उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
सोमवार, 26 दिसंबर 2011
यह भारत देश तमाशा है
यहाँ तानाशाह भी अपना अभियान शुरू करने से पहले महात्मा गाँधी की मूर्ति के समक्ष शीश नवाता है । और कोई आश्चर्य नहीं , यदि कभी हिन्दुओं में कसाई कौम पनपे तो वह बकरे की गर्दन पर छुरी चलाते समय मन्त्र बोले - "जय,गाँधी जी की जय" !
अब मैं अन्ना
* अपनी गलती मैं स्वीकार करता हूँ की मैं अभी तक अन्ना के साथ नहीं था । हीन भावना से ग्रस्त था मैं कि इतने बड़े ईमानदारी के कार्यक्रम में मैं भला कैसे शामिल हो सकता हूँ ? लेकिन अन्ना के सिपहसालारों के कारनामे सामने आने के बाद मैं भी अन्ना की लाइन में आने के लिए अर्ह , योग्य हो गया हूँ । शासन पर ईमानदारी का दबाव बनाना है , स्वयं ईमानदार तो होना नहीं है । और भूषण तो बहुत बड़े हैं , अरविन्द , किरनकुमार से ज्यादा भ्रष्टाचारी तो मैं कभी नहीं रहा जो मैं अन्ना आन्दोलन में किसी से पीछे रहूँ ! मैं व्यक्तिगत रूप से तो इनसे ज्यादा ही ईमानदार रहा हूँ । अतः अगले आन्दोलन में अन्ना के पीछे चलने में मुझे कोई परेशानी नहीं होगी , यदि वह अब भी आगे चले तो । और यदि मेरी समझ में तब तक यह न आ जाय कि अन्ना का आन्दोलन तो स्वयं में एक महान राजनीतिक भ्रष्टाचार है । #
विषम समता
प्रसन्नता हुयी जानकर कि एक मुद्दे पर दोनों एकमत हैं । फारुक अब्दुल्ला और बाल ठाकरे दोनों का कहना है कि लोकपाल की कोई ज़रुरत नहीं है ।
तानाशाह
" मेरा लोकपाल बिल , या हवाई जहाज़ का बिजनेस क्लास बिल अभी , फौरन जैसा मैंने बनाया है बिल्कुल वैसा ही , बिना किसी काट -छांट के पास करो , नहीं तो जाओ " ऐसा ऐलानिया धमकी जो दे , तो समझो वह तानाशाह है । जब वह आ जायेगा तो कभी जायगा नहीं ।
रविवार, 25 दिसंबर 2011
फिर भी वामपंथी
प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में इसके अध्यक्ष नामवर सिंह के बयान को लेकर कुछ लेखक उनकी थुक्का फजीहत कर रहे हैं लेकिन जैसा उनके चरित्र में है वे अपने गिरेबान में झाँकने का कष्ट नहीं करते।
वे यह आकलन करने में असमर्थ हैं कि नामवर सिंह फिर भी वामपंथी ही हैं अपने मौलिक स्वरुप में। और उन के चरित्र में शामिल हैं झूठ छद्म और पाखण्ड, जिसे वे अब तक ओढ़े हुए थे। ज़रा सा बोल क्या दिया कि उनका छद्म खुल गया। और इतने दिनों जो उन्होंने पहना- ओढ़ा-बिछाया, खाया-पिया वह पाप किस सिद्धांत के ऊपर डाला जायेगा?
आश्चर्य नहीं, जो आज नामवर की आलोचना कर रहे हैं कल वो भी अपने केचुल उतारें या उनका भी पर्दाफाश हो।
वे यह आकलन करने में असमर्थ हैं कि नामवर सिंह फिर भी वामपंथी ही हैं अपने मौलिक स्वरुप में। और उन के चरित्र में शामिल हैं झूठ छद्म और पाखण्ड, जिसे वे अब तक ओढ़े हुए थे। ज़रा सा बोल क्या दिया कि उनका छद्म खुल गया। और इतने दिनों जो उन्होंने पहना- ओढ़ा-बिछाया, खाया-पिया वह पाप किस सिद्धांत के ऊपर डाला जायेगा?
आश्चर्य नहीं, जो आज नामवर की आलोचना कर रहे हैं कल वो भी अपने केचुल उतारें या उनका भी पर्दाफाश हो।
लोकतंत्र कि ऐसीतैसी
अदम गोंडवी का १८ दिसम्बर को निधन हो गया। मुझे दुःख इसलिए है कि वह मुझसे एक साल छोटे थे और उन्हें मुझसे पहले नहीं जाना था। कविता में तो वे निश्चय ही बहुत आगे थे जिसका सबूत है अख़बारों में उनका अधिकाधिक कवरेज। और प्रगतिशील साहित्यिक सिद्धांत के अनुसार जो रचनाकार आज़ादी और लोकतंत्र की जितनी फजीहत करे, खिल्ली उड़ाए, नेताओं को गालियाँ दे सरकार को सर के बल खड़ा करे, व्यवस्था का मजाक उड़ाए वह उतना ही बड़ा शायर होता है
फ़िर भी ये लोग शायर के इलाज की ज़िम्मेदारी सरकार पर ही डालते हैं जो इनके अनुसार नाकारा है। क्या यह अनैतिक नहीं कि जिसको गालियाँ दो उसी से पैसा लो फिर उन्हीं के मुंह में डंडा भी करो । कितने बीमारों के इलाज के लिए उनके खेत बिक जाते हैं क्या इन जनवादियों को पता है?
ऊपर से इनकी स्थापना ये है कि कवि भी उन्ही को मानो जिन्हें ये कवि की मान्यता दें . इनकी नजर में नागार्जुन, मुक्तिबोध तो कवि हैं मगर निर्मल वर्मा और अज्ञेय साहित्य के क्षेत्र में अस्वीकृत होने चाहिए।
ओर कहना न होगा, समाज को लताड़ने वाला, उसके अंधकार पक्ष को उधेड़ना, नारेबाजी करना, बिना मानसिक परिवर्तन के बगावत, विप्लव के लिए उकसाना बहुत आसान भी तो होता है, कठिन साहित्य होता है मानव के मन में प्रवेश करना ।
फ़िर भी ये लोग शायर के इलाज की ज़िम्मेदारी सरकार पर ही डालते हैं जो इनके अनुसार नाकारा है। क्या यह अनैतिक नहीं कि जिसको गालियाँ दो उसी से पैसा लो फिर उन्हीं के मुंह में डंडा भी करो । कितने बीमारों के इलाज के लिए उनके खेत बिक जाते हैं क्या इन जनवादियों को पता है?
ऊपर से इनकी स्थापना ये है कि कवि भी उन्ही को मानो जिन्हें ये कवि की मान्यता दें . इनकी नजर में नागार्जुन, मुक्तिबोध तो कवि हैं मगर निर्मल वर्मा और अज्ञेय साहित्य के क्षेत्र में अस्वीकृत होने चाहिए।
ओर कहना न होगा, समाज को लताड़ने वाला, उसके अंधकार पक्ष को उधेड़ना, नारेबाजी करना, बिना मानसिक परिवर्तन के बगावत, विप्लव के लिए उकसाना बहुत आसान भी तो होता है, कठिन साहित्य होता है मानव के मन में प्रवेश करना ।
शनिवार, 24 दिसंबर 2011
लोकपाल के प्रश्न
* अन्ना के समर्थक कृपया यह बतायें कि सरकार अब क्या करे ? उसने तो एक बिल संसद में पेश कर दिया । उस पर मतैक्य नहीं हो रहा है , और सदन में वह पारित नहीं हो पा रहा है तो सरकार क्या करे ? क्या मार्शल लगा कर सारे सदस्यों से वह ज़बरदस्ती करा ले ? क्या वह ऐसा कर सकती है ? या वह फौज लगाकर राष्ट्रपति से , वह जहाँ कहीं भी हों उनसे , दस्तखत करा ले ? अन्ना टीम तब भी खुश होगी क्या ?
* अब आरक्षण के प्रश्न पर सोचा जाये । यह तो तय है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है । भाजपा तमाम गलत बयानी करती है , पर उसका यह कहना सत्य प्रतीत होता है कि यदि इसकी तामील की गयी तो देश में गृह युद्ध की आशंका है । आखिर सहनशीलता की भी एक सीमा होती है । पाकिस्तान -बंगलादेश के बंटवारे को सहने के बाद अब देश के पास इतनी सहन शक्ति शायद नहीं बची है कि वह एक और बंटवारे की भूमिका को स्वीकार करे । अतः ऐसे आरक्षण की मांग देश हित में मुसलमानों को छोड़ देना चाहिए । यह हमारा राजनीतिक प्रस्ताव है । अब दार्शनिक बहस यह है कि मुस्लिम कोई जाति है या धर्म । अधिकांश मान्यता है कि यह धर्म है । फिर तो जैसा ऊपर बताया गया इनके लिए आरक्षण संभव नहीं है । आरक्षण हिन्दू धर्म के भीतर की त्रासदी है , जिसके तहत सवर्ण हिन्दू अपनी जातिगत विसंगति का फल भुगतने के लिए तैयार है , ख़ुशी से या नाखुशी से । पर इसने किसी धर्म पर कोई अत्याचार नहीं ढाया है, जिसकी सजा वह भुगते । फिर भी यदि कोई इसमें आरक्षण की जिद में है तो उसे हिन्दू धर्म की जातिगत व्यवस्था में आना होगा । दर्जी , जुलाहा , धुनिया बनकर तो वह आरक्षण का बन सकता है , पर उसके साथ मुसलमान जोड़कर वह आरक्षण ना ही माँगे तो अच्छा है ।
* और एक अंतिम ,अप्रिय प्रश्न । इन मूलभूत प्रश्नों से आखिर अन्ना टीम क्यों नहीं जूझती , जिसका देश हित में स्थायी महत्व है ? और हम क्या बुरा करते हैं जो उसके इसी छद्म को पहचान कर उनके साथ नहीं जुड़ते ?
* अब आरक्षण के प्रश्न पर सोचा जाये । यह तो तय है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है । भाजपा तमाम गलत बयानी करती है , पर उसका यह कहना सत्य प्रतीत होता है कि यदि इसकी तामील की गयी तो देश में गृह युद्ध की आशंका है । आखिर सहनशीलता की भी एक सीमा होती है । पाकिस्तान -बंगलादेश के बंटवारे को सहने के बाद अब देश के पास इतनी सहन शक्ति शायद नहीं बची है कि वह एक और बंटवारे की भूमिका को स्वीकार करे । अतः ऐसे आरक्षण की मांग देश हित में मुसलमानों को छोड़ देना चाहिए । यह हमारा राजनीतिक प्रस्ताव है । अब दार्शनिक बहस यह है कि मुस्लिम कोई जाति है या धर्म । अधिकांश मान्यता है कि यह धर्म है । फिर तो जैसा ऊपर बताया गया इनके लिए आरक्षण संभव नहीं है । आरक्षण हिन्दू धर्म के भीतर की त्रासदी है , जिसके तहत सवर्ण हिन्दू अपनी जातिगत विसंगति का फल भुगतने के लिए तैयार है , ख़ुशी से या नाखुशी से । पर इसने किसी धर्म पर कोई अत्याचार नहीं ढाया है, जिसकी सजा वह भुगते । फिर भी यदि कोई इसमें आरक्षण की जिद में है तो उसे हिन्दू धर्म की जातिगत व्यवस्था में आना होगा । दर्जी , जुलाहा , धुनिया बनकर तो वह आरक्षण का बन सकता है , पर उसके साथ मुसलमान जोड़कर वह आरक्षण ना ही माँगे तो अच्छा है ।
* और एक अंतिम ,अप्रिय प्रश्न । इन मूलभूत प्रश्नों से आखिर अन्ना टीम क्यों नहीं जूझती , जिसका देश हित में स्थायी महत्व है ? और हम क्या बुरा करते हैं जो उसके इसी छद्म को पहचान कर उनके साथ नहीं जुड़ते ?
अन्ना का उभार
अन्ना हजारे ने कहा है कि यदि उनसे पूछा जाता तो वे मैदान के आवंटन के लिए कोर्ट न जाने देते | मतलब साफ़ है कि अन्ना अलग हैं और उनकी टीम अलग है | टीम कई काम उनके अनुकूल नहीं करती , जिस प्रकार उनके स्वयं के काम लोकतंत्र के अनुकूल नहीं होते |अब ज़ाहिर है किराये के लिए सात लाख रूपये चंदा लेना उनके बाएं हाथ का खेल है | वह भी नम्बर एक का | काफी मेहनतकश ईमानदार जनता उनके साथ है |
दूसरी बात यह गौर करने की है कि उनके आन्दोलन का दबाव सिर्फ कांग्रेस पर ही क्यों होता है ? अन्य दल भी तो संसद के सदस्य हैं जिनकी ज़िम्मेदारी है बिल को पास करना , और वे उसमे अड़ंगे लगा रहे हैं | तो उन पर क्या अन्ना का दबाव नहीं होना चाहिए ? फिर कांग्रेस ही क्यों दबे जो कि अपना कर्तव्य संविधान के दायरे में निभा भी रही है ?
तीसरी बात , अन्ना उन आपत्तियों का जवाब क्यों नहीं देते जो संसद में उठाये जा रहे है ? दलित ,महिला , पिछड़ों के आरक्षण पर उनका कोई पक्ष नहीं है | अल्पसंख्यकों के आरक्षण पर अन्ना चुप हैं | क्यों ? क्या यह अर्थ न लगाया जाये कि वे अपनी ज़िम्मेदारी निभा नहीं रहे हैं और बस किसी अज्ञात जिद वश रट लगाये जा रहे हैं - लोकपाल बिल पास करो , लोकपाल बिल पास करो |
* [हाइकु ]
आया उभार
अन्ना - अरविन्द का
उतर गया |
#
दूसरी बात यह गौर करने की है कि उनके आन्दोलन का दबाव सिर्फ कांग्रेस पर ही क्यों होता है ? अन्य दल भी तो संसद के सदस्य हैं जिनकी ज़िम्मेदारी है बिल को पास करना , और वे उसमे अड़ंगे लगा रहे हैं | तो उन पर क्या अन्ना का दबाव नहीं होना चाहिए ? फिर कांग्रेस ही क्यों दबे जो कि अपना कर्तव्य संविधान के दायरे में निभा भी रही है ?
तीसरी बात , अन्ना उन आपत्तियों का जवाब क्यों नहीं देते जो संसद में उठाये जा रहे है ? दलित ,महिला , पिछड़ों के आरक्षण पर उनका कोई पक्ष नहीं है | अल्पसंख्यकों के आरक्षण पर अन्ना चुप हैं | क्यों ? क्या यह अर्थ न लगाया जाये कि वे अपनी ज़िम्मेदारी निभा नहीं रहे हैं और बस किसी अज्ञात जिद वश रट लगाये जा रहे हैं - लोकपाल बिल पास करो , लोकपाल बिल पास करो |
* [हाइकु ]
आया उभार
अन्ना - अरविन्द का
उतर गया |
#
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011
आओ म्हारे देश
*
[कविता ]
आओ दोस्तों आओ
आओ दुश्मनों आओ
दोस्त बनकर दुश्मनी निभाओ
दुश्मन होकर दोस्ती निभाओ
भारत आओ ,
आओ आर्यों आओ
आओ यवनों आओ
आओ अंग्रेजो आओ
भारत का दरवाज़ा पूरा खुला है
आओ आतंकवादी आओ
मार्क्स - माओवादी आओ
आओ अन्ना हजारे आओ
हिंदुस्तान तुम्हारा
स्वागत करने के लिए
तैयार खड़ा है
आओ कोई भी आओ
सब लोग आओ । #
[कविता ]
आओ दोस्तों आओ
आओ दुश्मनों आओ
दोस्त बनकर दुश्मनी निभाओ
दुश्मन होकर दोस्ती निभाओ
भारत आओ ,
आओ आर्यों आओ
आओ यवनों आओ
आओ अंग्रेजो आओ
भारत का दरवाज़ा पूरा खुला है
आओ आतंकवादी आओ
मार्क्स - माओवादी आओ
आओ अन्ना हजारे आओ
हिंदुस्तान तुम्हारा
स्वागत करने के लिए
तैयार खड़ा है
आओ कोई भी आओ
सब लोग आओ । #
रविवार, 18 दिसंबर 2011
बदमाश chintan
१ - हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिये ,
एक कुइंटल धान हमसे हर फसल में लीजिये । #
२ - बंधू जी जिस काम में लागे ,
काम तो पीछे , बंधू आगे । #
एक कुइंटल धान हमसे हर फसल में लीजिये । #
२ - बंधू जी जिस काम में लागे ,
काम तो पीछे , बंधू आगे । #
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
बदमाश चिंतन
१- (उवाच ) = हमारी डाक्टर साहिबा अभी आउटडोर के मरीजों को देख रही हैं । हम तो इनडोर में भर्ती हैं न ! # २ - (कविता )= अभी तो पास नहीं आ रहे हो , कोई बात नहीं , जब डायरेक्टर कहेगा तब तो चिपकोगी ? # 3 - (dharm patrika ) = यदि कोई धर्म की एक पत्रिका निकालना चाहें तो उसे इसे मासिक आवर्त्तता के साथ निकालनी चाहिए और पत्रिका का नाम रखना चाहिए - "मासिक धर्म " । #
४ - (कथा भूमि) = प्रवचनकरता ने भाषण शुरू ही kiya था - "मनुष्य को अपनी काम भावना से मुक्त होना चाहिए ।"
मैं उठकर बाहर चला आया । #
४ - (कथा भूमि) = प्रवचनकरता ने भाषण शुरू ही kiya था - "मनुष्य को अपनी काम भावना से मुक्त होना चाहिए ।"
मैं उठकर बाहर चला आया । #
गुरुवार, 15 दिसंबर 2011
अयोध्या समाधान
१ - (समाधान) - मित्रों से बातचीत करने पर यह लग रहा है कि अयोध्या में जो सरकारी ज़मीन है उस पर मैटरनिटी होम बनवाने की माँग राष्ट्रव्यापी बनायीं जा सकती है । विवादित स्थल का निर्णय अदालत के पास है , वह करे । लेकिन यह तो तय है कि पूरी समस्या का समाधान हमारे पास है जिसे हम सरकार के माध्यम से लागू कराना चाहेंगे । वह काम तो कोर्ट नहीं कर सकती , और हिन्दू -मुस्लिम संगठन भी नहीं करेंगे । ऐसी दशा में सरकार को कौशल्या मातृत्व केंद्र बनाने की पहल करनी ही चाहिए जिससे समस्या को स्थायी समाधान की दिशा मिल सके । #
२ - (कविता) - मस्जिद तो बन ही नहीं सकती
तो अयोध्या में
राम जन्म भूमि मंदिर भी
नहीं ही बननी चाहिए ,
यह मुसलमान नहीं
हिन्दू की चाह है ,
कट्टर ,सत्य ,आधुनिक ,
प्रगतिशील , वैज्ञानिक
हिन्दू की चाह है । #
३ - (उवाच )- आप हिन्दू हैं । और साम्प्रदायिक नहीं हैं । इसका मतलब यह नहीं कि आप साम्प्रदायिक नहीं हैं । आप बड़े आराम से मुस्लिम साम्प्रदायिक हो सकते हैं । #
४ - जैसे जातियां हैं तो उनमे जातिवाद का होना स्वाभाविक है । उसी प्रकार सम्प्रदाय हैं , तो साम्प्रदायिकता भी होगी ही । अब देखना यह है कि जिन दो सम्प्रदायों में अधिक तनाव है , उनमे से कौन अन्य सम्प्रदायों को सहने , अपनाने में कुशल रहा है और कौन हमेशा तना - अकड़ा रहा है ? इसके लिए उनके इतिहास -भूगोल में जाना होगा और उनकी वर्तमान मानसिकता का भी आकलन करना होगा । तिस पर भी किसी निर्णय पर निश्चयात्मक हो पाना कठिन ही है । #
२ - (कविता) - मस्जिद तो बन ही नहीं सकती
तो अयोध्या में
राम जन्म भूमि मंदिर भी
नहीं ही बननी चाहिए ,
यह मुसलमान नहीं
हिन्दू की चाह है ,
कट्टर ,सत्य ,आधुनिक ,
प्रगतिशील , वैज्ञानिक
हिन्दू की चाह है । #
३ - (उवाच )- आप हिन्दू हैं । और साम्प्रदायिक नहीं हैं । इसका मतलब यह नहीं कि आप साम्प्रदायिक नहीं हैं । आप बड़े आराम से मुस्लिम साम्प्रदायिक हो सकते हैं । #
४ - जैसे जातियां हैं तो उनमे जातिवाद का होना स्वाभाविक है । उसी प्रकार सम्प्रदाय हैं , तो साम्प्रदायिकता भी होगी ही । अब देखना यह है कि जिन दो सम्प्रदायों में अधिक तनाव है , उनमे से कौन अन्य सम्प्रदायों को सहने , अपनाने में कुशल रहा है और कौन हमेशा तना - अकड़ा रहा है ? इसके लिए उनके इतिहास -भूगोल में जाना होगा और उनकी वर्तमान मानसिकता का भी आकलन करना होगा । तिस पर भी किसी निर्णय पर निश्चयात्मक हो पाना कठिन ही है । #
बुधवार, 14 दिसंबर 2011
Delivery
* देखा जा रहा है कि आजकल ज़्यादातर प्रसव नार्मल नहीं होते । तो क्या , पैदा होने वाले बच्चे तो नार्मल , सामान्य ही होते हैं !
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
गुरुवार, 10 नवंबर 2011
पागल खाना
* अभी तो नहीं , लेकिन जिस तरह अन्ना टीम सोते जागते रात- दिन जन लोकपाल बिल -जन लोकपाल बिल बडबडारही है , एक दिन उनकी समर्थक जनता ही उन्हें पागल करार दे देगी । #
* जन लोकपाल भजन
हे लोकपाल , जन लोकपाल !
रहना तुम हम सब पर कृपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे चक्र के अन्दर हैं ,
हे चक्र सुदर्शन हो निहाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सोने से पहले लोकपाल,
जगने पर पहले लोकपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हर दिवस -रात , हर सुबह -शाम ,
हम अविरल करते जाप माल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम टीम बना किर्तन करते
अब तो है इज्ज़त का सवाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे सेवक टीम अना ,
रखना हम पर अपना ख्याल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
भजती अन्ना की टीम तुझे ,
भजते हैं नीम हकीम लाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सरकार मान ही नहीं रही ,
हमको है अतिशय ही मलाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल ! ####
* जन लोकपाल भजन
हे लोकपाल , जन लोकपाल !
रहना तुम हम सब पर कृपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे चक्र के अन्दर हैं ,
हे चक्र सुदर्शन हो निहाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सोने से पहले लोकपाल,
जगने पर पहले लोकपाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हर दिवस -रात , हर सुबह -शाम ,
हम अविरल करते जाप माल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम टीम बना किर्तन करते
अब तो है इज्ज़त का सवाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
हम तेरे सेवक टीम अना ,
रखना हम पर अपना ख्याल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
भजती अन्ना की टीम तुझे ,
भजते हैं नीम हकीम लाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल !
सरकार मान ही नहीं रही ,
हमको है अतिशय ही मलाल । हे लोकपाल , जन लोकपाल ! ####
हराम क्या है
* मैं अपने बच्चों की आरजूओं का क़त्ल होते न देख पाया , मैं जानता था कि जिंदगी में हराम क्या है , हलाल क्या है । [ मो वासिफ फ़ारूकी ]
सोमवार, 7 नवंबर 2011
ईद मुबारक
* मेरा ख्याल है , यदि मैं देश को ईद [ उज्जुहा ] का मुबारकबाद ना भी दूँ , तो भी वह इसे ख़ुशी - ख़ुशी मना ले जायेगा | कुछ मजबूरियां तो राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , राज्यपालों , मुख्य मंत्रियों की होती हैं जो वे गाहे - बगाहे होली - दीवाली - शबे बारात वगौरह की शुभकामनाएं देते रहते हैं | #
* जो मैं सूरज की मानिंद ज्क्लता रहूँगा ,
वह चाँद है , बुझेगा नहीं तब तक |
[ रवि कुमार बाबुल , भड़ास ब्लॉग पर ] #
* क्या सचमुच भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या है ? वह ऊपरी स्टारों पर ? ऊपर का पैसा तो ऊपर वाले वैसे भी खा जाते हैं | हम निचले स्तरों के भ्रष्टाचारों से पीड़ित हैं | और क्या हमारी अन्य समस्याएं नहीं हैं ? अन्ना का लोकपाल क्या पानी में मिलाना रोक देगा , वाटर सप्लाई में कीचड़ आना बंद करा देगा ? वह कुछ भी करेगा तो शिकायत मिलने पर ही न ? शिकायत कौन करेगा ? अभी तो उनकी नियुक्ति होगी , वही संदिग्ध है | कहाँ से मिलेंगे इतने दूध के धुले , और दूध भी तो वही होगा जैसे हमने ऊपर वर्णित किया ? फिर , उनकी नियुक्ति में भी घपला अवश्यम्भावी है | उस पर मुक़दमेबाजी होगी \ बरसों लगेंगे फैसले आने में | तब वे सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे | उनका इन्फ्रा स्ट्रक्चर बनेगा | अमला तैयार होगा | तब तक तो हम ६५ से ९५ हो जायेंगे | व्यक्ति की आत्मा को कोई भी कानून नहीं बाँध पायेगा | और उस आत्मा को ईमानदार बनाने के लिए कोई साहित्यकार - पत्रकार , साधू संत , अन्ना -मन्ना , काम नहीं कर रहे हैं | #
* आखिर अंततः करना आपको भी राजनीति ही है ! तो फिर यह साहित्य , संस्कृति , अध्यात्म , धर्म , योग इत्यादि की बातें क्यों कर रहे हैं ? सीधे अपने मंतव्य पर आइये | #
* उत्तराखंड का लोकपाल बिल अन्ना टीम को इसलिए भी पसंद है क्योंकि उसमे गैर सरकारी संगठनों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है , और मुख्य मंत्री को अन्दर |
* रिटायर्ड जजों से अन्ना अपनी जांच करा रहे हैं , जैसे प्राइवेट डाक्टरों से अपने स्वास्थ्य की जांच | अब खुद मुजरिम , अपने ही वकील , अपना ही मुंसिफ है | फैसला किसे नहीं पता ? वे सत्य वादी हैं तो अपना जुर्म कुबूल क्यों नहीं कर लेते ? अपने पाप स्वीकार क्यों नहीं करते , जो की उन्हें भली - भाँति ज्ञात हैं ? इतने नाटक क्यों करते हैं ?
* हम वह लोग हैं जो यह मानते हैं कि भगवान का भजन [ लक्ष्य का प्रणयन ] ज्यादा प्रभावी तरीके से भूखे रहकर ही किया जा सकता है , लगभग निराजल व्रत की तरह | तभी भजन का सार्थक फल - फूल मिलता है | वर्ना भूख का क्या ? उसका तो पेट कभी नहीं भरता | #
########ईद मुबारक
* जो मैं सूरज की मानिंद ज्क्लता रहूँगा ,
वह चाँद है , बुझेगा नहीं तब तक |
[ रवि कुमार बाबुल , भड़ास ब्लॉग पर ] #
* क्या सचमुच भ्रष्टाचार देश की सबसे बड़ी समस्या है ? वह ऊपरी स्टारों पर ? ऊपर का पैसा तो ऊपर वाले वैसे भी खा जाते हैं | हम निचले स्तरों के भ्रष्टाचारों से पीड़ित हैं | और क्या हमारी अन्य समस्याएं नहीं हैं ? अन्ना का लोकपाल क्या पानी में मिलाना रोक देगा , वाटर सप्लाई में कीचड़ आना बंद करा देगा ? वह कुछ भी करेगा तो शिकायत मिलने पर ही न ? शिकायत कौन करेगा ? अभी तो उनकी नियुक्ति होगी , वही संदिग्ध है | कहाँ से मिलेंगे इतने दूध के धुले , और दूध भी तो वही होगा जैसे हमने ऊपर वर्णित किया ? फिर , उनकी नियुक्ति में भी घपला अवश्यम्भावी है | उस पर मुक़दमेबाजी होगी \ बरसों लगेंगे फैसले आने में | तब वे सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे | उनका इन्फ्रा स्ट्रक्चर बनेगा | अमला तैयार होगा | तब तक तो हम ६५ से ९५ हो जायेंगे | व्यक्ति की आत्मा को कोई भी कानून नहीं बाँध पायेगा | और उस आत्मा को ईमानदार बनाने के लिए कोई साहित्यकार - पत्रकार , साधू संत , अन्ना -मन्ना , काम नहीं कर रहे हैं | #
* आखिर अंततः करना आपको भी राजनीति ही है ! तो फिर यह साहित्य , संस्कृति , अध्यात्म , धर्म , योग इत्यादि की बातें क्यों कर रहे हैं ? सीधे अपने मंतव्य पर आइये | #
* उत्तराखंड का लोकपाल बिल अन्ना टीम को इसलिए भी पसंद है क्योंकि उसमे गैर सरकारी संगठनों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है , और मुख्य मंत्री को अन्दर |
* रिटायर्ड जजों से अन्ना अपनी जांच करा रहे हैं , जैसे प्राइवेट डाक्टरों से अपने स्वास्थ्य की जांच | अब खुद मुजरिम , अपने ही वकील , अपना ही मुंसिफ है | फैसला किसे नहीं पता ? वे सत्य वादी हैं तो अपना जुर्म कुबूल क्यों नहीं कर लेते ? अपने पाप स्वीकार क्यों नहीं करते , जो की उन्हें भली - भाँति ज्ञात हैं ? इतने नाटक क्यों करते हैं ?
* हम वह लोग हैं जो यह मानते हैं कि भगवान का भजन [ लक्ष्य का प्रणयन ] ज्यादा प्रभावी तरीके से भूखे रहकर ही किया जा सकता है , लगभग निराजल व्रत की तरह | तभी भजन का सार्थक फल - फूल मिलता है | वर्ना भूख का क्या ? उसका तो पेट कभी नहीं भरता | #
########ईद मुबारक
रविवार, 6 नवंबर 2011
भ्रष्टाचार की परिभाषा
* भ्रष्टाचार की परिभाषा होते होते यहाँ आ पंहुची है कि जो जन लोकपाल बिल पास कराये वह ईमानदार , और जो जन लोकपाल बिल पास होने में आनाकानी करे वह महाभ्रष्ट | जन लोकपाल भ्रष्टाचार का पर्याय हो गया है | अजीब विडम्बना की स्थिति है दार्शनिक हिंदुस्तान के लिए | शब्दों और समस्याओं कि इतनी हलकी व्याख्या इसके पहले नहीं होती थी | तो यह है हमारी असली प्रगति !
* केजरीवाल ने आय कर विभाग की नोटिस पर ९ लाख रु का चेक प्रधान मंत्री के पास भेज दिया है | क्या कोई साधारण समझदार नागरिक ऐसी बद तमीजी कर सकता है ? क्या बिजली का बकाया आप जल निगम में जमा कर सकते हैं | मैं इसके व्यवहार को देखकर हतप्रभ हूँ , कि आखिर यह लड़का अपने आप को समझता क्या है ? अन्ना संविधान से ऊपर , तो उनसे पहले श्रीमान जी संविधान से ऊपर ! अभी वह फोन टेपिंग का मसला उठा रहा है | उद्देश्य कुछ नहीं , सिर्फ यह जाताना कि देखो मैं इतना महत्त्वपूर्ण हूँ | और नहीं तो क्या ? अभी तो जूता और काले झंडे दिखाए गए हैं , आगे आगे देखिये क्या होता है ! उन्हें राजनीतिक विरोधी कहकर न टालिए राजनेताओं की तरह | वे उसी सौ करोड़ जनता के अंग हैं , जिनकी तरफ से आन्दोलन चलाने का तुम दावा ठोंकते हो |
इसीलिये मैं इन लोगों के दिखावे के मुद्दे से प्रभावित न होने और इनके असली मंतव्य को पहचानने और उसे धूल में मिलाने का आग्रह जनता जनार्दन से करता रहता हूँ | कुछ लोग इसे समझने से इंकार करके मुझ पर नाराज़ होते हैं , वह तो क्षम्य है | पर खेद है कि अन्ना महाशय भी इसे नहीं समझ रहे हैं , और अपनी तात्कालिक ख्याति , प्रशंसा और प्रचार की लालच में टीम की गिरफ्त में आते जा रहे हैं | वे नहीं समझते कि जब पोले खुलेगा , [ब्लॉगर विवाद से वह सामने आना शुरू भी हो गया है ] , और लोक की नज़रों में आसमान से गिरेंगे , तो उनका धवल वस्त्र मटियामेट हो जायगा | उनकी चांदनी चार दिनों से ज्यादा नहीं है | वे गौर करें कि यही कारण है कि अन्ना के अलावा उनकी टीम के अन्य सदस्य रंगीन कपड़े पहनते हैं , और वे उनके साथ अन्न त्याग कर अपना स्वास्थ्य ख़राब नहीं करते | दिग्विजय सिंह उनके विरोधी सही , पर निंदक को भी अपने नज़दीक रखना भारतीय जीवन शास्त्र में बड़ा ज़रूरी माना गया है | #
* मेरा प्रस्ताव है कि अन्ना टीम से यह लिखित शपथ पत्र ले लिया जाय कि वे स्वयं लोकपाल बनने के प्रत्याशी नहीं होंगे , जिससे हम जनता का उन पर अविश्वास कुछ कम हो , और उन पर थोड़ा विश्वास आये कि वे इतना उछाल कूद अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं , बल्कि जनहित में कर रहे हैं | वैसे भी ये लोग अपने अभी ही के भ्रष्टाचारों के कारण उस पद के काबिल नहीं रह गए हैं | #
* कहा और समझा यह जाता है कि जो अन्ना के साथ नहीं है वह भ्रष्ट है | ऐसी रणनीति ही बनायीं है इस टीम ने , इसीलिये यह प्राथमिक तौर पर इतना सफल भी हुआ | लेकिन दर असल हकीक़त इसके पलट है | सारे भ्रष्टाचारी अन्ना टीम में हैं या इनके आन्दोलन में हैं | जो समझदार नैतिक जन हैं वे इनसे दूर हैं इनका छल समझकर , या समर्थन में भी हैं तो कुछ आपत्तियों के साथ |#
* केजरीवाल ने आय कर विभाग की नोटिस पर ९ लाख रु का चेक प्रधान मंत्री के पास भेज दिया है | क्या कोई साधारण समझदार नागरिक ऐसी बद तमीजी कर सकता है ? क्या बिजली का बकाया आप जल निगम में जमा कर सकते हैं | मैं इसके व्यवहार को देखकर हतप्रभ हूँ , कि आखिर यह लड़का अपने आप को समझता क्या है ? अन्ना संविधान से ऊपर , तो उनसे पहले श्रीमान जी संविधान से ऊपर ! अभी वह फोन टेपिंग का मसला उठा रहा है | उद्देश्य कुछ नहीं , सिर्फ यह जाताना कि देखो मैं इतना महत्त्वपूर्ण हूँ | और नहीं तो क्या ? अभी तो जूता और काले झंडे दिखाए गए हैं , आगे आगे देखिये क्या होता है ! उन्हें राजनीतिक विरोधी कहकर न टालिए राजनेताओं की तरह | वे उसी सौ करोड़ जनता के अंग हैं , जिनकी तरफ से आन्दोलन चलाने का तुम दावा ठोंकते हो |
इसीलिये मैं इन लोगों के दिखावे के मुद्दे से प्रभावित न होने और इनके असली मंतव्य को पहचानने और उसे धूल में मिलाने का आग्रह जनता जनार्दन से करता रहता हूँ | कुछ लोग इसे समझने से इंकार करके मुझ पर नाराज़ होते हैं , वह तो क्षम्य है | पर खेद है कि अन्ना महाशय भी इसे नहीं समझ रहे हैं , और अपनी तात्कालिक ख्याति , प्रशंसा और प्रचार की लालच में टीम की गिरफ्त में आते जा रहे हैं | वे नहीं समझते कि जब पोले खुलेगा , [ब्लॉगर विवाद से वह सामने आना शुरू भी हो गया है ] , और लोक की नज़रों में आसमान से गिरेंगे , तो उनका धवल वस्त्र मटियामेट हो जायगा | उनकी चांदनी चार दिनों से ज्यादा नहीं है | वे गौर करें कि यही कारण है कि अन्ना के अलावा उनकी टीम के अन्य सदस्य रंगीन कपड़े पहनते हैं , और वे उनके साथ अन्न त्याग कर अपना स्वास्थ्य ख़राब नहीं करते | दिग्विजय सिंह उनके विरोधी सही , पर निंदक को भी अपने नज़दीक रखना भारतीय जीवन शास्त्र में बड़ा ज़रूरी माना गया है | #
* मेरा प्रस्ताव है कि अन्ना टीम से यह लिखित शपथ पत्र ले लिया जाय कि वे स्वयं लोकपाल बनने के प्रत्याशी नहीं होंगे , जिससे हम जनता का उन पर अविश्वास कुछ कम हो , और उन पर थोड़ा विश्वास आये कि वे इतना उछाल कूद अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं , बल्कि जनहित में कर रहे हैं | वैसे भी ये लोग अपने अभी ही के भ्रष्टाचारों के कारण उस पद के काबिल नहीं रह गए हैं | #
* कहा और समझा यह जाता है कि जो अन्ना के साथ नहीं है वह भ्रष्ट है | ऐसी रणनीति ही बनायीं है इस टीम ने , इसीलिये यह प्राथमिक तौर पर इतना सफल भी हुआ | लेकिन दर असल हकीक़त इसके पलट है | सारे भ्रष्टाचारी अन्ना टीम में हैं या इनके आन्दोलन में हैं | जो समझदार नैतिक जन हैं वे इनसे दूर हैं इनका छल समझकर , या समर्थन में भी हैं तो कुछ आपत्तियों के साथ |#
रविवार, 30 अक्टूबर 2011
RDHS
* गौर कीजिये कि अन्ना टीम में बहुत बड़े बड़े लोग हैं , इलीट क्लास के । बिल्कुल ब्राह्मण जैसे । और ये सरकार को दबा कुचल कर अपनी बात मनवाना , अपना काम करवाना चाहते हैं । सरकार इस समय बिल्कुल दलितों की अवस्था और स्थिति में हैं । अब आप सोचिये कि हम लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?
* मैं तो यह देख रहा हूँ कि जन लोक पाल बिल पास होने से पहले यदि मेरे द्वारा प्रस्तावित RDHS= Right to die of hunger strike [भूभ हड़ताल द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने या मरने का अधिकार] सम्बन्धी बिल संसद में पारित नहीं हो जाता , तब तक भ्रष्टाचार तो कैसे भी समाप्त नहीं होगा , यह आन्दोलन रुपी सामाजिक भ्रष्टाचार तो समाप्त नहीं होगा ।
* लोग कैसी कैसी गलतफहमियों में जीते हैं ! कि सरकार हो भ्रष्टाचार न हो ! जहाँ चार आदमी हों वहां स्वार्थ न हों , समाज हो और स्वार्थों का टकराव न हो ! तो भ्रष्टाचारियों का तो निश्चय ही एक स्वार्थ हो सकता है , होगा ही । लेकिन आन्दोलन कारियों का भी एक प्रति स्वार्थ अवश्य है , इसे ठीक से समझा जाना चाहिए । यह अकारण नहीं है कि तथाकथित गाँधीवादी संत अन्ना महाशय अपनी टीम का आँख मूँद कर समर्थन कर रहे हैं । #
* मैं तो यह देख रहा हूँ कि जन लोक पाल बिल पास होने से पहले यदि मेरे द्वारा प्रस्तावित RDHS= Right to die of hunger strike [भूभ हड़ताल द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने या मरने का अधिकार] सम्बन्धी बिल संसद में पारित नहीं हो जाता , तब तक भ्रष्टाचार तो कैसे भी समाप्त नहीं होगा , यह आन्दोलन रुपी सामाजिक भ्रष्टाचार तो समाप्त नहीं होगा ।
* लोग कैसी कैसी गलतफहमियों में जीते हैं ! कि सरकार हो भ्रष्टाचार न हो ! जहाँ चार आदमी हों वहां स्वार्थ न हों , समाज हो और स्वार्थों का टकराव न हो ! तो भ्रष्टाचारियों का तो निश्चय ही एक स्वार्थ हो सकता है , होगा ही । लेकिन आन्दोलन कारियों का भी एक प्रति स्वार्थ अवश्य है , इसे ठीक से समझा जाना चाहिए । यह अकारण नहीं है कि तथाकथित गाँधीवादी संत अन्ना महाशय अपनी टीम का आँख मूँद कर समर्थन कर रहे हैं । #
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