सोमवार, 24 दिसंबर 2012

अकेला पेड़


[ कविता ]        
                  अकेला पेड़
* मैं एक पेड़ तो हूँ
पर इतना बड़ा नहीं
कि कोई मुझे छू न सके ,
न ही मैं कोई बरगद
जिसके नीचे
कोई पेड़ न उगे ,
फिर भी न जाने क्यों
मेरे आस पास के सारे पेड़
मुझसे अलग हो गए , या
मुझे अलग कर गए !
कुछ अपना क़द
छोटा करते करते
बौने हो गए |
कुछ तिनके बन गए
यहाँ तक कि भूल गए
तिनके का महत्त्व |
और जो बड़े बनते थे
मुझसे दूर छिटक कहीं
इकट्ठे खड़े हो गए |
मैं अकेला पड़ गया
जब कि मैं
अकेला नहीं रहना चाहता था |
चलो , ठीक हूँ अकेला ही भला
भूले भटके , थके, हारे- मांदे
राहगीरों को छाया- सुकून देता |
पेड़ों के घने जंगलों में तो
लोग जाने से डरते हैं |
# #

[ कविता ]
                    भेदभाव
* उन्होंने काला रंग देखकर
उनसे भेदभाव किया ,
अब ये गोरा रंग देखकर
भेदभाव करेंगे |
पहले उन्होंने जात देखकर
भेदभाव किया
अब ये जात देखकर
भेदभाव करेंगे |
रहेगा तो भेदभाव
चाहे वह मूलभाव हो
या हो बदले का भाव |
नहीं मिटना
भेदभाव का भाव |
# #

निर्विवाद

* मूल प्रश्न - मैं मूरख तो यही नहीं समझ पाता कि प्रपत्रों में अपना ही नाम क्यों लिखना पड़ता है ? क्या वह सच होता है ? प्रज्ञा , संदीप , कामेश्वर , धीरेन्द्र , शिवानन्द क्या वाकयी ऐसे हैं ? क्या मैं उग्र हूँ जो मैं लिखता हूँ ? यह नाम तो बाप ने दिया | इसलिए अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए उनका भी नाम घसीट लेता हूँ | [ फिर जब बाप ने पति के हवाले कर दिया , तो उन्हें भी सेफ्टी पिन से टांक लेती हूँ ]

* दलितों को , ईमानदारी से , एकता की दृष्टि से , कम से कम यह तो करना ही चाहिए कि वे अपने परिवार का इलाज दलित डाक्टर [ ब्राह्मण डाक्टर से तो कतई नहीं ] और अपने बच्चों का दाखिला केवल दलित प्रबंधित स्कूल / कालेज में कराएँ , ट्यूशन केवल दलित शिक्षक से |

* चिंता की कोई गल नी है | देश , न तब आंबेडकर जी के अजेंडे पर था , न अब वह आंबेडकर वादियों की सूची में है | केवल अपना स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए | देश पर इस्लाम की जकड कैसी कसती जा रही है , इससे किसी को क्या मतलब ? " दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल " , यह बात गांधी से ज्यादा आंबेडकर जी और कम्युनिस्टों पर खरी उतरती है | ले ली उन्होंने आज़ादी और भरपूर उसका फायदा , बिना आज़ादी की लडाई लड़े - केवल रार और तकरार के बल पर |


खिलवाड़ खिलवाड़


" दबंग " के खिलाफ आन्दोलन क्यों नहीं ? जड़ों में खाद पानी डालते रहने से क्या पत्तियाँ सूख पायेंगी ?

God is not responsible for any evil of the world . He can not be made accountable for anything happening in the world . Because , as a matter of fact , he is non- existent . He is nowhere in this world .

[ डायरी ]
-धीरे धीरे संस्कार मन में बैठ जाते हैं और वे अपने हो जाते हैं | हमें प्रिय लगने लगते हैं | फिर हम ब्राह्मण हो जाते हैं , हिन्दू हो जाते हैं | तब राम - कृष्ण - सीता - गीता - रामायण हमारे हो जाते हैं | हम उनके विरोध या अपमान , चाहे वह कितना ही उचित हो , सह नहीं पाते | इसी इसी प्रकार रहते रहते हम किसी देश के हो जाते हैं, उसके लिए लड़ने लगते हैं |

खिलवाड़ खिलवाड़ | इसे यूँ लें जैसे कूड़ा - कबाड़ |
THOUGHT  PLAYERS  : खेलत में को काको गुसैयाँ | इसे खिलंदड़ी स्वभाव में स्वीकार करें और माहौल को अनावश्यक रूप से बिगाड़ें नहीं | यद्यपि हम गंभीर विचारों से लैस हैं तथापि विचारों का बोझ लेकर नहीं चलते | बस आये विचार , गए विचार | उन्हें जहां जितना रहना होगा रहेंगे अन्यथा गुम हो जायेंगे | कोई चिंता फिकिर की बात नहीं है |  

* आप चाहे कितने भी बुद्धिमान हों , विद्वान् या दार्शनिक | आपको कोई प्रणाम करेगा तो उसका उत्तर आपको देना ही पड़ेगा | आप अपनी दुनिया में खोये नहीं रह सकते | इसका हक भी नहीं है आपको

* मेरी एक ख़राब आदत है , जो मेरी परेशानी का कारण है और , संभवतः , मेरी सफलता का राज़ भी | वह यह कि मैं जो ठान लेता हूँ उस करके ही रहता हूँ | मतलब यह नहीं कि मैं हिमालय उठा लेता हूँ , बल्कि यह कि यदि मैंने सोच लिया कि यह चारपाई आज मैं बुन डालूँगा , तो उसे मैं बुन ही डालता हूँ |  

रविवार, 23 दिसंबर 2012

Some Slogans =


Some Slogans =
* धर्म ही है धर्म हमारा - ऐसा क्यों न कहें ?  इसमें हिन्दू - मुसलमान - सिख - ईसाई जोड़ने की क्या ज़रुरत है ?
* धर्म के स्थान पर लोग  भारतीय , भारतीयता आदि लिखते हैं | उनकी भावना सराहनीय है  | पर यह तो राष्ट्रीयता का नाम हैं | धर्म का तो सर्वभौमिक Universal  नाम 'धार्मिक/ Religious' ही उपयुक्त है | जब तक हमसे हमारा धर्म पूछा जाता है |
     
* भगवान ने तो हमें जानवर के रूप में बनाया और पृथ्वी पर भेज दिया | आदमी बनना तो अब हमारा काम है , हमारे जिम्मे !

* मेरे  विचार  से  HUMANISM  का हिंदी में सही अनुवाद = " मानव पंथ " और HUMANIST का मानव पंथी होगा , मनुष्य आधारित नैतिकता को जीने वाला संप्रदाय |

* अब दो धर्म बनते हैं मनुष्य के | जैसा वी एम तारकुंडे ने महात्मा गाँधी पर लिखते हुए उसका शीर्षक दिया था = SECULAR AND RELIGIOUS MORALITY  | उसी तरह दो धर्म मनुष्यों द्वारा धारण किये जायेंगे | सारे किताबी , ईश्वरवादी , परलोकवादी  धार्मिक नैतिकतावादी होंगे , और नास्तिक इहलोक वादी , बुद्धिवादी , विज्ञानवादी , लोग सेक्युलर होंगे |

IHU - 2 , जय जगदीश हरे

   Published in " HUMANIST OUTLOOK " , a journal of Indian Humanist Union - Vol - 13  No. - 5 , Autumn 2012  as -
Hindi column  By - Ugranath Nagrik                                 
                                                                                 जय जगदीश हरे 
                                                                                  --------------------
  *   मित्र आये तो कुछ गुस्से में थे | मुझसे बोले - हम तो यही समझते थे कि तुम नास्तिकता के अति पर हो जो हमें कुछ गलत लगता था | par तुम तो फिर भी अपने व्यवहार में सामाजिक नैतिकता का ध्यान रखते हो जो हमें प्रिय है | लेकिन इधर तो लोग हैं जो आस्तिकता का इतना अति किये हुए हैं कि वे अनैतिक हुए जा रहे हैं |
- - क्या हुआ , हो क्या गया ?
-  " मुझे आश्चर्य होता है | गोमती पुल के हनुमान मंदिर पर देखता हूँ भीड़ बढ़ती जा रही है | बड़े - बड़े अधिकारी , सेठ, सामंत ,साहूकार  कारों से आते हैं , मंदिर जाते हैं | तमाम उच्च शिक्षित , विज्ञान शिक्षित लोग भी निश्चित ही होते हैं इनमें | आधुनिक पीढ़ी की युवा - युवतियाँ भी और तमाम राहगीर सड़क से गुज़रते शीश झुकाना नहीं भूलते | गाड़ियों वाले यह भी नहीं सोचते कि सड़क पर जाम लग रहा है ? ऐसी पढ़ाई , शिक्षा , आधुनिकता और विकास से क्या फायदा ? देखता हूँ संपन्न घरों में अखंड रामायण का चौबीस घंटे पाठों की भरमार हो गई है | भगवती जागरण देखते  हैं आप, गणपति बप्पा का हुजूम और काँवरियों का कारवाँ ? यह सब क्या है ? क्या प्रगति की निशानी ? " 
- - ईश्वर पर आस्था है , आस्तिकता है |
-  " लेकिन नैतिकता नहीं | यही वे लोग हैं जो देश और समाज को बर्बाद करने में लगे हैं | येन केन प्रकारेण पैसा कमाने , भ्रष्टाचार - घोटाले करने में संलग्न हैं और इसमें इन्हें तनिक भी संकोच करने की प्रेरणा इनके प्रभु से नहीं मिलती | तो ऐसी आस्तिकता - धार्मिकता से क्या लाभ ? इससे तो तुम्हारी नास्तिकता भली जो ईश्वर को पूजते नहीं पर ईश्वर की सच्ची पूजा , इंसानियत के प्रति समझदारी - ज़िम्मेदारी तो पैदा करती है ! "

             सचमुच बड़ी चिंताजनक स्थिति है और विचारणीय विषय | लोगों में इतनी कथित आस्तिकता क्यों बढ़ रही है जब कि उनकी आर्थिक -शैक्षिक- सामाजिक दशा में बहुत सुधार आया है  और भौतिक तरक्की हुई है ? धर्म और ईश्वर के प्रति भक्तिभाव , समर्पण गरीबों की ज़िन्दगी का सहारा, तो समझ में आता है, पर यहाँ तो यह सब धन -संपत्ति का खेल , धनिकों का व्यापार दिखाई पड़ रहा है | अनाप - शनाप , अनुचित ढंग से अर्जित धन का अमर्यादित प्रदर्शन और इसके ज़रिये समाज में प्रतिष्ठित कहलाने की झूठी ललक बढ़ती जा रही है , जो इंसान और इंसानियत को अंततः गर्त में ही गिराएगी |
             सरकारी कर्मचारी, अधिकारियों के बारे में तो यह लगता है कि इसका कारण उनकी नौकरी की अनिश्चितता है | उन्हें यह भय लगा रहता है कि उनका यह पद , रुतबा कहीं छिन न जाय ! और फिर इस चाह में कि इस दिशा में उनकी और प्रगति हो | अब उनकी इस अस्थिर , संशयग्रस्त मानसिकता का कारण , एक तो उनमें आत्मविश्वास का अभाव होता है | ऐसे लोग कमज़ोर और डरपोक होते हैं , जीवन के मार्ग पर कठिन संघर्ष का साहस इनमे नहीं होता | तनिक भी विषम या प्रतिकूल स्थिति में इनका मनोबल टूटने लगता है |

[ दूसरे , इनमें लड़खड़ाहट  इसलिए होती है क्योंकि  वे जिस पद पर होते हैं , उसके वे योग्य नहीं होते | यदि योग्य होते हैं तो क्षमतापूर्वक  कार्य करने की प्रेरणा नहीं होती | यदि क्षमता है तो कर्त्तव्यपरायणता  को  व्यवहार में उतारने का  कोई संस्कार नहीं होता | और यदि वह भी है तो ऐसा करने वाले को उचित श्रेय -सम्मान - ईनाम  ( पारितोषिक ) नहीं मिलता | वह देखता है कि लोग गुण नहीं , धन दौलत की इज्ज़त करते हैं | फिर कोई क्यों मेहनत और ईमानदारी की ओर प्रेरित हो , और  सर उठा कर कहे - मैं अपना काम निष्ठां पूर्वक करता हूँ , और मैं संतुष्ट हूँ | मुझे किसी का भय नहीं | कोई क्यों न करे "हराम " की कमाई जब इसके लिए एक ऊपरवाला संरक्षण देने के लिए सहज उपलब्ध है ? ]
       तब , इसलिए वह  मूर्तियों , मंदिरों , पूजा -पाठ की ओर अग्रसर होता है | इसीलिये हैं गली - कूचों , सड़कों पर निरंतर , अविराम बढ़ती जा रही देवी - देवताओं की कुटिया और महलों की संख्या , इनके भक्तों की औकात के अनुसार ! और आदमी उनकी परिक्रमा में व्यस्त है  | उसे यह सोचने की फुर्सत नहीं , कोई चिंता नहीं कि वह तनिक  विचार , समीक्षा तो करे वह जीवन में वास्तव में क्या कर रहा है ? धर्म के नाम पर कितनी अनैतिकता ' धारण ' करता जा रहा है ? करे भी क्यों ? है न भगवान यह सब सोचने - करने के लिए ! यह उसकी ज़िम्मेदारी है | हम तो वही कर रहे हैं जो सब कर रहें हैं | सब तो फल फूल रहे हैं , फिर हम ही क्यों माथा खपायें , अपना सुख चैन गवाएँ , जो हमें इस जन्म में प्राप्त हो रहा है ? क्या हर्ज़ है कुछ फल -फूल- लड्डू लेकर मंदिर हो आने में ? सब दोष समाप्त ! तो चलो तीर्थ यात्रा कर लें , गंगा नहा लें , सारे पाप मिट जाएँ ! समाज के नुकसान के क्या एक हम ही ज़िम्मेदार हैं ? और एक हमारे नैतिक - ईमानदार होने से अंतर ही क्या पड़ेगा ? जो दबे - कुचले , गरीब और वंचित हैं , वे अपने पिछले जन्म का फल भुगत रहें हैं , तो हम क्या करें ? हमको देखो , जो कुछ कर रहे हैं वह ईश्वर को समर्पित भी तो कर दे रहे हैं ! तेरा तुझको अर्पित , क्या लागे मेरा ? ॐ जय जगदीश हरे | हे प्रभु, मेरी सुख -सुविधा , पत्नी -बच्चे , दुकान -नौकरी , बँगला -गाड़ी सबकी रक्षा करना मेरे मालिक ! वह सर्व शक्तिमान मालिक भगवान तो क्या हुआ , इनका नौकर- चौकीदार तो अवश्य हो गया , वह भी कुछ फूल - बताशों के दैनिक वेतन पर ! या फिर अवैतनिक बोतल के जिन्न की तरह !
                       एक होड़ सी लगी है धनवान होने की , तो साथ ही साथ धार्मिक होने की भी | फैशन की तरह हो गया है धार्मिक होना , दिखने का नाटक करना | माथे पर बड़ा सा टीका ज़रूरी है और उसका दिन भर वहाँ उपस्थित - विद्यमान रहना | पता तो चले , हमने सुबह नहाया धोया - पूजा पाठ किया था या मंदिर गए थे ! कार्यस्थल पर इष्ट देवी - देवता का चित्र अलमारी या मेज़ पर शीशे के नीचे होना अनिवार्य है, जिन्हें प्रणाम कर दिन की कार्यवाही का शुभारम्भ करें | लेकिन , बस उतना जिसमें कुछ ॐ शुभ लाभ प्राप्त होने की सम्भावना हो |
        शाम  को जल्दी जाना है सर ! फलाँ जगह से आये अमुक महाराज जी का प्रवचन है | एक हज़ार  देकर स्थान बुक कराया है | भला किस अधिकारी की मजाल जो ऐसे शुभकार्य के लिए मना कर दे और शामत मोल ले ? फिर उसे स्वयं भी तो कहीं जाना है ? मंदिर के अतिरिक्त उसे अपने बॉस  की और फिर बॉस को मंत्रालय की भी तो सेवा करनी होती है ! डबल , ट्रिपिल काम का बोझ है तो फिर वह अपना निर्धारित कार्य एकनिष्ठ हो कैसे करे , जब कि उसका सरवाईवल  इन्ही 'अतिरिक्त' कार्यों पर निर्भर है ?
              आध्यात्मिक जीवन के ये छद्म स्वरुप कैसे कँटीली झाड़ियों की तरह उग आये भारत के आँगन में ? कारण समझ में आता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें सब कुछ स्थूल है , और सूक्ष्म कुछ भी नहीं | स्थूल कार्य करके उसे दिखाना आसान होता है , जबकि सूक्ष्म कहीं दिखता नहीं और उसका प्रभाव भी सूक्ष्म होता है | प्रदर्शन के युग में , इसलिए , उसका कोई मूल्य नहीं | उसे बिरले पारखी ही समझ सकते हैं | इसलिए बनावटी आचरण ने असली मनुष्य को रिप्लेस , प्रतिस्थापित  कर दिया है | वरना क्या बुद्ध- कबीर के जीवन - प्रवचन - आचरण में आस्था नहीं थी ? नास्तिकता आस्तिकता का विवाद यहाँ है ही नहीं | वी. एम. तारकुंडे ने " लौकिक और धार्मिक नैतिकता " [Secular and Religious morality ] नामक लेख में गांधी की धार्मिक नैतिकता को किसी भी प्रकार कमतर नहीं आँका | इसलिए सवाल मानव मूल्यों पर आस्था का है | और उस मापदंड पर क्या इन्हें धार्मिक कहा जा सकता है या कहा जाना चाहिए , जैसा कहलाने का इन्हें बड़ा शौक है ? 
            आश्चर्य होता है सोचकर  कि बौद्ध धर्म , जिसकी वजह से ही विश्व में भारत को जाना जाता है , संसार में इसकी प्रतिष्ठा है और चीन जापान कोरिया आदि देशों से बौद्ध श्रद्धालु यात्री भारत तीर्थाटन पर आते हैं , उसे अपने ही देश ने किस तरह भुला दिया !
लेकिन विलाप करने , छाती पीटने से क्या होगा ? मंदिर के लिए हर बँगले में एक भूभाग , घर का एक कमरा , कमरे में एक कोना लकड़ी या पत्थर के बने ढाँचे में भगवान के बैठने के लिए स्थान सुरक्षित है | या नहीं तो दीवालों पर ईश्वर के चित्र टाँगने के लिए आदमी ने जगह दिया हुआ है | जगह यदि किसी चीज़ के लिए नहीं है तो वह है विवेक बुद्धि , वैज्ञानिक सोच , तार्किक चिंतन , मानुषिक संवेदना और सार्वजानिक नैतिकता | इन्हें कोई आश्रय , कोई सहारा जनजीवन से प्राप्त नहीं है | न धर्मों में , न हृदय में , न बुद्धि में | धर्म में पाखंडों की भरमार , हृदय स्वार्थों का भंडारगृह , और बुद्धि बस चालाकी का वृहद् कारखाना होकर रह गया है |
          तो भाइयो सुनो ! साहब अभी पूजा कर रहे हैं | दरबान जब यह सूचना दे तो यह निश्चित समझ लीजिये कि साहब किसी भी दशा में इस लोक में रहने वाले किसी भी प्राणी से नहीं मिल सकते , चाहें उसकी जान ही क्यों न चली जाय |

सुना नहीं आपने ? एक सेकुलर राज्य , जिसका नाम भारतवर्ष , हिंदुस्तान दैट इज इण्डिया है , के एक प्रधान मंत्री तब तक पूजा करते रहे जब तक बाबरी मस्जिद ध्वंस का कारनामा  चलता रहा , और पूजा पर से तभी उठे जब उन्हें सुनिश्चित सूचना मिल गयी कि श्रीमान ,यह धार्मिक शुभकार्य सफलता पूर्वक संपन्न हो गया है | 
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शनिवार, 22 दिसंबर 2012

अनुवांशिकी


[ अनुवांशिकी ]
* मैं सोचता हूँ , यदि कोई वैज्ञानिक सचमुच पूरी निष्पक्षता से , निरपेक्ष ढंग से खोज करके यह पाए कि अनुवांशिकी का प्रभाव व्यक्ति के गुण और व्यवहार पर होता है , तो क्या जातिवादी लेखक - विचारक उसे हिन्दुस्तान में जीने देंगे ? लेकिन मैं यह अनुभव करता हूँ कि व्यक्ति अपने कमरों / घर को किस रंग से पुतवाता है , या बाथरूम के टाइल्स की क्या डिज़ाइन और कलर चुनता है , यह तय करने में उसकी अनुवांशिकी का पर्याप्त हाथ होता है |

[ सवर्ण कथा ]
१ - - पापा फेस बुक पर एक किताब की बड़ी चर्चा होती है | मनुस्मृति नाम है उसका | आप ब्राह्मण हैं तो आप के पास वह ज़रूर होनी चाहिए | मुझे भी पढ़ने को दीजिये न !
= नहीं बेटा, मेरे पास तो गीता रामायण भर है | महाभारत भी घर में नहीं रखता | हाँ पड़ोस के अंकल जी से माँग लो | उनके पास ज़रूर होगी | वे आरक्षण समर्थक हैं | आजकल वही लोग मनुस्मृति ज्यादा पढ़ते हैं |

* पचास वर्षों तक प्रेम में आकंठ मुब्तिला रहने  के बाद अब मुझे अनुभव हो रहा है कि प्रेम सचमुच एक रोग ही है | इसमें आनंद बहुत आता है , मीठा मीठा दर्द होता है और महसूस होता है कि हम हवा में उड़ रहे हैं | लेकिन है यह  एक  बीमारी ही |

* दर्शन का काम है तो 'जानना' | लेकिन जानकर वह क्या करेगा ? क्या करता वह जानकारियाँ इकठ्ठा करके ? इसलिए उसका काम हो गया है - आदमी का जीवन कैसे सुखी हो , इसके बारे में सोचना और उसका मार्ग बताना | मनुष्य कैसे प्रसन्न रहे , यह ज़िम्मेदारी है अब दर्शन शास्त्र की | मेरी परिभाषा के अनुसार मानव मात्र को खुश और प्रसन्न देखना ही " दर्शन " है |

* आप चाहें , न चाहें सर्वदलीय , सर्व धर्मी  , सर्व देशीय , सर्व समावेशी सरकार | लेकिन सड़क समाज तो ऐसा होता जा रहा है | अस्पताल डफरिन भी है , झलकारी बाई , श्यामा प्रसाद मुखर्जी , और राम मनोहर लोहिया के भी हैं | इसी प्रकार सड़कें , गलियाँ और पार्क - मोहल्ले भी हैं | कुछ नाम ज़रूर आने शेष हैं पर वे घरों - जलसों में तो प्रतिष्ठा पा ही गए हैं , देर सवेर बाहर भी आ ही जायेंगे | आश्चर्य नहीं कि घरों से निकल कर कब मार्क्स , लेनिन , माओ , हिटलर , नाथू राम गोडसे भी सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित हो जायँ !

शायद धूप


* बलात्कारों के विषय में मेरी अक्ल कुछ काम नहीं कर रही है |

* बलात्कारी को फाँसी , और हत्यारे को प्रधान मंत्री की गद्दी ?

* अप्रामाणिक विचार =
मेरा ख्याल या विचार था कि लडकियाँ पुरुष मित्र बनाने से सुरक्षित होती हैं , उसी प्रकार जैसे पति करने से | दोनों ही बातें गलत साबित हुयीं | पति और पुरुष मित्र के समक्ष भी बलात्कार हो जाते हैं |

* सोचता हूँ , शिव सेना या माओ सेना का आतंक क्या दिल्ली में नहीं होना चाहिए ?

* नैतिकता जिद से आती है | पुरुषों को यह गाँठ बाँधना होगा कि उन्हें औरतों का आदर करना है , माँ समझकर - बहन समझकर या देवी समझकर | या यही समझकर कि वे हमारी रक्षिता हैं | इसमें कोई बुराई नहीं है , भले असमानता का कुछ अंश है | मानना पड़ेगा कि व्यवहारों में विसंगति के कारणों में एक छोटा सा हिस्सा बराबरी और समतावाद का भी है | बराबर हो तो भुगतो | लो करो बराबरी | इसमें तो ताक़तवरों की चाँदी होती है | औरत यदि थोड़ी कमज़ोर दिख जायगी तो उसका कुछ नुक्सान नहीं हो जायगा | लेकिन नहीं , वे न बाप की मानेंगी , न बूढ़ों की सुनेगी | तो जवान भी उनकी नहीं सुनने वाले |

* तथापि , दिन दूर नहीं जब लडकियाँ बलात्कार से बचने में सक्षम और समर्थ हो जायेंगी |

* नवाब लोग पान खाते थे तो उनके बगल में पीक दान भी रहता था | अब के नवाब तो पूरी सड़क को पीकदान बनाये हुए हैं |

* शायद धूप
कुछ निकल आये
कविता लिखूँ |
[ 'शायद धूप' नाम से मेरी कविता / हाइकू की कोई किताब हो सकती है ]

* थोडा ओंकार
ज्यादा सा अहंकार
मेरी ज़िन्दगी |

* लाभकारी है
निरुद्देश्य घूमना भी
यह जानिए |

* शांत चित्त हो
बैठो हमारे पास
उपासन में |

* शून्य में जाओ
जब भी मौक़ा मिले
ध्यान प्रणाली |

* अच्छा होता है
शून्य में विचरण
शांति समग्र |

* मिलेगा उसे
जो उसका देय है
निश्चित मानो |

* समतावादी
अपने बराबर
किसी को नहीं |

* पड़ता ही है
चाहना को रोकना
कुछ न कुछ |

* चाहें न चाहें
कोई लड़कियों को
मारता नहीं |

* यही तो हुआ
कि तुम बूढ़ी हुई
मैं बूढ़ा हुआ !

* बहुत आये
तुम्हारे जैसे बली
बहुत गए |

* कहा तो मैंने
मुझे प्यार चाहिए
सुनो तब न !

* कोई इंतज़ार
बढ़ा देता है उम्र
अनेक बार |

* नो प्राबलम
बहुत बड़ा मन्त्र
जीवनाधार |

* एक उम्मीद
हज़ार नेमत है
जीवन दायी |

* अन्याय होता
अन्याय लगता भी
कुछ ज्यादा है |

* लिखता जाऊँ
ख़त्म ही नहीं होतीं
बातें , क्या करूँ ?

* Do you know God ? If you know God , send him a friend request .:-)

* देखिये , अन्याय होता तो है | लेकिन इसके साथ यह भी है कि कौन किस बात को और कहाँ  तक किसी बात को अन्याय समझता है, इससे भी फर्क पड़ता है | वह उदाहरण लिख दूँ, जिससे यह विचार आया | मान लीजिये आप के किसी अवैध कब्ज़े को पालिका कर्मियों ने उजाड़ दिया , या ट्रैफिक वाले ने आपका चालान कर दिया | ज़ाहिर है , आप ने उन्हें देख -पहचान लिया | आप इज्ज़तदार -रसूखदार हैं | आपने इसे अपनी बेईज्ज़ती समझी और अवसर पाकर उन्हें पीट दिया बिना यह सोचे कि वे तो अपना  कर्तव्य निभा रहे थे | [ यही आजकल अधिकाँश हो ही रहा है ] | इसलिए मेरी स्थापना यह है कि इस तरह का अपमान हो या सचमुच का , अन्याय हो या अन्याय होता लगे , किसी भी दशा में बल अथवा शस्त्र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए |

* [ उवाच ]
# आत्मसंयम का नाम है संस्कृति - संस्कार | बलात संयम को कहते हैं राजनीति- सरकार |
# हास्य आदमी के अहंकार को मिटाने में मदद करता है | वह किसी के मजाक का बुरा जो नहीं मानता  !
# यदि मैं जानता और मानता हूँ कि ' भय बिनु होय न प्रीत ' , तो मुझे इस्लाम की कथित कड़ाई का समर्थन करना चाहिए |
# आप ने किसी से उसकी जात पूछ ली , तो यकीन मानिए आपने तो अपनी जात बता दी |
# मुझे कुछ शब्दों से आपत्ति है , जिसे मैं शब्दों के द्वारा व्यक्त करता हूँ |  OR =
मेरे कुछ शब्दों का , शब्दों के लिए , शब्दों के द्वारा विरोध है | [अस्पष्ट?]
# कनेक्टिकट विद्यालय में हुए संहार की घटना को सन्दर्भ में लें | अब समय आ गया है कि अस्त्रों का सम्पूर्ण समापन करें और " किसी का भी किसी भी दशा में वध नहीं का मन्त्र अपनाएँ " |

* [ अमानव वाद ]
# मत बंद कीजिये /
अपने जानवर का दरबा /
वरना जानवर अन्दर /
बंद हो जायगा /
तुम्हे ज्यादा जानवर बना देगा | $

# [ अमानव वादी ]
आप होंगे मनुष्य /
यह नाम तो आपने दिया /
मुझको गलत , जैसे /
किसी का नाम आपने /
ईश्वर दे दिया /
वरना मै तो जानवर हैं /
यह नाम मैं अपने लिए /
स्वीकार करता /
धारण करता हूँ /
अपने पशु बंधुओं के साथ /
भाईचारे में | $

# मनुष्य बनने , या कहें , महज़ कहलाने के चक्कर में हम कई असहज -अस्वाभाविक -अप्राकृतिक और  गैर ज़रूरी किंवा , आप की भाषा में अमानवीय हरकतें कर जाते हैं कि हम जानवरों को शर्म आती है | क्योंकि वे साधारण जैविक आचरण के विरुद्ध होती हैं |

* बीड़ी पिया था उसने
उसने मुझे चूमा
सर अभी तक
चकरा रहा है |
$
* ऐसा करेंगे
वह मिलें तो हम
वैसा करेंगे
सोचता रह गया
क्या क्या करेंगे ?
$
[ BADMESH ]
* उर्दू और हिंदी में वही फर्क है जो मुशायरे / कवि सम्मलेन के दौरान नीरज और बशीर बद्र में है |
[सुना है जहाँ नीरज जाते हैं वहां बशीर बद्र नहीं जाते, और जहाँ बशीर बद्र होते हैं वहां नीरज नहीं होते]

* वेश्या वृत्ति कानूनी होनी चाहिए या नहीं , यह उसी तरह का प्रश्न है जैसे F D I आनी चाहिए या नहीं ?

[बदमाश चिंतन]
* यदि किसी को सपने बहुत आते हैं , तो उसे स्वप्न दोष का रोगी नहीं माना जा सकता |
* मुझे बूढ़ों का व्यक्तित्व बहुत जमता है | इरफ़ान हबीब , हबीब तनवीर , रजनी कोठारी को मैंने देखा और सराहा है | अब मुझे बूढ़ा होना अच्छा लगने लगा है |
* मुझसे कोई व्यापार करा ले , और मेरा दिवाला निकलने से बच जाए तो मैं अपनी जाति और पूरी जाति प्रथा के खिलाफ हो जाऊँगा |

[ शेरो शायरी ]
* जेहि विधि मिले खूब विज्ञापन ,
समझो पत्रकारिता आपन |

* खुद के घर तो बहुत हैं , उनमें वह रहता नहीं है ,
कभी वह घर पर हो, तो सोचता हूँ मिल आऊँ |

* हर आदमी चालाक बहुत है , अपनी अपनी पारी में ,
हर मनई बुरबक है भारी , अपनी अपनी पारी में |
मुँह बाये हर लोग यहाँ पर अमृत घट पी जाने को ,
हर मनाई गू खोद रहा है अपनी अपनी पारी में ||

* न हिंदी से मेरा नाता , न उर्दू से मेरा मतलब ,
जसमे बातें मेरी आ जायँ, वही भाषा मकतब |

* एक शायर का यह मिसरा बहुत प्रभाव शाली है =
" तुम्हारे क़दमों को रोक पाए , किसी में इतनी मजाल क्या है "

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

हरिजन का अर्थ

हरिजन का अर्थ तो चलो, गड़बड़ है -' ईश्वर के लोग ', और ईश्वर इनके लिए, इनके फायदे के लिए,इनके पक्ष में नहीं है | लेकिन दलित के मायने भला क्या होते हैं ? क्या यह कोई बहुत अच्छा शुभनाम है जिस पर नाज़ किये फिरे हैं ?  

ईश्वर होता तो

ईश्वर होता तो क्या हम उसे न मानते ? क्यों न मानते ? कैसे न मानते ? क्या मजाल थी हमारी ? वह नहीं है तो इसमें हमारा क्या दोष ? बनाया तो भरसक उसे हमने  वह नहीं बना तो हम क्या करें ? और आदमी ने जितना उसे बनाया उतना तो उसे मानते ही हैं !

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

प्यार से ' तू '


मैं सोचता हूँ = मैं सोचने का ' कर्म ' करता हूँ | तब वह वस्तुतः सोचना / विचारना नहीं होता | सोच तो बिना ' सोचकर्म ' किये ही आता है | सही है आप का कहना | यह उक्ति दरअसल , संभवतः , उन्हें सोचने के लिए प्रेरणा निमित्त है , जो सोचते नहीं , जबकि वे मुझसे ज्यादा सही और सटीक सोच सकते हैं | क्या नहीं ?

* नागरिक उवाच को ओपन करने की सोच रहा हूँ | कुछ खिलवाड़ करने के लिए , अपने नाम को मिटाने ,तिरोहित करने के लिए | अभी यह सिर्फ मेरे लिखने के निमित्त है |

* तो रहने दीजिये न Rp भाई यह व्यवस्था ! भारत के इतिहास में कुछ तो बचा रहे ! :-)

* मित्र Zia खान सानेट कवितायेँ पोस्ट कर रहे हैं | बहुत अच्छी और पठनीय | उन्हें मैं वास्तविक कविता की श्रेणी में रखता हूँ | जो दिल को छू जाएँ | मेरा भी मन ऐसा लिखने का होता है | कभी कभी बात बन भी जाती है |

* आनंद देती
आनंद की कल्पना
भी सुखदायी |

* खूब सजतीं
भव्य रंगशालाएँ
शादियाँ होतीं |

* आज़ादी , कौन
बचाना चाहता है
आप हों तो हों !

* फर्क तो होंगे
लड़ते भी रहेंगे
संग रहेंगे |

* सच कहूँ तो
समय विषाक्त है
हम विषैले |

* अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए खेल खेल में हम पहले घोडा , हाथी , बिल्ली , गदहा बने | अब बच्चे बड़े हो गए | अब उनकी नज़र में हम उल्लू बने खड़े हैं |

* प्रिय सम्पादक व्यक्तिगत पत्रकारिता के आयाम प्रदर्शित करने का मंच है |

* कविता एक शिल्प है | इसमें अपने भाव सुगठित रूप से ढालने की श्रम साधना और प्रोफेसनल योग्यता की ज़रुरत होती है , जो मैं न करता हूँ न करने की कोशिश करता हूँ | इसलिए मैं अपने को कवि नहीं मानता, न ऐसा कहे जाने की अपेक्षा करता हूँ |

* प्यार से ' तू ' ]  कल तेरह दिसम्बर को वि.वि के मालवीय सभागार में द्वारिका प्रसाद जी " उफ़ुक़ " की 150 वीं जयन्ती मनाई गयी | संगोष्ठी में राज्यपाल महोदय आये , और पश्चात शेरी नशिश्त [ काव्य गोष्ठी ] हुआ  | उफ़ुक़ जी की पोती कोमल भटनागर ने इसे आयोजित किया था | उनके श्रम और अपने दादा जी के प्रति उनका स्मरण भाव की सराहना की जानी चाहिए | उफ़ुक़ क्षितिज को कहते हैं | सत्तर के दशक में ही मैं उनकी एक रचना पर मुग्ध हो गया था , और मैं उसे जब तब हर जगह उद्धृत करता रहता हूँ |
वह मुझे प्यार से ' तू ' कहता है ,
मैं खिताब  लेकर क्या करूँगा ?
मैं ' हुज़ूर ' लेकर क्या करूँगा ,
मैं ' जनाब ' लेकर क्या करूँगा ?

* जिन्ना का भारत = मैं पूरी सत्यता से कहना चाहता हूँ कि हम जिन्ना के भारत हैं | धर्म के लिहाज़ से नहीं बल्कि सेक्युलर राजनीति की दृष्टि से | याद कीजिये पाकिस्तानी संसद में अपने प्रथम संभाषण में उन्होंने क्या कहा था ? कि इस मुल्क में सबको अपने धर्म पालन की पूरी आज़ादी होगी , अल्पसंख्यकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा इत्यादि | इस सन्देश को ही तो भारत ने अपनाया ? तो हम जिन्ना के भारत हुए या नहीं ? इससे हमें क्या मतलब जो पाकिस्तान ने इसे भुला दिया ? अर्थात भारत सिर्फ गाँधी - नेहरु - आंबेडकर का ही नहीं , जिन्ना का भी उतना ही अनुयायी है |

* राजनीतिक विचारक इस्लामी कट्टरवाद के विरोध से तो सहमत होते हैं पर साथ ही मुसलमानों को भारत के संसाधनों पर पहला हक भी देना चाहते हैं | जब कि दूसरी और उन्ही का दलित विंग [ और वे भी ] केवल ब्राह्मणवाद से घृणा करने को नहीं कहता , न अपने अन्दर पनप रहे ब्राह्मणवाद से ही परहेज़ करता है बल्कि सम्पूर्ण ब्राह्मण समुदाय, प्रत्येक ब्राह्मण को कटघरे में रखकर उनके खिलाफ विषवमन करता है लतियाता - गरियाता रहता है | ' मासूम ' मुसलामानों के पक्ष में खड़े सेकुलर- प्रगतिशील आंदोलनकारी ' मासूम ' ब्राह्मणों के पक्ष में कुछ बोलने से कतराते हैं | ऐसी दो - अन्खियाही , यह वैचारिक गैर ईमानदारी राजनीतिक समाज में क्यों व्याप्त है ?

* [ अस्पष्ट ]
जो चीज़ गुम हो गई है , लोक आस्था कहती है , उसे थोड़ी देर के लिए भूल जाओ | फिर ढूँढो | मिल जायगी |

* [ डोर इतना न खींचो ]
यह बात दलित अति- आन्दोलन के पार्थ सारथियों - नील मंडल से संबोधित है | इस पर बशीर बद्र का एक अति प्रचलित शेर भी है - " दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे / कि जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा न हों | " इसलिए डोर उतनी ही खींचो जिससे वह टूटने न पाए , थोड़ी थोड़ी जुडी रहे | क्योंकि हमारे नाम तो राम लक्ष्मण सीता सावित्री जैसे ही होने हैं | ऐसा न करो कि फिर मुँह दिखाने के काबिल न रहो | सत्ता के दंभ में [ हाँ आरक्षण भी सत्ता कि एक सशक्त शाखा है ] इतना न खो जाओ कि पागल हो जाओ | और सबसे बड़ी बात , हमारा और कहीं ठिकाना भी नहीं है, हिन्दू के अलावा , हिन्दुस्तान के अतिरिक्त | यूँ हिन्दू तो हम तमाम सवर्ण भी नहीं हैं , आप की ही तरह और आप के साथ ही एक मनुष्य की भाँति हैं |  लेकिन क्या करें ? नाम के लिए तो हिन्दू होना ही है | विवशता ही समझ लें | लोग जो कहते हैं यह संस्कृति है , तो सारी संस्कृति तो दलितों के पास रक्षति रक्षितः है | ग्राम्य शिल्प , लोक गायन - नर्तन ब्राह्मणों के पास कहाँ ? फिर हिन्दू होने से क्यों डरते हो ? छीन लो ब्राह्मणों से ज्ञान - विज्ञान - तत्व ज्ञान - वेद पुराण | बन जाओ ब्राह्मण | कौन रोकता है अब ? दिनकर की बात आप के लिए भी तो है - सिंहासन खाली करो कि जनता [ दलिता ] आती है |

*  " दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे /
कि जब कभी हम दोस्त बन जाएँ तो शर्मिंदा न हों | "
[ बशीर बद्र ]

तिल का ताड़



* घर तो बहुतेरे हैं , पर उनमें वह रहता नहीं है ;
कभी वह घर में हो , तो सोचता हूँ मिल आऊँ |
[ ईश्वर ]

* तिल का ताड़ बना दे कोई ,
इतना प्यार जता दे कोई |

* मैं सोचता हूँ किन्तु गलत सोचता हूँ मैं ;
तुम ठीक सोचते हो मगर सोचते नहीं |

* आपने मुझसे मेरा नाम पता पूछा है ?
अभी मैं डायरी से देख कर बताता हूँ ।

* शादी भले न करें , पर शादी जैसा कुछ तो ज़रूर करना चाहिए आदमियों और औरतों को |
[ यह शादी करने वाले तय करेंगें | हर बात में मेरी तानाशाही नहीं चलेगी | बस कुछ करना चाहिए , मैंने ख्याल दे दिया , यह क्या कम है ? मैं बता दूंगा तो वे बिना मुझे भी बताये भाग लेंगे और मेरी दावत मारी जायगी | ]

* यह भला लाबीइंग होती क्या है | वही तो नहीं जो साहित्यकार लोग पद या पुरस्कार पाने के लिए पहुँच वाले लोगों से समर्थन जुटाने के लिए करते हैं ?

* जनम से नहीं अकल से भी दलित बनो तो मानें ! आसान काम करके पर्वतारोहण का पुरस्कार जीतना चाहते हो ?


[ बाल गीत ] - बन सकता है ]
* अगड़म बगड़म सारी चीज़ें ,
कुछ उपयोगी न्यारी चीज़ें ;
लेकर आये बन्दर मामा
बच्चों की सब प्यारी चीज़ें |
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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

रौशनी को देखकर


[ कवितानुमा ]

* रौशनी को देखकर
मैं सरपट भागा
मैं आगे आगे
रौशनी पीछे पीछे |
रौशनी रास्ता दिखाती रही
मैं चलता रहा |
और पीछे रौशनी ?
उसके पीछे कोई
रौशनी तो थी नहीं
वह औंधे मुँह
गिरी धडाम |
# #

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

मेरे ख्यालों में


[Badmesh]
* अब चाहे नैतिकता रहे चाहे जाय , चाहे बुराइयों का पहाड़ ही टूट पड़े , अब औरतें पुनः परदे में नहीं डाली जा सकतीं |

* औरतें कुतिया होती हैं या नहीं , पुरुष तो सारे कुत्ते ही होते हैं |

* जब तक आप बुर्क़ा नहीं लगायेंगे , दुनिया की असलियत नहीं जान पायेंगे |

* जहां तक आपका सवाल है ,
मेरे ख्यालों में एक ख़याल है |


* उधर देश बदमाशों से परेशान रहा इधर पूरे जाड़े भर मैं अपनी पत्नी से त्रस्त रहा | इसे बलात्कार तो कह नहीं सकता क्योंकि मैं सिद्ध नहीं कर पाऊँगा | उन्होंने खूब बनाया अपनी पसंद का मटर का निमोना और बथुए का सगपहिता दाल | ये दोनों पकवान मुझे पसंद नहीं | यह तो कहिये कभी कभी साग और गोभी , कभी आलू मटर टमाटर की रसेदार सब्जी भी बन जाती थी जिसे खाकर मैं यह लिखने के लिए जिंदा हूँ | कृपया मेरी एफ आई आर दर्ज कर ली जाय | 

सोचते तो हैं


* एक दिल है
तुम्हे देखकर ही
धड़कता है |

* भरा जाता है
मनों में , बैठता है
नक्सलवाद |

* क्या कभी रहा
लोक में लोकतंत्र
जो अब होगा ?

* बात , उनके
कान में डालकर
मैं चला आया |


* नागरिक जी
सोच नहीं पाते हैं
सोचते तो हैं !

* स्वीकार नहीं
आपकी सारी बातें
शिरोधार्य हैं |


* सदुपयोग
धन - धान्य का करूँ
ईश्वर का भी |

आस्थाएँ बनायें


* आस्थाएँ बनायें /
नयी आस्थाएं बनायें
क्यों पुरानी आस्थाओं के
ढोल पीटें, लकीर ढोयें ?
# #




 [ हमारी मनुष्यता ]

*  हमारी मनुष्यता में यदि कोई खोट या कमी हो तो हमें बताएँ | हम सुधार लेंगे , पाश्चाताप कर लेंगे , शर्मिंदा हो लेंगे , माफी माँग लेंगे | आप बताएं तो !

" नया मनुष्य "


दुखद दृष्टव्य है कि नास्तिकता का नाम लेते ही नाक भौहें चढ़ने लगती हैं , और उसके आध्यात्मिक निहितार्थ को पकड़ना किनारे हो जाता है | किसका दोष दें , काई की इतनी परतें चढ़ी हैं कि हमारे पाँव उसमे उलझ ही जाते हैं | समझ नहीं पाते अस्तित्व का मंतव्य जो कि ज्ञान की जन ग्राह्यता और जन- जन में आध्यात्मिक श्रेष्ठता है | इस उद्देश्य से हम मिशन का नाम बदल रहे हैं | इससे भी यदि बात न बनी तो फिर फिर बदलेंगे , पर नज़र रखेंगे चिड़िए की आँख पर- मनुष्य की आत्मिक उत्कृष्टता |

भूमिका = " नया मनुष्य " , स्थित प्रज्ञावान श्रेष्ठतर / ( न हि मानुषात श्रेष्ठतरम हि किंचित )
[ Individually Spirited / Highly Spiritual / Spiritual Humanist ] |
नया मनुष्य बनाने की बात अनेक जागृत महापुरुषों ने की | कृष्णमूर्ति , ओशो ने नए मनुष्य के उभार की प्रत्याशा की | और पहले, प्रकारांतर से बुद्ध ने , सार्त्र ने सुकरात ने की - अनगिनत शिक्षकों ने | लेकिन क्या कुछ हुआ ? और क्या कुछ भी नहीं होगा ? क्या नया मनुष्य नहीं बनेगा या नहीं बन सकता ? गुरुजन कहने ,पुकारने , रास्ता बताने के अतिरिक्त और क्या कर सकते थे ? उन्होंने किया | लेकिन बनना तो मनुष्य को है ! यही तो नए मनुष्य की विशेषता है कि वह स्वयमेव होता है, उसे जो होना है वह स्वयं होगा, अन्यथा नहीं होगा ( जो हो रहा है ) | वह किसी के अधीन नहीं हो सकता (लेकिन स्वाधीन तो हो सकता है ) | यही कारण है कि बनाते तो रह गए सारे धर्म अपने -अपने अच्छे इंसान और सभी अपने मुँह की खा गए | अलबत्ता फिर भी वे किनारे नहीं हुए | उन्होंने मनुष्य के लिए रास्ता नहीं छोड़ा | यही विडम्बना है जिसे हम तोड़ना चाहते हैं |
तो प्रश्न मौलिक है , क्या हम कुछ नहीं बनेंगे , नवीन ? कैसे बनेंगे ? या महामानवों की संकल्पना सारी मिथ्या में / निरर्थक चली जायगी ?  

ईश्वर अदालत में


* ईश्वर कभी अदालत में
पेश नहीं होता
कभी मैदान में
सामने नहीं आता ,
वह अपना वकील
भेज देता है ,
मनुष्यों को ही पेशकार
बनाया हुआ है उसने
जो कि दरअसल
उसके मुद्दई होने थे |
और यह वकील
ईश्वर को बचाता रहता है
तारिख पर तारीख
लेता चला जाता है |
ईश्वर सजायाफ्ता
हो ही नहीं सकता क्योंकि
उसका साइयाँ है मनुष्य ,
खुद उसका वकील / जज |
# #

दुआओं के लिए


* कहीं कुछ गोटी फिट हो जाय , किसी से प्रेम के आदान - प्रदान की स्थिति बन जाय , तो जीने का आनंद बढ़ जाता है |

* दवाओं का असर होते न देखा ,
दुआओं के लिए दर - बदर भटका |

* हमको उम्मीद नहीं है कोई ,
फिर भी तो काम किये जाते हैं |


* कौन सी आफत पडी , मत जाइए ,
आज का दिन शुभ नहीं , कल जाइये |

* भूल गया मैं सारा दुखड़ा ,
देख लिया जब उनका मुखड़ा |

* आपका , मित्र ! घर है कहाँ ?
घर में पेशाब घर है कहाँ ?


* [ ग़ज़ल पूरी करो ]
सड़कें वही हैं ,
गाड़ियाँ बढ़ी हैं |

Kunal Gauraw ना पूछो किस क़दर
दुश्वारियाँ बढ़ी हैं ।

Gulshan Chawla - -:-
मुसीबत सहे जाओ,
सारी उम्र पड़ी है ! .....


बैठी है उनमे ,
कैसी नकचढ़ी है ![ugranath]


कितने कुचले गए ,
कहाँ किसको पड़ी है ![ugranath]

रविवार, 9 दिसंबर 2012

सुनीता सुनील का तलाक़


[ story]         I LOVE YOU
सुनीता सुनील का तलाक़ संपन्न हो चुका था | सुनील ने हस्ताक्षरित सरे कागजात सुनीता को सौंप दिए , और वह उन्हें संभाल कर घर ले आई | फुर्सत से उन्हें एक एक करके ध्यान से चेक करना चाहा, कहीं कोई दस्तावेज़ छूट तो नहीं गया या कम तो नहीं रह गया | सब दुरुस्त थे | अब अंतिम पृष्ठ की बारी थी | पूरे फुलस्केप कागज़ पर लिखा था - Nevertheless , I love you , Sunita - Sunil

एक तरफ़ा राह है


* एक तरफ़ा राह है मत जाइये ,
घूम कर उस रोड से घर आइये |
[ घूम फिर कर लौटकर घर आइये ]

* सब लोग परेशान हैं इस ख्याति के लिए ,
कैसे बजा दें तालियाँ दो चार आदमी !

* बहुत आसान है तलवार लेखनी के भाँजना ,
कभी देखा है किसी कवि का सिर कलम होते ?
OR =
* बहुत आसान है शमशीर-ए-कलम भाँजते रहना ,
कभी देखा किसी शायर का सिर कलम होते ?