रविवार, 30 अक्टूबर 2022

saved book

मैं मनुष्यों का साथ कम चाहता हूँ क्योंकि यह बोलते बहुत हैं । और बोलते भी हैं तो बहुत ज़्यादा बोलते हैं ।
अन्य जीवों, पशु पक्षी, वनस्पतियों के साथ रहो तो वह भले सुनें न सुनें लेकिन बोलते तो कम हैं ।

शनिवार, 18 जून 2022

मूर्खता

यह दुनिया बुद्धिमत्ता पर नहीं, सदैव मूर्खता पर चली है । और चलती रहेगी । बस मूर्खों को यह पता होना चाहिए कि यह मूर्खता है । तब तक कोई दिक्कत नहीं ।
जब मूर्खता को।महिमामण्डित कर उसे बुद्धिमानी समझने, मानने लगते हैं तब परेशानी हो जाती है ।
मूर्खता को मूर्खता की तरह स्वीकार, धारण करो । यही धर्म है । 😊😢

शनिवार, 11 जून 2022

जीने की राह

तुम सही हो हम ग़लत हैं ।
यही कहोगे तो जीवित बचोगे ।
अपने सत्य पर अड़े रहोगे तो जीने न पाओगे ।
इतने विरोधी खड़े होंगे कि तुम्हारे लिए कोई रास्ता न बचेगा ।

गुरुवार, 26 मई 2022

बुधवार, 25 मई 2022

भला

धर्म आदमी को भला आदमी बनाना चाहते हैं । और मेरा इरादा यह है कि मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता ।
यही है मेरा और मजहब का रिश्ता । 😊😢

अच्छा आदमी

धर्म आदमी को भला आदमी बनाना चाहते हैं । और मेरा इरादा यह है कि मैं भला आदमी नहीं बनना चाहता ।
यही है मेरा और मजहब का रिश्ता । 😊😢

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

सोमवार, 28 सितंबर 2020

मेरानिर्णय

राजनीति के इस मोड़ पर सेक्युलरवाद:
- - - - - - - - - - -  उग्रनाथ
मेरी अपनी, भारतीय धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की समझ यह बनी है कि secularism की सारी किताबी परिभाषाएँ नहीं चलेगी । इसकी परिभाषा यह होनी चाहिए कि धर्म राज्य व्यवस्था के अधीन हो । दोनो में दूरी, separation का concept असफल है । State यदि हस्तक्षेप, assert न करेगा तो धर्म ruling स्थिति में आ जायेगा । इसे contain करना राज्य का काम होना चाहिए । और राज्य को Bradlaugh ian Secular, Complete scientific, Godless Thisworldly होना चाहिए । परलोक, That world को मानने वाले किसी समूह को राजनीति से बाहर रखना चाहिए । फिर व्यक्तिगत आस्था की स्वतंत्रता की संरक्षा का प्रश्न तो बेकार है उठाना । निजी सोच भावना, दिल दिमाग में कोई क्या रखता है, उससे यूँ भी किसी को परेशानी, या मतलब कहाँ होता है? यह उलझाने वाली बातें है । यही राज्य चाहता है । उलझे रहो जिससे उनका धर्म न जाने पाए । यही धर्म चाहता है कि उलझे रहो जिससे इनकी राजनीति चले ।
इस शताब्दी तक यह तार्किक निष्कर्ष आ चुका है कि धर्म और राजनीति दोनो का मकसद एक है, दोनो एक हैं । तो राज्य तो किसी एक की ही चलेगी? इस लोक की, या परलोक की । दोनो हाथ में लड्डू वाली होलियोक की शुभेच्छा न चल पायी भले गाँधी जैसों ने बड़ी कोशिशें कीं । असफल होना ही था क्योंकि विचार यह वैज्ञानिक नहीं कि लोकतंत्र में पराई दुनिया का हस्तक्षेप हो ।
केवल राजनीति का राज्य होना चाहिए । धर्म जिसे आवश्यक लगे वह राजनीति को अपना धर्म बनाये ।
क्या मानववाद, लोकतंत्र, संविधान, वैज्ञानिक चिंतन आस्था का विषय नहीं हो सकते हमारे ? धर्म बनने के लिए किस गुण की कमी है Secularism, इहलोकवाद में ?
धर्म को केवल जड़ से नहीं , इनका नामोनिशां मिटना चाहिए संसार से । 
आखिर हम डार्विन, स्टीफेन हाकिंग की दुनिया में जी रहे हैं ? किसी आसमानी, ब्रह्मलोक में तो नहीं ? (Sorry, so I said ! 😢)
,,उग्र

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

स्वधर्म

स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः - - 
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तमाम माथापच्ची के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इस बात पर माथापच्ची व्यर्थ है कि हमें कैसे इस दुनिया से विदा किया जाय, अर्थात हमारा अन्तिम संस्कार किस विधि से हो ? हिन्दू रीति से या इस्लामी तरीके से ?
पेंच यह फँस रहा था कि हम ठहरे बुद्धिवादी नास्तिक लोग । स्वर्ग नर्क, पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते । अब यदि हिन्दू रीति से क्रियाकर्म हुआ और हमारे सत्कर्मों के फलस्वरूप ईश्वर ने ब्राह्मण घर में पैदा कर दिया तब तो हमारी ऐसी दुर्गति होगी कि ज़िंदगी नरक हो जायेगी । और यदि इस्लामी तरीके से दफ़्न किये गए थे भी वही दिक्कत । जन्नत जहन्नुम हो जायगी । 72 हूरें कौन झेलेगा ? 
इस पेंच में अम्बेडकर भी टपक पड़े थे । घोषणा कर दी - हिन्दू पैदा तो हुआ लेकिन हिन्दू मरूँगा नहीं । अब बताइये, अपना तो बौद्ध धर्म में हो लिए, हमको हिन्दू मुसलमान छोड़ गए । हो तो हम भी जायँ बौद्ध, और वह तो हैं ही । लेकिन क्या वहाँ कम पाखण्ड है/होगा ? कहीं निजात नहीं । क्या किया जाए ।
तब आता है एक सनातन उद्धारकर्ता श्लोक । स्वधर्मे निधनं श्रेयः - - - और स्वधर्म का मतलब जिस धर्म में पैदा हुए । फिर क्या था? हमने अम्बेडकर को उलट खड़ा किया, जैसे मार्क्स ने हीगल को किया था । फार्मूला निकला - जिस धर्म में पैदा हुए उसी धर्म में मरेंगे । भाई वाह कि पैदा हुए हिन्दू धर्म में उसने हमें गू मूत में लपेटा, और अब जब साफ सुथरे हुए तो मरने कहीं और चले जायँ? नहीं हमें पैदा करने की गलती वही झेले जिसने हमें पैदा किया । पैदा किया तो अंतिम संस्कार भी करो । दूसरा धर्म कोई तुम्हारा नौकर, सेवक, सहायक है क्या, जो तुम्हारी गन्दगी ले जाये ?
इस प्रकार सिद्धांत निकला - जहाँ से शुरू वहीं पर अंत । जहाँ पैदा हुए, वहीं मरेंगे । और इसके बीच जीवन भर धर्म की जड़ में मट्ठा डालकर इसकी सेवा करो । 😢
,,उग्रनाथ के 74 वर्ष पूरे होने पर आप मित्रों को शुभकामनाएँ ।💐

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

Dgspn

.        (संस्कृति-समाज-सत्ता का जोड़, श्रंखला-18)

                  (व्यक्ति विरोध या विचार विरोध)

         अम्बेडकरवाद एक तरफ "सामाजिक बदलाव" से जुड़ा है,  दूसरी तरफ यह "धम्म" से भी जुड़ा है | बाबा साहेब का कार्य दो ध्रुवी है | बड़ा कठिन है यह मार्ग | दो अंतर्विरोधों को साथ लेकर चलना कितना दुरूह है ! भगवान बुद्ध ने कहा है "दो" हैं मार्ग | बाबा साहेब को दोनों मार्गों को साथ लेकर चलना पड़ रहा है | इसलिए ही अम्बेडकरवादियों में अंतर्विरोध नजर आ रहा है, द्वंद नजर आ रहा है | अम्बेडकरवादी जब "समाज" की बात करते हैं, तो धम्म बीच में आ जाता है | जब "धम्म" की बात करते हैं, तब समाज बीच में आ जाता है |  जबकि दोनों की दिशाएं अलग अलग हैं | सवाल यह है कि दोनों में सामंजस कैसे बिठाएं ? नहीं, दोनों मार्गों पर एक साथ चलना सम्भव नहीं है |
       वस्तुत: "धम्म" सम्रद्धता की नींव पर ही खड़ा हो सकता है | किसी भवन को बनाने के लिए नींव पहले ही रखनी होगी | नींव केवल पहले ही नहीं, मजबूत भी रखनी होगी | बाबा साहेब सम्रद्ध समाज के ऊपर धम्म का आलीशान भवन प्रस्थापित करना चाहते हैं | बाबा साहेब के "सामाजिक मिशन" के आधार में "धम्म के जीवन मूल्य" समाए हुए हैं | यदि बाबा साहब के मिशन में से धम्म के पहलुओं को निकाल दिया जाए, तो यह मिशन निरर्थक हो जाएगा | बाबा साहेब को यदि बौद्ध जगत ने महत्व दिया है, तो वह बुद्ध के कारण ही दिया है |
       बुद्ध ने एक मानवीय दृष्टि दी है, कि विचार से तो सहमति व असहमति हो, परन्तु व्यक्ति से सदा सहमति बिना शर्त बनी रहे | बुद्ध किसी भी परिस्थिति में "मनुष्य" को इन्कार नहीं करते | इसमें हमेशा ऊपर उठने की सम्भावना बनी रहती है | बुद्ध ने मनुष्यों के बीच जोड़ने का इन्सुलेशन (रसायन) मैत्री भावना के माध्यम से दिया है | यह मैत्री-भाव भेदभाव रहित, व बिना शर्त है | इसमें ना तो पापी और पुण्यात्मा में भेद किया है, ना ही  ब्राह्मण शुद्र में,  ना ही गरीब अमीर में, ना ही स्त्री पुरुष में |
        बुद्ध "भेदवाद" (विचार) से तो असहमत हैं, पर भेदवादियों (मनुष्य) से नहीं | बहुत बारीक अन्तर है | बुद्ध "मन" से तो असहमत हैं, पर "चित्त" से नहीं | क्यों ? क्योंकि मन परिवर्तनशील (अनित्य) है, चित्त सनातन (एस धम्मो सनन्तनो) है | क्योंकि मन के बदलने की सम्भावना के आधार पर व्यक्ति को नहीं छोड़ा जा सकता है | व्यक्ति का विरोध न होकर, विचार का विरोध हो, सोच का विरोध हो, दृष्टि का विरोध हो | सभी व्यक्तियों के तो पक्ष में होना है, सभी व्यक्तियों के प्रति तो भले का भाव रखना है, तभी तो हम बुद्ध की मैत्री "भाव-भावना" का पालन कर पाएगें | नहीं तो सारा मिशन, धम्म के जीवन मूल्यों से भटक जाएगा | अम्बेडकरवादियों से चूक इसी बिन्दु पर हो रही है | उन्होंने "विचार के विरोध को ही व्यक्ति विरोध से जोड़ दिया है |" वे इस पहलू पर विचार करते वक्त अपने अन्दर द्वेष ले आए हैं | यही अलगाव व घृणा की जड़ बन कर अम्बेडकरवादियों की छवि खराब कर रही है  |
      बुद्ध की इस दृष्टि से प्रभावित होकर बाद में संतों की व नाथ पंथों की श्रंखला ने अपनी उदार भाषा में कुछ इस ढंग से अभिव्यक्त किया है | संतों ने कहा है, "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं |" यही बुद्ध की व बाबा साहब की मूल देशना है | मेरी दृष्टि इसी पर आधारित है | मैं इसी पर चलते हुए आगे बढ रहा हूं |

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

Neglect than Opposing God IHU

Reaction -
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एक अंतरराष्ट्रीय Humanist and Ethical Union से जुड़े भारतीय मानवतावादी संघ की यह नीति है (Published 27 July) कि :-
"The idea of God is likely to suffer more from neglect than opposition. But Atheists can't leave the subject alone!"
तो जी हुज़ूर, हमने राम मंदिर के मामले को अस्सी के दशक से ही लगभग छोड़ा ही हुआ है । कुछ विरोध भी करते तो कैसे करते ? नास्तिकों के पास इतनी ताक़त कहाँ थी ? हमारी ताक़त तो आपलोग होते । लेकिन आपतो हमें पीछे खींचने में लग गए । विरोध न करो, बस नज़रअंदाज़ करो । यह तरीका ज़्यादा प्रभावी होगा और मसला जल्दी से मर जायेगा ।
जी हमारे मान्य गुरुवर, सचमुच वही फलित हुआ । मामला कचहरी से तय हो गया और अब राम मंदिर 5 अगस्त से बनना शुरू होने जा रहा है । कोई गगनचुम्बी मूर्ति भी राम की लगने जा रही है, कितने मीटर की है आप भी जानें, या पता करके मोद पाएँ । हम भी निश्चिंत घर में बैठे हैं ।
और इसी क्रम में अब आपका पेज पढ़ना भी neglect करने लगे हैं । शायद idea of god more suffer कर जाए । और हम सब अपने लक्ष्य को प्राप्त कर प्रसन्न हों !☺️😊😢
,,उग्र

बुधवार, 1 जुलाई 2020

जिसकी लाठी वही सेक्युलर

सेक्युलरवाद: तब और अब (भाग- दो, अंतिम)
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पिछला लेख पूरा न हुआ कि मेरे मोबाइल का हिंदी (हिंदू हिंदुस्तानी नहीं) कीबोर्ड ख़राब हो गया । इसलिए इस लेख का जल्दी उपसंहार कर दूँ वरना अनुकूल विषय न होने के कारण यह फिर रुष्ट न हो जाये । 
अनुभव यह कि भारत में पश्चिमी सेकुलरी तो चलने से रही । यहाँ ब्रॉडला होलियोक का सिद्धान्त नहीं चलेगा । वहाँ एक पोप था तो राज्य ने छुटकारा पा लिया । यहां तो पोप ही पोप, पाप ही पाप , कैसे इनसे तालमेल बिठाये ?
अब इसके दर्शन, धर्म व्यक्तिगत, Thisworldy, परलोक विरुद्ध, धर्म राज्य से , राज्य धर्म से दूर, और Public health आदि की पारिभाषिक अध्ययन, समीक्षा और चीर फाड़ में न जाइए वरना हम आप उलझ जाएँगे जैसे देश 70 सालों से इसमें हैरान परेशान है । 
बस खुश होने की बात यह है कि हर संस्था पार्टी इसके गुण गाती है, जैसे विज्ञान की गाती है, चाहे इनकी मानें एक नहीं । हिन्दू भारत ने इसे पंथनिरपेक्ष जैसा शब्द अपनाया, तो गौर कीजिए यह तो हिन्दू ही हुआ। इसी में अनेक पंथ गुंफित पल्लवित हैं । मतलब धर्म को छूना नहीं । यह तो देश का प्राण है, धर्म तो नैतिकता है, कर्तव्य है । आगे भी कृपा यह कहकर की कि हिन्दू तो स्वाभाविक सेक्युलर है, विश्वबंधुत्व से लैस है, कोई पश्चिम इसे नीति का पाठ न पढाये । इन्होंने यहाँ चार्वाक को उद्धृत न कर सनातन को ही सुयोग्य बताया । इस तरह यह शब्द देश में जिंदा या मरा पड़ा रहा । बाद में संविधान में इसका नाम अंग्रेज़ी में जोड़ा गया । 
तो मुक्तक यूँ बनता है :-
'हिंदुस्तान के मानी सेक्युलर
देश की बूढ़ी नानी सेक्युलर;
सती साध्वी? यानी सेक्युलर,
लालकृष्णअडवानी सेक्युलर !"
इस तर्ज़ पर शिवसेना, बजरंग दल सब सेक्युलर ।
तो मुस्लिम समाज क्यों पीछे रहता ? उसने भी दावा किया , इस्लाम भाई चारा, शांति, अम्न चैन, प्रेम मोहब्बत का मज़हब है । मानना ही पड़ेगा । बस केवल वह हम लोग सेक्युलर नहीं माने जायँगे जो सेक्युलर नाम की सतत गाली दोनो तरफ से खाने को पाते हैं । तो ऐसी दशा में निष्कर्ष क्या निकला? वही उपसंहार है । इसकी व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय परिभाषा बड़ी विनम्रता पूर्वक यह बनती है । 
कि जिस देश में जिसकी लाठी उसी के पास सेक्युलर थाती । प्रत्येक देश का बहुजन सेक्युलर माना जाय, इस ज़िम्मेदारी के साथ कि वह अल्पजन का ख्यालबात रखे । शेष तरीके से secularism सम्भव नहीं । उदाहरणार्थ -
खाड़ी मुल्कों में इस्लाम को सेकुलर स्वीकार किया जाय (तभी यह इस पर खरा भी उतरेगा)! यूरोप में Secularism को सेक्युलर मान उसकी प्राथमिकता स्वीकार किया जाय (अब पोप क्षीण शक्ति है, और जनता भी पर्याप्त नास्तिक सेक्युलर) ! चीन में मार्क्सवाद को सेकुलर संज्ञा दें।
 अब भारत की बात करना तो गैरज़रूरी है । यहाँ हिन्दू को सेक्युलर न माना गया औऱ इनपर अल्पसंख्यकों की नैतिक जिम्मेदारी न मानी गयी तो अनिष्ट होगा । सब अपने देश पर सेक्युलर राज्य फ़रमायें । 
यहीं नागरिकों का फर्ज़ भी बनता है कि अरब देश में हिंदुत्व का झंडा न लहरायें, इस्लाम के अंतर्गत रहें। यूरोप अमरीका में हिन्दू मुसलमान उत्पात करने की न सोचें । वहाँ democratic civil secular व्यवहार करें ।
दुनिया बंटी हुई है । बँटा हुआ सेक्युलरवाद ही चलेगा । जब Communist International नहीं चला तो कैसे उम्मीद करें, International Secularism चल पायेगा ? यह नितांत व्यावहारिक, practical नीति है । उसके किताबी सिद्धांत पर तो मैं इतना लचर (या अद्भुत?☺️) सुझाव देते हुए भी दृढ़ता से कायम हूँ, उसे जानता, समझता, लागू करने के प्रयास करता हूँ । साथी मित्र scientific temper के साथ, विज्ञान को जनचेतना में उतारने, हिंदी अर्थ में विज्ञान धर्म फैलाने में संलग्न हैं ।  कुछ उत्साही मित्र वैज्ञानिक समाजवाद में भी धर्म के गुण ढूँढ चुके हैं, शायद आ ही जाए। वह सब चलता रहेगा सफल भी होगा , क्योंकि यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत छूट प्राप्त है कि किसी भी महान मूल्य को धर्म की प्रतिष्ठा दी जाय । अतएव- 
जय मानव, जय व्यक्तित्व, जय विज्ञान, जय समाजवाद, जय नागरिक धर्म !👍💐
,,,उग्र

सोमवार, 22 जून 2020

मार्क्सवाद सिद्धांत है, विचारधारा नहीं, रोज़ बदलने वाली

Suresh Srivastava
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भागो की मौत का जिम्मेदार कौन?
   जनसत्ता, 17 जून 2015 में, 'हक़ के लिए' आलेख में भागो के ज़रिए निवेदिता ने रेखांकित किया है कि भागो जैसी हज़ारों दलित  महिलाएँ लोगों के हक़ के लिए लड़ते हुए जान दे देती हैं पर दलित महिला होने के नाते उनकी मौत ख़बर नहीं बनती है। वे भूल जाती हैं कि दूसरों के हक की लड़ाई लड़ने वाले/वालियां अपने आप को खाँचों में नहीं बाँटते/बाँटती हैं, जिनकी रुचि केवल ख़बरों में होती है, वे ही लड़ाकुओं को स्त्री या पुरुष, दलित या सवर्ण, अगड़ा या पिछड़ा, हिंदीभाषी या अहिन्दीभाषी, हिंदू या मुसलमान जैसे खाँचों में बाँट कर, वंचितों की हक़ की लड़ाई के लिए आवश्यक एकजुटता को कमज़ोर करते हैं। और अगर कुछएक, चाहे वह भगत सिंह हो या निर्भया हो, का बलिदान ख़बर बन भी जाता है तो भी वह उद्देश्य, जिसके लिए बलिदान दिया गया, क्या कहीं भी पूरा होता नजर आता है। इतिहास कहता है कि इसका उत्तर तो 'नहीं' के अलावा कुछ और नहीं हो सकता है। नब्बे साल पहले के भगतसिंह हों या आज के दौर के नक्सलवादी या माओवादी हों, उन बेशक़ीमती जवानियों की असफल शहादत और असमय मौत का ज़िम्मेदार कौन है? क्या राजसत्ता के कारकुन जल्लाद या सिपाही, या सामंतों की रनबीर सेना के हथियारबंद दस्ते? या फिर अस्तित्व के लिए संघर्षरत शोषित वर्ग के स्वघोषित पैरोकार बुद्धिजीवी, जो शोषितों को शोषकों विरुद्ध उकसाने का काम बख़ूबी अंजाम देते हैं, पर जो स्वयं न तो शोषण की क्लिष्ट प्रक्रिया को समझते हैं और न ही उसमें सार्थक हस्तक्षेप कर सकने की क्षमता विकसित कर सकने का रास्ता जानते हैं।
   बुद्धिजीवियों का एक वर्ग है जो समाजवाद की दुहाई तो देता है पर मार्क्सवाद को सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यह वर्ग अभिव्यक्ति की व्यक्तिगत आज़ादी को अनुल्लंघनीय नियम के रूप में स्वीकार करता है और अस्मिता की राजनीति को क्रांतिकारी संघर्ष मानता है, इसलिए उसके पास न कोई सिद्धांत हो सकता है और न ही वह संगठित संघर्ष के महत्व को समझ सकता है। पर जो मार्क्सवादी होने का दम भरते हैं और कम्युनिस्ट पार्टी के नाम पर एकजुटता का दावा करते हैं, वे भी मार्क्सवाद को एक सिद्धांत के रूप में न देखकर एक विचारधारा के रूप में देखते हैं जिसको निरंतर विकसित किये जाने की आवश्यकता है, और विचारधारा को विकसित करने के नाम पर, वैज्ञानिक समाजवाद को नकार कर, काल्पनिक समाजवाद को अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार परिभाषित कर, फ़िलवक्त के लिए प्रासंगिक विकसित समाजवाद के रूप में पेश करते रहते हैं। 
   इस प्रचलित धारणा, कि कम्युनिस्ट पार्टी ग़रीबों की पार्टी होती है, का अनुकरण कर भागो भी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गयी, बिना यह जाने-समझे कि बिना क्रांतिकारी सिद्धांत के कोई भी क्रांतिकारी पार्टी नहीं हो सकती है। लेनिन ने आगाह किया था कि ' जो कोई भी संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों, जिनके चलते मतभेदों के समाधान पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते हैं, को नहीं समझता है, वह व्यापक मजदूरवर्ग को ऐसे फ़ैसलों में विजयी अभियान के लिए तैयार करने के मक़सद से संसदवाद के आधार पर कभी भी उसूल सम्मत प्रचार तथा आंदोलन नहीं चला सकता है।' और पिछले नब्बे साल के इतिहास में हर निर्णायक अवसर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा लिए गये ग़लत फ़ैसले और व्यापक मजदूरवर्ग को विजयी अभियान के लिए तैयार करने में उनकी असफलता, इस बात की तसदीक़ करते हैं कि भारतीय कम्युनिस्टों के बीच उस सिद्धांत की समझ नदारद है, जिस सिद्धांत के बारे में मार्क्स ने कहा था कि 'सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है और जनता के मन में घर वह तब करता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनक़ाब करता है।' 
   मौजूदा विखंडित कम्युनिस्ट पार्टियों के रूप में संशोधनवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और उनके अवसान में निहित है भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का प्रस्थान बिंदु। 

सुरेश श्रीवास्तव 
22 जून 2015
marx-darshan.blogspot.in

पाखण्ड पार्टी

पाखण्ड पार्टी?
(भारतवर्ष का सनातन अधिकार)
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इसमें कोई शक़ नहीं कि "हम भारत के लोगों" को भारतीय दार्शनिक दिशा नहीं दे सके । कि धर्म का क्या रहना क्या फेंका जाना है?और godless spirituality भी कोई चीज है । धर्म सम्प्रदाय विहीन जीवन भी सम्भव है?  लेकिन यह पाखण्डी धर्मगुरुओं के वश की बात न थी, न है । इसका प्रणयन मार्क्सवाद के अनुसार ही सम्भव है । लेकिन मार्क्सवादी तो पहला काम यह करते हैं कि देश से बाहर चले जाते हैं । और यह भी नहीं कि क्यूबा से चेग्वेरा बनकर आते, पता नहीं कहाँ की बहस में फँस समय नष्ट करते हैं ।
अन्यथा बिल्कुल समीचीन था, यह उनकी तार्किक बौद्धिक क्षमता में थी कि वह Historical Materialism ऐतिहासिक भौतिकवाद की तरह Historical Spiritualism, ऐतिहासिक अध्यात्मवाद / प्रतिपादित करते । 
ज़मीनी स्थिति यह है कि नास्तिक भी कर्तव्य च्युत हैं, वामपंथ तो नास्तिकता के प्रथम step को भी ज़रूरी नहीं मानता, तो क्या खाक़ कुछ सोचेगा ? इनपर शोध करने के बजाय धर्म और अध्यात्म से ऐसा मुँह चिढ़ाते हैं मानो यह मनुष्य के विषय ही न हों, जब कि सबके सब धर्म योग में खूब संलिप्त, मुब्तिला हैं । (पाखण्ड करते भारती?)
अब तो बड़ी मुश्किल स्थिति है । मैं अपने को isolated और अकेला पाता हूँ। कोई नया चिंतन आ ही नहीं रहा। कोई सुनता ही नहीं, और मैं यह मान ही नहीं सकता कि मैं सम्पूर्णतः गलत हूँ। तो उस पर विचार तो होना चाहिए। मैं कहता हूँ धर्म को वैज्ञानिक बनाओ तो भाई कहते हैं धर्म अलग है, विज्ञान अपनी सीमा में रहे । तो यदि कहूँ राजनीति को वैज्ञानिक बनाओ तो भी कौन सुनेगा? इसी वाहियात राजनीति में सबको मज़ा जो आ रहा है। यह तो तब जब वैज्ञानिक समाजवाद जैसी विचारधारा उपलब्ध है और राजनीति को विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के रूप में ही पढ़ाया जाता है ( उसमें विज्ञान कहाँ है?)!
तो ठीक है भाई, व्यक्ति अलग, समाज अलग, राज अलग, धर्म अलग, अध्यात्म अलग, सोच अलग कर्म अलग ही जिया जाय ! यही तो "पाखण्ड पार्टी" है !☺️ Join it friends !💐(छुद्रनाथ)

मंगलवार, 16 जून 2020

विज्ञान धर्म की स्थापना

Rakesh Mishra Kumar To Ugranath
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वैज्ञानिकता को बिलकुल धर्म कह सकते हैं ।भारत में तो ज़रूर कह सकते हैं ।इसे संप्रदाय ,पंथ ,
मसलक नहीं कह सकते क्योंकि कि वैज्ञानिकता ,धर्मों की तरह बाँटी नहीं जा सकती ।
भारत में धर्म के पहले ही अनेक अर्थ हैं ।मनु के मुताबिक़ अहिंसा ,सत्य ,अस्तेय ,शौच ,इन्द्रिय निग्रह धर्म के 10 लक्षण हैं ।महाभारत के अनुसार जो भी धारण करने योग्य है ,वह धर्म है ।धर्म शब्द का अर्थ स्वभाव भी होता है ।वैज्ञानिकता तो मनुष्य का स्वभाव है ,इसलिए धर्म है ।अंग्रेज़ी में ईश्वर और उसकी प्रेषित किताब की लिखत को religion कहा गया 
मगर इसका एक शब्द कोशीय अर्थ किसी धारणा ,नियम सिद्धान्त के लिए दृढ़ विश्वास भी है ।अगर कहें कि humanism is my religion या कि patriotism is my religion तो मैं नहीं समझता कि इसमें कोई व्याकरणिक गलती है ।
बुद्ध का धम्म किसी देवी -देवता में विश्वास और इबादत से कोई ताल्लुक़ नहीं रखता अपितु मानवीय आचार का बयान है ।
इसलिए मैं आपका समर्थन करता हूँ ।वैज्ञानिकता ही हमारा धर्म है जिसे हम प्रचारात्मक धर्मों के मुक़ाबले ज़्यादा जोश ओ जुनून के साथ फैलाएँगे भी ।

गुरुवार, 11 जून 2020

Religiosity

मैं एक बड़ा काम करना चाहता हूँ । बड़ा काम कहने के लिए कह रहा हूँ, विनम्रतावश, वरना कवि के लिए किसी चाँद तारे की दूरी कुछ ख़ास नहीं होती ।
बात यह थी कि मैं Spirituality और Religiosity को धर्म के हाथ से छीनकर Science के हाथ में देना चाहता हूँ । क्योंकि यह सब काम धर्म के वश का नहीं है । विज्ञान ही है जो इनका सही उपयोग कर सकता है । करता ही है, करता ही रहा है । सच्चे आध्यात्मिक और धार्मिक तो वैज्ञनिक ही हैं, जो सृष्टि, सृजन की चरणों में बैठकर उसे भलीभाँति समझना चाहते हैं । सृजनकर्ता की सच्ची पूजा आराधना तो विज्ञान करता है । धर्म अनावश्यक इसमें टाँग अड़ाकर छिछली कल्पनाओं के बल पर बड़ा भारी spiritual और religious होने का खिताब अपने माथे पर धरने की धृष्टता करता रहा । अब उसकी यह हिमाक़त चलने न पाएगी । वह यह मान ले कि आदमी को मूर्ख बनाने का उनका धंधा है धर्म, और धंधे तक ही सीमित रहें । ज्ञान विज्ञान पर उनका दावा निरर्थक और अनावश्यक है, वह माना न जायगा । व्यक्ति चाहे तो कोई धार्मिक आस्था व्यक्तिगत सीमा तक रखे, इसका अधिकार secularism और democracy की राजनीतिक व्यवस्था उसे देती है । लेकिन उसके आगे वह न बढ़े । बढ़ेगा तो लताड़ा, अपमानित और सम्भवतः किसी समय राज्य द्वारा दंडित भी किया जा सकता है । धार्मिक भावना को ठेस लगना तो साधारण बात है, जिसे हम संज्ञान में ही नहीं लेते ।
यह भी नहीं चलेगा कि इन दोनों महान मानुषिक क्षेत्रों का दोनो ही इस्तेमाल करें, दोनो अपना कब्ज़ा रखें । इससे भ्रम होगा कि कोई ज्ञान वैज्ञानिक है या धर्मिक । इसलिए मैं इन विषयों पर विज्ञान के एकाधिकार देना चाहता हूँ ।
अर्थात कोई वैज्ञानिक ही आध्यात्मिक और धार्मिक चेतना युक्त हो सकता है, कोई पोप पुजारी नहीं । धार्मिकों को तो निकृष्टजन समझा जाए, जैसा कि वह हैं । और एक उदाहरण के लिए मार्क्स को मैं महान धार्मिक आध्यात्मिक व्यक्ति की संज्ञा देना चाहता हूँ ।
तो यह काम मैंने किया religious, spiritual. (☺️हास्य का इमोजी लगा दूँ जिससे कोई बुरा न माने😊)
और आपको क्या काम करना है? वह यह कि जब कोई बाबा टाइप आदमी जोकर जैसे कपड़े पहने (ऐसे बहुत मिलेंगे आपको) दावा करे कि वह बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक शक्ति वाला है, तो ज़रा उस पर ठठाकर हँस दें, उसकी जोरदार खिल्ली उड़ा दें । ध्यान दीजियेगा, कोई वैज्ञानिक अपने बारे में ऐसा कुछ नहीं कहेगा । वह तो प्रकृति का विनम्र सेवक है । आपको बिना उसके बताए उसको आदर प्रदान करना है । 
#हैशा (उग्रनाथ नागरिक)
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PS- टैग करना/ किया जाना मुझे अच्छा नहीं लगता । तो ध्यानाकर्षण हेतु कुछ मित्र चिंतकों को mention भर कर रहा हूँ । Gauhar Raza, Vir Narain, Surendra Ajnat,  Hirday Nath, Narendra Tomar, Rakesh Mishra Kumar, Vijay Kumar, Abhishek Wasnik, Dilpawan Tirkey, Azad Rao, Nitin Gaur, Chandan Singh एवं साथी।
जो मित्र इस group में न होंगे वह comment न कर सकेंगे, इस के समाधान हेतु इसे अपने Timeline पर भी share कर रहा हूँ जहाँ वह कमेंट कर सकेंगे । सादर स्वागत है।💐

बुधवार, 27 मई 2020

जीवन प्रपत्र

अलबत्ता मेरे प्रगतिशील, बुद्धिवादी लोग मुझसे नाराज़ हो जाते हैं, लेकिन मैं अपनी बात कहने से तो बाज़ आऊँगा नही । 
बात यह है कि हमें जीवन के किसी भी क्षेत्र Column को खाली नहीं छोड़ना चाहिए, भले उसमें Nota या N/A, not applicable ही लिखें , लेकिन कुछ दर्ज ज़रूर करें जितनी बुद्धि कहे, जानकारी हो । ऐसा नहीं करेंगे तो  हमारे जीवन का प्रपत्र, Form या Progress Report अधूरा रह जायेगा जो  प्रकृति को acceptible, मान्य न होगा । आप फेल हो जायेंगे।
अब वह क्षेत्र चाहे अपने नाम, पिता का नाम, निवासी, राष्ट्रीयता का हो या फिर आगे जाति धर्म संस्कृति,सम्प्रदाय, राजनीतिक विचारधारा का हो, और इनसे जुड़े तमाम प्रश्न ! अतिरिक्त भी कोई क्षेत्र सड़क बाग जंगल की झाड़ियों से निकाल पकड़कर उस पर अपनी बौद्धिक टाँग लगा देनी चाहिए, जो उचित लगे ।
यदि ऐसा न किया गया, और आपने कोई Field छोड़ दिया, तो उस पर काला कौआ, पैने चोंच वाले गिद्ध, नहीं तो छिपकली, चमगादड़, साँप बिच्छू कॉकरोच ही । और तब आप इनके वहाँ होने का परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिएगा । राजनीति ही नहीं, विज्ञान, अध्यात्म, धर्म देश सबके साथ यही हो रहा है क्योंकि हमने उन्हें उनके भरोसे छोड़ रखा है । अध्यात्म पाखण्ड है, धर्म की क्या ज़रूरत ? जाति कहाँ बची है , और फिर यह भी कि हम तो राजनीति से दूर हैं, बड़ी गंदी जगह है, दूर ही रहेंगे ।

बहरहाल आप विशिष्ट हों तो हों, यह सामान्य मनुष्य की संचेतना है ।👍
(उग्रनाथ)

सोमवार, 18 मई 2020

सड़क पर शूद्र

ये जो सड़क पर आ रहे हैं, सारे के सारे शूद्र हैं, भले उनमें कुछ जन्मना कथित ब्राह्मण जाति के हों । लेकिन जो कमाकर खाता है वह शूद्र है । ब्राह्मण तो बैठे ठाले दूसरे के श्रम पर खाता है । 
दूसरी ओर सत्त्ता पर ब्राह्मण शोषक विराजमान है । सत्ता सदैव ब्राह्मण कही जायगी क्योंकि वह शोषक है और सम्प्रति तो अत्याचारी भी । 
तो बंटवारा ब्राह्मण और शूद्र के बीच है । कब तक हम ब्राह्मण को पूँजीवादी, सामंतवादी, बुर्ज़ुआ, फासिस्ट आदि तमाम नामों से नवाज़ते और जनता को अस्पष्टतः भ्रमित करते रहेंगे, जबकि वह ब्राह्मण शब्द को समूल आसानी से समझ और आत्मसात कर लेता है ? जनता के बीच जनता की भाषा के साथ नहीं जाना क्या हमें कम्युनिस्टों की तरह ?
दूसरी ओर कम्युनिस्टों की तरह ही हम कब तक इंतजार करेंगे कि ये सड़क के लोग वर्गचेतना से लैस हों, मार्क्सवाद में प्रवीण हों तब हम क्रांति करेंगे ? अथवा हम कब तक इनसे इंतज़ार करेंगे कि ये अम्बेडकरवादी बनें और जय भीम का नाद करें ? अथवा ये बौद्ध धम्म ग्रहण करें , नमो बुद्धाय का उद्घोष करें तब दलित राजनीति सफल हो ? नहीं, दलित सवर्ण कुछ नहीं । ये दोनो ही जन्मना पहचानें हैं, जो सही नहीं है और हम जाति धर्म विरोधियों को स्वीकार भी नहीं होना चाहिए । विभाजन केवल ब्राह्मण (शोषक) और शूद्र (शोषित) में है, वह भी देसी शब्दावली में । गौर करें तो इस विचार में मार्क्सवाद और अंबेडकर वाद सम्मानजनक रूप में समाहित है, कहीं कोई खोट या कमी नहीं, यदि कोई वादी अपने वाद को जड़ता से पकड़े बैठा न हो ? 
तो सारे श्रमिक शूद्र हैं और सारी सत्ता ब्राह्मण । द्वंद्व केवल इन दोनों के बीच होना चाहिए, न कि जाति धर्म सम्प्रदाय के नाम पर ।
(श्रावस्ती सम्यक/suggestion)

चकमक

चकमक पत्थर रगड़ते रगड़ते आख़िर तो चिंगारी निकली । धीरे धीरे आग फैलाता रहूँगा ।
श्रावस्ती सम्यक(suggestion)
For - शूद्र सरकार