* गौर कीजिये कि अन्ना टीम में बहुत बड़े बड़े लोग हैं , इलीट क्लास के । बिल्कुल ब्राह्मण जैसे । और ये सरकार को दबा कुचल कर अपनी बात मनवाना , अपना काम करवाना चाहते हैं । सरकार इस समय बिल्कुल दलितों की अवस्था और स्थिति में हैं । अब आप सोचिये कि हम लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?
* मैं तो यह देख रहा हूँ कि जन लोक पाल बिल पास होने से पहले यदि मेरे द्वारा प्रस्तावित RDHS= Right to die of hunger strike [भूभ हड़ताल द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने या मरने का अधिकार] सम्बन्धी बिल संसद में पारित नहीं हो जाता , तब तक भ्रष्टाचार तो कैसे भी समाप्त नहीं होगा , यह आन्दोलन रुपी सामाजिक भ्रष्टाचार तो समाप्त नहीं होगा ।
* लोग कैसी कैसी गलतफहमियों में जीते हैं ! कि सरकार हो भ्रष्टाचार न हो ! जहाँ चार आदमी हों वहां स्वार्थ न हों , समाज हो और स्वार्थों का टकराव न हो ! तो भ्रष्टाचारियों का तो निश्चय ही एक स्वार्थ हो सकता है , होगा ही । लेकिन आन्दोलन कारियों का भी एक प्रति स्वार्थ अवश्य है , इसे ठीक से समझा जाना चाहिए । यह अकारण नहीं है कि तथाकथित गाँधीवादी संत अन्ना महाशय अपनी टीम का आँख मूँद कर समर्थन कर रहे हैं । #
उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
रविवार, 30 अक्टूबर 2011
शर्म , मगर नहीं आती
* बड़ा शोर है कि सरकार अन्ना टीम को परेशान कर रही है । ज़रूर सच्चाई होगी इसमें । सरकार तो वह करेगी ही जो उसका चरित्र है , और लिसके लिए वह बदनाम है । पर आप को क्या हो गया है ? क्या आपको यह पता नहीं था कि सरकार यह सब करेगी ? इसके लिए तो आपको तैयार रहना चाहिए था । कमसे कम नहा ढो कर , धुले कपड़े तो पहन ही लेना चाहिए था ! अब आप एक दिन नौकरी नहीं करेंगे और पैसा खा ले जायेंगे तो यह कैसे उम्मीद मारेंगे कि सरकार चुप रहेगी ? किरण ने स्वयं अपनी कलाकृति स्वीकार की और पैसे वापस करने का प्रस्ताव किया । कविवर महाशय स्कूल पढ़ाने नहीं जाते , इसमें झूठ क्या है ? आप लोग यह क्यों भूल रहे हैं कि शासन - प्रशासन की ऐसी ही अक्षमताओं का नतीजा जनता भुगतती है , जिसे आप ही भ्रष्टाचार कहते हो । सर्विस डेलिवरी को आप ही पुख्ता करना चाहते थे न अन्ना ! तब तो बड़ी जोर शोर से बोल रहे थे , समय बद्ध कम निपटा रहे थे जनता का ! लगा दीजिये अपनी टीम को और देखिये । कहना बहुत अच्छा लगता है , पर करना पड़े तो - - । सामान्य कर्मचारी भी केजरी -बेदी - कुमार - प्रशांत से कम कर्म निष्ठ और ज्यादा बेईमान नहीं हैं , जैसा तुम समझते हो । तुम अपने टीम की वकालत कर रहे हो , यह तुम्हारे नहीं , आन्दोलन के भी नहीं , गाँधी के भी नहीं , हमारे और पूरे देश के लिए शर्म की बात है । शर्मिंदा हैं हम की एक शुभ आन्दोलन का नेता अन्ना एक छुद्र आचरण पर उतारू है । #
शाश्वत भ्रम
* अन्ना टीम एक शाश्वत भ्रमित लोगों का एकजुटन है । कुमार विश्वास कहते है कि यह सौ करोड़ जनता का कोर कमेटी बने । कैसे हो सकता है यह ? क्या उन्हें मालूम नहीं कि ऐसी ही वास्तविक कोरे कमेटी तो सरकार का मंत्रिमंडल है जिसे जनता पूरे देश से चुन कर भेजती - बनाती है , और उसी से वे पंगा लिए हुए हैं । देश की कोर कमेटी में शामिल होना हो तो चुनाव में उतरो । अब तुम इस सुख को बिना चुनाव लड़े भोगना चाहते हो तो और बात है । #
* बड़ी आसानी से समझा जा सकता है की टीम क्या चाहती है । भ्रष्टाचार विरोध उसकी दिली आकांछा नहीं है , यह तो तय है । जैसे इंदिरा गाँधी का गरीबी हटाओ का नारा गरीबी हटाने के लिए नहीं था । सीधा सा खेल राजनीतिक खिलवाड़ का है । यह टीम जन लोकपाल बिल के बहाने अपने को एक समानांतर सरकार के रूप में प्रतिष्टित करना चाहती है । अभी लोकपाल है , फिर वह हर मसले पर दबाव डालकर अपनी बातें ही मनवाने का स्वरुप धरेगी , अपना राज भारतीय राज्य पर चलाएगी , या इसकी कोशिश करेगी । इसलिए भूषण के बयान को अनदेखा नहीं किया जा सकता , क्योंकि इससे हमें इनकी भावी राजनीति की झलक मिलती है । न ही केजरी, बेदी , कुमार विश्वास के ,अनियमितता ही सही , व्यवहारों को यूँ नज़रंदाज़ किया जा सकता है ।
* बड़ी आसानी से समझा जा सकता है की टीम क्या चाहती है । भ्रष्टाचार विरोध उसकी दिली आकांछा नहीं है , यह तो तय है । जैसे इंदिरा गाँधी का गरीबी हटाओ का नारा गरीबी हटाने के लिए नहीं था । सीधा सा खेल राजनीतिक खिलवाड़ का है । यह टीम जन लोकपाल बिल के बहाने अपने को एक समानांतर सरकार के रूप में प्रतिष्टित करना चाहती है । अभी लोकपाल है , फिर वह हर मसले पर दबाव डालकर अपनी बातें ही मनवाने का स्वरुप धरेगी , अपना राज भारतीय राज्य पर चलाएगी , या इसकी कोशिश करेगी । इसलिए भूषण के बयान को अनदेखा नहीं किया जा सकता , क्योंकि इससे हमें इनकी भावी राजनीति की झलक मिलती है । न ही केजरी, बेदी , कुमार विश्वास के ,अनियमितता ही सही , व्यवहारों को यूँ नज़रंदाज़ किया जा सकता है ।
बेदाग़ लोकपाल
* बताया गया है कि अन्ना टीम की जन लोकपाल बिल के अनुसार बेदाग और अच्छी , ईमानदार छवि वालों की कोई कमेटी एक सर्व शक्तिमान लोकपाल की नियुक्ति करेगी । पता नहीं वह कमेटी अन्ना टीम के सदस्यों की तरह ही बेदाग होगी ,या उससे कुछ कम , या उससे कुछ ज्यादा ईमानदार होगी ? यह तो भविष्य ही बताएगा , पर अभी तो भविष्य अंधकारमय नज़र आ रहा है । क्या हम अन्ना टीम जैसी कमेटी , और इन्ही में से किसी को लोकपाल के रूप में सहन कर पाएंगे ? उस लोकपाल के अधीन प्रधान मंत्री क्या कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग बताने का साहस कर पाएगा ? अभी जैसे सी ए जी अपनी सीमा लांघना चाहता है , क्या पता लोकपाल भी यदि सीमा लांघ जाय , और सारी ताक़त उसके पास हो , तो कल्पना करें कैसा अनर्थ हो सकता है ? इसीलिये मैं पी एम को उसके दायरे में रखने वाली बिल का सख्त विरोधी हूँ जिसके लिए केजरीवाल [इसके अलावा अन्ना टीम का कोई अर्थ ही नहीं है] पूरी जिद बनाये हुए है । #
* मैं सरकार में नहीं हूँ , पर समझ में नहीं आया कि सरकार क्या क्या करती है ? या केजरीवाल इस बहाने भी अपना महत्व बढ़ाने के लिए यह आरोप लगा रहा है कि उनके खिलाफ सब सरकार कि साजिश है ? अब कुमार विश्वास ने अन्ना को चिट्ठी लिखकर कोर कमेटी भंग करने को कहा ,तो इसमें सरकार क्या करे ? अख़बार ने किरण के यात्रा बिलों का खुलासा किया तो इसमें सरकार का क्या दोष ? प्रशांत भूषण यदि देश के जन मानस विरोधी वक्तव्य पर पिट गए ती - - । यदि अन्ना टीम के सदस्यों की साख उनके अपने दुष्कर्मों , घमंड पूर्ण और अलोकतांत्रिक , जिद्दी स्वभाव के कारण गिर गयी तो सरकार क्या करे ? आखिर जनता के पास भी आँख - कान हैं , और वह भी कुछ देख -सुन रही है ।
* एक बात मेरी समझ से बाहर हो रही है कि ये खजरी वाले जनता को इतना मूर्ख क्यों समझते है जो इनके तरफ से बयान पर बयान जारी किये जा रहे हैं ? कहते हैं यह सौ करोड़ जनता का आन्दोलन है । एक तो मैं नहीं हूँ , रामदेव आपसे सहमत नहीं हैं , संघ का समर्थन आप माँ नहीं रहे हो , और - - और - । फिर इतना झूठ क्यों बोलते हो ? राजनीति का ग्रहण लग गया न !#
* मैं सरकार में नहीं हूँ , पर समझ में नहीं आया कि सरकार क्या क्या करती है ? या केजरीवाल इस बहाने भी अपना महत्व बढ़ाने के लिए यह आरोप लगा रहा है कि उनके खिलाफ सब सरकार कि साजिश है ? अब कुमार विश्वास ने अन्ना को चिट्ठी लिखकर कोर कमेटी भंग करने को कहा ,तो इसमें सरकार क्या करे ? अख़बार ने किरण के यात्रा बिलों का खुलासा किया तो इसमें सरकार का क्या दोष ? प्रशांत भूषण यदि देश के जन मानस विरोधी वक्तव्य पर पिट गए ती - - । यदि अन्ना टीम के सदस्यों की साख उनके अपने दुष्कर्मों , घमंड पूर्ण और अलोकतांत्रिक , जिद्दी स्वभाव के कारण गिर गयी तो सरकार क्या करे ? आखिर जनता के पास भी आँख - कान हैं , और वह भी कुछ देख -सुन रही है ।
* एक बात मेरी समझ से बाहर हो रही है कि ये खजरी वाले जनता को इतना मूर्ख क्यों समझते है जो इनके तरफ से बयान पर बयान जारी किये जा रहे हैं ? कहते हैं यह सौ करोड़ जनता का आन्दोलन है । एक तो मैं नहीं हूँ , रामदेव आपसे सहमत नहीं हैं , संघ का समर्थन आप माँ नहीं रहे हो , और - - और - । फिर इतना झूठ क्यों बोलते हो ? राजनीति का ग्रहण लग गया न !#
भ्रष्टाचारी टीम
* अन्ना , यह तो मौन नहीं है | मौन तो तब , जब मन भी न बोले |
[इस पर सैन्नी अशेष , mystic rose ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं ] #
* भ्रष्टाचार रहे या जाये , बस जन लोकपाल बिल आये |
[अन्ना टीम का आशय]
* जैसे कुमार विश्वास मंच के कवि हैं , वैसे ही अन्ना मंच के क्रांतिकारी हैं |
* यदि अन्ना टीम की कारगुज़ारियाँ भ्रष्टाचार नहीं हैं , तो भाई , भ्रष्टाचार होता क्या है ? भ्रष्टाचार कहते किसे हैं ? यह तो अवसर और स्थिति की बात है | इन्हें यदि मंत्रालय का मौका मिला होता तो क्या भरोसा कि वे वही न करते जो इन्होने अपनी छोटी सी स्थिति में किया ? यदि ईमानदारी इनका आतंरिक मामला नहीं है , तो भ्रष्टाचार की खिलाफत भी इनका कोई मामला नहीं है | आश्चर्य का विषय है कि अन्ना टीम के समर्थक टीम के भ्रष्टाचार को अनदेखी करना चाहते हैं | ऐसे में पता नहीं कैसे अन्ना को भरोसा है कि वे ऐसी भ्रष्ट मानसिकता की भीड़ की नाव पर चढ़कर भ्रष्टाचार विरोधी बिल को वे वैतरणी पार उतार सकते हैं ? लेकिन अब गेंद जनका के पाले में है कि वह अन्ना टीम को अपना उद्धारक माने , या उनके छद्म को पहचान कर उनकी राजनीतिक मंशा की प्रतिपूर्ति में भागीदार न बने | #
* और , व्यक्ति का प्रभाव पड़ता क्यों नहीं है , मुद्दे व्यक्ति के आधार पर ही जोर पकड़ते हैं । जे पी या अन्ना के व्यक्तित्व पर ही लोग इकट्ठा हुए | अब यदि प्रशांत भूषण अपने वक्तव्य से जनता में अविश्वश्नीय हो जायं तो यह कैसे कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोग उनके पीछे जान छिड़कने लगेंगें ? यदि मुद्दा व्यक्तियों से इतना अलग है तो फिर छोड़ दे अन्ना टीम मुद्दे को जनता के ऊपर । पर अब तो इनकी सत्य निष्ठां संदिग्ध है । #
[इस पर सैन्नी अशेष , mystic rose ज्यादा बेहतर लिख सकते हैं ] #
* भ्रष्टाचार रहे या जाये , बस जन लोकपाल बिल आये |
[अन्ना टीम का आशय]
* जैसे कुमार विश्वास मंच के कवि हैं , वैसे ही अन्ना मंच के क्रांतिकारी हैं |
* यदि अन्ना टीम की कारगुज़ारियाँ भ्रष्टाचार नहीं हैं , तो भाई , भ्रष्टाचार होता क्या है ? भ्रष्टाचार कहते किसे हैं ? यह तो अवसर और स्थिति की बात है | इन्हें यदि मंत्रालय का मौका मिला होता तो क्या भरोसा कि वे वही न करते जो इन्होने अपनी छोटी सी स्थिति में किया ? यदि ईमानदारी इनका आतंरिक मामला नहीं है , तो भ्रष्टाचार की खिलाफत भी इनका कोई मामला नहीं है | आश्चर्य का विषय है कि अन्ना टीम के समर्थक टीम के भ्रष्टाचार को अनदेखी करना चाहते हैं | ऐसे में पता नहीं कैसे अन्ना को भरोसा है कि वे ऐसी भ्रष्ट मानसिकता की भीड़ की नाव पर चढ़कर भ्रष्टाचार विरोधी बिल को वे वैतरणी पार उतार सकते हैं ? लेकिन अब गेंद जनका के पाले में है कि वह अन्ना टीम को अपना उद्धारक माने , या उनके छद्म को पहचान कर उनकी राजनीतिक मंशा की प्रतिपूर्ति में भागीदार न बने | #
* और , व्यक्ति का प्रभाव पड़ता क्यों नहीं है , मुद्दे व्यक्ति के आधार पर ही जोर पकड़ते हैं । जे पी या अन्ना के व्यक्तित्व पर ही लोग इकट्ठा हुए | अब यदि प्रशांत भूषण अपने वक्तव्य से जनता में अविश्वश्नीय हो जायं तो यह कैसे कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लोग उनके पीछे जान छिड़कने लगेंगें ? यदि मुद्दा व्यक्तियों से इतना अलग है तो फिर छोड़ दे अन्ना टीम मुद्दे को जनता के ऊपर । पर अब तो इनकी सत्य निष्ठां संदिग्ध है । #
शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011
क्षीण मन
गीत -
अब वे जैसा भी सोचें , लेकिन मैं तो सोचूंगा ;
उनका कोई बुरा न हो , हो भला सदा सोचूंगा ।
#
गीत -
फिर लगा मन क्षीण होने
जीर्ण होते , शीर्ण होने ।
फिर लगा - - - =
#
अब वे जैसा भी सोचें , लेकिन मैं तो सोचूंगा ;
उनका कोई बुरा न हो , हो भला सदा सोचूंगा ।
#
गीत -
फिर लगा मन क्षीण होने
जीर्ण होते , शीर्ण होने ।
फिर लगा - - - =
#
पाठक हूँ मैं
* न विचार की तरफ , न सरकार की तरफ ;
सब काम मुखातिब हैं पुरस्कार की तरफ |
#
* मेरे ऊपर
कहानियाँ लिखोगे
कवितायेँ बनाओगे
लेकिन जियोगे नहीं
तुम मेरा जीवन .
योग्यता ही नहीं तुममे
विषम जीवन जीने की
साहस ही नहीं विषम
परिस्थितियाँ का
सामना करने का |
#
* पाठक था मैं
पाठक ही हूँ
पाठक ही रहूँगा मैं
अपने मूल में ।
#
सब काम मुखातिब हैं पुरस्कार की तरफ |
#
* मेरे ऊपर
कहानियाँ लिखोगे
कवितायेँ बनाओगे
लेकिन जियोगे नहीं
तुम मेरा जीवन .
योग्यता ही नहीं तुममे
विषम जीवन जीने की
साहस ही नहीं विषम
परिस्थितियाँ का
सामना करने का |
#
* पाठक था मैं
पाठक ही हूँ
पाठक ही रहूँगा मैं
अपने मूल में ।
#
बुधवार, 26 अक्टूबर 2011
दीवाली
* दिया जल गया तो
किसी ने नहीं देखा
कि दिए का आकार क्या है ,
क्या है उसका रंग रूप ,
वह मिट्टी का बना है या
सोने या चांदी का ,
उसमे घी पड़ा है या तेल ?
लोगों ने बस रोशनी देखी
उन्हें रोशनी चाहिए ,
उन्हें रोशनी से मतलब है |
किसी ने नहीं देखा
कि दिए का आकार क्या है ,
क्या है उसका रंग रूप ,
वह मिट्टी का बना है या
सोने या चांदी का ,
उसमे घी पड़ा है या तेल ?
लोगों ने बस रोशनी देखी
उन्हें रोशनी चाहिए ,
उन्हें रोशनी से मतलब है |
तानाशाह
* लीबिया के तानाशाह का तो अंत हुआ । अब मुझे यह स्पष्ट लिखना तो नहीं चाहिए पर देश हित को ध्यान में रखकर भारत की जनता को आगाह कर रहा हूँ , जिसे वह शायद अभी आसानी से न पचा पाए , कि अन्ना टीम के नाम से भारत में एक तानाशाह जन्म ले चुका है । #
* अन्ना के अतार्किक बयान समझ में इसलिए आ रहे है , और इसलिए वह क्षमा किये जा सकते हैं क्योंकि जिस मंदिर को उन्होंने अपने आवास बनाया है , सुनने में आया है कि उसमे वास्तु -दोष है । #
* अन्ना के अतार्किक बयान समझ में इसलिए आ रहे है , और इसलिए वह क्षमा किये जा सकते हैं क्योंकि जिस मंदिर को उन्होंने अपने आवास बनाया है , सुनने में आया है कि उसमे वास्तु -दोष है । #
तुम्हारे बारे में
* अगर भीड़
मेरी तरफ है
तो वह जनता है ,
लेकिन यदि भीड़
मेरी तरफ है
तो वह भीड़ है ।
#मैंने तुम्हारे लिए
कुछ नहीं किया
मैंने तुम्हारे बारे में
सिर्फ सोचा किया ।
#
* इसलिए नहीं कि
मैं तुमसे इससे अधिक
पाना नहीं चाहता था ,
बल्कि इसलिए कि मैं
तुमसे इससे अधिक
पा नहीं सकता था ।
मेरी तरफ है
तो वह जनता है ,
लेकिन यदि भीड़
मेरी तरफ है
तो वह भीड़ है ।
#मैंने तुम्हारे लिए
कुछ नहीं किया
मैंने तुम्हारे बारे में
सिर्फ सोचा किया ।
#
* इसलिए नहीं कि
मैं तुमसे इससे अधिक
पाना नहीं चाहता था ,
बल्कि इसलिए कि मैं
तुमसे इससे अधिक
पा नहीं सकता था ।
पत्ता - प्रार्थना
* प्रार्थना एक समय
प्रार्थना थी ,
प्रार्थना , अब
किसी भी प्रभु की
निंदा प्रस्तावना ।
#
* हवा पत्ते को उड़ा ले गयी
यह कहना ठीक नहीं है ,
सच तो यह हुआ
कि हवा ने पहले तो
पत्ते को छुआ
फिर उसे सर्वांग चूमा
फिर जोर से उसे आलिंगन में भींचा
और उसका हाथ पकड़ कर
अपनी ओर खींचा
और अपने साथ ले चली ।
लोग यह क्यों नहीं कहते
कि पत्ता ही हवा को उड़ा ले चला ?
#
[Poem by - Paradise Lost]
प्रार्थना थी ,
प्रार्थना , अब
किसी भी प्रभु की
निंदा प्रस्तावना ।
#
* हवा पत्ते को उड़ा ले गयी
यह कहना ठीक नहीं है ,
सच तो यह हुआ
कि हवा ने पहले तो
पत्ते को छुआ
फिर उसे सर्वांग चूमा
फिर जोर से उसे आलिंगन में भींचा
और उसका हाथ पकड़ कर
अपनी ओर खींचा
और अपने साथ ले चली ।
लोग यह क्यों नहीं कहते
कि पत्ता ही हवा को उड़ा ले चला ?
#
[Poem by - Paradise Lost]
सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
Jeewan garima
* Jeewan ko garima deni ho to bolo -
' Koi jeewan bekar nahi hota hai .'
* woh usse
Sunder nahi thee ,
Yeh , usse
Sunder nahi hai ;
Isee tulnatmak adhyayan me
Beet gaya jeewan ,
Na sunder milee ,
Na a-sunder .
* Bhagya ko
Nahi mante ?
Aytant
Durbhagya poorna !
' Koi jeewan bekar nahi hota hai .'
* woh usse
Sunder nahi thee ,
Yeh , usse
Sunder nahi hai ;
Isee tulnatmak adhyayan me
Beet gaya jeewan ,
Na sunder milee ,
Na a-sunder .
* Bhagya ko
Nahi mante ?
Aytant
Durbhagya poorna !
शक
* Woh mujhe
Shaque ki nazar se
Dekhta hai
Main use
Shaque ki nazar se
Dekhti hun .
[Poem from - KALA JEEWAN]
* Dekhiye ud ke kahan jaate hain ,
Dil ke tukde jo bikhere hamne !
[Sher from - KALA JEEWAN]
Shaque ki nazar se
Dekhta hai
Main use
Shaque ki nazar se
Dekhti hun .
[Poem from - KALA JEEWAN]
* Dekhiye ud ke kahan jaate hain ,
Dil ke tukde jo bikhere hamne !
[Sher from - KALA JEEWAN]
शनिवार, 22 अक्टूबर 2011
किरण बेदी को बचत सम्मान
* हम किरण बेदी को माफ़ करते हैं । हमें उनकी नेक नीयती पर भरोसा है । हम भरोसा करने वाले लोग हैं । बिना भरोसे और विश्वास के शिष्टाचार क्या भ्रष्टाचार भी संभव नहीं होता । यही दिक्कत अन्ना टीम के साथ है कि वे किसी पर भरोसा नहीं करते , केवल अपने को स्वच्छ -ईमानदार और बाकी सबको बेईमान समझते हैं । यहीं वे गच्चा खा जाते हैं । तो अब भुगतें । लेकिन मैं उन्हें क्लीन चिट देता हूँ । ऐसी छोटी छोटी बातें तो हो ही जाती हैं , होती रहती हैं । यदि ऐसे शुभ प्रयासों को भी हम भ्रष्टाचार कह देंगें तो आन्दोलन के लिए हम अन्ना - अरविन्द -बेदी कहाँ से लायेंगे ।
मैं तो प्रस्तावित करता हूँ कि बेदी की इस अभूतपूर्व बचत योजना के लिए बचत निदेशालय द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए , किराये में पाँच फीसद और छूट देनी चाहिए जिससे वे अपनी संस्था के लिए और पैसे बचा सकें और देश की ज्यादा सेवा कर सकें ।
उनके आलोचक मेरी बात का जवाब दें कि यदि उस छूट से उन्हें कोई लाभ ही न हो तो ऐसी छूट से क्या लाभ ? क्या वह दिखाने के लिए होगा , या उन्हें बुलाने वाले आयोजकों के हित के लिए ? तब तो वह एक दिन भी सभा - सेमिनार से फुर्सत न पायें !
फिर भी कुछ पेंच मेरे भी मन में है । एक तो यही कि सख्त न सही , सधारण लोकपाल ही होता तो वह क्या करता ? दूसरे , बिल की नैतिक सच्चाई तो खटाई में पड़ ही गयी । किराये के अलावा जो उन्हें मानदेय प्राप्त हुआ उसी को अपनी संस्था के फंड में डालना था । फिर , जिन संस्थाओं का उन्होंने दोहन किया , वे भी तो कुछ सामाजिक कार्य कर ही रही हैं , उन पर बोझ डालना उचित न था । और अंततः , ठीक है कि वह कोई कोमलांगी महिला नहीं हैं फिर भी इकोनोमी में यात्रा करके शरीर को कष्ट नहीं देना चाहिए था । वह कष्ट हम लोगों की धरोहर है ।
चिंता न करें , यह तो होता ही रहता है । ठेकेदार को तो जो दर के हिसाब से भुगतान होता है वह तो होगा ही , इसीलिये इन्जीनियेर उसमे से कुछ बचत कर लेता है , शुभकार्यों के लिए । अक्सर राज्य और शासन के प्रतिनिधियों के लिए । इसमें गलत क्या है । हम भी जो थोड़ा बहुत हाथ मरते हैं वह भी बच्चों की पढ़ाई के लिए , उनके रहने का ठिकाना बनाने के लिए , पत्नी को खुश रखने के लिए । कौन हम सब अपने लिए करते हैं ?
मैं तो प्रस्तावित करता हूँ कि बेदी की इस अभूतपूर्व बचत योजना के लिए बचत निदेशालय द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए , किराये में पाँच फीसद और छूट देनी चाहिए जिससे वे अपनी संस्था के लिए और पैसे बचा सकें और देश की ज्यादा सेवा कर सकें ।
उनके आलोचक मेरी बात का जवाब दें कि यदि उस छूट से उन्हें कोई लाभ ही न हो तो ऐसी छूट से क्या लाभ ? क्या वह दिखाने के लिए होगा , या उन्हें बुलाने वाले आयोजकों के हित के लिए ? तब तो वह एक दिन भी सभा - सेमिनार से फुर्सत न पायें !
फिर भी कुछ पेंच मेरे भी मन में है । एक तो यही कि सख्त न सही , सधारण लोकपाल ही होता तो वह क्या करता ? दूसरे , बिल की नैतिक सच्चाई तो खटाई में पड़ ही गयी । किराये के अलावा जो उन्हें मानदेय प्राप्त हुआ उसी को अपनी संस्था के फंड में डालना था । फिर , जिन संस्थाओं का उन्होंने दोहन किया , वे भी तो कुछ सामाजिक कार्य कर ही रही हैं , उन पर बोझ डालना उचित न था । और अंततः , ठीक है कि वह कोई कोमलांगी महिला नहीं हैं फिर भी इकोनोमी में यात्रा करके शरीर को कष्ट नहीं देना चाहिए था । वह कष्ट हम लोगों की धरोहर है ।
चिंता न करें , यह तो होता ही रहता है । ठेकेदार को तो जो दर के हिसाब से भुगतान होता है वह तो होगा ही , इसीलिये इन्जीनियेर उसमे से कुछ बचत कर लेता है , शुभकार्यों के लिए । अक्सर राज्य और शासन के प्रतिनिधियों के लिए । इसमें गलत क्या है । हम भी जो थोड़ा बहुत हाथ मरते हैं वह भी बच्चों की पढ़ाई के लिए , उनके रहने का ठिकाना बनाने के लिए , पत्नी को खुश रखने के लिए । कौन हम सब अपने लिए करते हैं ?
बेदी की बचत
* अभी याद आया कि मुकदमा जीतने के लिए तमाम मन्त्रों - गंडों - तावीजों का प्रचार बाबाओं का छपता रहता है अख़बारों में । ऐसे में यदि कोई पक्ष सचमुच अयोध्या राम जन्म भूमि / बाबरी मस्जिद का मुकदमा जीतना चाहता है तो उन्हें क्यों नहीं अपनाता ?
* मैं अभी वहाबी आन्दोलन के बारे में टी वी पर समाचार विवरण देख रहा था , कि इस आन्दोलन के लिए खूब पेट्रो डॉलर भारत और दुनिया भर के देशों को भेजे जा रहें हैं । तब दिमाग दौड़ा कि जिसके पीछे बाबा रामदेव पड़े हैं , भारत का पैसा जो विदेशों में है , उससे ज्यादा खतरनाक तो वह पैसा है जो विदेशों से देश में आ रहा है ।
* ' बचत ' करो
मंदिर में लगाओ
' बेदी ' कहाओ ,
भ्रष्ट न बनो
ईमानदार रहो
' बचत ' करो । [ डबल हाइकु ]
* अन्ना जी मौनव्रत पर हैं , बोल नहीं सकते । ऐसे में वह एक पंक्ति का बयान फोटोकापी करा कर रख लें और रोज़ सुबह -शाम बँटवा दिया करें कि - यह सब विरोधियों की साजिश है । क्योंकि यही बोलने की स्थिति उनकी रोज़ की हो गयी है । पहले केजरीवाल , फिर प्रशांत भूषण , फिर किरण बेदी , फिर कुमार विश्वास , फिर केजरीवाल - - -।
* मैं अभी वहाबी आन्दोलन के बारे में टी वी पर समाचार विवरण देख रहा था , कि इस आन्दोलन के लिए खूब पेट्रो डॉलर भारत और दुनिया भर के देशों को भेजे जा रहें हैं । तब दिमाग दौड़ा कि जिसके पीछे बाबा रामदेव पड़े हैं , भारत का पैसा जो विदेशों में है , उससे ज्यादा खतरनाक तो वह पैसा है जो विदेशों से देश में आ रहा है ।
* ' बचत ' करो
मंदिर में लगाओ
' बेदी ' कहाओ ,
भ्रष्ट न बनो
ईमानदार रहो
' बचत ' करो । [ डबल हाइकु ]
* अन्ना जी मौनव्रत पर हैं , बोल नहीं सकते । ऐसे में वह एक पंक्ति का बयान फोटोकापी करा कर रख लें और रोज़ सुबह -शाम बँटवा दिया करें कि - यह सब विरोधियों की साजिश है । क्योंकि यही बोलने की स्थिति उनकी रोज़ की हो गयी है । पहले केजरीवाल , फिर प्रशांत भूषण , फिर किरण बेदी , फिर कुमार विश्वास , फिर केजरीवाल - - -।
तो कहाँ जाते
* कर न लेते तेरे वादे पर यकीं,
तो कहाँ जाते , कहाँ होते मकीं ?
* भ्रष्टाचार के अनेक रूप ,
कोई हड्डी , कोई सूप |
* जब टी वी पर विज्ञापन आता है , उतनी ही देर घर का कुछ काम करने का मौका मिलता है |
तो कहाँ जाते , कहाँ होते मकीं ?
* भ्रष्टाचार के अनेक रूप ,
कोई हड्डी , कोई सूप |
* जब टी वी पर विज्ञापन आता है , उतनी ही देर घर का कुछ काम करने का मौका मिलता है |
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011
हर तरफ राक्षस
* हर तरफ राक्षस हैं
राक्षसों से लड़ाईयाँ हैं
बुराई पर
सच्चाई की जीत है
फिर ,
हर तरफ राक्षस हैं |
###
राक्षसों से लड़ाईयाँ हैं
बुराई पर
सच्चाई की जीत है
फिर ,
हर तरफ राक्षस हैं |
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अन्ना की टीम
* सत्तर के दशक में जिस प्रकार श्रीमती इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था , उसी प्रकार जब अन्ना ने एक असंभव काम , भ्रष्टाचार मिटाओ , का नारा दिया , और वह भी केवल उनके जन लोकपाल बिल के माध्यम से , तभी मेरे कान खड़े हो गए थे | ज़रूर दाल में काला है | लेकिन भारतीय जनता का क्या , वह तो लोलीपोप पर मचल जाती है , बल्कि आश्वासनों पर जिंदा रहने की आदी हो गयी है | वह छुपे एजेंडों को नहीं समझ पाती | अब अन्ना टीम की चाभी कहाँ है , कौन है , दिखने लगा है | उनकी नीयत शुरू से राजनीतिक थी ,जिसे हमने उनकी जिद , और अब चुनाव प्रचार में देखा , वरना वे असंभव काम हाथ में न उठाते | अपनी असफलता का ठीकरा किसी अन्य पर थोपने की पूरी गुंजाईश इससे बनी रहती है , और चलती रहती है इनकी राजनीति | अन्ना कुछ भी कहें , प्रशांत भूषण उनके ही टीम के मेम्बर हैं | हिसार उपचुनाव का श्रेय उठाने की ललक पूरी तरह राजनीतिक है | अब कुछ मैग्सेसे अवार्डी टीम से हट रहे हैं , उन्हें बुद्धि आ रही है | पुरस्कृत लोग सोशल एक्टिविस्ट होते हैं , इनके पास दिमाग ज़रा कम होता है | अब बाहर हो भी जायं तो क्या संतोष ,प्रशांत ,राजेन्द्र , राजगोपाल | अरविन्द ने उनसे अपनी नीव की ज़मीन पुख्ता करने के लिए इस्तेमाल तो कर ही लिया | हम अपनी पीठ ठोंक सकते हैं कि हम अरविन्द के झांसे में नहीं आये } अभी भी हम आगाह करेंगे मीडिया को कि वह आदरणीय अन्ना को ही महत्त्व दे और अरविन्द को दरकिनार करे वर्ना यह विदेशी मग्सेसे पुरस्कृत छोकड़ा देश को विदेशी सपनों के जाल में फंसा कर उसका तहस नहस कर डालेगा | अन्ना से कुछ नहीं कहना , उन्हें भी समझ में आ रही हैं , और आ जायंगी और अनंत मौन धारण करने में ही देश की भलाई समझेंगे | ##
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