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सोमवार, 22 जून 2020

पाखण्ड पार्टी

पाखण्ड पार्टी?
(भारतवर्ष का सनातन अधिकार)
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इसमें कोई शक़ नहीं कि "हम भारत के लोगों" को भारतीय दार्शनिक दिशा नहीं दे सके । कि धर्म का क्या रहना क्या फेंका जाना है?और godless spirituality भी कोई चीज है । धर्म सम्प्रदाय विहीन जीवन भी सम्भव है?  लेकिन यह पाखण्डी धर्मगुरुओं के वश की बात न थी, न है । इसका प्रणयन मार्क्सवाद के अनुसार ही सम्भव है । लेकिन मार्क्सवादी तो पहला काम यह करते हैं कि देश से बाहर चले जाते हैं । और यह भी नहीं कि क्यूबा से चेग्वेरा बनकर आते, पता नहीं कहाँ की बहस में फँस समय नष्ट करते हैं ।
अन्यथा बिल्कुल समीचीन था, यह उनकी तार्किक बौद्धिक क्षमता में थी कि वह Historical Materialism ऐतिहासिक भौतिकवाद की तरह Historical Spiritualism, ऐतिहासिक अध्यात्मवाद / प्रतिपादित करते । 
ज़मीनी स्थिति यह है कि नास्तिक भी कर्तव्य च्युत हैं, वामपंथ तो नास्तिकता के प्रथम step को भी ज़रूरी नहीं मानता, तो क्या खाक़ कुछ सोचेगा ? इनपर शोध करने के बजाय धर्म और अध्यात्म से ऐसा मुँह चिढ़ाते हैं मानो यह मनुष्य के विषय ही न हों, जब कि सबके सब धर्म योग में खूब संलिप्त, मुब्तिला हैं । (पाखण्ड करते भारती?)
अब तो बड़ी मुश्किल स्थिति है । मैं अपने को isolated और अकेला पाता हूँ। कोई नया चिंतन आ ही नहीं रहा। कोई सुनता ही नहीं, और मैं यह मान ही नहीं सकता कि मैं सम्पूर्णतः गलत हूँ। तो उस पर विचार तो होना चाहिए। मैं कहता हूँ धर्म को वैज्ञानिक बनाओ तो भाई कहते हैं धर्म अलग है, विज्ञान अपनी सीमा में रहे । तो यदि कहूँ राजनीति को वैज्ञानिक बनाओ तो भी कौन सुनेगा? इसी वाहियात राजनीति में सबको मज़ा जो आ रहा है। यह तो तब जब वैज्ञानिक समाजवाद जैसी विचारधारा उपलब्ध है और राजनीति को विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के रूप में ही पढ़ाया जाता है ( उसमें विज्ञान कहाँ है?)!
तो ठीक है भाई, व्यक्ति अलग, समाज अलग, राज अलग, धर्म अलग, अध्यात्म अलग, सोच अलग कर्म अलग ही जिया जाय ! यही तो "पाखण्ड पार्टी" है !☺️ Join it friends !💐(छुद्रनाथ)

मंगलवार, 16 जून 2020

विज्ञान धर्म की स्थापना

Rakesh Mishra Kumar To Ugranath
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वैज्ञानिकता को बिलकुल धर्म कह सकते हैं ।भारत में तो ज़रूर कह सकते हैं ।इसे संप्रदाय ,पंथ ,
मसलक नहीं कह सकते क्योंकि कि वैज्ञानिकता ,धर्मों की तरह बाँटी नहीं जा सकती ।
भारत में धर्म के पहले ही अनेक अर्थ हैं ।मनु के मुताबिक़ अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,शौच ,इन्द्रिय निग्रह धर्म के 10 लक्षण हैं ।महाभारत के अनुसार जो भी धारण करने योग्य है ,वह धर्म है ।धर्म शब्द का अर्थ स्वभाव भी होता है ।वैज्ञानिकता तो मनुष्य का स्वभाव है ,इसलिए धर्म है ।अंग्रेज़ी में ईश्वर और उसकी प्रेषित किताब की लिखत को religion कहा गया 
मगर इसका एक शब्द कोशीय अर्थ किसी धारणा ,नियम सिद्धान्त के लिए दृढ़ विश्वास भी है ।अगर कहें कि humanism is my religion या कि patriotism is my religion तो मैं नहीं समझता कि इसमें कोई व्याकरणिक गलती है ।
बुद्ध का धम्म किसी देवी -देवता में विश्वास और इबादत से कोई ताल्लुक़ नहीं रखता अपितु मानवीय आचार का बयान है ।
इसलिए मैं आपका समर्थन करता हूँ ।वैज्ञानिकता ही हमारा धर्म है जिसे हम प्रचारात्मक धर्मों के मुक़ाबले ज़्यादा जोश ओ जुनून के साथ फैलाएँगे भी ।

बुधवार, 27 मई 2020

जीवन प्रपत्र

अलबत्ता मेरे प्रगतिशील, बुद्धिवादी लोग मुझसे नाराज़ हो जाते हैं, लेकिन मैं अपनी बात कहने से तो बाज़ आऊँगा नही । 
बात यह है कि हमें जीवन के किसी भी क्षेत्र Column को खाली नहीं छोड़ना चाहिए, भले उसमें Nota या N/A, not applicable ही लिखें , लेकिन कुछ दर्ज ज़रूर करें जितनी बुद्धि कहे, जानकारी हो । ऐसा नहीं करेंगे तो  हमारे जीवन का प्रपत्र, Form या Progress Report अधूरा रह जायेगा जो  प्रकृति को acceptible, मान्य न होगा । आप फेल हो जायेंगे।
अब वह क्षेत्र चाहे अपने नाम, पिता का नाम, निवासी, राष्ट्रीयता का हो या फिर आगे जाति धर्म संस्कृति,सम्प्रदाय, राजनीतिक विचारधारा का हो, और इनसे जुड़े तमाम प्रश्न ! अतिरिक्त भी कोई क्षेत्र सड़क बाग जंगल की झाड़ियों से निकाल पकड़कर उस पर अपनी बौद्धिक टाँग लगा देनी चाहिए, जो उचित लगे ।
यदि ऐसा न किया गया, और आपने कोई Field छोड़ दिया, तो उस पर काला कौआ, पैने चोंच वाले गिद्ध, नहीं तो छिपकली, चमगादड़, साँप बिच्छू कॉकरोच ही । और तब आप इनके वहाँ होने का परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिएगा । राजनीति ही नहीं, विज्ञान, अध्यात्म, धर्म देश सबके साथ यही हो रहा है क्योंकि हमने उन्हें उनके भरोसे छोड़ रखा है । अध्यात्म पाखण्ड है, धर्म की क्या ज़रूरत ? जाति कहाँ बची है , और फिर यह भी कि हम तो राजनीति से दूर हैं, बड़ी गंदी जगह है, दूर ही रहेंगे ।

बहरहाल आप विशिष्ट हों तो हों, यह सामान्य मनुष्य की संचेतना है ।👍
(उग्रनाथ)

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

दलित एक्टिविस्ट

मैं मूलतः Dalit Activist हूँ ।
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अब आपको असली बात बताता हूँ ।
दरअसल नास्तिकता की मेरी Policy mature हो गयी है । बार बार मन की कम्पनी से नोटिस मिल रही थी । ADMI (Atheist Democratic Minority of India) Group में सदस्यों की संख्या डेढ़ लाख ? मज़ा आ गया । मोदी की भाषा में मेरा भी वक्ष 56 के करीब है । साथियों को हार्दिक बधाई!💐
पर कोरोना period में मुझे group से physical distancing करनी पड़ी । कोरन्टीन हेतु अपने मूल निवास में आ गया । मैं मूलतः दलित activist हूँ । उन्हीं की दशा और मानवता के अगाध प्रेमवश मैं पक्का, यहाँ तक कि कटु, cantankerous atheist हुआ । मेरा वह मुकाम पक्का हुआ । अब कोई भय नहीं कि मुझे कोई डिगा दे ।
तो Humanism, Radical Humanism के रास्ते, सैद्धांतिक राजनीति में रुचि के नाते खुद को सेक्युलरवाद के काम में संलग्न हो गया  । Secular Register (fb group) । इसमें एक राज्य की हैसियत से सबका ख़्याल रखना पड़ता है । ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है (नास्तिकता में तो उग्रता, उद्दंडता चल जाती थी)!
लेकिन वह, Secularism तो राज्य का विषय है और उसकी बागडोर मेरे हाथ नहीं । तो अपने मूल कार्य क्षेत्र में खेती कर रहा हूँ । (संस्कृति चित्त भूमि की खेती है - - आचार्य नरेंद्र देव)।
और किसी भी मानववादी के कार्य तो जग विख्यात है - विवेकानंद दरिद्र नारायण का नाम बताते हैं, तो गांधी अपने चिंतन में अंतिम व्यक्ति का ध्यान करने को । बस यही मेरा ध्यान, अध्यात्म, मनोयोग है ।
अब बस दो एक बातें clear करनी हैं। बात क्या मनोयुद्ध का लेखा जोखा/ progress report अपने मालिक मित्रों के सामने ।
 सच, लगा तो यह रहा है कि जयभीम हमारा बहुत भला न कर पायेगा, व्यक्ति पूजा पर ठहर जाएगा । दलित आस्तिकता और अंधविश्वास से भी नहीं उबर रहे हैं, न समाजवाद की वैज्ञानिक धारा मार्क्सवाद में उनका नेतृत्व रुचि नहीं लेने दे रहा है, बल्कि उनसे द्वंद्व में है। भले मैं कम्युनिस्टों से झगड़ा कर रहा हूँ कि इन्हें सर्वहारा, prolitariat मानो , लेकिन उनकी भी वाजिब दिक्कत है और दलित वामपंथ के सुयोग्य नहीं बन रहे हैं । फिर भी हम इन्हें साथ तो देंगे ही । तो जयभीम को लालभीम बनाने की चेष्टा है। इन्हें हमारे वामपंथ की ओर लाना तो है । Communism is the only way । तो हमने भी इनके अम्बेडकरी बौद्ध धर्म में strategically आना स्वीकार किया । (कुछ मजबूरन, कुछ मसलहतन)। प्रेम बड़ा adjustment, नमनीयता माँगता है। इसी प्रकार हम इन्हें नास्तिकता और अनास्तिक नैतिकता से परिचित करा सकेंगे, इनके साथ रह, घुलमिलकर, ऐसी उम्मीद है । और साम्य, वाम राजनीति सीखने के लिए इस अदना एकलव्य ने एक मार्क्सवादी कल्पित शिक्षक भी Tuition पर लगा लिया है ☺️। दलितोयवस्की (fb group) ! जिससे शायद इनकी कम्युनिस्ट पार्टी बन सके, या वर्ग संघर्ष में शिरकत कर सकें। उसी में हमारा भी भला है । सोचा यही है , बाकी भूल चूक लेनी देनी ।☺️👍
अब बस । कक्षाएँ चल रही हैं online, जिसके हम आप सभी भागीदार, तालिबे-इल्म हैं (चीन जाना नहीं सम्भव)! ☺️ लालभीमबुद्धायसलाम ! 💐
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-- उग्रनाथ @ CCA, (Communist Culture in India)

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

आय वर्ग

जात पात कुछ नहीं है । कोई अपनी जाति लेकर हरवक्त उसे चाटता नहीं है । फिर, जो रोग सर्वत्र, सबकी खोपड़ी में व्याप्त हो, वह महत्वहीन हो जाती है । सार्वजनिक होकर अपना महत्व खो देती है । "अरे यह किसी न किसी जाति का होगा ही", यह ज्ञान और भावना जातिवाद का असर समाप्त कर देती है । हाँ, जातिवादी लोग इसका कभी कोई खास इस्तेमाल करने के लिए अपनी जेब से निकाल लेते हैं । जैसे वोट फोट माँगते समय ।
वरना सच बात तो यह है, ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि आदमी अपने आय वर्ग से पहचाना है । खानसामा को पंडितजी कहकर बुला भले लें, उसकी इज़्ज़त उतनी ही है जितनी घर में झाड़ू पोंछा करने वाले की ।
सत्य से मुँह न मोड़ो, न हवा में रहो । फ़र्क़ कम ज़्यादा आमदनी वाले के बीच है । आप चाहे कम्युनिस्ट बनो या बनो, आप जानो , लेकिन बराबरी के लिए संघर्ष का और कोई रास्ता नहीं हॉ ।
- - उग्रता @ श्रावस्ती

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कॉकरोच

कल आपको हमने अपने धर्म के बारे में बताया । पाखण्ड नाम है हमारे धर्म का । संस्कारों, त्योहारों की नौटंकी । 😢
तदन्तर अपने भगवान को ढूंढने में लग गया । आखिर कौन है मेरा ईश्वर ? तब तो जिन ढूंढा तिन पाइयाँ ।
आख़िर मिल ही गया मुझे मेरे ईश्वर । हिट spray छिड़ककर आखिरी कॉकरोच को घर से भगाया । तो पकड़ में आ गया । कॉकरोच है मेरे ईश्वर का नाम । ये दोनों मेरे घर में नहीं रहने पाते ।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मेरा क्या

मेरे विचार यदि किसी अन्य, या किन्हीं दूसरों के विचार नहीं बनते तो वह बेकार हैं । हथेली पर लेकर मुझे चाटना थोड़े ही है !😢

मुराद

Democracy, और democracy के साथ साथ साम्यवाद, communism का कैसे तालमेल बिठाऊँ, यह मेरे लिए बहुत बड़ा उलझन का कारण रहा ।
कल युवा मित्र Gaurav Pratap Singh ने अंबेडकर का विचार उद्धृत कर बहुत कुछ/ क्या पूरा रास्ता साफ किया । उनका आभार, अंबेडकर जी के प्रति अनुग्रहीत ।
लोकतंत्र, democracy के आधार मूल्य समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व (बुद्ध के term में मैत्री) को भारतीय भावभूमि में मैंने केवल "मुहब्बत" के शाश्वत गुण से जोड़ एक कार्यस्थल चुना ।:-
"मुराद" : मुहब्बत राजनीतिक दल

कहने की आज़ादी

कुछ कहने की (अभिव्यक्ति की) आज़ादी का तभी कोई मतलब होगा जब अभिव्यक्ति (कथन) को सुना भी जाय ।
यहाँ तो हाल यह है कि क्यों सुनें? इसे तो गीता रामायण ने कहा, इसे तो बुद्ध चार्वाक ने कहा, इसे तो गांधी अंबेडकर ने कहा, मार्क्स लेनिन ने कहा, जीसस मोहम्मद ने कहा ।
फिर कोई मेरी तुम्हारी बात क्यों सुने? Freedom of thought and expression का क्या अचार डालेंगे ? वह आपको क्यों मिले ?

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

आह, अफीम

आज एक राजनीतिक पोस्ट पर विचार करते समय मार्क्स की संदेशना का सूत्र समझ में आया (उनका आशय कुछ भी रहा हो)! कि उन्होंने क्यों धर्म को पीड़ितों की आह कहा ?
मैं अभी मानकर चल रहा हूँ कि राजनीति मनुष्य की मौलिक आवश्यकता है - व्यक्ति समूहों की व्यवस्था के काम और जीवनोपयोगी वस्तुओं, संसाधनऔर सुविधाओं के वितरण, नियमन और संचालन के लिए ।
यहाँ तक तो ठीक, लेकिन समूहों का आकार बढ़ने के साथ अपने ही राज्य (शासक सामंत कुछ भी कह लें) पर भुक्तभोगियों की पकड़ समाप्त (नहीं तो कम) होती गयी । मनुष्य सत्ता के सामने लाचार हो गया ।
तब उसने धर्म की ईजाद की जिसका सदस्य वह सत्ता से अलग रहकर भी हो सकता था । और कसरत, गाने बजाने, चीखने चिल्लाने में मस्त रह सकता था ।
राजनीतिक सत्ता में अपना माकूल स्थान न पाकर वह आह, आह कह बैठा। इसीलिए मार्क्स ने "धर्म" को पीड़ित मनुष्यता की "आह" बताना उचित समझा।
और इसी धर्म को अफीम कहना पड़ा, जिसके प्रभाव में मनुष्य हवास खोकर भूल जाता है कि उसका असली काम,कर्तव्य तो राज्य/व्यवस्था को वैज्ञानिक तरीके से चलाना/चलवाना है ।
(उग्र नागरिक, Radical Humanist)

कोरोना मंदिर

देखिये, क्रोनोलॉजी पकड़िये । बहुत पहले कभी एक निर्जीव वायरस ने मनुष्य के मस्तिष्क पर हमला किया था । तो मनुष्य ने उस अदृश्य अज्ञात को ईश्वर बताकर मंदिर में बैठा दिया । पूजा पाठ आराधना संकीर्त्तन में संलग्न मनुष्य को अब महसूस ही नहीं होता कि यह वही संहारक प्रलयंकारी वायरस है, जिससे संक्रमित होकर अब यह अभ्यस्त, conditioned हो गया है । 👍right?
उसी प्रकार इस नए निर्जीव, अदृश्य महाविनाशक किरोना के समक्ष नतमस्तक होकर इसका मंदिर बना देना चाहिए जिसमें वह पड़ा रहे मुँह पर मास्क लगाकर । अन्यथा तो यह भी सर्वव्यापी की तरह घूमता रहेगा और कहर मचाता रहेगा ।😢

रविवार, 12 अप्रैल 2020

Love International

घृणा को दिल से निकालने के लिए थोड़ा मशक्कत करनी होती है ।
इसी को इस तरह भी कह सकते हैं कि प्रेम मोहब्बत करने के लिए मन की घृणा को थोड़ा/बहुत दबाना, परे हटाना, उससे मुक्ति पाना होता है।
अब उच्छृंखल, आज़ाद ख़्याल लोग लोकतन्त्र और स्वतंत्रता संग्राम का हवाला देकर इस बंधन को गुलामी या पराधीनता की संज्ञा देकर नकारें नहीं, तो यह मनुष्यता के लिए हितकर होगा ।
इस बात को दो एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जाय तो विचार कुछ ठीक से जन मस्तिष्क तक पहुंचे :-
जैसे हम अधिकांश नागरिकों की प्रवृत्ति में शासन सत्ता सरकार के प्रति एक अजीब सा विक्षोभ, कहें तो घृणा उपजी है । तो क्या इसी से हम अपनी नागरिकता को संचालित होने दें ? नहीं, इस मन को मारकर ही हम अनुशासित व्यवहार द्वारा लिख पढ़कर भी सत्ता पर विचार प्रहार कर सकते हैं । सत्ता से अपना प्रेम, अपनी संलग्नता सर्वथा समाप्त तो नहीं कर सकते?
इसी प्रकार बहुलांश हिन्दू के मन में सहजीवी मुस्लिमों के प्रति आधारहीन, विचारहीन, दुष्प्रचार जनित घृणा जमकर व्याप्त हो गयी है (सरकार सम्मिलित)। हो सकता है इनके पास इसके पक्ष में मजबूत कारण हों । हम उसपर बहस विवाद न कर चलो उनका आरोप सही मान लेते हैं । तिस पर भी अपने मन से, चाहे योग ध्यान अध्यात्म पूजा पाठ द्वारा ही, इस घृणा को उन्हें निकालना ही होगा । चलिए इसे हठयोग कह लेते हैं, यह तो भारतीय है? ऐसा हर युग, सनातन से लेकर अब तक किया गया और आगे भी जब तक सृष्टि है तब तक करना ही पड़ेगा । यही धर्म है, धारण करने योग्य । इसी हठयोग, धर्म और अध्यात्म द्वारा मनुष्य से प्रेम करना ही पड़ेगा । इसे बंधन गुलामी न समझें। यह धर्म है, धर्म का अनुशासन है । इससे बंधना ही पड़ता है ।
तो अपनी घृणा से बलपूर्वक, नफ़रत से ज़बरदस्ती छुटकारा लेकर हिन्दू जमात को मुस्लिम जाति/ जनजाति से एकतरफा मोहब्बत की पैदावार करनी ही होगी, अपनी भारतीयता को सिद्ध (caa?) सफल और उच्चतर बनाने की ख़ातिर ।👍
(Love International)

ज़िद्दी

ज़िद्दी जमात (fb group)
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ज़िद्दी जमात: पिद्दी की ज़ात, खुराफ़ात ही खुराफ़ात, एकलव्य वाला पुरुषार्थ- आत्मविश्वास के साथ, डर को दे मात- बाबू उग्रनाथ!

Sense

ABSolute NONsense (fb group)
हँसते हुए महामारी कोरोना, प्रलयंकारी ईश्वर और विकासवादी राज्य का सामना करना।
(मजदूर वर्ग)

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

अकर्म

मैंने काम यह किया कि मैंने कुछ नहीं किया । (अकर्म?☺️)
मैंने अपने परिवार को अपनी ओर मोड़ने की कोई कोशिश नहीं की, बच्चों को कोई दिशानिर्देश नहीं दिया, मित्रों को विचारधारा नहीं पकड़ाई ।
सब उन्होंने अपने मन से अपना काम किया ।
और मेरा काम हो गया, होता गया ।
मैंने कुछ नहीं किया - यही मैंने काम किया ।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

धारणा की स्वतंत्रता

कोई व्यक्ति कोई भी विचार, वाद सिद्धांत कभी भी धारण कर सकता है , इसकी आज़ादी है, होनी ही चाहिए ।
और आगे वह उससे विमत, विरत, असहमत, बल्कि उसका आलोचक और विद्रोही भी हो सके, इसकी स्वतंत्रता भी उसे होनी चाहिये । किसी व्यक्ति या संस्था को उस पर उँगली उठाना नहीं चाहिए । इसी में democracy है, इसी में secularism है ।
- - मित्र नागरिक

फेल सरकार

दुःखद सूचना --
यह कि भारत ने अपनी ऋषिसुलभ आध्यात्मिक ज़िम्मेदारी नहीं निभाई ।
योगी जी ने, कुछ पुजारियों ने और शिवराज जी अवश्य कुछ हिम्मत दिखाई प्रतिबंध परे सार्वजनिक धार्मिक राजनीतिक कार्यक्रम करके । और चर्च के अनुयायी , इस्लाम के प्रचारकों ने तो अवश्य भक्ति दिखाई । लेकिन सरकार ने कोई भारतीय आध्यात्मिक कर्तव्य नहीं पूरा किया ।
थाली तोड़ने, दिया जलाने के आडम्बर के स्थान पर यह गीता, जिसे ये राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने वाले हैं, का तो उध्दरण देकर देश को आश्वस्त कर ही सकते थे ?
मृत्यु अवश्यम्भावी है । आत्मा अजर अमर है । इससे क्या डरना? अवश्य, संवैधानिक वैज्ञानिक दृष्टि से महामारी से सचेत / बचकर रहना तो लौकिक दृष्टि से आवश्यक है । तो मेरे प्यारे देशवासियो, यह - यह वह एहतियात पूरा बरतो, और अपना सामान्य जनजीवन धैर्य निष्ठा और नागरिकता के साथ जियो । हम और पूरे देश की राजकीय, चिकित्सकीय मशीनरी तुम्हारे साथ है । और किन्ही की यदि मौत आ ही जाती है तो शोक न करो और खुशी खुशी स्वीकार करो । हे पार्थ , गीता।की बात सुनो । जीवन का हथियार कमरे में बन्द होकर मत डालो । तुम्हारा क्या था, क्या लेकर आये थे क्या ले जाओगे । अर्जुन कोरोना से इस प्रकार युद्ध करो ।
अन्यथा किस दिन काम आयेंगी ये धर्म की किताबें जिनमें विश्व का सारा ज्ञान विज्ञान सनातन से भरा पड़ा है ? जिनके बल पर अपनी विश्व गुरुता का दावा सीना ठोंककर करते हो ? अपनी पारी आयी तो देश को अंदर करके निकल लिए?
निश्चय ही भारत ने अपनी आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक साहस की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई । इन्हें नम्बर मिले बस दस बटे सौ ।
क्योंकि यदि वायरस पूर्ण समाप्त न हुआ तो क्या साल छः महीने तालाबंदी को खींचना उचित होगा?😢
(गुरुनाथ)

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

धर्म व्यक्तिगत नहीं , राज्य

आप धर्म की बात कर रहे हैं (सेक्युलरवाद के तहत), हम तो राजनीति को भी व्यक्तिगत बनाये हुए हैं । मजबूरन हम राज्य के मामलों में बोल नहीं सकते ।
जबकि विदेशी Secularism की अँग्रेज़ी परिभाषा के अनुसार हमें धर्म को व्यक्तिगत बनाना बताया गया था ।
तो इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अब हम धर्म को  सार्वजनिक मनाये दे रहे हैं, और राज्य को , राज्य की राजनीति को, व्यक्तिगत मान समझ छुपाकर या चुपकर मना ले रहे हैं ।
यह शोध की बात है । secularism के शास्त्रीय विद्यार्थी इस पर चर्चा कर सकते हैं । Secularism and Democracy के इस भारतीय कायापलट पर विश्वविद्यालयों के राजनीति विभाग कृपया इस पर ध्यान दें , यदि उन्होंने secularism के दर्शन को भी व्यक्तिगत न बनाया हो । और वह भी इस syndrome के शिकार न हों कि विदेशी सेक्युलरवाद भारत पर फिट नहीं बैठता, और यह कि इसमें खोट ही खोट है । भला धर्महीन राज्य का क्या मतलब ? etc etc - -  ! रामचन्द्र कहि गए सिया से - - - यही तो ?😢

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

कम्युनिस्ट इसलिए

कम्युनिज़्म इसलिये, क्योंकि सबको सबके साथ रहना है ।
जैसे मेरे ही आसपास, पड़ोसी मित्र और परिजन भी मुझे नापसंद हैं। नालायक हैं और उनसे मेरी बैठती नहीं ? तो क्या करें? साथ तो जीना खाना, उठना बैठना रहना ही है । यह कम्युनिज़्म नहीं तो क्या है? द्वंद्व (तनाव) की वहाँ भी गुंजाइश है । बल्कि विचारधारा का प्रमुख आवश्यक अंग । Dialectical Materialism !
और उदाहरण लीजिये । यूँ कहने का सही समय नहीं है, फिर भी । यदि मुसलमान साम्यवाद अपनाए होते तो क्या धर्म सम्प्रदाय के नाते इतने अपमानित होते ?होते तो उतने, उन्ही के साथ जितने वामपंथी दुत्कारे जाते हैं । पर बचाव और संघर्ष में सब साथ होते ।
यही अवस्था दलित की है । अंबेडकर के नाम पर अलग खिचड़ी पकाते हैं । केवल ब्राह्मणवाद को गाली, जबकि स्वयं हिन्दू हैं । प्रकारांतर हिन्दू को पुष्ट कर रहे हैं, और आक्रामक, जिसका दुष्परिणाम इनके साथ मुसलमानों को भी झेलना पड़ता है ।
और हिन्दू भाई बहन? इनके बारे में कुछ न कहना । इनने अपने कुएँ में भाँग डाल रखी है । जिसे कम्युनिस्ट अफीम कहते हैं ।
(दलितोयवस्की)

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

Two Pages

हमारी उल्टी माया जानते हैं क्या आप ?
हमारे पास दो Pages हैं internet पर, जो नागरिकमुनीजी ने बनाये ।
तो "नागरिक धर्म" (our citizenship is our religion) के माध्यम से हम राजनीतिक कार्य, चिंतन/ लेखन/ अभिव्यक्ति आंदोलन करते हैं । और
नम्बर दो, दुनियावादी दल (secularist party) के ज़रिए धर्म, अध्यात्म, बुद्धिवाद, नास्तिकता, का प्रचार करते हैं ।
क्योंकि हमें तो कोई संदेह नहीं कि धर्म और राजनीति एकमिक्स हैं । इन्हें अलग नहीं किया जा सकता, यह एक बात है, इन्हें अलग किया भी नहीं जाना चाहिए यह समझने की बात है । यदि आपको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दोषपूर्ण विचारधारा से लड़ना है । वह दोनो को एक करके कुएँ में भाँग डालते हैं । तो हमें भी रणनीति के तहत के दवाइयों की पोटली बनाकर पानी साफ करना पड़ेगा ।
तदन्तर, एक और clarification :- हम भारतीय धर्म को सेक्युलर बना रहे हैं, और विदेशी सेक्युलरवाद को भारतीय खाँचे में ढाल रहे हैं ।
और फिर? मियाँ की जूती मियाँ के सर ! ह ह हा☺️👌