शनिवार, 25 अगस्त 2012

18-06-2012


[ कवितायेँ ]
१- कबीर चदरिया 
मैं महसूस करता हूँ 
एक चादर अपने ऊपर ,
अपने शरीर के ऊपर |
नीचे नहीं किनारे नहीं , 
न सिर के पीछे 
न  पाँव के नीचे 
बस केवल ऊपर 
छाया हुआ , लहराता 
मेरे  ऊपर आक्षादित |
मैं हर तरफ से मुक्त हूँ 
बस एक  आभास भर है -
मेरे ऊपर एक चादर है |
वह चादर मेरी नहीं है 
जो मुझे सृष्टि से मिली  होगी 
वह चादर कबीर की है ,
मैं  चादर को नहीं जानता 
लेकिन कबीर को पहचानता हूँ 
मेरे ऊपर कबीर की चदरिया है ||
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२ - अपना राजा 
मैं अपना राजा 
उसे बनाना  चाहता हूँ 
जो मुझसे दूर हो
मेरे  घर - परिवार
सम्बन्ध  का न हो 
जिससे वह पक्षपात न कर पाए 
तभी वह शासन कर पायेगा /
तभी मैं उससे शासित हो पाऊँगा |
मैं दलित को राजा बनाना -
मानना चाहता हूँ 
क्योंकि मैं दलित नहीं हूँ 
मेरा कोई संबंधी दलितों में नहीं है |
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३ - क्षणिका  
आदमी 
अपने से 
पार पाए ,
तब न कुछ 
कर पाए ?
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४ - बिस्तर 
मुझे ख़ुशी है कि मैंने 
अपना बिस्तर  बाँध लिया है 
समान सब पैक कर लिया है ,
कुछ भी इधर - उधर 
बिखरा  नहीं रह गया है 
कमरा भी साफ़ कर दिया है 
और सामानों को इकठ्ठा 
एक जगह रखकर , तैयार होकर 
किनारे कुर्सी पर बैठ गया हूँ 
बस  ऑटो वाले के आने भर की देर है |
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५ - आटा गीला 
गरीब हो , मतलब गरीबी है तो
आटा  थोड़ा ही गून्थो
ज्यादा तो कनस्तर में ही 
पड़ा रहने दो ,
क्योंकि आटा गीला तो 
होना ही है , गरीबी में !
यदि अलग कुछ आटा न हुआ 
तो उसे कैसे सुखाओगे , माडोगे
कैसे रोटी बनाओगे ?
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६ - सत्यवान 
तुम मुझे क्यों 
खींचे लिए जा रहे हो ?
मैं कोई सत्यवान नहीं जो 
कोई सावित्री मुझे तुमसे 
छुड़ा ले जायेगी ,
वस्तुतः मैं तुम्हारे साथ 
जाऊँगा ही नहीं 
मेरे पास इतना काम है  कि 
मुझे मरने की फुर्सत नहीं |
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७ - दिलफेंक 
यदि तुम दिल -
- फेंकना ही चाहते हो 
तो फेंक दो 
वह किसी भी चेहरे पर जाकर 
फिट हो जायगा 
यदि तुम दिलफेंक हो तो !
जैसे एन जी ओज़ के बारे में 
प्रचलित है कि 
किसी तरफ कंकड़ फेंको 
वह किसी एनजीओ पर गिरेगा |
अब यह बात और है कि 
न एनजीओ विश्वसनीय हैं 
न दिल |
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एक चुटकुला है या कहावत , कि एक हिन्दू एक मुसलमान आपस में झगड़ रहे थे कि हनुमान जी उनके देवता हैं | हिन्दू की दावेदारी तो सर्व विदित है , लेकिन मुसलमान कह रहा था कि जैसे रहमान , उस्मान , सलमान , वैसे ही हनुमान | इतने में एक सरदार जी बीच में आ गए | बोले - न हिन्दू न मुसलमान हनुमान जी सरदार थे | वह कैसे ? तो देखो सीता जी पत्नी थीं राम चन्द्र की , श्री राम का झगड़ा था रावण से और बीच में हनुमान जी अपनी पूँछ जला बैठे | यही  सरदार गिरी  है | 
उसी प्रकार राष्ट्र पति चुनना है राजनीतिक दलों को , वोट देना है सांसदों को , लेकिन हम लोग बीच में अपनी टांग अड़ाये  जा रहे हैं , मानो हमारे बनाने से ही राष्ट्रपति को बनना है |  18/6/12    kwt

लखनऊ के कुछ अन्य स्कूल


 लम्बे समय तक जब तक चन्द्र दत्त तिवारी जी D -10 /5 , पेपर मिल कॉलोनी  में थे , तब तक वह एक स्थायी विचार केंद्र के सामान रहा औपचारिक / अनौपचारिक रूप से | इसके अतिरिक्त उन दिनों जो केंद्र कार्य रहे थे मेरी स्मृति के अनुसार एक तो था माह के दो शनिवार चलने वाला नवचेतना केंद्र , अशोक मार्ग पर गोष्ठी जिसमे तमाम रिटायर्ड आई ए एस , आई पी एस , न्यायाधीश हैं , और जो अब भी नियमित चल रही है , जैसा कि अख़बार से पता चलता है , क्योंकि उसे हम लोगों ने पहले ही त्याग दिया था , जब डॉ एम एम एस सिद्धू से शिकायत  करने के बाद भी बात नहीं बनी | एक हर्ष नरायन जी का था नरही में उनके अपने घर पर , जिसका नाम लखनऊ अकादमी जैसा कुछ था | विश्वविद्यालय में कुछ थे / रहे होंगें क्योंकि वहाँ विचार केंद्र बनते बिगड़ते रहते है अकादमिक सेसन के साथ जैसे कभी ' सोच - विचार ' भी कोई था | अम्बरीश का थिंकर्स फोरम था और ज्यादा याद नहीं | हाँ जब तक राजा साहेब कोटवारा [फिल्म निर्माता मुज़फ्फर अली के पिता] जिंदा थे उनकी ह्युमनिस्ट  यूनियन में भी यदा - कदा गोष्ठी हुआ करती थी | और तो अन्य औपचारिक सभा- सेमिनार प्रेस क्लब , इप्टा ऑफिस , जय शंकर सभागार आदि स्थानों पर हुआ ही करते थे | पार्टियों और संस्थाओं की भी अपनी सभाएँ थीं | एक महान पाठक और पत्र लेखक स्व के.के .जोशी के घर भी हम लोग वक़्त ज़रुरत बैठक कर लिया करते थे | बाद में अनुराग बाल केंद्र , निराला नगर में चला | उधर लखनऊ मोंटेसरी में शिव  वर्मा जी भी सक्रिय थे | फिर जितना मैं जानता हूँ, या मुझे याद आता है , या जिनमे मैं शरीक होता था उन्ही को तो बता पाऊँगा | अन्य तमाम चलते रहे होंगे , जो उन्हें जानते हों वे जानें | #
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साइंटिफिक टेम्पर से साइंटिफिक टेम्पर तक : Story of Lucknow  School of Young  Thoughts   =

हुआ यूँ की जिस विभाग में मैं नौकरी करता था ,फील्ड कर्मी होने के नाते मुझे अपने अधिकारी के निवास पर जब -तब जाना पड़ता था , और वह महानगर में रहते थे | एक दिन वहां से लौटकर बहुत थका हुआ मैं पास के फातिमा अस्पताल के सामने ढाबे पर चाय पी रहा था | बगल में ही तख्ते पर कुछ और लोग बैठे थे  | मैंने सुना एक व्यक्ति अपने साथी से कह रहे थे कि हिंदुस्तान में साइंटिफिक टेम्पर संभव ही नहीं है | मैं चौंक गया ,आलस्य फटाफट दूर हो गया , क्योंकि यह मेरा प्रिय चिंतन और कर्म का विषय था | मैंने उनकी ओर परिचय का हाथ बढ़ाया और चर्चा में शामिल हुआ | वे थे श्री कृष्ण मुरारी यादव , यादव भवन के सबसे अग्रज और उनके मित्र श्री राय साहेब , कवि | इसी बीच संयोग से पता नहीं कहाँ से रिक्शे से प्रमोद कुमार श्रीवास्तव उधर से गुज़र रहे थे | मैंने उन्हें फ़ौरन रोका और खुशखबरी बताई | शुभ मिलन प्रारंभ हुआ | हम यादव भवन गए |
यादव जी ने बंगाल के शानिवारेर गोष्ठी की परंपरा  का इतिहास बताया और यह भी कि Lucknow  School of Young  Thoughts  उसी तरह से चलाने की उनकी मंशा थी | दोनों इतिहास के आदमी थे , सहमत हो गए = प्रत्येक शनिवार सायं ५ बजे स्थान यादव भवन , महानगर में मिल बैठने का सिलसिला शुरू हो गया | सदस्य बहुत नहीं थे पर बढ़ते गए | कोई बंधन न था पर इसका होना निश्चित होता था | उसके कुछ चेहरे थे हरजिंदर , मुकेश त्यागी , पुनीत टंडन ,विपिन त्रिपाठी  , आलोक, मैं और प्रमोद जी | हम पर तो उन दिनों इसका नशा सवार था | कभी कभी आने वालों में थे अवधेश खरे , भुवनेश मिश्र, राजीव हेमकेशव | अब इसके आगे हरजिंदर भले से बता सकते हैं क्योंकि वे अत्यंत  नियमित थे और विषयों के समझदार भी | लेकिन शुरू में बिना विषय के अनौपचारिक चर्चा ही होती थी पर होती गंभीर और दिमाग की भुजिया बनाने वाली थी | ज्यादातर तो  सूत्रधार होते यादव जी और प्रमोद जी  पर बहस में सभी खुल कर भाग लेते थे, इसलिए हमें बहुत उपयोगी और रोचक लगती थी  |
तभी एक दुर्घटना  हो गयी | मेरी एक वन लाइनर पर क्रुद्ध होकर भुवनेश जी ने कह दिया कि मैं इनके हाथ का छुआ पानी भी नहीं पियूँगा | सभा सन्न हो गयी , यह बात लोकतान्त्रिक  मूल्य के विपरीत थी | मैं तो खून के आँसू पी गया { अछूतों की दशा का मन में अनुमान -अनुभव करते  }, लेकिन युवा -उत्साही प्रमोद जी को चैन कहाँ ? तब  उन्होंने तय किया  विषय को लेकर  चर्चा करने  की और लिखित परचा पढ़ने की , जिससे विषयांतर न होने पाए | नारी मुक्ति , धर्म निरपेक्षता -- आगे याद  नहीं | इस पर प्रमोद जी प्रकाश डालें तो ही ठीक होगा | बहुत दिनों तक ऐसा चलता रहा , पर किसी दिन यादव भवन के पड़ोसी घोसियों से रंजिश में स्कूल में व्यवधान पड़ गया [ इसके समर्थ गवाह अवधेश जी हैं , मैं उस दिन  गाँव गया था ] |
 लेकिन मैं मेंढक तोलने से कहाँ बाज़ आता ? यादव जी से मुलाकातें तो होती ही थीं , तो उनकी दुकान विनायक गैस सर्विस पर ही लोग मिलने लगे , यद्यपि वह ऊर्जा अब न थी | वहीँ पर प्रगतिशील लेखक संघ के भी लोग आये | किसी से भी मिलना , वार्ता करनी होती तो उसके लिए हमारे पास यही जगह थी , जिसे बौद्धिक कह सकते थे | यहीं पर हैदराबाद एकता के सेकुलर सामाजिक - राजनीतिक कार्यकर्त्ता कुद्दूस भाई भी आये | उनसे सबकी लम्बी चर्चा हुयी | प्रमोद जी वह सब अच्छी तरह समझते थे | मुझे राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता में कोई रूचि न थी, मैं उसका  आध्यात्मिक  पक्षपाती  था | सो मैंने नादानी में पूछ लिया -- " लेकिन कुद्दूस भाई ,  साइंटिफिक टेम्पर का क्या होगा ?" और उन्होंने मुझे सेट बैक दिया - " इसका अभी समय नहीं आया है " | अतः वह केंद्र भी बंद हो गया | तदन्तर मैंने तिवारी [सी डी] से उनके निवास पर परमिशन चाहा  |  
उन्होंने  पहले तो 'हाँ' कह दिया पर दुसरे  दिन शर्त लगा दी की किसी उद्देश्य के तहत बैठो तो बैठो , नहीं तो नहीं | तब सेकुलर सेंटर की भूमिका बनी और वह बना भी , जिसमे मुख्य  भूमिका निभाई के .के .जोशी ,रूपरेखा वर्मा , प्रमोद कुमार ,आलोक जोशी  और कहना चाहिए जय प्रकाश ने जिन्होंने बड़ी मेहनत की | प्रभात  जी भी शायद तब तक मैदान  में आ गए थे | थोड़ा अपने योगदान से भी इन्कार नहीं करूँगा , क्योंकि मैं  संयोजक चन्द्र दत्त तिवारी जी का एकमात्र सचिव था | उसे विस्तार से आलोक ही बता सकते हैं क्योंकि वह उस समय सबसे युवा -सक्रिय सदस्य थे , और वह और प्रमोद जी राष्ट्रीय सम्मलेन के अवसर पर रात रात भर बिहार से आये और आयीं  प्रतिभागियों से बहस रत रहते थे, और अवसर मिलने पर मुंबई से आई पत्रकार ज्योति पुनवानी के साथ | उसकी अलग कहानी है जो आडवानी की रथ यात्रा के साथ अंत को प्राप्त हुई | आगे चलकर प्रमोद जी यादव जी के साथ 'लखनऊ एकता रपट '  निकालने लगे और हम रूपरेखा जी के साथ ' नागरिक -धर्म समाज ' में सक्रिय हुए |  लेकिन मेरी फितरत समाज कार्य में कम विचार कार्य में ज्यादा थी , जिसके लिए हमारे पास जगह न थी | सो , मैंने  फिर बाँध छेंक कर रूपरेखा जी और राकेश [ इप्टा] को यादव जी के निवास पर ले जा कर गोष्ठी प्रारंभ करनी चाही | चौथे सहभागी के रूप में उपस्थित हुए प्रमोद जी | विषय साइंटिफिक टेम्पर ही था | अन्धविश्वास पर चर्चा छिड़ी तो पता नहीं क्यों बात बिगड़ गयी | यादव पक्ष यह सिद्ध करना चाह रहा था कि पोलियोड्रॉप भी तो अन्धविश्वास है , या ऐसा ही कुछ | फिर तो वहाँ दूसरी बैठक होने की नौबत नहीं आई , मैं खिसिया कर रह गया जो कि चाहता था कि एक जगह मिलने -बैठने की गुंजाइश बने | फिर तो मैं , निराश hibernation  period में आ गया | कभी- कभी यादव जी के घर चला जाता था , जो  तमाम शायरों को कलमकारान - ए - लखनऊ के नाम से हर माह के ग्यारह तारीख को नशिष्त- दरबार  चलाते थे , जो उनकी मृत्यु तक चला | 'नागरिक -धर्म समाज' [जिसमे मेरी जान थी] का कायाकल्प " साझी दुनिया "  में हो गया , जिसे वीसी पद से रिटायर होकर रूपरेखा जी यशपाल जी के घर पर अवस्थित कार्यालय से अविराम चला रही हैं | वहाँ चल रही हर वृहस्पतिवार सायं चार बजे की बैठकों में कभी जाना हो ही जाता है | पर अब कहीं कुछ नहीं बोलता, अनबोलता मशीन हो गया हूँ मैं | मैं समझ गया हूँ कि  मैं अप्रासंगिक हो चूका हूँ , शायद सदा ही रहा था , और वही मेरी असफलता का कारण | अब  मैं कुछ फुटकर- स्वतंत्र मित्रों और कविता - कहानी - पत्र लेखन -ब्लॉग लेखन और फेस बुक में अपना मनोवांछित लिख -पढ़ -कह कर  मस्त रहता हूँ | यादव जी स्वर्ग सिधार गए [ वह उसे मानते न थे] , प्रमोद जी विश्वविद्यालय में हेड हैं ,किताबें लिखने और अपने अकैदमिक्स में मशगूल हैं , आलोक मुंबई गए , हरजिंदर दिल्ली | पुनीत की दर्दनाक मौत हो गयी सपत्नीक | एक दिल  के टुकड़े हज़ार हुए , कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा |
 तो यह थी किस्सा - कोताह Lucknow School of Young Thoughts की कहानी, Scientific Temper से शुरू  , Scientific Temper पर समाप्त | लेकिन  हाँ , यंग का अर्थ विचारकों की जवानी से नहीं विचारों के जवानी से था | यह उसकी विशिष्टता भी थी और , मेरे ख्याल से यही उसकी कमजोरी भी साबित हुयी | यादव जी तो नवीनता की रेंड ही मार देते थे और कुछ अपने ख़ास बने - बनाये विचार इस तरह आगंतुक पर लाद देते थे , कि वह फिर दोबारा आने का नाम न लेता | और हम भी कुछ नया कहने के उत्साह में कुछ ऐसा कह जाते जो लगभग निरर्थक और अग्राह्य होता | तिस पर भी दुःख इस बात का नहीं है कि स्कूल बंद हो गया , शोक यह है कि सचमुच नया, प्रिजुडिस विहीन , निर्वैयक्तिक , स्वार्थ रहित मानुषिक  विचार प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई जैसा कि स्कूल का स्वप्न था [ ऐसा मुझे लगता है ] | 
 यह सारी कथा अस्सी और कुछ नब्बे की दशक को छूते हुए है | इतनी पुरानी यादें लिखने में कोई त्रुटि हो गयी हो , कुछ छूट  गया हो और मेरा लेखन व्यक्तिगत होना तो निश्चित है , उसके लिए यह अकिंचन हमेशा क्षमा प्रार्थी रहेगा | #      kwt
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20-06-2012


[ gon -zo ]

हाइकु=
* तन से सब
मन से कुछ नहीं
मानता हूँ मैं |

* न गर्मी ठीक
कोई मौसम नहीं
न जाड़ा ठीक |

* विशालता से
कम कुछ भी  नहीं
चाहिए मुझे |

कविता =

* हाँ यार ,
लिखना तो चाहिए ऐसा
की दुनिया हिल जाए
पूँजीवाद धूल में मिल जाए
सरकारें धराशायी हो जाएँ
जनवाद का बोलबाला ,
साम्राज्य स्थापित हो जाए |
हाँ यार '
लिखता तो हूँ ऐसा
की कोई पुरस्कार मिल जाए |    kwt
##

टीप = डी एन ए टेस्ट
* एक उदाहरण याद है अभिनेत्री नीना गुप्ता का | उन्होंने स्वयं अपनी मर्जी से संतान - प्राप्ति की , और पुरुष का नाम नहीं बताया | उनके अनुसार यह पर्याप्त था कि वह उसकी माँ है , उसने अपनी ज़िम्मेदारी पर बच्चा पैदा किया है , इसमें किसी पुरुष - बाप के नाम की ज़रुरत क्या है ? वह ही माँ -बाप हैं | यह अतीव साहस का काम था |
दूसरा उदाहरण पौराणिक है | बिना बाप के नाम के पुत्र सत्यकाम और उसकी माँ का | लोक - उलाहनों से प्रेरित सत्यकाम ने अपनी माँ से पूछा - माँ , मेरे पिता कौन हैं ? साहसी और सत्यवादी  माता ने दृढ़तापूर्वक  कहा - " बेटे मैं कई ऋषियों की सेवा में रही , तू किसका पुत्र है , मैं बता नहीं सकती ?" यही बालक सत्यकाम सत्यवाद का महान नायक बना , और पुराण पुरुष | प्राच्य विज्ञानं का गुण गाने वाले भले कहते रहें कि उस ज़माने में पुष्पक विमान था , यह था -वह था , लेकिन निश्चय ही उस काल - अवधि तक डी एन ए टेस्ट की जानकारी विज्ञानं को नहीं थी | और यह भी कि हर औरत नीना गुप्ता और सत्यकाम की माँ नहीं हो सकती |     kwt
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[ हाइकु ]
१ - पर्याप्त होता
औरत का होना ही
किसी घर में |

२ - बच्चे रहते 
घर भरा रहता
आनंद पूर्ण |

३ - बिलावजह
नींद हराम किया
उनके पीछे |

४ - होना चाहिए
ईश्वर है नहीं तो
नया बनाओ |

५ - मुझे क्या पता
प्रेम किसे कहते
करना जानूँ |

६ - नाम कमाना
क़ुरबानी माँगता
हलवा नहीं |

७ - कोई न कोई
पावरफुल होगा
वह कोई हो |

८ - कोई आदमी
अपनी बराबरी    
नहीं चाहता |

९ - चिंतन कर्म
बिल्कुल आसान है
शुरू तो करो |

१० - मैं मूरख था
मैं मूरख रहूँगा
मैं मूरख हूँ |

११ - मिलता भी तो
कब तक मिलते
जीवन छोटा |

12 - ठीक से देखो
नज़र नीची करो
ज़मीन देखो |

13 - कुछ चीज़ें तो
बदलनी चाहिए
मसलन क्या ?
हमारी सोच
जन - मानसिकता
बदलेगी क्या ?
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[ कथनानुसार ]
१ - बीस रुपया रोज़ पाने वाले गरीब विधायक -सांसद बनें यह तो संभव नहीं है , लेकिन मेरी आकांछा आकांक्षा है कि सांसद - विधायक बीस रुपया रोज़  वेतन लें |
२ - अजीब बात है कि असली 'व्यक्ति' का उदय तब होता है जब उसका नकली ' व्यक्ति ' तिरोहित हो जाता है |
३ - यदि हिंदुस्तान को तरक्की तो क्या , जिंदा भी रहना होगा तो उसे यह भूलना होगा कि कोई व्यक्ति मात्र पैदा होने से छोटा या बड़ा होता है |
४ - किसी के कहने से नहीं , जब मेरी नानी मरीं , तब मुझे विशवास हो गया हम सबको , सारे मनुष्यों को मरना होगा |
५ - बूढ़ों को भी अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए |
६ - ' आम आदमी ' वह है जिसे अपने आम ज़रुरत के कार्यों के लिए नौकर , मजदूर न लगाना पड़े |
७ - ईश्वर को अपने सिस्टम से delete  मत करो तो उसे recycle bin में तो डाल ही दो |
८ - मैं स्वर्ग को न तो जानता हूँ न मानता हूँ , लेकिन यदि कहीं स्वर्ग हुआ और उसमे मुझे जाना ही पड़ा , तो चला जाऊँगा |
९ - ईश्वर को छोड़ अपने ' आदमी ' की शरण में आइये |
१० - बड़ी ज़िम्मेदारियाँ उतनी ही बड़ी नैतिक ऊँचाइयों के साथ निभाई जानी चाहिए |
११ - जो अपने आपको बहुत बुद्धिमान समझते हैं , वे सबसे अधिक मूर्ख होते हैं |
१२ -  The world is made up of ‘differences’ . Once you forget it , you will  be in a candid tension .  kwt
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मौत की तो सिर्फ बात करता हूँ ,
वरना मैं जनता हूँ - ज़िन्दगी  हूँ |
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अभी समय है , हिंदुस्तान - पाकिस्तान एक करो , चाहें जरदारी को भारत का राष्ट्रपति बना दो | दोनों देशो की समस्याएँ , परेशानियाँ एक हैं अंदरूनी भी , बाहरी  भी | कहने दीजिये किसी को , जब बिल्कुल ठीक से बँटवारा नहीं हुआ , हो ही नहीं सकता था , कि सारे हिन्दू हिंदुस्तान  में - सारे मुस्लिम पाकिस्तान में , तो फिर यह माना जाना चाहिए कि दोनों का रहन सहन , संस्कृति एक ही है | और जो नहीं है तो भी वे अपनी अपनी मान्यताओं के साथ एक साथ सदियों से रहते आये हैं | इन्हें एक साथ रहने का पूरा अनुभव - अभ्यास है | यह काम जितना जल्दी हो जाय उतना अच्छा | भारतीय मानस इस बँटवारे को स्वीकार नहीं कर पाया है , न कभी इसे पचा पायेगा | यदि ऐसा न हुआ तो पाकिस्तान में हिन्दुओं की दशा अच्छी नहीं होगी , है भी नहीं | उसी प्रकार भारत में मुसलमान भी ढंग से नहीं रहने पायेंगे , चाहें सच्चर कमेटी लागू कर लीजिये चाहें आठ प्रतिशत आरक्षण | कैसे भूल जायेगा हिंदुस्तान जिन्ना की बात कि हम अलग हैं और एक साथ नहीं रह सकते , और इसे पाकिस्तान ने अपने यहाँ हिन्दुओं के साथ वही व्यवहार करके दिखा भी दिया ? यदि जिन्ना की बात गलत करनी है ,अल्लामा इकबाल का कौमी तराना यदि सही ठहराना हो , तो फिर एक होकर दिखाओ | अब इससे कोई लाभ नहीं कि बँटवारे में जिन्ना - -इकबाल का दोष ज्यादा था या गाँधी - नेहरु का | एक होने पर सारा मलाल मिट जायेगा | यह तो तय है कि  जनता का तो कोई दोष नहीं था ? उसने बहुत सह ली बँटवारे की त्रासदी | अब वह एक होना चाहती है | ऐसी राजनीतिक इच्छा [Political Will ] जिसके पास हो वह अब अगले चुनाव में उतरे | शेष तो लफ्फाजी बहुत हो चुकी |    kwt
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अन्ना को डाक्टर ने बताया है कि कुछ बोलना ज़रूर है | प्रणव के बारे में नहीं पता था तो भी बोलना , बयान -समर्थन देना ज़रूरी था | अब जब प्रणव के बारे में साथियों से कुछ पता चल गया तब तो बोलना , समर्थन का खंडन करना ज़रूरी ही है | इसी तरह पत्रकारिता ने भी यह ठान लिया है कि अन्ना के बयानात वह छापेगी , उछालेगी ही चाहें वह जैसी हो | मेरा मूल प्रश्न है प्रेस अन्ना को इतना महत्त्व क्यों दे रहा है ? उनकी हैसियत क्या है ? और इसी प्रकार रामदेव की भी ? क्या इसलिए कि ये लोग साधु संत जैसे दिखते लोग हैं ?
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लोग कहते हैं कि सभासदों , पार्षदों , मेयरों के पास अधिकार नहीं हैं | उधर समाचार है कि ये लोग चुनाव जीतकर ज़मीनें हथियाते हैं | भैया जी लिखते है कि अब ठेकेदार नगर निगम के चुनाव में आ रहे हैं | तो इतने कम या कुछ नहीं अधिकार  पर जब यह हाल है , यदि इनके पास खूब अधिकार होता तो ये क्या करते ? 20/6/12 kwt