गुरुवार, 29 अगस्त 2013

जैसा देश वैसा भेष -

जैसा देश वैसा भेष -
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यह ड्राफ्ट अधुरा पड़ा है | अधुरा तो अब भी रहेगा , फिर भी इसे भेज देना है | यह मित्र Byomkesh जी के एक ऐतराज़ से उपजा था | सन्दर्भ था सउदिया में रमजान माह में विदेशियों द्वारा कुले आम तावत उड़ाने और धमा चौकड़ी करने का | इस पर सउदिया को आपत्ति था और मैंने उनके पक्ष का समर्थन किया था | मूल कच्चा आलेख जोड़ने से पहले दो बातें लिखना चाहूँगा | पहला तो यह कि क्या आप चाहते हैं हर देश में धार्मिक अराजकता फैले ? हम इतने विश्व -प्रसार वादी क्यों बने ? कट मर कर एक घर में रहें , इससे अच्चा है चूल्हे अलग कार लें और सुख चैन अमन शान्ति से रहें | मुसलमान क्यों कहें कि अमरीका में जुमा को छुट्टी  करो , हम नमाज़ पढ़ेंगे ? और दुबई में रोज़ी के लिए गए हिन्दू इसकी मांग क्यों करें कि मंगल को हमें छुट्टी दो हम हनुमान जी का व्रत रखेंगे ? सब अपनी सांस्कृतिक सीमायें रख लें तो झगड़े कुछ तो कम हों !
दूसरा उदाहरन अभी कल ही गुज़रा त्यौहार कृष्ण जन्माष्टमी का है | बड़ी आपत्तियां हैं जनाब - सेक्युलर राज्य में सरकारी पुलिस लाइनों में यह क्यों मनाया जाए ? आपत्ति कतई नाजायज़ और निराधार है | भारत में सेक्युलरवाद का अनुकूलन भारत के हिसाब से करना पड़ेगा अन्यथा न सेक्युलरवाद सफल होगा न साम्प्रदायिकता रुकेगी | और सभी देशों में ऐसा ही होता है | ' IN GOD WE trust ' का सिक्का secular अमरीका में भी चलता है, और ब्रिटेन कि रानी ईसाई ही होती है , अपनी तमाम वज्ञानिक लोकतांत्रिक प्रगतिशीलता के बावजूद | हमें निश्चय ही अपनी सोच और निर्णयों में व्यावहारिक होना पड़ेगा |
अब पढ़िए मूल आलेख, जिसका मैंने पुनरावलोकन नहीं किया है | व्योम जी कि "भक्ति " विषय पर भी लिखना है | सोचता हूँ जल्दी ही उसे लिखकर अपना काम पूरा करूँ | उनके समूह में मैं नहीं हूँ पर वह हमारे समूह में हैं | वह इसे अवश्य पढ़ पाएंगे | इस पर अधिक खंडन मंडन वाद विवाद न करें तो ही शुभ | इसके आगे मेरे पास कोई ज्यादा जवाब नहीं है |
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बातें अभी घुमड़ रही है | वस्तुतः मैं समझने में असमर्थ हूँ कि लोगों की
असहमति किस बात को लेकर है |यह बात तो मैं अरसे से कह रहा हूँ और किसी
बुद्धिमत्ता -चालाकीवश बात कहाँ बदल रहा हूँ ? मेरी बात ठोस ज़मीन पर
आधारित है | जो मै कह रहा हूँ वही होना है और वही हो भी रहा है | हम
परिस्थितियों को अवश्य अनदेखा कर रहे हैं | बहुत वैश्विक सदाशयता ने अभी
तक तो काम नहीं, अलबत्ता भारत ने इसे खूब गाया और भूनाया | फिर, मैं
घृणा-द्वेष - अलगाव - असहिष्णुता की बात कहाँ कर रहा हूँ | विपरीत मैं तो
सामंजस्य -सहिष्णुता-तालमेल ही तो बिठा रहा हूँ ? भाई अपने अपने घर में
रहो, किसी के घर जाओ तो उसे मेजबान का घर समझो, मेहमान की तरह रहो | मैं
तो " जैसा देश वैसा भेष " की लोकनीति पर ही चलने का आग्रह कर रहा हूँ ,
इसमें त्रुटि कहाँ है ? यह ज़रूर है की मैं ऐसे हवाई आदर्श की बात नहीं कर
रहा हूँ जिसका पूरा होना असंभव हो | क्योंकि सामूहिक राजनीतिक नैतिक
व्यवहार अलग थलग रहकर नहीं किये जाते | हम कोई टापू हैं भी नहीं | वे
अन्योन्याश्रित, सापेक्षिक, तुलनात्मक विधि से संचालित होते हैं | इसलिए
मैं सम्पूर्ण व्यावहारिक पक्षों पर सोचता हूँ | विचारों को ज़मीन पर उतरने
लायक सोचता हूँ | मुझे कोई इधर उधर से टीपटाप कर कोई शोधपत्र दाखिल करके
डिग्री नहीं हासिल करनी, न ही लोकप्रियता |
चाहता तो मैं देशो का बंटवारा भी नहीं, तो क्या हम सभी देशों को एकीकृत
कर लेंगे ? मुझे आश्चर्य है कि हम इस बिल्कुल स्थूल तथ्य को क्यों न
देखने की जिद करते हैं ? एक हिन्द पाक का विभाजन तो रोक नहीं पाए, न इसके
पुनः एकीकरण की कोई सम्भावना ही है | और चले हैं विश्वगुरु बनने, विश्व
बंधुत्व का स्वप्न देखने | वह बिना किसी बैरियर के !
सपना तो चलो फिर भी ठीक | देखते रहे | लेकिन अभी, परस्पर प्रेम भाव,
सांस्कृतिक एकता के लिए यह कहाँ से ज़रूरी हो गया कि प्रत्येक व्यक्ति,
प्रत्येक व्यक्ति के गर्भगृह (Bedroom) में प्रवेश का हकदार हो, या इसका
दावा करे ? मैं तो सास्कृतिक बहुलता - विविधता (Pluralism ) को स्वीकारने
की बात कह रहा हूँ | विश्व सम्राट बनने की गरज से सारी मनुष्यता / जनता
की एकता की अनहोनी संकल्पना, खासकर जब तमाम आस्थाएँ, संस्कृतियाँ और धर्म
उसमे समाविष्ट हों, तनाव और फिर युद्ध तक का कारक हो जाता है | मैं तो
जनाब हट्टिंगटन के ' सांस्कृतिक महाभारत' को रोकने का प्रस्ताव कर रहा
हूँ | इसलिए मैं अभी भी मानता हूँ जिन्ना की सोच में कोई दोष न था | जिसे
सावरकर ने थोडा पहले ही समझ लिया था |
इसमें क्या दिक्कत है कि भारतीय (और ये वहां से लौट कर बताते भी हैं )
कनाडा जायें तो वहां गन्दगी (litter) न फैलाएं | और यदि कोई भारतवर्ष आये
तो यह मानकर, मन बनाकर आये कि यहाँ दीवालों पर पेशाब, खुले में शौच किया
जाता है, लोग इधर उधर थूकते हैं | यहाँ जातिवाद वगैरह का भेद और तद्जनित
संघर्ष हैं,भीषण गरीबी और आभाव है | यहाँ गोबर से घर लीपे जाते हैं,
गाय-पीपल पेंड़ - सांप पूजे जाते हैं |  इत्यादि | जिससे यहाँ आकर वह इन
पर नाक भौं न चढ़ाए, न अपमानजनक टिप्पणियाँ करके हमारा दिल दुखाये,
सांस्कृतिक आस्था को चोट पहुंचाए | ज़ाहिर है, टूरिज्म से हमारी राष्ट्रीय
आय ज़रूर अभी कम होगी | ठीक है जब हम बदलकर कुछ "सभ्य" हो जाएँ, तब जितना
हम उनके अनुकूल बैठें, उसी अनुपात में "हमरे गाँव" आयें | लेकिन अभी तो
इसी स्थिति से समझौता करें | इसी से शांति स्थापित होगी | यही तो मैंने
कहा ?
यह विचार यूँ ही दिमाग में नहीं आया | विश्वप्रेम अटूट रखते हुए भी जब
मैंने अपने विश्वास को बार बार टूटते देखा और पाया , तो मैंने इसके कारण
और निदान के लिए स्थूल विज्ञानं की ओर रुख किया |
और मैंने पाया कि यहाँ भी तो तत्व और पदार्थों का विश्लेष्ण उसे अलग अलग करके ही किया जाता है | यह sepal - petal - andrucium -gynecium है , यह एक दालीय-द्विदालीय , यह solid - liquid -gas hai . Yh Mammelia yh Reptile | अब मुझसे यह तो न पूछिए कि मनुष्य जब मैमेल्स कि श्रेणी में आता है तो वह सरीसृप reptile व्यवहार कैसे करने लगा ? :)  

सोमवार, 19 अगस्त 2013

जग में रहो , My posts ending 20 / 8 / 2013

* जग में रहो
जग में रमो नहीं
अच्छी नीति है |

* बहुत कुछ
मेरे मन में, तुम्हे
बताने को है |

* सब का सब
सब पैसों का खेल
पैसा ही पैसा !

* अराजकता
स्वयं तय करेगी
अपना रास्ता |

*सवर्ण हो या
आदमी बने रहो
दलित हो या |

* प्याज के बारे एक क्षीण स्मृति उभर रही है | कुलदीप नैयर या किसी अन्य की किताब में पढ़ा था | इंदिरा गाँधी ने अपने विवाह के अवसर पर प्याजी रंग की साड़ी पहनी थी |

* एक नयी हरकत मेरी शुरू हुई है | कमेन्ट करने के बाद मैं पूर्णविराम नहीं लगा रहा हूँ | न जाने फिर कुछ और लिखना पड़े !

* वास्तव में ईश्वर पर आस्था से हमारा ऐतराज़ इसलिए है , कि ईश्वर से मनुष्य  को कुछ छुट्टी मिले तब न आदमी कुछ सोचे !

* हम ईश्वर को नहीं मानते | तो क्या हम मनुष्य नहीं रहे ? लोग देखते तो ऐसे ही हैं !

* जब हम कुछ बड़ा होने कि कोशिश करते हैं तो जानते हैं क्या करते हैं ? हम बराबरी का सत्यानाश करते हैं |

* Communists are Elitists of Rural India .

* और कोई सुविधा गावों में भले नहीं पंहुची , लेकिन गावों की दशा के तमाम सर्वेक्षणों की बड़ी बड़ी रपटें तो ज़रूर पहुँच गयीं | गावों के बारे में जितनी सूचनाएं और आंकड़े NGO'S के पास है , उतनी किसी गाँव वाले को भी नहीं पता होगी |

* मुझे तो घर में काम करने वाले नौकर को भी नौकर करते अच्छा नहीं लगता |और इधर दलित भाई हैं जिन्हें दलित से इतर कुछ कह दो तो बुरा मान जाते हैं | कैसी उलटबासी है ?


नास्तिक The Atheist एक ग्रुप और है अलग | और वह ठीक चल रहा है | उसमे भी हमारे कई साथी  शामिल भी हैं | चिंतनीय है कि शुद्ध नास्तिकता कि बात वहीँ एक जगह चलाई जाय और हम यहाँ कुछ अपने विषय और उद्देश्य बदल लें | क्या राय है आप लोगों कि ?
एक और दिक्कत समक्ष आ रही है कि लोग निश्चय ही अपनी आस्था लेकर बीच में आते हैं | ग्रुप में आना और बहस में आना अलग बातें हैं |मसलन कहा जाता है आस्था निजी चीज है | अब इतनी primary बात पर कितना समय बर्बाद किया जाय ? निजी है तो हम यहाँ सार्वजनिक मंच पर क्यों हैं ? रहिये अपने निज में ! यह मौलिक बात तो मानकर चलनी पड़ेगी कि निजी आस्थाएं बनती कैसे हैं ? वे स्थितियां परिस्थितियां , परवेश हमारी चिंता के विषयों में हैं और होनी चाहियें | व्यक्तिगत कह कर उन्हें छोड़ा तो नहीं जा सकता ? किसी को नहीं पसंद तो वह पोस्ट को निजी रूप से पढ़कर चुप रहे | लेकिन ऐसा होता नहीं | अपनी आस्थाओं कि लडियां पिरोते रहते हैं और comments बेमकसद बढ़ते बढ़ते बिना कहीं पहुंचे रह जाते हैं | इतने पर भी किसी के विचार पर विचार का "निजी " संकल्प लेकर कोई सब्र करना तो जानता ही नहीं | बहरहाल ग्रुप के नए स्वरुप को सोच रहे हैं- -

* भारत का 'राष्ट्रीय ग्रन्थ ' कौन सा है ? इस पर मेरी राष्ट्रीय राय है - " गुरु ग्रन्थ साहेब " | यह 'ग्रन्थ ' है , यह सांप्रदायिक नहीं है | इसमें नीति - उपदेश हैं भारत के तमाम गुरुओं - कबीर - रैदास आदि सबके | यह संकलन है , न कि कोई आसमानी धार्मिक किताब | यह आलोचना से परे है | यह हिन्दुस्तान का आध्यात्मिक दस्तावेज़  है | मैं इस बात को आगे ले जाना चाहता हूँ और राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करना चाहता हूँ | होना भी चाहिए किसी भी राष्ट्र के पास उसका ' राष्ट्रीय ग्रन्थ ' | इस पोस्ट के लिए मैं आप की प्रशंसा करता हूँ कि इसके माध्यम से आपने इस मुद्दे को उठाने का अवसर दिया | मैं  इसे राष्ट्रीय मुद्दा मानता हूँ | [ राकेश ]

* Now , in independent India , there should be a law like - " RIGHT TO DIE OF HUNGER STRIKE " . It is also according to wishes of Dr B R Ambedkar.

* सुबह ही एक Documentary या वैज्ञानिक चैनेल का दृश्य सामने है | उसमे एक पुरुष डाक्टर एक महिला को खड़े खड़े ही प्रसव करा रहा था , और सफलता पूर्वक कराया | ज़ाहिर है ऐसे वैज्ञानिक प्रदर्शनों में शर्म या परदे का कोई स्थान नहीं होता | उसका यह प्रयोग था , जिसके पीछे अनुभव यह था कि मनुष्य एक जानवर ही है और उसका प्रसव भी जानवरों की तरह खड़े खड़े ही सामान्य और सुविधाजनक होगा |
बात सचमुच गौर करने की है | मैं इसे उसे अन्य व्यवहारों पर भी लागू करता हूँ | सब तो नहीं लेकिन सेक्स के मामले में भी वैसा ही है | सारे धर्म इसकी वर्जना में लगे और सब औंधे मुंह गिरे | मेरा सोचना है इस सम्बन्ध में जो भी नीति , कानून बने , मनुष्य की पशुता को स्वीकार करके बने तो वह ज्यादा व्यवहारिक होगा , और ग्राह्य |

* यह कोई अंग्रेजी राज तो है नहीं जो भूख हडताल से डर जाए !

[19 / 8 / 2013 ] नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा मुसलामानों को रिझाने का कार्यक्रम बना रही है |
- - तब तो मिल चुका उसको मेरा वोट !

* 19/8/2013/ ] अवधी और भोजपुरी का यह विभाजन ही गलत है | फिर तो मालिनी अवस्थी और मनोज तिवारी में झगडा तो होना ही था | जिस भोजपुरी पर आज इतनी दृढ़ता दिखाई जा रही है , मालिनी के अवधी गायिका होने के तर्क पर , उस भोजपुरी समाज का कार्यक्रमों में मंचों पर भोजपुरी "न बोला जाता " सुना है | इस तरह की क्षेत्रीयता उचित नहीं | देखा जाय तो हर व्यक्ति अपनी एक अलग ही भाषा अलग अंदाज़ में बोलता है | और हर व्यक्ति एक समाज होता भी है | तो ?

* उन सभी को धन्यवाद जिन्होंने जिंदगी में मेरा साथ दिया |
Thanks to each and everyone who accompanied me in my life .

* एक मित्र का ग्रूप के पाठकों से अनुरोध है कि " राजनीति , संगठित धर्म और आतकवाद " के अंतरसंबंधों को रेखांकित करते हए अपने तथ्यात्मक आलेख { प्रकाश्य पुस्तक के लिए } लिखकर निम्न    मेल पर भेजने का कष्ट करें -
priyasampadak@gmail.com

* और कुछ हो न हो , यह अनुभव ग्रहण करने योग्य है कि नास्तिक व्यक्ति भी चाहे पैदायशी संस्कार या सामाजिक राजनीति के कारण हिन्दू - मुसलमान दुनियादारी के दबाव में मजबूरन होता ही है, होना ही होता है | एक मित्र तो कहते हैं कि भारत में कोई जातिविहीन रह ही नहीं सकता | यह हिदू की ख़ास समस्या है | अब बड़ी जाति के तहत हिन्दू - मुस्लिम भी आ जाता है | मैं इसे पहले भी समझता था | लेकिन शावेज़ साहेब की इस आवाज़ पर कि नास्तिक में हिन्दू मुस्लिम क्या, मैं चुप कर गया | देखा जाय , शायद उन्ही की बात सच हो | लेकिन कहाँ हुआ ? वरना यदि यह क़ुबूल भी कर लिया जाय कि इस्लाम की आलोचना ज्यादा हो गई, तो भी नास्तिक शावेज़ साहेब को इससे क्या फर्क पड़ता | जब कि सच यह है भी नहीं और हिन्दू देवताओं, भगवानों , पुराणों रिवाजों आदि की खूब धज्जियां उड़ाई जाती हैं यहाँ | बल्कि यह इसी निमित्त था भी (है भी ), और मैंने इसी गरज से मुस्लिम मित्रों को थोडा इससे दूर रहने का निवेदन किया था | मुझे पता था कि चोट लगेगी | तथापि उन्हें मना तो किया नहीं जा सकता था | इसलिए मुस्लिम मित्र आये लेकिन स्वाभाविक था कि इनकी भी कुछ अवशिष्ट आस्थाएं इनके साथ थीं , जिससे इन्हें कथित [क्या सत्यशः] हिन्दू आलोचनाएँ बुरी लगीं | इसका मुझे निजी तौर पर बहुत खेद है | हम इससे बचना चाहते हैं | इसलिए हम शायद यह निर्णय लेना चाहें कि ग्रुप हिन्दू नास्तिकों के लिए हो | अनावश्यक विवाद और वैमनस्यता हमारा उद्देश्य नहीं | आ बैल मुझे मार तो गलती से हो गया | मुस्लिम नास्तिक यदि चाहें तो ग्रुप बनाकर अलग से चर्चा करें | वह ज्यादा मुनासिब होगा और उसका कुछ फायदा भी होगा | किसी चर्चा से किसी को तकलीफ हुई तो मैं माफ़ी चाहता हूँ | हमने ऐसा चाहा न था | एक तजरबा तो ज़रूर हो गया |

- Alok Chantia [Astt Prof. SJN]PG college Lko . @ All India Rights Organisation ]
To live in a certain geographia does not manifest one’s right to be a true/real citizen of that country. The Law or Constitution of a country decides only parameters of citizenship and if any one fulfils it, he/she may be a legal citizen of that country, but ethics, values and self consciousness are some other parameters which decide whether a person has/ has not the quality to be a citizen of that country.

If a person, who lives in a country gets job, livelihood and protection but does not know his/her right in that country, may be subjected to violence of some kind or the other. In general practice when we talk about common law which empowers a person as real citizen, almost every person denies to have any concern with it. And that is the reason why we find dozens of stories of Human Rights Violation across the country and at the global level as well. To lead a life of equality and dignity, one needs to adhere to common features of Human Rights as described in the Charter of United Nation Organisation (UNO). The tenets of Human Rights of UNO may or may not have been incorporated by any country of this globe according to their law and constitution for the protection of Human Rights. Violation of Human Rights is not a rare subject on the path of human cultural evolution.

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

Black & White Board ending 15 August 2013

* [ कविता ?]
हाँ मैं बीमार हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपकी जाति का नहीं हूँ
आप मेरी नाड़ी देखें या नहीं ,
हाँ मैं बीमार हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपके धर्म से सम्बंधित नहीं हूँ
आप मेरा सर दबाएँ या न दबाएँ ,
हाँ मैं निश्चित अस्वस्थ हूँ
लेकिन मैं आपको बता दूँ
मैं आपके सम्प्रदाय का नहीं हूँ
आप मेरे लिए दवा लायें या न लायें ,
हाँ मैं मरण शैया पर हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपकी पार्टी का नहीं हूँ
चाहे आप मुझे दफनायें या न दफनायें ,
अलबत्ता मैं आदमी हूँ
और फिलहाल बीमार हूँ |
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* Indian democracy nascent stage में है | प्रौढ़ नहीं है | बन्दर के हाथों में उस्तरे न पकडाईए - ये RTI , right तो recall वगैरह | ये बहुत पढ़े लिखे लोगों के राजनीतिक सोसे हैं | अभी तो यहाँ मौलिक नागरिक चेतना का ही इतना अभाव है | ये इन अधिकारों को संभाल न पायेगे और सिवा इनके दुरूपयोग के और कुछ न होगा | हाँ यदि इस लूली लंगड़ी आज़ादी को चलने न देना हो , अड़ंगे ही लगाना हो तो और बात है | और दूंध कर  लाईये कुछ अधिकार | मैंने भी एक ढूँढा है - right to die of Hunger Strike | समर्थन करेंगे न ?

नास्तिकता का उपरान्त :-
यह मैं बहुत पहले से सोच रहा हूँ , आज व्यक्त कर रहा हूँ | कि दुनिया की असली समस्या तो नास्तिकता के बाद शुरू होती है | ईश्वर तो एक झूठी समस्या है जिसे आस्तिकों ने अनावश्यक कड़ी कर दी और उसे हटाने के लिए हमें अपनी शक्ति जाया करनी पड़ी | लेकिन असली जिन्दगी कि लडाई तो इसके आगे है | मित्र पुष्प जी अभी अपनी व्यथा बता रहे थे कि मुझे भी कल साक्षात कई झटके लगे | एक नास्तिक तो सुबह से शाम तक ब्राह्मणों को गाली ही देते रहते हैं |पुष्पेन्द्र जी सोचते हैं कि इन लोगों को जाति कि सीमाओं से निकल चुकना अपेक्षित था | कल एक विज्ञानवादी जी ने फरमाया - इस्लाम सर्वाधिक वैज्ञानिक धर्म है | किसी ने कहा उम्दा साहित्य केवल वामपंथी सृजित करते है | आदि आदि | अब क्या किया जाए | तब हम यह रास्ता निकलते हैं कि नास्तिकता भी एक व्यक्तिगत आस्था ही हो सकती है | उसके आगे तो व्यक्ति स्वतंत्र है अपने निर्णय लेने में |सबका अपना दिमाग है , ठीक है कि वह ईश्वर या धर्म द्वारा संचालित नहीं है | पर वह फर्क फर्क तो है | नास्तिकता एक सीमित एकता का आधार ही बन सकती है | तदुपरांत कोई कम्युनिस्ट होगा कोई भाजपाई, हिंदी वादी - अंग्रेजी वादी होगा , इत्यादि लौकिक तफरके | और हममें कोई मौलाना तो है नहीं जो फतवे जारी कर दे [औरत को अपना चेहरा केवल अपने भाई -बाप को ही दिखाना चाहिए, कल का ताज़ा फ़तवा ] और सबको एकमत कर दे |
इसलिए हमें इसकी आशा छोड़ देनी होगी | यही लोकतंत्र का तकाज़ा है | सभी को अपना विचार बनाने की स्वतंत्रता है | नास्तिकता कि यह पहली शर्त है | पुष्पेन्द्र जी , सविता जी, दीपा जी और मैं उग्रनाथ यह सुन लें कि हमें संतोष करके अपने अभियान में यहीं रुक जाना चाहिए | सबकी वैचारिक / अभिव्यक्तिगत स्वतंत्रता का आदर करना चाहिए | मानना होगा कि हमारी तरह सबके पास बुद्धि है और उसका प्रयोग करना उनका अधिकार है | हमने बस इतना किया कि धर्म और ईश्वर से मुक्त अपना चिंतन करो | बस यही तो ? फिर हम यह क्यों जिद करें कि सब मेरी ही तरह सोचें ? फिर तो हम धर्म की तरह हो जायेंगे, जो हम बिलकुल नहीं चाहेंगे, चाहे कितना ही नुकसान हो जाय संगठन का |
यही क्या कम है कि हम नास्तिकता तक सहमत है ? फिर सेक्युलरवाद की वह परिभाषा याद आती है कि धर्म एक व्यक्तिगत चीज़ है | उसी प्रकार नास्तिकता भी व्यक्तिगत आस्था क्यों न बना लें हम भी ? इसीलिए मैं कह्देता हूँ - नास्तिकता हमारा धर्म है , तो मित्र नाराज़ हो जाते हैं | नहीं नाराज़  होना चाहिए | उसी उत्साह केसाथ हमें इसका प्रचार प्रसार करना चाहिए | मनुष्य का मानस मुक्त होगा तो वह कभी न कभी कोई न कोई सही रास्ता निकाल ही लेगा | अपने को माँजते रहने कि ज़रुरत है |हमारी दृष्टि से यह ओझल नहीं है कि जो सारे लोग नास्तिक हैं वे सब सचमुच " नास्तिक " हुए नहीं है |फिर भी हमें उनके बुद्धि - विवेक पर विशवास करके ही आगे बढ़ना होगा | आगे कि असहमतियां अलग रखें , अभी हम यह देखें कि कोई भी जन नास्तिक होने के नाते समाज में अपमानित न होने पाए | मनुष्य कि गरिमा हमारे लिए सर्वोच्च है | उनकी भी जो अंध आस्था के गर्त में पड़े हुए हैं | मनुष्य से प्रेम हमारा कर्तव्य ही नहीं , हमारी ज़िम्मेदारी है | क्योंकि हम ईश्वर को नहीं मानते |

* यूँ तो सर्व 'काम' मय सब जग जानी , लेकिन मेरे ख्याल से आलिंगन - चुम्बन को सेक्स की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए |

* छोडो यार, क्या ईश्वर के चक्कर  में पड़े हो ? वह बहुत दूर कहीं ऊपर रहता है | वहाँ तक पहुंचोगे तब भी वह मिलेगा यह निश्चित नहीं है | और अगर कहीं चढ़ते चढ़ते धर्म की कोई रस्सी हाथ से छूट गयी तो ऐसा गिरोगे कि हड्डी पसली एक भी ढूँढने से न मिलेगी | और उसके पास कोई ट्रामा सेंटर भी नहीं है जहाँ तुम्हारा इलाज हो सके | उसके पास सिर्फ मर्चरी, स्वर्ग-नर्क ,यानी केवल मरने के बाद का ही प्रबंध है | जिंदगी के तो सारे सामान यहीं, इसी दुनिया में हैं | इसे छोड़ कही न जाओ भाई , जब तक जिंदा हो | और न किसी ईश्वर को ध्याओ |

* विशिष्ट अभिव्यक्ति :-
" सारे भ्रम जानकर
सारे भ्रम में पड़ा | "
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* परिवर्तन की हवा ज्यादा तेज़ हो तो दियासलाई की तीली भी बुझ जाती है |

* अतिसुन्दर ! बड़ा ही सजावटी चित्र है यह | संभाल कर रखो | कैलेन्डर छपवाने के काम आएगा |

मौत जीते हैं हम, क्षण क्षण | ज़िन्दगी नहीं जीते , जिंदगी भर !

* हम जिधर भी चल रहे हों , यदि उधर देखा करें ,
बुरी घटनाएं बहुत सी राह से हटती बनें |

* मेरा मतलब यह था कहने का -
एक हमारा घर हो रहने का |
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मैं अनुमान कर रहा था कि यदि मनु न होते, या अभी ब्राह्मण न होते | तो ये तमाम दलित लेखक क्या एक दो भी लाइन लिखना सीख / जान पाए होते ? अभी तो ब्राह्मण विरोध में लिखकर कुछ अभ्यास हो जाता है लिखने का , हाथ साफ़ हो जाता है |
क्या माना जाय कि यह भी ब्राह्मणों की एक सूक्ष्म साजिश / चाल है जिससे ये कुछ इसी बहाने पढ़ना लिखना सीख जाएँ ?
मैं सोच रहा था यदि किसी विद्यालय में मनुवाद की शिक्षा पाठ्यक्रम में रखी जाय तो उसे पढ़ाने के लिए दलित शिक्षक ही रखे जाएँ | मनुवाद की सबसे अच्छी शिक्षा वे ही दे सकते हैं |
[ भूल चूक माफ़ करेंगे ]

3 अगस्त / मैथिलि शरण गुप्त जी की 128 जयंती पर राय उमानाथ सभागार के कवि सम्मेलन में श्री नासिर अली नदीम ने इतनी सुंदर शुद्ध हिंदी की ग़ज़लें सुनाई कि फिर उसके बाद कुछ सुनने को बाक़ी न रहा | उन्होंने मुशायरा जीत लिया | और मैं फिर चला आया |

जानने का अधिकार RTI के बारे में मैं कभी निश्चित नहीं रहा | हाँ बताने का अधिकार { RTI - Right to Inform ] को अवश्य उपयोगी मानता हूँ |

एक मित्र अपनी नास्तिकता का श्रेय धर्मों कि तुलना को देते हैं | वैसा कुछ तो मेरे साथ भी हुआ , लेकिन उससे ज्यादा मिझे मेरे गाँव कि बुनावट ने नास्तिक बनाया | जब मुझे अपने धर्म जाति सम्प्रदाय का बोध कराया जाता तभी मैं सोचता कि यदि मैं अपने घर के दस मीटर दायें पैदा होता तो मैं बनिया होता | सौ मीटर बाएं उत्तर दिशा में पैदा होता तो खां मुसलमान और दो सौ मीटर आगे मालिक मुसलमान होता | फिर अगर सौ ही मीटर दाएँ दक्षिण ओर किसी घर में जन्म लेता तो चमार , और सौ ही मीटर सामने पूरब के किसी घर में टपकता तो पासी होता |
तो ऐसा क्या हो गया जो घटना - दुर्घटना / संयोगवश इसी घर में पैदा हुआ ? बस इतने भर से इतना अंतर कैसे हो गया ?

* नास्तिकता को चलने दीजिये ऐसे ही , फैशन के तौर पर ही सही | कुछ तो असर करेगी आप लोगों की संगत उन पर ? मुस्लिम मित्र भी हैं | जो भी उनकी मजबूरियाँ हों या चाहतें | जो यहाँ आये हैं अपने मन , अपनी इच्छा और प्रेरणा से आये हैं | मेरा ख्याल है जो खुद को नास्तिक कहता है वह पर्याप्त नास्तिक है हमारे लिए | जैसे यदि कोई अपना परिचय हिन्दू , मुसलमान, यादव आदि कहकर देता है तो क्या हम उससे पूछने जाते हैं - तुम क्या क्या मानते , पालन करते हो ? आगे का काम उन्ही पर छोड़ दिया जाय | हमारा काम एक सीमित सहमति बनाना है |

कम्युनिस्टों के बारे में एक बात तो पता चलती है कि ये बहुत पढ़ते हैं (केवल एक किस्म की किताब ), पढ़ने वाले लोग होते हैं , पढ़े हुए | लेकिन बस , इसके आगे कुछ नहीं |

* पोस्ट्स को पढ़ने का एक मकसद जनमत को जानना भी है / होना चाहिए | सिर्फ जिदपूर्वक विवाद करना नहीं |

* जैसे आस्तिक हिन्दू आदमी होते हैं , मुसलमान -सिख -ईसाई भी आदमी होते हैं | वैसे ही नास्तिक भी आदमी होते होंगे ! चलिए मिलकर देखा जाय !

फिर नागरिकता का मतलब क्या हुआ ?
मेरा आशय था कि देश मात्र रैखिक सीमायें नहीं बल्कि सांस्कृतिक अवगुंठन भी होते हैं , और उस सांस्कृतिक नीचता या महानता को देश के भीतर रहने वालों को और विदेशी आव्रजनों को स्वीकार करना चाहिये | तब मित्र नाराज़ हुए थे | मैं हिन्दू संस्कृति क्यों मुसलमानों पर थोपना चाहता हूँ - ऐसा कुछ ऐतराज़ था उनका | जब कि मैंने स्पष्ट किया था कि इस प्रकार तो मैं अरब की इस्लामी संस्कृति के संरक्षण की कोशिश कर रहा हूँ | न मैं अमरीका में मंदिर बनाऊं , न कोई भारत में दारुलिस्लाम फैलाये |
चलिए विरोध के चलते मैं अपनी बात वापस तो ले लूं | लेकिन एक प्रश्न छोड़ने के बाद | कि फिर नागरिकता का मतलब क्या हुआ ? क्या जेब में कागज़ एक देश कि नागरिकता का और मन में संलग्नता किसी अन्य मुल्क की सिटिजनशिप की ?

* यह देश अपनी महानता के कारण बर्बाद होगा | और महानता है कि इसके बगैर यह देश रह नहीं सकता |
भारत के नागरिक बड़े महान हैं |

* धर्म का मेरे लिए मतलब होता है Concern से | जब मैं पूछूं आपका धर्म क्या है , तो समझिये मैं पूछ रहा हूँ आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ? क्या सोच रहे हैं आप ?

* वैज्ञानिकता और नास्तिकता एक ही चीज़ें हैं , और वे भारत की धरोहर हैं | देखिये कही ये धरी की धरी न रह जाएँ !
अलबत्ता वैज्ञानिकता में वह महानता, वह आकर्षण कहाँ, जो लफ्फाजी में है |

* हमारी कोई गलती नहीं | हमें कोई अहंकार नहीं | हम कोई गुस्ताखी नहीं करते | दरअसल ईश्वर है नहीं तो हम क्या करें ? उसी बात का प्रचार करते हैं | उसका होना तो लोगों ने झूठ मूठ फैलाया हुआ है , और उसके बहाने मनुष्य का शोषण कर रहे हैं , आदमी का जीना दूभर किये हुए हैं | तो क्या हम उस धुंध को न मिटायें ? नहीं तो जैसा आप लोग कहिये |

* :) अज्ञात व्यक्ति / हर व्यक्ति को सम्मान देना लोकतंत्र का वृहद् अनुशासन है | जान कर ही सम्मान दिया तो क्या दिया ? अनजान को भी सम्मान दें , इसमें इंसानियत कि पराकाष्ठा है | बच्चों का मामला ज़रूर है | चाहे पैर छुवाये  या कुछ और , हर समाज में सम्मान प्रदर्शन की कवायदें हैं | और उसे दम्पति अपने संतानों को सिखाएगा ही | चाहे जापानी तरीके से झुककर  या अंग्रेजी - इस्लामी विधि से हाथ मिलाकर | निजी तौर पर मुझे पैर छूना , हाथ मिलाना नहीं अच्छा लगता | दोनों हाथ जोडकर प्रणाम करना भर मुझे प्रिय है |इसमे स्त्री पुरुष का भेद नहीं बरतना पड़ता | बच्चों को भी नमस्कार करना भर बताया | अब दुसरे लोग और उनके बच्चे मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं उस पर मेरा कोई वश नहीं , न मैं उसमे हस्तक्षेप करता हूँ | लेकिन एक बात [ निंदा का पात्र बनने का खतरा उठाकर भी ] कहना चाहूँगा कि यदि  चरणस्पर्श भी किसी का सांस्कारिक अभिवादन है तो इससे उस व्यक्ति या समाज की हेठी नहीं हो जाती | उस दशा में जब कि हम देखते हैं एक दुसरे के नक् से नाक रगड़ना , चुम्बन लेना भी अभिवादन के तरीकों में शुमार है | मनुष्य का पैर कोई गन्दा वस्तु तो नहीं है भाई !

* कोई भी धर्म मनुष्य कि इच्छा के बगैर उसे नैतिक नहीं बना सका , नहीं बना सकता | अपनी नैतिकता स्वयं आविष्कार - अंगीकार कीजिये |

* Shraddhanshu Shekhar asks :-
Why do human being give importance to self centered activities ?
और यह हमारी चिंता का विषय है, हमेशा रहा है | बल्कि हमारी नास्तिकता एक वैकल्पिक नैतिकता के रूप में हमें इसीलिए ग्राह्य हुयी क्योंकि हमने देखा कि धर्म मनुष्य को नैतिक बनाने में असफल रहा है , बल्कि उससे उसका बुद्धि विवेक छीन कर उसे अनैतिक बना दिया | लेकिन अब तो हमारा दिमाग स्वतंत्र है अपनी नैतिकता विकसित करने के लिए | फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि स्वार्थ सर चढ़कर बोल रहा है ?
मैं तो कभी आश्चर्यचकित होता हूँ कि किस प्रकार कथित विज्ञानवादी अपनी बुद्धि को किसी व्यक्ति या वाद के प्रति अंधसमर्पित कर देते हैं |और वह भी किसी cause, उद्देश्य के लिए नहीं,बल्कि छोटे स्वार्थों के लिए - हमारा नाम हो, पहचान हो, सामूहिक ताक़त हो etc | वे सही हो सकते हैं और अपना मार्ग चुनने की उन्हें आज़ादी है , लेकिन कभी कभी सामने रखे स्पष्ट तथ्य और तर्क को जब वे नज़र अंदाज़ कर देते है, और रूढ़ विचार रखते हैं, तब पीड़ा होती है | अरे, कुछ तो अपनी बुद्धि का इनपुट होना चाहिए, कुछ अपनी प्रज्ञा - अपना संकल्प, अपनी व्यक्तिमत्ता, या सब कुछ किसी विचार का अनुगमन, भले ही वह विचारक व्यक्ति कितना ही बड़ा हो ? [ऐसा तो हमारे गौतम ही कह गए ] |
कहना पड़ता है गज़ब है सृष्टि का सर्जक तत्व, जिसे ज्यादातर लोग ईश्वर कहते हैं ! क्या उसने मनुष्य को इसी तरह, इसीलिए बनाया ही है कि वह हमेशा दिमाग से गुलाम रहे ? मनुष्य की मुक्ति का मार्ग क्या है ? निश्चय ही स्वार्थ साधना इसमें एक बड़ा बाधक है | स्वार्थ से मुक्ति ही मानव मुक्ति है |इसीलिए पूछते हैं मित्र  -Shraddhanshu Shekhar :- Why do human being give importance to self centered activities ?
क्या कोई उत्तर है किसी के पास ? और कोई तरीका ?

[मैं अपनी त्रुटि स्वीकार करता हूँ कि यह नास्तिकता के आगे का प्रश्न है ,जिसे हम इस समूह में नहीं बढ़ाना चाहते थे |इसलिए इसे सामान्य चर्चा के लिए " प्रिय सम्पादक " समूह में भी ले जा रहे हैं , जहां आस्तिक मित्र भी होंगे ]

* वन डे मातरम् !
वन्दे मातरम् के वोर्ध में कुछ आपत्तियां है जो स्वयं आपत्तिजनक है | हर मुल्क कुछ नाटक गढ़ता है , अपना होना सिद्ध करने के लिए , जिसे देश केसारे नागरिक मिलकर अभिनीत करते हैं | एक झंडा , एक राष्ट्र गान कुछ राष्ट्रीय प्रतीक | इनका कोई तर्क नहीं होता | तमाम अंधविश्वासों और धार्मिक मान्यताओं को आँख बंद करके वन्दे गीत में तर्क ढूंढते हैं तो या तो विज्ञानवादी आशा जगती है या फिर हंसी और रुलाई आती है | लेकिन जीवन और समाज के सारे काम तर्क से नहीं चलते , यह वह भी जानते हैं और हम भी | तब वन्दे का विरोध समझ से बाहर हो जाता है | हम भी कोई देशभक्त नहीं हैं, बल्कि हम नास्तिक तो देश के नाम पर कलंक कहे जाते हैं | फिर भी राष्ट्र धुन पर उठ खड़े होते हैं | उठाना चाहिए | यह देश ही नहीं आन्तरदेशीय नियम और परंपरा है | हर देश में इसके उल्लंघन पर सजा का प्राविधान है | न भी हो कानून तो क्या बिना सर पर रूमाल बांधे या टोपी लगाये कोई फुरुद्वारा में जाता है या नमाज़ पढ़ता है | इसी तरह झंडा गान भी एक सेक्युलर आडम्बर है | फिर , कौन देखता है खड़े होकर कौन क्या करता है | बहुत से केवल चुप खड़े रहते हैं, और कोई एतराज़ नहीं करता | क्या यह भी कोई मुश्किल काम है ? हमने बहुत से कौम के युवकों , अभिनेता , कलाकारों को कैसे कैसे तो गाने गाते  नाचते देखा है, हम अनभिग्य नहीं हैं क्या क्या कौन क्या करता है | तो वाही गाईये रैप संगीत में - वन डे मातरम् ! हम सुन लेंगे आप गा रहे हो - वन्दे मातरम् ! ध्वनियों में हम इतना फर्क नहीं करते | लिखने में करते हैं | तो आपसे अपनी देशभक्ति का प्रमाणपत्र  लिख कर देने को कौन कह रहा है ? जबानी जमा खर्च है भाई | क्या इतना भी नाटक नहीं कर सकते ? नहीं कर सकते तो भी सही | लेकिन यह घोषित करना कि हम नहीं करेंगे एक अपराध है, जिससे किसी का लाभ नहीं होता | लेकिन नुक्सान होता है ऐसी कौम का | क्योंकि जिस तरह आप राष्ट्र गान न गाने को स्वतंत्र हो उसी प्रकार शेष जनता आप के बारे में कोई राय बनाने के लिए भी तो स्वतंत्र होगी ? कोई उसे कैसे रोक सकता है ?  

खुदा के अतिरिक्त किसी के आगे सर नही झुकायेंगे |
लेकिन यह है कौन 'खुदा '? यह भारत या हिन्दुस्तान में पूछा जायगा | यहाँ प्रश्न चिन्ह कि परंपरा है | है तो शास्त्रार्थ कि भी , जिसे हमने सम्प्रति बंद कर रखा है | तो , कहाँ रहता है खुदा ?बास्तिकों की बात कोई नहीं मानता तो आप भी न मानिए |अलबत्ता इसकी पूरी और सशक्त परंपरा भारत / हिंदुस्तान में है |लेकिन संशयवादियों [ agnostics] की  तो  सुनिए , जो ईश्वर के बबरे में परिभाषित करते हैं - "वह इस कमरे में नहीं है "|इसे सेक्युलर देश के सन्दर्भ में सेक्युलर आन्दोलन के पुरोधा / प्रणेता चार्ल्स ब्रॉड ला के हवाले से कहा जा सकता है - ' इस देश में ईश्वर नहीं रहता ' | तो फिर किसके आगे सर झुकाओगे ? किसी के भी आगे सर न झुकाऔ | न देश की  वंदना करो न भगवान् की |

[उवाच ]
* अपनी कमजोरी मान लेना भी बहुत बड़ी ताक़त है !

* यदि हम उसके व्यवहार से प्रभावित हैं तो चलें उसकी बातें भी सुनें !
[Means - Behavior is the most influential talk ] , talkatism ?  ? ha ha ha :)

ईश्वर ही ईश्वर
समझ में नहीं आता , मेरे मन के चारो तरफ , हर कोने में ईश्वर ही ईश्वर ही ईश्वर क्यों बैठा हुआ है , जिसका विरोध करने को मैं विवश हो जाता हूँ ? :)

* रिहाई हो रिहाई
Amnesty का में बहुत पुराना समर्थक  हूँ , और कट्टर मृत्यु दंड विरोधी | राजनीतिक नुकसान कुछ भी हो | मैंने अफज़ल / कसाव ककी  माफ़ी के लिए ऐसे मंचों से बोल दिया कि सेक्युलर मित्र भी सकते में आ गए |
लेकिन यहाँ तो मामला महज़ रिहाई का है | समस्या आसान है इसलिए सुलझाना कठिन | कोई मंच बना हुआ है | आमंत्रण मुझे भी था पर मैं शामिल नहीं हुआ | यह केवल मुसलमानों के हितार्थ  है |शामिल कोई भी हो सकता है, इसलिए तमाम सेक्युलर / वामपंथी इससे जुड़े हैं | विडम्बना यही है कि इनके सारे कार्यक्रम सिर्फ मुस्लिमों के लिए होते हैं | ये न भोपाल गैस काण्ड पर बोलेंगे , न 1984 के खिलाफ |
तो सम्प्रति मुद्दा निर्दोष मुस्लिम युवकों को पुलिस द्वारा आतंकवाद के आरोप में फंसाने के खिलाफ है और ये उन्हें छुड़ाना चाहते हैं | मुलायम सरकार भी तैयार है | न्यायपालिका को कुछ दिक्कत है लेकिन वह कितने दिन कायम रहेगी | उनकी शंका और आपत्ति दूर कार दी जायगी क्योंकि जैसा कि कथन से स्पष्ट है इन्होने यह पक्के तौर पर मान लिया है कि ऐसे सारे के सारे मुस्लिम युवक " सर्वथा और पूर्णतया निर्दोष " हैं , भले उनके खिलाफ ऍफ़ आई आर पर जांच भी कुछ , या बहुत आगे बढ़ चुकी हो ||फिर तो क्या दिक्कत है ?
मेरी दिक्कत यह है कि मृत्युदंड की मुखालिफत करनी होती तो चल जाता | लेकिन यहाँ तो राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और न्याय प्रणाली को ही धुल चाटना है | अब क्या करें यदि मान भी लें कि हमारी पुलिस कुछ पूर्वाग्रह ग्रस्त और अत्याचारी है | कहाँ से लाये निष्पक्ष फिर भी स्मार्ट पुलिस फ़ोर्स ? इनके बारे में तो सामान्य मान्यता है कि इनसे न दोस्ती अच्छी , न दुश्मनी | और यह भी कि इनके द्वारा अपराधी कम भले सज्जन ज्यादा प्रताड़ित होते हैं | लेकिन यह सबके लिए है कवक मुस्लिमों के लिए नहीं | अब सबके लिए तो बोलने वाले कोई नहीं है , इनकी सुविधा के लिए रिहाई मंच ज़रूर बना हुआ है |
तो राजनीतिक रूप से मरता क्या न करता | गोकुला में जो रहना है तो राधे राधे कहना है | और जब कहना ही है तो यह क्यों न कहें कि हमारे इन मोअज्जिज़ मेहमान के युवा संतानों को किसी भी दशा में पुलिस न पकडे , न जेल भेजे , भले ये रेंज हाथों इस भ्रष्ट पुलिस द्वारा पकडे जाएँ | केवल वाही युवक छुए जाएँ जिन्हें रिहाई मंच खुद पकड़ कर लाये और लिखित अनुरोध करे कि इन्हें सजा दी जाय | अब तो शायद यह प्रस्ताव ठीक है !

मुझे मालूम था कि
प्यार के चक्कर में
नहीं पड़ना , नहीं पड़ना ,नहीं पड़ना |
जाने क्या बात हुई -
ऐन वक़्त भूल गया |

[ लेकिन बात के दम में कुछ कमी खटक रही है | क्या इसे इस प्रकार लिखा जाय ? :-
मेरा यह प्रण था
मुझे प्यार के चक्कर में
नहीं पड़ना ,
नहीं पड़ना ,नहीं पड़ना |
जाने क्या बात हुई -
ऐन वक़्त भूल गया | ]

सोमवार, 12 अगस्त 2013

[ राजकिशोर ] अतिशयोक्ति by - - -

* [ कविता ?]
हाँ मैं बीमार हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपकी जाति का नहीं हूँ
आप मेरी नाड़ी देखें या नहीं ,
हाँ मैं बीमार हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपके धर्म से सम्बंधित नहीं हूँ
आप मेरा सर दबाएँ या न दबाएँ ,
हाँ मैं निश्चित अस्वस्थ हूँ
लेकिन मैं आपको बता दूँ
मैं आपके सम्प्रदाय का नहीं हूँ
आप मेरे लिए दवा लायें या न लायें ,
हाँ मैं मरण शैया पर हूँ
लेकिन आपको बता दूँ
मैं आपकी पार्टी का नहीं हूँ
चाहे आप मुझे दफनायें या न दफनायें ,
अलबत्ता मैं आदमी हूँ
और फिलहाल बीमार हूँ |
#  #
* मजाक नहीं , मैं गंभीरता पूर्वक कह रहा हूँ कि विवाह का अधिकार आवश्यक होना चाहिए | भले वोट देने का अधिकार मिले न मिले | यौन तुष्टि व्यक्ति का सहज प्राकृतिक मौलिक अधिकार है | इसे सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है |

* उनके भी दिन बहुरें :-
जैसे आदिवासी जन नक्सल वादी बने हुए हैं , उसी प्रकार नक्सल वादी जन आदिवासी बनें !

* नास्तिकता के मामले में मैं गंभीरता से आस्तिक हूँ |

* सेक्सुअल आज़ादी के लिए शुरुआत यहाँ से कीजिये कि जो कोई आपका परिचित या परिवार का सदस्य इस मामले में उन्मुक्त हो, जिसे सामान्य भाषा में धोती (साड़ी ) का ढीला कहते हैं, उसे अपमानित न कीजिये, अपमान की दृष्टि से न देखिये, उसके सम्मान में कोई कमी न होने दीजिये | और यदि  कोई दूसरा उसके साथ ऐसा व्यवहार करे तो उसे रोकिये | इस आज़ादी को स्वयं अपने उपभोग भर के लिए मत रखिये |    

* चिंतन के क्षेत्र में जब मेरा चित्त उतरा [ लगभग 1964-66, 18 - 20 की आयु में ] तब मैंने सबसे पहले यह विचार बनाया कि आदमी की कोई नीति तो होनी चाहिए | नीतिविहीन आदमी भी भला क्या ? भले वह नीति वह किसी दुसरे से ले, अपना स्वयं कोई न बनाये तो |
अब इतने वर्षों बाद [ 66 - 67 की आयु तक ] तनिक मेरी योग्यता और उपलब्धि तो देख लीजिये [ बिलकुल शून्य अंक न दे दीजियेगा, थोडा कृपांक बनाये रखियेगा ] कि अपने एक सहकर्मी मित्र के साथ दैनिक जीवन संबंधी एक वैचारिक - व्यावहारिक विवाद उठा था - उनका कहना था कि कपडे सस्ते किन्तु कई होने चाहिए | जब कि मेरा विचार था कि कपड़े कम हों किंतु अच्छे हों, उन्हें जल्दी जल्दी धुल कर बिना इस्तरी कराये पहन सकते हैं | स्वीकार करता हूँ कि इस प्रश्न का अंतिम निर्णय मैं आज तक नहीं दे पाया | कहता हूँ मैं महान विचारक हूँ |

 [कविता ]

* मैं उसके
बालों के लिए फूल
तोड़कर लाता हूँ ,
वह उसे
बाज़ार में बेच आती है |
#   #

* अहा गरीब !
तुम न होते
तो हम
दानी कैसे होते ?
#   #
* जवानी ?
जी हाँ , जिसके
आगे है अभी -
जीवन आनी |
#   #
* झूठ ही है
राजनीति का आधार
सच मानिए !
#   #
* क्या उम्र का असर ?
चीज़ें सामने रखी होती हैं
उन्हें ढूंढता रहता हूँ ,
तुम भी क्या चीज़, जानेमन !                                                                                    #   #              

* जब से ही 
शुरू किया ,
शुरू हुई 
ज़िन्दगी |

# #

* देख तो लो ही
देखने की चीज़ है
खरीदो नहीं |

* किसी से भी तो
मैं सहमत नहीं
क्या बने संस्था ?

* मैं किसी भी काम का नहीं ,
बिना काम कोई महब्बत क्या करे ?

* चलिए मान लेते हैं कि ईश्वर एक हकीकत है | लेकिन हमारी भी थोड़ी सी तो मान ही लीजिये कि ईश्वर , देवी -देवताओं के चित्र तो काल्पनिक हैं ! देखा तो किसी ने नहीं न ?

* ठीक है, खूब उछालिये, और ऊपर तेजी से उछालिये मंदिर का मुद्दा ! जिससे आपके सारे वोट आपकी झोली से बाहर जा गिरें !

* मुस्लिमो, कुछ सन्देश सुनो, सबक लो और तैयार रहो | दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन इसलिए किया गया है क्योंकि उनकी कार्यवाही से साम्पदायिक सौहार्द्र बिगड सकता था | शायद मतलब यह कि माहौल बिगड़ा इसलिए नहीं क्योंकि फ़ौरन निलंबन हो गया | निलंबन न होता तो स्थिति बिगड़ ही जानी चाहिए थी | सपा का निहितार्थ यह कि अब आप को तैयार इस बात के लिए रहना है कि कहीं ऐसा न हो कि अधिकारी का निलंबन न हो और आप साम्प्रदायिक  तनाव बनाने से भी चूक जाएँ | अपने प्रिय राजनीतिक दल की लाज तो रखनी है आपको , जिसने आप के लिए इतनी तत्परता दिखाई !

* सी एम ने दी इफ्तार पार्टी ( समाचार ) ५ / ८ /१३
- क्या यह भी सेक्युलर राज्य कि संवैधानिक ज़िम्मेदारियों में शामिल है जिसे यू पी सी एम ने निभाया ? है तो उन्हें भी ईद कि मुबारकबाद |
* - U P को IAS अधिकारियों कि कोई ज़रुरत नहीं है ( स्पा सरकार दुर्गा शक्ति नागपाल के सन्दर्भ में केंद्र सर्कार से )
इस पर [ भले हमारी नापसंद भाजपा के ] मुख़्तार ने एक साहित्यिक बौद्धिक टिप्पणी की है कि ऐसा विकल्प हो तो यू पी कि जनता भी निश्चित रूप से कह सकती है कि [सपा ] सरकार के बगैर भी प्रदेश का काम काज चल सकता है |
लेकिन वैसे सरकार को इसे इस तरह से कहना चाहिए था कि हमारे पास शिक्षित यादव जनशक्ति कि कोई कमी नहीं है और उन सबको केवल राजनेति में खपाया नहीं जा सकता | उनका हम एक यादव प्रशासक अकादमी बनायेंगे और उनसे यूपी का तो काम चलाएंगे ही, केंद्र सरकार को भी निर्यात करेंगे | केंद्र नहीं मानेगा तो खाद्य सुरक्षा बिल को हम समर्थन नहीं देंगे |

* निश्चय ही मैं हिन्दू इसलिए तो हूँ क्योंकि मैं इसमें पैदा हुआ , लेकिन अब नास्तिक होने के बाद केवल इसलिए हिन्दू नहीं हूँ कि मैं हिंदुत्व में अपनी नास्तिकता बरक़रार रख सकता हूँ , और भाई बंधु  दोस्त अहबाब, परिवार को नास्तिक बना सकता हूँ | बल्कि मेरे हिन्दू, भले नामशः , होने के पीछे एक गंभीर कारण है | वह यह कि मैं केवल हिन्दू से खुलकर संवाद कर सकता हूँ | और संवाद तो बहुत आवश्यक वस्तु है जिंदगी के लिए | भले हिन्दू युवक कुछ धमकियां देते हैं पर उनसे मूलतः  कोई भय नहीं लगता , जब कि ( नाम लेकर कहूँ मुस्लिम मित्रों कम से कम धर्म और ईश्वर विषयक मुद्दों पर ) बात करने में डर तो नहीं कहूँगा, लेकिन एक अनजाना सा संकोच तो होता ही है | इसलिए शिष्टतावश सिर्फ हाँ हूँ से काम चलाना पड़ता है जिससे बौद्धिक असंतोष उपजता है अपने मन में |

* राष्ट्रपति शकर दयाल शर्मा ने मुलायम सिंह यादव को ४ दिसंबर १९९२ को ही बता दिया था कि बाबरी मस्जिद गिरेगी | मुस्लिम हितैषी नेता जी तब दो दिन तक क्या करते रहे, हाथ पर हाथ धरे ? वे  क्या कर सके जो ६ दिसंबर को मस्जिद गिरा दी गयी और वह उसे बचा नहीं पाए ? दो दिन पर्याप्त थे अपने यूथ ब्रिगेड से मस्जिद को घेर कर सुरक्षित करने के लिए | फँस गए मुलायम सिंह यह बताकर, खुलासा कर, उदघाटन कर कि उन्हें मस्जिद के मिसमार होने की बात पता थी | अब उनका अपराध और गंभीर हो गया और वे भी लगभग कारसेवकों की श्रेणी में आ गए | अब वह मुसलमानों के कल्याणी बनने का दावा ना ही करें तो अच्छा है | किसी को विश्वास नहीं आएगा | ज्यादा परेशान न हों, न कोई ग़लतफ़हमी पालें | बावजूद इसके कि मस्जिद की कथित दीवार गिरवाने का आरोप लगाकर उन्होंने आई ए एस अधिकारी को निलंबित करवा दिया है |

* कभी लिखा था कि मुसलामानों के (वोटों के) डर से इनकी रूह काँप रही है , और चले हैं सेक्युलर बनने ! अब थोडा बात बदल लें – “चले हैं शासन करने ” !
* मुलायम सिंह सेक्युलर नहीं सांप्रदायिक राजनीति कर रहे हैं | इससे देश कमज़ोर होता है | आश्चर्य नहीं जो अम्बी ने लिखा कि सपा समाप्त होने वाली है !

* आज पृथक ने बहुत अच्छा पोस्ट लिखा - साहित्यिक राजनीतिक | मन खुश हो गया :-
गरीब मुल्क में दो लाख करोड़ का सालाना बजट प्राप्त करने वाली दस लाख सैनिको वाली भारतीय सेना क्या शहीदो के सम्मान में बिगुल बजाने के लिए है?
७/८/१३ 

* लखनऊ से भी सद्यः प्रकाशित NBT में हमारा निम्नवत विज्ञापन दि . ८ , ९ , ११ , और १३ अगस्त के अंकों में प्रकाश्य :-
   " नास्तिकता  अपनाएँ |  इससे आत्मविश्वास बढ़ता है | - उग्रनाथ 'नागरिक ' एवं मित्रगण | 9415160913 | priyasampadak@gmail.com
"अगली बार इसे अपने नाम से नहीं किसी संस्था समूह, जैसे " नास्तिक हिन्दुस्तानी दल " / " नास्तिकता प्रचारक दल " के नाम से प्रकाशित कराना अभिचिन्तित |

* आपने अभी मुझे देखा है | मेरे मित्रो को देखिएगा, उनसे मिलिएगा तो दाँतों तले उँगली दबा लेंगे आप ! इतने निःस्वार्थ इतने नैतिक कि क्या कहना ! मैं उनके पीछे हो लेता हूँ , दिल से | लेकिन आप उन्हें पहचानेंगे कैसे ? वे दिखने में बहुत छोटे लोग हैं |

" नास्तिकता अपनाइए " वाले आज के NBT में हमारे पहले दिन के विज्ञापन पर आज तीन फोन आये | एक भाई ने घर बुलाया है, दूसरे  ने प्रथम वाक्य में ही पूछा - मेरे लिए क्या आदेश है ? कब मिलने आऊँ ? तीसरे के बारे में कहने में कोई हर्ज़ नहीं है कि जिनसे कम उम्मीद की जाती है , शादाब भाई ने कहा हम साइंटिफिक सोच के लोग संख्या में अत्यल्प हैं | इनकी बातों से बड़ा आनंद आया, उत्साहवर्द्धन हुआ, प्रोत्साहन मिला | विशवास उपजा किसी भी काम में अनवरत लगे रहो तो कुछ सफलता मिल ही जाती है | मिलने , मिलते रहने की योजना बनी |  

* मुबारकबाद के मामले में हम नास्तिक सेक्युलर जन ज़रूर कुछ पशोपेश में होते हैं | मैं एक तरीका सोच रहा हूँ , आप भी सोचये | शुरू यूँ करें - जैसे हम लोग जन्म और नाम से हिन्दू होते ही हैं , लेकिन क्या होली दीवाली हम लोग उसी तरह दिल से मानते हैं ? शुभकामना मिलने पर क्या उसी तरह उछलते हैं ? नहीं, बिल्कुल नहीं | बस एक औपचारिकता निभाते हैं |स  उसी प्रकार ईद की शुभकामना प्राप्त करने के उचित पात्र होने के लिए उनका "मुसलमान " होना ज़रूरी है | केवल पैदा होना या नाम से मुस्लिम लगना पर्याप्त नहीं है | तो शिष्ट संस्कृति के तहत हम मुस्लिम मित्रों को तो मुबारकबाद कह सकते हैं , लेकिन जिन मुस्लिम मित्रो को हम जानते हैं कि वे मुस्लिम नहीं हैं , उनके साथ यह नाटक करना मुझे गैरज़रूरी लगता है | उम्मीद करता हूँ जो मुस्लिम दोस्त हमें नास्तिक जानते हैं वे भी हमें हिन्दू त्योहारों कि शुभकामना न दें | मैं तो बस यह करता हूँ कि अपनी और से किसी की तरफ कोई पहल नहीं करता | कोई बोलता है तो उसे " धन्यवाद / शुक्रिया | आपको भी " कह कर एक रिवाज़ का पालन करता हूँ |
{ ' मुँह ' से शुभ शुभ बोल देने में क्या बुराई है , यदि इससे आपका शुभ होता हो ? इसलिए आपको भी ईद मुबारक ! और हाँ, शुभ बोल देने से होली दीवाली , क्रिसमस भी शुभ हो जाते हैं मित्र ! इनके आधार कुछ भी हों | निराधार होते हैं सरे त्यौहार , बस खान पान, गुझिया सिवैयां, छुट्टियां और मौज - मस्ती पर आधारित | (To Neel )}

* आज अख़बारों से सूचना मिली | मेरे प्रिय एक गीतकार शिव बहादुर सिंह भदौरिया [ रायबरेली ]का  मंगलवार को निधन हो गया | उनका एक प्यारा गीत यूँ है कि -
" मैं राह बदलने वाला था ,
बस इतने में
ध्रुव तारा दिखा गया कोई | "
#  #
इस पंक्ति ने मेरे ह्रदय को इतना छुआ कि मैंने भी इस गीत पर अपना भाव चस्पा किया |
और गाया - " मैं जग में रमने वाला था
बस इतने में
मृगछाला बिछा गया कोई |"
#  #
इन्ही पंक्तियों के साथ उस शीर्ष गीतकार कवि को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि |
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कब से तो कहावत के रूप में कहा जाता है और प्रचलित भाषा है कि - वह ऐसा पानी पीता है कि खुदा भी नहीं जान सकता | लेकिन इसमें अब रामपुर के अति धर्मिष्ठ मौलानाओं को इस्लाम का अपमान दिखने लगा है | तभी तो ऐसा ही कुछ अपने फेसबुक पर लिखने के कारण वे लेखक कँवल भारती को कड़ी सजा दिलाने की मांग कार रहे हैं | अभी तक उनके ऊपर हलकी धाराएँ लगायी गयी थीं |

त्योहारों से ही धर्मों का मन बढ़ता है , चाहे वह कि भी धर्म हो | त्यौहार उसकी ताक़त हैं | इससे उन्हें बल ख्याति और प्रचार प्रसार बल्कि राजनीतिक शक्ति भी प्राप्त होती है | इसलिए शुभ करना है तो हर दिन कीजिये | शुभ कामना के साथ होली दीवाली , दशहरा , ईद बकरीद रमजान मुहर्रम न जोड़िए |

* कुछ लोग वह वाले सेक्युलर हैं जिनसे ' हिन्दू ' चिढ़ते हैं , लेकिन 'मुसलमान' मोहब्बत करते हैं | वे उन्हें अपना मित्र / हितैषी मानते हैं | हम वैसे हैं जिनसे ' हिन्दू ' भी कुछ गैर - गैर रहते हैं और ' मुसलमान ' तो खैर दूर ही रहते हैं | हाँ जो केवल आदमी और इंसान हैं वे हमारी बात की सच्चाई समझते हैं और हमसे स्नेह रखते हैं , हमारा समर्थन करते हैं |
{ हम ईद की सिवैन्यान , होली का गुझिया खाने कि तत्परता प्रदर्शित करके भाई चारा का नाटक नहीं करते |}

रविवार, 4 अगस्त 2013

विप्लव ! Vishvnath Dobhal: नास्तिक वो बला है..

विप्लव ! Vishvnath Dobhal: नास्तिक वो बला है..: नास्तिक वो बला है जो चिल्लाता है की मैं नास्तिक हूँ . क्योंकि वो सच्चे अर्थो में नास्तिक है।   ...

Rough Notes , 21 July 2013

Rough Notes  , 21 July 2013  (Two )

भक्ति का उपरांत

हम होंगे कामयाब
चलिए एक काम करते हैं | हम मिलकर एक गाना गाते हैं | हम होंगे कामयाब, एक दिन / मन में है विश्वास / पक्का है विश्वास /  हम होंगे कामयाब, एक दिन | चौंक गए आप ? इसे हम कैसे गायें ? इसमें तो विश्वास की बात है ? और विश्वास तो विश्वास ? निश्चय ही आपका संदेह उचित न सही पर निराधार नहीं है | ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अंधविश्वास को भी धार्मिक-संप्रदायों के लोग विश्वास ही कहते हैं | वह अपने विश्वासों को भला अन्धविश्वास भला क्योंकर कहेंगे जब कि वे भी जानते हैं कि अंधविश्वास गलत बात है | {इस चेतना के लिए गॉड-ईश्वर-अल्लाह सबको धन्यवाद दिया जा सकता है}| वे भी उन्हें तार्किक ही मानते हैं, बल्कि एक होड़ से चल निकली है तमाम दकियानूसी बातों को विज्ञानंसम्मत सिद्ध करने की (शुभ लक्षण ?) | तथापि हमें इस गाने को गाने को कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि यह आत्मविश्वास का मामला है | कहते भले हम भी इसे विश्वास ही हैं | कौन 'आत्म' या ''अंध" जोड़कर शब्द को बड़ा करने जाय ? (काहिली नहीं, सुविधा के लिए ) | फिर सत्य यह तो है ही कि दोनों ही हैं विश्वास ही और दोनों में ताक़त है | दोनों शब्दों में एकात्मकता, घालमेल इसलिए भी है क्योंकि वे भी आप के विश्वास को अंधविश्वास ही कहते हैं, जैसा कि आप उनके अन्धविश्वास को अन्धविश्वास कहते हैं |
अब आत्मविश्वास का तकाज़ा यह है कि हम पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी परिभाषा वाले 'विश्वास' पर कायम हों और गायें गीत - हम होंगे कामयाब |    
आपका विश्वास अपने निज के संकल्प पर तार्किक - नैतिक निष्ठां है | उनका विश्वास पराया, परवासी {जिसे एक पुराणी कहानी 'बासी' कहती है}खामख्याली है | उसमे पुरातन, अनिश्चित, अवैज्ञानिक आदेशो- निर्देशों या जानकारियों के प्रति "आत्मसमर्पण" है | इसी लिए उसे "आत्मविश्वास" नहीं कह सकते | आत्मविश्वास में जहाँ सकारात्मक रचनात्मक ऊर्जा है, अंधविश्वास में नकारात्मक ध्वंसात्मक विश्रान्ति- सुषुप्ति है |
इसी तरह कल गुरु पूर्णिमा [मैं ओशो प्रेमी हूँ इसलिए मैंने अपना दिन अपनी तरह उल्लास में बिताया] | इस पर एक अख़बार ने प्रश्न उठाया - गुरु की उपासना कैसे की जाय ? मैंने सोचा अब हम लोग क्या करें, क्योंकि हमारा तो कोई गुरु है / होता नहीं ? फिर विचार किया कि ऐसा नकारात्मक भाव क्यों बनाये ? थोडा सकारात्मक सोच रखें | आखिर कुछ सीखना ही तो होता है | तो चलिए गुरु बनाया जाय किसी को ! तब शब्द निकला ' आत्म गुरु ' | है न अपना वह ? अप्प दीपो भव कहा भी गया है | तो हम हुए, हम हैं अपने गुरु | क्या हमें जब कुछ पूछना होता है, कोई प्रश्न - कोई संदेह मन में उठता है तो हम वैसे ही आत्म चिंतन-मंथन नहीं करते जैसे किसी से वाद -विवाद -वार्तालाप कर रहे हों ? [मैं तो स्वाभाविक काफी तेज़ आवाज़ में आत्मालाप करता हूँ, पत्नी पूछती है किससे बात कर रहे थे ?]
लेकिन ऐसा तो हम रोज़ करते है, गुरुपूर्णिमा के दिन का क्या ? लेकिन नहीं, इस दिन हम अपनी जिज्ञासा, the thirst for learning को तीब्रता से उच्च शिखर पर ले जाकर अपने आत्म(गुरु) से कुछ ज्यादा पूछताछ तो कर सकते हैं |  
   # हाँ, एक बात तो लिखना भूल ही गया था | दरअसल बातें तमाम घुमड़ती हैं, कुछ तो अभिव्यक्ति पा जाती हैं कुछ गम हो जाती हैं | मैं कह रहा था कि मेरा तो अनुभव है और आप भी अवसर लगे तो ध्यान से देखिएगा कि अन्धविश्वासी  लोगों में  [ऐसा न कहकर मैं इन्हें सीधे पूजापाठी- तीर्थयात्री कहता हूँ ] दैनिक जीवन के लिए ज़रूरी न्यूनतम आत्मविश्वास का भी नितांत अभाव होता है | कोई दुःख क्या ज़रा सा इंजेक्शन या परीक्षण हेतु खून निकलवाने में भी सीत्कार करने लगते हैं | वैसे भी हर दम  राम राम सित्ता राम , अरे  राम, हे राम जी सहाय बनो  इत्यादि इनका तकिया कलम हॉता है |  


   * सद्भावना प्रदर्शन के लिए भी कुछ मौलिक जानकारियाँ ज़रूरी हैं | वरना आप भी मेरे मित्र की तरह "मुहर्रम मुबारक" बाँटते फिरेंगे |


" हास्य प्रवाह "
आज (से) मैं जिस संस्था के काम कर रहा हूँ उसका नाम है = " हास्य प्रवाह " /
( ख़ुशी ही जीवन है ) आज गुरु पूर्णिमा है | ओशो प्रेमी नीलेश देशभ्रातार एवं अन्य मित्रों ने बुलाया है | लेकिन बहुत दूर है | ओशो की साधना विधियों में हास्य का प्रमुख स्थान है |


* मित्रो , अब तो मेरा मन हो रहा है भारत में ब्रिटेन जैसी ' रानीशाही ' शासन लाने, एतदर्थ वकालत करने का । जैसे वहाँ ईसाई ही रानी बनती है , वैसे यहाँ की मूलनिवासी, शूद्र, दलित {जो भी कहें / कहते हों} मायावती को रानी बना दिया जाय । बाकी सब वैसे ही हो जैसे ब्रिटेन (लोकतंत्र की जननी) में होता है । उसी तरह संविधान रहित-परम्परा आधारित शासन प्रणाली । हटाइए इस मोटे, भारी-भरकम संविधान को । बड़ा विवाद है इसपर और बेअसर भी हो रहा है यह, रोज़ रोज़ बदलकर। यह बाबा साहेब का बनाया मूल संविधान रह भी नहीं गया । फिर तो यह देश भी अब मूल संस्कृति, मूलवंशी परम्पराओं पर चले । हमें यह सर्वथा उचित और राष्ट्र के लिए सभी प्रकार से हितकर लगता है । 2014 में चुनाव आने वाले हैं । ऐसा कुछ कीजिये कि आप के वोटों से ही ऐसी व्यवस्था हो जाये, प्रत्यक्ष या परोक्ष । हिन्दू राष्ट्रवादी भी खुश होकर तालियाँ बजाएँ कि इस विधि से भारत में सचमुच हिन्दू राज्य की स्थापना हो जायगी और "विदेशी-आततायी-आक्रमणकारी-बर्बर-लुटेरे-हिंसक-चंगेज़ी और क्या-क्या तो तमाम गंदे विशेषण युक्त", हाँ आतंकवाद से छुटकारा मिल जायगा । यह भी कि, बासठ वर्षों से चल रही ' छद्म धर्मनिरपेक्षता (जिससे वह बहुत ज्यादा तंग और कुपित हैं) से देश को निज़ात मिल जायगी । वास्तविक पंथनिरपेक्षता का तभी आगमन होगा । विश्व बंधुत्व, सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वजन हिताय की प्रतिष्ठा होगी । भारत देश पुनः अपनी खोया सम्मान, विलुप्त गरिमा को प्राप्त करेगा और विश्वगुरु के शीर्ष शिखर पर पदासीन होकर अपनी आभा से विश्व को आलोकित करेगा । एवमस्तु !       

* [कविता ]     " धोबी का कुत्ता "
पहले एक धोबी होता था
उसका एक घर होता था
उसका एक घाट होता था ,
उसका एक कुत्ता भी होता था
जो न घर का होता था
न घात का होता था |
लेकिन अब
सिर्फ कुत्ते होते हैं
उन्ही के घर भी होते है
उन्ही के घाट भी होते है
और विडम्बना !
उनका कोई धोबी नहीं होता |
#  #

* सब छोडो यार नागरिक ! तुम भी क्या रोज़ रोज़ संस्था / पार्टी बनाते रहते हो ? सारा काम 'दिनमान ' के नाम से करो | यह तुम्हारी प्रेरणा भी थी और अब प्रपौत्र का नाम |घर का नाम हुआ " दिनमान कोठी " | " दिनमान DINMAN , The Day Time "

* मैं सोचता हूँ
सोचता रहता हूँ
मैं क्या क्या सोचूँ  ?

* जो था वह था
अब जो है, वह है
देखो आज को |

* स्वीकार करो
जैसा निज जीवन
जैसा है जग |

* सब तो मैं हूँ
तुम तो बहाना हो
- उसने कहा |

* भाई साहेब
काम बहुत,समय
बहुत कम !

* इतना कुछ
लिखने को पड़ा है
लिखूँ तो कैसे !

* मन में आया
यह, और यह भी
लिखता गया |

* कोई लडाई
मेरे वश की नहीं
शब्दों के सिवा ।

* मेरी उग्रता
मेरे लिए घातक
साबित हुई ।

* होते ही नहीं
कपडे सहनीय
इस ऊष्मा में । ।

* CBI चाहे इनके हाथ में रहे चाहे उनके या चाहे अपने हाथ में रहे , वह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रहेगी । उनका इस तरह दबाव नहीं होगा, तो इनका इस तरह का दबाव हो जायगा जिसे वह आज़ादी पूर्वक स्वीकार करेगी ।

* वह होंगे हिन्दू ह्रदय सम्राट लेकिन पता नहीं क्यों ( हर बात का कारण नहीं बताया जा सकता ), मुझे नमो महोदय के हाव भाव, देह भाषा, अदा समेत सम्पूर्ण व्यक्तित्व ( सभी अटल जी बनना चाहते हैं ) पसंद नहीं आया । उन्हें PM के रूप में रोज़ किसी न किसी बहाने TV के परदे पर आना मुझे अच्छा नहीं लगेगा । [व्यक्तिगत]

* केवल जाति है हिंदुस्तान में | कोई धर्म वर्म नहीं | हिन्दू तो कहते ही हैं वे जीवन शैली हैं | उसी प्रकार सब ज़िन्दगी के तरीके ही हैं | यह जो मुस्लिम सिख ईसाई को धर्म कहा जाता है , वे धर्म नहीं [हिन्दू न कहें ] हिंदुस्तान की जातियां है | नहीं समझ में आया तो सिख जैन को देखिये | इन्हें धर्म भी कहा जाता है लेकिन इनका व्यवहार भारतीय जाति की तरह है या नहीं ? इन्हें समाज ऐसे ही देखता है | इसी प्रकार मुस्लिम ईसाई थोडा अभी थोडा दूर दिखते हैं लेकिन ये सब भी जातिवाद से पूर्णतः ग्रस्त [क्यों कहें, परिपूर्ण ] हैं | जो कि हिन्दू की विशिष्टता है | इसे सांप्रदायिक शीशे से नहीं सांस्कृतिक तरीके से देखा समझा और व्यवहार किया जाय , तो भारत की साम्प्रदायिकता का दोष बहुत हद तक मिट जाय | फिर , झगड़ा ही तो करना है ? तो जातियों में क्या संघर्ष नहीं होता ?

* मेरा अब भी ख्याल है कि -
फेसबुक को अभिव्यक्ति का मंच होना चाहिए , बहस - विवाद का नहीं | हर साथी अपने चेतन- अर्द्धचेतन- अचेतन के अक्षर-वाक्य-शब्द अपने वाल पर निःसंकोच लिखे | मित्रों को ध्यान रखना चाहिए कि भले समक्ष नहीं, आभासी सही, टेढ़ा मेढ़ा, गलत सही लिख रहा है वह अपना मित्र ही है | हो सकता है वह बीमार हो शरीर या मानस से , और मनोरंजन के लिए अपने दीवाल का इस्तेमाल कर रहा हो | संभव है उसे कुछ सोचकर लिखना न आता हो, सीखने के लिए लिए अपने स्लेट - तख्ती - श्यामपट - व्हाइट बोर्ड का सहारा ले रहा हो | हमें जहाँ तक हो सके इसने उसकी मदद करनी चाहिए, न कि उसे हतोत्साहित करना | हमें उसे सुनना, बिटवीन द लाईन्स पढ़ना चाहिए | अभी तो केवल दूरस्थ मित्र है, उसका आत्मीय बनना चाहिए | हमें सौभाग्य (जो भाग्य न मानते हों तो कहें विज्ञान की कृपा = विज्ञाग्य ) से यह अवसर मिला है कि हम विश्व के कोने कोने से इतने सरे लोगों से एक साथ घर बैठे मिलने बैठने, कहने सुनने का मौका मिला है तो उसका सदुपयोग करें | अन्यथा तो विज्ञान वैसे ही अपने आविष्कारों के दुरूपयोग के लिए बदनाम है |
कोई अपनी पार्टी का प्रचार कर रहा है, धर्म का विस्तार कर रहा है तो कोई दूसरी पार्टी की आलोचना, अन्य धर्म को अपवित्र कर रहा है | करने दीजिये, यह उसका हक है | कोई सामंती युग तो है नहीं ! वैसे भी उसका लिखा कोई पत्थर पर लकीर तो है नहीं | बालुका तल पर वह उँगलियों की खटपट कर रहा है तो आप भी उसी प्रकार समुद्र तट पर कुछ चित्र उकेर रहे हैं मन बहलाने के लिए | सब मूलतः मन की भंडास ही निकाल रहे हैं | कोई साहित्यिक अभिलेख, शोध प्रबंध नहीं लिख रहा है इस पर | लिख भी रहा है तो वह भी स्वान्तःसुखाय, मनोरंजनार्थ | सुना है इस हेतु विदेशों में वृद्धजन किराये पर श्रोता इम्प्ल्वाय करते हैं | फेसबुक की यह सुविधा कोई मामूली नहीं असाधारण है |
ठीक है, कोई प्रतिक्रिया उपजती है जो कि स्वाभाविक है | तो, साधारण बात तो कमेन्ट में लिख दें और कोई बात स्पष्ट न हुई हो, अर्थ - भावार्थ समझ में न आया हो तो पूछ लें | पर यदि आप बहुत विद्वान है, और आपका विचार बहुत लम्बा जोर मार रहा हो तो अपनी बात अलग से अपने वाल पर लिखें | एक पोस्ट को इतना न खींचें कि दिल्ली से दौलताबाद तक हाईवे बन जाय |
हर हाल में इसे मेले जैसा मनोरंजन स्थल बनायें रखें | एक बार जो मिल जाये तो वह बार बार मेले में आना चाहे, आपसे मिलना चाहे |

*  एक कविता है :-                      
साधु अपना काम करता है /
मैं अपना काम करता हूँ |
वह मुझे बार बार /
पानी से बाहर निकलता है /
मैं उसे बार बार डंक मारता हूँ |
साधु अपना काम करता है /
मैं अपना काम करता हूँ |
#   #

* आज रविवार ! पत्रकार मित्र K.B. Singh घर आये | उन्होंने एक e-paper computer पर दिखाया | उन्होंने कहा आप का आन्दोलन यह अखबार पूरा कर रहा है , जो अख़बारों से मेरी चिर - Demand है | DAWN अखबार एक पूरा पृष्ठ सम्पादक के नाम पत्रों को देता है | मुझे ख़ुशी हुई | फिर याद दिला दूँ - मैंने प्रिय संपादक मासिक पूर्णतया इसी हेतु अभिचिन्तित कर 1984 में पंजीकृत कराया था | उसी ग्रुप में यहाँ हम आप शामिल है | बधाई !{ 21 जुलाई 2013  }




Intrduction to Hindi Samay

नाम -  उग्रनाथ " नागरिक "
जन्म - 9 सितम्बर 1946
विधाएँ - चिन्तन एवं कथन , वह जिस भी विधा में ठीक बैठ जाये | मूल उत्स - कविता
प्रकाशन - " प्रिय सम्पादक " मासिक का 1984 से 38 वर्षों तक
सम्पादन-प्रकाशन | अतिरिक्त :-
             (क) हस्तलिखित A - 4 आकार सतत लेखन संग्रह = 20 अदद
             (ख) कविता संग्रह - 1 - कफन और अन्य कविताएँ 2 - पुनश्च 3 -
पांच सात पांच 4 - दूसरी कड़ी
                                  5 - बढ़िया है 6 - तिस पर भी 7 - बस
क्षण भर 8 - मेरा अंतर्मन मेरी कविताएँ                       9 - सुबह
की पहली चाय 10 - साधारण स्थितियों की कविताएँ 11 - कविता के तौर पर 12 -
ये कैसी कविताएँ 13 - ७०६ हाइकु 14 - जो चाहो उजियार 15 - आगे और हैं
कविताएँ 16 - आमी नदी
              (ग) डायरी / विचार संग्रह - 1 - बिना नेकर का आदमी 2 -
धारा प्रवाह 3 - रैन्डम रबल
                                               4 - मानुषेर मुंशी 5 -
बुद्धिविहीना
               (घ) कथन संग्रह = सुनो भारत
               (ड०) लेख संग्रह  = तेरह पन्ने
               प्रकाश्य = 1- हरी धनिया की पत्ती (कविता) 2 - लघुत्तमा (कविता)
               कुल 45 , लेकिन इन्हें प्रकाशित कहना अनुचित होगा क्योंकि
इन्हें मैंने स्वयं प्रकाशित किया |

सम्मान - जो भी हैं, मैं उनका उल्लेख नहीं कर सकता | अतः - " कोई नहीं " समझा जाय |

सम्प्रति - सेवानिवृत्त , स्वनियुक्त " दिनमान " कार्यकर्त्ता , फेसबुक
एवं ब्लॉग लेखनरत |

संपर्क - दिनमान काटेज, L - 5 - L / 185 , Sector - L , Aliganj ,
Lucknow - 226024 [U.P.]
          Phone - 09415160913
          Email - priyasampadak@gmail.com

Quick Reply

14 Poems to Hindi Samay

To Hindi Samay
अभी कविताएँ         द्वारा -  उग्रनाथ नागरिक
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तूफ़ान में बहते लोग

[कविता नहीं ]

1 *मैं कविता नहीं लिख पाता
बस सोचता भर हूँ -
क्या दस- पचास हज़ार लोग सचमुच मर गए ?
क्या वे लोग भी मेरी तरह ही आदमी थे
जिन्दा, सांस लेते लोग ?
सोचता हूँ मैं उनकी तरह
मर रहा हॉता तो क्या दशा होती मेरी ?
कैसा अफनाए, छटपटाए होंगे
हाथ पैर मारे होंगे बचने के लिए
सांस फूली होगी, आँखें बाहर निकल आई होंगी
असफल प्रयास में, बच नहीं पाए
लाश होकर बह गए ?
क्या वे बच्चे, औरतें, बूढ़े, हमारे
घर के बच्चों, औरतों बूढ़े माँ - बाप
की तरह ही रहे होंगे
जिनसे मैं इतना प्यार करता हूँ ?
मैं अपने परिवार के लोगों को
निर्निमेष देखता हूँ
उनके इस तरह बिछड़ने की कल्पना से सिहर जाता हूँ |
डरा, सहमा हुआ बैठा हूँ मैं
मुझसे कविता नहीं हो पाती |
# #

[कविता ]
2 किसी के घर
एक वक़्त खा लेता हूँ
उसका शुक्रगुजार हो जाता हूँ
देश का तो रोज़ ही खाता हूँ |
#  #

[कविता ]
3- जलता तो है तवा
तपता, आँच सहता

और सिंकती है 'रोटी '
उस पर किसी और की ?
#  #

[कविता ]
4 उस औरत में
जिसके लिए पुरुष
अपनी जान
देता - छिड़कता है ,
उसकी माँ - बहन भी
शामिल है ,

और वह पुरुष
जिसके लिए औरत
तड़पती, छ्टपटाती है ,
उसका बाप और
भाई भी हो सकता है |
# #

[कविता ]
5 - मुसीबतें हमेशा
मेरे साथ चलती हैं ,
अभाव मेरे पीछे पडा रहता हैं ,
परेशानियाँ पीछे लगी रहती हैं ,
बीमारियाँ मुझे घेरे रहती हैं ,
क्या क्या कहूँ
सारे दुःख तो मेरे पीछे चलते हैं
अर्थात, मैं
उनके आगे चलने वाला,
कोई महामहिम
नेता हो गया हूँ !
#  #

[कविता ]
6 - आज मेरे बेटे ने
अपना कद नापा
वह अंदर से दौड़कर आया
पापा , मैं मम्मी के
दूध के बराबर हो गया हूँ
अब आप से नापूं
वह मेरे कलेजे तक था
और बड़ी बहन के चश्मे के बराबर .
मैंने कहा , बेटे
यह तो तुम्हारा स्थाई कद है
इससे कम तो तुम कभी न थे
इससे परे तो तुम
कभी न जाओगे |
#  #

[कविता ]
7 - मैं जानता हूँ , लोग हँसेंगे
सुनकर मेरी पीड़ा
तिस पर भी , मैं अपने दोस्तों को अपना दुःख
तार तार करके सुनाता हूँ ,
आखिर दोस्त हैं मेरे
थोडा हँस ही लें ,
वरना उन्हें भी जिंदगी में
कहाँ सुख नसीब !
#  #

[कविता ]
8 - अरे ! बारिश हो रही है
छज्जे पर मैंने
तुम्हारे लिए
आँखें बिछा रखी थीं ,
देखो, कहीं
भीग तो नहीं गयीं !
#  #

- [कविता ]
9 - हाँ बच्चो , मूर्ख तो हैं तुम्हारी दादियाँ
उन्हें अंग्रेजी डिमोक्रेसी के मूल्य पता नहीं -
व्यक्तिगत स्वतंत्रता उसने जानी ही नहीं
प्राईवेसी का आदर वह क्या जाने ?
तुम आधे कपडे पहनकर बाहर निकलती हो
तो वह टोक देती है ,
भाई घुटनों के बल गिर जाता है
वह दौड़ कर धूल झाडती है
तेल मालिश करती, काजल लगा देती
और माथे पर दिठौना ,
उसके गले से नहीं उतरता कि अंग्रेजी डॉक्टर ने
यह सब करने से मना क्यों किया है ?
चलो अच्छा हुआ, अब वह गाँव भेज दी गयी
लेकिन क्या हुआ ? कल से जब से फोन आया
छुटकी को बुखार आ गया है , वह तड़प रही है |
मुझे हर घंटे बोलती है फोन करो, पूछो हाल !
बूढ़ा तो मैं भी हूँ, लेकिन थोड़ी दुनिया जानता हूँ
समझाता हूँ आज़ादी की बात - किसी की
व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल नहीं देना चाहिए ,
लेकिन वह मानती ही नहीं
मूर्ख जो है न ! तुमारी दादी |
# # #

10 -  [कविता ] " धोबी का कुत्ता "

पहले एक धोबी होता था
उसका एक घर होता था
उसका एक घाट होता था ,
उसका एक कुत्ता भी होता था
जो न घर का होता था
न घात का होता था |
लेकिन अब
सिर्फ कुत्ते होते हैं
उन्ही के घर भी होते है
उन्ही के घाट भी होते है
और विडम्बना !
उनका कोई धोबी नहीं होता |
# #

[कविता ]
11- बड़ी मुश्किल से तो
खंडहर हुयीं हैं इमारतें
जर्जर हुई थीं किताबें ,
तिस पर भी
इनके संरक्षण के लिए
पुरातत्व विभाग /
अभिलेखागार बनाये हमने !
क्या यह कम सबूत है
हमारी भलमनसाहत का ?
# #

[कविता ]
12 - मैं एक कफ़न हूँ
ज़िंदा ही जला दिया जाता हूँ
एक मुर्दा लाश के साथ
गोया कि मैं एक ज़िंदा लाश हूँ
लेकिन मुझे गर्व है कि
मैं शव का देता हूँ कब्र तक साथ
और उसके ख़ाक होने तक
उसकी लाज ढके रहता हूँ
तथा राख बनकर भी
तन से लगा रहता हूँ
फिर भी मुझे खेद है
कोई मुझे जीवन में
प्यार नहीं करता
आखिरी सांस तक
स्वीकार नहीं करता
बस चंद शहीदों के सिवा
वही तो मुझे
अपनाते हैं जीते जी
और मैं भी उन्हें
कभी मरने नहीं देता .
#  #

[कविता ]
13 - शहीद !
मर गए
चिरायु हैं ,
वे गिद्ध नहीं
जटायु हैं |
#  #

आखिरी [ कविता ]
14 - तुम जीवन में ऐसे आये ,
जैसे सुबह की पहली चाये |