राह्मण कौम का महती योगदान है । जिससे चिकवा ( कुर्रेशी ) मुसलमानों की आमदनी बढ़े , उनकी माली हालत सुधरे । वरना भला वे मांसाहार करते !

Honestly your's ,


उग्रनाथ