।। एक मजदूर का धर्म और कर्म।।
वैसे तो मजदूर कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति, समाज या राज्य का हो। एक मजदूर इन सभी के बंधनों से मुक्त होता है।
चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, ईसाई हो, दलित हो, सवर्ण हो, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक हो सभी ने कभी न कभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरी किया होगा। मजदूरी करने के लिए किसी विशेष जाति या मजहब, समाज या समुदाय को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती, एक मजदूर के लिए कर्म ही प्रधान होता है। निरंतर कर्म करते रहना ही एक मजदूर का परम कर्तव्य होता है, परंतु अक्सर यह देखा गया है कि निरंतरता हमेशा बनी नहीं रहती।
एक मजदूर अक्सर जाति- पांति, वर्तमान में व्याप्त तथाकथित धर्मों, वैचारिक, सामाजिक व आर्थिक असमानता के कारण अपने पथ से विमुख हो कर राजशाही के विषैले कुएं में डूब जाता है।
और इसका मुख्य कारण है कि मजदूर का कोई संवैधानिक, सर्वव्यापी धर्म के आस्तित्व का ना होना। यदि मजदूरों का भी कोई व्यापक धर्म होता और उस धर्म का पालन करने के लिए विशेष विचारधारा होती तो कोई मजदूर कभी पथभ्रष्ट नहीं होता और निरंतरता हमेशा बनी रहती।
आवश्यकता है एक ऐसी विचारधारा की जो व्यक्ति को मजदूर बनाए रखे और एक पहचान की जिससे कि विचारधारा को लागू किया जा सके। पहचान को बनाए रखने के लिए ही आज इतने धर्म आस्तित्व में आये हैं, या समझ लीजिए कि पहचान को बनाए रखने के लिए जो विधि कार्य करती है उसी को धर्म कहा जाता है।
तो क्यों ना एक ऐसा सर्वव्यापी धर्म हो जिससे कि कर्म प्रधान व्यक्तियों का आस्तित्व कायम रह सके? क्यों ना एक एक नए धर्म को आस्तित्व में लाया जाये जिसे मजदूरों के धर्म की संज्ञा दी जा सके और एक पहचान मिल सके?
उग्रनाथ'नागरिक'(1946, बस्ती) का संपूर्ण सृजनात्मक एवं संरचनात्मक संसार | अध्यात्म,धर्म और राज्य के संबंध में साहित्य,विचार,योजनाएँ एवं कार्यक्रम @
बुधवार, 17 जुलाई 2019
मजदूर
मजदूर आंदोलन
।। एक मजदूर का धर्म और कर्म।।
वैसे तो मजदूर कोई भी हो सकता है चाहे वह किसी भी जाति, समाज या राज्य का हो। एक मजदूर इन सभी के बंधनों से मुक्त होता है।
चाहे कोई हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, ईसाई हो, दलित हो, सवर्ण हो, अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक हो सभी ने कभी न कभी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मजदूरी किया होगा। मजदूरी करने के लिए किसी विशेष जाति या मजहब, समाज या समुदाय को अपनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती, एक मजदूर के लिए कर्म ही प्रधान होता है। निरंतर कर्म करते रहना ही एक मजदूर का परम कर्तव्य होता है, परंतु अक्सर यह देखा गया है कि निरंतरता हमेशा बनी नहीं रहती।
एक मजदूर अक्सर जाति- पांति, वर्तमान में व्याप्त तथाकथित धर्मों, वैचारिक, सामाजिक व आर्थिक असमानता के कारण अपने पथ से विमुख हो कर राजशाही के विषैले कुएं में डूब जाता है।
और इसका मुख्य कारण है कि मजदूर का कोई संवैधानिक, सर्वव्यापी धर्म के आस्तित्व का ना होना। यदि मजदूरों का भी कोई व्यापक धर्म होता और उस धर्म का पालन करने के लिए विशेष विचारधारा होती तो कोई मजदूर कभी पथभ्रष्ट नहीं होता और निरंतरता हमेशा बनी रहती।
आवश्यकता है एक ऐसी विचारधारा की जो व्यक्ति को मजदूर बनाए रखे और एक पहचान की जिससे कि विचारधारा को लागू किया जा सके। पहचान को बनाए रखने के लिए ही आज इतने धर्म आस्तित्व में आये हैं, या समझ लीजिए कि पहचान को बनाए रखने के लिए जो विधि कार्य करती है उसी को धर्म कहा जाता है।
तो क्यों ना एक ऐसा सर्वव्यापी धर्म हो जिससे कि कर्म प्रधान व्यक्तियों का आस्तित्व कायम रह सके? क्यों ना एक एक नए धर्म को आस्तित्व में लाया जाये जिसे मजदूरों के धर्म की संज्ञा दी जा सके और एक पहचान मिल सके?
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019
धर्म से निपटें
अब यह समस्या नहीं है कि धर्म को समझा कैसे जाय ।
अब तो समस्या यह है कि इनसे निपटा कैसे जाय ?
शनिवार, 26 जनवरी 2019
बताया गया
आप जानते हैं आप आस्तिक क्यों हैं? ईश्वर को क्यों मानते हैं, उसकी पूजा आरती करते हैं?
क्योंकि आपको यही बताया गया है कि कोई ईश्वर है जिसने दुनिया बनाई, वह बहुत ताक़तवर है, वह उपासना से खुश होता है । वह आपको कुछ भी सामान वरदान दे सकता है । और यह भी कि आपके, दुनिया के कष्ट निवारण के लिए वह अवतार लेता है/ लेगा ।
मेरे भाई, यह आपको बिल्कुल गलत और सरासर झूठ बताया गया , जिस पर आप विश्वास करते हो ।
ज्ञान विज्ञान के आदेश पर अब हम आपको बताते हैं कि कहीं कोई ईश्वर, इस सृष्टि का कोई व्यक्ति-निर्माता नहीं है । इसके पूजा पाठ से कोई फायदा नहीं है । जो भी होगा आपके कर्मों से होगा ।
अतः आज ही से किसी पारलौकिक शक्ति पर विश्वास और भरोसा मत करो ।
क़ैद ईश्वर
कविता
-- -- -- --
मनुष्य शिखर पर
ईश्वर मंदिर में पड़ा
सोचता है -
मनुष्य से कैसे मिलूँ ?
* * * * *
(उग्रनाथ नागरिक)
गुरुवार, 17 जनवरी 2019
आज़ाद औरतें
कविता
-- -- --
वह सती होती थीं
अपनी इच्छानुसार
अपने पति के प्रेमवश ।
वह नक़ाब पहनती हैं
अपनी पसंद से
किसी के कहने
किसी के दबाव में नहीं ।
वह शादी करती हैं
विवाह क़ुबूल करती हैं
अपनी पूरी सहमति के साथ ।
वह रसोई में जल जाती हैं
अपनी असावधानी से
कोई उन्हें जलाता नहीं ।
यहाँ तक कि वह
बलात्कार को बुलाने
आमंत्रण देने
देर रात सफ़र करती
घर से निकलतीं
आती जाती हैं
सब अपने मन से ।
हमारी स्त्रियाँ पूरी स्वतंत्र हैं
आत्मनिर्भर, स्वावलंबी ।
क्या आपको अब भी
बात समझ नहीं आती ?
-- -- --
-- उग्रनाथ नागरिक
बुधवार, 16 जनवरी 2019
क्या तीर
ईश्वर नहीं है, तो हमने नहीं माना । इसमें कौन सा तीर मार लिया हमने ?
ईश्वर होता और हम न मानते तब आप हमारी पीठ थपथपाते !
मंगलवार, 15 जनवरी 2019
अति
अति सर्वत्र वर्जयेत नहीं होना चाहिए ।
अतिचिन्तन से अधिक ज्ञान और बड़े निष्कर्ष प्राप्त होते हैं ।
रविवार, 13 जनवरी 2019
शनिवार, 12 जनवरी 2019
बुधवार, 9 जनवरी 2019
अविष्कार ?
ईश्वर भी मनुष्य का एक आविष्कार है?
हाँ अवश्य ! शायद इसीलिए हमें अपने आविष्कार के साथ जीना सीखना चाहिए, कलात्मक/साहित्यिक तरीके से । वह अब ऊपर नहीं, इसी दुनिया का नागरिक हो गया है । मानव संसाधन के रूप में उसका सदुपयोग किया जाना चाहिए और एक दुश्मन मानकर उसके हाथों खिलौना बनने से बचना चाहिए ।
गुरुवार, 20 दिसंबर 2018
दुःखद स्थिति
क्या तो नज़ारा हो गया है देश का ! धर्मनिरपेक्षता के तहत धर्म से दूर रहने, दूरी बनाने की जगह अब सरकार स्वयं पूजा करने बैठ गयी है । 😢
बुधवार, 19 दिसंबर 2018
मंगलवार, 18 दिसंबर 2018
रविवार, 16 दिसंबर 2018
शनिवार, 15 दिसंबर 2018
शोषण के खिलाफ़
मैं यह कहना चाह रहा था कि अगर ईश्वर और धर्म शोषण के औजार हैं तो कम्युनिस्ट जन ईश्वर और धर्म का खुला विरोध क्यों नहीं करते ? केवल पूँजीवाद ही उनकी ज़ुबान पर क्यों रहे ?
अविशिष्ट
निश्चित ही हर व्यक्ति विशिष्ट है ।
लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति अपनी विशिष्टता का प्रदर्शन, दावा, हक़दारी करने लगता है, वह अशिष्ट हो जाता है ।
बुधवार, 12 दिसंबर 2018
तीसरा आदमी
इस देश में केवल हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई रहते हैं । यही चार भाई इस देश के उत्तराधिकारी हैं, तभी तो केवल इन्ही में भाई चारा रखने के प्रयास होते हैं, गीत गाये जाते हैं ।
बल्कि इनमें भी केवल दो, हिन्दू और मुस्लिम ही प्रभावी रूप से सक्रिय हैं । कभी प्रेम से रहते कभी लड़ झगड़ लेते हैं ।
इनके अतिरिक्त कोई जनसंख्या भारत में नहीं है । होगी भी तो दिखती नहीं है । वैज्ञानिक विचारधारा वाले मानववादी, नास्तिक, धर्म-सम्प्रदाय, जाति विहीन तबका तो कहीं दिखता नहीं । और एक कम्युनिस्ट नामक अधर्मी समूह की समाज में कोई छाप दिखती नहीं है ।
परिणाम, यही दो सम्प्रदाय देश को चला रहे हैं और ले जा रहे हैं देश को हिंद महासागर की ओर ।
बात लग गयी न ? लेकिन बताइये, कोई तीसरा पक्ष होता तो एक Common Civil Code के लिए अड़ न जाता ? क्या किसी ने दावा ठोंका कि रहा होगा चप्पे चप्पे पर कभी मंदिर मस्जिद अब कानून बनाकर अयोध्या में विद्यालय बनाओ ? इस ज्वलंत मुद्दे पर दो ही फ़रीक कोर्ट में भी लड़ रहे हैं और ज़मीन पर भी संघर्षरत ।
क्या किसी धार्मिक-अधार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक समूह ने यह कहने की हिम्मत की कि कश्मीर को आज़ाद करने के विकल्प पर भी विचार किया जाना चाहिए ?
जी नहीं, कोई नहीं है ।
मंगलवार, 11 दिसंबर 2018
साथी संगठन
कम्युनिज़्म भी एक सांस्कृतिक विचारधारा है ।
तो जिस प्रकार RSS बिना राजनीतिक ताक़त के राजनीति में इतना प्रभाव जमा सकता है, मार्क्सवाद भी बिना चुनाव लड़े सशक्त क्यों नहीं हो सकता ?
ज़रूरत है तो वही संघ वाली निष्ठा की !
प्रचार
झूठ में बड़ी ताक़त है और प्रचार में बड़ी शक्ति ।
प्रचार से ही ईश्वर नामक झूठ अस्तित्व में आया ।
प्रचार द्वारा उसके फरेब को मिटाने में कोई बुराई नहीं है ।
अयोध्या विद्यालय
हमें मंदिरमस्जिद नहीं, विद्यालय चाहिए ! (युवापक्ष,हिन्दोस्तान)
-- -- -- -- -- -- -- -- -- -- --
यह युवा आंदोलन बनना चाहिए। "युवापक्ष हिन्दोस्तान" एक युवा संगठन के रूप में उभरना चाहिए,सचमुच युवा?
रविवार, 5 अगस्त 2018
आंदोलन
किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना तो उचित ही होता है । लेकिन यह भी होता है कि जिन्हें आंदोलन की आदत होती है वह आंदोलन करने के लिए कोई न कोई अन्याय का मुद्दा ढूँढ ही लेते हैं ।
गुरुवार, 22 मार्च 2018
अमरत्व
ऐसा क्यों होता है
कि कोई हिन्दू पैदा होता है
तो हिंदुत्व पर गर्व करने लगता है
कोई मुसलमान पैदा होता है
तो इस्लाम के गुण गाने लगता है ?
ऐसे तो नहीं चलेगा भाई !
आदमी और इंसान
हिन्दू मुसलमान तो नहीं होता !
यदि हिन्दू को हिन्दू ही रहना है आजीवन,
मुसलमान को मुसलमान रहना है ताउम्र ,
तब तो आदमी को मरना ही है
इंसानियत अमर नहीं हो सकती कभी
अमरत्व की खोज क्या
कल्पना ही बेमानी है ।
सोमवार, 19 मार्च 2018
वेद प्रदर्शनी
अयोध्या अधिग्रहीत भूमि पर "वेद विज्ञान प्रदर्शनी" लगा कर दुनिया को दिखाओ । यह जन्मभूमि विवाद भी मिटे और इस बहाने हिन्दू हृदय सम्राट राजा राम का नाम भी प्रतिष्ठा पाये । ज़ाहिर है उस परिसर में एक कोने में राम की मूर्ति भी खड़ा लो । जैसे अनेक, लगभग सभी, केंद्रीय- राज्य सरकारी कार्यालयों, दफ्तरों में अनिवार्य रूप से होते ही हैं, और कोई उनका क्या बिगाड़ लेता है ? उसी प्रकार अयोध्या वेद विज्ञान कार्यालय / परिसर में एक मंदिर हो जाय । किसी को क्या ऐतराज़ यदि इस तरीके से सुंदर देश के एक गन्दे खेल का समापन ही जाए ।
रविवार, 18 मार्च 2018
यहूदी
अज्ञात व्यक्ति को तो आदमी ही मानकर चलना पड़ेगा । यह तो बाद में पता चलेगा कि वह कैसा आदमी है ! स्त्री है या पुरुष, उत्कृष्ट है अथवा निकृष्ट, ईसाई है या यहूदी ?
शनिवार, 17 मार्च 2018
अयोध्या उपाय
निर्दोष समाधान !
Foolproof scientific solution to Ayodhya Dispute :-
--- --- --- --- --- ---
सम्पूर्ण समस्या को संकेंद्रित, centralise करके देखें तो बात है केवल गर्भगृह की । आस्था की दुहाई दी जाती है राम जन्मभूमि की । लड़ाई है राम की पैदायशी ज़मीन की । धार्मिक भावना जुड़ी है जहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित, विराजमान है । विवाद भले पौने तीन एकड़ में फैला है ।
तो उस गर्भगृह पर मंदिर मस्जिद कोई हल नहीं है । इससे समस्या घटने के बजाय बढ़ेगी । समाप्त तो कतई नहीं होगी । इसे किसी गहरे अंधकूप, काल के विवर में डालना ही एकमात्र स्थायी उपाय है । इसे हम Black Hole Solution नाम देना चाहते हैं ।
लेकिन इसे आप सुविधा के लिए Pillar Well भी कह सकते हैं ।
उस स्थान को आप एक गोल मोटी दीवाल से घेर दें । और उस दीवाल पर वह राम मंदिर के लिए करोड़ोे की कीमत के लाये, तराशे गए सारे पत्थर एक के ऊपर एक जोड़ते हुए ऊँचा उठाते जायँ । क्या खूब कि वह राम का कुआँ बुर्ज़ खलीफ़ा से भी ऊँचा हो जाये । दुनिया देखे । पत्थर जड़ते जड़ते अगर शिखर के पत्थर आपस में जुड़कर Dome के आकार की हो जायें, और वह स्तूप बन जाये तो क्या कहने ! बौद्धों की भी आस्था का समाधान हो जाये । है न उनका भी सशक्त दावा उस स्थान पर और राज्य को सबका ख्याल रखना है । देखिये, पूरा न्याय absolute तो नहीं निकल सकता, यदि वहाँ मस्जिद वापस न की गयी तो । तो अन्याय तो होना है धार्मिक श्रद्धा पर । तो भक्तों, कारसेवकों का भी तुष्टिकरण संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के विरुद्ध होगा । लेकिन यह भी सच है कि इसका कोई सेक्युलर उपयोग भी सौंदर्य शास्त्र Secular Aesthetics के अनुकूल न होगा । इसे एक धार्मिक स्मारक, Historical-Religious Monument ही बनना उचित होगा । यही फिर बुर्ज़ खलीफ़ा की तरह secular credential को प्राप्त होगा, tourism पर्यटन का एक महान केंद्र ।
अब उपसंहार । चूँकि (दिवंगत 14 मार्च) सदी का महान ब्रम्हाण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग वेदों में विज्ञान की बड़ाई कर चुके है, तो यह तो बहुत अच्छी बात है । उन्होंने भारत का शीश संसार में ऊँचा कर दिया, हमारे लिए गर्व की बात है । इसलिए उस शेष परिसर को स्टीफन हाकिंग विज्ञान पार्क का नाम दिया जाय । वहाँ बुर्ज़ खलीफ़ा के तौर तरीके पर Light & Sound प्रदर्शनी द्वारा यह दिखाया सुनाया जाय कि पुष्पक विमान कैसे उड़ाया जाता था, गणेश के सिर की सर्जरी कैसे हुई, कैसे पत्थर को तैराया जा सकता है, किस प्रकार फल फूल आदि से गर्भाधान किया जाता था, इत्यादि इत्यादि । वेद भी खुश, विज्ञान भी प्रसन्न ।
Final resolve
निर्दोष समाधान !
Foolproof scientific solution to Ayodhya Dispute :-
--- --- --- --- --- ---
सम्पूर्ण समस्या को संकेंद्रित, centralise करके देखें तो बात है केवल गर्भगृह की । आस्था की दुहाई दी जाती है राम जन्मभूमि की । लड़ाई है राम की पैदायशी ज़मीन की । धार्मिक भावना जुड़ी है जहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित, विराजमान है । विवाद भले पौने तीन एकड़ में फैला है ।
तो उस गर्भगृह पर मंदिर मस्जिद कोई हल नहीं है । इससे समस्या घटने के बजाय बढ़ेगी । समाप्त तो कतई नहीं होगी । इसे किसी गहरे अंधकूप, काल के विवर में डालना ही एकमात्र स्थायी उपाय है । इसे हम Black Hole Solution नाम देना चाहते हैं ।
लेकिन इसे आप सुविधा के लिए Pillar Well भी कह सकते हैं ।
उस स्थान को आप एक गोल मोटी दीवाल से घेर दें । और उस दीवाल पर वह राम मंदिर के लिए करोड़ोे की कीमत के लाये, तराशे गए सारे पत्थर एक के ऊपर एक जोड़ते हुए ऊँचा उठाते जायँ । क्या खूब कि वह राम का कुआँ बुर्ज़ खलीफ़ा से भी ऊँचा हो जाये । दुनिया देखे । पत्थर जड़ते जड़ते अगर शिखर के पत्थर आपस में जुड़कर Dome के आकार की हो जायें, और वह स्तूप बन जाये तो क्या कहने ! बौद्धों की भी आस्था का समाधान हो जाये । है न उनका भी सशक्त दावा उस स्थान पर और राज्य को सबका ख्याल रखना है । देखिये, पूरा न्याय absolute तो नहीं निकल सकता, यदि वहाँ मस्जिद वापस न की गयी तो । तो अन्याय तो होना है धार्मिक श्रद्धा पर । तो भक्तों, कारसेवकों का भी तुष्टिकरण संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के विरुद्ध होगा । लेकिन यह भी सच है कि इसका कोई सेक्युलर उपयोग भी सौंदर्य शास्त्र Secular Aesthetics के अनुकूल न होगा । इसे एक धार्मिक स्मारक, Historical-Religious Monument ही बनना उचित होगा । यही फिर बुर्ज़ खलीफ़ा की तरह secular credential को प्राप्त होगा, tourism पर्यटन का एक महान केंद्र ।
अब उपसंहार । चूँकि (दिवंगत 14 मार्च) सदी का महान ब्रम्हाण्ड वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग वेदों में विज्ञान की बड़ाई कर चुके है, तो यह तो बहुत अच्छी बात है । उन्होंने भारत का शीश संसार में ऊँचा कर दिया, हमारे लिए गर्व की बात है । इसलिए उस शेष परिसर को स्टीफन हाकिंग विज्ञान पार्क का नाम दिया जाय । वहाँ बुर्ज़ खलीफ़ा के तौर तरीके पर Light & Sound प्रदर्शनी द्वारा यह दिखाया सुनाया जाय कि पुष्पक विमान कैसे उड़ाया जाता था, गणेश के सिर की सर्जरी कैसे हुई, कैसे पत्थर को तैराया जा सकता है, किस प्रकार फल फूल आदि से गर्भाधान किया जाता था, इत्यादि इत्यादि । वेद भी खुश, विज्ञान भी प्रसन्न ।
मंगलवार, 13 मार्च 2018
करीब आ जाओ
पुरानी कविता, नया दम:
(इतना करीब आ जाओ)
--------------
तुम मेरे
इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाओ
कि मेरी साँस उखड़ने लगे
मेरा दम घुट जाए
और मैं मर जाऊँ ।
- - - - - - - -
पहले मैं
बड़े मेलों में जाता हूँ
फिर बड़ी सभाओं में
छोटे छोटे सम्मेलनों में
फिर छोटी गोष्ठियों
और छोटी मीटिंग में
छोटी से छोटी होती
कमरों की गुफ़्तगू में
शामिल होता हूँ ।
फिर बहुत ही छोटा
कोई गुरिल्ला ग्रुप बनकर
दुश्मन से चिपक जाता हूँ
उसके इतना करीब
इतना करीब
इतना करीब आ जाता हूँ
कि उसकी साँस घुट जाए !
--- --- --- ---
(उग्रनाथ नागरिक) - 13 मार्च, 2018
सोमवार, 12 मार्च 2018
RTR
सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट कम से कम Right to Recall में ही जनता का अप्रत्यक्ष सहयोग करें । ऐसे ही Recall करते करते , भ्रष्ट अवसरवादी नेताओं को वापस बुलाते बुलाते सम्भव है इनसे प्रभावित हो एक दिन जनता इन्हीं को सत्ता में बुला ले, Call कर ले ! सर्वहारा के अधिनायकत्व हेतु !
अहिंसा
यह हिंसा क्या चीज होती है ? इस नाम की किसी चिड़िया को हम नहीं जानते । और जब जानते नहीं तो हिंसा करेंगे क्या !
अलबत्ता हम अहिंसा से परिचित हैं । इसे बचपन से पढ़ाया जाता रहा है । अहिंसा परमो धर्मह । और अब इसका अर्थ भी समझ में आया ।
यह डाकुओं का सुरक्षा कवच है । लूटने वाले, शोषण अत्याचार करने वाले अपने संतों के माध्यम से जनता का कान भर देते हैं :- देखो , हिंसा न करना । हिंसा करना पाप है । अहिंसा ही धर्म है इसे धारण करो । तभी से हम अहिंसा को जानते हैं । हिंसा कहाँ जान पाए ?
सोमवार, 5 मार्च 2018
कम्युनिस्ट
न किसी ईश्वर के समक्ष जीभ काटकर चढ़ाना, न स्वर्ग की इच्छा, न नर्क से घबराना, न मोक्ष के लिए दुनिया से भागना । लेकिन दुनिया को बदलने के लिये पागलपन की हद तक अपना जीवन लगाना ।
ये हैं कम्युनिस्ट और उनका सपना है कम्युनिज़्म यानी साम्यवाद । इसका दर्शन है मार्क्सवाद, जिसके प्रणेता हैं बाबा कार्ल मार्क्स । खाँटी भारतीय भाषा में बोलें तो यह बाबा अगर भारत में होते तो संत कहलाते (कहीं ग़लत तो नहीं बोल दिया, क्योंकि यहाँ के सन्त तो कुछ भिन्न प्रकार के होते दिखते हैं ?)! जिनका कामरेड सम्प्रदाय भी किसी संत संप्रदाय की तरह प्रशंसित और पूज्य होता ।
लेकिन इन्हें पूजा पसन्द नहीं । ये तो अपने मार्गदर्शकों मार्क्स, लेनिन आदि की मूर्तियों पर माला नहीं चाहते । उनकी किताबों का अवगाहन करते हैं, माथापच्ची बहस मुबाहिसा करते कुछ निष्कर्ष, कुछ कार्यभार तय करते और जंगलों पहाड़ों की खाक़ छानते हैं । न खाने पीने की चिंता, न चाह में अट्टालिका ! आख़िर ये कौन हैं झोले में केवल विद्याधन की गठरी डाले ? क्या भारतीय मनीषा अपने इन सुयोग्य समर्पित नौनिहालों को कभी अपने गले लगाएगी ?
कथनी करनी
मैं कम्युनिज़्म की तरह हिंदुत्व को भी बहुत महत्व देता था ससम्मान, इसके विश्व बंधुत्व की घोषणा के कारण । दुनिया के सारे मजदूर हमारे साथी के समानांतर संसार के सभी मनुष्य हमारे बंधु ! लेकिन अपने कुछ हिन्दू साथी, संघ, संगठन यहाँ तक कि विधि दर्शन के व्याख्याता मित्रों को इसकी आड़ में निकृष्ट विचार और कर्म पर उद्धत पाया तो हताशा हुयी । जिसे कुछ यूँ समझा जा सकता है कि जैसे मार्क्सवाद कहता कुछ है, नक्सलवादी करते कुछ हैं ।
शनिवार, 3 मार्च 2018
शुक्रवार, 2 मार्च 2018
गुरुवार, 1 मार्च 2018
अंतर
अगर वह
ईश्वर के प्रति आसक्त हैं
तो यह मानकर चलिए कि
वह हिन्दू मुसलमान में बंटेंगे,
फिर वह ईद और होली
मिलजुलकर सौहार्द्रपूर्वक मनाएँ
या लड़ झगड़कर
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
रहेंगे वह परस्पर अंतर पर ही ।
क्या वह है
क्या वह है ?
--- --- ---
इतनी सदियों से
इतने तो मनुष्यों ने
राजा से लेकर रंकों ने
हिन्दू मुसलमान
यहूदियों ईसाइयों ने
साधु संतों देवी देवताओं ने
उसकी पूजा अर्चना की
दूध फूल पानी नारियल चढ़ाए
नमाज़ें कीं भजन गाये
उसकी शान में दुसाध्य रोज़े रखे ।
उस पर कुछ असर हुआ ?
पत्थर तो छोड़िए
वह तो पिघल जाता लेकिन
वह तो ईश्वर था
कहते परमेश्वर था ?
तो प्रश्न उठता है -
क्या वह है भी
या हम व्यर्थ ही - - - ?
**************
NA
रज़ामन्दी हो तो कोई मित्र इस प्रयोजन हेतु विशेष group ही बना सकते हैं, NA नाम से ।
Not Applicable Sir !
ज़्यादा दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं है । दिक्कत यह है और इसे समझने की ज़रूरत है, कि सरकारी कागजों में व्यक्ति का धर्म लिखा जाना एक राजनीतिक मामला है । आपकी आस्था से राज्य को कोई मतलब नहीं । अपना कोई धर्म बता दो जिसे वह जोड़कर अपनी जनगणना तैयार कर ले और उससे राजनीतिक लाभ उठाये । और सेक्युलर राज्य में तो वह और अतिरिक्त ही हमारी आस्था विश्वास से निरपेक्ष है, क्योंकि उसके जिम्मे हमारे लिए मंदिर मस्जिद पूजास्थल बनाना नहीं है ।
ऐसे में प्रश्न विकट है कि हम नास्तिक अपना धर्म क्या लिखाएँ ? भूलिए नहीं कि वह राजनीति का आधार बनेगा । और इसे राजनीतिक नज़रिए से देखिए । कुछ ऐसा लिखाएँ जिससे आपकी जनसंख्या बढ़े । नास्तिक ? कितने लोग नास्तिक लिखेंगे ?अल्पमत में रहना हो तो लिखिए । फिर नास्तिकों में भी अनेक श्रेणियाँ हैं । अभी कोई मित्र अधार्मिक पर जोर दे रहे थे, आदि आदि । यद्यपि दो विभाग तो समझ में आ रहे थे - धार्मिक और अधार्मिक, या आस्तिक और नास्तिक । लेकिन आस्तिक/धार्मिक लोग अपना अपना अलग अलग धर्म अवश्य लिखेंगे । बचे हम नास्तिक श्रेणियाँ, तो ऐसा क्या किया जाय कि हम बंटे न दिखें । फिर याद दिला रहा हूँ यहाँ अपने सिद्धांतों पर न जाइये, सिर्फ अपनी संख्या बढ़ाने की सोचिए सरकारी मर्दुमशुमारी में । तो
जो धार्मिक भी हैं उनसे भी लोकतंत्र और संविधान का हवाला, दुहाई देकर इस मत पर सम्मत किया जा सकता है कि राज्य को वह अपनी यह गुप्त सूचना न दें, उसे उसकी जरूरत नहीं है सिवा दुरुपयोग करने के ।
और हम आप सब लोग भी इस बात पर राज़ी हों कि हम भी नास्तिक पर ज़िद न करें (जनगणना अधिकारी लिखेगा भी नहीं )। और जैसे तमाम प्रपत्रों में कई कालम में हम N/A, NA, ( Not Applicable) लिखते हैं, वही व्यवहार धर्म के कालम से करें । सचमुच यह आप पर लागू नहीं होता/ Applicable नहीं है । सरकार और surveyor मान भी जायगा । जैसे NOTA (None Of The Above) का बटन । धर्म में चूँकि Above कोई Candidate नहीं, इसलिए NA .
होली
लगता है अब प्रेम और भाईचारा बहुत ज़्यादा उरूज़ पर आने वाला है । जब हिन्दू मुसलमान बिना किसी दावे के अपना अपना त्योहार मना लेते थे/ मनाने देते थे, बिना अधायी बिधायी, बिना एक दूसरे के त्योहारों में हस्तक्षेप के, तब मुहब्बत कम थी । अब तो राजनीति का भी काम हो गया है मोहब्बत फैलाना ! जय हो होली जी की ।
जूता
आप मेरा अपमान कर सकते हैं ।
कभी लोग कहते हैं - तुम नास्तिक कैसे हो ? तुम यह करते हो, तुम्हारे परिवार वह करते हैं, रिश्तेदार यह वह करते हैं ?
मैं कोई फ़िजूल प्रतिवाद नहीं करता । सिम्पली कहता हूँ - हाँ, इसके लिये आप मुझे अपमानित कर सकते हैं , गाली दे सकते हैं । हाथ में जूता पकड़ाऊँ क्या ?