ज़माने ने
बड़े जुल्म देखे हैं
उनके आगे
यह क्या है
जो मेरे ऊपर
तारी हुआ है ?😢
उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
मंगलवार, 28 जनवरी 2020
चल तो रहा हूँ ।
कविता?
चलने की तैयारी
करता रहता हूं तो लगता है
कि चल ही तो रहा हूं ।
मेरे पास कई झोले हैं
कई आकार और प्रकार के
विभिन्न,
कम या ज्यादा सामान ले जाने के लिए
मैं तैयार रहता हूं
मेरे पैर नहीं चलते
केवल मेरा दिमाग चलता है
तो चल ही तो रहा हूं
मैं चलने की तैयारी करता रहता हूं
तो लगता है कि मैं चल ही तो रहा हूं ।
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(उग्रनाथ नागरिक)
गुनगुनी धूप
एक पखवारे से मैं अंदर अंदर बड़े अवसाद में हूँ । पता नहीं कब तक रहूँगा । एक 7 साल की बच्ची ने अब बड़ी होकर, तब 81 वर्ष के बुजुर्ग लगभग विक्षिप्त हुए अति सम्मानित महा जनकवि बाबा नागार्जुन पर जो दुर्व्यवहार का आरोप लगाया उससे मैं आहत हुआ । यह दुर्घटना मेरे दिमाग़ से उतर ही नहीं रही है । कौन सही कौन गलत तय ही नहीं कर पा रहा हूँ । समझ में नहीं आता मैं बाबा की तरफ से शर्मिंदगी महसूस करूँ, उस पाप का पश्चाताप करूँ, या साहित्य-संस्कृति विभाग की ओर से आरोपकर्ता के ऊपर मानहानि का मुकदमा ठोंकूँ ? बाबा के उत्तराधिकारी सारे नर नारी कवि लेखक साहित्यकारों की चुप्पी अप्रत्याशित है ।
अनिर्णय और क्षोभ की दशा में मैंने दो काम किये । एक तो बाबा की नज़ीर देकर मैंने इधर मृत्युदण्ड प्राप्त अपराधियों के लिए क्षमादान की माँग की । (जब बाबा जैसी हस्ती ऐसा करने पर विवश हुई तो उन लफंगों की क्या सांस्कृतिक हैसियत?)
दूसरे - फेसबुक पर किसी महिला मित्र के पोस्ट को Like/Comment, प्रतिक्रिया बिल्कुल बन्द। इनसे दूर रहने में ही अपनी इज्ज़त की सुरक्षा है । इनके प्रति मेरी दृष्टि तीखी हो गयी है । Sorry, Very sorry!😢
गुरुवार, 23 जनवरी 2020
हिन्दू जिन्ना
हम मुसलमान नहीं हैं कि जिन्ना कह दें और हम देश बाँटकर पाकिस्तान बना लें ! और आप जिन्ना की भूमिका में हो, हिन्दू जिन्ना । हम देश बाँटकर हिंदुस्तान नहीं लेंगे । हम देश को बँटने नहीं देंगे !
क्रांति की पाठशाला
मैं क्रांतिकारी बनूँ, इससे बेहतर होगा मैं क्रांतिकारी बनाऊँ । अनगिनत, अगणित ! हम अकेले कितनी क्रांतियाँ सँभालेंगे ? कारगर होगा "जितने लोग उतनी क्रांतियाँ" की रणनीति । जिससे क्रांति चलती रहे । किसी व्यक्ति- विचारधारा के बाद रुक न जाये ।
जननी कौन ?
तीन हाइकु
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कहाँ जाते हो
मंदिर में घण्टा है
बहुत टंटा !
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अच्छे दिन का
इंतज़ार ख़तम
नहीं आएँगे !
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हाँ,अवस्था तो
आपत्तिजनक है,
जननी कौन ?
सोमवार, 20 जनवरी 2020
परेशान नागरिक
मुझे डिमोक्रेसी से कुछ परेशानी हो रही है । इसमें नागरिक को बहुत सचेत, जागरूक रहना पड़ता है । हर समय देखते रहो, सरकार कुछ गड़बड़ तो नहीं कर रही है ? करे, तो फौरन घर से निकलकर धरना प्रदर्शन करो, गला फाड़कर चिल्लाओ, और पुलिस के डंडे खाओ, और जेल की हवा ।😢 हरदम सशंकित रहो । बिल्कुल Watchdog, कुत्ते की तरह ज़िंदगी ! ठीक से सोने को नहीं मिलता । और सोओ भी तो कुकुरनिंदिया । ज़रा सी आहट पर जाग कर चौथा खम्भा पकड़कर भोंको (कुत्ता और खम्भा हास्यपरक युग्म है 😢), मेरा मतलब पत्रकारिता से था । है न परेशानी की बात ?
शूद्र हिन्दू
By - Hirday Nath
जातिवाद का सच क्या है ???
अंग्रेज़ी दैनिक (Hindustan Times, 22 September,2014) की रिपोर्ट के अनुसार ,राष्ट्रीय स्वयम सेवक सघं की नवीनतम थ्यूरी के अनुसार हिन्दू धर्म में लेश मात्र भी ४ वर्ण पर आधारित घृणित छुआछूत जन्य जातिवाद नहीं है.वह तो केवल मुस्लिम राज्य के समय मल्लेच्छों की देन है.
यूं तो जातिवाद हिन्दू धर्म के प्रत्येक ग्रन्थ का अभिन्न अंग है,परन्तु मैं यहां केवल ब्रह्म सूत्र से सम्बन्धित विषय पर संदर्भ प्रस्तुत कर रहा हूं जिन की रचना भारत में मुस्लिम राज्य से कई शताब्दीयों पहले हुई थी और न ही भाष्यकर्ता रामानुज मल्लेच्छों का पक्षपाती था.
# शूद्र का वेद सुनना वेद पढना अर्थ समझना एवं अनुष्ठान निषिद्ध हैं.
# शूद्र चलता फिरता शमशान है,उस के समीप वेद नहीं पढना चाहिए.
# शूद्र पशु सदृश है.
# यदि शूद्र वेद को सुन ले तो राजा उस के कानों में सीसा व लाख पिघला कर ड़ाल दे.
# यदि शूद्र वेदमंत्र का उच्चारण करे तो उस की जीब काट देनी चाहिए.
# यदि शूद्र वेद मंत्र को याद कर ले तो उस का शरीर चीर देना चाहिए.
# शूद्र को धर्म अथवा व्रत न सिखाओ.
टिप्पणी ;यदि हिन्दुत्व वादी सचमुच समाज में मानवतावाद पर आधारित बन्धुत्व और एकता स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसे सभी गन्थों का बहिष्कार करना चाहिए,क्योंकि इस प्रकार की मानसिकता भारतीय संविधान के अन्तरगत नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की घोर उल्लंघना है.देरी काहे की ?सरकार भी तो उन्ही की है.
बाबा नागार्जुन का "चूल्हा रोया"!
मैं इंदिरा जयसिंह की भाँति अपराधियों के मृत्युदण्ड से क्षमा किये जाने की वकालत करता हूँ, अलबत्ता उनका कृत्य जघन्य था । लेकिन उनकी फाँसी से यह अपराध समाप्त न हो जायेगा , धड़ाधड़ हो रहे हैं, कानून के बावजूद। इसका निदान कहीं और मसलन शिक्षा में है । वह तो ही नहीं रहा।
तो भी बहुत भुगता इन नासमझों ने 7 साल जेल में रहकर । पर्याप्त यातना सह ली । एक ने तो आत्महत्या कर ली, इन्हें भी अवसर मिलता तो कर लेते । इनकी भी पीड़ा समझनी चाहिए । जब 81 वर्ष के महाजनकवि नागार्जुन 7 साल की गुनगुन थानवी से कुछ कर सकते हैं तो उन लफंगों की क्या मानसिक, नैतिक हैसियत थी ? उन्होंने अपराध किया उन्होंने भुगता । मैं अपनी सोच में if-but लगाने वाला 'लेकिनवादी" नहीं हूँ । मैं मृत्युदण्ड और आँख के बदले आँख का विरोधी हूँ । इसलिए क्षमादान माँगना मुझे वाजिब लगा, तो लिख दिया । यूँ फाँसी देना, न देना मेरे हाथ में तो है नहीं । इन जीवों को मारकर जिन्हें खुशी हो उन्हें मुबारक़ । 😢
#चूल्हारोया
सोमवार, 13 जनवरी 2020
मंदिर वहीं बनाएँगे ?
#मंदिरनहींजाएँगे। आंदोलन ! (MNJ Movement)?
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साथी प्रो दिलीप मंडल / अशोक भारती का Twitter पर यह Hashtag बड़ा trend हो रहा है । मुझे अच्छा लगा और मैं इसके पक्ष में इसका समर्थक हूँ ।
मैं नास्तिक हूँ कहने से ज़्यादा acceptible है "अनाराधक" बताना । और उससे भी ज़्यादा सरल शब्दों में है यह कहना, घोषित ऐलान करना कि "मंदिर नहीं जाएँगे" ! ईश्वर है/नहीं है, ईश्वर को हम मानते हैं या नहीं मानते इस सबसे परे विवाद बखेड़े से हटकर है बस "मन्दिरनहींजाएँगे" !
आप लोगों की क्या राय है ? क्या उचित न होगा इस आंदोलन को चलाना ? देशव्यापी बनाना । मेरे ख्याल से हमें अपने घरों, वाहनों या प्रदर्शित स्थानों पर इसका sticker लगाना चाहिए । और सारे बहस विवादों से मुक्त होकर इस प्रकार धीमे से, हौले से नास्तिकता का प्रचार करना चाहिए । इससे किसी का द्वेष कोई झगड़ा भी नहीं है । बस हम मंदिर नहीं जाते/ मंदिरनहींजाएँगे ।
आपका - उग्रनाथ नागरिक 👍👌
इसे ज़िद्दी जमात (अनाराधक संघ) में भी डाला है ।
लोग हमें नास्तिक आस्तिक खाने में न डालें । बस #मन्दिरनहींजाएँगे । ☺️👍💐👌
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019
आदिम आदमी
कोई सिंधु घाटी की सभ्यता है तो कोई अरब सागर की । सबने आदमी का जीना दूभर कर रखा है । अतः हमने विचारोपरांत इन सबसे पीछे जाने का मन बनाया है । ये सब तो सभी हज़ार, दो हज़ार, पाँच दस हज़ार वर्ष के हैं । इसके बहुत बहुत पहले न ईश्वर था, न धर्म, न वेद क़ुरान, आदमी सब स्वतंत्र समानतापूर्वक रहते थे । हमारी परेशानियाँ सभ्यता के विकार हैं । कैसे छूटेगा जब तक अपने मूल को न समझेंगे ? मौलिक मनुष्य । आदमी को अपनी मौलिकता न भूलनी चाहिए । धर्मों ने जितना सभ्य बनाने का दावा किया मनुष्य उतना ही अमानव होता गया । हमें अपने आदिम , अदिकालिक आध्यात्मिक मानुषिक एकता के पक्ष में रहना चाहिए । बस । धन्यवाद । मैं ज़्यादा बहस न कर पाऊँगा और देख रहा हूँ कि ग्रुप में बहस बहुत होती है, मौलिक विचार बहुत कम । वैसे भी मैं net पर कम ही रहता हूँ । आप सबका :
- - उग्रनाथ, आदिम आदमी ( Primitive Humane) @ (Godless People Worldwide)
मंगलवार, 17 सितंबर 2019
Secular Register
आज थोड़ी फुर्सत में हूँ तो सहज ढंग से step by step क्रमबद्ध तरीके से एक बड़ा कार्यक्रम समझाता और आपके सामने रखता हूँ :-
*देखिये, सच पूछिए तो हम सब हैं प्राकृतिक श्रमिक । हमारा , हम सबका काम है श्रम और मेहनत मजदूरी । श्रम चाहे शारीरिक हो , वैचारिक या नैतिक । सब श्रम है ।
यह मैंने ठीक कहा या नहीं ? तब आगे चलें ।
* अब यदि भारतीय समझ और परिभाषा के अनुसार हमारा कर्तव्य हमारा धर्म है, तो " कर्म ही पूजा" की नीति के अनुसार हमारा असली, मूल धर्म का नाम बनता है - वही जो कर्तव्य हम करते हैं, मतलब "मजदूरी" !
यहाँ तक ठीक है ? तो आगे बढ़ते हैं ।
आगे यही कि कर्म ही पूजा / या कहें श्रम का पूजन तब सम्भव होगा , मेहनत का फल तभी ठीक से मिलेगा जब मेहनत का माहौल होगा, मेहनतकशों का राज होगा ।
वह कैसे होगा ?
वह होगा राजनीति से । सत्ता शासन के क्षेत्र राजनीति के अंतर्गत आता है । श्रम और श्रमिक कुशल अवस्था में रहें, इसके लिए श्रमिक को चाहना होगा कि राज्य निर्माण में रुचि लें और राजनीति को अपना कर्म बनाये ।
अगला step फिर वही । यदि राजनीति कर्म में आप उतरे तो राजनीति आपका धर्म हुआ ।
इस प्रकार हमारा धर्म हुआ "राजनीति" ! राजनीति से भागना नहीं । कोउ नृप होय से काम नहीं चलेगा, यह तो छोटी बात है, आपको ही नृप बनना होगा ।
यहाँ तक तो खींच ले गया ।
तो क्या अगली जनगणना में हम अपना धर्म राजनीति लिखाएँ ? होना तो यही चाहिए, सत्यनिष्ठा के साथ ।
तो ठीक है । बस एक थोड़ा सा मोड़ देना है और हम अपने गंतव्य पर ! ☺️
मोड़ शाब्दिक terminological है । यह अनुशासन न देंगे तो सब राजनीति और धर्म के विषयी लोग हमारी हँसी उड़ाएँगे - - यह देखो, राजनीति को धर्म बनाने चले हैं ?😊
हमने भी कच्ची गोली नहीं खेली है महाशय !
हमें पता है कि राजनीति का जो धार्मिक, धर्म विषयक, धर्म के क्षेत्र का पारिभाषिक शब्द नाम है - सेक्युलर ( SECULAR) . राजनीति का धर्म सम्बन्धी मामला या धर्मों का राजनीतिक खेल Secularism के अंतर्गत पढ़ा पढ़ाया जाता है ।
हम सब अपना धर्म एक स्वर में सेक्युलर लिखाएँ , बताएँगे । (बात खत्म)
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हम तो झूठ बोलते नहीं, न कोई छद्म पाखण्ड करते हैं । तो हम साफ कह रहे हैं कि हमारा धर्म ही राजनीति है । लेकिन अन्य हमारे सामने वाले ,देखिएगा कितना झूठ, लम्बा लम्बा हांकेंगे गौर कीजियेगा । कहेंगे , अरे हम तो अलां फलाँ धर्म वाले हैं । हमसे राजनीति से क्या मतलब ? सरासर झूठ ! सच्चाई तो हम जानते हैं कि धर्म वर्म कुछ नहीं सारा राजनीति है, या धर्म के नाम पर राजनीति करना इनका उद्देश्य है ।
फिर भी ठीक है। उनकी वह जानें । हम सेक्युलर तो करते हैं राजनीति - मानववाद, इहलौकिक दुनिया की राजनीति, मात्र जो वही मनुष्य का भविष्य सुधार सकती है । 👍👌💐
गुरुवार, 15 अगस्त 2019
बीरबल का न्याय
मुझे तो बस चोर की दाढ़ी में तिनका याद आता है । यह एक कहावत बन चुका है । इस युक्ति से बीरबल ने एक चोर की शिनाख्त की थी । तब वह जज भी थे ,वकील भी थे । पीड़ित को उनके पास जाकर केवल यह बताना था कि उसका सामान चोरी गया । आगे की ज़िम्मेदारी बीरबल जी की थी । और उन्होंने उसे निभाया, जिसे दुनिया जानती है ।
न्याय व्यवस्था ऐसी ही होनी चाहिए । अपराध हुआ, न्याय विभाग सूचित हुआ । फिर उसका काम है अपराधी को पकड़ना , उसे सज़ा देना । उसके अधीन पुलिस, CID, खोजी तंत्र और सज़ा का अधिकार, और सबसे बड़ी बात अपराध नियंत्रण और न्याय की पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिए । सरकार से अलग ।
अभी तो क्या है ? सब कुछ पका पकाया, सुबूत, गवाह, अपराधी की खोज, सब पैक करके माननीय न्यायमूर्ति जी के कक्ष में प्रस्तुत करो, तब उन्हें जब फुर्सत मिली तो अभियोजन पक्ष को भी तिखाड़ डाँट डपट कर कोई निर्णय लिख देंगे । नहीं ! पुलिस, जेल, न्याय प्रशासन इनके अधीन होना चाहिए । इन्हें जासूसी करने के लिए, गवाहों के घर जाकर गुप्त तथ्य लेने के लिए बाहर भी निकलना चाहिए, केस के पूरा होने/ करने की ज़िम्मेदारी न्यायाधिकारी की होनी चाहिए ।
(उग्रनाथ नागरिक)
रविवार, 11 अगस्त 2019
जन्मभूमि विद्यालय
जन्मभूमि कन्या विद्यालय
कहते हैं जन्मभूमि है, चलिए मान लिया । तो मस्जिद न बने, चलिए मान लिया । लेकिन तब मंदिर भी न बने, यह भारत के विकास की माँग है । सारी ज़मीन आपकी है तो क्या सब पर मंदिर ही बनेगा ? जी नहीं ! उस जमीन पर विद्यालय बनाइये । कन्या विद्यालय की माँग मान लीजिये । और राम की सच्ची आराधना में लगाइए ।
विद्यालय का नाम अवश्य "जन्मभूमि कन्या विद्यालय" होना चाहिए । (राम शब्द अंतर्निहित, अव्यक्त और सर्वज्ञात है) हो । कन्याओं के लिए वह सुरक्षित, मुक्त, उपयुक्त स्थान है । रामशिलायें कटी बनी रखी हैं । और वही पैसे इसके निर्माण में इस्तेमाल होंगे जो मंदिर के लिये देशवासियों ने प्रदान किये हैं ।👍
अस्तित्व सबको सद्बुद्धि दे !
(मन दुर्वासा )
शनिवार, 10 अगस्त 2019
विरुद्ध
मैंने प्रेम खूब किया, तो प्रेम और प्रेमपात्र नारी जाति का विरोधी हो गया । मैंने पूजा बहुत की, तो पूजा पाठ, ईश्वर के विरुद्ध ही गया । 😢
इस्लाम का प्रसार
आख़िर इस्लाम में ऐसा आकर्षक है ही क्या जो कोई सिर्फ बुलाने से इसे स्वीकार कर लेगा ? एक कबीलाई ईश्वर, किताब, संदेशक के प्रति पूर्ण अन्धविशवास के साथ समर्पण ? जब मूल ही सत्यानाशी है तो आगे क्या बहस ? अब इतना तो मूर्ख समझें नहीं इस्लाम वाले इस्लाम से बची दुनिया को !☺️ और अब एक तुर्रा यह निकला है कि बस हम सुन्नी ही मुसलमान हैं । बाकी शिया, ताबिश, अशफ़ाक़, आतंकी तो (इसमें यौन पता नहीं कहाँ से घुसा दिया गया फ्रायड की कृपा से) यौन कुंठित हैं । तो हो गया न इस्लाम पाक और साफ ? किसकी आलोचना करेंगे ?
लेकिन तब भी कुछ बातें इनकी अस्पष्ट और अनुत्तरित हैं । कितने ही बड़े विज्ञान शिक्षित हों (कलाम साहब भी शंकराचार्य के चरण में बैठे), तमाम मूर्धन्य विज्ञान वेत्ताओं (Armed chaired हॉकिन्स समेत) की बात मानने को यह कदापि तैयार नहीं, इनके दिमाग में ही नहीं घुसता childhood conditioning की वजह से, कि कोई ईश्वर कहीं नहीं है । केवल nature है जिसका exploration विज्ञान के जिम्मे है, ख्याली खिलंदड़ जन इसके लिए भरीसेमंद नहीं ।
दूसरा यह कि अपनी अज्ञानता और अंधविश्वासों को बचाने, रक्षा करने में इतने जी जान से जुट क्यों जाते हैं ? हम तो जिस किसी भी धर्म सम्प्रदाय के हैं, उसकी तो खटिया खड़ी कर देते हैं, खूब आलोचना करते हैं और विद्रोह भी ! इनके यहाँ क्यों नहीं होता, न किसी को करने दिया जाता है ? यहाँ तो धार्मिक तरक्की का परिणाम यह होता है कि कोई वहाबी खित्ता बन जाता है, कोई जैशे मोहम्मद, और तमाम आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर इस्लाम के नक्शेकदम पर, दावे के साथ । नतीजा , जो अच्छे भले नैतिक रूप से मुस्लिम बचते हैं उनकी शामत आ जाती है, और वह दुबक जाते हैं । वह भी मारे डर के कहने लगते हैं जी जी हाँ, इस्लाम बड़ा ही प्रेमी, भाईचारा वाला जीव है, तलवार का बली नहीं 😢! ऐसे ही नहीं इतनी बड़ी एरिया पर इतने सदी से राजगद्दी नशीन है ? क्या भला तलवारी ताक़त पर यह सम्भव है ? सही है, तस्लीमा ,रुश्दी तो इसलिए भागे भागे फिरते हैं कि कोई उन्हें गले लगाकर चुम्मा न ले ले ☺️! अन्यथा उन्हें कोई डर नहीं ।
औऱ यह इनकी समझ तो तब है जब कि देख रहे हैं कि पूरी दुनिया इन्हें हिकारत की नज़र देखती है। अपनी लोकतांत्रिक मानववादी सेकुलर चरित्र के कारण इन्हें सब, हर ज़मीन आसमान वाले बर्दाश्त कर रहे हैं तो इसलिए की वे सभ्य हैं और तलवार में यकीन नहीं रखते । लेकिन सच यह है कि इनकी कोई इज़्ज़त नहीं करता, न कोई इसे महान समझता है ( किसी गांधी की पैदाइश यहाँ नामुमकिन है)। Unacceptance, अग्राह्यता इसलिए भी है क्योंकि यह दार्शनिक और वैज्ञानिक विचार धारा नहीं है । यहाँ असहमति की गुंजाइश नहीं है, जो कि लोकतन्त्र की पहली शर्त है । इनका विश्वास लोकतन्त्र या आधुनिक समाजवादी साम्यवादी व्यवस्था पर नहीं है, निज़ामे मुस्तफ़ा पर है ।
अलबत्ता, तिस पर भी, इनका दावा गलत नहीं कि इस्लाम पूरी दुनिया पर राज करेगा । कारण उन्हें तो पता है ही, दुनिया को भी पता है कि यह धर्म (नीति कर्तव्य) का tentative ख़ाका नहीं, एक मजबूत , सुदृढ़-सशक्त फ़ौज़वादी मजहब है , अपने में सम्पूर्ण राजनीति अपनी समस्त कलाओं में (अंतर्निहित,अकथनीय) प्रवीण,संलग्न और हर तरह से जुटे हैं । बुला लाएंगे (आओ फलाने भाई इन नीच आधुनिक मानव वादियों से मिलो) ! तो भला कैसे जीत पाएँगे इनसे और जीतना ही ही क्यों ? इनके साधारण सदस्य से भी बात करना असम्भव है, धर्मगुरू तो भूल जाइए । संवाद अव्यवहारिक है, अनावश्यक भी । यह किसी की बात न सुन ही नहीं सकते तो मानेंगे कैसे ? सिवा एक permanent, अपरिवर्तनीय directive, दिशा निर्देश के । इनकी भी मजबूरी है, उससे इतर और परे जाना तो दूर, सोचना भी गुनाह है, जिसकी कड़ी सज़ा मुकर्रर है ।😢और मान लेने पर पुरस्कार की लालच तो आप जानते हैं वह बहत्तर वाली ! 😊
अभी अभी, बिल्कुल यहीं एक idea उभरा है । यह क्षमा के योग्य हैं (भले ईसाइयत की तरह "प्रार्थी" नहीं) । तनिक इनकी निष्ठा गौर से देखिये , यह भला किसी को क्या डराएंगे, धमकाएँगे या मारेंगे ? ये तो खुद डरे हुए हैं व्यक्तिगत रूप से । इनके विश्वासों ने खुद इन्हें इतना दबा, डरा, और मार रखा है कि इनकी तार्किक चेतना बिल्कुल समाप्त हो चुकी है, कुछ हैभ तो उसी दायरे में । मुसल्लम ईमान ने इनकी जगह बहुत थोड़ी ही छोड़ी है तो यह क्या करें ? जो बताया गया वह कर रहे हैं । फेसबुक पर भी गुर्रा तो रहे हैं । अभी और यहाँ गरजेंगे । लेकिन इनके बादल में आधुनिक और भावी मानव समाज पर बरसने, उसे शीतल करने के लिए कोई "पानी" नहीं है ।😢
वोटर पार्टी
यह डिमॉक्रेसी, यह चुनाव बड़े लोगों का खेल है । साधारण आदमी चुनाव लड़ ही नहीं सकता तो किस बात की डिमॉक्रेसी ? बन्द होना चाहिए,यह नाटक, यह तमाशा । हम वोटर पार्टी बनाने जा रहे हैं । हम इन्हें चुनाव नहीं लड़ने देंगे । इनका बहिष्कार करेंगे । आगे देखा जायेगा ।
रविवार, 4 अगस्त 2019
धिक्कार पुरस्कार
मैग्सेसे अवार्ड तो ठीक । लेकिन इसका महत्व तब तक चटक नहीं होता जब तक इसके विपरीत कोई धिक्कार पुरस्कार या "मारो ठांय ठांय" पुरस्कार नहीं कायम होता । जो अनैतिक नीति योग के तलुए चाट रहे हैं, उन्हें मिलना चाहिए यह असम्मान ।
आज एक अखबार का सम्पादकीय विपक्ष को दायित्वबोध करा रहा था । इसी बहाने सत्ता की चापलूसी ! उसको तो ज़िम्मेदारी बताने की हिम्मत नहीं है । होगा कोई - - रामजादा !
एक तो यह फैशन चल गया है कि
"क़द तो है पिद्दी भर और फोटो आदमक़द"!
संपादकीय बनाने का यह कौन सा तरीका है ? अच्छा हो कुछ दिन बाद सम्पादकीय के विकल्प में केवल तस्वीरें छापी जायँ । कभी मोदी कभी शाह सावरकर, गुरु गोलवलकर के साथ संपादक की सेल्फी, फोटोशॉप या कोलाज ! अच्छा रहेगा । हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान ज़िन्दाबाद (अरे नहीं, अमर रहे !) ☺️😊😢👍👌💐