रविवार, 15 सितंबर 2013

नागरिक पत्रिका 10 सितं से 15 सितम्बर तक

* ग्रह नक्षत्र तो मैं जानता नहीं | लेकिन सितारों को जानता हूँ | हमारे सितारे चड्ढी और चूरन का प्रचार  कर रहे हैं |

* इसे विडम्बना कहकर मैं टालना नहीं चाहता कि तमाम महापुरुषों का जन्म कुमारी माताओं की कोख से हुआ !

* सौ सौ चूहे खाय बिलाई हज को चली |
इसे अन्यथा न लें , यह कहावत है |

* Personally , I would, rather like to be called as - " Poetic Humanist " [ PH= फ ]

  • हाँ निवास जी , मैं हिंसा और सख्ती का अंध विरोधी नहीं हूँ ( इस शर्त के साथ कि उसका अधिकार सक्रिय राज्य के पास होना चाहिए , जिससे प्रत्येक नागरिक को इसका सहारा और कानून को हाथ में न लेना पड़े | हिंसा राज्य का विशेषाधिकार है ) | और आपने ठीक तो कहा कि न्याय तुरत होना चाहिए | पकडे जाने के 24 घंटे के अंदर , त्वरित सुनवाई द्वारा |
  • Ugra Nath और दूसरी बात यह कि यदि कानून बन सके तो यह कि पीड़ित पक्ष के दो या दस परिजनों का अपराधी - वध के समय उपस्थित होना अनिवार्य हो | तब तो सार्वजनिक मृत्युदंड की स्वीकार्यता बनती है | वर्ना पब्लिक इसे देखते देखते स्वयं अ -संवेदनशील हो जायगी | यह मनोवैज्ञानिक खतरा है |
  • Ugra Nath तीसरी बात , मैं आसाराम जी के मामले में लिख चूका हूँ , फिर दुहराता हूँ कि इनकी मौत के पहले विश्व विद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग और अपराध अनुसंधान के शोधार्थियों को इनके ऐसे मानस के की तह में जाने के लिए जाना चाहिए और इनकी आपबीती , डायरी , सामाजिक -आर्थिक - सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आदि का पूरा विवरण लेकर शोध प्रबंध लिखना और प्रस्तुत करना चाहिए , जिससे मानव सभ्यता ऐसी मनोवृत्ति के पनपने के कारणों से अनभिज्ञ न रहे , और इससे निजात के उपाय सोचे , अमल में लाये | इतने मानव शरीरों के अंत के द्वारा मानवजाति कुछ सांस्कृतिक लाभ तो उठाये | इनकी हत्या निरर्थक न जाए | कृपया मृत्यु दंड को केवल राजनीतिक शब्दावली में तो न सोचें , इतना तो मेरा आग्रह सुना जा सकता है , यदि Capital Punishment मिटाया न जा सके तो |



  • * भाई , कहा कुछ भी जाय जब एक बार नीति बन गयी तो बन गयी | मैं मृत्यु दंड के पक्ष में तो नहीं जाऊँगा !


* अच्छा बहाना भी है राजनीति | कह दो सब राजनीति है , विरोधियों ने किया | बस छुट्टी, बच गए जिम्मेदार से | अरे भाई, लड़की से छेड़खानी हुयी थी या नहीं | उसका भाई जब विरोध करने गया था , तब माफ़ी ही मांग लेते | पर उससे उलटे मारपीट कि गयी या नहीं ? फिर उसके बाद तो किसने कम मारा , किसके ज्यादा मरे , यह हिसाब नहीं चलता | और इन हकीकत के झगड़ो में क्या चाहते हैं सम्प्रदाय को सामने नहीं आना चाहिए , वरना वह सांप्रदायिकता हो जायगी ? फिर जातियों - सम्प्रदायों का काम ही क्या रह जायगा ?

* सुना है, लखनऊ में कुछ सीनियर छात्र बड़े " मैनर " वाले हो गए हैं और नए, जूनियर छात्रों की रैगिंग करके  उन्हें सिखा रहे हैं | भले खुद एक फ्यूज़ वायर न बाँध पायें | ऐसे लड़कों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए क्योंकि ये नए छात्रों को आतंकित करते हैं | भय की प्रतिष्ठा होना अत्यंत आपत्तिजनक बात है | यह तो सरासर गुंडागर्दी हैं | खबर है, किसी लड़की ने आत्महत्या कार ली ति किसी ने कोशिश की | संस्थान परिचय सम्मेलन स्वयं आयोजित करे और उसके अतिरिक्त जो छात्र किसी छात्र को अनुचित परेशान करे उन्हें फ़ौरन निष्काषित कर दिया जाय | स्कूल में उन्ही को रखा जाय जिनकी इच्छा और उद्देश्य पढ़ना हो | जिन्हें बकैती करनी हो, मैनर सिखाना हो, वे पुलिस विभाग में जायँ, या फिर किसी संत के आश्रम में | सचमुच पढ़ने कि चाह रखने वाले छात्रो कि कोई कमी नहीं है, जो इन्हें इनकी बदतमीजियों के बावजूद भी स्कूल में रखा जाय ! मेरा अनुमान है रैगिंग करने वाले सवर्ण श्रेणी से होंगे |  

* कुछ मौतें मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं देतीं | आज एक युवक मोबाईल से बात करते करते रेलवे फाटक पर शहीद हो गया | तो ठीक ही हुआ | भाई बात करने का अधिकार है तो उसके लिए जान देने का भी उन्हें हक है | ऐसे ही रेलवे ट्रैक पर भी दुर्घटना हुयी थी | उन्हें तो लाखों के मुआवज़े भी दिए गए | क्यों भला ? दुर्घटना न हो , इसकी व्यवस्था तो सरकार को करन चाहिए | लेकिन जो मरना ही चाहे, उन्हें कौन रोक सकता है | इसलिए उन्हें मुआवजा न देकर, उलटे उसके परिवार से जुर्माना वसूल किया जाना चाहिए |

* तमाम संगीत -नृत्य के शिक्षक लड़कियों को संगीत -नृत्य सिखाते हैं, लेकिन उन्क्के बारे में ऐसा कुछ सुनने में नहीं आता | और उनकी आयु ७० - ७२ से ज्यादा होती हो , ऐसा भी नहीं !

* कोई मनोविज्ञान का विभाग, किसी भी विश्व विद्यालय का, या सरकारी विभाग - संस्थान आसाराम बापू के पास उनके मानस का अध्ययन करने उनके पास नहीं गया | जाना चाहिए | एक एक केस हिस्ट्री पर शोधप्रबंध आयोजित किये जाने चाहिए !

* यह हिन्दुस्तान है प्यारे ! दिखाइए, और देखिये - पीड़ितों के माता पिता ही हाय ! न कह दें तो कहिये ! यह बदला लेकर - खून का बदला खून, आँख के बदले आँख लेकर खुश होना वाला समाज नहीं है | हम तो चाहते हैं आप संगसारी दिखाएँ, फांसी चढ़ाया जाते दिखाइए | काम हमारा सिद्ध हो जायगा - जनमानस मृत्युदंड के खिलाफ हो जायगा

* इतनी धार्मिक विविधताओं के बीच नास्तिक [ धर्मों से असम्बद्ध / निर्मोही ] कारकुन, पुलिस कर्मी, अधिकारी, न्यायाधिकारी, राजनेता ,शिक्षक ही, यहाँ तक कि चपरासी और सफाईकर्मी भी  सेक्युलर राज्य के सही संवाहक हो सकते हैं | वर्ना यह मंत्री लाखों की भीड़ में पहले स्नान करेगा (भीड़ कुचल कर मरे तो मरे ), राज्य में नरसंहार करेगा या वह मंत्री हज के लिए विदेश यात्रा कर लेगा | कोई क्या कर लेगा उनका ? कौन समझाए , कौन रोकेगा उन्हें ? आखिर वह व्यक्ति हैं अपनी धार्मिक आस्था के साथ और साथ ही राज्य के सूबेदार भी हैं | हम कौन है और आप कौन हैं ? पलटते रहिये शब्दों की किताबी परिभाषाएं ! तब तक तो वह बहुत कुछ अंजाम दे चूका होगा | आधी सदी से अधिक तो ले ही लिया इसने ! मित्र , बाहरी शब्दों को अपनी ज़मीनी यथार्थ से जोड़ कर सोचना होगा | तभी सटीक परिभाषा निकलेगी | मच्छिका स्थाने मच्छिका बैठाने से नहीं |  

* मैं दो तीन निवेदन सार में रखकर दो तीन दिन के लिए गाँव जाऊँगा - ऑफलाइन |यह धृष्टता मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरी इसमें हार्दिक रूचि है, और मैं इसका एक्टिविस्ट भी हूँ ( तथापि विवाद खींचना मेरी फितरत में नहीं ) |  पहला - सेक्युलर सरकार का यह संवैधानिक कर्तव्य भी है कि वह जनता में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करे और सामाजिक स्वास्थ्य और नैतिकता के विरुद्ध कुछ न होने दे | तो - - ? दूसरे - व्यक्ति का प्रिथक्करण यदि संभव नहीं तो जो लोग उच्च पदस्थ अधिकारी - नेता - देश निर्माता हैं उन्हें तो चाहिए कि घरके अंदर और बाहर की सार्वजनिक स्वरुप को अलग अलग करें ! उन्हें इसकी समझ तो हो कि बस , यहाँ मेरी आस्था की सीमा समाप्त होती है और सेक्युलारिस्म (की मारो गोली ), समता और सामान्य न्याय कि दृष्टि से अपनी आस्था को समेट लेना चाहिए | एक लघुतम उदहारण = माथे पर लंबा गहरा टीका लगाना आपकी आध्यात्मिक आवश्यकता और धार्मिक आस्था हो सकती है | लेकिन इसका सार्वजनिक प्रदर्शन ? बहुत झीना , महीन भेद है | लेकिन उसे समझना,  पालन करना तो  होगा , कम से कम राज्य कि संस्थाओं और उनसे जुड़े व्यक्तियों को ? या नहीं तो फिर सारा राज्य PSU को दे दीजिये | क्या सोचा आपने - - - ? तीसरे - secular की ही धाराएँ, भाई पडोसी हैं  Secular morality (Religious  morality- as said  for Gandhi ), Humanism, Rationalism, Anti-superstitions, Godlessness , Non theist , anti -theist, Atheist etc etc | इन्हें आप धर्म कह सकते हैं - धारणीय अवश्य | तो हैं तो हैं , जैसे अन्य धार्मिक हैं | उनसे बड़ी सहानुभूति है तो थोड़ी हमसे क्यों नहीं ? हम तो विज्ञानं के अनुचर व्यक्ति - समाज है , जब कि वे कहीं ऊपर स्वर्ग से संचलित होते हैं | इसलिए हम तो नहीं कह सकते कि हम आसाराम की भांति   नैतिक और इन्द्र के स्वर्ग की स्थापना कर देंगे ! हम सिर्फ मनुष्य हैं और मनुष्य जितना कर पायेगा करेगा | ज़ाहिर है तब भी द्वन्द्व होगा, तनाव, लडाई झगड़े होंगे , पर ईश्वर, उसकी किताब - देवदूत को लेकर तो नहीं | वे दुनियावी होंगे | बोलिए अस्वीकार है - - - ? और अंतिम - Secularism की व्यावहारिक परिभाषा Charles Bradlaugh से निकलती है | याद कीजिये , हम कृतग्य हैं उन्होंने God का स्थान पर सत्यनिष्ठा की शपथ को मान्यता दिलाई | उनसे कुछ मुलायम Holyoke साहब के साथ उनके द्वन्द्व को याद कीजिये और फिर बताइए हम उनके मुकाबले कहाँ खड़े हैं आज , इतने अरसा बाद - - -  ?          


* लखनऊ में कुछ विज्ञानं मिजाजी लोग अन्धविश्वास के विरुद्ध " हम सब दाभोलकर " नाम से संस्था / कार्यक्रम बना रहे हैं | वह तो बनायेंगे लेकिन उससे पहले कुछ बुढ़भस लोग " हम सब आसाराम " बोल रहे हैं | वह बयान जारी करने को हैं | यार उतने देर तक कन्या आसाराम के साथ रही | यद्यपि कानूनी तौर पर वह नाबालिग होगी लेकिन इतनी भोली और छोटी भी तो नहीं ! वह तनिक सी हरकत पर भी उनका हाथ झिड़क देती , बूढ़े में इतनी ताकत तो नहीं कि वह इतना जबरदस्ती कर पाता | बाहर तो अन्य लोग , माता पिता भी थे शायद  | कोई जंगल नहीं था वह | चीख पुकार करती तो लोग  सुन लेते | दरवाज़ा खोल कर वह भाग भी सकती थी | अंदर से बंद दरवाजे कि सिटकिनी इतनी ऊंची तो न रही होगी ? वह भी क़द में लगभग आसाराम के बराबर ही होगी ? यार यह तो ठीक कि संत रसिक हैं , लेकिन यह भी बलात कैसे हुआ | कहीं ऐसा तो नहीं कि सब कुछ हो जाने देने के बाद - - - - ? ?

* - क्या देख रहे हो ? - महिला ने पूछा |
- तुम्हारी साड़ी का रंग और डिजाईन | मेरी पत्नी पर खूब फबेगा !

* शायद दीपा ने ही लिखा था - महिलाओं की दो समस्याओं पर | एक तो पहनने को कुछ नहीं है , और दुसरे रखने कि जगह नहीं है |
मेरे विचार से दो ऐसी ही और समस्याएँ हैं उनके साथ | एक तो यह कि वह आदमी मुझे देख क्यों रहा है ? दुसरे यह कि वह आदमी मुझे देख क्यों नहीं रहा है ?

* आदमी से हमेशा प्रेम से बतियाना नहीं , कभी कडाई से भी बोलना चाहिए | बेरुखी से भी पेश आना चाहिए | ज़रुरत ही पड़ जाती है इसकी |यह दुनियादारी कि बात है | पुराणी विनम्रता कि सीख अब हर वक़्त काम नहीं करती |

* आश्चर्य की बात है जो एक संस्था बनाने के लिए सात व्यक्तियों की ज़रूरत पड़ती है ! हर आदमी स्वयं एक संस्था क्यों नहीं होता ?

* Corruption is not as much great an issue as Poverty is .

* औरतें इसलिए परेशान हैं क्योंकि वह मेरी बात नहीं मानतीं | वे मानती ही नहीं कि नहीं कि कुछ ही मामलों में सही , उनमे और मर्दों में अन्तर है ! समानता का भूत सवार है उन पर , तो भुगतें ! मैंने तो देखा है बिटिया की बिदाई और बेटे के गुडगाँव जाते समय माएँ बहुत रोती हैं , बाप बहुत कम ! पर वह मानेंगी नहीं कि उनका दिल अपेक्षाकृत कमज़ोर होता है | नहीं मानतीं तो भुगतें | हम क्या करें ?

* हम इस बात का इंतज़ार नहीं करते कि औरत कहे तब हम उसका काम करें | नहीं हम सेवा भावी  इन्सान हैं | वह आदमी ही क्या जो कहने पर मदद करे ? हम तो बिना उसके कहे ही उसकी मदद को तत्पर रहते हैं |
तब तक , जब तक वह यह कहना सीख न जाय कि नहीं , मुझे तुम्हारी सेवा कि अभी आवश्यकता नहीं है | और यह भी कि जब उसे आवश्यकता हो तो बेझिझक हमारी सेवा मांग ले !

* इतना सत्य
कैसे बोल देता मैं
उन्हें दुखाता !

* किसी से नहीं
न तन, न धन से
मन से हारा |

* फिर भी कुछ
तो है ही जीवन में
जो सुंदर है !

* पहले डुबो
फिर तो पानी पियो
गहराई का !

* थोड़ी बहुत
ऊर्जा बचा रखूँगा
अंत के लिए |

* सितम तेरे
कौन याद रखता
मैं भूल गया |

* शायद नहीं
लेकिन शायद हाँ
हो सकता है |

* देर हो गई
दुर दुर करते
पाप न भागा |

* तुमने कहा
" भुला देना मुझको "
लो , भुला दिया |

* अब भला क्यों
चेहरे ढाँपती हैं
ये लडकियाँ ?

* नहीं पसन्द
मेरे हाइकु तुझे
तेरे मुझको !

* बहुत अच्छे
देखता हूँ स्वप्न मैं
जागरण में |

* यह क्या किया ?
तुमने जगा दिया
मैं स्वप्न में था !

* देखो तब भी /
नाराज़ हो जाते हैं /
न देखो तो भी |
 :)



रविवार, 8 सितंबर 2013

नागरिक पत्रिका 5 सितं से 9 सितम्बर तक

* " लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चार्ल्स डार्विन लम्बे समय तक खुद यही मानते थे कि हर जीव को ईश्वर ने बनाया है | इस सोच को बाद में उन्होंने अपनी गलती माना - -- ?
( कात्यायनी उप्रेती - एक लेख में - nbt 4 सितम्बर )
-- लेकिन हम तो अभी भी इस गलती को नहीं मान रहे हैं , और ईश्वर के चक्कर में अपना अमूल्य समय गवां रहे हैं !

* एक प्रश्न और बहुत कुलबुला रहा है | सोचता हूँ शिक्षक दिवस पर पूछ ही लूँ Vandita जी भी आ गयी हैं | और उज्जवल जी तो उपसंहार करेंगे ही |
नैतिक - आध्यात्मिक चिन्तक इसका उपाय बताएं | पुराने संत तो घपले में डाल गए हैं | एक तरफ कहते हैं - चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग | दूसरी तरफ सावधान करते हैं - कुसंग से दूर रहो और सत्संग करो | अब आप बताइए हमारे लिए कौन सी नीति उचित है ? अपनी तरफ से बता दूँ  कि - हमें दुष्टों से दो गज दूर ही रहना चाहिए | लेकिन जैसा आप लोग कहें , हम वही मानेंगे |

* हमारे लिए -
हमारे लिए न वह तब पूज्य थे , हमारे लिए न वह अब घृणित हैं | हमारे लिए वह तब भी निन्दनीय थे , हमारे लिए वह अब भी निन्दनीय हैं |

* चलिए अब आसाराम के भक्त तो भाजपा को वोट देने से रहे ? उन्होंने आसाराम को बचाया जो नहीं !

* सब कीजिये | लेकिन थोड़ी गुंजाइश रखिये कि पुरुष वर्ग नपुंसक तो न होने पाए !

* मैं आसाराम बापू से छः साल लहुरा हूँ

* ध्यान रखियेगा ! नास्तिक हैं तो आपको ' वास्तविक ' मनुष्य होना होगा |

* यदि Juvenile लड़कों को Adult मानने का आग्रह है , तो नाबालिग लड़कियों को क्यों नहीं ?

* बंटवारा हो तो चूका है , हमारे नेता उसे पूरा  नहीं होने दे रहे हैं |

* अरे हाँ , तो जब मैं कोई सांप्रदायिक दंगा करूँ तब न प्रगतिशील साहित्यकार लिखें कहानियां, कवितायेँ, उपन्यास ?

* शासक वह जो दूसरों को शरण - संरक्षण देता है | वह नहीं , जो अपने लिए आरक्षण लेता है |

* ( नाटक सम्वाद अंश )
" यह ठीक है कि आप न ढोल हैं, न शूद्र, न पशु, न ही नारी ! लेकिन बाबा तो गँवार को भी ताडन का अधिकारी बता गए हैं ! वह तो आप हैं | "

* बहुत से लोग बाहें चढ़ाए मार पीट , युद्ध, बदला आदि की बातें करते हैं | वे एक किताबी प्रश्न का उत्तर बताये तो हम भी मानें वे बड़े लड़ाका हैं  -
" अस्त्र और शस्त्र में क्या अंतर है ? " :)
Naveen Mishra शस्त्र हाथ में लेकर लड़ते है जैसे तलवार ,अस्त्र फेंक कर मारते है जैसे भाला

Right to information = RTI = Right to Inform
Right to education = RTE = Right to Express
हाँ याद आया | RTE में लड़कियों ( और दलितों ) को ज़बरदस्ती आरक्षण क्यों न दिया जाय ?
अजीब स्थिति है | रेग्युलर पढ़ने जाते ही नहीं | वजीफा मिलना होता है तब बन ठन कर जाते हैं | अभिभावकों में भी , पढ़ाने की अभिलाषा ही नहीं दिखती |

* ब्राह्मणों से बड़ा गुरेज़ है तो यदि दलितों को शनैः शनैः ब्राह्मण बनाने कि प्रक्रिया शुरू कर दी जाय तो क्या हर्ज़ है ?
जो लोग क्लास 4th की नौकरी में आ जाएँ , उनकी जाति वैश्य कर दी जाय . जो 3rd श्रेणी में आयें उन्हें क्षत्रिय , और क्लास प्रथम एवं द्वितीय कि नौकरी पाने वालों को ब्राह्मण करार दिया जाय |
लेकिन दिक्कत यह है कि इन्हें ब्राह्मण बनना स्वीकार भी तो नहीं है , अविरल आरक्षण की लालच में  | तो प्रक्रिया को पलट दिया जाय | जाति व्यवस्था के प्रतिकूल अब ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य - शुद्र को क्रमशः चार - तीन -दो - प्रथम श्रेणी का राजकीय स्तर दिया जाय |

* धर्म का नाम - जाति का नाम
-----------------------------
एक और बड़ी समस्या है | न धर्म का कालम छूट रहा है , न जाति का | मनुवाद को ही यदि मानें या दोष दें , तो इसके अनुसार भी चार ही तो श्रेणियां हैं - ब्राह्मण - क्षत्रिय - वैश्य -शुद्र , ब्रह्मा के कथित चार अंगों से उपजे ? फिर ये इतने जाति - नाम कहाँ से आ गए ? हम उन्हें क्यों स्वीकार करें | तो नामकरण केवल इन्ही चारों में से हो, इतर कोई जाति न हो | इसे भी निर्मूल करने या धीरे धीरे फेड आउट करने के लिए व्यवस्था यह हो कि जो जाति प्रथा न माने उसे सच्चा ब्रह्म ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण लिखा जाय , उसे कोई आरक्षण न मिले | इस प्रकार सारी जातियों को समेट कर केवल मौलिक चार में सीमित कर दिया जाय |

और धर्म को मिटने का काम तो चुटकियों में हो सकता है ( कमल पाशा याद आ गए ) | इसे हमारे एक युवा मित्र ने बड़ी बुद्धिमत्ता पूर्वक सुलझाया और सुझाया | जाति का कालम मिटा दिया जाय और धर्म के कालम में जाति [ उन्ही चार में से ] लिखी जाय | या इसका पलट भी हो सकता है |
और यह तो कहना रह ही गया | कि इन सब श्रेणी बद्धताओं में व्यक्ति के नाम से कोई सम्बन्ध न रखा जाय | वह किसी भी भाषा में हो |
बात कुछ जम तो रही है !


* गुजरात के राज्यपाल , और उनके बहाने राज्यपाल की प्रविधा को ही , उसे केंद्र का एजेन्ट , वायसराय कहकर समाप्त करने की बात की जा रही है |
अरे कतई न मानियेगा | केंद्र के वायसराय सही, ये हैं तो राष्ट्र का राज्यों पर कुछ अंकुश है | वरना आश्चर्य नहीं कोई राज्य USA में शामिल होने का निर्णय ले ले ! तबाह हो जायगा देश !

* " पार्टी हाई कमांड "
राज्यपाल के पद को कायम रखने के पक्ष में है |

* क्या यह आँकड़ा सही है , या होना चाहिए ,कि भारत में केवल दो सम्प्रदाय हैं - हिन्दू और मुसलमान ?

* " मैं अपनी जायदाद किसके नाम करूँ ? "

विज्ञानं हो | तो कुछ भी हो - साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन, कला, खेलकूद, सिनेमा, मनोरंजन, कुछ भी | चलेगा | विज्ञानं न हो तो विज्ञानं भी स्वीकार नहीं

" ज्ञान उत्सव "
किसी पार्क में लगाया जाए | लोहिया जी ने रामायण मेला लगवा कर जो गुड गोबर किया , उसे पलटा  जाए |
बस मेला | Fanfare , पुस्तकों कि दुकानें , rational बातचीत , सभा-सम्मेलन , परिचय - युवा युवतियों के , बूढ़ों के , अधार्मिक जीवन के साथी संगती मिलें | इसमें  विज्ञानं  के क्रिया कलाप तो हों , पर इसका नाम विज्ञानं उत्सव न रखें , वरना यह स्थूल हो जायगा | इसे संस्कृतिक नाच गाना बजाना ही रखें मनमोहक , आकर्षक | खुला सबके लिए रखें , संचालक नास्तिक वैज्ञानिक चेतना वाला संगठन हो |
#  #

* भजन गीत =  " मैं हुशियारी सीख गया हूँ "
दुनिया में रहने के नाते दुनियादारी सीख गया हूँ |

तन मेरा चाहे जैसा हो मन मेरा अब भी चन्दन है ,
ह्रदय नहीं मेरा बदला है, कोमल भावों का नंदन है 
लेकिन अभिनय करते करते, मैं  हुशियारी सीख गया हूँ |
                       
मन मेरा कब यह कहता है किन्चित मन को दुःख पहुँचाऊँ 
ह्रदय भला कब अनुमति देता किसी हृदय को ठेस लगाऊँ ,
पर जंगल में रहते रहते, मैं वटमारी सीख गया हूँ  |

पावन मन से जब सच बोला, घर बाहर सब धोखे खाया 
आखिर जग में रहना था ही, मैंने भी यह पथ अपनाया -
मन में छूरी, मुंह से कहना - " कृष्णमुरारी" सीख गया हूँ ||
#  # 

हम दुनिया को 
नहीं बना सकते ,
हम दुनिया को बिगड़ने से 
नहीं बचा सकते |
----------- Feeling sorry 

* गर्ल फ्रेंड को रिझाने में बना लुटेरा =
गर्ल फ्रेंड को मंहगे गिफ्ट देने के लिए लूट करने वाला , चेन स्नेचिंग कर भाग रहा युवक धरा गया |
[NBT 6 सितं]
* मेरी डिमांड है कि उस गर्ल फ्रेंड को भी पकड़ा जाय | यह क्या है कि मीठा मीठा गप कड़वा कड़वा थू ? कुछ वह भी भुगतें |

* ख़ुशी कि खबर -
भटकल पर बयान देने वाले जनाब कमाल फारुकी साहेब कि सपा कि राष्ट्रीय सचिव की कुर्सी छिनी |


* अहमद हसन , स्वास्थ्य एवें कल्याण मंत्री साहेब ! पहले प्रदेश में डेंगू की बीमारी का हाल लीजिये , महिला अफसरों के 
अहंकार कि खबर बाद में दीजियेगा |

*श्री अहमद हसन साहेब , स्वास्थ्य मंत्री जी ! आप के मरीज़ को मिला वेंटिलेटर , जिसके चलते सुम्बुल को मिली मौत ?
 - क्या यह मंत्रि पद का अहंकार नहीं है ?

* दंगे यदि दंगाई करते हैं , तो फिर ये हिन्दू मुसलमान भला क्या करते हैं ? जो इतनी जगह छेकाए हुए हैं ? फिर इनकी ज़रूरत क्या है ?

Trial of Errors में रेहान का नाटक { 7 सितं } तो हुआ | लेकिन मलाला , सुष्मिता पर कब नाटक कारों की कृपादृष्टि  जायेगी ? हाँ , इनमे कोई Errors अलबत्ता नहीं हैं :)

आज आसाराम के दिन खराब हैं तो सभी उनके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं | सारे गड़े मुरदे अब उखाड़ने लगे | अन्यथा अभी ट यही लोग उनकी सेवा में लगे थे | वे सब उनके नादाँ दोस्त हैं |लेकिन हम उनके दानादार ( बुद्धिमान / मानववादी ) दुश्मन हैं ? एक कैदी को देय सुविधाओं के लिए हम उनकी वकालत करेंगे, वह जो भी हों | हम वह मानवाधिकारवादी नहीं हैं जो केवल नक्सलियों / आतंकियों के लिए झंडा उठाते हैं | आसाराम को भी उनकी आयु और स्वास्थ्य के अनुकूल ही व्यवहार किया जाना चाहिए | मेरा ख्याल है लोगों को पसंद शायद न आये यह सोचकर कि मैं तो नास्तिक आदमी हूँ , ढोंग पाखंड विरोधी , और आसाराम वह सब करते थे !
क्योंकि हमारे यहाँ मनुष्य का शारीरिक मूल्य भी है |)

दो तरीके =
1 - पहले स्वीकार करो ( मानो )
     फिर संदेह करो ,
     फिर इन्कार करो ( न मानो )

2 - पहले इन्कार करो ( न मानो )
     फिर संदेह करो ,
     फिर स्वीकार करो ( मानो )

#  #

* रामदेव ने कहा  - साधू संतों के लिए बने आचार संहिता |
  - यूँ है तो यह हास्यास्पद और भारत का दुर्भाग्य | क्योंकि जो साधू संत जनता के लिए आचार संहिता बनाते और उन्हें पढ़ाते हैं , स्थिति ऐसी आ गयी है कि उनके लिए आचार संहिता बनानी बनानी पड़ रही है ! 

लेकिन फिर भी यदि बनानी ही पड़ रही है , तो उसे बनाएगी जनता | अर्थात भारत का संविधान , और उसके तहत चल रही सेक्युलर सरकार |

* ईश्वर तो वह जिसका अपमान ( Blasphemy ) असंभव हो !

सारा दोष राजनीति, सपा बसपा, भाजपा को ही न दें | कुछ अपने लिए भी बचा  कर रखें  जो धर्म को   बड़ा महत्व , अत्यंत महिमामंडित करते हैं | अरे बहुत ज़रूरी है धर्म मनुष्य के लिए - धारयति सः धर्मः ! अन्यथा मानव तो दानव हो जायगा | तो भुगतिए अब अपने देवताओं को !

क्या यह कहावत सच है कि मूर्खों के सींग - पूंछ नहीं होते ? मेरा तो ख्याल है कि, होते हैं हमें दिखाई नहीं देते |

* सुष्मिता बंद्योपाध्याय ! यूँ तो सजातीय, सधार्मिक विवाह में भी कुछ भी हो सकता है | लेकिन अंतरधार्मिक विवाह से ही क्या सुख हासिल हो गया ? शान्ति सुनिश्चित हो गयी ? - - - - 

आखिर " इस बात का भी क्यों नहीं कुछ मायने हो पाया कि वह इस्लाम स्वीकार करके साहब कमाल हो गयी थीं, और लोगों की सेवा कर जिंदगियां बचा रही थीं " ?

* तालिब कहते हैं शिक्षार्थी को , शिक्षा की तलब, प्यास रखने वाले को | तालिबानी का अर्थ भी कुछ इसी के आसपास होना चाहिए !


* हिन्दुओं के साथ बैठकर खाना जायज़ " = दारुल उलूम |

- - चलिए अब मेरा चिकन बिरयानी पक्का हो गया !


* इस जग का ईश्वर है मालिक 
तुम मानो हम नहीं मानते ,
धरती का इकलौता मालिक
तुम मानो हम नहीं मानते | 

* ईश्वर = अदृश्य सत्ता का एहसास ,

* धर्म  = स्व अर्जित नैतिकता |

* हम नास्तिक इसलिए हैं , क्योंकि आस्तिक लोग आस्तिक नहीं रह गए | इसलिए हम अपनी आस्तिकता का नाम नास्तिकता कहते हैं !

" धर्म की हानी " इसलिए हो रही है क्योंकि ' धार्मिक ' जनानि के आध्यात्मिक ' दूध के दाँत ' टूटते ही नहीं | उनके माथे से ' छाप तिलक ' बुढ़ापे तक भी नहीं छूटता , तो कैसे मिलें ' नैना ' उस समग्र - समष्टि से ? वही प्राइमरी स्कूल में प्रार्थना में ताउम्र शामिल , मूर्तियाँ, घंटे घड़ियाल बजाते आरती हवं करते ! अरे भाई , गोलियों की ज़रूरत तो बच्चों को गिनती - पहाड़ा सिखाने के लिए पड़ती है ! क्या वही जिंदगी भर लिए रहेंगे ? फिर कहेंगे , हाय मैं तो एमएससी में फेल हो गया | अरे, वार्धक्य के बल पर अध्यात्म के सोपान नहीं चढ़े जाते मित्र ! छोडो सब छोडो , गोरख गुरु तो कहते हैं - मरो , मरो रे जोगी मरो ! 

यात्रा का आनन्द लेने का अपना तरीका मैं आप को बता रहा हूँ , बिना पैसा व धन बरबाद किये | बैंक खाते में दो तीन हज़ार हर हाल में पड़ा रहने देता हूँ | हर महीने irctc से कहीं जाने और वहाँ से लौटने का टिकट बुक करा लेता हूँ , स्लीपर में , ए सी में | कहीं का भी , कभी दिल्ली, कभी कोलकाता नहीं तो कभी गोरखपुर अपने घर तक का ही | जहां भी कन्फर्म मिले | बिना पक्के टिकट के मैं यात्रा नहीं करता | फिर क्या करता हूँ कि यात्रा प्रारंभ होने के 24 घंटे पहले उन्हें कैंसिल कर देता हूँ | है न घर बैठे यात्रा के आनंद का नायाब तरीका ? :)


* इतनी धार्मिक विविधताओं के बीच नास्तिक [ धर्मों से असम्बद्ध / निर्मोही ] कारकुन, पुलिस कर्मी, अधिकारी, न्यायाधिकारी, राजनेता ,शिक्षक ही, यहाँ तक कि चपरासी और सफाईकर्मी भी  सेक्युलर राज्य के सही संवाहक हो सकते हैं | वर्ना यह मंत्री लाखों की भीड़ में पहले स्नान करेगा (भीड़ कुचल कर मरे तो मरे ), राज्य में नरसंहार करेगा या वह मंत्री हज के लिए विदेश यात्रा कर लेगा | कोई क्या कर लेगा उनका ? कौन समझाए , कौन रोकेगा उन्हें ? आखिर वह व्यक्ति हैं अपनी धार्मिक आस्था के साथ और साथ ही राज्य के सूबेदार भी हैं | हम कौन है और आप कौन हैं ? पलटते रहिये शब्दों की किताबी परिभाषाएं ! तब तक तो वह बहुत कुछ अंजाम दे चूका होगा | आधी सदी से अधिक तो ले ही लिया इसने ! मित्र , बाहरी शब्दों को अपनी ज़मीनी यथार्थ से जोड़ कर सोचना होगा | तभी सटीक परिभाषा निकलेगी | मच्छिका स्थाने मच्छिका बैठाने से नहीं     

* हिन्दू हिन्दुई 
दंगा करें दंगाई 
तुर्क तुर्कई |

* मैं पूछता हूँ -
इतनी लम्बी तो है 

कविता कहाँ ?

* लस्त पस्त हो 
सुरसती का पापा 
घर आता है |

* कोई तो मिथ 
काम नहीं करता 
छद्म युग में |

* होगा क्यों नहीं 
इतना पैसा है तो 
धूम धड़ाका ?

* आत्म अलग 
अध्यात्म अलग है ?
फिर से सोचूँ  |

* क्या होगा कुछ 
कहने सुनने से 
हो तो बताओ !

* इतनी जल्दी 
प्यार के प्रतिमान 
मत बदलो !

  अजीब बात !
हर समय व्यस्त 
रहता हूँ मैं |

लक्ष्य इतने 
कर्तव्य कुछ नहीं 
क्या सफलता ?

अच्छा जीवन 
मुश्किल से बनता 
शीघ्र टूटता |

साहित्य चर्या 
है सम्पूर्ण अध्यात्म 
हृदयान्तर !

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

थोड़ा लिखना 1 / 9 से 4 / 9 / 2013

* नकलची नास्तिक ?
मुझे नहीं लगता कि नास्तिकों ने कोई मौलिक काम किया है नास्तिक होकर | काम तो किया है आस्तिकों ने किया - यह ईश्वर, वह भगवान् , इतने देवी देवताओं का आविष्कार करके , इधर उधर से काल्पनिक तथ्य खोजकर मोटे मोटे किताब लिखकर | नास्तिक ने सिर्फ उन्हें देखा है | वह देखता है कि सामने खड़े समूचे प्राणी को तुम कैसे पैर से पैदा बताकर उसे अछूत कर देते हो | चोरी बेईमानी घटियाही करते हो , अन्याय अत्याचार करते हो और तुम्हारा ईश्वर तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाता , रोक ही नहीं पाता | तब तुम कहते हो इसका फल स्वर्ग नर्क के माध्यम से या फिर अगले जन्म में मिलेगा | अब इतना इंतज़ार कौन करे ? तब नास्तिक कहता है - अरे , जब यही काम, यही व्यवहार, यही दिनचर्या करनी है तो हम तो इसे बिना ईश्वर को माने ही कर सकते हैं | और वह ईश्वर को नकार देता है | फिर अपनी बुद्धि विवेक भावना के बल और आधार पर जैसी भी जिंदगी जी पाता है जीता है | वह किसी ईश्वर को अपने कुकर्मों का आलम्ब नहीं बनाता |

- " वक़्त पर काम नहीं आया मेरा भगवान " --- DIG गुजरात वंजारा |
सुन लीजिये और गाँठ बाँध लीजिये - किसी के भी किसी भी काम नहीं आएगा भगवान |

* लखनऊ के एक पुलिस अधिकारी ने अपनी महिला सहकर्मी के हाथ पर दिल बनाया और लिख दिया - " I Love You " .
गलत बात | लिखना चाहिए था - " I Hate You " . तब वह शिकायत भी न करती , और अधीन काम भी ढंग से करती | कि साहब कहीं नाराज़ न हो जाएँ !
[ यह भी छेड़खानी हो गयी | आखिर वह उतने देर तक हाथ फैलाये क्यों रही जितनी देर दरोगा उसके हाथ पर लिख रहा था | वह फ़ौरन अपना हाथ खींच सकती थी | लेकिन तब शिकायत का आधार और पुरुष को बदनाम करने का मौका कैसे मिलता ? आखिर वह भी सिपाही है उसी विभाग में ! यह गलत परिपाटी है | इतना तो मान कर चलना होगा कि स्त्री पुरुष में आकर्षण स्वाभाविक है और यदि कोई अभद्र बल प्रयोग नहीं है तो उसे छेड़ खानी नहीं माना जाना चाहिए | I love you लिखने से हाथ नहीं कटता| ]
शायद यही सब देख कर इस्लाम कहता है - औरतों को घर में महफूज़ रखो | मैं महिला कांस्टेबल कि इस दबंगई की निंदा करता हूँ |

* मुसलमानों पर यह आरोप तो सरासर नाजायज़ ही है कि वह हिन्दुस्तान को अपना नहीं मानते | यह हो ही कैसे सकता है ? यह हो ही नहीं सकता | जब उनके नेता, धार्मिक नेता अमरीका जैसे अपने दुश्मन मुल्क तक को अपना बनाने पर तुले हैं तो भला वे हिन्दुस्तान को अपना क्यों न बनाना चाहेंगे | और बिना अपना समझे तो किसी को अपना बनाया नहीं जा सकता !
यही बात हिन्दू राष्ट्र्वदियों पर भी लागू है | लगता तो है कि उनके कृत्य देश को तोड़ने वाले हैं , लेकिन नहीं | वह भी तो विश्व बंधुत्व का भाव रखते हैं |
कहीं युद्ध इसी बात को लेकर तो नहीं , कि हर समुदाय पूरी दुनिया को अपना बनाना चाहता है, अपनी झोली में रखना चाहता है ?

* मैं इस बात से सहमत हूँ कि हिन्दुस्तान में हिन्दू आतन्कवाद से सख्ती से निपटा जाना चाहिए | क्योंकि यह उनका राष्ट्र है , हिन्दू राष्ट्र है | वही जब देश की बदनामी करेंगे, मेंड़ ही खेत खायगा तब देश क्या रहेगा ?
इससे , उनके कृत्यों से एक तो राष्ट्र हित  प्रभावित होता है , दुसरे इसके चलते भारत को हिन्दू राज्य  बनाने की हमारी कोशिशों , तर्कों - दलीलों को धक्का लगता है | तीसरे जब हिन्दू राज्य बन जायगा तब यही आतंक वादी उस राज्य के लिए सर दर्द बन जायेंगे, खतरा साबित होंगे |और उसे चलने न देंगे यदि इनकी ऐसे ही चलने दी गयी और ये धीरे धीरे ताक़त ग्रहण कर ले गए | जैसा कि पडोसी पाकिस्तान में हो रहा है | इसलिए क्या कहा है कि - Nip the evil in the Bud | इनसे अभी से निपटते रहना चाहिए , भले हम इनकी पीड़ा समझते हैं | इन्हें हिंसा के खून का स्वाद न चखने दिया जाय | इसलिए हाय मुस्लिम -हाय मुस्लिम जैसी बात हम न करें | चिंता करें हिन्दू राज्य की | वह क्या होगी , कैसी होगी , दलितों अल्पसंख्यकों को पूरा सहारा , सहयोग और संरक्षण होगा ,किस प्रकार बेहतर तरीके से होगा ,यह हमें अभी से अपने व्यवहारों और राज्य की संस्थाओं के माध्यम से प्रकट - प्रदर्शित करना चाहिए | जिससे लोग इसकी प्रशंसा करें , इसकी और आकर्षित हों | हमारा काम आसान हो , मार्ग प्रशस्त हो |

* क्या करें ? इतने सारे तो इश्वर और भगवान् हो गए हैं , किसको मानें किसको न मानें ?

* जब सुकरात से लेकर गौतम बुद्ध , कबीर , रैदास से होते हुए महर्षि अरविन्द , जे. कृष्णमूर्ति तक नहीं समझा पाए , तो हम तो उनके मूली भला क्या समझा पायेंगे ?

* कव्वाली -
कुछ झूठ कहा कुछ सच बोला
लेकिन यह बात सही तो है ,
सब झूठ कहो सब सच बोलो
दुनिया में गुज़ारा होता क्या ?

* हिन्दुस्तान अपने नाम से तो हिन्दू राष्ट्र है , लेकिन राज्य तो सेक्युलर है हमारा | अर्थात हम हिन्दुत्व  को किसी के ऊपर राज्य कि शक्ति के बल पर थोप नहीं सकते , जैसा कि अतीत में राजाशाही काल में होता आया है | वैसे हम चाहें भी तो भी हिंदुत्व को किसी के ऊपर लाड नहीं सकते | हम तो स्वयं उसके निरर्थक, अनुपयोगी, अनावश्यक भार [वज़न] को शनैः शनैः उतार रहे हैं |

* अल्पसंख्यक होने के साथ एक  परसंख्यक होने का भाव भी जुडा है | एक परायापन महसूस करते हैं वह |  अथवा बहुसंख्यक को अनुभव कराते हैं कि देखो - हम पराये हैं | दोनों बातें हैं , और अल्पसंख्यक वाद का यह खतरनाक पक्ष है | वर्ना अल्पसंख्यक तो तमाम वे भारतवासी हैं जो ह्रदय से मानवता और राष्ट्र के हितैषी हैं , जाति सम्प्रदायवाद, नोच खसोट वाद के खिलाफ है | तार्किक बुद्धिवादी , वैज्ञानिक मिजाजी अथवा नास्तिक हैं |

* आया मुझको
करते ही करते
थोड़ा लिखना

जिसकी आस्तिक होना हो वह मुसलमान हो जाय | आस्तिकता की इसे बड़ी मिसाल कोई नहीं |
जिसको धार्मिक होना हो वह हिन्दू हो जाय } धार्मिकता का इतना बड़ा माया जाल और कहीं नहीं |
जिसको ईश्वरविहीन नैतिक मनुष्य होना हो वह यहीं रहे |


हमारा एक धुन = ईश्वर नहीं है |
हाँ आदमी हैं ,
हम हैं तुम हो ,
आसाराम बापू हैं '
आसाराम बापू आदमी हैं '
हम सब आदमी हैं ,
कोई ईश्वर नहीं है |

* ईश्वर से भेंट हो तो ज़रा पूछकर बताइए | उसने हमें बुद्धि दिया ही क्यों जब हमें उसका प्रयोग करना नहीं है | यदि प्रयोग कर दें तो सबसे पहले ईश्वर ही निरर्थक साबित होता है ?
दुसरे यह भी कि उसने हमें मानव योनी में ही क्यों पैदा किया ? जीव जंतु , कीड़े मकोड़े हम क्या बुरे होते ?

" कोई नहीं है ईश्वर अल्ला
दरवाजे पर नहीं है पल्ला |"
सुबह नींद खुलने पर यह सिद्ध मन्त्र साढ़े तीन बार पढ़ो | तभी उठकर दरवाज़ा खोलो |
तुम्हारा दिन शुभ होगा | पत्नी या पति चाय नाश्ता खाना सब देगी / देगा | आफिस में बॉस खुश रहेगा  | परीक्षा में उत्तीर्ण होगे | कचहरी में जीत होगी | शीघ्र संतान होगी |धन सम्पत्ति घर आएगा |
जो राम नाम , ईश्वर अल्ला जपता बिस्तर छोड़ेगा , उसका सारा दिन चिंता और दुःख में बीतेगा |

* राष्ट्र वादी =
एक कहानी याद आती है , कहीं पढ़ी हुई | कम से कम १९६६ के पहले , क्योंकि मैंने इस कथा का उल्लेख तब एक अधिकारी कि विदाई पार्टी में किया था |
कोई विदेशी भारत भ्रमण के बाद स्वदेश लौट रहा था | टेक्सी से एअरपोर्ट के रस्ते में ड्राईवर ने विदेशी से प्रतिक्रिया पूछी | विदेशी ने उसे वह बताया जो कटु था उचित न था | पहुँच कर विदेशी उसे किराया देने लगा तो ड्राईवर ने कहा -किराये के बदले मुझे एक आश्वासन दीजिये | इस बुरे अनुभव का ज़िक्र आप अपने देश में किसी से न करें |अन्यथा मेरे देश कि बदनामी होगी |
मेरे ख्याल से उस ड्राईवर को राष्ट्रवादी घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए |

* DHISHUM =
धर्म और ईश्वर से ऊबे मनुष्य
( ढिशुम )

* लोग हमारी नास्तिकता से बड़े खफा रहते हैं | अच्छे लोग हैं धार्मिक जन , नहीं देखते धर्मों की बुराई , सुन भी नहीं सकते बेचारे - अंध आस्था के मारे | उनसे हमारा आदरपूर्ण निवेदन है कि परेशान न हो , और हमें अपना काम करने दें | जिसको हमारी बात सुननी होगी सुनेगा , माननी होगी मानेगा , अन्यथा नहीं मानेगा | आप अपना काम कीजिये , कर ही रहे हैं | आखिर हम उतना बुरा काम तो नहीं कर रहे हैं जितना आपके फलां फलां और फलां कर गये , और कर रहे हैं | फुर्सत और हिम्मत हो तो उनसे भिडीये

* कोई माई का लाल ईश्वर नहीं है जो मनुष्य को समझा सके | वह खुद समझेगा तभी समझेगा कि ईश्वर नहीं है |

आसाराम प्रकरण पर कुछ विचारणीय बिंदु ( विचार नहीं )
* बालिग़ नाबालिग का मापदंड कानून की किताब का , वरना - -
* यौन शोषण की परिभाषा आपकी , वरना - -
* सारे कानून आपके बनाये हुए - - प्रकृति तो अपना काम - -
* आकर्षण और motivation तो प्राकृतिक - -
आगे आप ले जाएँ बात को --
- दोषी प्रकृति है या मनुष्य
* आस्तिक धार्मिक बताएं | वे तो इस बुराई से मुक्त होने का दावा और वादा करते हैं ? फिर कहाँ चली गयी आत्मसंयम भरी गुरु की वाणियाँ ?
* उमा भारती कैसे कह सकती हैं कि वह ' ऐसा नहीं कर सकते ' ? क्या मात्र इस अनुभव पर कि उनके साथ ऐसा हादसा नहीं हुआ, संभव नहीं हो सका ?

* वह होता , तो निपटा न देता हमारा झगड़ा कि वह है कि नहीं है ?

* आपके लिए है तो है | हमारे लिए ईश्वर नहीं है |

* आखिर मुद्दा तो नीति और नैतिकता का है न ? तो यह तो आपने देख लिया कि ईश्वर और धर्म इतने समय से यह काम कर रहे हैं और वे असफल रहे हैं | तो अब कुछ दिनों के लिए मनुष्य की सत्ता मनुष्यों को , धर्म विहीन नास्तिकों को सौंपने में तुम्हे क्या परेशानी है ? आखिर कितने दिन अकेले राज करोगे और किसी अन्य को नहीं आने दोगे ?

* हम आस्तिक हैं या नास्तिक | हम आस्तिक कैसे भी हैं या कैसे भी नहीं हैं | हम कैसे नास्तिक हैं , कितने है, किस प्रकार के हैं , क्यों है ? इत्यादि | ये सारे प्रश्न निरर्थक हैं , और आप क्या करेंगे जानकर | आप तो आस्तिक हैं ? हम आपसे यह बताते हैं कि हम नास्तिकता का प्रचार करते हैं | हमें इसका काम ऊपर से एलॉट हुआ है | सो हम कर रहे हैं | आपको जो काम मिला है वह आप करिये | यदि आप पैसे कि भाषा समझते हैं तो समझिये कुबेर जी ने हमें इसके लिए पैसा दिया है | यदि आप भाग्य वादी हैं तो समझिये चित्रगुप्त महाराज ने हमारे भाग्य में यही लिखा है | यदि आप कर्मवादी हैं तो जानिये श्री कृष्ण ने हमें ऐसा ही उपदेश दिया है | कर्मफल मानते हैं तो हम फिछले जन्म की सजा भुगत रहे हैं | और ईश्वर को मानते हैं तो ईश्वर ने कहा कि अब मैं अवतार नहीं लूँगा , तुम लोग जाओ और यह काम करो | तो भाइयो , हम तो हरि इच्छा पूरी करने में लगे हैं | अब तुम इसे मानो या न मानो तुम्हारी मर्ज़ी } हमारा क्या है ? जब दोजख और नरक में धकेले जाओगे तब पता चलेगा | तब हमारी बात याद आएगी के वे कहते थे ' मनुष्य बनो, मनुष्य ही रहो ' | तब पछताओगे | इसलिए अभी मान लो तो बेहतर | कि इश्वर नहीं है , किसी कि पूजा पाठ न करो , किसी भी सीमा तक मनुष्य  बनो | हम तो चाहते हैं भगवान् तुम्हारा भला करे |
( नास्तिकता प्रचार दल)

* क्या बुरा नहीं लग रहा है कि कोई एक ईश्वर इतने पुराने सडे, गंधाये कपड़े पहने, बिना नहाए धोए , इतने दिनों से मनुष्यों के बीच रह रहा है ?

1 - महा प्रश्न =
" क्या यासीन भटकल 'मुसलमान ' है फारुकी साहेब ? "
इस सवाल का जवाब आपके अलावा यदि बड़े बड़े कुछ इस्लामी उस्ताद - जाकिर नायक , बुखारी सरीखे लोग देते , तो हमे भी उनसे उलझने [ क्या तक़रीर सुनने ] में मज़ा आता | हमारी बड़ी रूचि है इन विषयों में , और बड़ी खोज खबर ली है | ऐसे ही नास्तिक नहीं हुए हम !

2 - * आप तो गिरफ्तार नहीं हुए कमाल फारूकी साहेब ? आप मुसलमान नहीं हैं  क्या  ?

3 - एक अप्रिय स्थिति का अनुमान मुझे हो रहा है | जब हम नास्तिकों की अल्पसंख्यक राजनीति करेंगे तो यह ज़रूरी नहीं कि हम केवल हिन्दू का विरोध करें | हम समानांतर मुस्लिम राजनीति का भी विरोध कर सकते हैं , और सहधर्मी नास्तिकों की राजनीति का भी | और हमारा यह रुख सेक्युलरों और कम्युनिस्ट मित्रों को नागवार लग सकता है |

४ - सोचना पड़ेगा , सोचना तो पड़ेगा =
सपा के जनाब कमाल फारुकी साहेब के बयान का तर्ज़ और लय मुझे इतना प्यारा लगा कि वह बात बात पर मेरे दिमाग में गुनगुनाने लगता है |
अब यही देखिये कि कल 31 अगस्त को राही मासूम रजा साहित्य अकादमी के तत्वावधान में डा अब्दुल बिस्मिल्लाह को अवार्ड दिया गया , तो वहां भी यह गीत सर में सस्वर गाने लगा :-
ज्ञातव्य हो कि सेक्युलर आइकन के तौर पर इस अकादमी का गठन हुआ है | तो
1 - यदि डा राही मासूम रज़ा को सेक्युलर होने के नाते संस्था का आइकन बनाया गया तब तो ठीक , लेकिन यदि उन्हें मुसलमान होने के कारण ऐसा किया गया तो सोचना पड़ेगा |
[ज़ाहिर है इन्हें इतने तमाम जातियों में से कोई हिन्दू सेक्युलर आइकन नहीं मिला, शायद हिन्दू सेक्युलर हो ही नहीं सकता | इसलिए पेरियार, रामस्वरूप वर्मा, गोरा , या अभी मरे / मारे गए डोभालकर सेक्युलर नहीं थे ]
उसी तर्ज़ पर एक और छंद बनता है :-
2 - यदि डा अब्दुल बिस्मिल्लाह को सेक्युलर कलम के धनी लेखक के रूप में सम्मानित किया गया तब तो ठीक , लेकिन यदि उन्हें मुसलमान होने के नाते अवार्ड से नवाज़ा गया तो फिर सोचना पड़ेगा |
सोचना तो पड़ेगा !

* हमने कभी किसी के लिए
मृत्युदंड नहीं चाही ,
न हमने तब उन्हें
फांसी पर लटकाने की माँग की ,
न हम अब इन्हें
सूली चढ़ाने की माँग कर रहे हैं |
हम हमेशा मृत्युदंड के खिलाफ थे
हम अब भी मृत्युदंड के खिलाफ हैं |
#   # 

* अभी मृत्यु दंड तो समाप्त नहीं कर पाए , चले हैं बड़े धार्मिक राष्ट्र बनने !

* अंधा ही होना है तो सावन में हो लेंगे | अभी तो पतझड़ की उदासी के दिन हैं !

* पोलिटेक्निक चौराहे पर जाम और भीड़ कि वजह से वहां सड़कें कुछ चौड़ी कि जानी  हैं और गोलाई कुछ कम | इसके लिए आज भूमि पूजन हुआ | क्यों हुआ भूमि पूजन ? पूजा का अभीष्ट क्या है ? उससे क्या फल मिलेगा ? अभी साल भर ही पहले थोडा चिनहट की ओर एक पुल टूट कर गिर गया था और उसके नीचे सोये मजदूर मर गए थे | क्या उस निर्माण के पूर्व पूजन हुआ था ? यदि हुआ था तो फिर वह टूटा क्यों ? और जब काम ठीक नहीं होना है , ज़िम्मेदारी निभानी नहीं जानी है, निर्माणों को क्षतिग्रस्त होना ही है , तो फिर पूजा का पाखण्ड क्यों ? सेक्युलर देश में यह किसके आदेश पर हो रहा है ? हमें सख्त ऐतराज़ है | क्या देश को सरकार भी पाखंडी बना रही है आसरामों कि तरह ? मैं याद दिलाना चाहता हूँ - सरकार का कर्तव्य वैज्ञानिक चेतना फैलाना है , ब्राह्मणी अंधविश्वास नहीं | 

*  करता तो हूँ
जितना कर पाता हूँ
क्या जान दे दूँ ?

* इनके बनें
बनना गुलाम है
चाहे उनके !

* देखना होगा
समाज का चलन
व्यवहार में |

* भ्रम में हम
दुनिया बदलेंगे ?
अजी हटिये !

* पहले आप !
नहीं , पहले आप !
छूटीं गाड़ियाँ |

* न विचारों का
आदर करेंगे, न
ही व्यक्तियों का |

रविवार, 1 सितंबर 2013

छुईमुई के पौधे Posts ending 31 August 2013

* जो व्यक्ति छुईमुई के पौधे में ईश्वरीय अस्तित्व नहीं देख पाता और मंदिरों की मूर्तियाँ में ईश्वर के दर्शन खोजता है, तीर्थस्थलों के चक्कर लगाता है उसे नास्तिक भले न कहें, आस्तिक भी न ही कहें तो श्रेयस्कर !


*अपने तमाम धर्म और ईश्वर विरोध के बावजूद मेरी पूरी सहानुभूति आसाराम बापू के साथ है | सही बात है | इच्छा तो होती है | लेकिन मेरे फ़ाज़िल दोस्त ! ऐसे व्यवहारों के लिए समय देखना होता है, समाज,लोकमत, लोकलाज का ख्याल रखना होता है | अपनी आयु , पद , मान सम्मान का लिहाज़ रखना होता है | और इसकी दिक्कत तो आपने खुद खड़ी की हुई है | अपना रुतबा आपने अपनी भक्त मण्डली में ऐसी बना रखी है कि लोग आपको भगवान् से बस ज़रा सा ही कम समझते हैं | ऐसी दशा में वे आपसे देवतुल्य व्यवहार की अपेक्षा करते हैं तो उनकी क्या त्रुटि ? वरना यदि आप आम आदमी की होते / रहते तो जैसे लोग करते , और सहयोगी से सहमति बना लेते हैं, आप भी करते | कौन आपको पूछने जाता, कौन आपके पीछे पड़ता ? लेकिन आपने अपनी प्रतिष्ठा से कन्या को तो आतंकित ही कर दिया | तो अब मेरी आपसे पूरी सहानुभूति के बावजूद भारत राज्य का कुछ कोप तो आपको सहन करना पड़ेगा |

* अब प्रश्न है - क्या हम नास्तिक भी हिन्दू हैं ?
{मित्र विवाद में न जायँ , प्रश्न को बिलकुल सीधा रखने के लिए एक प्रमुख धर्म का नाम लिया है } |
व्यक्तिगत मैं तो हिन्दू शब्द और संस्कृति के प्रति अपनी कृतज्ञतावश हिन्दू हूँ , क्योंकि इसने मुझे यह अवसर दिया कि मैं नास्तिक [या कुछ भी ] हो सकूँ | बल्कि इसकी विसंगतिपूर्ण विविधता ने ही मुझे नास्तिकता कि और उन्मुख किया | इसलिए मैं तो इसका आभारी हूँ | कृतघ्नता, अहसान फरामोशी उचित तो नहीं है ? दुसरे, और राष्ट्रीय - राजनीतिक कारण भी हैं | यदि हिन्दू नहीं हूँ तो क्या हूँ ? क्या हम शुद्ध , निखालिस नास्तिक होकर जीवन जी सकते हैं ? अभी नास्तिकता की कोई स्वतंत्र जीवन शैली तो बनी नहीं है | इसलिए इसी के अंतर्गत जो कुछ हो पाता है करता हूँ - कुछ विरोध - किंचित समर्थन के साथ सह लह कर |


* जानदेवा ( जीवनदायी ) औषध एंटीबायोटिक्स का आविष्कार किसने किया ? इस दवा से लाभान्वित हुए कितने मरीज़ उस वैज्ञानिक के समक्ष सर झुकाते हैं ? पूजा तो दूर !

* Byomkesh Mishra
"शूल सेज राणा नै भेजी, दीज्यो मीरां सुलाय, सांझ भई मिरां सोवन लागी, मानों फूल बिछाय"
कहते हैं मीरा के चित्तोड़ त्यागने के बाद मेवाड़ भी उजड़ गया, राणा के वंश का नाश हुआ और राजपुताना सदा के लिए ध्वस्त हो गया । पतन तो मीरा की प्रताड़ना के साथ ही आरंभ हो चुका था, किन्तु मीरा के बाद इसका ऐसा मानभंग हुआ कि इतिहास ने कभी राजपूतों की सत्ता नहीं देखी । इतिहास कुछ ऐसी घटनाएँ व कुछ ऐसे चरित्र गढ़ता है जो मिथक हो जाते हैं, फिर ये मिथक सामाजिक आस्थाओं में संघटित हो, ऐतिहासिक प्रामाणिकता की कसौटी लांघ जाते हैं । इसलिए मिथक साक्षी हैं कि महात्माओं, संतों व पुण्यात्माओं का जाने-अनजाने अपमान, उत्पीड़न व प्रयाण घोर अपशगुन का सूचक है । हालाँकि, घटनाएँ सांयोगिक, तुलनाएँ सांकेतिक तथा प्रासंगिकता रचनात्मक होती है...
फिर भी आज मन दुखी हुआ ये जान कर कि "उग्रनाथ जी" ने ये ग्रुप छोड़ दिया है ! "भक्ति" पर उनसे संवाद अधूरा ही रह गया...इसीलिए शायद...आज फिर मीरा का स्मरण हो आया...


* संस्कृतियों का
अप्राकृतिक होना -
उनकी इच्छा |

* बस थोड़ी सी
चेतना और बस
काम हो गया |

* किसके लिए
जिया आपने, मरे
हेतु किसके ?

* जिनके होंगे
उनके वह होंगे
मेरे तो नहीं !

* सामने नहीं
तो भी हैं इतने तो
फेसबुक में |

* शिक्षा व्यवस्था
का एक काम अच्छा
टाई लटकी |

* प्रगतिशील
हैं तो, किंतु गाड़ी है
अभी एक ही !

* आज हेमामालिनी का बयान पढ़ा कि चूँकि अब द्रोपदी को बचने वाला कोई कृष्ण सरीखा नहीं है , इसलिए लड़कियों को बच - बचा कर रहना चाहिए | लेकिन मेरी उलटी बुद्धि कल से ही अन्य दिशा में चल रही है |कल हुआ यह कि मैं दांत के डाक्टर के क्लिनिक से वापस आ रहा था स्कूटर से | रास्ते में पानी बरसने लगा | देखा कि एक लड़की जल्दी कदम बढ़ाते अगले चौराहे कि और जा रही है , जहाँ से उसे टेम्पो मिलता | मैंने सारी बातें दिमाग में सोची और स्थितियों की बिगाड़ को देखते  मैं जानता हूँ मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए | लेकिन मैंने तय किया - मुझे ऐसा करना ही चाहिए स्थितियां जैसी भी हों | मैंने रुक कर कहा - क्या मैं आपको चौराहे तक छोड़ दूँ ? उसने कहा - नहीं नहीं | मैंने कहा -पानी बरस रहा है , इसलिए मैने कहा | कोई बात नहीं | और मैंने स्कूटर बढ़ा दिया |
अब सोचिये - ज़माने कि खराबी के कारण ही तो उसने मना किया ? लेकिन क्या इस तरह समाज चलेगा जहाँ विशवास का , या सहयोग का इतना अभाव हो ? अतः मेरा ख्याल बन रहा है कि यह साहस लड़कियों को करना चाहिए | ठीक है दुर्घटनाएं हो सकती हैं , कहाँ नहीं होती हैं ? लेकिन जीवन कि घटनाये तो चलेंगी ? और यह तो मैं कह ही चूका हूँ कि कुछ दुर्घटनाओं को दुर्घटना ही समझा जाना चाहिए , न कि आजीवन के इज्जत का प्रश्न | तभी दुर्घटनाएं रुकेंगी और नारी मुक्त भी होगी | ऐसा न होगा तो वह तो फिर घर में सिकोड़ दी जायगी | यही तो पुरुष चाहता है | लड़कियों को वैसा नहीं होने देना चाहिए | उसे लिफ्ट लेना चाहिए और निर्भय होकर देना भी चाहिए | लड़कों के साथ बराबर होना चाहिए | जब चाहे मौज मस्ती - दोस्ती करे , तब न चाहने पर वह इनकार भी कर सकेगी | अब जैसा वह चाहे लेकिन डर से तो कुछ नहीं होगा | दुर्घटना भले न हो, तो कोई घटना भी तो नहीं घटेगी , आत्मविश्वास की, बराबरी की , कुछ आगे होड़ की ? एक उदहारण - क्या याद करेंगे हवा में उड़ने कि कोशिशों में कितने साहसी दुर्घटनाग्रस्त हुए ? एक सज्जन तो हाथों में सूप बांधकर पहाड़ी से चिड़िया कि तरह उड़ने की कोशिश में कूदे और जान गवां बैठे | तो लड़कियों को भी खतरा ही उठाना होगा , उससे बचना नहीं |

* एक अप्रिय स्थिति का अनुमान मुझे हो रहा है | जब हम नास्तिकों कि अल्पसंख्यक राजनीति करेंगे तो यह ज़रूरी नहीं कि हम केवल हिन्दू का विरोध करें | हम समानांतर मुस्लिम राजनीति का भी विरोध कर सकते हैं , और सहधर्मी नास्तिकों कि राजनीति का भी | और हमारा यह रुख सेक्युलरों और कम्युनिस्ट मित्रों को नागवार लग सकता है |

कृपया 2 सितम्बर , सायं 3 बजे शहीद स्मारक , गाँधी भवन के सामने आयें | मित्रजन - परिवार एवं विरोध उल्लिखित प्लेकार्ड के साथ ! धन्यवाद  !

 ...हम लोग बहुसंख्यक ईश्वर-वादियों के बीच रहते हैं, मानवता बहुसंख्यक ईश्वर-वादियों के कुचक्रों में फंसी कराह रही है, हम मानवता के पक्षधर हैं. हम सामाजिक और आर्थिक हर तरह के भेद-भाव को मिटाना चाहते हैं इसलिए जोर देकर कहते हैं कि हम 'नास्तिक' हैं.
Drafted by - Ram Kumar Savita

* तो चलिए , ईश्वर तो नहीं है |
लेकिन फिर ?
उसके बाद ?
उसके आगे ?
कुछ आदमी ,
कुछ मनुष्य है ?
क्या है मनुष्य ?
मनुष्य क्या है ?
और कुछ ?
यह दीन दुनिया ?
और - - - ?
कुछ तो है आखिर !
#  #

* हम सब अपना अपना जीवन जीते हैं | तो क्या हमें कहना चाहिए कि हम " जीवन वादी " हैं ? क्या ऐसा बताये बगैर हम जीवन नहीं जी सकते ? या हमारा जीवन तब क्या जीवन न होगा ?

* मैं बहुत गंभीरता से सोचता रहा हूँ - संत कौन ? इतना तो पाया - जो निहित स्वार्थ और लालच से मुक्त हो | लेकिन अपने शरीर, समाज और दुनिया से सर्वथा कटा, अलग, असम्पृक्त हो उसे संत मानने में मुझे थोड़ी दिक्कत रही है | पलायन नहीं, अलबत्ता दूर से मुक्तदृष्टा हो, चलेगा | फिर आया - जो अविच्छिन्न, अविचलित सत्यवादी हो | यहाँ मैं मात खा गया | मैं सत्य को देख और विचार तो सकता हूँ लेकिन खुला बोल , कह नहीं सकता | तो मैं तो संत नहीं हूँ , अपने निकष पर |

* हम जन्माष्टमी की बधाई दे ले नहीं रहे हैं | लेकिन इतना तो तय समझा जा सकता है कि 5 हज़ार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों को दुग्ध शास्त्र का पूरा ज्ञान था | दूध से दही बनाना , मक्खन निकलना , उसे सुरक्षित टांग कर रखना - -  | और यह भी कि तब ऐसी स्वतंत्रता थी कि राधाकृष्ण ग्वाल बाल सखा समेत रात रात भर रास लीला [ डान्स ] कर सकते थे | जैसा कि कथाओं से ज्ञात होता है - - और आगे गीता का ज्ञान तो है ही ----- !

* अल्पसंख्यक नास्तिक ( राजनीतिक )
* तो थोड़ी सी राजनीति हो जाए , अल्पसंख्यक सही ! जानते हैं हम BJP को क्यों नहीं सपोर्ट करते ? जब कि हम यह मानते हैं कि भारत " हिन्दू राष्ट्र " है , संस्कृति के अर्थों में | लेकिन यहाँ भी केवल शाब्दिक एकता है, शेष मतभेद है | वे सनातन को राष्ट्र मानते हैं , हम दलित संस्कृति को भारत राष्ट्र मानते हैं , और इसलिए सेक्युलर [ अस्पष्ट ] के स्थान पर ' दलित हिन्दू राज्य ' या अब तो ' नास्तिक हिन्दुराज्य' भी कह सकते हैं ' की स्थापना का पक्ष लेते हैं | लेकिन इनका देखिये | आसाराम का मामला तो अभी अधर में है |फिर भी उनकी वकालत क्यों कर रहे हैं जब तक जांच न हो जाय ? यह तो कुछ गनीमत है , पर असमय 84 कोसी यात्रा रोके जाने को धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बताना तो निहायत दकियानूसी बात है | ऐसे में इनके हाथ में हिन्दू देश कि तकदीर देना खतरे से खाली नहीं है , बागडोर सौंपना कतई असुरक्षित है | ये तो हिन्दू युवाओं को मंदिर के कंगूरे दे देंगे , और एक एक घंटा | लो बच्चो इसे हिलाओ , प्रभु के गुन गाओ , स्कूल मत जाओ | जब कि संविधान में राज्य की ज़िम्मेदारी है नागरिकों में विज्ञानिक विचार भरना | आगे वह हम लोगों का काम होगा बताना कि वैज्ञानिकता नास्तिकता में ही शरण पाती , फूलती फलती है | तो बताइए ऐसे गैर ज़िम्मेदार राजनीतिक दल को समर्थन कैसे दे सकते हैं ?

* देश में , समाज में , किंवा कम्यून में गरीबी है | तो इसका सीधा अर्थ यह है कि हम हार्दिक कम्युनिस्टों को चाहिये कि हम खुद गरीबी में रहें , गरीबों का जीवन जियें | बिना जिए गरीबी कि पीड़ा समझी नहीं जा सकती , और न कोई उपचार संभव होगा |

* डा डाभोलकर तो  न ईश्वर का विरोध कर रहे थे , न मज़हब और धर्म की मुखालिफत | वह तो केवल ढोंग - पाखण्ड - टोना टटका का विरोध कर रहे थे | तब भी मारे गए | हम लोग तो वह भी करते हैं जो वह नहीं करते थे | हम तो मज़हब और खुदा ( राहुल सांकृत्यायन ) के खिलाफ भी बोलते हैं | तो क्या हम सब मारे जायेंगे ? नहीं | कितनों को कोई मार पायेगा भला ? हम बहुत सारे हैं , अकेले एकलव्य नहीं |

[ विरोध भी किस हद तक ? किन तरीकों से ? वे जादू टोना करके भी तो मार सकते थे ? मतलब न तो उनके जादू टोन में कोई ताकत है , न उन्हें स्वयं उसकी शक्ति पर भरोसा |]

यह संतप्त मन का विषाद बोल रहा है कि यदि डाभोलकर मुस्लिम नागरिक होते तो देखता विरोध प्रदर्शन का जलवा ! जैसा कि इशरत जहाँ के केस में दिखा और आश्चर्य नहीं भटकल की गिरफ़्तारी पर दिखे ! बाटला इनकाउंटर में एक ही मुस्लिम , वह भी संदिग्ध , मारा गया था एक थानेदार की जान लेकर | और एक आरोपित आतंकी पुलिस क़ैद में - - - -  छोडिये

* डाक्टर डाक्टर से शादी कर रहे हैं | फ़िल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों से | अमरीकन अमरीकन से , अफ्रीकन अफ्रीकन से, अँगरेज़ अँगरेज़ से | तो यदि भारतीय भारतीय से , हिन्दुस्तानी हिन्दुस्तानी से , मुस्लिम मुस्लिम से , हिन्दू हिन्दू से , ब्राह्मण ब्राह्मण से , यादव - कुर्मी  यादव - कुर्मी में , बनिया बनिया में , हलवाई हलवाई में, जुलाहा जुलाहा में , दलित दलित में शादियाँ होती हैं तो परेशानी क्या है ? इसमें अमानवीय क्या है ? और जाति बाहर में प्रगति क्या ? क्या आप लोग चाहते हैं तमाम जनता कुंवारे रह जाएँ ? अभी तो जैसे तैसे लगभग सबकी हो ही जाती है ! मैंने कहा नहीं लेकिन जाने रहिएगा गरीब की शादी गरीब में और आमिर की आमिर में ही होगी | यह सबसे सत्य जाति है | भले तमाम छटपटाकर पैदायशी जाति को इधर उधर कर लें | तब भी उन शादियों का मूलाधार भी गरीबी - अमीरी ही होगा |

अल्पसंख्यक नास्तिक
( धार्मिक - सांस्कृतिक - राजनीतिक )
* "महजिदिया "
जब तक मेरी नानी दादी मस्जिद का नाम बिगाड़कर महजिदिया कहती थी, तब तक साम्पदायिक कटुता सुषुप्तावस्था में थी | मंदिर को वह मन्दिल बोलती थी | सब उन बुज़ुर्गों का पुण्य प्रताप था | अब, जब से शुद्ध उच्चारण का आग्रह हो गया है, मेरी माँ चुप है | साम्प्रदायिकता बडबोली हो गई है |

* स्वान्तः सुखाय -
भिखारी अपने पेट के लिए भीख माँगता है , मजदूर अपने परिवार के लिए खटता है , व्यापारी अपने मुनाफे के लिए दूकान रखता है, गृहिणी अपने बच्चों के लिए खाना बनाती है, डाक्टर अपने फायदे के लिए डिस्पेंसरी चलाता है, इंजीनियर अपने लिए,नेता भी अपने पक्ष में वोट पाने के लिए तमाम तिकड़म करता है | सम्पादक प्रकाशक भी अपने नाम -पद -धनलाभ के लिए पत्रिका - पुस्तक छापते हैं | लेखक कवि भी अपने सम्मान के लिए लिखते हैं | यहाँ तक कि बाबा तुलसीदास ने भी सारा कुछ घोषित रूप में स्वान्तःसुखाय लिखा |
लेकिन एक वर्ग (वर्ग ही कहना उचित होगा) हिन्दुस्तान में ऐसा है जो अपने लिए कुछ नहीं करता , लिखता पढ़ता | वह सब काम समाज और केवल समाज के लिए करता है | कविता , लेख , कहानी , उपन्यास वह सर्वजन सर्वहारा के लिए लिखता है | वह है हमारा प्रगतिशील , जनवादी , संस्कृतिकर्मी  और सशक्त विचारधारा से लैस वामपंथी |
मेरा सादर नमन उनको, खासकर इसलिए क्योंकि मैं तो किसी भी अन्य के लिए कुछ भी नहीं लिख पाता | सब कुछ मैं अपने , केवल अपने सुख के स्वास्थ्य के लिए लिखता हूँ | खेल खेल में , मनोरंजन के लिए |यह अपराध मैं स्वीकार करता हूँ |    

* द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का साधारण hindi में अर्थ है - दोगलात्म्क बात व्यवहार |

* Thank god ! I am not a born brahimin .

* आज तुम्हारी यादों की
बारिश में भीग गया

कपड़े धुल गए होंगे

सुखाकर इन्हें
कल फिर पहन लूँगा

फिर भीगूँगा
तुम्हारी यादों में |
#   #

* [कविता ] - " लम्हों ने खता की थी "
--------------------------------------------------
इतिहास अपनी बात
जल्दी पूरा ही नहीं कर पाता |
हें हें हकलाते हुए कहने में
सदियाँ लगा देता है ,
तब भी उसकी बात
पूरी होने में मुझे संदेह है
क्योंकि यह स्वयं
इतिहास को भी नहीं पता
कि कब वह चिल्ला पड़े -
सुनो भाई पुराणी मेरी बात
तब पूरी नहीं हुई थी ,
यह इतनी और बात तो
कहनी रह ही गई थी
अब सुन लो आगे की छुटी हुई बात,
और वह फिर शुरू हो जाय
अपनी बकवास लेकर !

क्या पता कब वह
सुकरात का मामला उठा दे
कब ब्रूनो गैलिलियो का और फिर
उसमें क्रुसेड घुसेड दे !
किसे पता कब यवनों का
आक्रमण बताने लगे
और आते आते जालियाँवाला
बाग़ भूलने न दे !

कुछ कहा नहीं जा सकता
कब उसे मथुरा काशी याद आ जाए
कब बाबरी गाने लगे ,
आजकल वह रामजन्मभूमि
खोद निकालने के कार्य में
जी जान से जुटा है |

ठहरिये, ठहरिये , यह फिर
ठहर सकता है पाँच साल
और फिर उठा देगा
पाँच हजार साल पहले का -
ब से बाभन , भ से भंगी का सवाल
म से मनुस्मृति के खोल दे पन्ने
और फिर कह दे - ले रख दे
इन्हें फ्रिज में, फ्रिज के फ्रीज़र में
मन तनिक विश्राम कर लूँ
बड़े काम हैं मेरे जिम्मे
थक जाता हूँ करते करते और
यह काम है कि कभी पूरा ही नहीं होता
ऐतिहासिक काम है यह
न जाने कब मुझे फिर जगना पड़े !
इस तरह इतिहास अपनी बात
कभी पूरी तरह पूरी नहीं कर पाता ,
इस पर फाइनल रिपोर्ट , क्लोज़र रिपोर्ट
लगाना इतिहासकारों के लिए
संभव नहीं होता ,
असफल हैं हिस्टोरियन
हिस्ट्री का कोई भी चैप्टर
बंद करने में |
इसी को कहते हैं -
लम्हों ने खता की थी,
सदियों ने सजा पायी ?
#   #

* कारण को भी
पार कीजिये, ऐसे
कार्य कीजिये !

* कारण को भी
पार कीजिये,
ऐसे भी कुछ
कार्य कीजिये !

* मन इतना
अपवित्र नहीं है
जितना तन !

* भटकल बा |
के भटकल बा हों ?
उहै मनई |
[ भोजपुरी हाइकु ]

[एक कविता ]                                                                                                                  सारे योद्धा ,                                                                                                                       अ -योद्धा में !                                                                                                                डरपोक कहीं के !
#  #

निष्कर्ष _
नरेन्द्र डोभालकर कि हत्या से निष्कर्ष निकलता है कि इस देश में अंधविश्वास ही चलेगा | इसके विरुद्ध कोई भी कोशिश - आन्दोलन व्यर्थ ही जाने हैं | यहाँ एक अंधविश्वास ही दूसरे अन्धविश्वास को हटाएगा | बुद्धिवाद Rationalism फ़ैलाने का कोई काम तो न ही किया जाय | मैं बहुत दुखी हूँ | 25 -26 सौ साल से बुद्ध महाबीर , 5 -6 सौ साल से कबीर रैदास फैला ही तो रहे हैं ? क्या अब हम इतने तार्किक न बनेंगे कि इनकी असफलताओं से कुछ सबक लें , अनुभव ग्रहण करें और अपना रास्ता बदलें | कोई भी , जो न्यूनतम कुछ तो सफल हो | यह तो मानकर ही चलना होगा कि मनुष्य मूल्त्तः विशवास से संचालित होता है | कहाँ हैं नास्तिक जन ?

* आज हम शोक मना रहे हैं | आज १२ बजे रात तक कोई सदस्य तर्क और विज्ञानं के पोस्ट न करे |

* बहुत अच्छी और उपयोगी बहस | मैं दोनों से सहमत हूँ | सैद्धांतिक रूप से दीपक से | विचार फैलेगा तो क्या कर लेगा ? अशक्त होगा संगठित धर्मों के आगे , और सिर्फ विचार बनकर किताबों में रह जायगा | सत्य जी व्यावहारिक हैं , और समर्थन योग्य | पहली बात तो इनके संगठन भेड़िया धसान हो ही नहीं सकता | फिर यदि मानवीय बुराइयाँ आती है तो आयें | अगली पीढ़ी पर भरोसा करें , वह ठीक करेगी या फिर नया बनाएगी | क्या कीचड़ लग जाने के भय से हम कीचड़ कि सफाई में न उतरें ? अभी अधिक तो नहीं कह सकता पर कोई उपाय कीजिये कि नास्तिको, बुद्धिवादियों कि संतानें भी वैसी बने | जिस प्रकार हिन्दू - मुसलमान के बच्चे हिन्दू मुस्लमान | और हाँ , राजनीति में नास्तिकों का पदार्पण सुनिश्चित करें | अभी सप्रदाय बनें न बनें |
 | नास्तिकता अपने आप में एक सम्पूर्ण समृद्ध सशक्त मानववादी विचारधारा है | उसमें व्यक्ति से लेकर समाज और साम्य सबका सर्वांगीण समावेश और समन्वय है |

* धर्म और राजनीति अलग चीज़ें हैं , यदि हम इस भ्रम से निकल आयें तो कुशल हो और कुछ तर्कसंगत रणनीति बनाई जा सके | ठीक है आप इस परिभाषा से सहमत नहीं हैं , लेकिन जिन्हें आयोजन करने हैं वे तो इसी परिभाषा के अनुसार सक्रिय हैं !

तुष्टीकरण = Appeasement
* खुश रहो अहले चमन हम तो सफर करते हैं "
यह कहा शहीदों ने हिंदुस्तान से | और यही कहते हैं हिन्दुस्तानी सेक्युलर भारत के मुसलमानों से |
लेकिन यह तो तुष्टीकरण है ! ?

* Shraddhanshu Shekhar
Sad News

Anti-superstition activist Narendra Dabholkar shot dead in Pune
Edited byDeepshikha Ghosh| Updated: August 20, 2013 10:36 IST
Pune: Renowned anti-superstition activist Narendra Dabholkar, who was pushing for law against superstition and black magic, was shot dead this morning in Pune, Maharashtra.
Mr Dabholkar was on a morning walk when he was shot near the Omkareshwar Bridge in the city by gunmen on a motorcycle. He died in the Sassoon hospital. More details are awaited.
The senior rationalist, known for his campaigns against superstition, Mr Dabholkar had for many years pushed for an anti-superstition Bill in the state assembly. He had also authored several books and was the editor of the "Sadhana" magazine devoted to progressive thought.

Narendra Dabholkar - Wikipedia, the free encyclopedia

http://en.wikipedia.org/wiki/Narendra_Dabholkar?seg=1

Prathak Batohi wrote:
"अन्धभक्ति अन्धविश्वास व् अंधउन्माद।

देश बड़ा है, बड़ा है सो बड़े स्केल पर चीजे है जैसे बड़ी आबादी और उस बड़ीआबादी की बड़ी अशिक्षा और बड़ी गरीबी। जब इन दोनों से निजात न मिला तो सबल की अंधभक्ति, भाग्योदय के लिए अंधविश्वास और अंधभक्ति अन्धविश्वास के घालमेल से बना अंधउन्माद इसकी बड़ी तीन बड़ी डेरिवेटिव समस्याएँ बन गई है। इनमे से एक अंधउन्माद की भेंट आज नरेंद्र दाभोलकर चढ़ गये है।

आज का दिन महाराष्ट्र में अंधश्रद्धा निर्मूलन में लगे नरेंद्र की जान लेकर उदय हुआ है तो यही दिल्ली में एक राजनेता की अंधभक्ति से परवान चढ़ा है। नरेंद्र की हत्या महज इसलिए कर दी गई क्यूंकि वे धर्म में तर्कशीलता या वैज्ञानिकता के पक्षधर थे। जब धर्म में तर्क आयेंगे तब धर्म में अन्धविश्वास व् कट्टरता भी क्षीण होंगी पर यह हर एक को सुहाएगा ऐसा संभव नही।

रिफार्म या सुधार हर समाज में आहुति लेकर ही आते है कहीं किन्ही को किसी स्मृति का दहन करना पड़ता है या कही जॉन हस सरीखा स्वयम दहन होना पड़ता है। अभी 15 अगस्त को ध्वजारोहण पर जो कुछ बिहार में हाशिये पर पड़े समाज पर हुआ वह भी रिफार्म के विरोध की परिणिती थी। आप अपने सुधारवादी संतो मसलन यहा संत रविदास के अस्तित्व को नही स्वीकारते।

बड़ी विडम्बना है आप नरेंद्र की हत्या पर मौन रहते है, बिहार की घटना पर मौन रहते है पर किश्तवाड़ आपको सालता है सरकारे आपको अकर्मण्य और अपराध अक्षम्य लगते है ।सोचिये हे मुख्यधारा समाज आप गैलिलेयों की प्रताड़ना पर मौन रहे,आप जॉन हस को जलाकर खुश हुए पर वही जॉन जब चिता से मिटटी बन कर उड़ा तो मठ के मठ ढह गये ह्स्माईट युद्धों से यूरोप की तन्द्रा टूटी और विश्व में प्रोटेस्टेंट का जन्म हुआ। घबराइये नही आप संत रविदास या नरेंद्र को जब जब हटायेंगे वे आपको प्रभावित किये बिना या प्रोटेस्टेंट बनाये बिना नही छोड़ेंगे। विशवास ना हो तो अपना कबाइली वैदिक इतिहास से सूफ़ी सिखी कबीरपंथी और सबको लीलकर समृद्ध हो चुके सनातन समाज को देख लो ।

* जब कुछ न कर पाओ तो शहीदों के जन्म दिवस , शहादत दिवस मनाओ |

* हैं अभी भी हुमायूँ बहुत देश में ,
कोई राखी तो बाँधे बहन की तरह !
[ लक्ष्मी चाँद दद्दा , गोंडा ]

* राखी की जय हो !
लखनऊ | शादी का झांसा देकर गौतम पल्ली क्षेत्र की तीन नाबालिग बहनों का आठ दिन तक दिल्ली के एक कमरे में यौन शोषण किया गया | यौन शोषण करने वाले तीनो आरोपी रिश्ते में भाई थे | [अमर उजाला 20 अगस्त ]
राखी का त्यौहार किसे मुबारक कहें ?


* बदल दिया
पुराना जो धर्म था
नया लाये हैं |

[Great News]
" इज्ज़त के डर से क्या अपना आनन्द छोड़ दें ? "
( ओशो नीरव / मीरा आनंद )

जाति प्रथा तो एक Gradation System जैसा है | इसलिए इसका आधार इतना मजबूत है कि इसे हटाया ही नहीं जा सकता | चाहे वह वर्गीकरण किसी भी प्रकार का हो | विज्ञानं , इतिहास , समाज शास्त्र आदि सभी अनुशासनों के अध्येता यही प्रणाली अपनाते है | यह आधुनिक इतिहास है , वैज्ञानिक युग है , मनुष्य स्तनधारी जीव है क्यों कहते हैं हमारे स्कूल ? और प्रथम से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक के लोग क्या हैं ?

Communists are Elitists of Rural India .
महाजनों येन गतः स पन्था |

और कोई सुविधा गावों में भले नहीं पंहुची , लेकिन गावों कि दशा के तमाम सर्वेक्षणों की बड़ी बड़ी रपटें तो ज़रूर पहुँच गयीं | गावों के बारे में जितनी सूचनाएं और आंकड़े NGO'S के पास है , उतनी किसी गाँव वाले को भी नहीं पता होगी |

जाति प्रथा तो एक Gradation System जैसा है | इसलिए इसका आधार इतना मजबूत है कि इसे हटाया ही नहीं जा सकता | चाहे वह वर्गीकरण किसी भी प्रकार का हो | विज्ञानं , इतिहास , समाज शास्त्र आदि सभी अनुशासनों के अध्येता यही प्रणाली अपनाते है | यह आधुनिक इतिहास है , वैज्ञानिक युग है , मनुष्य स्तनधारी जीव है क्यों कहते हैं हमारे स्कूल ? और प्रथम से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक के लोग क्या हैं ?


व्यवस्था खुद ही आतंकवादी पैदा करने में जी जान से जुटी हुई है |
- लखनऊ में रिहाई मंच पर डाक्यूमेंट्री फ़िल्मकार आनंद पटवर्द्धन |
* बहुत सही फ़रमाया पटवर्द्धन जी ! कहीं इस्लाम का नाम जुबान पर मत ले आना , वरना - - - ?
हाँ हिंदुत्व को इसमें शामिल कर सकते हो |


* कल 24 अगस्त कि शाम अपने गृह क़स्बा बेवां से बस्ती 45 किमी गया , लखनऊ कि बस पकड़ने के लिए | अच्छी बस देखकर सवार हुआ और तिक्त भी कटा लिया |बस चली तो बजाय अयोध्या - फैजाबाद ले जाने के वह मुझे फिर बेवां ले आई , और फिर उतरौला - गोंडा रगड़ गंज , कर्नलगंज , घुमाते हुए लखनऊ पोलिटेक्निक लायी | इस रूट से मैं बचना छटा था , वर्ना बेवां से ही इसकी बस ले लेता | कहाँ इरादा उनका था उसके पहले हमारी 84 कोसी परिक्रमा हो गई |
इस दौरान मुझे दो ख्याल आये | एक तो यह कि इस रूट की सड़कों को देखकर यह कहने का मन होता है कि इन इलाकों में M.P. , M.L.A. की ज़रूरत क्या है ?
दुसरे यह कि जब सामान्य आवागमन ही नहीं सुनिश्चित हो सका तो सपा सरकार अपनी व्यस्था पर अपनी पीठ कैसे ठोंक सकता है ? यह तो सरकार ने विश्व हिन्दू [ पता नहीं कौन से हिन्दू हैं ये लोग ? क्या हम लोग हिन्दू नहीं हैं ?] परिषद का ही मकसद पूरा किया !