सोमवार, 5 मार्च 2018

कम्युनिस्ट

न किसी ईश्वर के समक्ष जीभ काटकर चढ़ाना, न स्वर्ग की इच्छा, न नर्क से घबराना, न मोक्ष के लिए दुनिया से भागना । लेकिन दुनिया को बदलने के लिये पागलपन की हद तक अपना जीवन लगाना ।
ये हैं कम्युनिस्ट और उनका सपना है कम्युनिज़्म यानी साम्यवाद । इसका दर्शन है मार्क्सवाद, जिसके प्रणेता हैं बाबा कार्ल मार्क्स । खाँटी भारतीय भाषा में बोलें तो यह बाबा अगर भारत में होते तो संत कहलाते (कहीं ग़लत तो नहीं बोल दिया, क्योंकि यहाँ के सन्त तो कुछ भिन्न प्रकार के होते दिखते हैं ?)! जिनका कामरेड सम्प्रदाय भी किसी संत संप्रदाय की तरह प्रशंसित और पूज्य होता ।
लेकिन इन्हें पूजा पसन्द नहीं । ये तो अपने मार्गदर्शकों मार्क्स, लेनिन आदि की मूर्तियों पर माला नहीं चाहते । उनकी किताबों का अवगाहन करते हैं, माथापच्ची बहस मुबाहिसा करते कुछ निष्कर्ष, कुछ कार्यभार तय करते और जंगलों पहाड़ों की खाक़ छानते हैं । न खाने पीने की चिंता, न चाह में अट्टालिका ! आख़िर ये कौन हैं झोले में केवल विद्याधन की गठरी डाले ? क्या भारतीय मनीषा अपने इन सुयोग्य समर्पित नौनिहालों को कभी अपने गले लगाएगी ?

कथनी करनी

मैं कम्युनिज़्म की तरह हिंदुत्व को भी बहुत महत्व देता था ससम्मान, इसके विश्व बंधुत्व की घोषणा के कारण । दुनिया के सारे मजदूर हमारे साथी के समानांतर संसार के सभी मनुष्य हमारे बंधु ! लेकिन अपने कुछ हिन्दू साथी, संघ, संगठन यहाँ तक कि विधि दर्शन के व्याख्याता मित्रों को इसकी आड़ में निकृष्ट विचार और कर्म पर उद्धत पाया तो हताशा हुयी । जिसे कुछ यूँ समझा जा सकता है कि जैसे मार्क्सवाद कहता कुछ है, नक्सलवादी करते कुछ हैं ।

शनिवार, 3 मार्च 2018

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

दाँत

दाँत ऊपर से तो दिखती इतनी ही हैं । लेकिन इनकी जड़ें कितनी गहरी हैं कभी दाँत उखड़वाकर देखिए ।

गुरुवार, 1 मार्च 2018

उत्सव

हम तो हर रोज़ "विचार गोष्ठी" उत्सव/त्योहार मनाते हैं ।

अंतर

अगर वह
ईश्वर के प्रति आसक्त हैं
तो यह मानकर चलिए कि
वह हिन्दू मुसलमान में बंटेंगे,
फिर वह ईद और होली
मिलजुलकर सौहार्द्रपूर्वक मनाएँ
या लड़ झगड़कर
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
रहेंगे वह परस्पर अंतर पर ही ।

क्या वह है

क्या वह है ?
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इतनी सदियों से
इतने तो मनुष्यों ने
राजा से लेकर रंकों ने
हिन्दू मुसलमान
यहूदियों ईसाइयों ने
साधु संतों देवी देवताओं ने
उसकी पूजा अर्चना की
दूध फूल पानी नारियल चढ़ाए
नमाज़ें कीं भजन गाये
उसकी शान में दुसाध्य रोज़े रखे ।
उस पर कुछ असर हुआ ?
पत्थर तो छोड़िए
वह तो पिघल जाता लेकिन
वह तो ईश्वर था
कहते परमेश्वर था ?
तो प्रश्न उठता है -
क्या वह है भी
या हम व्यर्थ ही - - - ?
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दुश्मन

दुश्मन है !
जो तुम्हे मदिरा दे
तुम्हारा दुश्मन है,
जो तुम्हें मंदिर दे
वह महा दुश्मन है ।

NA

रज़ामन्दी हो तो कोई मित्र इस प्रयोजन हेतु विशेष group ही बना सकते हैं,  NA नाम से ।
Not Applicable Sir !
ज़्यादा दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं है । दिक्कत यह है और इसे समझने की ज़रूरत है, कि सरकारी कागजों में व्यक्ति का धर्म लिखा जाना एक राजनीतिक मामला है । आपकी आस्था से राज्य को कोई मतलब नहीं । अपना कोई धर्म बता दो जिसे वह जोड़कर अपनी जनगणना तैयार कर ले और उससे राजनीतिक लाभ उठाये । और सेक्युलर राज्य में तो वह और अतिरिक्त ही हमारी आस्था विश्वास से निरपेक्ष है, क्योंकि उसके जिम्मे हमारे लिए मंदिर मस्जिद पूजास्थल बनाना नहीं है ।
ऐसे में प्रश्न विकट है कि हम नास्तिक अपना धर्म क्या लिखाएँ ? भूलिए नहीं कि वह राजनीति का आधार बनेगा । और इसे राजनीतिक नज़रिए से देखिए । कुछ ऐसा लिखाएँ जिससे आपकी जनसंख्या बढ़े । नास्तिक ? कितने लोग नास्तिक लिखेंगे ?अल्पमत में रहना हो तो लिखिए । फिर नास्तिकों में भी अनेक श्रेणियाँ हैं । अभी कोई मित्र अधार्मिक पर जोर दे रहे थे, आदि आदि । यद्यपि दो विभाग तो समझ में आ रहे थे - धार्मिक और अधार्मिक, या आस्तिक और नास्तिक । लेकिन आस्तिक/धार्मिक लोग अपना अपना अलग अलग धर्म अवश्य लिखेंगे । बचे हम नास्तिक श्रेणियाँ, तो ऐसा क्या किया जाय कि हम बंटे न दिखें । फिर याद दिला रहा हूँ यहाँ अपने सिद्धांतों पर न जाइये, सिर्फ अपनी संख्या बढ़ाने की सोचिए सरकारी मर्दुमशुमारी में । तो
जो धार्मिक भी हैं उनसे भी लोकतंत्र और संविधान का हवाला, दुहाई देकर इस मत पर सम्मत किया जा सकता है कि राज्य को वह अपनी यह गुप्त सूचना न दें, उसे उसकी जरूरत नहीं है सिवा दुरुपयोग करने के ।
और हम आप सब लोग भी इस बात पर राज़ी हों कि हम भी नास्तिक पर ज़िद न करें (जनगणना अधिकारी लिखेगा भी नहीं )। और जैसे तमाम प्रपत्रों में कई कालम में हम N/A, NA, ( Not Applicable) लिखते हैं, वही व्यवहार धर्म के कालम से करें । सचमुच यह आप पर लागू नहीं होता/ Applicable नहीं है । सरकार और surveyor मान भी जायगा । जैसे NOTA (None Of The Above) का बटन । धर्म में चूँकि Above कोई Candidate नहीं, इसलिए NA .

होली

लगता है अब प्रेम और भाईचारा बहुत ज़्यादा उरूज़ पर आने वाला है । जब हिन्दू मुसलमान बिना किसी दावे के अपना अपना त्योहार मना लेते थे/ मनाने देते थे, बिना अधायी बिधायी, बिना एक दूसरे के त्योहारों में हस्तक्षेप के, तब मुहब्बत कम थी । अब तो राजनीति का भी काम हो गया है मोहब्बत फैलाना ! जय हो होली जी की ।

जूता

आप मेरा अपमान कर सकते हैं ।
कभी लोग कहते हैं - तुम नास्तिक कैसे हो ? तुम यह करते हो, तुम्हारे परिवार वह करते हैं, रिश्तेदार यह वह करते हैं ?
मैं कोई फ़िजूल प्रतिवाद नहीं करता । सिम्पली कहता हूँ - हाँ, इसके लिये आप मुझे अपमानित कर सकते हैं , गाली दे सकते हैं । हाथ में जूता पकड़ाऊँ क्या ?

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

जनांदोलन

जनांदोलन के भरोसे विचार कर्म को नहीं छोड़ा जा सकता । आप तार्किक विचार देते रहें, जनांदोलन तो चुटकियों में हो जायेगा ।

कच्चा घड़ा

कच्चे घड़े से बलात्कार करने से बेहतर है प्यासा मर जाना !

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

Downtrodden

दलित की परिभाषा में विद्वत्जन बिलावजह दलन आदि शब्द छानते हैं । दलित का अंग्रेज़ी में अर्थ है - The Downtrodden. बोलने में भी वैसा ही ध्वनित होता है । दलितजन !

अंतिम मार्क्स

मेरा कम्युनिज़्म से क्या सम्बन्ध ? मेरा आग्रह केवल यह होता है कि सब कुछ सोच लेने के बाद अंत मे निर्णय इस बात पर गौर करने के बाद ही लिया जाय कि इस प्रश्न पर मार्क्सवाद क्या कहता है । और मार्क्सवाद भी क्या ? जैसा कि लेनिन खुद कहते हैं - यह नहीं ढूँढना है कि अमुक समस्या पर मार्क्स ने क्या कहा है ? बल्कि यह छानना है कि मार्क्स होते तो इसका क्या हल सोचते, निकालते, बताते ? अब आज के मार्क्स तो आपही हैं न ? यही मेरा मार्क्सवाद है ।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

गरीब स्वर्ग दिलाता

ग़रीब न हों तो बहुत से लोगों का स्वर्ग बिगड़ा जा रहा है !

न्योते

मैं सोचता हूँ, सामाजिक और राजनीतिक। सम्बन्ध यदि पारिवारिक संबंध न बनें तो ही अच्छा । कितनी शादियों में शामिल हों ? किन किन को घर दावत पर बुलायें ?

वहशी

आपको संदेह ही तो हो , मुझे कोई संदेह नहीं कि धर्म आदमी को सनकी और वहशी बनाता है ।

किसको किसको

मेरे पास एक और तरीका है नास्तिक बनाने का । समझ लो मैं आस्तिक तो बनना चाहता था । पूर्ण आस्तिक, पक्का और वाकयी ईमानदार आस्तिक । तो जब ईश्वर को मानता तो अल्लाह छूट जाता, जब अल्लाह को मानता तब गॉड छूट जाता । जब राम को मानता तब मोहम्मद छूट जाते, जब मुहम्मद को मानता तब ईसा छूट जाते । इसलिए सोचा, बेईमानी न करूँ, न इनको मानो, न उनको मानो, न किसी को मानो । और इस तरह सब छूट गए ।

मन उचटा

मेरी नास्तिकता का कारण यूँ समझिये कि मैं पूजा पाठ कर नहीं पाता था । समय नहीं मिलता था और रुचि भी नहीं रह गयी थी । मन उचट गया था इससे । तो फिर ऐसे सम्बन्ध को क्या पालना जिसे निभा न सको !

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

चीन को जाओ

युद्ध के वक़्त तो हथियार बाहर से भी मंगाने ही पड़ते हैं । इस दौरान कुछ घोटाले भी हो जाते हैं ☺, तो क्या !
इन औजारों में पहले तो है शिक्षा । वह क्या तो कहा है कि ज्ञान के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाओ । फिर जब चीन, रूस जा ही रहे हो तो वहाँ से कम्युनिज़्म भी आयात कर लाओ । यह दूसरा हथियार है वर्ग युद्ध का ।

आखिर जीवन

थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि आप दलित नहीं हैं । वैसे भी कितने दिन दलित रहना ही है ! यह आरक्षण, दलितपन बस कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । यह अस्थायी स्थिति है । इसलिए इस आंदोलन को बहुत लंबा नहीं खींचा जा सकता, भले समय कुछ ज़्यादा लगे । लेकिन साम्यवाद तो मनुष्य की मानुषिक जीवन की स्थायी प्रवृत्ति है ? दलित न होकर भी साम्यवादी होना, समाजवादी जीवन जीना है । तो क्यों न अभी से अभ्यास करें, उच्चतर जीवन मूल्य और उसके लिए संघर्ष की ?

आँतें

अब इससे ज़्यादा इस शरीर की सेवा करना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं । इसका पेट भरना भर मेरा काम था । आँतें कुछ रोज़गार के लिए कुलबुला रही थीं, तड़प रही थीं । मैंने इनमें कुछ दाने डाल दिये, - लो चबाओ, पीसो इनको और चुप रहो । बस, इससे ज़्यादा नहीं । मुझसे यह न होगा कि मैं इसके लिए अच्छे कपड़े, कोई घर, कोई गाड़ी, कोई भली सी बीवी लाकर दूँ । दूँ, तब भी तो यह संतुष्ट न होगा । और और माँगता रहेगा । कहाँ तक मैं इसकी ख्वाहिशें पूरी करूँगा । इसलिए इसकी आँत भरने के अलावा मैं इसकी कोई ज़िम्मेदारी अपने सर नहीं लेता ।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

वैज्ञानिक हिन्दू मुसलमान

वह तुमसे चंदा लेने आएँगे
तुम कुछ नहीं होगे, धर्मविहीन होगे
तो दे ही डालोगे कुछ रुपये
मंदिर मस्जिद के नाम पर मानवतावश,
नहीं तो तुम कहोगे - हम वैज्ञानिक हैं,
हम नहीं देते इन सब कार्यों के लिए चंदा ।
(वैज्ञानिक समुदाय, Scientific Community)

वैज्ञानिक हिन्दू

वैज्ञानिक हिन्दू और वैदिक हिन्दू में फर्क़ करना पड़ेगा ।

अम्बेडकरी हिन्दू

अब देश का और क्षरण रोकने के लिए अम्बेडकरी हिन्दू को चाहिए कि वह हिंदुत्व को मनुवादी, सनातनी, पाखंडी, पोंगापंथी हिंदुओं से छीनकर भारत के हिंदुत्व पर कब्ज़ा कर लें ।
मुश्किल नहीं है । मन बनाने की बात है । मैदान यह कह कर छोड़ना नहीं है कि हम हिन्दू नहीं हैं , तब तो वह और शेर हो जायेंगे । कहना होगा कि हम नास्तिक, प्रगतिशील, सेकुलर, बौद्धिक, विचारशील, अभी तक के पिछड़े दलित ही असली हिन्दू हैं । तुमने तो बदनाम किया देश की संस्कृति को । यकीनन यह धार्मिक आंदोलन होगा, आम्बेडकर के आगे, उन्हीं के रास्ते, आत्मसम्मान हेतु ।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

प्रेमी

धोखे खाकर भी जो
प्रेम रखे जारी,
तब तो वह प्रेमी
अन्यथा व्यापारी ।

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अकेला

कोई आदमी अकेला नहीं होता । जिसे आप अकेला देख रहे हैं, उसके निकट कोई बहुत विश्वसनीय साथी बगल में अदृश्य बैठा होता है ।

निराशा

मुझे लगता है, मुझे वर्ग संघर्ष और सर्वहारा की तानाशाही की उम्मीद छोड़नी पड़ेगी । क्योंकि दलित जातियाँ अपनी अस्मिताएँ त्यागकर वामपंथ का वर्ग बनने को तैयार नहीं, और कम्युनिस्ट आंदोलन अपनी परिभाषा झुकाकर दलित को वर्ग मानने को उत्सुक नहीं !

अनुशासन

कई बातें, अच्छी तरह मालूम होने के बावजूद खुलकर नहीं कही जा पातीं । खुलकर कही भी नहीं जानी चाहिए ।

बुधवार, 31 जनवरी 2018

कार्ल मार्क्स

मानव धर्म
मानव धर्म के संस्थापक बाबा कार्ल मार्क्स थे ।
ऐसा मैं कह रहा हूँ । आप आज़ाद हैं कुछ और कहने के लिए । आप कहिये - मानव धर्म के संस्थापक गाँधी/ विवेकानंद/ फुले आम्बेडकर/ बुद्ध ईसा / थे । लेकिन अपने धर्म को एक स्वर से मानव, और सिर्फ मानव बोलिये, बताइये । भाषा और शब्द अलग हो सकते हैं - इंसान, आदमी, Human, मनुष्य ! लेकिन शब्दार्थ एक होना चाहिए । धार्मिक स्वतंत्रता हो पर मनुष्यता बंटने न पाए ।
--  --  एक और विकल्प हो सकता है । यदि आपको हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई होने पर ही गर्व हो , तो कोई बात नहीं । पलने दीजिये उस गर्भ को । बस उसके संस्थापक का नाम कार्ल मार्क्स जानिए । वह हर जगह चलेगा, उसे हर जगह इस्तेमाल कीजिये । वैज्ञानिक युग का वह प्रतिनिधि दार्शनिक राजनेता है ।
-- और आगे चलिए । यदि आपको अपनी जाति में भी पड़ा रहना है, तब भी है न यह कल्लू मरकवा ! इसी को अपनी जाति का Icon आइकॉन पुरुष मान लीजिए । किस्सा खत्म, झगड़ा खत्म । इसी को वर्ग संघर्ष के अंतिम चरण में वाया समाजवाद, साम्यवाद की स्थापना कहते हैं । न रहेगा राज्य, न धर्म, न जाति, न देश और न फटहे बाँस की बाँसुरी !

दुर्गापूजा

क्या विडम्बना है ! बंगाल की दुर्गापूजा भी कम्युनिस्टों की बदनामी का बायस बन गया है ।

इतिहास

इतिहास पर कभी भरोसा न करो । सब झूठ होता है, सिवा साल दिन दिनाँक के ।

वामपंथी दड़बा

कम्युनिस्टों ने अपने लिए ऐसा कोटर, एक दड़बा बना लिया है कि उन्हें कोई तवज्जो नहीं देता । वह कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं कोई पूछता ही नहीं । इनका नाम दो दिशाओं से कभी कभी समाचारों में आ जाता है । एक तो जब माओवादी कोई लाश गिराते हैं । दूसरे प्रगतिशील वामपंथी जब किताबें लिखते हैं, सहित्यचर्चा करते हैं । और इन दोनों कामों से कुछ हासिल नहीं होता, सिवा "रोना धोना" के ।
(निराला कोपदृष्टि)

तिरंगा

क्या अब समय नहीं आ गया है कि इनके हाथ से तिरंगा छीन लिया जाय ? इनके हाथों नहीं संभल रहा है इसकी जिम्मेदारी, भावना और गरिमा का भार !
चर्चिल ने कहा था वह मैं नहीं कह रहा । मेरा कहना है जनता और युवा को इससे खेलने न दिया जाय । इन्हें अधिकार ही न हो इसे लेकर Flag March करने का । इसे केवल शासकीय, राजकीय उपयोग तक सीमित किया जाय जिससे इसका आदर, मान सम्मान सुरक्षित रह सके, बच सके । बंद हो प्लास्टिक का यह कारोबार । कोई जन, जनसमूह, एनजीओ इसका display न करे । सब अपना भगवा, हरा नीला पीला काला लाल झंडा लेकर चलें । तिरंगा लेकर न चलें ।
(निराला कोपदृष्टि)

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

नेता आयोग

यह प्रस्ताव मेरे अजेंडे में है । स्वतंत्र चुनाव आयोग (की तरह या उसी में) "जन प्रतिनिधि वेतन भत्ता एवं चरित्र पंजी समिति" होना चाहिए, जिसकी स्थापना और चुनाव जनता के हाथ में हो ।

आहत

धामिक भावना आहत न की जाय, यह दूसरी बात है । पहली बात यह है कि धार्मिक भावना आहत हो ही क्यों ? यह तो बड़ी उच्च और आदर्श किस्म की चीज़ होती है ? कोई कहता रहे अंट शंट, बकता रहे अंड बंड, आपसे क्या मतलब ? आप बचकर निकल जाइए ।

दलितोवस्की

मैं सवर्ण होकर यदि कम्युनिस्ट हूँ, तो इस शर्त पर कि सत्ता का हक़ दलितों को सौंपा जाय । Marxism दलित को वर्ग नहीं मानता और वर्ग के नाम पर सवर्ण कम्युनिस्ट पार्टियों पर काबिज़ हैं, यह मुझे पसंद नहीं । या फिर यदि शुद्ध कम्युनिस्ट हूँ तो मैं हिन्दू मुसलमान वाला मौजूदा वामपंथी नहीं हूँ । या तो पूरा मार्क्सवादी बनूँ , नहीं तो दलितवादी कम्युनिस्ट होना ही उचित ।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

30 जनवरी का शहीद

भगवान किसी को सन्मति नहीं देता । सन्मति के लिए मनुष्य को वैज्ञानिक चेतना धारण करना चाहिए ।
न ईश्वर, न अल्लाह ! प्रकृति और कुदरत है उसका नाम ।
अलबत्ता, गाँधी जी एक बेहतरीन मनुष्य थे  उनको नमन !

भगवान से बचो

इन्सान अगर अपने आपको भगवान से नहीं बचाएगा, फिर तो इसे कोई नहीं बचा सकता । आदमी के लिए महत्वपूर्ण है ईश्वर से बचना ।

कम्युनिस्ट

कम्युनिस्ट लोग भगवान को कुछ कमतर आँकने लगे, तो उसके खिलाफ़ काम करना इन्होंने बंद कर दिया । नतीजा, यह औंधे मुँह गिरे । ईश्वर ने अपना काम कर दिया ।

रामराज्य

राम राज्य में तो कहा जाता है कि बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं ! तो क्या इस रामराज्य में हिन्दू मुसलमान दो जानवर नहीं बनते हैं ?

जग सत्य है

जगनमिथ्या ! तो कुछ भी नहीं सत्या !

पौष्टिक

कम्युनिस्ट क्या कर रहे हैं यह मत देखिए । कम्युनिस्ट पार्टियाँ क्या कर रहीं हैं इसके चक्कर में मत पड़िये । खुद कम्युनिस्ट बनिए । दूसरे का खाया पिया आपके पेट में नहीं जायेगा ! आप अपना पौष्टिक विचार ग्रहण कीजिये, सेवन कीजिये ।

रविवार, 28 जनवरी 2018

योगी

किस हिन्दू के लिए दिन रात एक कर रहे हैं योगी जी ? वह जो एकदम सांप्रदायिक हो चुका है, घृणा हिंसा से ओत प्रोत ? अशिक्षा असभ्यता की ओर अनवरत अग्रसर ?

जाने क्यों

वामपंथ न जाने क्यों नास्तिकता के काम से दूर रहता है । जबकि वास्तव में समाज में उसकी पहचान, बदनामी की हद तक, नास्तिक ही है ।

टाँग

हम किसी के काम में टाँग नहीं अड़ाते । हम केवल अपने काम को काम समझते हैं ।

ना मानूँ

ना मानूँ, ना मानूँ, ना मानूँ रे !
विचार आता है कि नास्तिकता के स्थान पर यदि "ना मानूँ समूह" बनाया जाय तो वह ज़्यादा चले । खूब चले और कई मायनों में चले । केवल ईश्वर और देववाणी की ही बात नहीं है । हम किसी की कोई बात नहीं मानेंगे तो क्या कर लोगे ? हम अपने मन की करेंगे । तुम कहते रहो । ☺
करते रहो पोस्ट पर टिप्पणियाँ । हम सुनेंगे ही नहीं । जवाब भी नहीं देंगे ।😊

स्वार्थ

धार्मिक स्वार्थ, और राजनीतिक भी, अपरिपक्व मन के नवयुवकों को इस्तेमाल करते हैं । कभी यह झंडा पकड़ा देते हैं, कभी वह झंडा उठाने को कहते हैं !

इस्तेमाल

नवजवानों को सभी मूर्ख बनाते हैं । और उनकी ताक़त का अपने स्वार्थ में इस्तेमाल करते है । मेरे कहे अनुसार यदि वे नास्तिक हो जायँ, किसी की बात मानें ही नहीं तो यक़ीनन उनके द्वारा अपना दुरुपयोग बचा लें ।

सुनना

मुझमें तमाम कमियाँ हैं । लेकिन एक अच्छाई तो है । कि मैं सबकी बात धैर्य से सुनता हूँ । और विचारार्थ अपने पास रख लेता हूँ ।

शनिवार, 27 जनवरी 2018

लुंगी

मुझे लुंगी पहनना पसंद है । इससे तन तो ढकता ही है, इसमें नग्नता का भी एहसास होता है ।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

करना

चाह नहीं है
कर गुज़रने की
कुछ सार्थक
तब कविता होती
कविता किये जाते ।

अनादर्श

बिल्कुल आदर्श नहीं हो सकता
दुनिया मानवीय संबंधों पर चलती है
और मानवीय सम्बन्ध में
मनुष्यों का मुँह देखना पड़ता है
रोता हँसता गाता, मुँह चिढ़ाता, बिचकाता
आदर्श को थोड़ा जेब में रख
मनुष्य को गले लगाना पड़ता है ।

भक्त

प्यारे,सनेही, आदरणीय फेसबुक मित्र जी ! विश्वस्त सूत्रों से विदित हुआ है कि अनेक भक्तजन आज करणी सेना से नफरत में हैं । बीता हुआ कल इनका तोगड़िया को दुत्कारते बीता था । तो इसी प्रकार देश हित के हवाले से आने वाले कल में ये मोदी शाह को भी किनारे लगाते झिझकेंगे नहीं । आखिर राष्ट्रवादी हैं, राष्ट्र का हित इनके लिए सर्वोपरि है ? इसके अतिरिक्त उनसे अधिक ही ये पढ़े लिखें हैं और कुछ तो वकील भी हैं तो कुछ तो आत्मवान होंगे ही । जो कुछ कमी होगी तो वह हम महात्माओं के, आभासी ही सही, सान्निध्य और प्रभाव से पूरी हो जायेगी । ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए । क्योंकि ये केवल निर्मल बाबा की कृपा पर निर्भर नहीं हैं । हमारी भी कृपा इन पर बरस रही है जब तक ये हमारे आश्रम में हैं । 😊👍👌💐🎂

भक्ति

राष्ट्रभक्ति को उतनी ही सीमा में रखिये जिसके आगे वह मनुष्यता विरोधी न हो जाये !

सोमवार, 22 जनवरी 2018

निराला मंथन PPI

वसंत पंचमी । महाप्राण निराला का जन्म दिवस । आज उनके गाँव जिला उन्नाव हम लोग गए । साथी आशीष सिंह, बन्धु कुशवर्ती, धनञ्जय शुक्ला, विशाल वर्मा, रंजीत कुमार और शुभम पाण्डे । निराला जी का साधना कक्ष प्रणम्य । उनकी प्रतिमा के साये में कविता पठन समर्पित ।
"निराला मंथन" (Poetic Philosophers of India) PPI
दलित कम्युनिस्ट पार्टी with स्लोगन :
"दलित राजा सवर्ण प्रजा"
परिकल्पना । उग्रनाथ नागरिक । दस्तोवस्की
21 जनवरी 2018

DCP

दलित राजा सवर्ण प्रजा
CPM विवाद के मद्देनजर हमारी तरफ से यह उल्लेखनीय है कि इसके Central Committee में और साथ ही Polit Bureau में एक भी दलित नहीं है ।
और यही फ़र्क़ है उनकी और हमारी पार्टी में । यहाँ विचारधारा से लैस कोई भी व्यक्ति अवर्ण सवर्ण सदस्य कार्यकर्ता होगा, जातिभेद से परे जो कि वाम पंथ का गुण है । लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष में इसके जन्मना सवर्ण सदस्य पार्टी को पूरा सहयोग, योगदान देते हुए इसके केंद्रीय समिति या पोलित ब्यूरो में , या राज्य में किसी भी पद, सत्तापद पर नहीं होंगें । पार्टी और समाजवादी मूल्यों के प्रति यह उनका आध्यात्मिक त्याग होगा । यह त्याग उन्हें स्वयं, स्वेच्छा से स्वीकार होगा भारत के कलंकित सवर्णवादी ऐतिहासिक चेतना के फलस्वरूप ।
हमारा नारा, उदघोष होगा - "दलित राजा सवर्ण प्रजा " ।
दलित कम्युनिस्ट पार्टी
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निवेदक :- दलितोवस्की

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

सिपाही

सिपाही
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तुम भी सिपाही
वह भी सिपाही
तुम सिपाही
उस सिपाही को
क्यों मारते हो ?
कहीं वह मर गया तो ?
उसके बाल बच्चों,
परिवार का क्या होगा ?
आज तुम उसे मारते हो
कल वह तुम्हें मारेगा तो ?
तो क्या होगा ?
तो क्यों मारते हो ?
क्यों अपनी जान पर तुले हो ?
मत मारो
जब मरना होगा वह मर जायेगा
जब मरना होगा तब तुम मरना ।
अभी क्यों मारते मरते हो ?
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रविवार, 7 जनवरी 2018

बुढापा

पहले बचपन प्यारा होता होगा । फिर जवानी पर घमण्ड होने लगा होगा । अब बुढापा अच्छा लगने लगा है ।

आदमी

पहले आदमी देखिए । फिर देखिएगा उसका देश धर्म जाति आयु लिंग सम्प्रदाय विचारधारा और पार्टी इत्यादि ! पहले से ही आपका पर्याप्त काम चल जाएगा ।

बुद्धिमत्ता

विश्वास कीजिये, मैं आपकी अक़्लमंदी पर भरोसा करना चाहता हूँ । तैयार बैठा हूँ । अक़्लमंदी तो कीजिये !

निर्जन

जनसंख्या तो खूब है । आदमियों की कमी है ।

स्मारक

मैंने कहा था
मत बनाओ विजय स्तम्भ
मीनारें और बुर्ज
ये तुम्हें सालेंगी,
या उन्हें चिढ़ाएँगी
उकसायेंगी बदला लेने को
या पुनः करने को अपमानित
उन्हें जो भूलना चाहते हैं घाव
अपना दम्भ मत याद करो
तुम चुनौतियों से घिर जाओगे
जीत नहीं पाओगे
हार जाओगे
अब हारना हराना छोड़ो
दो रोटी दो धोती का जीवन जियो ।
मत रखो तस्वीरें पुरखों की घर में
बीत चुके गुरुओं, भगवानों की
अब कोई ज़रूरत नहीं इनकी
इतिहास से अब मुक्ति लो
देखो, बाहर चिड़िया बैठी है
चोंच फैलाये और तुम्हारे बच्चे ।

शनिवार, 6 जनवरी 2018

साम्यवाद

ईश्वर नहीं तो आदमी तो है ? और आदमी क्या ईश्वर से कुछ कम आततायी है ? बहुत दुष्ट है यह भी तभी तो इसने अपने यथानुसार ईश्वर बनाये । इसलिए इस मनुष्य की पूरी, अच्छे से खबर रखनी पड़ेगी । मानव विज्ञान , सभ्यता का विकास और साम्यवाद की समझ बनानी पड़ेगी । खाली नास्तिकता से क्या काम चलेगा ।

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

सोमवार, 1 जनवरी 2018

नास्तिक को मज़ा

नास्तिकों को मज़ा क्यों आता है अपने को नास्तिक, Atheist कहने में ? जबकि इसके और भी लगभग समानार्थी तमाम आयाम हैं । Secular तो है ही, Non-theist, Anti-theist, Agnostic, Rationalism, Freethought, Radical Humanism, etc.और इनमें से भी बारीक अंतर वाली कई विचारधाराएँ ? सबसे प्रमुख sect Humanism तो Atheists के इस ईश्वर विरोधी रुख पर कुछ खफ़ा भी होता है । जानने की बात है कि humanism, मानववाद (कुछ इसे मानवतावाद कहना prefer करते हैं फिर भी यह Humanitarianism को छूता हुआ भी उससे अलग है) तो इन सारी विचारधाराओं का माई बाप, स्रोत संरक्षक और उत्स, initiative है । मतलब, मनुष्य (Human being) जिसके चिंतन और व्यवहार का केंद्र हो, कोई Supernatural God वगैरह नहीं । वह मानववाद है । और यही सभी सिद्धांतों के मूल में है । फर्क तो आगे चलकर होता है विशेष बातों पर । मानववाद आस्तिकता और धर्म का सकल विरोध न करके अंधविश्वास, जड़ता-कठमुल्लापन और परलोकआश्रिता को मना करता है, मनुष्यों में प्रेम सौहार्द्र का विशेष पक्षधर होता है। नास्तिक सारे पराविचार, पराशक्तियों को समूल, सिरे से नकारते हैं, इसलिए वह तिरछी नज़रों के ज़्यादा शिकार होते हैं ।