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शुक्रवार, 1 मई 2020

Blasphemy

लेकिन धर्म समस्या तो तब बनते हैं जब वह दूसरे धर्मों के प्रति किसी अवधारणा को धारण कर लेते हैं । ( यही इनका मूलाधार ही है। सारे धर्म अपने से पहले के धर्म की Blasphemy पर बने हैं )।
इस्लाम तो खूब बदनाम हुआ काफिरों के प्रति अपने दृष्टिकोण और सम्भवतः कार्यवाहियों के लिए ।
हिन्दू सदियों से चुप रहा , लेकिन अब तो यह भी मुसलमानों के प्रति द्रोही और घृणित अवधारणा और आचरण के लिए विश्वविख्यात हो रहा है ।
अब इसके बाद तो राजनीति का क्षेत्र आ जाता है ।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

बौद्ध

नमो बुद्धाय ! चाहे इसे धार्मिक अभिवादन के रूप में लें, बरक्स जयश्रीराम☺️, अथवा बुद्धिवाद, rational, scientific temper के रूप में । यह हथियार काम आता है/ आ सकता है । बिना हथियार (धर्म) हथियारों (धर्मों) से नहीं लड़ सकते, भले वह नाम, प्रतीक मात्र हो , व्यक्ति समाज का पहचान भर हो । कभी कभी पतली सी लकड़ी संटी भी कुत्तों को भगाने के लिए ज़रूरी होती है । मैं तो हिन्दू हूँ, इसे त्याग कर भी । तो क्या बताऊँ परिचय आपको । Atheist rational, बुद्धिमान हूँ तो बौद्ध मुझे सटीक denote करता है । यही कहता/ कहना चाहता हूँ । कोई ज़रूरी नहीं औपचारिक धर्म परिवर्तन । उसमें दिल कहाँ बदलता है । कोई ज़रूरी नहीं भंते मुझे उपदेश दें । और भारतीय रणनीति - बौद्ध अब प्रकटतः दलित, शोषित निम्न वर्ग का धर्म बन चुका है । क्या इसे राजकीय संरक्षण नहीं मिलना चाहिए? या हमारा समर्थन सहयोग ? क्या प्रबुद्ध जन भूल गए कि हिन्दू बौद्ध इस्लाम कोई भी धर्म धर्म के अतिरिक्त सघन राजनीति भी होते हैं ? तो बोलो साथी किस ओर हो तुम ? अमीरों के या वंचितों के ? यहीं, इसी से तुम्हारा नैतिक, आध्यात्मिक गुरुता का भी परीक्षण हो जायेगा । Yes, धर्म आध्यात्मिक आधार भी देते हैं, सिर्फ कर्मकांड और राजनीति ही नहीं । बुद्ध की विपस्सना एक secular सर्वधर्मिक, भेदभाव रहित उपासना है । भारत को ऐसे बुद्धवाद/, बुद्धिवादी मार्ग की ज़रूरत है ।
लेकिन यह सब उनके लिए है जिनमें कुछ कर्मणा है, जिन्हें कुछ करने की अभीप्सा, नैतिक अनुभूति है । जिन्हें कुछ नहीं करना उनसे क्या मतलब धर्म से, क्या मतलब राज्य से, क्या मतलब पीड़ित मानवता से ? धार्मिकता की छिछली समझ से बस रोली चंदन पोत घण्टा मजीरा बजाते रहें । 
- - उग्रनाथ श्रावस्तिक
(बुद्धवादी साम्यवादी संस्कृति)