बुधवार, 18 जनवरी 2012

दोष मत दो

[ कविता ]
किसी का दोष मत दो
जातिवाद , धर्म - संप्रदाय के
दोषों के लिए , किसी व्यक्ति को
दोषी मत ठहराओ
न ब्राह्मण को , न मौलाना को ,
दोष न ब्राह्मणवाद का , न रूढ़िवाद का ,
सबके ज़िम्मेदार तुम हो
क्योंकि तुम इसे मानते हो ।
नहीं मानते , तो बस इतना कहो -
धार्मिक अलगाववाद बेमानी है ,
और साम्रदायिकता है ज़हर ,
ईश्वर का होना नहीं है सिद्ध ।
लेकिन इसके लिए
किसी अन्य को दोष मत दो ,
इससे व्यक्ति तो दोषी हो जायगा
मगर दोष बना रहेगा ।
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मंगलवार, 17 जनवरी 2012

वोट का आधार

* हम क्यों रोज़ी - रोटी , कपडा - मकान के वायदे के आधार पर किसी को वोट दें ? हम तो उसी पार्टी को वोट देंगें जो अयोध्या में राम मंदिर नहीं , सार्वजानिक अस्पताल बनवाने का दम भरे ।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

वोट दें

किसी भी दल को नहीं , किसी भी दलित को वोट दीजिये । इस बार , बार - बार , चुनाव में ।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

दलित को वोट

आह्वान :- किसी दल को नहीं , किसी दलित को वोट दीजिये । इस बार , बार -बार , चुनाव में ।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

चुनाव प्रचार

चुनाव प्रचार
* अन्ना तो आ नहीं रहे हैं , फिर आने दीजिये केजरीवाल को चुनाव दुष्प्रचार के मैदान में । मालूम पड़ जायगा उन्हें आटा-दाल का भाव ।

सोमवार, 9 जनवरी 2012

प्रेमिका

[कविता ]
* वही लिजलिजा मांस
वही कठोर हड्डी
माँ की , पत्नी की , प्रेमिका की
किस तो शरीर से प्यार करूँ !
फिर भी प्यार करना तो है
माँ से , पत्नी से , भाई - बहनों से
प्रेमिका से भी ।
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रविवार, 8 जनवरी 2012

शीशे में नूंह

[कविता ]
* मेरा ख्याल है कि
प्यार जताने से पहले
मुझे अपना मुँह
शीशे में
देख लेना चाहिए ।
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बुधवार, 4 जनवरी 2012

अयोध्या प्रस्ताव

Proposal /
If you agree, Please Propose in whatever way you can , and let the problem end :
* KAUSHALYA MATERNITY and INFERTILITY RESEARCH CENTRE
[ at Ayodhya] " KAUSHALYA HOSPITAL"

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

एक्टिंग

[कविता ]
* एक्टिंग ?
एक्टिंग क्या चीज़ है ,
मै तो अपना काम
कर रहा था ।
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रविवार, 1 जनवरी 2012

आरक्षण का न्याय

हमें बिल्कुल एतराज़ नहीं है लोकपाल में एक पद मुस्लिम आरक्षण पर । बस शर्त यह है कि वह मुस्लिम तसलीमा नसरीन नाम की औरत हो , जिसे हिंदुस्तान से मुसलमानों के विरोध के कारण भगाया गया । यदि वह भारत में नहीं रह सकती , तो हम भी मुसलमानों को भारत में कोई आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हो सकते ।

पैसा - प्यार

[कविता ]
* पैसा
प्यार नहीं खरीद सकता ,
पैसा
सब कुछ खरीद रहा है ।
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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सख्त लोकपाल बिल

* अभी तो खैर लोकपाल का मामला लटक गया है । लेकिन जब कभी यह आये तो सख्त लोकपाल के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूँ । सख्त लोकपाल वही हो सकता है जिसका कार्य क्षेत्र सीमित हो उसका काम यदि साठ लाख लोगों पर छितरा दिया गया तो वह प्रभावी काम नहीं कर पायेगा । इसलिए यदि उसे सचमुच मज़बूत बनाना है तो केवल उसे सांसदों के भ्रष्टाचार पर नज़र रखने , उनकी जांच करने और उन्हें सजा देने तक सीमित रखें । पी एम को भी एम पी के रूप में उसके अधीन रखें पर पी एम के काम पर उसका कोई दबाव न हो । एक अभूत पूर्व विचार यह है कि लोकपाल को चुनाव आयोग [संवैधानिक स्तर प्राप्त ] के अन्दर एक सेल के रूप में बना दें जो सांसदों के सम्पूर्ण आचरण , उनकी उपस्थिति ,वेतन -भत्ते पर नज़र और अंकुश रखे । [आखिर मुख्य समस्या तो उन्ही के भ्रष्टाचार को लेकर है , जिस से जनता ज्यादा नाराज़ है , और उस से छुटकारा पाना चाहती है ? अन्ना ने तो अनावश्यक इतना फैला दिया कि वह असफल होने के लिए अभिशप्त हो गयी ] । शेष संस्थाओं सी बी आई , न्याय पालिका , ए बी सी डी ग्रुप और प्रदेशों के लोकायुक्त जैसे अपना काम कर रहे हैं वैसे करें । इस प्रकार बिल के तमाम जद्दो ज़हद समाप्त हो सकते हैं और इसके बहाने फैलाये जा रहे राजनीतिक ज़हर से देश को बचाया जा सकता है
और अंत में एक ख़ास बात । हम नहीं चाहते कि लोकपाल इतना सख्त हो जाय कि वह किरण बेदी के बिल चेक करने लगे , अरविन्द केजरीवाल की सेवा पुस्तिका उलटने लगे, भूषणों की संपत्ति का ब्यौरा लेने लगे या कुमार विश्वास के पढ़ाए बच्चों के इम्तिहान की कापी जांचने लगे । यदि वह इतना अधिकार संपन्न हो जायगा ,तब हम लोगों को थोड़ी दिक्कत हो जायगी । #

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

सफल अन्ना

* अन्ना का आन्दोलन सफल , यदि इसे सफल माना जाय तो , इसलिए हुआ क्योंकि अन्ना टीम ने व्यक्ति और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को छुआ तक नहीं । बल्कि उनके सदस्य व्यक्तिगत रूप से जब भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के लिए आरोपित हुए तो स्वयं उन्होंने उसे भ्रष्टाचार नहीं माना और अन्ना ने उनका बचाव ही किया । अपनी सफलता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने चिड़िये की आँख की तरह केवल राजनीतिक , उसमे भी केवल सरकारी भ्रष्टाचार , स्कैम ,घोटालों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखकर आन्दोलन को संचालित किया । इसीलिये उन्हें एकाएक जन समर्थन मिला और वे सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब हुए । यदि उन्होंने ज़रा भी अपनी भीड़ से भ्रष्टाचरण न करने की शपथ लेने की पेशकश की होती तो भीड़ का छँटना जो अब मुंबई में प्रकट हुआ , वह दिल्ली में ही शुरू हो गया होता । बल्कि जिस तरह वह आज MMRDA मैदान छोड़ कर भागे ,उस तरीके से तो वह जंतर मंतर से ही छू मंतर हो गए होते । बहरहाल अब भी अन्ना की यदि अन्ना की समझ में कुछ आ जाय तो यह उनके स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा । उन्हें समझना होगा कि सफलता व्यक्ति को बड़ी जल्दी पठार में फेंकती है ।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

अन्ना को बचाओ

* अन्ना हजारे का कहना है कि वह मृत्यु से नहीं डरते । तो उनके साथियों में इतना यो साहस होगा ही कि वे जेल का आनंद उठा सकें । अतः उन लोगों को जेल भेजकर सरकार को चाहिए कि वह अन्ना को बचाए । वर्ना यह चंडाल चौकड़ी अन्ना से भूख हड़ताल करवा - करवा कर उन्हें मार डालेगी ।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

अन्ना के नौजवान

अन्ना के नौजवान :
अन्ना अपने नौजवानों से जीवन में कभी घूस न लेने की शपथ नहीं दिला रहे हैं तो कोई बात नहीं । पर यदि ये भ्रष्टाचार विरोधी युवक स्वयं ही अपनी शादी में दहेज़ न लेने की और अपनी बहनों , तथा आगे चलकर बेटियों के विवाह में दहेज़ न देने की शपथ ले लें , तो अन्ना का आन्दोलन कुछ तो विश्वसनीय हो जाता । वर्ना तो फिर यही निष्कर्ष निकलता है कि बस राजनीतिक इच्छा वश ही ये जन लोकपाल बिल माँग रहे हैं, जिस प्रकार राजनीतिक कारणों के तहत ही कांग्रेस एवं अन्य दल इसे पास करना नहीं चाह रहे हैं ।

अन्ना के नौजवान

अन्ना के नौजवान :


अन्ना अपने नौजवानों से जीवन में कभी घूस लेने की शपथ नहीं दिला रहे हैं तो कोई बात नहीं

यह भारत देश तमाशा है

यहाँ तानाशाह भी अपना अभियान शुरू करने से पहले महात्मा गाँधी की मूर्ति के समक्ष शीश नवाता है । और कोई आश्चर्य नहीं , यदि कभी हिन्दुओं में कसाई कौम पनपे तो वह बकरे की गर्दन पर छुरी चलाते समय मन्त्र बोले - "जय,गाँधी जी की जय" !

अब मैं अन्ना

* अपनी गलती मैं स्वीकार करता हूँ की मैं अभी तक अन्ना के साथ नहीं था । हीन भावना से ग्रस्त था मैं कि इतने बड़े ईमानदारी के कार्यक्रम में मैं भला कैसे शामिल हो सकता हूँ ? लेकिन अन्ना के सिपहसालारों के कारनामे सामने आने के बाद मैं भी अन्ना की लाइन में आने के लिए अर्ह , योग्य हो गया हूँ । शासन पर ईमानदारी का दबाव बनाना है , स्वयं ईमानदार तो होना नहीं है । और भूषण तो बहुत बड़े हैं , अरविन्द , किरनकुमार से ज्यादा भ्रष्टाचारी तो मैं कभी नहीं रहा जो मैं अन्ना आन्दोलन में किसी से पीछे रहूँ ! मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे ज्यादा ही ईमानदार रहा हूँ । अतः अगले आन्दोलन में अन्ना के पीछे चलने में मुझे कोई परेशानी नहीं होगी , यदि वह अब भी आगे चले तो । और यदि मेरी समझ में तब तक यह न आ जाय कि अन्ना का आन्दोलन तो स्वयं में एक महान राजनीतिक भ्रष्टाचार है । #

विषम समता

प्रसन्नता हुयी जानकर कि एक मुद्दे पर दोनों एकमत हैं । फारुक अब्दुल्ला और बाल ठाकरे दोनों का कहना है कि लोकपाल की कोई ज़रुरत नहीं है ।