गुरुवार, 3 जनवरी 2013

तीन तीन युद्ध


* अगर वक्तृता, लच्छेदार भाषणों  के बल पर सद्भाव कायम होता , तो अटल बिहारी जी को पाकिस्तान यात्रा बीच में छोड़कर कारगिल न लड़ना पड़ता |  
तीन तीन युद्ध हुए | किसने किया ? कौन जारी रखे हुए है ?

संबंधों को 'गन्दला' करने वाले हुक्मरान और सियासतदान कहाँ से आते हैं ? आप उनसे अपने मुल्क में लड़िये | हम तो यहाँ लड़ ही रहे हैं | इसमें जनता के बीच प्रेम मोहब्बत क्या कर लेगी ?

अजीब बात है | अन्य किन्ही देशों से प्रेम की बल्तों की इतनी नौटंकी नहीं की जाती , पर उनसे सम्बन्ध बिगड़ते तो नहीं हैं | इधर हिन्द -पाक के बीच जितना मोहब्बताना शोर होता है , उतना ही इनके सम्बन्ध बिगड़ते हैं |

[कविता ]
* पता चलता है 
वह शूद्र है ,
विश्वास तो नहीं 
पर शक होने लगता है -
वह शूद्र होगा |
# # 
* समानता भी 
क्या दोनों एक साथ ?
आरक्षण भी ?


* एक दो तथ्य और ध्यान देने योग्य हैं | लोग मृत्यु दंड की बड़ी मांग कर रहे हैं | यदि इस दंड में कोई ताक़त होती तो लोग इसके aagman के भय से ही डर गए होते , जैसे भेड़िया या शेर के अथवा प्रलय आने की सूचना से भय व्याप्त हो जाता है | लेकिन क्या हुआ ? बलात्कार के समाचारों से अखबार पटे पड़ रहे हैं | एक पत्रकार मित्र का आज कहना था कि अब ' बलात्कार समाचार ' नाम से अखबार की गुंजाइश हो गयी है | अतः फाँसी अशक्त और अपर्याप्त है अपराधियों को अपराध से विरत करने में |

दूसरे , अख़बारों में यह कोई गौर नहीं कर रहा है कि आयुर्वेदिक शक्तिवर्द्धक नाना प्रकारेण कैप्सूलों के विज्ञापनों की कितनी भरमार हो गयी है ? 


* एन डी तिवारी शिया कालेज पहुंचे | - - उन्होंने कहा कि समुदाय को शिक्षित करने व उर्दू भाषा के प्रचार - प्रसार के लिए सरकार सहित सामाजिक संगठनों को आगा आना होगा | 
 मुसलमानों को शिक्षित करने के बीच में यह उर्दू भाषा कहाँ से आ गयी ? कहा तो जाता है कि उर्दू किसी संप्रदाय की भाषा नहीं है | तो थोडा तो मूर्ख बनना हमें मनोरंजक लगता है, लेकिन सरासर मूर्ख बनाने कि कोशिशों को हम उचित नहीं समझते | मुसलमानों के निमंत्रण पत्र उर्दू / अंग्रेज़ी में छापते हैं | इसलिए यह कहा जा सकता है कि उर्दू हिंदुस्तानी भाषा है , लेकिन यह मुसलमानों कि थोड़ी ज्यादा है |

* आखिर थानों में महिला पुलिस कान्स्तेबुलों कि संख्या बढ़ानी पडी या नहीं ? मैं कहता हूँ तो मेरी बात कोई मानता ही नहीं - कि देश का बागडोर महिलाओं और दलितों को सौंप दिया जाना चाहिए | फिर चाहे महिलाओं की अस्मिता का प्रश्न हो या आरक्षण की समस्या , सब सुलझ जायगी | और यही केवल एक उपाय है भारत के लिए समुचित | इसमें कई कई गुण हैं | कोई समझे तो ! बस अपने स्वार्थ से निकलने और देश सेवा के भाव से आगे आने की ज़रुरत है |      

* लोग कहते हैं औरत पुरुष से निम्न और भिन्न है | इसे पलट कर क्यों न समझा जाए ? पुरुष औरत से भिन्न अतएव  निम्न है |

* दुर्घटनाओं , अप्रिय घटनाओं का कारण है प्रगति , अंधाधुंध गति | पैसा आ गया , खान पान , कपडे लत्तेवगैरह तो बदल गए पर उस हिसाब से दिमाग नहीं बदला / बढ़ा | उसके अनुकूल मानस तब्दील नहीं हुआ , बुद्धि में अभिवृद्धि नहीं हुई | इसलिए सामाजिक व्यवहार में पाँव लड़खड़ा जाते , क़दम गलत दिशा में पड़ जाते हैं |



एक छोटी सी विनम्र सूचना देनी थी | हम थोडा कट्टर किस्म के धुर नास्तिक Cantankerous Atheist लोग हैं | हम अपनी आस्था और विश्वास का ही प्रचार करते हैं और यूँ अमूमन धर्मों या धर्म विशेष का सन्दर्भ नहीं लेते, फिर भी ज़रुरत पड़ने पर मजबूरन उन पर कटु प्रहार भी कर सकते हैं , क्योंकि स्थितियां सहन शीलता की सीमा से प्रायः बाहर चली जाती हैं | इसलिए धार्मिक सांप्रदायिक आस्तिक मित्रों को सावधान करना है कि यदि उन्हें हमारी आस्था रुचिकर न लगे तो भी उसका आदर करें और हमें चिढ़ाएं नहीं, यदि वे अपनी आस्था का आदर बचाना चाहते हैं तो | बराबरी का [पौरुषेय] व्यवहार वैसे ही करें जैसे एक आस्तिक द्वारा दूसरे आस्तिकों से किया जाना अपेक्षित है | [ नास्तिक जन ]


* लोग मृत्यु दंड की बात करते हैं और यहाँ मैं थानों में थर्ड डिग्री मेथड अपनाने के ही खिलाफ हूँ | नतीजा जो भी हो |
* मैं यह सोच रहा था कि पुलिस थाने अपराध दर्ज करने से क्यों कतराते हैं ? अक्सर सुनने में आता है कि ऍफ़ आइ आर नहीं लिखा जाता | शायद सर्कार द्वारा थानो के मूल्यांकन में यह आंकड़ा काम आता है कि देखो हमारे यहाँ अपराध कम है | यदि सरकार थानों में दर्ज अपराधों को थाने के कार्य प्रणाली से न आंकने की नीति बना ले तो थानेदार उन्हें लिखने से न कतराएँ और सही वस्तु स्थिति , वह जैसी भी हो ठीक हमारे सामने आये |

* प्रमोद जी की बात से , इसीलिये बात आती है कि राज्य कमज़ोर आदमियों के लिए होनी चाहिए | कमज़ोर आदमी ही इकठ्ठा होकर राज्य बनाते हैं , राज्य का निर्माण करते हैं | मजबूत और दमदार लोगों का क्या ? वे तो अपने व्यवसाय - व्यापार का भी प्रबंध कर सकते हैं , अपने बच्चों के लिए शिक्षा का इंतजाम भी और आवास आदि , और अपनी सुरक्षा भी वे भली भाँति कर सकते हैं | इसीलिये हमने [ एकदा फितरतन ] " कमज़ोर पार्टी " बनाने कि सोची, जो हंसी में उड़ गयी मेरे हर ख्याली पुलाव कि तरह |  लेकिन सच यह है तो और ऐसा कहा जा सकता है कि - " राज्य वही जो कमजोरों के काम आये " |


निश्चयात्मा ( नास्तिक जन )


निश्चयात्मा
यद्यपि संशय / संदेह करना वैज्ञानिक प्रवृत्ति है और उसे एक सीमा तक हम स्वीकार करते हैं | लेकिन तदन्तर किसी तो समय हमें किसी निर्णय पर पहुँचना ही पड़ता है | तभी वह हमारा कोई लक्ष्य निर्धारित करता है और हम दृढ़निश्चय होकर किसी मार्ग पर प्रवृत्त होते हैं | सदैव संदेह में रहने वाला तो कहीं का नहीं होगा | संशयात्मा विनश्यते | इसलिए अपने जीवन (सर्वाइवल) के लिए आस्तिक को भी निश्चयात्मा होना पड़ेगा, और नास्तिक को भी संदेहमुक्त होना पड़ेगा | तभी मानुषिक आचरण (धार्मिकता) जीवित रह पायेगी | यह विनष्ट इसीलिये हो रही है क्योंकि आस्तिकों में भी आस्था का छद्म है | जिसे वे आस्था बताते हैं वह तो सर्वांगीण अनास्था है | तनिक से दुःख में या विपरीत स्थिति में वे घंटा घड़ियाल बजने - पूजा पाठ करने - हनुमान चालीसा गाने लगते हैं | या फिर वे पारंपरिक ढोंग का ही पालन करते हैं बिना मन के , बिना सच्ची आस्था और विश्वास के | और यही हाल नास्तिकों का भी है | उन्हें भी विज्ञानंसम्मत ज्ञान तो है कि ईश्वर नहीं है , लेकिन एक संदेह बना रहता है - अरे यदि कहीं वह हो गया तो - - ? इसलिए वे इस दिशा में कोई कार्य नहीं करते जिसके कारण इसका प्रचार प्रसार तो नहीं हो रहा है, यह विचारधारा लुप्तप्राय हो रही है जो कभी अपने उत्कर्ष पर थी | कम से कम भारतवर्ष में तो , लेकिन उस पर अधिक चर्चा संभव नहीं |
किन्तु हम नास्तिकता पर निश्चायात्माओं की तलाश और उनके निर्माण / विकास में सहायक होना चाहते हैं | जो भी जन, स्त्री - पुरुष, इस सत्य पर अपनी अंतरात्मा से दृढ़मत हों कि ईश्वर नहीं है और जो है उसका नाम ईश्वर नहीं है , उनका स्वागत है | फिर उनकी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता पर तो कोई प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकता | वे चाहें तो अपना अपना ईश्वर अपने अपने लिए नया नया ईजाद करें और हमें (आपस में ) बताएँ |     

नया मनुष्य ( नया अध्यात्म )
  * नया अध्यात्म विवेकानन्द का धर्म होगा , खलील जिब्रान का वचन , सुकरात का किस्सा , मीरा - कबीर का भजन , और छाप तिलक सब छीनने वाले खुसरो का कलाम | और - - और - - कहना न होगा - नीत्शे का ऐलान |
* नया धर्म होगा हर व्यक्ति का व्यक्तिगत , उसकी स्वयं अपनाई गई नैतिकता | वरना दृष्टव्य हैं कि मनुष्य की इच्छा के बगैर आज तक उसे कोई भी धर्म नैतिक नहीं बना पाया |
* नया ईश्वर भी होगा मनुष्य का स्वनिर्मित | ऐसा वह हमेशा ही रहा है किन्तु कुछ परिस्थितियों वश मनुष्य का ईश्वर मनुष्य से दूर होता गया , कुछ गढ़ों में क़ैद हो गया , और मनुष्य भी अपने ईश्वर के सन्निकट आने से वंचित रह गया, वह पाखंडों में फँस गया | अब नया ईश्वर वस्तुतः काल्पनिक होगा , साहित्यिक - सांस्कृतिक , मानववादी और मनुष्य के वैज्ञानिक मन के अनुकूल - किंवा मनोवैज्ञानिक | वह सृष्टि का प्रकृति होगा अन्यथा शून्य तो शून्य - वह ' कुछ नहीं ' होगा | 

---------------------------------------------
* हाँ , इसी प्रकार वह दामिनी की भी परीक्षा ले रहा था | फेल हो गई बेचारी ? वह बाबरी मस्जिद गिरने और गुजरात के दंगों में ही परीक्षा ले रहा था | लेकिन इस पर तो कुछ लोग हाय तौबा मचा रहे हैं, और कुछ लोग प्रसन्नता मना रहे हैं | सब अल्लाह की मर्जी ? संकोच आना चाहिए ऐसे ईश्वर की तरफदारी में | लेकिन आये कैसे ? सबसे पहले तो वह विनाश काले सामान्य संवेदना , साधारण बुद्धि का ही विनाश जो कर देता है | और इस प्रकार अपना साम्राज्य कायम करता है | 

मटर का छिलका


* घर में फैला
मटर का छिलका
बकरी आयी |

* हर बात में
साला हिन्दू मुस्लिम
या हिंदी उर्दू |

* ब्राह्मणवादी ?
और इसके सिवा
कोई तो नहीं !


* और ऊपर
और ऊपर जाओ
वहाँ है फल |

* अंग प्रत्यंग
ढीले हो जाते हैं
वृद्धावस्था में |


तेरी रश्मियाँ



[गीत / ग़ज़ल ]
* जो ज़माने को बदले मेरे दरमियाँ,
ऐसी ताक़त है किसमें और वह है कहाँ ? [ मतला ]
* एकदा जो अँधेरे में मैं खो गया ,
मुझको ढूँढा करेंगी तेरी रश्मियाँ |  [ आमद का शेर ]




मुश्किल है कि नहीं

* मुश्किल है कि नहीं ? स्त्रियों को देवी कह दो तो आफत , भोग्या कह दो तो आपत्ति | फिर छोड़ दीजिये इस चक्कर को | वे नंगी घूमें या लड़के बलात्कार करें | सबको आज़ादी चाहिए तो लें आज़ादी और उसकी कीमत चुकाएँ |

* और यदि मानव जीवन के प्रति इतनी बेचैनी है तो जो पुलिस वाला प्रदर्शन के दौरान मर गया उसके लिए किसी के पास दो आंसू क्यों नहीं हैं ? इसीलिये मुझे यह सब छद्म लग रहा है | चलो एक मौका मिला है , हो जाय भीड़ भडक्कम | मोमबत्ती से अपना चेहरा रोशन | राज्य तो वह जो आन्दोलनों से नुकसान करने वालों को भी सजा दे | पुलिस वालों के हत्यारों को भी मृत्यु दंड दे | दामिनी तो अकेले थी , सिपाही के तो आश्रित बाल बच्चे भी होंगे | प्रदर्शन एक बात है और उसका हिंसक होना और बात है | कडाई हो तो इस पर रोक लगे | पर इसे तो लोकतंत्र की रीढ़ माना जाता है, जब कि है यह घातक | यही कारण है कि आज एक खबर में शराब पीने से मना करने वाले पुलिस कर्मियों की दबंगों ने पिटाई कर दी | जब पुलिस अशक्त होगी तो कड़े क़ानून क्या कर लेंगे ?


* कल पकिस्तान से आयी मोहतरमा आलिया जी का सु भाषण सुन रहा था | चुपचाप, मेहमान नवाजी में | अब इसे तंज समझिये या हकीकत, मुझे विश्वास हुआ किअब oratory या भाषण कला द्वारा दोनों देशों के संबंधों में सुधार आएगा | वरना मुझ जैसे मंदबुद्धि , mentally retarded की समझ में तो यही नहीं आता कि कोई हिन्दू मुसलमान क्यों हो जाता है ? फिर उसका देश क्यों बँट जाता है ? लेकिन यह बात ज़रूर समझ में आती है कि कश्मीर / बांगला देश आदि समस्याओं को समाप्त करने के जो उपाय हैं , वे हैं - कि भारत की राष्ट्र भाषा उर्दू कर दी जाय [ वे उर्दू पर भी उर्दू में बोलीं ] , और इसे पाकिस्तान की भाँति इस्लामी राज्य घोषित कर दिया जाय |    


बुधवार, 2 जनवरी 2013

मज़ा आता है


* वह रहता
मामूली आदमी सा
जो महान है |

* कोई इंसान
भूखा क्यों रह जाय
तुम्हारे होते ?

* करनी होगी
इतनी तो बेशर्मी
शर्म आ जाय |

* मज़ा आता है
अकेले जूझता हूँ
मैं अभिमन्यु |

* एक शादी की
अपने मनुआ ने
एक विवाह |

मर नहीं जायेंगे


* तुम रहो मेरे या हो जाओ गैर ,
मर नहीं जायेंगे हम तेरे बगैर |

* अब मेरी पत्नी बहुत बीमार रहती हैं ,
अब बड़ी मुश्किल से सड़कें पार होती हैं |

* गलतियों को माफ़ करना सीखिए ,
ह्रदय को शफ्फाफ करना सीखिए |

* प्ले तो प्ले था , असली वो था ,
जेब औरंग था , दारा शिको था |

* तेरे दीदार की ज़रा खातिर ,
मुसल्सल इंतज़ार तो मैं हूँ |
(To add to Gazal )

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

कहाँ गए थे


* [ कुछ नए अशआर ]

* झूठ मूठ जीवन को झूठ मूठ जीना है ,
थोडा तो सीना और ज्यादा पिरोना है |

* शेष ज़िन्दगी काटनी है अब किसी की याद में ,
किसी शिकवे में नहीं , या किसी फ़रियाद में |

* कहाँ गए थे मुझे छोड़कर ,
अब मत जाना मुझे छोड़कर |
दो दिन से भूखे प्यासे हो ,
जी पाओगे मुझे छोड़कर ?

चार शादियाँ हिन्दुओं में


* नव वर्ष = कुछ लोगों को ऐतराज़ होता है इस नव वर्ष पर | असली नव वर्ष तो 'वह ' है | मेरे ख्याल से न यह असली न वह असली | ये तो हमारी मान्यताएँ हैं | ज़िन्दगी का कोई भी पल जहाँ से ज़िन्दगी शुरू करे सार्थक और सकारात्मक वही नए वर्ष का पहला दिन है | सामान्यतः मैं किसी को बधाई नहीं देता , न इस दिन न उस दिन | लेकिन जब भी किसी का आ जाता है , स्वीकार करके सामान्यतः शुक्रिया - धन्यवाद - थैंक्यू कह देता हूँ | शुभ का आदान प्रदान किसी भी अवसर पर हाथ से जाने क्यों दिया जाय ?

* [ खुराफात ] इस्लाम तो बिलावजह शोर मचाकर बदनाम हुआ | चार शादियाँ तो , सच पूछो तो , हिन्दुओं में जायज़ ही नहीं , आवश्यक होनी चाहिए | क्योंकि इसमें चार वर्ण हैं - ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र | हर वर्ण के सदस्यों को हर वर्ण में एक शादी अनिवार्य हो तो जातिप्रथा खटाखट टूट जाय और भाई संदीप वर्मा मोद पाएँ, प्रसन्न हो जाएँ | इसलिए इस शुभ कार्य का प्रथम पुरोहित उन्हें बनाया जाना चाहिए | अब इसमें एक दिक्कत दरपेश हो सकती है | क्योंकि हिन्दुस्तान में लड़कियों का अनुपात कम है और यहाँ तत्कालीन अरब देश जैसी हालत भी नहीं है, जहाँ युद्धों में तमाम पुरुषों के हत हो जाने से स्त्रियाँ अधिकाधिक बच गईं थीं | ऐसी स्थिति में पंडित वर संदीप जी यह मार्ग निकाल सकते हैं कि कुछ स्त्रियों की डबल डबल शादियाँ करवा दें | लेकिन संभव है कि पुरुष होने के नाते वह इसकी ज़िम्मेदारी न उठायें, यद्यपि वह पर्याप्त स्त्रीवादी भी हैं ? तब यह हो सकता है कि कुछ महिलायें लाल पीली नीली आँखें निकाल कर आन्दोलन पर उतर आयें कि हम औरतों के लिए भी चार विवाह सुसंगत करो | अंततः पंडित जी को मानना ही पड़ेगा , और इस प्रकार जातिगत विद्वेष टूटने के साथ साथ स्त्री पुरुष समानता भी स्थापित हो जायगी | भारत वर्ष के दिन फिर बहुर जायेंगे | नए वर्ष के पहले दिन का कितना बढ़िया आइडिया है यह !

‎* हिन्दू [सवर्ण ] बिलावजह रामायण गाकर अपना गला फाड़ रहे हैं और मोहल्ले की नींद उड़ा रहे हैं | जब कि उन्हें हिन्दू [ अवर्ण ] मनुस्मृति के आधार पर गालियों से अभिसिंचित कर रहा है | ऐसी दशा में बिलकुल सीधे और सहज ढंग से बुद्धिमानी तो इसमें है कि सवर्ण जन मनुस्मृति को अपनी पावन पुस्तक घोषित कर दें | उसी का पठन पाठन और पालन करें | जब आखिर गालियाँ खानी ही हैं तो - -

‎* प्रश्न है - दलित जनों को क्या मनुष्य , मनुज कहलाने पर भी ऐतराज़ है ? असंभव तो नहीं , क्योंकि इनके साथ ' मनु ' जो लगा है |


* नारा है - " आरक्षण विरोधी दलित प्रतिनिधियों का बहिष्कार करो " | अरे बबुआ , यही तो ब्राह्मण या ब्राह्मणवाद कहता है ! इसी नाते तो इसने तुमको अछूत मनाया | तुम ठीक कर रहे हो , ऐसा ही करना पड़ता है | अब बेचारे नेता , यूँ भी दलित, ऊपर से दलितों द्वारा बहिष्कृत ! डबल अछूत | कहाँ जाओगे ?
करो विरोध और दो गाली ब्राह्मण को |  लेकिन रास्ता उसी का गहना पड़ेगा अंततः | देखा नहीं मायावती को ?

* घर पर आने वाले plumber , electrician या अनजान आगंतुक को चाय पिला तो सकता है , चाहे कुल्हड़ में पिलाये या चुल्लू से | वह भले उसे न छुए या गले लगाये | लेकिन दलित तो दलित को भी पानी न पिलाये, ब्राह्मण को तो दूर से ही भगा देगा | काम करवाएगा और खिसका देगा | उनके संस्कार ही ऐसे हैं, और जहाँ से संस्कार मिल सकते हैं उससे उन्हें सख्त नफरत है | बस एक गालियों की संस्कृति है जिसे वे खूब सीख रहे हैं , उन्हें सिखाया जा रहा है |   

* बलात्कार का माहौल , भावभूमि बनाती हैं बिंदास फ़िल्मी कलाकारान, और परिणाम भुगतना पड़ता है साधारण कन्याओं को | बाजारवाद के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है कि इण्डिया की संस्कृति का फल भारतवर्ष को धोना पड़ता है |


* अभी तक भारतीय जातियों / जनजातियों की जीवन शैलियों / प्रथाओं का मजाक विदेशी मीडिया ही उड़ाता था | कि देखो , यहाँ वे नग्न रहता हैं , ऐसे विवाह करते हैं , यह - वह खाते पीते हैं | लेकिन अब देश की कुप्रथाओं को उछाल उछाल कर उनकी खिल्ली अब हमारे महान दलित चिन्तक भी करने लगे हैं | और इसमें उन्हें मज़ा आता है , क्योंकि उस संस्कृति में वे स्वयं को शामिल नहीं समझते | यह देखो यहाँ नारी पूजते हैं , सीता की परीक्षा लेते हैं , गाय खाते थे ,कन्या को दान करते हैं , सांप को दूध पिलाते , होली - दीवाली - दशहरा इस इस कारण से मानते हैं , संस्कृत पढ़ते हैं , पापी राम को भगवान् मानते हैं , ज्ञानी रावण को जलाते हैं , इत्यादि अनंत | चलिए आशा करें , इनकी आलोचना से हिन्दुस्तान कुछ सुधर जाए ! 
विदेशियों को जहाँ भारत का मजाक उड़ना अच्छा लगता है , वहाँ हमारे आलोचकों को हिन्दुओं को अपमानित करने में बड़ा मज़ा आता है | खुश रहो अहले चमन , हम तो सफ़र [ suffer ] करते हैं |  

* ये दलित और पिछड़े सारे के सारे मानते ईश्वर को हैं , और दोष देते हैं ब्राह्मणों का ! जातियां यदि ब्राह्मण की बनाई होतीं तो कब की ख़त्म हो गयी होतीं | यह सार्वकालिक सामाजिक जीवन के अनुभवों और व्यवहारिकता पर दृढ़ता से आधारित है | इसे ये दलित ख़त्म तो क्या करेंगे , उसका पालन पोषण करते हैं और खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे |

* आगे कभी , शीघ्र ही , पुलिस तो प्रदर्शन करेगी [ लाठी भांजने , अश्रु गैस छोड़ने , पानी की बौछार करने आदि का ] , और आन्दोलनकारी उसे पीट पीट कर लहू लुहान कर देंगें |

* देखिये, बात करनी चाहिए साफ़ और जो सच लगे , भले उससे बदनामी मिले | मुझे मोमबत्तियाँ बिलकुल अविश्वसनीय लग रही हैं |


* लगता है जाति प्रथा समाप्त करना आप लोगों के वश का काम नहीं है | अब यह काम मैं करूँगा |


त्रुटिपूर्ण चिंतन

* त्रुटिपूर्ण चिंतन हेतु पूर्ण अधिकृत मैं मनुष्य हूँ ।  

* विज्ञानं सचमुच ब्रह्माण्ड को नहीं जानता | वह इसका दावा भी तो नहीं करता | लेकिन श्रीमन ! आप क्या सब कुछ जान गए ? कहते तो आप ऐसा ही हैं | कैसे जान गए आप ? अनुमान से ? तो भाई , अनुमान तो अनुमान है , ज्ञान तो नहीं |

* नई मनुष्यता का पहला नियम | बाहर से कुछ भी न पता चले कि आप किसी ख़ास धर्म या मज़हब के हैं | आपका व्यवहार , सत्य आचरण ही आपकी असली पहचान होगी | दिखावा कुछ भी नहीं , न कुछ होने का कोई अभिमान ही |

* 'ज्ञान' होता है | 'ज्ञान ' होना चाहिए | ज्ञान सबको सुलभ नहीं होता | लेकिन जिसे भी ज्ञान प्राप्त हो , उसे उस पर अहंकार नहीं करना चाहिए (वैसे ऐसे होता भी नहीं मैं तो बस सावधान कर रहा हूँ) | उसे ज्ञान के भार से झुक जाना चाहिए | विनम्र हो जाना चाहिए | फिर शांत , फिर मौनवत, फिर मौन - - , फिर चिर मौन | वही व्यक्ति चिरायु होता है |

* ‎* ईश्वर को याद करो | लेकिन किसी एक विधि से नहीं , अनेक विधियों से |
हवा से, अब्र से, गुल से पयाम लेता हूँ ,
मैं हर बहाने तुम्हारा ही नाम लेता हूँ |

* ‎* ईश्वर को किसी नाम से पुकारना हमें नामंजूर है | इसलिए हम नास्तिक हैं | वरना - -

‎* धर्म ही है धर्म हमारा - ऐसा क्यों न कहें ? इसमें हिन्दू - मुसलमान - सिख - ईसाई जोड़ने की क्या ज़रुरत है ?

* " उस समय ईश्वर कहाँ था ? | कहना अच्छा तो नहीं लगता , लेकिन जब इस पर किसी अवसर पर ध्यान नहीं दिया जाता तो लिखना पड़ता है | अपने प्रिय संपादक में तो मैं ऐसा स्तम्भ ही लिखता था -" उस समय ईश्वर कहाँ था ? " , जब तीर्थों / तीर्थ यात्राओं में कोई दुर्घटना घटती थी | इसी प्रकार दिल्ली दुर्घटना पर क्या यह संदेह व्यक्त करना स्वाभाविक नहीं है कि जब लफंगे दामिनी की आँतें निकाल रहे थे, उस समय ईश्वर कहाँ था ? तथाकथित सर्वशक्तिमान, सर्व व्यापक ? आस्तिक जन बहाना बना लेंगे - उस समय वह बसंत विहार में नहीं था | बल्कि मैं तो आरोप लगाऊँगा - उस समय वह वहीँ था और उसी की देख रेख में सब कृत्य संपन्न हुआ |  नहीं था तो फिर उसके होने का क्या प्रयोजन ? मनुष्य को जब अस्पताल और कानून के सहारे रहना है तब उसकी क्या ज़रुरत ? उसे मनुष्यों की दुनिया से अलग हो जाना चाहिए | शीघ्र अतिशीघ्र | 


* इसी प्रकार, इतनी ठंडक पड़ रही है | फिर भी लोग कहते हैं उसका प्रबंध बिलकुल परफेक्ट है | खाक है | यदि आदमी ने जाड़ागर्मी बरसात से बचने का इंतजाम न करता तो ईश्वर के निजाम में तो वः भूमि गति को ही प्राप्त हो जाता | वह अगर नुक्कड़ से हमारे कल्लू भाई बिजली मिस्त्री या बलि प्रेक्षागृह के संगीत कार्यक्रमों में साउंडसिस्टम पर बैठने वाले लगभग नाबालिग लड़के को ही बुला ले जाता तो वह एक नाब ऊपर करता एक खूंटी नीचे खिसकाता और जाड़ा गर्मी एडजस्ट कर देता | बड़े मियाँ हमारे संसद से ही कुछ सबक ले सकते थे | जाड़ा पाल बिल को स्थगित करके इसे मई जून के लिए स्थगित कर सकते थे | लेकिन प्रश्न तो वही मौलिक है - जब श्रीमान जी स्वयं कुछ होते तब न ? अब कुछ नहीं को तो कुछ भी माना जा सकता है | इसी सुविधा का लाभ आस्तिक जन बड़े मजे से उठाते हैं | मजा लेते / खाते हैं विज्ञानं का और गाते हैं भगवान् का |  
* यह आपकी कल्पना है और ऐसी कल्पना करने के लिए आप स्वतंत्र हैं | इन्ही कल्पनाओं से तो सारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं | और हाँ , एक बात और | यदि आप नास्तिक हैं तो आप की टिप्पणी का सहर्ष मज़ाकन स्वागत है | लेकिन यदि आप किसी मज़हब के practitioner हैं तो आप अपनी आस्था का पालन कीजिये और हमारी आस्था का आदर कीजिये | अनावश्यक विवाद मत कीजिये | हम इन बहसों से निपट कर यहाँ आये हैं |
‎

अजीब मुल्क


‎* यह देश है
नाम हिन्दुस्तान है
अजीब मुल्क |

* नीचे ऊँचे हो
तो बराबर कैसे ?
असमान हो |

* दृष्टि में गिद्ध
सृष्टि में कृमि सम
होते हैं हम |

* प्रभुत्व होता
फकीर कि फिक्र में
छेड़ना नहीं |

* कुछ न करूँ
अन्यमनस्क बैठूँ
कुछ न धरूँ |

* कितना देखें
दायें बाएँ या पीछे
टक्कर बचे |

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

दलित मनुज

* प्रश्न है - दलित जनों को क्या मनुष्य , मनुज कहलाने पर भी ऐतराज़ है ? असंभव तो नहीं , क्योंकि  इनके साथ ' मनु '  जो लगा है |

सुबह का अखबार

[ग़ज़ल ]
* सुबह का अखबार तो मैं हूँ ,
अब इतना गुनहगार तो मैं हूँ |

कुछ बुरी ख़बरें ले आया हूँ ,
अपशकुन इश्तहार तो मैं हूँ |

और कुछ चिट्ठियाँ लिख रखी हैं ,
डाकिये की गुहार तो मैं हूँ |

छपी हैं नग्नतम कुछ तस्वीरें ,
आपके मन की बात तो मैं हूँ |

खरीदो , बेच लो अब जो कुछ भी
अब तो एक व्यापार तो मैं हूँ |
# # #

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मनुष्यों से घृणा


* [ नयी बात ]
आज सुबह दो विचार मन में आते हैं | उन्हें सु और कु में विभाजित करना निरर्थक है | विचार सिर्फ  विचार होते हैं | दुनिया का आधा नाश इन्ही सुविचारों से हुआ है | इसलिए इसे कुविचार ही माना जाय तो बड़ी कृपा होगी |
     एक तो यह कि प्रकृति अब मनुष्य को मिटाना, बरबाद करना चाहती है | हो सकता है बदला लेना चाहती हो | या, कारण जो भी हो, मंशा कुछ भी हो | मैं उसकी विवेचना में नहीं जाऊँगा | उसे मैं जानता भी नहीं |
    दूसरा यह कि अब मनुष्यों से घृणा किया जाना चाहिए | ऐसा ही दुष्ट और नालायक है यह | घृणा का ही पात्र है यह | बहुत हो गयी प्रेम की बातें, बहुत धोखे खाये पीढ़ियों ने | सारे धर्म - मज़हब प्यार मोहब्बत के नाम पर ही उगे और कहर ढाए | प्रेम ने बहुत छला | परस्पर घृणा के संतुलन से ही जीवन सही होगा | तो, मैं तो शुरू करता हूँ सर्वप्रथम अपने आप से, अपने प्रियजनों - परिवार से घृणा करने से | फिर आता है क्रम उसका जिसे सुंदर कहा जाता है और आधी दुनिया उस आधी दुनिया पर मरी जाती है | मैं औरतों से घृणा करता हूँ | फिर तो ईश्वर, देवी -देवताओं से नफरत करनी ही पड़ेगी |   #
[20/2/13]

प्यार का चक्कर
* जब से मैंने माना कि प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं होती , तब से मनस्क्लेश का एक नया चक्कर शुरू हो गया | कि हाय ! तब तो मुझे भी कोई प्यार नहीं करेगा , अब क्या करूँ , मेरी जीवन नैया कैसे पार होगी ?   क्या यह ऐसे ही नीरस और शुष्क रह जायगी ?
लेकिन आगे का ध्यान किया तो पाया कि प्यार का जो जल तुम्हे दिखाई दे रहा है , वह तो विज्ञानं के टोटल रिफ्लेक्सन का खेल है | वहाँ पानी नहीं है | इसी फेनामेना को मृग तृष्णा कहा जाता है | तब मन को समझाया - रे मन , जब प्यार जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं तो तुझे कोई प्यार क्यों करेगा ? कर ही कैसे सकता है ? तो सच्चाई तो यही है , इसे सहर्ष स्वीकार करो | ऐसे में तो यदि कोई तुमसे कहे कि " मैं तुमसे प्यार करती हूँ " तो उसे केवल तन की भूख समझो | उसे मन से मत जोड़ो वर्ना भ्रम और मृग मरीचिका में पड़ोगे तथा दुःख और संताप झेलोगे | अच्छा ही तो है और सही भी जो मुझसे कोई प्यार नहीं करता | इसकी आशा ही मत करो क्योंकि वस्तुतः ऐसी कोई चीज़ नहीं होती | निश्चिन्त - निष्काम चैन की नींद लो ,और अपना जीवन सार्थक सार्वजानिक कार्यों में लगाओ | शरीर की आवश्यकता को, शरीर की आवश्यकता की                                                                ecrrrfffffffsssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssssपूरी करो | प्यार के चक्कर में मन और आत्मा का सत्यानाश मत करो | इससे एक लाभ यह भी है की तुमसे कोई यह नहीं कहेगा की तुम उसे प्यार करो | न तुम किसी को प्यार करो , न कोई तुमसे प्यार करे तो जीवन में न लाभ हो न घाटा , न इनकी बिलावजह चिंता , न कोई फ़िल्मी उपन्यास कथा का निर्माण , जिनसे प्रोत्साहित होकर तमाम युवा ज़िंदगियाँ बरबादी की और कदम बढ़ाती हैं | आमीन |  20/2/13

* " CULTURE  IS POLITICS OF SOCIAL LIFE  "
इस विचार को सोचते जायंगे तो इसे क्रमशः सत्य ही पाएंगे | यह तो हम एक दूसरे से शिष्ट सभी - प्रेम व्यवहार करते, सलाम दुआ, खान पान करते, तीज त्यौहार मानते / शरीक होते हैं, सब ज़िन्दगी की राजनीति है | राजनीति का मतलब जिसमे बनावट और झूठ ज्यादा हो और सच्चाई की मात्रा कम | इस प्रकार हम अपने सुख और शक्ति को बढ़ाते हैं | अन्यथा हम अकेले , अलग थलग न पड़ जायं ? इसीलिए जो सीधे सादे लोग सामाजिक कम होते हैं वे कमज़ोर पड़ जाते हैं | और जो समाज Social Life को सक्षम राजनीतिक रूप से जीता है वह अधिक शक्तिशाली हो जाता है | यहाँ तक की वह राज / शासन करने की स्थिति में आ जाते हैं | 21/2/13

अध्यक्षीय भाषण के बाद


* ईश्वर एक कविता है | स्वयं गढ़ों और गाओ |

* तुच्छ बातों से ईश्वर बनाया भी नहीं जा सकता , न कविता | ये सब श्रेष्ठ / उन्नत कलाएं हैं |

[ अध्यक्षीय भाषण के बाद , अर्थात वह टिपण्णी जो घटना - विवाद के बाद थोडा रुक कर की गयी हो ]
* यदि विचारकों का कोई department होता और मैं उसका अध्यक्ष, तो सच मानिये , सारे विचारकों/ विचार कर्मचारियों की और से ज़िम्मेदारी लेते हुए अब उस पद से इस्तीफ़ा देने का मेरा मन है | क्या फायदा हमारे होने से जब हमारे सारे विचार धडाधड ध्वस्त / धराशायी हो रहे हैं, झूठे साबित हो रहे हैं | श्वेत पत्र १९६० के दशक से जारी करता हूँ , जब मैं इस विभाग में कूदा | तब सिनेमा की खिलाफत पर विचारक कहते थे कि मनोरंजन के साधनों के अभाव में लोगों से बच्चे अधिक पैदा हो जा रहे हैं | लेकिन सिनेमा ने जनसँख्या नियंत्रण में तो कोई भूमिका नहीं निभाई | फिर आया कि पर्दा प्रथा मर्दों को औरतों की और अनावश्यक आकर्षित करता है | हमने पर्दा हटा दिया | फिर छींटाकशी क्यों होती है ? हमने स्त्री पुरुष संबंधों को खुला और आसान बनाने का विचार दिया | मुक्त यौन की वकालत कर यौनशुचिता के प्रति दकियानूसी अवधारणा का विरोध किया | पार्कों में युवाओं के मिलन को उचित कहा और उन पर सांस्कृतिक / पुलिसिया कार्यवाही का विरोध किया | वैलेंटाईन डे मनाया | जहाँ तक संभव हुआ स्त्री पुरुष संबंधों को सहज - सरल करने का प्रयास किया | इसके अतिरिक्त हम धारा ३७७ के भी पक्ष में रहे | हमने वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने का भी विचार दिया | वह संभव नहीं हुआ पर उसकी उपलब्धता तो है ही | फिर बलात्कार क्यों हो रहे हैं ? इसकी ज़रुरत क्यों है और गुंजाइश कहाँ है ? एक गलती मानी जा सकती है हमारी जिस पर अपराधियों के मनोबल बढ़ाने का दोष मढ़ा जा सकता है - वह है - हमने मृत्युदंड की अवश्य खिलाफत की और उसे अनावश्यक बताया | लेकिन वह तो बलात्कार हो जाने के बाद की सजा है | मेरा तो अपने विभाग के ऊपर आरोप यह है कि हम विचारकों के होते हुए बलात्कार की मानसिकता समाज में पनपने क्यों पायी ? बलात्कार होते क्यों हैं ? हम इसे रोकने का रास्ता क्यों नहीं बना पाए ? इसलिए मेरा त्यागपत्र |
मेरी सिफारिश है संदीप , नीलाक्षी , पूजा शुक्ला, रूपा राय, चंचल भू , उज्ज्वल जी एवं अपने तमाम अनुज - अग्रज मित्रों से कि वे इसे स्वीकार कर मुझे जलील करें , जूते मारें , मुझ पर थूकें | मैं आज बहुत शर्मिंदा हूँ |    

मनुस्मृति जलाकर एक प्रयास और करता हूँ , लेकिन अब तो अपने ऊपर यह भी विश्वास नहीं रहा कि इससे भी बलात्कार ख़त्म होगा |
क्या अब यही कहने का समय आ गया है कि - लडकियों अन्दर जाओ ?

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

मेरी क्रिसमस


[व्यक्तिगत ]
* मुझे दूसरों के गलतियों की सजा भुगतने में बड़ा आनंद आता है | भुगता ही जीवन भर भाई , बेटा - बेटी अधिकारी - मातहत की गलतियों की सजा | अब समझ में आया आज मुझे ईसा मसीह क्यों ज्यादा याद आये ! आज मेरी क्रिसमस के दिन अपने परिवार द्वारा किये गए वाहन दुर्घटना की सजा मुझे भुगतनी पड़ी | लेकिन मैं मनुष्य हूँ न ? ईश्वर की औलाद नहीं | इसलिए दुखी हूँ थोडा |

परम आस्तिक


* परम आस्तिक = नास्तिक |

* सदुपयोग
धन - धान्य का करूँ
ईश्वर का भी |

* Just now I thought that Ishwar is an asset of human race . Is not it ? Human civilization  has devoted a lot of time to invent , reinvent and revive it [ should I write 'HIM' ?] . We, rationalists-atheists should not let it be spoiled and go all in vain . I don't find any wisdom to kill him . Many did try . We should take lesson from what happened and what we gained . Just now , I am in an utilitarian mood . And above all , we can not go too much far away from our beloved common human beings , ordinary people , who finds solace in his presence . So , let him remain as much he is useful to be . Don't throw the baby along with the bath water . This much I can say today at the instant .

लड़ लो


[ कहानी ]
                       " लड़ लो "
* - माँ का दूध पिया है तो आओ लड़ लो |
= माँ का दूध ? वह तो मैंने पिया नहीं |
- क्यों ? क्या माँ नहीं थी ?
= नहीं , वह तो थी | अब भी है , पर मैंने उसका दूध पिया नहीं |
- माँ थी ! तब कैसे नहीं पिया ?
= उसने कभी अपना दूध मुझे पिलाया नहीं |
- फिर कैसे पले , बढ़े /
= माँ बताती है , उसने मुझे डिब्बे का दूध पिलाया |
- तो चलो यही चैलेन्ज रहा कि पिया हो असली डिब्बे का दूध तो आओ लड़ लो |
= अब यह भी मैं नहीं कह सकता कि डिब्बे का दूध असली था या नकली ?
- तो फिर तुमसे क्या लड़ना | चलो भागो यहाँ से |
# # #

तुम्हारा सत्य


[बड़ी पुरानी कविता ]

* तुम्हारा सत्य
काला है ,
हमारा झूठ -
सफ़ेद है |
# #


[ कविता ]
* मुसीबत हमेशा
मेरे पीछे चलते हैं ,
पीछे लगे रहते हैं ,
मेरा पीछा नहीं छोड़ते |
अर्थात, मैं
उनके आगे चलने वाला,
उनका सर्वमान्य
नेता हो गया हूँ |
# # #  



* जिनसे उम्मीद थी कुछ देंगे, वह लूट गए ,
जिन पर संदेह था कि लूटेंगे , दे कर गए |

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

औरतों से डरो


* मैं वामपंथी केवल इस तरीके से माना जा सकता हूँ कि मेरी पत्नी का स्थान बायीं और है , और मैं पत्नी के पक्ष में हूँ |

* बहरहाल यह तो तय हुआ मालूम होता है कि भारत देश में बलात्कारियों की संख्या बस वही आठ- दस ही है जिन्होंने दिल्ली में काण्ड किया | और इतने सारे आन्दोलनकारियों में कोई वैसी पुरुष मानसिकता का हो  इसका सवाल ही नहीं उठता | तो स्थिति संतोषजनक ही मानी जायगी | सवा अरब की जनसँख्या में एक दर्जन अपराधी कोई मायने नहीं रखते |

* औरतों से डरो -
आजकल हमारी औरतों को यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, यानी अपनी पूजा कराने से सख्त ऐतराज़ है | उन्हें भाई -बाप -पति से अपनी रक्षा कराना भी नामंजूर है | ऐसी दशा में पुरुषों के लिए हमारा क्या सन्देश हो सकता है ? यही तो, कि यदि अपनी सलामती और खैर चाहते हो तो औरतों से डरो |

* कोई न देगा
बच्चू , साथ तुम्हारा
देखते रहो |

* आँख गड्ढे में
धँसती जा रही हैं
बुड्ढा घूरता |

* जात बताता
आप का व्यवहार
नाम थोड़े ना ?

* हमारा सार ही कुछ बकवास है | and so, members with fake ID are no problem with us .

* स्वर्ग - नर्क मानिए या नहीं , पर स्वर्गवासी होने से कहाँ बच पायेंगे, और बैकुंठधाम जाने से ?