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उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017
शुक्रवार, 15 मार्च 2013
मंगलवार, 11 दिसंबर 2012
मेरे ख्यालों में
[Badmesh]
* अब चाहे नैतिकता रहे चाहे जाय , चाहे बुराइयों का पहाड़ ही टूट पड़े , अब औरतें पुनः परदे में नहीं डाली जा सकतीं |
* औरतें कुतिया होती हैं या नहीं , पुरुष तो सारे कुत्ते ही होते हैं |
* जब तक आप बुर्क़ा नहीं लगायेंगे , दुनिया की असलियत नहीं जान पायेंगे |
* जहां तक आपका सवाल है ,
मेरे ख्यालों में एक ख़याल है |
* उधर देश बदमाशों से परेशान रहा इधर पूरे जाड़े भर मैं अपनी पत्नी से त्रस्त रहा | इसे बलात्कार तो कह नहीं सकता क्योंकि मैं सिद्ध नहीं कर पाऊँगा | उन्होंने खूब बनाया अपनी पसंद का मटर का निमोना और बथुए का सगपहिता दाल | ये दोनों पकवान मुझे पसंद नहीं | यह तो कहिये कभी कभी साग और गोभी , कभी आलू मटर टमाटर की रसेदार सब्जी भी बन जाती थी जिसे खाकर मैं यह लिखने के लिए जिंदा हूँ | कृपया मेरी एफ आई आर दर्ज कर ली जाय |
बुधवार, 5 दिसंबर 2012
अमौसी
[ बदमाश चिंतन ]
* रेडीमेड कपडे खरीदने में एक दिक्कत बहुत आती है | यदि थोडा ओवरसाइज़ लो तो कंधे लटकने लगते हैं | और यदि बिल्कुलसाइज़ के लो तो गले का बटन बंद नहीं होता |
* अमौसी | मैं इस चिंतन में था कि लखनऊ का हवाई अड्डा अमौसी में क्यों है ? और मैंने इसका कारण ढूँढ निकाला | क्योंकि मेरी मौसी का घर बालागंज में है, और उसके विपरीत शहर से दूर दूसरे छोर पर हवाई अड्डा है जहाँ मेरी मौसी नहीं रहतीं | इसलिए उसका नाम अमौसी पड़ा |
* पैदल चलना एक भी किलोमीटर नहीं है, और खरीदेंगे खूब बड़े मजबूत तली के वज़नदार ब्रांडेड जूते | नाम नहीं बताऊंगा नहीं तो उसका प्रचार हो जायगा और मुझे कोई पैसा तो मिलना नहीं है !
* दलितों से तो भेदभाव करता ही हूँ , उनमे भी औरतों और मर्दों में फर्क करता हूँ | दलित नर मित्रों के फ़ोन आते हैं तो दो चार बार बजने पर स्वीकार करता हूँ , जब कि दलित नारी मित्रो के फ़ोन घंटी बजने से पहले ही उठा लेता हूँ |
* पुरुषों को चाहे गोली मार दो , सूली पर चढ़ा दो , या उनके अंग - अंग काट कर ज़मीन में गाड़ दो , वह कुत्ते की पूँछ हैं | वह हर हाल में नारी शरीर और आकृति पर आकर्षित होता रहेगा | उनके लिए वह अपनी जान गवाँता रहेगा |
* बुढ़ापे में यह ज़रूर हो जाता है कि हवा खिसकाने में शर्म हया कुछ कम हो जाती है |
शनिवार, 17 नवंबर 2012
हम अत्र कार भी तो हैं
[ गलत बयानी ]
* पत्रकार होने के साथ साथ हम अत्र कार भी तो हैं ! ' अत्र ' माने' - ' यहाँ ' की जिंदगी जैसी जी जानी चाहिए , जीने वाले , जीने की राह बनाने वाले !
* ' असहमति के स्वर ' शासन के खिलाफ बहुत हैं | बहुत आसान भी है यह !
लेकिन दलित - नारी - नक्सल वारी - काश्मीरवादी - बाँध वादी -भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन वादी से असहमति [ संभवतः हो तो ] व्यक्त करके तो दिखाओ |
* दुष्यंत कुमार ग़ज़ल में कहते हैं - कहाँ तो तय था चिरागाँ हर एक बशर के लिए |
लेकिन यह सच कहाँ है ? स्वाधीनता - स्वराज की बात तो थी , लेकिन दुष्यंत की बात कहाँ थी ? किसने ऐसा वादा किया था ? सोचा , सपना भले देखा हो | यह तो उन्होंने अपने मन से जोड़ लिया , और हमारे दिलों में अशांति भर दी | अवश्य इन्होने काम यह किया कि अशांति के कार्यकर्ताओं - संगठनों के हाथ में एक जलती हुई लुकाठी पकड़ा दी | इनकी कवितायेँ देश में असंतोष भरने के बहुत काम आयीं | पात्र - पत्रिकाओं के क्रांतिकारी दिखने में ये बहुत उपयोगी रहीं |
बुधवार, 14 नवंबर 2012
चुप रह नागरिक
[ गलतबयानी ]
* उधर एक केजरीवाल हैं जो रोज़ प्रेस वार्ता में एक बम फोड़ते हैं , तो इधर हमारी नीलाक्षी जी हैं जो रोज़ फेसबुक पर एक धमाका करती हैं |
* दिलीप मंडल नामक एक जीव इस भूमंडल पर अवतरित हुए हैं | जो ब्रह्मा के पारंपरिक चार अंगों से नहीं जन्मे , न पूरी काया से ही पैदा हुए , बल्कि ये ब्रह्मा की चोटी से सीधे पृथ्वी पर उतरे , जिस प्रकार गंगा शिव की जटाओं से | इनमे विद्यमान है धरती और आकाश का सारा ज्ञान- विज्ञानं, सर से पाँव तक ज्ञान ही ज्ञान | स्वागतम , सुस्वागतम !
* ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ' पर नारियों को घोर आपत्ति है | माना जाना चाहिए कि नारियाँ पूजा करने योग्य [थीं या नहीं थीं पर अब ] नहीं हैं | ऐसी दशा में यदि अ-देवताः [ राक्षस या बलात्कारी ] इनके साथ रमते हैं तो किमाश्चर्यम ?
* गोमांस भोज एक अच्छा कार्यक्रम था | एक तो इसमें सामूहिकता की गंध थी | दूसरे, यह सस्ते में निपट भी जाता | सुना है यह अन्य मांसों की तुलना में काफी सस्ता है , इसीलिये गरीब मुसलमान इस पर मुनहसर हैं | तीसरे इस आयोजन से हिंदुस्तान के हमारे पुराने आका अतिप्रसन्न होते , जिन्होंने ब्रिटिश काल से पहले लगभग हज़ार वर्ष हिंदुस्तान पर शासन किया और दलितों की सेवा में तमाम हितकारी काम किया - सब भला ही भला, जिसे ये भुला नहीं पाए | इसी से तो प्रभावित होकर इन्होने अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लडाई में भाग लेना उचित नहीं समझा था | इससे विलग रहे क्योंकि उसमें इन्हें हिन्दू ब्राह्मणों की साजिश नज़र आई |
* कहाँ तो सलाह है कि कुरान की आयतों के सही अर्थ जानने के लिए अरबी भाषा का अच्छा ज्ञान अपेक्षित है | और कहाँ संस्कृत का कुछ भी न जानने वाले यही लोग वेद- पुराण- मनुस्मृति आदि ग्रंथों की प्रामाणिक व्याख्याएँ साधिकार संपन्न किये जाते हैं |
चुप रह नागरिक, इन्हें अपने हँसी- मजाक के कालम में ले |
सोमवार, 12 नवंबर 2012
दिग्विजय सिंह साहित्यकार
एक सशक्त संभ्रांत लेखक ने पूछा है - यदि दिग्विजय सिंह साहित्यकार होते तो क्या करते ? मेरा विनम्र उत्तर है - तब वह केजरीवाल की तुलना राखी सावंत से न करके मैत्रेयी पुष्पा से करते |
मंगलवार, 6 नवंबर 2012
गलत बयानी
[ गलत बयानी ]
* शादी से कुछ हासिल नहीं होता | बस यह होता है कि नारी तन - मन का थोड़ा निकट से ज्ञान हो जाता है |
* दूध सचमुच मांसाहार है | इसे बिल्ली उसी चाव से पीती है , जिस चाव से वह चूहे खाती है |
* ब्राह्मण है तो वह वैसा होगा ही , यह जातिवाद की शुरुआत है | और आंबेडकर ही एकमात्र विचारक और नेता थे , यह जातिवाद का अंत |
* मार्क्स न होते तो मार्क्सवादी विचारक , बेचारे दो कौड़ी के होते |
* मैं सोच रहा हूँ कि मुझे किसी को डराना नहीं चाहिए , उलझाना भी नहीं चाहिए | ऐसी शब्दावली नहीं लिखनी चाहिए , जो उन्हें समझ में न आये |
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
लैपटॉप का विन्डोज़ ' करप्ट '
[ व्यक्तिगत ]
करप्शन के खिलाफ बड़ा आन्दोलन चल रहा है , लेकिन मेरे लैपटॉप का विन्डोज़ ' करप्ट ' हो गया उसकी चिंता किसी को नहीं है , न कोई उसे रोक पाया | कैसे मिटेगा भ्रष्टाचार ? अब मैं गाँव जा रह हूँ , कैसे बातें हो पाएंगी मित्रो से ? वे मेरे बिना कैसे रह पाएंगे ? यह दुनिया कैसे चल पायेगी मेरे निर्देश के बगैर ? और तो और , अब तो उसका ' हार्ड डिस्क ' ही ख़राब हो गया | ' निष्ठुर ' नहीं रह गया | कहें कि चलो अच्छा ही हुआ ? तो मित्रो , अलविदा | अब संपर्क तभी बनेगा जब लखनऊ आऊंगा , रहूँगा | अब मैं आपका प्रेम -संपर्क अपनी 'गोद' में लेकर फिर नहीं सकूँगा |
मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012
दमादम मस्त कलंदर
कोई प्रगतिशील कवि क्या इस विषय पर भी कविता लिख सकता है ? यथा , हे जानवर ! भेंड , बकरा , ऊँट या तुम्बा ! तुम्हे तो कुर्बान होना ही है अल्लाह की राह में - हजरत इब्राहीम के हाथों , बेटे हजरत इस्माइल की जान बचाने की खातिर | या इसी प्रकार कुछ - - -
नहीं , कोई नहीं लिखेगा | यह कोई हिन्दू सीता , शम्बूक , एकलव्य , पन्ना दाई का मामला नहीं है , जिस पर कलम चलाते इनके हाथ नहीं थकते ?
PS - मैं कुछ गानों की सूची बना रहा था , इस प्रश्न के साथ कि क्या ऐसी कविताएँ भी वामपंथी साहित्यकार लिख सकते हैं ?
* दमादममस्त कलंदर / छाप तिलक - - [ खुसरो ]
* सूली ऊपर सेज पिया की - - - [ मीरा ]
* लगता नहीं है दिल मेरा - - [ ग़ालिब ]
* सरकाय लाओ खटिया / आरा हीले छपरा हीले - - [ लोक गान ]
सूची अधूरी है , फिर भी पोस्ट कर रहा हूँ |
नया नज़रिया
तरक्की को चाहिए नया नजरिया,
यथा -
कैसे अखबार बिके ,
कैसे बाज़ार बढ़े ?
बाज़ार में सामान बिके ,
बाज़ार का व्यापर बढ़े ?
कैसे मिले विज्ञापन ?
कैसे इनामी कूपनों द्वारा
पाठकों की जेब कटे ?
चाहे वह जो भी पढ़े ,
चाहे बिलकुल न पढ़े |
कैसे बाज़ार चढ़े ?
तरकी को चाहिए -
नया नज़रिया |
सोमवार, 22 अक्टूबर 2012
चीन देश की यात्रा
अनुमान किया जा सकता है कि जितने सारे लोग ज्ञान प्राप्त करने चीन देश की यात्रा पर गए , वे सब के सब अपना अर्जित एवं पारंपरिक ज्ञान भी , वहीँ छोड़कर स्वयं खाली हाथ लौट आये | तभी टी चीन इतना ज्ञानी है और शेष दुनिया अज्ञानी ?
रविवार, 21 अक्टूबर 2012
आजीवन कुवाँरे
कविता -
* उनका मन हुआ
तो इनका मन नहीं हुआ ,
इनका मन हुआ
तो उनका मन नहीं हुआ ;
दोनों आजीवन
कुवाँरे रह गए ।
# #
* उनका मन हुआ
तो इनका मन नहीं हुआ ,
इनका मन हुआ
तो उनका मन नहीं हुआ ;
दोनों आजीवन
कुवाँरे रह गए ।
# #
मार्क्सवाद की महानता
Badmesh - Ravana , a राइजिंग :- On मार्क्सवाद की महानता ।
कम्युनिज्म को मैं तदर्थ राम के समान सर्वव्यापी , सर्वसमर्थ और हर बात का समाधान - उत्तर मानकर , जैसा कि माना जाता है , मान कर यह लिख रहा हूँ ।
मैं इस बारे में प्रयासरत था , चिंतित होने की हद तक , कि आखिर ऐसा क्या कारण है , क्या बात है इसमें , जो मार्क्सवाद लगभग सभी पढ़े - लिखे को पागल बनाये हुए है , या नहीं तो इतना प्रभावित किये है कि भले उसका वजूद कहीं नहीं है , भले कोई उसका एक तिनका भी नहीं पालन करता , न संपत्ति छोड़ता है न पत्नी , न समूह में रहने के आवश्यक त्याग करता है , फिर भी इस दर्शन के पीछे , कम से कम सार्वजानिक वोकल रूप से तो दीवाना है ही ? मित्र तो तमाम ऐसे हैं जिनसे जानकारियां मिलती रहती हैं और वे अपना हर काम व्यवस्था परिवर्तन होने तक स्थगित किये हुए हैं [वहाँ व्यक्ति के व्यक्तिगत की कोई गुंजाइश नहीं है] , लेकिन एक मित्र की सलाह पर माओ के पांच निबंधों वाली किताब भी ले आया । एक ही अध्याय के बाद इस नवरात्रि में मेरे भीतर रावण का उदय होने लगा और कुछ सूत्र हाथ आने लगे ।
मुझे अहसास होता है कि यदि हर छोटे बड़े विचार को किसी वाद का नाम दे दिया जाय , और यह कह दिया जाय कि इससे पहले इसे किसी ने नहीं सोचा . नहीं कहा , तो भला किस माई के लाल में साहस है जो उस वाद को नकार दे , या उसे मान न ले ? जैसे यदि मैं कहूँ कि गरीबी अभिशाप है , संपत्ति सारी बुराई की जड़ , शोषण का माध्यम है , या ज्ञान के लिए आदमी का विनम्र और निर - अहंकारी होना आवश्यक है , या पहले हमारे परदादा हुए फिर दादा फिर पिता जी पैदा हुए फिर उनसे हम जन्मे और हमारे बाद हमारा पुत्र और फिर पोता -पोती पैदा होंगें , तो भला इससे कौन इनकार कर देगा ? और यदि मैं यह सार्वजानिक रूप से ऐलान कर दूँ कि " जीवन एक सतत संघर्ष , एक युद्ध है " तो इसे कौन नहीं मानेगा ? भले मैं कह दूँ कि यह नागरिक द्वंद्व वाद है , [ ठीक उसी प्रकार जैसे कोई वस्तु ऊपर से गिराने पर नीचे धरती की ओर गिरेगी ' को न्यूटन वाद कहा जाय ] तो क्यों नहीं मानेंगे लोग ? लेकिन मैं आप को निराश करना चाहता हूँ । मैं आपको यह कहकर नहीं देने वाला कि इसके पहले इस बात को किसी ने नहीं कहा। कितने आये कहने वाले , कितने आये सुनने वाले ! जो ऐसा कहते हैं वे बड़े नाम हैं । और विचार एवं साहित्य जगत से परिचित लोग जानते हैं कि वहाँ नाम चलता है । मैं माओ की विनम्रता से ही कहता हूँ कि ये विचार मुझसे पहले कई लोग दे चुके हैं । मेरे विचारों में कुछ भी नया नहीं है । जीवन प्राचीन काल से चल रहा है । किसी ने कुछ कहा हो या नहीं बिना इन्हें जाने तो सभ्यता आगे बढ़ी न होगी ? और यह भी कि विचारों का इतिहास भी अपने आप को दुहराता है । यही चक्र प्रणाली है । इसका आदि भी अंत है और हर अंत एक आदि । इसीलिये मैं विचारधारा के अंत का कभी समर्थक न हुआ , मार्क्सवादी न होते हुए भी ।
लेकिन मार्क्सवाद यही कहता है । वह प्रत्येक ज्ञान को अपने वाद से जोड़ता है और कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं जो इस वाद से अछूता हो । इसलिए यह विशिष्ट है कि साधारण बात को भी यह इतनी दम ख़म से जटिल बनाकर कहता है कि बुद्धि चकरा जाय । फिर तो अपने को ज्ञानी बताने के लिए मेरे लिए यह कहना आवश्यक हो जाता है कि हाँ मैंने मार्क्सवाद को समझ लिया है , उसे जान लिया है और मैं मार्क्सवादी हूँ । भला ज्ञान विज्ञानं के क्षेत्र में मैं पीछे रहना अथवा दिखना क्योंकर चाहूँगा ? यह मेरा छद्म है और छद्म के सिवा कुछ नहीं , क्योंकि मैं वस्तुतः कुछ नहीं जानता , मार्क्सवाद तो बहुत ऊँची बात है इसलिए दूर की ।
या देवी सर्वभूतेषु मार्क्सवाद रूपेण संस्थिता ,
नमस्त्स्ते नमस्त्स्ते नमस्त्स्ते नमो नमः ।
शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
अंग्रेजी दवाखाना
Fishing an Idea :-
हिंदी छाँडि अंग्रेज़ी ध्यावो | - अंग्रेजी दवाखाना |
जिस प्रकार अंग्रेजी दवाखाना होता है | जिसका मतलब होता है - आधुनिक , वैज्ञानिक दवाओं की दूकान | दूसरी और अन्य देसी यूनानी , आयुर्वेदिक , होमियोपैथिक , और नीम हकीम दवाखाने होते हैं , जिनका आशय होता अवैज्ञानिक और दकियानूस - पारंपरिक आदि | जैसे हर कोई हार थक कर अंततः आधुनिक अंग्रेजी इलाज के ही शरण में जाता है [ रामदेव भी गए थे, सांस्कृतिक अटल जी ने भी घुटनों का इसी प्रकार इलाज कराया ] , उसी प्रकार सारे सड़े गले , पुराने दकियानूसी , पारंपरिक अर्थात हिंदी धर्मों को छोड़कर आधुनिक अंग्रेजी धर्म अपनाने का आइडिया निकाल रहा हूँ | अब धर्मों का वर्गीकरण भी इन्ही दो नामों में कर दिया जाय जिससे इन्हें समझने , संदर्भित करने में सुविधा हो | हिंदी [ देसी ] धर्मों के अंतर्गत हिन्दू - मुस्लिम - सिख - और कठमुल्ले ईसाई रखे जाएँ | और अंग्रेज़ी धर्म के तहत सेक्युलर , नास्तिक , तर्कशील , प्रगतिशील विचारों को रखा जाय | और हाँ , मार्क्स वाद , लेनिनवाद , माओवाद तो मैं छोड़ ही गया | उन्हें भी अंग्रेज़ी धर्म में रखा जाय |
देवी - देवताओं की इज्ज़त
आदमी को चाहिए कि यदि वह अपने भगवान् और देवी - देवताओं की इज्ज़त सचमुच बचाना चाहते हैं तो उनके नामों पर अपने , अपने बच्चों के नाम न रखायें | क्योंकि इसे स्पष्ट देखा जा सकता है कि लोग जब मनुष्यों को उनके नाम लेकर गाली देते हैं , और देते ही हैं , तो वह प्रकारांतर से ईश्वर और देवी देवता के लिए अपमान स्वरुप हो जाता है | कोई कहता है - ई साले हरामजादे किसनवा / राम लखना / संकरवा / इन्द्र देवुवा का देखो कैसा इठलाता है चोर कहीं का ! तो कोई कहतीं हैं - ई परबतिया तो छोनार निकर गयी | तो क्या होता है परोक्षतः ? अतः सबको सेक्युलर नाम रखने ही श्रेयस्कर है |
सैफ - करीना की शादी
अब कुछ बेफ़िज़ूल की भी बात हो जाय |
कल मित्र जी चिंतित थे कि दारुल उलूम ने सैफ - करीना की शादी को अमान्य कर दिया | अब चिल्लाये होत का जब फतवा उड़ा अकास | जब मैं कहता हूँ , और यह अख़बारों की भी भाषा है कि यह ' समुदाय विशेष ' है , तब तो मानते नहीं ! खैर उसे छोडिये क्योंकि उनके तरफदार हर हॉउस , हर ग्रुप में उनकी अपनी कुल जनसँख्या से भी ज्यादा है | फिर भी , इस पर दो तीन बातें उठती हैं | एक तो यह कि यदि अपना भी कोई " दारुल इंसान " जैसा संगठन होता और उसके मौलाना संदीप बाबू होते तो क्या वह आवाज़ न उठाते कि कामन सिविल कोड के तहत यह विवाह जायज़ है | तब तो वह चाहते तो हर सजातीय विवाह पर यह फतवा जारी कर सकते थे कि वह विवाह अवैध है और इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए | ऐसी उनकी आकांक्षा भी यत्र तत्र प्रकट हुई है | लेकिन नहीं , इसी आशय का जब मैंने समूह मनाया 'सेक्युलर नागरिक ' यानि वैकल्पिक धर्म का , तब किसी ने ध्यान नहीं दिया | दर असल मेरे जैसे महान दार्शनिक को कोई तरजीह ही नहीं दे रहा है | लेकिन इसका दोष उन पर नहीं है | अपनी इस अवस्था के लिए मैं स्वयं ज़िम्मेदार हूँ | क्योंकि मैं सौ साल आगे की बात करता हूँ , और ज़ाहिर है सब अपने समय को जी रहे हैं | तो कैसे समझें मेरी बात | उलटे मुझे हतोत्साहित करते हैं | मुझे क्या है , उनकी मौलाना की गद्दी खुद ही छूट जायगी |
दूसरी बात | यदि सैफ - करीना मेरे बदमाश चिंतन का अनुसरण करते तो उन्हें चाहिए था कि वे किसी डमी दूल्हा / दुल्हन से वैध - सामाजिक विवाह करते | सैफ किसी मुस्लिम लडकी से और करीना अपनी जाति के लड़के से | वे तो इतने समृद्ध हैं कि वे तो अपने लिए दूल्हा / दुल्हन खरीद भी सकते थे | किसी को कोई आपत्ति न होती | दारुल उलूम भी मस्त - खुश होता | अब ये बड़े आराम से बिस्तर सम्बन्ध बनाते और अंतर धार्मिक बच्चे पैदा करते | हाथी के दांत दिखाने के और , खाने के और होते | धर्मों को अंगूठा दिखा कर कहते - ले , तू डाल डाल , तो हम पात पात | प्रगति की उपलब्धि यह होती किउनकी संतानें जींस , डी एन ए के अनुसार वस्तुतः तो अंतरजातीय होते | जिस वंश - कुल की शुद्धता का ढिंढोरा पीता जाता है , वह तो विनष्ट होता ! होगा तो अब भी पर चीख पुकार के साथ | फिर ऐसा करने का साहस हर जोड़ा तो कर नहीं सकता | जब कि मेरा फार्मूला सार्वजनिक है और उसे कोई भी अपना सकता है - चोरी छुपे , लुका छिपे तो राम को भी बाली को मारना पड़ा था , और शिखंडी को समक्ष करके भीष्म को भी मारा गया था |
अब तीसरी बात | थोड़ी गंभीर हो जायगी इसलिए कहने से डरता हूँ | मूर्खता तो नहीं कहूँगा , विडम्बना की हद देखिये धर्मों की | कि करीना यदि कुछ शब्द उच्चारण कर दे तो वह मुसलमान हो जायेगी , भले उसका आचरण कितना भी गैर इस्लामी हो | और यदि वह कलमा नहीं पढ़ती है तो मुसलमान नहीं हो सकती , भले उसका व्यवहार कितना भी इस्लामी हो | बस आमीन , अब आगे नहीं बोलूँगा |
बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
अंतरजातीय बच्चे
एक विचार बहुत प्रचलित है कि जातिवाद समाप्त करने का एकमात्र उपाय है अंतरजातीय विवाह | और स्वजातीय विवाहों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए | इस पर मुझे एक बदमाश चिन्तन सूझ रहा है | अन्यथा न लें तो बढ़िया , अन्यथा लें तो घटिया हास्य विचार है यह | स्वजातीय विवाहों का बहिष्कार करने से तो हमें हिंदुस्तान ही छोड़ देना पड़ेगा | इससे अच्छा ख्याल यह होना चाहिए कि आखिर शादी के बाद बच्चे ही तो पैदा होंगे ? तो शादी हो न हो , अंतरजातीय बच्चे तो पैदा हों | ऐसी कोशिश जाति उन्मूलक सामाजिक कार्य कर्ताओं को करनी चाहिए | अंतरजातीय बच्चे समतामूलक समाज के अमूल्य निधि साबित होंगे | उनसे अप्रकट अंतरजातीय बापों को भी प्रेम और लगाव होगा | समाज में सद्भावना का विकास होगा , रूढ़ियाँ टूटेंगी | बहुत बड़ा काम होगा |
किसी ब्राह्मण के मुख से अंतरजातीय स्वीकारोक्ति की बात कहलाइए तो मज़ा आ जाये | [ इसीलिये मैं दलित आन्दोलन को ब्राह्मणों को साथ रखने की सलाह देता हूँ , भीष्म से ही पूछो उनके प्राणांत का मार्ग] | यदि वह सामान गोत्र में विवाह की मनाही कर सकता है , तो सामान जाति में भी विवाह प्रतिबंधित कर सकता है [ थोडा अतिरिक्त दक्षिणा मिल जाय तो ] | वह यदि समान जाति के विवाह कराने जायगा ही नहीं तो सजातीय विवाह कैसे होंगे ? सजातीय जोड़े तब कोर्ट मैरेज की शरण लेंगे और वैध , सामाजिक रूप से मान्य और प्रतिष्ठित होंगी अंतरजातीय शादियाँ | भैया संदीप राजा बजायेंगे बाजा |
चलिए , वह [ Saif weds kareena ] तो अंतर्धार्मिक विवाह कि समस्या है | हम लोग हिन्दू धर्म के अंतर्गत सजातीय /अंतरजातीय विवाह के चिंता में हैं |
तो मेरे उपरोक्त प्रस्ताव - विचार को इस लय - ताल में सोचिये :-
" मेरा विवाह सजातीय हुआ , मेरे रिश्तेदार सजातीय हैं इस पर मेरा कोई वश नहीं था , लेकिन मैं अपने बच्चों को सजातीय नहीं पैदा होने दूँगा यह मेरे वश में है | "
अब ' नागरिक ' कोई बड़ा नाम नहीं है इसलिए आप लोग इस विचार की महानता को स्वीकार नहीं कर रहे हैं | वरना मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा देते | कोई बात नहीं पर यह तो मानिये कि विवाह एक ओपन सेरीमनी है [ पाखण्ड ही सही ] | इसे अंतरजातीय बनाने में कई अडचनें हैं , एतराज़ है | तो अनावश्यक झगडा क्यों मोल लें समाज से ? इसे , जैसे यह हो रहा है होने दें [ जब तक ऐसा होने से रोक न पायें ] | लेकिन गर्भाधान और प्रजनन तो गोपनीय , आंडे में करने के काम हैं | उसे अपनी प्रगतिशील , सद्बुद्धि से संपन्न करें | पति पत्नी मान लें कि उन्हें अंतरजातीय बच्चे पैदा करने हैं | तो करें न ! कौन देखने आता है ? " जन्म से " कोई निम्न / श्रेष्ठ होता है यह भ्रम तो टूटेगा , जब बाद में यह पता चलेगा कि संतान तो जैविक रूप से कुजात है , फिर भी जैसा है वैसा है | धीरे धीरे यह कार्यक्रम लीक होगा , और फिर समाज इसे स्वीकार कर लेगा , और आगे चलकर अंतरजातीय विवाहों के लिए सरल मार्ग प्रशस्त हो जायगा | जातियों की श्रेष्ठता का कोई सम्बन्ध जींस से नहीं है , यह तो सिद्ध होगा | प्रगतिशील तबका यह तरीका भी अपना सकता है कि स्वस्थ , उत्तम वीर्य का संग्रहालय बनाये , जाति- निरपेक्ष | फिर उनका इस्तेमाल अपनी पत्नियों के गर्भाधान के लिए आवश्यकतानुसार करे | इससे भी जातीय भेदभाव का भ्रम टूटेगा और संतान भी उत्कृष्ट गुणवत्ता के होंगे | यह वैज्ञानिक सोच है | यह विचार आगे शोध माँगता है और क्रांतिकारियों की स्वीकृति | क्योंकि आगे मशाल लेकर तो उन्हें ही चलना है , शुरुआत उन्हें ही करनी है |
तब तक एक प्लान और है सवर्ण / पिछड़े दलितवादियों के लिए | उनके लिए अनिवार्य हो कि वे अपने घरों के विवाह दलितों में ही करें | सिर्फ बातें न करें |
किसी ब्राह्मण के मुख से अंतरजातीय स्वीकारोक्ति की बात कहलाइए तो मज़ा आ जाये | [ इसीलिये मैं दलित आन्दोलन को ब्राह्मणों को साथ रखने की सलाह देता हूँ , भीष्म से ही पूछो उनके प्राणांत का मार्ग] | यदि वह सामान गोत्र में विवाह की मनाही कर सकता है , तो सामान जाति में भी विवाह प्रतिबंधित कर सकता है [ थोडा अतिरिक्त दक्षिणा मिल जाय तो ] | वह यदि समान जाति के विवाह कराने जायगा ही नहीं तो सजातीय विवाह कैसे होंगे ? सजातीय जोड़े तब कोर्ट मैरेज की शरण लेंगे और वैध , सामाजिक रूप से मान्य और प्रतिष्ठित होंगी अंतरजातीय शादियाँ | भैया संदीप राजा बजायेंगे बाजा |
चलिए , वह [ Saif weds kareena ] तो अंतर्धार्मिक विवाह कि समस्या है | हम लोग हिन्दू धर्म के अंतर्गत सजातीय /अंतरजातीय विवाह के चिंता में हैं |
तो मेरे उपरोक्त प्रस्ताव - विचार को इस लय - ताल में सोचिये :-
" मेरा विवाह सजातीय हुआ , मेरे रिश्तेदार सजातीय हैं इस पर मेरा कोई वश नहीं था , लेकिन मैं अपने बच्चों को सजातीय नहीं पैदा होने दूँगा यह मेरे वश में है | "
अब ' नागरिक ' कोई बड़ा नाम नहीं है इसलिए आप लोग इस विचार की महानता को स्वीकार नहीं कर रहे हैं | वरना मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा देते | कोई बात नहीं पर यह तो मानिये कि विवाह एक ओपन सेरीमनी है [ पाखण्ड ही सही ] | इसे अंतरजातीय बनाने में कई अडचनें हैं , एतराज़ है | तो अनावश्यक झगडा क्यों मोल लें समाज से ? इसे , जैसे यह हो रहा है होने दें [ जब तक ऐसा होने से रोक न पायें ] | लेकिन गर्भाधान और प्रजनन तो गोपनीय , आंडे में करने के काम हैं | उसे अपनी प्रगतिशील , सद्बुद्धि से संपन्न करें | पति पत्नी मान लें कि उन्हें अंतरजातीय बच्चे पैदा करने हैं | तो करें न ! कौन देखने आता है ? " जन्म से " कोई निम्न / श्रेष्ठ होता है यह भ्रम तो टूटेगा , जब बाद में यह पता चलेगा कि संतान तो जैविक रूप से कुजात है , फिर भी जैसा है वैसा है | धीरे धीरे यह कार्यक्रम लीक होगा , और फिर समाज इसे स्वीकार कर लेगा , और आगे चलकर अंतरजातीय विवाहों के लिए सरल मार्ग प्रशस्त हो जायगा | जातियों की श्रेष्ठता का कोई सम्बन्ध जींस से नहीं है , यह तो सिद्ध होगा | प्रगतिशील तबका यह तरीका भी अपना सकता है कि स्वस्थ , उत्तम वीर्य का संग्रहालय बनाये , जाति- निरपेक्ष | फिर उनका इस्तेमाल अपनी पत्नियों के गर्भाधान के लिए आवश्यकतानुसार करे | इससे भी जातीय भेदभाव का भ्रम टूटेगा और संतान भी उत्कृष्ट गुणवत्ता के होंगे | यह वैज्ञानिक सोच है | यह विचार आगे शोध माँगता है और क्रांतिकारियों की स्वीकृति | क्योंकि आगे मशाल लेकर तो उन्हें ही चलना है , शुरुआत उन्हें ही करनी है |
तब तक एक प्लान और है सवर्ण / पिछड़े दलितवादियों के लिए | उनके लिए अनिवार्य हो कि वे अपने घरों के विवाह दलितों में ही करें | सिर्फ बातें न करें |
रविवार, 7 अक्टूबर 2012
पर्याप्त शिक्षित
पर्याप्त शिक्षित -
यदि आप गाँधी को गाली देना जान गए हैं , तुलसी रामायण के पन्ने फाड़ सकते है , तो आप पर्याप्त शिक्षित हैं | अब आपको आगे कुछ भी पढ़ने लिखने की ज़हमत उठाने की ज़रुरत नहीं है | आरक्षण से कुछ न कुछ उपलब्ध हो ही जायगा और आप बड़ी आसानी से दलित नेता बन जायेंगे |
शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
वह समय अच्छा था
वह समय अच्छा था जब शोषण था , अत्याचार था | आदमी बंधन में था , उच्छृंखल न था , अराजकता न थी | सब कुछ ठीक था , प्रशांति थी | [ अन्यथा सोच ]
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